अलका सरावगी के कथासाहित्य : अस्तित्त्व की तलाश: आज़र ख़ान

शोधार्थी, हिंदी विभाग, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़

समकालीन कथासाहित्य में अलका सरावगी का विशेष महत्त्व है। इन्होंने अपनी कहानियों और उपन्यासों में व्यक्ति की मनोदशा का वर्णन सहज रूप में किया है। इनकी कहानियों और उपन्यासों का कथा क्षेत्र कलकत्ता शहर है और इसमें संदेह नहीं कि अलका सरावगी अपने परिवेश के रग-रग से परिचित हैं। इन्होंने आधुनिक हिंदी कथा क्षेत्र में संवेदनशीलता और वातावरण की मार्मिक तथा सूक्ष्मतलदर्शी पकड़ के कारण अपना स्मरणीय स्थान बना लिया है। कई अंतरंग स्रोतों से उपलब्ध जानकारियों के अनुसार सन् 1996 में ‘कहानी की तलाश में’ कहानी संग्रह का प्रकाशन हुआ जो कि इनका पहला कहानी संग्रह है। इस कहानी संग्रह में छोटी-छोटी सत्रह कहानियाँ हैं, जिनमें व्यक्ति की रोज़मर्रा की ज़िंदगी की झलक दिखाई देती है। इन कहानियों में स्त्री विमर्श का एक नया रूप सामने उभरकर आया है। अलका सरावगी का दूसरा कहानी संग्रह ‘दूसरी कहानी’ का प्रकाशन सन् 2000 में हुआ इस कहानी संग्रह की कहानियाँ ‘‘यथार्थ को तथ्य-सीमित करने की रूढ़ि को ध्वस्त करती हैं। घटनाओं का बोझिल आडंबर छोड़कर वे कहानी विधा की नई मुक्ति का ऐसा संकेत देती हैं कि हम कहानी को गद्य-कथा या कथा-निबंध की तरह पढ़ सकें। वे तथाकथित यथार्थवादी कहानी के ढाँचे को विचलित कर मानव व्यवहार और प्रकृति के आधे-अधूरे प्रारूप या पाठ की तरह दिख सकती हैं। इसी अधूरेपन, इसी अनहोनी में अलका सरावगी की कहानियों का अर्थ छिपा है। दूसरी कहानी संग्रह की कहानियाँ ‘पार्टनर’, ‘एक पेड़ की मौत’, ‘दूसरे किले में औरत’, ‘यह रहगुज़र न होती’, ‘कनफेशन’ हैं। संकेत है कि शायद जीवन पूर्णता या सार्थकता की संभावना इसी अपूर्णता या अधूरेपन में है। देखने की चीज़ यह है कि इस कथा-कल्पना में क्रीड़ा-वृत्ति या विनोद-वृत्ति स्थगित नहीं है, पर वह प्रायः एक तरह के जीवन विषाद या अवसाद का ही मार्मिक प्रत्यक्ष है। इस अवसाद को महान बनाने की भावुकता से मुक्त अलका सरावगी का कथा-मार्ग साधारण या मामूली पर भरोसा टिकाता है, जो इस ओर इशारा है कि साधारण में ही छिपा है, ग़ैर-साधारण या असाधारण का मर्म।”1

अलका सरावगी की कहानियाँ अपनी बनावट या संरचना, स्वभाव या प्रकृति, शिल्प में हिंदी कहानी की परंपरा में एक अलग और नई पहचान लेकर उपस्थित होती हैं, अतः एक नई कथा धारा का आरंभ इनसे होता है। यह हिंदी की पहली कथाकार है, ‘जो प्राणों में घुले हुए रंग’ और ‘मन के रंग’ को यानी मनुष्य के राग-विराग और प्रेम को, दुःख और करूणा को, हास-उल्लास और पीड़ा को अपनी कहानियों में एक साथ लेकर ‘आत्मा के शिल्पी’ के रूप में उपस्थित होती हैं। साथ ही वे मनुष्य का चित्रण एक ठोस ज़मीन पर, एक काल विशेष में करती हैं। अपनी कहानियों के माध्यम से अलका सरावगी ने सामाजिक जीवन की सशक्त अभिव्यक्ति की है और हिंदी कथासाहित्य में अपनी स्थिति निर्मित की है। कहानी के द्वारा समाज के उन सभी पक्षों को प्रस्तुत करने का प्रयास किया है, जो अनगढ़ हैं, विसंगतिपूर्ण हैं और जिनकी अपनी राजनीति, धर्म, मूल्यबोध की सीमा और अर्थवत्ता है। अलका सरावगी की कहानियों में समाज की आर्थिक दशा के साथ-साथ संस्कृति के उत्थान-पतन की स्थितियाँ भी व्यंजित हुई हैं। स्त्री-पुरुष संबंधों, रूढि़यों, परंपराओं और आधुनिकताबोध के स्वस्थ एवं अस्वस्थ पक्षों का चित्रण भी इनमें देखा जा सकता है, साथ ही नारी की स्थितियों के विविध रूप भी प्रकट हुए हैं। अधिकांश नारी पात्रों में समाज से विद्रोह करने की क्षमता है, पर उन नारी पात्रों की संख्या अधिक है जो रूढ़ियों, अंधविश्वासों, आडंबरों और दारिद्रय की शिकार हैं। जिनकी आकांक्षाएं, मनोकामनाएँ किन्हीं स्तरों तक उभरते-उभरते मरण का वरण करती हैं। ‘कहानी की तलाश में’ कहानी संग्रह की कहानी ‘बहुत दूर है आसमान’ में अलका सरावगी नें ठीक ही लिखा है कि ‘‘क्या यही ज़िदगीं है लड़कियों की? क्या मेरी गुल्लू बचपन में ही अपनी मर्जी से खेल-कूद नहीं सकती? क्या लड़कियों को इतना भी अधिकार नहीं है? गुल्लू कितनी ऊँची-ऊँची पैंगें लेती है झूले पर। दीवाल पर चढ़कर बिना डरे दौड़ती है। उसके बराबर के उम्र के लड़के तो घुग्गू हैं उसके सामने। कितना जीवन है उसमें! तो क्या मैं यह मान लूँ कि लड़कियों को बचपन से ही खुली हवा नहीं मिल सकती?’’2 इन नारियों की अनुभूति का अहसास किन्हीं पात्रों को हुआ है पर अनेक ऐसी हैं जिनकी चीख नक्कारखाने में तूती की आवाज़ बनकर रह जाती हैं।

उपन्यास विधा अलका सरावगी के लेखन का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है। आधुनिक उपन्यास लेखन में अलका सरावगी का नाम अग्रगण्य है। इन्होंने उपन्यास विधा में अपनी बहुमुखी प्रतिभा का पूर्ण परिचय देकर कथासाहित्य के क्षेत्र में अद्वितीय सफलता प्राप्त की है। नारी की अस्मिता के लिए आधुनिक सामाजिक परिवेश में जो लेखिकाएँ अपनी क़लम से संघर्ष कर रही हैं, उनमें अलका सरावगी का नाम अग्रणी है। इनके उपन्यास यथार्थ की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम हैं। उपन्यासों में न केवल नगरीय और महानगरीय जीवन बोध मुखर हुआ है, बल्कि व्यक्ति के अंदर का वह द्वंद्व भी सामने आया है जिससे वह दिन रात जूझता है। अलका सरावगी का प्रथम उपन्यास ‘कलि-कथा: वाया बाइपास’ सन् 2000 में प्रकाशित हुआ। ‘‘कलि-कथाः वाया बाइपास 1925 में जन्में किशोर बाबू की कहानी है-किस तरह दिल के बाइपास आपरेशन के बाद वे अपने कैशोर्य की दुनिया में चाले जाते हैं और उन्हीं दिनों की तरह उलझनों में जूझते कलकत्ता शहर में पैदल चक्कर लगाते सड़क मापने लगते हैं यह चक्कर मानो एक वर्तुलाकार कालचक्र है जिसमें अतीत, वर्तमान और भविष्य के बीच कोई विभाजन नहीं है। यह अनायास किशोर बाबू को अपने पुरखों की दुनियाँ में ले जाता है-अपने ग्रेट ग्रैंडफादर रामविलास बाबू की दुनिया में लौटना किशोर बाबू की कथा का वह बिंदु है जो जाड़े में दूर देशों से आनेवाली चिड़ियों की तरह अपनी मातृभूमि से दूर हो गई एक जाति-मारवाड़ी और एक शहर कलकत्ता की साझी औपन्यासिक कथा रचता है।’’3

अलका सरावगी का दूसरा उपन्यास ‘शेष कादम्बरी’ सन् 2001 में प्रकाशित हुआ। ‘‘अलका सरावगी का यह दूसरा उपन्यास एक सदी से दूसरी सदी तक के समय और स्मृतियों के इतिहास के तनाव से नई उत्सुकता को जगाता है और साथ ही उपन्यास के परिचित ढाँचे को एक बार फिर तोड़ने की नई चुनौती भी पैदा करता है।’’4 इस उपन्यास में समाज से जुड़ी नारी के अनेक रूपों का वर्णन है जो कि किसी न किसी रूप में समाज के द्वारा सताई गई हैं या किसी अन्य रूप में अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए प्रयासरत हैं।

‘कोई बात नहीं’ अलका सरावगी का यह उपन्यास सन् 2004 में प्रकाशित हुआ। यह उपन्यास जैसे एक मंत्र है-हार न मानने की जिद और नई शुरुआतों के नाम। इस उपन्यास को ‘‘मोटे तौर पर इसे शारीरिक रूप से कुछ अक्षम एक बेटे और उसकी माँ के प्रेम और दुःख की साझेदारी की कथा के रूप में देखा जा सकता है, पर इसका मर्म एक सुंदर और सम्मान पूर्ण जीवन की आकांक्षा है, बल्कि इस हक की माँग है।’’5 इस उपन्यास की कथा सत्रह वर्षीय शशांक पर आधारित है। शशांक दूसरे बच्चों से अलग है क्योंकि वह दूसरों की तरह चल और बोल नहीं सकता। कलकत्ता के एक नामी मिशनरी स्कूल में पढ़ता हुआ वह ग़ैर बराबरी का जीवन जीता है। स्कूल में उसका एक मात्र दोस्त आर्थर सरकार है। ‘‘शशांक का जीवन चारों तरफ से तरह-तरह के कथा-किस्सों से घिरा है। एक तरफ उसकी आरती मौसी है, जिसकी प्रायः खेदपूर्वक वापस लौट आनेवाली कहानियों का अंत और आरंभ शशांक को कभी समझ में नहीं आता। दूसरी तरफ उसकी दादी की कहानियाँ हैं-दादी के अपने घुटन भरे बीते जीवन की बार-बार उन्हीं शब्दों और मुहावरों में दोहराई जाती कहानियाँ, जिनका कोई शब्द कभी अपनी जगह नहीं बदलता, लेकिन सबसे विचित्र कहानियाँ उस तक पहुँचती हैं जतीन दा के मार्फत, जिनसे वह बिना किसी और से जाने, हर शनिवार विक्टोरिया मेमोरियल के मैदान में मिलता है। ये सभी आतंक और हिंसा के जीवन से जुड़ी कहानियाँ हैं जिनके बारे में हर बार शशांक को संदेह होता है कि वे आत्मकथात्मक हैं, पर इस संदेह के निराकरण का उसके पास कोई रास्ता नहीं है।’’6 एक भयानक घटना घटती है, जिससे उसके जीवन में भूचाल आ जाता है। ऐसे समय में यह कथाएँ उसके लिए संजीवनी का काम करती है।

अलका सरावगी का चौथा उपन्यास ‘एक ब्रेक के बाद’ है। यह उपन्यास सन् 2008 में प्रकाशित हुआ है। यह उपन्यास के. वी. शंकर अयर के जीवन पर आधारित है। ‘‘उम्र के जिस मुकाम पर लोग रिटायर होकर चूक जाते हैं, के. वी. शंकर अयर के पास नौकरियाँ चक्कर लगा रहीं हैं। के. वी. मानते हैं कि इंडिया के इकोनॉमिक ‘बूम’ में देश की एक अरब जनता के पास खुशहाली के सपने हैं। दुनिया का शासन अब सरकारों के हाथ नहीं, कॉर्पोरेट कंपनियों के हाथों में है।’’7 उपन्यास के दूसरे पात्र गुरु चरण राय हैं जो के. वी. की बातों को बिना किसी तर्क के सुनते हैं। उपन्यास के तीसरे पात्र भट्ट की आदत एक नौकरी से दूसरी नौकरी के कारण शहर-शहर भटकने की है। इस उपन्यास में कॉर्पोरेट इंडिया की तमाम विडंबनाएँ हैं तो कहीं ‘पोगापंथी’ पिछड़ा भारत है, जहाँ तीस करोड़ लोग ज़िंदगी जीते हैं।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि अलका सरावगी ने अपने कथासाहित्य में पात्रों को नए रूप में उभारा है इनके कथासाहित्य में नारी विमर्श का जो रूप सामने आया है वह एकदम नया है क्योंकि अपने विमर्श में वह नारी विमर्श की परंपरा से हटकर एक नया नारी विमर्श करती दिखाई देती हैं। इनके उपन्यासों की नारी पात्र आम ज़िंदगी जीती घरेलू नारियाँ हैं, जो कि अपने ही समाज द्वारा तथा अपनो द्वारा शोषित की गई हैं। इन नारी पात्रों में कुछ अपनी अस्मिता की पहचान को खोजने में लगी हैं और कुछ अपनी अस्मिता को भूलकर सिर्फ बेटी, पत्नी या माँ का पर्याय बन चुकी हैं। इसके साथ ही एक किशोर की मनः स्थिति का चित्रण भी उन्होंने सहेजता के साथ किया है। कहा जा सकता है कि अलका सरावगी का प्रत्येक पात्र अपने अस्तित्त्व को खोजता हुआ दिखाई देता है।

संदर्भ-

1. अलका सरावगी, दूसरी कहानी, फ्लैप से

2. अलका सरावगी, कहानी की तलाश में, पृ॰ 45-46

3. अलका सरावगी, कलि-कथा: वाया बाइपास, पृ॰ फ्लैप से

4. अलका सरावगी, शेष कादम्बरी, फ्लैप से

5. अलका सरावगी, कोई बात नहीं, फ्लैप से

6. वही, पृ॰ फ्लैप से

7. अलका सरावगी, एक ब्रेक के बाद, फ्लैप से

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