आदिवासियों की व्यथा से रुबरू होती “ग्लोबल गाँव के देवता”: रवि शंकर शुक्ल

रवि शंकर शुक्ल शोध-छात्र, हिन्दी विभाग,

उत्तर बंग विश्वविद्यालय,

राजा राममोहनपुर,

जिला- दार्जीलिंग ( प. बं.),

पिन- 734013,

मो.09614889085

Gmail: ravishukla163@gmail.com

आदिवासियों की व्यथा से रुबरू होती “ग्लोबल गाँव के देवता”

भारतीय ज्ञानपीठ से सन् 2009 में प्रकाशित ‘ग्लोबल गाँव का देवता’ रणेन्द्र का पहला उपन्यास है । इसमें आदिवासी जीवन स्थिती की पूरी सच्चाई दिखाई देती है । रचना में झारखंड के आदिवासी समुदाय ( असुर ) को कथा के केन्द्र में रखा गया है । यह उपन्यास असुर समुदाय के लोगों के निरन्तर संघर्ष का लेखा-जोखा है। उपन्यास में जिन आदिवासी समस्याओं को दिखाने का प्रयास किया गया है वे आज अचानक ही जन्म नही लेती है, बल्कि प्रचीन समय से चली आ रही हैं । पहले तो देवता इनका शोषण किया करते थे और आज भी देवता (विकसित लोग) ही आदिवासियों का शोषण किया करते हैं । इस उपन्यास को पढ़ते समय पता चलता है कि राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय कम्पनिया भी इनका शोषण किया करती है । इस उपन्यास की दृष्टी मल्टीनेशनल कम्पनीयों पर पड़ी हैं । झारखंड मे अनेक कम्पनिया आती हैं जो यहाँ के जमीन से खनिजों को अत्यधिक मात्रा निकाल कर ले जाते है और वहा के लोगों को दफन होने के लिए केवल गढ्ढे छोड़ जाते है; जिनमे बरसात के दिनों मे पानी भर जाने की वजह से मच्छर जन्म लेते है। इस वजह से इलाके मे घातक विमारिया फैल जाती है । यहाँ एक बात समझ में आती है कि जो किसान अनाज व वीज को पैदा करते है उसकी हालत गरिबी से सन्घर्ष करती जस की तस ही रह जाती है जबकि उस वीज एवं अनाज को बेचने वाले करोड़पति हो जाते है । उपन्यास में अंधविश्वास, मिथक, शिक्षा, स्त्री शोषण, लूट- खसोट, विद्रोह, धर्म,तथा आदिवासियों की दयनीय स्थिती को उस्के गहराई के तल से दिखाने का प्रयास किया गया है ।

उपन्यास के द्वारा रणेन्द्र ने सबसे पहले असुर कहे जाने वाले आदिवासी लोगों के प्रति प्रचलित मिथक को तोड़ा है । जब लेखक की मुलाकात पहले पहल लालचन असुर से होती है तो उसकी असुरो के प्रति पोषित पूर्व समस्त धारणाएँ खंडीत हो जाती है । लेखक के अनुसार- “असुरो के बारे में मेरी धारणा थी कि खूब लम्बे चौड़े, काले कलूटे, भयानक दाँत-वाँत निकले हुए, माथे पर सींग–वींग लगे हुए लोग होंगे, लेकिन लालचन को देखकर सब उलट-पलट हो रहा था” एक अन्य सन्दर्भ मे ही ऐसा दृश्य दिखाई पड़ता है - “ आज हर बात मुझे चौका रही थी । लग रहा था कि हफ़्ता दिन बाद आज आँखें खुली हों । यह छरहरी- सलोनी एतवारी भी असुर ही है, यह जान कर मेरी हैरानी बढ़ गयी थी । हफ़्ता भर से इसे देख रहा हूँ ,न सूप जैसे नाखुन दिखे, न खून पीनेवाले दाँत । कैसी- कैसी गलत धारणाएँ ! खुद ही अजब – सी शर्म आ रही थी...1”

अन्धविश्वास जो आदिवासियों के जीवन का एक अहम पहलू है जो इनके बीच रहती है और साथ –साथ भी चलती है; रणेन्द्र के इस उपन्यास को पढते हुए आदिवासियों की यह कमजोरी साफ-साफ दिखाई पडती है । उपन्यास के शुरूआत में ही एक अदिवासी असुर युवक के घायल होने का कारण अन्धविश्वास ही हैं । यहाँ के लोगो का मानना है- “दरअसल अब भी कुछ लोगों के मन में यह बात बैठी हुई है कि धान को आदमी के खून से सानकर बिछड़ा डालने से फसल बहुत अच्छी होती है”2 । ऐसे ही अन्धविश्वास के चलते लालाचन का सर मूड़ीकटवा लोग काट ले जाते है । ऐसे अन्धविश्वासों के साथ ये सदियों से जीते आ रहे हैं ।

आज शिक्षा हमारे देश एवं समाज के स्वर्णिम विकास के लिए अतिआवश्यक कारक है,जिसका बहुत थोडा हिस्सा इन जनजातियों को प्राप्त होता हैं और कुछ जगहो पर उन्हे ये भी नसीव नही होता । लेखक द्वारा इनकी शिक्षा व्यव्स्था पर छाई धाँधलियों की ओर पाठकों के ध्यान को आकर्षित करने का प्रयास किया है । जिस शिक्षा के लिए आदिवासी लोगों को आधार बनाकर स्कूल खोले जाते हैं, स्कूल खुलने पर वह आधार(आदिवासी) ही गायब हो जाता है अर्थात शिक्षा से उन्हे बेदखल कर दिया जाता है और उन पर उच्च वर्ग का कब्जा हो जाता है । आदिवासी समाज के लोगों के जीवन के विकास के लिए सरकार द्वारा प्रायोजित शिक्षा नीति का हनन हो जाता है । उपन्यास में देखा जा सकता है कि जो स्कूल आदिवासी जाति के बच्चों के पढ़ने के लिए बनाये गए थे, उन पर भी शक्तिशाली लोगों का कब्जा हो गया हैं । उनमें नाम मात्र के ही असुर समाज के बच्चे पढ़ते हैं। बाकी तो होता वही है जो आज तक होता रहा है, मुख्यधारा के लोगों का उनके संसाधनों पर कब्जा । यथा, इसी उपन्यास का यह अंश दृष्टव्य है- “ लेकिन एक और बात की ओर लालचन और रुमझुम ने इशारा किया । भौरापाट स्कूल आदिम जाति परिवार की बच्चियों के लिए खोला गया था । किन्तु उसमे पढ़ने वाली असुर- बिरिजिया बच्चियों की संख्या दस प्रतिशत से ज्यादा नहीं थी । ज़्यादतर बच्चियाँ हेडमिस्ट्रेस और और टीचर्स के गाँव की और उनकी ही जाति, उरांव-खड़िया, खेरवार परिवार की थीं3 |”

उपन्यास आदिवासी समाज की स्त्रियों को भी साथ लेकर चलती है । आज के समाज की एक बडी समस्या महिलाओं की इज्जत की सुरक्षा हमारे सामने है । आदिवासी महिलाओं के संघर्ष और उनकी विवशता को भी रणेंद्र ने दिखाया है। आदिवासी स्त्रियों व लड़कियों को रूपये का लोभ देकर ठेकेदार मुंशी अपने पास बुलाते हैं । इसकी व्यथा उपन्यास में दिखाई एवं सुनाई पड़ती है । आदिवासी नौजवानों के मुँह से यह गीत अक्सर सुनाई पड़ता है -

“ काठी बेचे गेले असुरि,

बाँस बेचे गेले गे,

मेठ संगे नजर मिलयले,

मुंशी संग लासा लगयले गे,

कचिया लोभे कुला डुबाले,

रूपया लोभे जात डूबाले गे” । 4

खदान के मेठ, कलर्क ,अफ़सरों के डेरों में काम करने वाली महिलाओं के रंग–ढग देखते देखते बदल जाते है । यह गीत इनकी सच्चाई को दिखाता तो है ही तथा साथ ही साथ समाज के सामने अपनी शिकायत भी दर्ज कराता है कि समाज का हमारे साथ ऐसा व्यवहार क्यूँ हैं ।

उपन्यासकार ने जिस झारखंड राज्य को अपनी कथा का केन्द्र बनाया है,वह एक समान्य राज्य नही है । उस झारखंड राज्य की धरती के गर्भ में अपार खनिज–सम्पदा है जिसका पूरा उपयोग वहाँ की सरकारें करती हैं, फिर भी वहाँ के लोगों का कोई विकास होता नही दिखाई देता है । इसका स्पष्ट दृश्य इस उपन्यास में दिखाई पड़ता है “अभी तो आप आये ही हैं । देखिएगा कि मक्का की एक बरसाती फसल के भरोसे जिन्दगी कितनी कठिन हो जाती है । मजदूरी और जंगल का सहारा ना हो तो लोग आसाम और भूटान निकल जायेगें । लेकिन एक तAरफ इन खानों ने मजदूरी दि तो दूसरी तरफ बर्बादी के सरेजाम भी खड़े किये । पिछले पच्चीस तीस सालों मे खान मालिकों ने जो बड़े- बड़े गड्डे छोड़े हैं बरसात में इन गड्डों मे पानी भर जाता है और मच्छर पलते हैं । सेरेब्रल मलेरिया यहाँ के लिए महामारी है , महामारी । 5”

उपन्यास में ग्लोबल गाँव के सभी आदिवासी समस्याओं को ध्यान देते हुए लालचन दा और रूमझुम इलाके मे हो रहे अवैध खनन को रोकने के लिए वहाँ के कलक्टर को दरख्वास्त देते हैं पर कलक्टर इस जाँच के लिए एक भ्रष्ट अधिकारी को जिम्मेदारी देते हैं जिसके कारण उन्हें निराशा ही हाथ लगती है । शिंडालको जैसी खनन कम्पनी भी इनका शोषण करती है। इन खनन कम्पनीयों के विरोध में आदिवासियों द्वारा एक जुलूस निकाला जाता है और पूरे पाट के लगभग सभी खदानों का काम सात दिनों तक रोक दिया जाता है । इसके बाद शिंडालको कम्पनी का मैनेजर आता है और अपने छद्म कूटनीति से सारे आन्दोलन को ध्वस्त कर देता है और फिर कई असुर आदिवासीयों को गिरफ्तार कर लिया जाता है।

इसके बाद ग्लोबल गाँव में एक नये देवता शिवदास बाबा जा जन्म होता है जो इन असुरो की जमानत देता हैं फिर वह असुरों को बहकाना शुरू करता है और समाज-सेवा के नाम पर वे आदिवासी युवतियों का रात में सेवा के बहाने उनका शोषण करता है । शिवदास बाबा की ही तरह ग्लोबल गाँव मे दो और देवता का जन्म होता है जो इन असुरो को चारो तरफ से लूटने का काम करते है। “वेदांग और टाटा” जैसी कम्पनी बाबा और विधायक के साथ मिल कर शोषण करते है । ये सभी ग्लोबल गाँव के देवता हैं । रणेन्द्र बडी सफाई से इन सभी देवताओं के माध्यम से शासन और प्रशासन को न्याय के कठघरे में खड़ा कर देते है।

इस उपन्यास को पढते हुए धर्म और उनके ठेकेदारों की नीयत का भी पता चलता है जो हमारे समाज में कही ना कही विद्य्मान है। शिवदास बाबा द्वारा आदिवासियों को कंठी धारण व धर्म परिवर्तन करवाने के लिए अन्धविश्वासों का पूरा सहारा लिया जाता है । कंठी धारण करने के साथ - साथ उन्हे शिक्षा दी जाती है कि “उसे मांस खाना छोड़ देना था और हड़िया दारू को हाथ भी नहीं लगाना था । घर के आगन में तुलसी का पौधा और हाते में पीपल लगाना था । जादू-टोना, डाइन, बिसाही,ओझा,भूत,प्रेत,चुड़ैल इन सबों से दूर रहाना था । सियानियों को सबेरे जागने के बाद और रात में सोने से पहले अपने पतियों का पैर छूना था । गुरूवार के गुरूवार अखड़ा मे सामूहिक रूप से भजन गाना और गैर-कंठी वाले आदमी का छूआ पानी भी नहीं पीना था । साफ़-सफ़ाई पर पूरा ध्यान और काला वस्त्र, काली वस्तु,काले गाय-गोरू,मुर्गी सूअर से दूर रहना था ये काले जानवर दरअसल जानवर नहीं थे,बल्कि वेश बदले हुए पिशाच थे । 6”

रणेन्द्र दिखाते है कि इन असुरों को किस तरह अपने अस्तित्व को बचाये रखने एवं समाज में बने रहने के लिए आन्दोलन करना पड़ता है और इनके इस समान्य से विरोध को भी नक्सली आन्दोलन का नाम दे दिया जाता है । शासन –प्रशासन के सहयोग से वेदांग जैसी कम्पनीयाँ इन आदिवासी लोगों को माइंस बिछाकर उड़ा देती है । यह सब देखकर ग्लोबल गाँव का देवता खुश होता है “जो लड़ाई वैदिक युग में शुरू हुई थी , हजार हजार इंद्र जिसे अंजाम नहीं दे सके थे, ग्लोबल गाँव के देवताओं ने वह मुकाम पा लिया था । 7”

भूमण्डलीकरण और निजीकरण के चलते आदिवासियों से उनकी जमीनें छीनी जा रही है जो बहुत ही दुखद बात है। जिन प्रशासकों पर इन आदिवासीयों के हित और सुरक्षा की जिम्मेदारी है वे ही अपनी जिम्मेदारी को ताक पर रख अपनी रोटियाँ सेंकते हैं तथा वेदांत एवं शिंडालको जैसी कम्पनीयों को आदिवासियों के धन सम्पदा को लूटने का मौका देते हैं । जो भी इनका विरोध करता है उसे रास्ते से हटा दिया जाता है । यह उपन्यास आज के झारखंड राज्य में हो रहे लूट-पाट के यथार्थ को बखूबी दिखाता है और साथ ही साथ ऐसी स्थिती पैदा होने का जबाब माँगता है ।

संदर्भ सूची-

1. रणेंद्र, ग्लोबल गाँव के देवता, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, दूसरा संस्करण 2014, पृष्ठ-11

2. रणेंद्र, ग्लोबल गाँव के देवता, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, दूसरा संस्करण 2014, पृष्ठ-12

3. रणेंद्र, ग्लोबल गाँव के देवता, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, दूसरा संस्करण 2014, पृष्ठ-20

4. रणेंद्र, ग्लोबल गाँव के देवता, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, दूसरा संस्करण 2014, पृष्ठ-38

5. रणेंद्र, ग्लोबल गाँव के देवता, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, दूसरा संस्करण 2014, पृष्ठ-13

6. रणेंद्र, ग्लोबल गाँव के देवता, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, दूसरा संस्करण 2014, पृष्ठ-57

7. रणेंद्र, ग्लोबल गाँव के देवता, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, दूसरा संस्करण 2014, पृष्ठ-100

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