• Jankriti International Magazine

“अंधरे में” कविता की काव्य संरचना


“मेरा ख़याल है कि मेरी भाषा सुंदर न भी हो सके, वह सशक्त होकर रहेगी, क्योंकि उसके पीछे अंदर का ज़ोर रहेगा। बताइए क्या मेरा सोचना गलत हैं।"[1]

मुक्तिबोध का रचना संसार एवं कवि-कर्म विकसनशील है। उनके कविता का स्थापत्य महज शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि शब्दों के सामर्थ्य को गहरे तक उकेरती और उजागर करती है। यह कवि के अंतरात्मा की वैचारिक अनुगूज होती है, जिससे वह दूसरों को के अंदर झनझनाहट पैदा करना चाहती है। जाहिर है ऐसे में मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे में’ अपने समय और समाज से एक कदम आगे निकलकर यथार्थ का भान कराती है। शायद इसीलिए श्रीकांत वर्मा ने कहा है कि, ‘अंधरे में’ ‘कविता में हिन्दोस्तान है।’

मुक्तिबोध की कविताएं जितनी जटिल हैं उतना ही जटिल उनका जीवन संसार रहा है। उनके जीवन में छटपटाहट, बेचैनी एवं व्याकुलता देखी जा सकती है। उन्होनें अपनी इस छटपटाहट भरे अन्तर्मन में चलने वाले संघर्षों की दास्तान को अपने कविताओं में अभिव्यकित की है। वास्तव में इन संघर्षों के पीछे की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियां आज के परिवेश से अभिन्न हैं। कहना न होगा कि आज हमें उनका ज्यादा विकृत रूप दिखाई पड़ रहा है।

दरअसल, मुक्तिबोध ने अपनी काव्य संरचना का स्थापत्य सामाजिक विसंगतियों को लेकर ही तैयार किया है। मुक्तिबोध की कविता ‘अंधरे में’ एक लंबी कविता है। जो आठ खण्डों में विभक्त है। लंबी कविता में जब एक बात से दूसरी बात और दूसरी बात से तीसरी बात तथा तीसरी से चौथी बात निकलती जाती है तो कविता की लम्बाई बढ़ती जाती है। इस लम्बाई में कविता का केन्द्रीय भाव गुथा रहता है और वह पूरी संरचना का भाग होता है। कविता औपन्यासिक रूप लेने लगती है। क्योंकि कवि का आत्मसंवेदन पूरे व्यौरे के साथ उसमें उपस्थित होता है और यह लम्बी कविता नाट्यधर्मी रचना-प्रक्रिया में होने लगती है। मुक्तिबोध का मानना था कि, ‘स्वाधीनता के इस युग में मेरी कविता सघन बिम्ब-मालिकाओं में अधिकाधिक गहन होती गई। किन्तु यह भी एक तथ्य है कि इस आत्मग्रस्ता के बावजूद और शायद उसको साथ लिए-लिए मेरा आत्मसंवेदन समाज के व्यापकतर छोर छूने लगा। कविता का कलेवर भी दीर्घतर होता गया।’ कवि कविता कि लम्बाई छोटी करना चाहता है। लेकिन जीवन और जगत के फैलाव का दबाव उसे लम्बी कर देती है। अतएव ‘अंधेरे में’ कविता का स्थापत्य स्थिर और सुपरिभाषित नहीं है। इसलिए मुक्तिबोध को उस समय हिन्दी कविता में जो माडल सुलभ थे, उससे हट कर कष्ट पूर्वक एक नया स्थापत्य अपने लिए गढ़ा। और लंबी कविता की शुरुआत की। सवाल यह है कि क्या मुक्तिबोध से पहले हिन्दी कविता में लम्बी कविता की परंपरा नहीं थी? जैसाकि, अगर हम लम्बी कविता की परंपरा को देखे तो पाते हैं कि, छायावाद से ही लम्बी कविता की परंपरा शुरू हो जाती है। जैसे परिवर्तन (सुमित्रानंदन पंत), राम की शक्तिपूजा, सरोज स्मृति, कुकुरमुत्ता (निराला) और परवर्ती काल में अज्ञेय ने भी लम्बी कविता ‘असाध्य वीणा’ शीर्षक से लिखी। फिर कैसे मुक्तिबोध की कविता का माडल इन सब कवियों से भिन्न है? गौरतलब यह है कि मुक्तिबोध की कविता काव्य का नया विधान रचती है। जिससे भाषा नयी हो जाती है।

मुक्तिबोध ने अपने कवि-कर्म और भाषा के माध्यम से ‘अंधेरे में’ कविता का ऐसा जाल बुना है कि कविता की भाषा बोलती या धड़कती हुई नज़र आती है। जैसे-

“बताओ तो किस-किस के लिए तुम दौड़ गए

करुणा के दृश्यों से हाय! मुँह मोड़ गए

बन गए पत्थर”

जाहिर है भाषा के संदर्भ में अगर बात करें तो भाषा का सबसे प्रमुख तत्व है- शब्द और व्याकरण। शब्द और व्याकरण में ज्यादा महत्वपूर्ण कौन है, इसकी बहस में न पड़ते हुए यह स्वीकार करना होगा कि ‘शब्द’ एक सामाजिक निधि है। जैसाकि मुक्तिबोध ने भी स्वीकार किया है। इस प्रकार शब्द के अर्थ गहन जीवन अनुभवों से जुड़े रहते हैं। अत: जीवनानुभवों के वैविध्य के आधार पर शब्द एवं उसके भिन्न-भिन्न अर्थों की सार्थकता में भी वैविध्य होता है। भिन्न-भिन्न शब्दों के योग से निर्मित भाषा एक प्रकार से हमारे जीवन अनुभवों तथा यथार्थ के प्रति हमारी सारी प्रतिक्रियाओं का संयोग कही जा सकती है। कवि अपने मनोविज्ञान द्वारा इन कटु अनुभवों तथा यथार्थ को विश्लेषित कर सर्वथा नवीन शब्द-संसार की रचना करता है। मुक्तिबोध का काव्य ‘अंधरे में’ इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है।

‘अंधेरे में’ कविता में मुक्तिबोध ने कटु यथार्थ का इतना भयावह वर्णन किया है कि कविता में लय और संगीत के स्थान पर चिल्लाहट के स्वर सुनाई पड़ते हैं। देखिये-

“सड़क पर उठ खड़ा हो गया कोई शोर

मारो गोली, दागो स्साले को एकदम”

स्पष्ट है कि इस चिल्लाहट को मृदु तथा कोमल भाषा के बजाए एक कठोर तथा अपरिचित भाषा द्वारा वर्णित किया गया है। शायद इसीलिए हुकुमचंद राजपाल लिखते हैं कि, “उसकी (अंधरे में) भाषा क्या है? एक लम्बा आत्मालाप है। स्वप्न में अन्विति नहीं होती। उसका पाठ असंघटित है, कोलाज है। वह परंपरा से प्राप्त अनुभव को तोड़कर अपने अनुकूल बनाता है। जिसमें प्रत्यक्ष संश्लेषण का निषेध है। उसका कारण प्रगतिवादियों की सपाटबयानी और जड़ीभूत विचारधारा का विरोध का काव्य है। भाषा का ‘Defemiliarization’ जड़ीभूत प्रगतिवादी विचारधारा की ‘एनेस्थेसिया’ भी तोड़ देता है और एक नए एस्थेटिक्स और यथार्थ का सृजन होता है।”[2]

मुक्तिबोध ने ‘अंधेरे में’ कर्कश शब्दों के प्रयोग द्वारा वे स्थापित संगीतात्मकता के सुकौमार्य को तोड़ते हैं। जो छायावाद की देन है। ये छायावादी रोमांटिकता के विरुद्ध अपनी काव्य भाषा में मध्यम वर्ग के जीवन से संबन्धित बिम्ब, प्रतीक तथा वातावरण निर्माण की सामग्री चुनते हैं। छायावादी छन्दबद्धता के विरुद्ध मुक्तिबोध ने द्वंद-मुक्त तथा गद्द्यात्मक भाषा का प्रयोग करते हैं। स्वंय मुक्तिबोध ने लिखा है कि, “यह सबके अनुभव का विषय है कि मानसिक प्रतिक्रिया हमारे अभ्यंतर में गद्दभाषा को लेकर उतरती है, कृत्रिम ललित काव्य भाषा में नहीं फलत: नई कविता का पूरा विन्यास गद्द भाषा के अधिक निकट है।”[3]

‘अंधेरे में’ कविता कि गद्दात्मक भाषा में मुक्तिबोध ने कई नवीन प्रयोग किए हैं। मसलन, दो विरोधी अर्थ वाले शब्दों को एक साथ संजोकर विरोधी परिस्थितियों का संश्लिष्ट चित्रण कविता में विलक्षणता पैदा करता है। जैसे-

“रहस्य साक्षात/ मीठी है दु:सह/ यह शोभायात्रा है किसकी मृत्यु-दल की”

इसके अतिरिक्त शब्दों की पुनरावृत्ति ‘अंधेरे में’ कविता की काव्य संरचना में कई जगह देखी जा सकती है। उदाहरण के लिए-

“कोई मेरी बात मुझे बताने के लिए ही बुलाता है, बुलाता है, हृदय को

सहला.../ नील तेज-उद्भास/ पास-पास-पास-पास/ आ रहा इस ओर”

शब्दों की पुनरावृत्ति से ऐसा लगता है कि जैसे शब्दों का फ़िजूल ख़र्चा हुआ हो लेकिन वास्तविकता तो यह है कि शब्दों की यह पुनरावृत्ति मुक्तिबोध के काव्य की प्राणशक्ति है। कथ्य की सशक्तता तथा भयावहता पर बल देकर उसे अधिक मूर्त रूप में उपस्थित करने के लिए शब्दों की पुनरावृत्ति करते हैं। इस संदर्भ में अशोक चक्रधर भी कथ्य के आंतरिक ज़ोर को रेखांकित करते हुए कहते है कि, “शब्दों में ज़ोर पैदा करने के लिए मुक्तिबोध पुनरावृत्ति करते हैं। ‘मानता हूँ, मानता हूँ, मनवाता अड़ा हूँ’ वाली शैली में उनके शब्द मानों कह रहे हो-‘यह हुआ मैं कहता हूँ यह हुआ। मानों इसे। एक ही तरह की शब्दावली और एक ही तरह के बिम्ब, प्रतीकों का एकाधिक बार इस्तेमाल होना कथ्य के आंतरिक ज़ोर के कारण होता है। उनकी कविता की भाषा तथा कथित सीमा दरअसल उनकी शक्ति है।”[4]

मुक्तिबोध ‘अंधेरे में’ कविता में अपनी गहन मानवीय अनुभूति तथा कल्पनाशीलता को भाषाबद्ध करते हुए अंग्रेजी, संस्कृत, मराठी, उर्दू और फ़ारसी शब्दावली का प्रयोग किया है। इतना ही नहीं उन्होंने अंग्रेजी विशेषण, हिन्दी संज्ञा अथवा हिन्दी विशेषण का व्याकरणिक प्रयोग किया हैं। जो भाषा में एक नएपन का निर्माण करता है। मुक्तिबोध ने विज्ञान, धर्मशास्त्र, न्यायशास्त्र एवं दर्शनशास्त्र से शब्दों को लेकर अंतरअनुशासनीय विचारों का परिचय दिया है। उदाहरण के लिए- चुंबकी-शब्द, मूल-उद्गम, ज्यामिती रेखा, ज्योतिशास्त्र, रासायनिक चिकित्सा, इलेक्ट्रान, ताराविद्दुत मण्डल आदि। शब्दों की क्रियाशीलता का बोध कराते हुए मुक्तिबोध ने ठपाठप, पिचपिची, तड़ातड़, ओरांग-उटांग, धाँय-धाँय, हाय-हाय आदि शब्दों का प्रयोग ‘अंधेरे में’ किया है। अत: मुक्तिबोध के लिए भाषागत अभिव्यक्ति, जीवन के अभिव्यक्ति से अभिन्न रूप से जुड़ी हुई है। इस अभिव्यक्ति के अंतर्गत सम्पूर्ण जीवन की संस्कृति के प्रतिबिंब दिखाई पड़ते हैं। तभी तो मुक्तिबोध के काव्य ‘अंधेरे में’ मठों और गढ़ों को तोड़कर ‘अरुण-कमल’ तक पहुँचने का संघर्ष दिखाई देता है। जो उनकी विचारधारात्मक संस्कृति का प्रतिपाद्य है। जैसे-

“अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे

उठाने ही होंगे।

तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब।

पहुँचना होगा दुर्गम पहाड़ों के उस पार

तब कहीं देखने मिलेंगी हमको

नीली झील की लहरीली थाहें

जिसमें कि प्रतिपल काँपता रहता

अरुण कमल एक,

धँसना ही होगा

झील के हिम-शीत सुनील जल में।”

‘अंधेरे में’ कविता में मुक्तिबोध ने अंधकार को लेकर ठोस बिम्बों का प्रयोग किया है। वह अपार बिम्बों के संग्रह करता हैं। उनका काम बिम्बों के बिना नहीं चल सकता। उनका पथ बिंबीय है। मुक्तिबोध संवेदनात्मक ज्ञान तथा ज्ञानात्मक के आपसी अंतर्द्वंद द्वारा कल्पना-चित्र अथवा भाव-विधान की रचना-प्रक्रिया को चित्रित करते हैं। उनका मानना है कि कल्पना-चित्र स्वंय एक ज्ञानात्मक पक्ष रखने के साथ-साथ संवेदनात्मक पक्ष भी रखते हैं। इन दोनों पक्षों के संयोजन से काव्य में सौंदर्य के साथ-साथ सार्थकता भी उत्पन्न होती है। इस विचार तथा भाव के द्वारा कवि जिन्दगी के प्रत्येक पल को बड़ी सूक्षमता के साथ विच्छेदित कर मूल करणों की पड़ताल में संलग्न हो जाता है। इस प्रक्रिया में विचार और भाषा के बीच की खाई बिम्ब-संयोजन से भरी जाती है। केदारनाथ सिंह ने लिखा है कि, “बिम्ब जब भी आता है, किसी गहरे विचार या जीवन दृष्टि का संवाहक बनकर आता है। एक श्रेष्ठ बिम्ब जीवन के प्रत्यक्षात्मक और धारणात्मक दोनों ही गुड़ों से संयुक्त होता है।” एक उदाहरण देखिए-

“गेरुआ मौसम, उठते हैं अंगार/ जंगल जल रहे जिन्दगी के अब/

जिनके कि ज्वलंत प्रकाशित भीषण/ कूलों से बहती बेदना नदियाँ/

जिनके कि जल में/ सचेत होकर सैकड़ो सदियाँ ज्वलंत अपने/

बिम्ब प्रसारित करती है प्रतिपल।”

मुक्तिबोध इतना ही कहकर शांत नहीं हो जाते। वह अनके प्रकार के बिम्बों की भरमार कर दिए हैं। श्रव्य बिम्ब का अलग से उत्कृष्ट उदाहरण देखिए-

“दूर-दूर जंगल में सियारों का हों-हों/ पास-पास आती हुई घहराती गूँजती/

किसी रेलगाड़ी के पहियों की आवाज़!!/ किसी अनपेक्षित/

असंभव घटना का भयानक संदेश/ अचेतन प्रतीक्षा/

काही कोई रेल-एक्सीडेंट न हों जाए।”

‘अंधेरे में’ कविता की संरचना में अधिकांशत: प्रतिकों-बिम्बों को रचना का माध्यम बनाया गया है। ‘अंधेरे में’ की मूल कथा रूपात्मक है। अत: बिम्ब और प्रतीक के बिना उसका चित्रण भी असंभव है। कवि अंधेरे, जैसे भयानक डरावने सपनों से भरे रहस्यमय प्रतीक के अतरिक्त उसी की प्रतीकात्मकता को पूरी व्यवस्था में मानव जीवन में फैले अंधकार, व्यभिचार को चित्रित करने के लिए अन्य प्रतीक भी चुनता है। इस प्रकार ‘अंधेरे में’ के प्रतीक यथार्थ का चित्रण करने के साथ-साथ वर्तमान व्यवस्था को ध्वस्त करके ‘आगामी’ की रचना करने का उद्देश्य रखते है।

मुक्तिबोध ने काव्य संरचना का स्थापत्य निर्माण करते हुए, ‘अंधेरे में’ फैंटेसी का प्रयोग किया है। जो उनके काव्य के सौंदर्यबोध को निहित करता है। इतना ही नहीं वह कला के तीन क्षण भी निर्धारित किए है। पहला क्षण है जीवन का उत्कट क्षण, दूसरा- इस अनुभव का अपने दुखित जीवन मूल्यों से अलग हो जाना और फैंटेसी का रूप धारण कर लेना, मानों वह फैंटेसी आँखों के सामने खड़ी नज़र आती हो। कला का तीसरा क्षण है, फैंटेसी के शब्दबद्ध होने की प्रक्रिया। क्योंकि कवि या कलाकार को शब्द साधना के माध्यम से नए-नए अर्थ-स्वप्न मिलते हैं और कवि फैंटेसी से भाषा को समृद्ध करता है, जो उसमें अर्थ-अनुषंगों का नया पन भर देती है। इस प्रकार देखा जाय तो मुक्तिबोध की ज़्यादातर कविताएं फैंटेसी युक्त हैं। तभी तो मुक्तिबोध ने फैंटेसी को ‘अनुभव की कन्या’ बताया है। और ‘अंधेरे में’ कविता की काव्य संरचना मध्य वर्गीय जीवन शैली को लेकर बुना है। जो सामाजिक संरचना में एक बड़े परिवर्तन की आकांक्षा रखते हैं तथा बेहतर दुनिया के निर्माण में एक विकसनशील स्थापत्य या काव्य संरचना का निर्माण करते हैं।

संदर्भ-

1. सं. नेमिचन्द्र जैन, मु. रच. भाग-6 से नेमिचन्द्र जैन को (पत्र), राजकमल प्रकाशन, नई-दिल्ली, 1998.

2. सं. बच्चन सिंह, 'अंधेरे में' इतिहास, संरचना और संवेदना, अभिव्यक्ति प्रकाशन, इलाहाबाद, 1995, पृ.सं. 188.

3. सं. नेमिचन्द्र जैन, मु. रच. भाग-5, राजकमल प्रकाशन, नई-दिल्ली, 1998, पृ. सं.194.

4. अशोक चक्रधर, मुक्तिबोध की कविताई, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई-दिल्ली, 1998, पृ. सं.181.

5. सं. अशोक वाजपेयी, गजा. मा. मुक्तिबोध, प्रतिनिधि कविताएं, राजकमल प्रकाशन, नई-दिल्ली, 2104.

सुमित कुमार चौधरी (शोधार्थी-हिन्दी)

जे.एन.यू. नई-दिल्ली(110067)

मो. 9654829861

Sumitchaudhary825@gmail.com

[1]


[2]


[3]


[4]

485 views

Recent Posts

See All

भक्तिकालीन साहित्य का सामाजिक सरोकार"-दीपक कुमार

शोधार्थी, दिल्ली विश्वविद्यालय “वर्ण–व्यवस्था लगातार चोट करने वाले इस आन्दोलन ने भक्ति के द्वार सभी जातियों के लिए खोल दिया और ‘जात–पात पूछे ना कोई, हरि को भजै सो हरि का होई’, जैसा नारा देकर सभी को एक

8805408656

©2019 by Jankriti. Proudly created with Wix.com