आदिवासी हिन्दी कविता का सच: समकालीन विमर्श के नए स्वर धनंजय कुमार साव


हमारा देश भारतवर्ष विविधताओं से भरा है | यह विविध जातियों, संस्कृतियों, भाषाओं और धर्मों का देश है | आज हम सभ्यताओं के विकाश-पथ पर चलते हुए इक्कीसवीं सदी के तेज भागते समय में प्रवेश कर गए हैं | पर इतने लंबे सभ्यता-सफर में आदिवासी जीवन- समाज कहाँ अटका पड़ा है, जरा इस पर भी ठहरकर सोचने की जरूरत है |

आज जिसे इक्कीसवीं सदी का भारत बताया जा रहा है, उसका एक बड़ा भू-भाग आदिवासी लोगों का उपेक्षित संसार है | एक रिपोर्ट के अनुसार- “आदिवासी सम्पूर्ण भारत में हैं इनकी संख्या लगभग 8 करोड़ है | यह देश की आबादी के 7.8% हैं | पूरे देश में आदिवासी समुदायों की संख्या 600 से अधिक है | देश के 72% वनज और प्राकृतिक संसाधन, 90% कोयला खदान, 80% खनिज संपदा आदिवासी इलाकों में है | फिर भी 85% आदिवासी गरीबी रेखा के नीचे गुजर-बसर कर रहे हैं | देश के कुल बंधुआ मजदूरों में 83% मजदूर आदिवासी हैं |”1 स्पष्ट है कि आदिवासी जीवन-समाज देश की आर्थिक समृद्धि-स्त्रोत के मध्य रहकर भी कंगाल है, उपेक्षित है | कहने की जरूरत नहीं है कि इनकी उपेक्षा का प्रमुख कारण सत्ता के गंदे खेल स्वरूप प्राकृतिक संसाधनों का दोहन, जंगल-जमीन से आदिवासी जन-जीवन की बेदखली एवं उनकी सामुदायिक संस्कृति को नष्ट करने की दुरभिसंधि है|

उल्लेखनीय है कि भारत की मुख्यधारा का विकसित संसार आदिवासी जीवन-समाज के दोहन की नींव पर अपने विकास-महल के कंगूरे खड़ा कर रहा है | आदिवासी समाज से गहरे जुड़े समाज-चिंतक वीर भारत तलवार का भी इस संदर्भ में यही तर्क है-“ आदिवासी इलाकों में प्राकृतिक संसाधनों और सस्ते श्रम का शोषण करके भारत राष्ट्र की जो प्रगति की जा रही है वह हमारी और आपकी- भारत की विकसित राष्ट्रीयताओं के चरागाह( ग्रेजिंग ग्राउंड ) बने हुए हैं | नियम यह है की हर यज्ञ में बलि जरूरी है स्वतंत्र भारत के आर्थिक विकास का जो यज्ञ पिछले पचास सालों से चल रहा है, उसमें बलि आदिवासियों की दी गई हैं |”2 अतः आदिवासी समाज में हलचल होना शुरू हो गया है, उसी की एक परिणति आदिवासी साहित्य-लेखन है | यहाँ कहने की जरूरत नहीं है कि अन्याय और शोषण की नींव पर खड़ी हमारी समाज-व्यवस्था के कारण समकालीन हिन्दी कविता में भी आदिवासी स्वर का उठना स्वाभाविक हो गया है, जो साहित्यिक विमर्श के नए तेवर को हमारे समक्ष रखने की कोशिश कर रहा है |

दरअसल बात यह है कि समकालीन हिन्दी साहित्य में आदिवासी कविता अपने रचनात्मक सफर के प्रारम्भिक पड़ाव में है | इसे अभी लंबी यात्रा तय करनी है, उन दरवाजों पर दस्तक देते हुए अपनी साहसपूर्ण उपस्थिति दर्ज करते हुए जो वर्षों से बंद पड़े हैं | इस संदर्भ में हरिराम मीणा का मन्तव्य अवलोकनीय है- “आदिवासी जीवन को लेकर जब कविता की बात की जाती है, तो मौखिक परंपरा ही समृद्धि के धरोहर के रूप में सामने आती है जो प्रमुख रूप से गेय परंपरा रही है | आधुनिक या समकालीन कविता कि दृष्टि से आंचलिक भाषाओं में अवश्य कविता के माध्यम से जीवन के विभिन्न पक्षों की अभिव्यक्ति होती रही है लेकिन हिन्दी भाषा में आदिवासी कविता अभी शुरूवाती दौर में है |”3 कहना न होगा कि समकालीन हिन्दी साहित्य में आदिवासी हिन्दी कविता की उपस्थिति उसकी अपनी आवाज है, जिसे बुलंद करने को कई कवि-कवयित्री आगे आयें हैं, मसलन- निर्मला पुतुल, ग्रेस कुजूर, अनुज लुगुन, भुजंग मेश्राम, सी॰एल॰ सांखला, डॉ॰ भीम सिंह, महादेव टोप्पो, सुशील कुमार, वीर सिंह पाडवी, हरिराम मीणा इत्यादि | यहाँ इनमे से चंद रचनाकारों की कविताओं के जरिये हम आदिवासी जीवन- समाज की वास्तविकताओं तथा उसके कटु- सच से अवगत हो सकते हैं |

इस संदर्भ में सबसे पहले आदिवासी कवयित्री निर्मला पुतुल की कविता ‘ चुड़का सोरेन’ का उल्लेख किया जा सकता है | जहां वर्षों से आदिवासी जीवन-समाज के विकास के नाम पर देश की मुख्यधारा की सभ्यता-सत्ता के सिरमौर बने लोगों द्वारा होने वाले छल का संकेत है | जहां यह दर्शाया गया है कि आदिवासी जीवन-समाज के लिए देश की ‘आजादी’ और गणतन्त्र आदि मूल्यों का अब तलक कोई मतलब नहीं निकला है | आदिवासी समाज को केवल नुमाइश की चीज बना दिया गया है | निर्मला पुतुल आदिवासी जन ( चुड़का सोरेन आदि) को सत्ता के गंदे खेल और छल से अवगत कराते हुए हमारी सभ्यता की विकास-यात्रा पर प्रश्न करती हैं –“ तुम्हारी भाषा में बोलता वह कौन है / जो तुम्हारे भीतर बैठा कुतर रहा है तुम्हारे विश्वास की जड़ें? / दिल्ली की गणतन्त्र की झांकियों में अपनी टोली के साथ / नुमाइश बनकर / कई –कई बार पेश किए गए तुम पर गणतन्त्र के नाम की / कोई चिड़िया / कभी आकर बैठी / तुम्हारे घर की मुंडेर पर ?”4 स्पष्ट है कि कवयित्री का यह सवाल केवल चुड़का सोरेन से नहीं, बल्कि मुख्यधारा के विकसित उस समाज से भी है, जो अपनी सुध में मस्त -लस्त पड़ा है |

कवयित्री यहीं नहीं रुकती हैं, बल्कि वह चुड़का सोरेन के जरिये अपने ही समाज की अंदरूनी कमजोरियों की ओर भी इशारा करती हैं | जहाँ आदिवासी समाज का ही नेता अपनी उच्छृंखल कामनाओं को पूरा करने के लिए, थोड़े से लालच को पाकर अपने ही समाज और संस्कृति को उन लोगों के सामने रेहन रख देता है, बेच देता है जिनके लिए आदिवासी समाज- संस्कृति की हर चीज की तरह उनकी स्त्रियाँ भी केवल उपभोग का सामान है | कवयित्री अपनी इस कविता में स्त्री को केवल देह समझकर उसका भोग करने तथा उसकी खरीद- फ़रोक्त करने की घृणित मानसिकता की शख्त खिलाफत करती है – “ कैसा विकाऊ है / तुम्हारी बस्ती का प्रधान / जो सिर्फ एक बोतल विदेशी दारू में / रख देता है / पूरे गाँव को गिरवी ओर ले जाता है / लकड़ियों के गट्ठर की तरह / लादकर अपनी गाड़ियों में / तुम्हारी लड़कियों को ... |”5

स्पष्ट है कि कवयित्री अपनी इस कविता के जरिये उस आदिवासी विमर्श की अलख जगाने की चेष्टा करती हैं, जो आदिवासी जन-जीवन की चेतना को उद्बुध कर सके, जो उन्हे उनकी वास्तवीक जिंदगी का बोध कराये तथा उन्हे शोषण के हर पहलू की पहचान कराये | वह लिखती हैं-“ शाम घिरते ही अपनी बस्तियों में उतर आए / इन खतरनाक शहरी जानवरों को / पहचानों चुड़का सोरेन पहचानों!! / पाँव पसारे जो तुम्हारे ही घर में / घुस कर बैठे हैं / तुम्हारे भोलेपन की ओट में / इस पेंचदार दुनिया में रहते / तुम इतने सीधे क्यों हो चुड़का सोरेन?? |”6 यहाँ गौर किया जाय तो कवयित्री अपने शब्द- प्रयोग से कई महत्वपूर्ण बातों की ओर इशारा करती हैं | वह ‘खतरनाक शहरी जानवर’ से यह कहना चाहती है कि शहरी- सभ्यता का वहशीपन ( लालचपन) इतना खतरनाक है कि अपने भोग, उपभोग और अकेले विकसित होने के मद में पूरे आदिवासी समाज-संस्कृति की अस्मिता को ही निगल जाना चाहती है | इसलिए इनकी चालाकियों को समझने की जरूरत है | इन तत्त्वों से सीधे बने रहकर टकराया नहीं जा सकता है |

इसी संदर्भ में निर्मला पुतुल की एक अन्य कविता ‘संथाली लड़कियों के बारे में कहा गया है’ का जिक्र करना स्वाभाविक लगता है | जिसमे मुख्यधारा के विकसित समाज के सौंदर्य-बोध और उससे जुड़ी हिपोक्रेसी को उघाड़ने की नीयत साफ झलकती है | वह लिखती है – “ वे जब हँसती हैं फेनिल दूध सी / मिलने से कतराते और रात के अंधेरे में / मिलने को मांगते हैं आमंत्रण / ये वे लोग हैं जो रात को लबादा ओढ़े / शहरों के आखिरी छोर पर गिरा अपने अंदर की सारी गंदगी / गंदला रहे हैं हमारी बस्तियाँ... |”7 स्पष्ट है कि यहाँ कवयित्री दिन-रात और उजाले-अंधेरे की स्थितियों के सहारे मुख्यधारा समाज की उस लोलुप निगाह पर चोट करती है, जो आदिवासी स्त्री-देह को छिप कर भोगने में संलिप्त रहती है | यही नहीं, कवयित्री तो यह भी कहती है कि ये मुख्यधारा विकसित समाज के वे ही सौन्दर्य प्रेमी हैं, जो मेरे कविताओं अर्थात आदिवासी कविता में भी मेरी देह अर्थात स्त्री- देह को ढूंढते हैं –“ ये वे लोग हैं जो मेरी कविताओं में भी / तलाशतें हैं मेरी देह... |8 स्पष्ट है कि यहाँ कवयित्री अपनी कविता के माध्यम से स्त्री-स्वर को बुलंद करती हुई स्त्री को केवल देह तक सीमित कर देने वाले साहित्यिक सौंदर्यशास्त्र की भी भर्त्सना करती है |

देखा जाय तो समय के तेज रफ्तार में मुख्यधारा समाज के विकास की परिधि दिन-प्रतिदिन विस्तृत होती जा रही है | यह सब कुछ हासिल करने की ज़िद लिए आगे बढ़ रही है, और जो इसके सामने आता है, आदिवासी जल-जंगल-जमीन (प्रकृति-पर्यावरण) या इनकी संस्कृति उस पर काबिज हो, सिरमौर बन जाने की कोशिश कर रही है | ऐसे नाजुक समय में हिन्दी कविता अपनी प्रकृति और संस्कृति की रक्षा हेतु सजग हो गई है | अर्थात जो कुछ है उसे बचाने की जद्दोजहद में लग गई है | आदिवासी कविता का यह स्वर समकालीन हिन्दी कविता के मूल स्वर को ही रेखांकित करता है |

आखिरकार आदिवासी समाज जो चाहता है उसे गंभीरता से देखने-समझने, उस पर ठहरकर विचार करने का समय आ गया है | आदिवासी समाज बस इतना आग्रह करता है कि प्रकृति की नैसर्गिकता की तरह हमारी ( आदिवासी) संस्कृति की जीवंतता भी अक्षुण्ण रहे | कवि अनुज लुगुन की कविता ‘ हमारी अर्थी शाही नहीं हो सकती’ का निम्न स्वर उक्त संदेश को ही मुख्यधारा समाज के समक्ष पहुंचा देना चाहता है –“ खेतों के आसमान के साथ / हमने चाहा की जंगल बचा रहे / अपने कुल गोत्र के साथ पृथ्वी को हम पृथ्वी की तरह ही देखें / पेड़ की जगह पेड़ ही देखें / नदी की जगह नदी / समुद्र की जगह समुद्र / और पहाड़ की जगह पहाड़ ...|”9 किन्तु विडम्बना की बात यह है कि आदिवासी जीवन-समाज की इस नाचीज़ मांग की भी रक्षा नहीं करना चाहती है मुख्यधारा समाज की विलासपूर्ण मानसिकता |

वैसे यह बात जाहिर है की आदिवासी समाज प्रकृति और संस्कृति से अत्यधिक प्यार करता है | इस प्रेम के आलंबन स्वरूप- पेड़, पर्वत, नदी, गीत-नृत्य और संगीत आदि उनमे गहरे समाया रहता है | इस कारण भी आदिवासी कविताओं में अपने अंचल की प्रकृति के रूप में वहाँ के पेड़-पल्लव, नदी, पर्वत, गीत-संगीत का ज़िक्र बार-बार आता है | ऐसी ही संवेदना की एक कविता ग्रेस कुजूर की ‘ एक और जनी का शिकार’ है | इस कविता में यह द्रष्टव्य है कि पेड़-पल्लव आदिवासियों के आर्थिक-सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा हैं | यहाँ यह भी देखने को मिलता है कि कवयित्री का मन अपने अंचलों से पेड़ों के गायब होने तथा वहाँ के वातावरण के विषाक्त होने से खिन्न है – “ कहाँ गया वह फुटकल का गाछ / जहाँ छ चढ़ती थी मैं / साग तोड़ने / और गाती थी तुम्हारे लिए / फगुआ के गीत / जाने किधर हैं / कोमल पत्तियों वाला / कोयनार का गाछ जिसके नीचे तुम / बजाया करते थे माँदर और बांसुरी / ... / किसने उगाएँ हैं वहाँ / विषैले नागफनी / बार-बार उलझता है जहां / तुम्हारी ‘तोलोंग’ का फुदना / पटवा के उजले पंख? ... |”10 स्पष्ट है कि आदिवासी कविता का यह स्वर केवल आदिवासी विमर्श को ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण प्रकृति-पर्यावरण के विमर्श या यूं कहें कि एक नई सभ्यता-विमर्श को हमारे समक्ष रखता है | यही नहीं, प्रस्तुत कविता का यह स्वर एक आदिवासी स्त्री की प्रेम संवेदना के भी चोटिल होने की व्यथा को प्रस्तुत करता है, क्योंकि उनकी प्रकृति, उनका सम्पूर्ण अंचल ही उनके प्रेम का आलंबन है |

इसी तरह भीम सिंह की एक कविता ‘पीलू’ है, जो आदिवासी जीवन-समाज की पेड़ से जुड़ी संवेदना को एक अन्य स्तर पर उठाती है | पीलू एक फल का पेड़ है | यह राजस्थान के सवाई माधोपुर जिला के लिए एक परिचित नाम है | आदिवासी जीवन-समाज में इसकी उपादेयता मनुष्य और प्रकृति के संतुलन साधने में होती है | यह पेड़ अकाल, बाढ़ एवं ग्रीष्म ऋतु में राहगीरों के विशेष काम आता है | यही नहीं, यह मिट्टी के कटाव को रोकने में सहायक वृक्ष है | पर इन सब बातों से बेख़बर मुख्यधारा समाज की लालची प्रवृत्ति इसे काटने की फ़िराक में रहती है, क्योंकि उसे सिर्फ मुनाफा कमाना है | डॉ॰ भीम सिंह की यह कविता प्रकृति-पर्यावरण और इससे सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से जुड़े आत्मीय जनों की संवेदना की किनारेकशी को गंभीर रूप से उठाती है | वे लिखते हैं – “ पीलू रे पीलू / पसीने से लथपथ / राहगीरों का एक मात्र तू ही आश्रयदाता / ... / बरसौ मेह / तो पाड़ बांधड़ी पड़े रे / तो काम आया ‘पीलू’ / ... / मेह बरसौ कौनी / तो काम आयो ‘पीलू’ /तो जी गयो भोलू / ... / प्रधान ने दे दियो ठेको तो रो दियो ‘भोलू’ / तो काई का गीत गाये भोलू? / पीलू रे पीलू .... |”11 स्पष्ट है कि यहाँ भोलू की रूदन में आदिवासी समाज की प्रकृति और समाज का क्रंदन व्यंजित है |

आदिवासी जीवन-समाज का अपने पेड़-पल्लव ही नहीं, अपनी नदियों से भी गहरा लगाव होता है | वह उसे माँ की तरह पूजता है, भले ही वह किसी हिमालय की गंगोत्री से नहीं निकली हो | यह समाज अपनी नदियों से इतना आत्मीय-अंतरंग होता है कि इसके सूखने को अपनी व्यथा से संपृक्त कर देखता है | ऐसी ही एक नदी की व्यथा-कथा सुशील कुमार की कविता –‘ बांसलोय में बहत्तर’ है | जिसमें संथाल परगना की एक पहाड़ी नदी की व्यथा-कथा के बहाने आदिवासी जीवन-समाज की संवेदना का चित्रण हुआ है –“ नदी माँ, तुम्हारी ममता में / बहत्तर ऋतुओं को जिया है मैंने / देखता हूँ, तिल-तिल जलती हो दिककुओं के पाप से तुम / दिन-दिन सूखती हो / क्षण-क्षण कुढ़ती हो / निर्मोही महाजनों से / मन ही मन कोसती हो / जंगल के सौदागरों को / रेत के घूँघट में मुँह ढाप रात-रात भर रोती हो ...|”12 स्पष्ट है कि नदी के रोते हुए बिम्ब के जरिये आदिवासी जीवन-समाज की वास्तविकता की ओर इशारा हुआ है, जहाँ मुख्यधारा का विकास-उन्माद, पूँजीपतियों के मुनाफे का खतरनाक खेल स्पष्ट व्यंजित है |

इसी तरह पर्वतों के मिटाने की मुख्यधारा समाज की विकास-ज़िद को आदिवासी कविता सम्पूर्ण मानव के प्रकृति-पर्यावरण को असंतुलित करने की खतरनाक कोशिश के रूप में देखती है | ग्रेस कुजूर की कविता ‘ हे समय के पहरेदारों’ का निम्न स्वर यही कहता है –“ आज तुम अपने ही स्वार्थ के लिए / पर्वतों के पत्थर / तोड़ रहे हो / बारूदी गंध से / जीवन को मोड रहे हो / ... / करोड़ों सालों में बने / इन पर्वतों को / तुम्हारे बारूदी मन ने / फिर-फिर तोड़ा है / और कुँवारी हवाओं को हर बार छेड़ा है |”13 स्पष्ट है कि प्रकृति-पर्यावरण के नैसर्गिक माहौल में मुख्यधारा समाज और उसके विकास- उन्माद की अनचाही दखल कही न कहीं कवयित्री को गहरे में पीड़ित करती है | इसी कारण वह साफ-साफ कहती है कि प्रकृति की नैसर्गिकता से छेड़छाड़ सिर्फ आदिवासी जीवन-समाज के अस्तित्व के संकट का प्रश्न नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानव एवं मानवेतर प्राणी जगत का संकट है | कवयित्री का चेतावनी भरा स्वर कुछ इस प्रकार है – “ इसलिए फिर कहती हूँ / न छेड़ों प्रकृति को / अन्यथा यही प्रकृति / एक दिन मांगेगी / हमसे / तुमसे अपनी तरुणाई का एक-एक क्षण / और करेगी भयंकर ... बगावत / और तब / न तुम होगे / न हम होंगे|”14 ध्यान दिया जाय तो इसी बिन्दु पर आकर आदिवासी कविता समकालीन कविता के मूल स्वर – जो कुछ बचा है, उसे बचाने की चाहत – से एकमेक हो जाती है | यही नहीं, आदिवासी कविता प्रकृति और उसके उपादानों को बचाने की नीयत के कारण एक तरह से आदिवासी विमर्श को पर्यावरण विमर्श या यूं कहें एक नए सभ्यता-विमर्श को स्वर देती है |

अतः इस प्रकार कहा जाय तो आदिवासी कविता एक व्यापक कैनवास लिए हुए हमारे समक्ष उपस्थित होती है | इसमें आदिवासी जीवन-संस्कृति के शोषण-दोहन का जो कुचक्र मुख्यधारा समाज का विकास-उन्माद करता है, उसका गंभीर निरूपण है | प्रकारान्तर से यह उत्तर आधुनिक सभ्यता के उस भयावह पहलू को दर्शाता है, जहाँ यह मान लिया गया है कि उपभोग और केवल स्वयं के, केवल अकेले का उपभोग ही चरम सुख है | इसी तरह आदिवासी कविता अपने समाज की स्त्रियों को देह मात्र समझने, उसे वस्तु की भाँति खरीद-फ़रोक्त करने की घृणित मानसिकता को आड़े हाथों लेती है, तथा पूंजीवादी-सामंती पितृसत्ता को चुनौती देती है | इस बिन्दु पर आदिवासी कविता स्त्री-विमर्श को भी अपने भीतर समेट लेती है | यही नहीं, प्रकृति की नैसर्गिकता और मानवता को बचाने की संवेदना के कारण आदिवासी कविता पर्यावरण- विमर्श को तथा उसके माध्यम से सभ्यता के नए विमर्श को स्वर देती है | सारत: कहा जाय तो आदिवासी कविता एक समावेशी विमर्श को आगे बढ़ाती है, जिसे समकालीन हिन्दी कविता को आग्रहपूर्वक सुनने-समझने की जरूरत है |

संदर्भ

1॰ उद्धृत देवरे, डॉ॰ शिवाजी, समकालीन हिन्दी उपन्यासों में आदिवासी विमर्श, विद्या प्रकाशन, कानपूर प्र॰ सं॰ 2013, भूमिका

2. उद्धृत, आलोचना,अक्तूबर-दिसम्बर, 2008

3॰ मीना, हरिराम (संपादक), समकालीन आदिवासी कविता, अलख प्रकाशन, प्र. सं. 2013, पृ. 10( भूमिका)

4. यथोपरि, पृ. 27-28

5. यथोपरि, पृ. 28

6. यथोपरि, पृ. 29

7. यथोपरि, पृ. 30

8. यथोपरि, पृ.31

9. यथोपरि, पृ. 16

10 यथोपरि, पृ.10

11. यथोपरि, पृ.75-76

12. यथोपरि, पृ.85

13. यथोपरि, पृ.24-25

14. . यथोपरि, पृ.25-26

धनंजय कुमार साव

अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, कलियागंज कॉलेज

पो. कालियागंज, उत्तर दिनाजपुर,पिन.733129

पश्चिम बंगाल, मो.09474439158

ईमेल: shawdhananjay10@gmail.com

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