असम का पारम्परिक लोकनाट्य: अंकिया-नाट


भारत के नाट्य इतिहास के अध्ययन के पश्चात् हम सभी को पता चलता है कि प्राचीन नाट्यकला रूपों का उदभव धार्मिक और अनुष्ठानिक आयोजनों से हुआ है। मध्ययुग में जो भक्ति आन्दोलन हुआ उसका एक मात्र उद्देश्य समाज में उच्च मानवीय मूल्यों और आदर्शों की स्थापना करना था। भक्ति आन्दोलनों से जुड़े संतों ने समाज में फैले कुरीतियों एवं रुढियों का पुरजोर विरोध किया इसके लिए संतों ने एक ऐसे माध्यम की खोज की जिसके द्वारा वे अपनी बात/ विचार को सामान्य जन तक पंहुचा सके। उन्होंने (संतों ने) इस बात का विशेष ख्याल रखा कि चुना गया माध्यम सामान्य जन के बीच पहले से लोकप्रिय हो। बहुत विचार विमर्श करने के बाद आन्दोलन से जुड़े लोगों ने सामान्यजन के कल्याण तक अपने विचार पहुंचाने हेतु गीत एवं नृत्य को अपना माध्यम बनाया। बाद में इस गीत एवं नृत्य के साथ लोक-कथाओं के समन्वय से नाट्य कला के विभिन्न नाट्य रूपों का उद्भव हुआ। असम का अंकिया नाट्य भी इन्ही परंपराओं की प्रचलित कड़ी है। वैष्णव भक्ति आन्दोलन के पुरोधा संत शंकरदेव ने संस्कृत और लोकनाट्य शैली के सम्मिश्रण से एक ऐसी नाट्यधारा का प्रवर्तन किया जिसे हम वैष्णव नाटक ‘अंकिया-नाट’ के नाम से जानते हैं। अंकिया-नाट के उदभव के बारे में विभिन्न विद्वानों के मत निम्नलिखित है।

डा. दशरथ ओझा अपनी पुस्तक में अंकिया-नाट के उदभव काल के बारे में लिखते हैं- 15वीं शताब्दी के अंत में असम के अंकिया-नाटों की भाषा और अभिनय स्थलों की खोज हुई|

नेमिचन्द्र जैन अपनी पुस्तक ‘रंग परंपरा’ में लिखते हैं – “15वीं से 17 वीं शताब्दी में भक्ति आन्दोलन की प्रेरणा से जिन अनेक नाट्य-प्रकारों का उदय हुआ या पहले से चले आते नाट्यों का नया संस्कार हुआ, वे एक धार्मिक आन्दोलन के अंग तो थे ही विशिष्ट धार्मिक या धर्मपंथीय उद्देश्यों के व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए ही आयोजित हुए थे। जिनमें असम का अंकिया-नाट, तमिलनाडु का भागवत मेल, केरल का कृष्णाअट्टम, आन्ध्र का कुचिपुडि, महाराष्ट्र का दशावतार, उत्तरप्रदेश का रासलीला और रामलीला स्पष्टत: वैष्णव धार्मिक आनुष्ठान जैसे हैं, जिनमें बहुत बार अभिनेता साधारण मानव न रहकर ‘स्वरूप’ या अवतार माने जाते हैं और उसी रूप में प्रदर्शन के दौरान ही उनकी पूजा होती है|

ओमप्रकाश भारती लिखते है- “अंकिया-नाट असम का जनप्रिय पारंपरिक नाट्य रूप है। इसे वैष्णव नाटक भी कहा जाता है। अंकिया नाट का आविर्भाव 16वीं शताब्दी में मध्ययुगीन भक्ति आन्दोलन की स्निग्ध छाया में हुआ। इसके आदि प्रणेता प्रसिद्ध वैष्णव संत श्री शंकर देव (1449-1557 ई.) को माना जाता है। उन्होंने समाज में उच्च नैतिक आदशों को लोकमंच के द्वारा प्रस्तुत किया। आज भी असम के ग्रामीण अंचलों में अंकिया-नाट श्रद्धा और भक्ति-भाव के साथ खेले जाते हैं|

असाम आदिम संस्कृति एवं कला का केंद्र रहा है, किन्तु मध्ययुग में वैष्णव धर्म, विशेष कर कृष्ण भक्ति आन्दोलन के अभ्युदय, विकास एवं विस्तार ने आसाम जैसे दूरवर्ती प्रदेश को भी अपने अंचल में समेट लिया। फलस्वरूप एक ओर कृष्ण रस से संबंधित मणिपुरी लोकनृत्य तथा दूसरी ओर वैष्णव कवि नाटककार शंकरदेव के नेतृत्व में अंकिया नाट(16 वीं शताब्दी) का विकास हुआ|

इस प्रकार ऊपर के तथ्यों के विश्लेषण करने के बाद निष्कर्ष में यह कहा जा सकता है कि अंकिया-नाट का उद्भव और विकास 15वीं से 17वीं शताब्दी में हुआ है। इसके प्रवर्तक असम के वैष्णव संत शंकरदेव है। इनका उद्देश्य था उच्च नैतिक आदर्शों को समाज में स्थापित करना, इसके लिए उन्होंने लोकमंच का सहारा लिया। शंकरदेव ने अपने शिष्यों सहित ब्रजमंडल की यात्रा की । वहाँ उन्होने कृष्ण के जीवन पर आधारित लीलाओं को देखा वहाँ से वह पूर्वाञ्चल भारत की यात्रा पर गए। वहाँ उन्होने बंगाल में जात्रा तथा बिहार में कीर्तनियाँ उमापति रहित पारिजातहरण आदि देख असम लौटने के बाद अपने अनुभव से ब्रजबूली की रचना की । जिसे विद्वानों ने अंकिया-नाट का नाम दिया। कहा जाता है कि शंकरदेव ने अंकिया शब्द का प्रयोग नहीं किया है, उन्होंने अपने नाटकों को नाटिका, नाट, यात्रा और नृत्य आदि नाम दिया है। असमी नाटक में नाट और नाटक में कोइ अंतर नहीं समझा जाता है। महापुरुष शंकरदेव ने अपने नाटकों के लिए नाट, नाटक, तथा यात्रा तीनों ही शब्दों का प्रयोग किया है। अनुमानत: यह कहा जा सकता है कि शंकरदेव के बाद के विद्वानों ने इसका प्रयोग किया है। जिसका प्रमाण डॉ. ओमप्रकाश भारती की पुस्तक लोकायन से होता है।

अंकिया शब्द का प्रयोग शंकरदेव ने नहीं किया है। शंकरदेव ने अपने नाटकों को नाटक, नाट, यात्रा और नृत्य के नाम से अभिहित किया है। अनुमानतः यह शब्द उनके बाद प्रचलित हुआ होगा। शंकरदेव से पहले अंक शब्द का प्रयोग असमिया एकांकी नाटकों के लिए किया जाता था। इसका प्रमाण रामशरण ठाकुर की एकांकी चरितपुथी है। विद्वानों का तर्क है कि अंकिया-नाट एक ही अंक का होता है इसलिए इसे- अंकिया कहा जाए और नाट शब्द संस्कृत रंगमंच से लेकर अंकिया नाट शब्द का रूढ़ हुआ होगा|

ज्यादा तर अंकिया-नाट में एक ही अंक होता है, इसीलिए इस प्रकार के नाटक को ‘अंकिया या एक अंक वाला नाटक’ कहते हैं।

इस आधार पर कह सकते हैं कि अंकिया-नाट एक ही अंक का होता है। अंकिया-नाट के एकांकी होने के कारण आकर में प्रायः वे लधु होते हैं और उनमें उतनी ही कथा समाविष्ट की जाति है जिसका अभिनय एक रात्रि में सरलता से हो सके। सूत्रधार कथासूत्रों को जोड़कर नाटकीय कथा को गति प्रदान करता है।

कपिला वात्स्यायन के अनुसार “इन नाटकों का लोकप्रिय नाम अंकिया-नाट है, यद्यपि शंकरदेव के नाटकों में इस नाम का कहीं उल्लेख नहीं है। इसके स्थान पर यात्रा, नाटक, नृत्य,और नट का भी प्रयोग करते हैं। उनके उत्तरवर्ती नाटककारों, विशेष रूप से रामानंद और रामशरण ने शंकरदेव के नाटकों का वर्णन करने के लिए ‘अंकिया-नाट’ शब्द का प्रयोग किया है। अब यही नाम प्रचलित हो गया है|

अंकिया-नाट के महत्त्वपूर्ण तत्व निम्न लिखित है-

· गायन और बायन (वाद्य मंडल) दर्शकगण के आकर्षण को बढ़ाते हैं।

· इनका पारखी सूत्रधार के शब्दों और नृत्यों की प्रशंसा करते है।

· इसके लिए संस्कृत के श्लोकों की रचना की जाती है क्योंकि उनका अर्थ ग्रहण करने वाले लोग विद्वान होते हैं।

· दर्शाकगण में उपस्थित ब्राह्मण इन गीतों का अर्थ समझेंगे।

· सामान्य ग्रामीण लोग ब्रज बोली के शब्दों को समझ सकेंगे।

· अनजान लोग मुखोटे और प्रतिमाएँ देखेंगे ।

· प्रस्तुत नाटक नें कृष्ण का गुणगान।

यह नाटक के सात अनमोल तत्व होते है|

कथानक (अंकिया-नाट)

कृष्ण के चरित को नाट्य में विकसित कर प्रस्तुत करने का प्रयत्न सर्प्रथम ‘अंकिया-नाट के जरीय यह असम में हुआ है। विद्वानों ने शंकर देव के नाटकों की संख्या नो बताई है जिसमें छह नाटकों का ही प्रकाशन हो पाया है और जो उपलब्ध भी है जिसके नाम निम्नलिखित है- रुक्मिणी-हरण, कालियदमन, केलिगोपाल, परिजातहरण, राम-विजय और पत्नी प्रसाद। शंकरदेव द्वारा रचित नाटकों को ही विद्वानों ने अंकिया-नाट का नाम दिया है। उपरोक्त नाटकों के कथानकों की बात करे तो हम देखते हैं कि इनमें से चार कृष्ण कथा पर आश्रित है (रुक्मिणी-हरण, कालियदमन, केलिगोपाल, परिजातहरण आदि) और रामविजय राम की कथा पर तथा पत्नी- प्रसाद की कथा विवाहित ब्राह्मणी स्त्रियों के अतिशय कृष्ण प्रेम पर आधारित है। विद्वानों ने इसकी व्याख्या निम्न प्रकार से की है जी नीचे निम्नलिखित है-

डॉ. जगदीशचंद्र माथुर अपनी पुस्तक परंपराशील नाट्य में लिखते है- “दक्षिण और पूर्वी भारत के परंपरागत नाट्यों में एक ही प्रकार के पौराणिक कथानकों का प्रयोग हुआ। नृसिंहावतर, श्रीकृष्ण-लीला, रामचरित, महाभारत के दृश्य- यह कथाएँ असम से केरल तक सभी प्रकार के नाट्यों में मिलती हैं|

शंकरदेव ने नाटकों में जो गीतों का प्रयोग किया है। उसमें प्रयुक्त राग और ताल की सूची निम्नलिखित है।

रागों के नाम


तालों के नाम

कानड़ा, आसोआरी, रागश्री, धनाश्री, बेलोवारी, गौरि, स्याम, सिन्धुरा, श्रीगान्धार, पायाड, कलयाण, राग तुड़, माउर धनाश्री, पयाड़ राग कानड़ा, बेलआल, बसंत, पुर्ब्बी, श्रीगौरि, राग कौउ, कौ, दोमानि, सुहाई, भाठीआलि, केदार, राग नाट, राग अहिर, राग तथा, नाटमल्लार, तुड़ भाठीयाली, सारें, माहुर।


परिताल, रूपकताल, एकताल, मान एकताल, जौतिमान, खरमान, एकतालितालेन, परिताल जौतिमान, ताल जोति, मान परिताल, दोमानी जातिमान, धनश्रीएकताली, चुटीकाला मान, चुटिकाला, मान जति, बिसम ताल।

शंकरदेव के नाटकों में रस का प्रयोग निम्नलिखित है—

सामाजिकों या दर्शकों में भक्ति-भाव उत्पन्न करना महापुरुष शंकरदेव का मुख्य उद्देश्य था। उनके नाटकों में विभिन्न रसों का प्रयोग हुआ है।

कलिदमन यात्रा में भयानक तथा करुण रस,

केलिगोपाल में श्रृंगार रस,

पत्नीप्रसाद में अद्भुत रस,

रुक्मिणी हरण और राम विजय में श्रृंगार तथा वीर रस

परिजातहरण में वीर तथा बीभत्स रसों का प्रयोग किया है।

अंकिया-नाट में बीच-बीच में पयाड़ नमक एक गीत के प्रकार का भी प्रयोग किया गया है। जैसे—

हे परमेश्वर जगत-निबासा । हमू नारद तुया चरनक दासा ।।

भरमो दिस दस तुया जष गाया । हामाकू आगु करसि ओह़ी माया ।।

जगत उद्धारन जाहेर चरित्र । ताहेक हामू कयलु पवित्र ।।

जाहेरि नामो मुकुति-पद पाई । सो हरि कर तुति-नती कतिलाई ।।

यह गीत भी भटिमा अन्य गीत के तरह ही अंकिया नाट में प्रयोग में लाया जाता है।

अंकिया-नाट में गद्य का प्रयोग—

शंकरदेव कृत अंकिया नाट्य में गद्य का भी प्रयोग किया है। अंकिया नाट्य में गद्य की कुछ विशेषताएँ हैं वो स्थान-स्थान पर संगीत-लय से युक्त है। उदाहरण—

‘तदनन्तर परम बिप्रिय बानि सुनिए राजनन्दनिक माथे जैचे कलम भाडल। श्रीकृष्ण निरासा सुनिए दिश दश अंधीआरि देखिए मुर्च्छित हया तत्तकाले परल, जैचे कदलिक बाते उपारल।”

कहीं-कहीं कविता के उपयुक्त आलंकारिक भाषा का भी प्रयोग हुआ है—

‘आहे सभासद लोक, जे जगतक परम गुरु, परम पुरुष पुरुषोत्तम, सनातन ब्रह्मा महेससेवित चरनपंकज नारायण, श्री श्रीकृष्ण.... ।”

शंकरदेव ने अपने नाटकों में कहीं-कहीं वाक्य में तुक बंदी भी मिलता है और मात्राएँ भी बराबर हैं— उदहारण

‘तदनंतर ढोल ढक्का, संख गोमुख, मृदु मृदंग, ताल करताल, काहाल कोलाहल, महोत्सव रव सुनियह, जानकी सखिक सम्बोधि बोलल’।”

कहीं-कहीं असमी लोकोक्तियों का भी प्रयोग हुआ है, जैसे

‘राजनन्दनिक माथे जैचे कलस भाडल।

जैचे कदलिक बाते उपारल |

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि अंकिया-नाट असम का बेहद लोकप्रिय पारंपरिक लोक नाट्य रूप है। जिसके माध्यम से रंगकर्मी समाज में उच्च मानवीय मूल्यों एवं आदर्शों की स्थापना करने की कोशिश करते हैं। इसके द्वारा समाज में फैले कुरीतियों तथा रूढ़ियों का लगातार विरोध होता रहा है जो इस लोक नाट्य रूप के जनप्रिय होने का प्रमुख कारण है

संदर्भ सूची:-

1) डा. दशरथ ओझा हिन्दी नाटक: उदभव विकास पृ.सं. 11

2) नेमिचद्र जैन रंगपरम्परा (भारतीय नाट्य में निरंतरता और बदलाव) पृ.सं. 35

3) ओमप्रकाश भारती लोकायन (लोककला, रूपों पर एकाग्र )पृ.सं. 169, 179

4) डॉ. महेंद्र भानावत, लोक रंग पृ.सं.305

5) डॉ. कपिला वात्स्यायन, पारंपरिक भारतीय रंगमंच अनंत धाराएं पृ.सं. 85

6) जगदीशचंद्र माथुर, परंपराशील नाट्य पृ.सं. 18

7) पारिजात हरण नाट मूल प्रति पृ. सं. 132

8) रुक्मिनिहरण नाट, मूल प्रति श्लोक न. 13 के नीचे

9) कालियदमन यात्रा, “ श्लोक न. 4 के ऊपर

10) श्रीरामविजय नाट, गीत सं. 15 के नीचे

11) रुक्मिनिहरण नाट, श्लोक सं. 13 के नीचे

नितप्रिया प्रलय

शोधार्थी, पीएच.डी.

प्रदर्शनकारी कला (फिल्म एवं रंगमंच ) विभाग,

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय,वर्धा,

मोबाइल- 9890791936, 867686769,

Email- nitpriyapralay@gmail.com

0 views

©2019 by Jankriti. Proudly created with Wix.com