अहिंसा का उदभव, विकास एवं विभिन्न धर्मों की दृष्टिअहिंसा: आशीष कुमार

आशीष कुमार

एम. फिल. अहिंसा एवं शांति अध्ययन

ashikumar43@gmail.com

09604454556

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय

गांधी हिल्स वर्धा (महाराष्ट्र)


अहिंसा का सामान्य अर्थ है 'हिंसा न करना'। इसका व्यापक अर्थ है - किसी भी प्राणी को तन, मन, कर्म, वचन और वाणी से कोई नुकसान न पहुँचाना। मन में किसी का अहित न सोचना, किसी को कटुवाणी आदि के द्वारा भी नुकसान न देना तथा कर्म से भी किसी भी अवस्था में, किसी भी प्राणी से हिंसा न करना, यह अहिंसा है| हिन्दू धर्म में अहिंसा का बहुत महत्त्व है। अहिंसा परमो धर्म: अहिंसा परम (सबसे बड़ा) धर्म कहा गया है। आधुनिक काल में महात्मा गांधी ने भारत की आजादी के लिये जो आन्दोलन चलाया वह कॉफी सीमा तक अहिंसात्मक था।

अहिंसा शब्द एक प्राचीन शब्द है। इसके शाब्दिक और व्यावहारिक स्वरूप में भले ही अन्तर हो, किन्तु शब्द की प्राचीनता में कोई अन्तर नहीं है।

अपने शाब्दिक स्वरूप में अहिंसा एक नकारात्मक शब्द है, अ+हिंसा = अहिंसा अर्थात हिंसा नहीं अर्थात हिंसा को नकारना। तो जिसे नकारा जा रहा है उस शब्द को समझ लेना हमारे लिए आवश्यक हैं। हिंसा शब्द की धातु रूप का जब हम परीक्षण करते हैं तो हम पाते हैं कि ‘हैन’ धातु से ही हिंसा शब्द कि उत्पत्ति हुई है। इस धातु रूप का शाब्दिक अर्थ है चोट पहुँचाना, हत्या करना, समाप्त करना इत्यादि। इसी शब्द से हिंसा शब्द बना है जिसका शाब्दिक अर्थ है-चोट पहुँचाने की अथवा हत्या की इच्छा। इस शब्द के आगे ‘अ’ प्रत्यय जोड़ देने से यह शब्द बनता है अहिंसा जिसका शाब्दिक अर्थ होगा ‘चोट’ न पहुँचाना अथवा ‘हत्या न करना’। इसलिए शाब्दिक अर्थ में अहिंसा एक नकारात्मक शब्द है।

अपने व्यावहारिक अर्थ में अहिंसा हमारे धार्मिक संस्कारों के साथ जुड़ा हुआ है। आर्य संस्कृति के प्रारम्भिक भारतीय स्वरूप में अहिंसा विद्यमान थी, किन्तु उसका स्वरूप नितांत प्रारम्भिक होने के कारण विशुध्द अहिंसा के रूप में नहीं था। पर समय के साथ उसका स्वरूप परिष्कृत होता गया और उपनिषद-काल तक आते आते अपने संपूर्ण बौधिक परिमार्जन के रूप में प्रकट हुआ। इस दृष्टि से अहिंसा एक सर्व-व्यापी विचारधारा है। भारतीय इतिहास में प्रारम्भिक आर्य संस्कृति के अंतर्गत खान- पान में मांसाहार एवं सुरापान वर्जित नहीं था।

अहिंसा शब्द का पहली बार प्रयोग ‘श्वेताश्वर निषद’ में हुआ जिसमें यहाँ तक कहाँ गया है कि यज्ञ, हवन आदि में भी अहिंसा को महत्व दिया जाना चाहिए।

पदम पुराण में विष्णु भगवान को प्रसन्न करने के लिए जिन आठ पुष्पों के विषय में लिखा गया है, उनमें अहिंसा को प्रथम पुष्प कहाँ गया है।

पातञ्जलि योग में अहिंसा को न केवल समुचित महत्व दिया गया है बल्कि पंचायत में अहिंसा को स्थान देते हुए इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि उसी मनुष्य का आध्यात्मिक विकास संभव है। योग सूत्र में भी यह भावना प्रतिपादित कि गई है कि अहिंसा कोई शारीरिक स्थिति नहीं बल्कि मानसिक स्थिति है।

महाभारत अहिंसा के उल्लेख से भरा पड़ा है। महाभारत के अनुशासन पर्व को यदि हम अहिंसा पर्व कि संज्ञा दें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। अहिंसा की सर्वाधिक लोकप्रिय व्याख्या करते हुए अहिंसा को परम धर्म, परम तप, परम सत्य, परम संयम, परम ज्ञान, परम मित्र, परम सुख, कहाँ गया है। अहिंसा से ही सब धर्मों कि उत्पत्ति मानी गई है। उसमें कहाँ गया है कि यदि सब यज्ञों में दान किया जाए, सब तीर्थों में स्नान किया जाए, सब प्रकार के स्नान, दान का फल प्राप्त हो तो भी उसकी तुलना अहिंसा धर्म के साथ नहीं हो सकती।

मनुस्मृति में अहिंसा की प्रशस्ति में लिखा है- जो मनुष्य किसी भी प्राणी का बंधन या बध नहीं करता, किसी भी प्रकार से किसी को कष्ट नहीं पहुंचाता वह सबका हित चिंतक मनुष्य अपार सुख प्राप्त करता है।

गीता में अहिंसक ‘अनाशक्तियोग’ तथा ‘निष्काम कर्मयोग’

अहिंसा की वह चरम स्थिति है जब मनुष्य वासनाओं, कामनाओं, लालसाओं आदि निम्न भावनाओं से ऊपर उठ चुका होता है। लेकिन, वह संसार से विमुख नहीं होता, सन्यासी बनकर बीतराग नहीं होता। वह संसार में रहता है और कर्म करता है। किन्तु कुछ लोगों को गांधी जी के जीवनदर्शन से यह भ्रम उत्पन्न हो गया कि वे सन्यासी बन गए और उन्होंने संसार का परित्याग कर दिया। गांधी जी सही अर्थों में कर्मयोगी बने। उनके बारे में जो भ्रम फैला उससे एक प्रसिध्द प्रशंसक को भी यह विश्वास हो गया कि वो वास्तव में सन्यासी ही बन गए हैं। वो प्रशंसक थे ‘रेने फूलो पमिलन’

हिन्दू शास्त्रों में अहिंसा

हिंदू शास्त्रों की दृष्टि से "अहिंसा" का अर्थ है सर्वदा तथा सर्वदा (मनसा, वाचा और कर्मणा) सब प्राणियों के साथ द्रोह का अभाव। (अंहिसा सर्वथा सर्वदा सर्वभूतानामनभिद्रोह: - व्यासभाष्य, योगसूत्र 2। 30)। अहिंसा के भीतर इस प्रकार सर्वकाल में केवल कर्म या वचन से ही सब जीवों के साथ द्रोह न करने की बात समाविष्ट नहीं होती, प्रत्युत मन के द्वारा भी द्रोह के अभाव का संबंध रहता है। योगशास्त्र में निर्दिष्ट यम तथा नियम अहिंसामूलक ही माने जाते हैं। यदि उनके द्वारा किसी प्रकार की हिंसावृत्ति का उदय होता है तो वे साधना की सिद्धि में उपादेय तथा उपकार नहीं माने जाते। "सत्य" की महिमा तथा श्रेष्ठता सर्वत्र प्रतिपादित की गई है, परंतु यदि कहीं अहिंसा के साथ सत्य का संघर्ष घटित होता है तो वहाँ सत्य वस्तुत: सत्य न होकर सत्याभास ही माना जाता है। कोई वस्तु जैसी देखी गई हो तथा जैसी अनुमित हो उसका उसी रूप में वचन के द्वारा प्रकट करना तथा मन के द्वारा संकल्प करना "सत्य" कहलाता है, परंतु यह वाणी भी सब भूतों के उपकार के लिए प्रवृत्त होती है, भूतों के उपघात के लिए नहीं। इस प्रकार सत्य की भी कसौटी अहिंसा ही है।

जैन धर्म में अहिंसा

जैन दृष्टि से सब जीवों के प्रति संयमपूर्ण व्यवहार अहिंसा है। अहिंसा का शब्दानुसारी अर्थ है, हिंसा न करना। इसके पारिभाषिक अर्थ विध्यात्मक और निषेधात्मक दोनों हैं। रागद्वेषात्मक प्रवृत्ति न करना, प्राणवध न करना या प्रवृत्ति मात्र का विरोध करना निषेधात्मक अहिंसा है, सत्प्रवृत्ति, स्वाध्याय, अध्यात्मसेव, उपदेश, ज्ञानचर्चा आदि आत्म हितकारी व्यवहार विध्यात्मक अहिंसा है। संयमी के द्वारा भी अशक्य कोटि का प्राणवध हो जाता है, वह भी निषेधात्मक अहिंसा हिंसा नहीं है। निषेधात्मक अहिंसा में केवल हिंसा का वर्जन होता है, विध्यात्मक अहिंसा में सत्क्रियात्मक सक्रियता होती है। यह स्थूल दृष्टि का निर्णय है। गहराई में पहुँचने पर तथ्य कुछ और मिलता है। निषेध में प्रवृत्ति और प्रवृत्ति में निषेध होता ही है। निषेधात्मक अहिंसा में सत्प्रवृत्ति और सत्प्रवृत्यात्मक अहिंसा में हिंसा का निषेध होता है। हिंसा न करनेवाला यदि आँतरिक प्रवृत्तियों को शुद्ध न करे तो वह अहिंसा न होगी। इसलिए निषेधात्मक अहिंसा में सत्प्रवृत्ति की अपेक्षा रहती है, वह बाह्य हो चाहे आँतरिक, स्थूल हो चाहे सूक्ष्म। सत्प्रवृत्यात्मक अहिंसा में हिंसा का निषेध होना आवश्यक है। इसके बिना कोई प्रवृत्ति सत् या अहिंसा नहीं हो सकती, यह निश्चय दृष्टि की बात है। व्यवहार में निषेधात्मक अहिंसा को निष्क्रिय अहिंसा और विध्यात्मक अहिंसा को सक्रिय अहिंसा कहा जाता है।

बौध्द धर्म में अहिंसक दृष्टि

बौध्द धर्म का जन्म भी जैन धर्म कि ही तरह वेदों के यज्ञवाद और ब्राहमाणवाद के विरूध्द हुआ। अहिंसा बौध्द धर्म का मेरुदंड है, आधार है, धुरी है, किन्तु जैन धर्म कि तरह बौध्द धर्म अहिंसा सिध्दांत को उतने अधिक अतिवादी एवं रूढ़िवादी दृष्टिकोण से नहीं देखता। बौध्द दर्शन सुचित से प्रारंभ होकर प्रेम पर समाप्त होता है। इसमें अध्यात्मवाद पर उतना बल नहीं दिया गया जितना नैतिकता पर दिया गया है।

निश्चित ही अहिंसा के अंतर्गत प्रेम, करुणा, निष्पक्षता और सरलता अनिवार्य है। जिस प्रेम की अपेक्षा बुध्द अपनी अहिंसा के अंतर्गत करते है वह विशाल एवं व्यापक है। उनकी परिधि में सारी सृष्टि, सारी मानवता आ जाएगी। बुध्द के अहिंसा आदर्शों की स्पष्ट व्याख्या ‘भंते सुत्त’ में मिलती है। यद्दपि बुध्द के अहिंसा संबंधी आदेश व्यक्तिगत धरातल पर है फिर उनका प्रेम और करुणा संबंधी सिध्दांत सार्वजनिक एवं सर्वव्यापी है।

यहूदी धर्म में अहिंसक दृष्टि

यहूदी धर्म में जो धर्मादेश है उसमें भी अहिंसा एवं शांति के भाव परिलक्षित होते हैं। वे धर्मादेश हैं- माता-पिता का आदर करो, हत्या न करो, व्यभिचार न करो, चोरी न करो, अपने पड़ोसी के ख़िलाफ़ झूठी गवाही मत दो, अपने पड़ोसी के मकान, स्त्री, नौकर, नौकरानी, पशु या किसी वस्तु के प्रति लालच न करो। ये सभी अहिंसक भाव स्पष्ट करते है कि यहूदी धर्म भी अहिंसा को प्रमुंखता देता है।

गांधी जी के अनुसार

गांधी जी के अनुसार सत्य सर्वोच्च कानून और अहिंसा सर्वोच्च कर्तव्य है। सत्य की ही तरह अहिंसा की शक्ति असीम और ईश्वर का पर्याय है। सत्य और अहिंसा के बीच का संबंध को स्पष्ट करते हुए गांधी जी ने कहाँ है- जब मैं सत्य की खोज की दिशा में बढ़ता हूँ तब मैं पाता हूँ सत्य में ही सब कुछ निहित है। विशुध्द हृदय और बुध्दि से जो कुछ देखा जाता है वही उस क्षण का सत्य है। महात्मा गांधी जी की अहिंसा संबंधी मान्यता प्रगतिशील है। गांधी जी के अनुसार हत्या उस समय हिंसा नहीं है। उन्होंने एक कुवरी कन्या को उस व्यक्ति की हत्या की अनुमति दी थी जो उसका शील भंग करना चाहे।

इसी प्रकार गांधी जी ने कायरता को हिंसा से भी बुरा माना है। उन्होंने कहा था कि यदि मुझे कायरता और ही हिंसा में से एक को चुनना हुआ तो मैं निश्चित ही हिंसा को चुनूंगा। अहिंसा किसी अकर्मण्य का दर्शन नहीं है। यह कर्मठता और गतिशीलता का दर्शन है। अहिंसा के दो निश्चित पहलू भी हैं – प्रेम और धैर्य।

महात्मा गाँधी कहते हैं कि एकमात्र वस्तु जो हमें पशु से भिन्न करती है वह है अहिंसा। व्यक्ति हिंसक है तो फिर वह पशुवत है। मानव होने या बनने के लिए अहिंसा का भाव होना आवश्यक है।

मेरी अहिंसा

मैं केवल एक मार्ग जानता हूँ - अहिंसा का मार्ग। हिंसा का मार्ग मेरी प्रछति के विरुद्ध है। मैं हिंसा का पाठ पढाने वाली शक्ति को बढाना नहीं चाहता... मेरी आस्था मुझे आश्वस्त करती है कि ईश्वर बेसहारों का सहारा है, और वह संकट में सहायता तभी करता है जब व्यक्ति स्वयं को उसकी दया पर छोड़ देता है। इसी आस्था के कारण मैं यह आशा लगाए बैठा हूँ कि एक-न-एक दिन वह मुझे ऐसा मार्ग दिखाएगा जिस पर चलने का आग्रह मैं अपने देशवासियों से विश्वासपूर्वक कर सकूंगा।

(यंग, 11-10-1928, पृ. 342)

मैं जीवन भर एक 'जुआरी' रहा हूं। सत्य का शोध करने के अपने उत्साह में और अहिंसा में अपनी आस्था के अनवरत अनुगमन में, मैंने बेहिचक बड़े से बड़े दांव लगाए हैं। इसमें मुझसे कदाचित गलतियां भी हुई हैं, लेकिन ये वैसी ही हैं जैसी कि किसी भी युग या किसी भी देश के बड़े से बड़े वैज्ञानिकों से होती हैं।

(यंग, 20-2-1930, पृ. 61)

गाँधी जी कहते हैं कि हमारा समाजवाद अथवा साम्यवाद अहिंसा पर आधारित होना चाहिए जिसमें मालिक-मजदूर एवं जमींदार-किसान के मध्य परस्पर सदभावपूर्ण सहयोग हो। नि:शस्त्र अहिंसा की शक्ति किसी भी परिस्थिति में सशस्त्र शक्ति से सर्वश्रेष्ठ होगी। सच्ची अहिंसा मृत्युशैया पर भी मुस्कराती रहेगी। बहादुरी, निर्भीकता, स्पष्टता, सत्यनिष्ठा, इस हद तक बढ़ा लेना कि तीर-तलवार उसके आगे तुच्छ जान पड़ें, यही अहिंसा की साधना है। शरीर की नश्वरता को समझते हुए, उसके न रहने का अवसर आने पर विचलित न होना अहिंसा है।

संदर्भ ग्रंथ

1- आर. सी. मजूमदार, एशेन्ट इंडिया, पृ. स. 46

2- कृष्णदास, सेवन मन्थ विथ महात्मा गांधी, पृ. स. 208

3- सी. एफ. एंड्रोज, महात्मा गांधी आयडियाज़, पृ. स. 132

4- हरिजन पत्रिका 17-08-1934 पृ. स. 234

5- यंग इंडिया 19-02 1925 पृ. स. 61

आशीष कुमार

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