आधुनिक संस्कृत-काव्यों में राष्ट्रीय-चेतना(कवयित्रियों के विशेष सन्दर्भ में)-अरुण कुमार निषाद


राष्ट्र शब्द का अर्थ बहुत ही व्यापक है | ‘राजति राजते वा इति राष्ट्रम्’ इस अर्थ में ‘राज् दीप्तौ’ धातु से ‘सर्वधातुभ्य: ष्ट्रन्’ (औणादिक सूत्र) से ष्ट्रन् प्रत्यय होने पर राष्ट्र शब्द निष्पन्न होता है | राष्ट्रीय चेतना किसी स्थान विशेष, काल या पात्र का निरूपक न होकर एक सार्वभौमिक नित्य-भाव के रुप में अवस्थित है | यह शाश्वत प्राणशक्ति जिसे हम राष्ट्रीय चेतना कह रहे हैं, वह रहती है अपने देशवाशियों के मनोमस्तिक में, उनके हृदय प्रदेश में | The feeling of nationlity lives in the minds and hearts of its people . यही भारत का राष्ट्रीय स्वरूप है | संपूर्ण संस्कृत साहित्य राष्ट्रीय चेतना से ओत-प्रोत है , पर विडम्बना यह है सर्वसाधारण की भाषा न होने के कारण लोक इन ग्रन्थों में छिपे रहस्य से अभी तक अनभिज्ञ हैं |

जयशंकर प्रसाद की कालजयी रचना ‘कामायनी’ में बन्धुत्व,समरसता,एवं समन्वयवाद का सन्देश देते हुए श्रद्धा मनु से कहती है –

“औरों को हँसते देखो मनु हंसो और सुख पाओ |

अपने सुख को विस्तृत कर लो ,सबको सुखी बनाओ ||”

ऋग्वेद से लेकर लौकिक साहित्य राष्ट्र की सभी संकल्पनाओं और उससे सम्बन्ध विचारों से भरा पड़ा है | ऋग्वेद के वाक् सूक्त में ऋषि कहते है-

“ऋतेन राजन्ननृतं विविञ्चनं मम राष्ट्रस्याधिपत्यमेहि”

किसी कवि ने कहा है –

“उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम् |

वर्ष तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्तति:||”

यजुर्वेद में लिखा है कि- राष्ट्र स्वतंत्र हो , वह जन हितकारी हो तथा विश्व कल्याण के लिए प्रयत्नवान हो –

“जनभृत्य राष्ट्रदा राष्ट्रं मे दत्त , विश्वभृतस्थ राष्ट्र दा |

राष्ट्र मे दत्त , स्वराज्यस्थ राष्ट्र दा राष्ट्रं मे दत्त” ||

शुक्ल यजुर्वेद में भी वर्णित है –“........योगक्षेमं न: कल्पन्ताम्” ||

अन्यत्र भी –

इत्था हि सोम इन्मदे ब्रह्मा चकार वर्धनम् |

शविष्ठ वज्रिन्नोजसा पृथिव्या नि:शशा अहिमर्चन्ननु स्वराज्यम्”||1

अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त (12/1) तथा राष्ट्राभिवर्धनम् सूक्त (1/29) में ऋषियों ने इसी बात का वर्णन करते हुए कहा है -

अभिवृत्य सपत्नानभि या नो अरायत: |

अभिपृतन्यन्तं तिष्ठाभि यो नो दुरस्यति ||2

मनुस्मृति में राष्ट्रीय चेतना का प्रकटन इस रूप में किया गया है –

एतद् देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मन: |

स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवा:” ||

अभिराज’ राजेन्द्र मिश्र अपने काव्यशास्त्रीय ग्रन्थ “अभिराज राजयशोभूषणम्” में लिखते हैं-

तत्रऽनेको बिन्दवो मम्मटोक्तव्यवहारज्ञान एवान्तर्भवति |

राष्ट्रभक्त्यादीनि प्रयोजनानि पुनर्वयमपि अभिनन्दाम: |

तत्समर्थितमेव रेवाप्रसादद्विवेदैरपि युगावश्यकता पूर्ते: धर्मरक्षा

राष्ट्रदेवप्रबोधादीनामपि काव्यप्रयोजनत्वमिति द्विशद्भि3 ||

पण्डिता क्षमाराव

पण्डिता क्षमाराव राव आधुनिक संस्कृत साहित्य की सुप्रसिद्ध लेखिका हैं |आपका जन्म 4 जुलाई 1980 ई. को महाराष्ट्र के सामन्तबाड़ी जनपद के बांबोली नामक गाँव में हुआ था | आपके पिता का नाम शंकर पाण्डुरंग था | आपका विवाह प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ.राघवेन्द्र राव के साथ हुआ | इनके साथ आपने अनेक विदेश यात्रायें की और उन-उन देशों में संस्कृत भाषा और भारतीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार किया | आपकी लगभग दस रचनायें हैं | आपका देहांत 22 अप्रैल 1954 ई. को हुआ |

पण्डिता क्षमाराव की देशभक्तिपरक रचनाओं में प्रमुख हैं –ग्रामज्योति: , तथा सत्याग्रहगीता | ग्रामज्योति: एक कथासंग्रह है | इसमें तीन कथाएँ हैं- रेवाया: कथा, कटुविपाक: ,और वीरभा | सत्याग्रहगीता एक काव्य रचना है | सत्याग्रह गीता में वे लिखती हैं-

तथापि देशभक्त्याहं जातास्मि विवशीकृता |

अतएवास्मि तदातुमुद्यता मन्दधीरपि ||4 ” 1/3

और भी

पारतन्त्र्याभिभूतस्य देशस्याभ्युदय: कुत: |

अत: स्वातन्त्र्यमाप्तव्यमैक्यं स्वातन्त्र्यसाधनम् ||5

डॉ. मिथलेश कुमारी मिश्रा

आपका जन्म उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद नगर में तिवारी गली के मुहल्ले में दिसम्बर 1953 को हुआ था | इनकी प्रारम्भिक शिक्षा फर्रुखाबाद तथा उच्च शिक्षा लखनऊ विश्वविद्यालय में सम्पन्न हुई | प्रणीत ‘चन्द्रचरितम्’ महाकाव्य में दस सर्ग हैं | इसमें नेताजी सुभाषचन्द्र बोस द्वारा राष्ट्र के लिये किये गए कार्यों का वर्णन है | राष्ट्र की स्वतन्त्रता के लिए उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन लगा दिया | कतिपय पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं -

(क )बाल्यकालादेव य: सेवाव्रती

येन बालानां सुसंघटनं कृतम् |

अस्तु वन्दे मातरं, जय भारतं

घोष एवं विश्रुतस्तदनन्तरम् ||6

(ख )अग्रणी आसीद् यएतेषां तदा स:सुभाषस्तत्रतद्हस्ते ध्वज:

‘इंकलाबस्तथा जिन्दाबाद’ इति उत्थित्तो घोषो महाँस्तत्कण्ठज:7

(ग ) कामना देश स्वातन्त्रस्य वर्तते मनसि ते निरंतरम्

भारतमुक्तिर्भूयात्कथं चिन्तनं च यत्ते अहर्निशम् || 8

वह आजाद हिन्द फौज नामक सेना के जनक तथा स्वतन्त्रता संग्राम के अगुआ के रुप में कार्य करने वाले सिपाही थे |

सर्वे भवन्तु, सुखिन: सर्वेपि सन्तु मुक्ता

भारतवेक्ष्य सर्वे स्वाधीनमेव तावत् |

आजादहिन्द जिन्दाबाद: स एवमुक्त्वा

कृतवानसौ समाप्तं निजभाषणं तु सहजम् ||9

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के लिए राष्ट्र सर्वोपरि था | उन्होंने अपने नेताजी की उपाधि को चरितार्थ कर दिया | स्वतन्त्रता संग्राम की अग्नि में स्वयं को समर्पित करने वाले वह अग्रगण्य व्यक्ति थे |

भारतीया नु अद्याप्याशान्विता

आगमिष्यति सुभाष: कदाचित्स्वयम् |

किन्तु नैवागतोऽसौ गतो वा गत-

स्तस्य दर्शनमितो दुर्लभं भावितम् |

केवलं तत्सस्मृति: ध्यानमध्ये स्थिता

भारतस्यापि हृदये सदा विद्यते |

नैव भूतो न भविता कुतः कश्चिदपि |

तस्य सदृशोऽपि नेता न संदृश्यते ||10

माधवीशास्त्री

संस्कृत कवयित्री माधवी शास्त्री अपनी ‘नववर्ष-शुभकामना’ कविता के माध्यम से यह इच्छा करती है कि-केवल मुझे या मेरे भारत को ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व को सुख –शान्ति प्राप्त हो |

जनास्तु सर्वे हि सुखेन युक्ताः |

भवन्तु सर्वे हि च दुःखमुक्ता: |

शुद्धं च भूयाज्जनता-मनस्तु |

देशे-विदेशे सुखशान्तिरस्तु ||11

डॉ.नवलता वर्मा

समकालीन संस्कृत-साहित्य को समृद्ध करने वाली संस्कृत कवयित्रियों में डॉ.नवलता का भी उल्लेखनीय स्थान है | आपका जन्म 10 जून 1955 ई. को लखनऊ में हुआ | आपके पिता का नाम श्री शिवशंकर श्रीवास्तव तथा माता का नाम श्रीमती अंजना श्रीवास्तवा है | सम्प्रति आप कानपुर विश्वविद्यालय के विक्रमाजीत सिंह सनातनधर्म महाविद्यालय, कानपुर में संस्कृत विभागाध्यक्ष हैं | वे लिखती हैं –

हे कवि ! गायसि युगेभ्य: स्वीयमेव व्यथाप्रगीतम् |

कांक्षसे रचनां नवीनां, यदि, सखे, भव कर्मयोगी ||12

अर्थात् हे कवि तुम युग के लिए अपना व्यथागीत गाओ और एक नवीन रचना करो | तुम कर्मयोगी बनो |

प्रो.सुश्री संतोष वर्मा

इन्होंने अपनी कविता ‘कथय कथम्’ में लिखा है-

राष्ट्रभक्तिर्विना राष्ट्रसन्धि विना, राष्ट्रशक्तिर्भवेत् कथय कथम् |

ज्ञानस्फुरणं विना प्रेमप्रवणं विना स्नेहवर्णं भवेत् कथय कथम् ||13

डॉ. श्रीमती लीना रस्तोगी

आपका जन्म गुजरात राज्य में स्थित पाटन नामक नगर में 29 जुलाई 1939 ई.को हुआ | इनके पिता का नाम श्री मन्जुनाथ खोटे है |रचनायें – सन्त गुलाबराव महाराज (1983) , स्पन्दन (मराठी काव्य संग्रह 1987)

विजयते भारतभू: पावनी इयं ननु सकलमनमोहनी |

मुकटोऽयं हिमवानुत्तुंग: जलधिरधस्ताच्चलत्तरंग: ||

वीच्यर्चित-चरणा विराजते चरचरामोदनी ||

इयं ननु सकलमनमोहनी ||14

डॉ. मनोरमा तिवारी

अर्वाचीन संस्कृत-साहित्य को समृद्ध बनाने में डॉ. मिथलेश कुमारी मिश्रा का महत्त्वपूर्ण योगदान है | आपका जन्म 1 दिसम्बर 1953 ई. को हरदोई जनपद (उ.प्र.) के गढिया खद्दीपुर नामक गाँव में हुआ था | आपके पिता का नाम पं.रामगोपाल मिश्र तथा माता का नाम श्रीमती भगवती देवी था | उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की निवासी डॉ. मनोरमा तिवारी अर्वाचीन संस्कृत गीतकार कवयित्रियों में महत्त्वपूर्ण स्थान रखती हैं | वे लिखती हैं-

जयतु जयतु जन्मभूमि: | जयतु देशो भारतम् ||

जयतु जगति प्रथितमहिमा , भूरि –भूरि प्रशंसिता ||15

डॉ.मृदुला शर्मा

समकालीन कवयित्रियों में डॉ. मृदुला शर्मा का नाम बड़े की सम्मान के साथ लिया जाता है | अपनी कविता मेंदेश के वीरों को सम्बोधित करती हुई वह कहती हैं-

उत्तिष्ठ देशवीर ! विक्रमं कुरुष्व रे

राष्ट्र स्वतंत्रतैकता –रक्षा विधत्स्व रे ||

गर्जासु भीषणं यथा पंचाननो वने

रुद्रो यथा भयंकर: प्रलयस्य ताण्डवे

काश्मीरघाटिकासु वै किंजलकराशिसु

चान्दनवनस्य पुण्यधरा नाम धामसु

ये नागफणी वल्लरी बीजं वपन्ति वै

तेषां प्रणाशने व्रतं भीम कुरुष्व रे ||16

डॉ. उमा एम.देशमुख

आधुनिक संस्कृत साहित्य की कवयित्री डॉ. उमा एम. देशमुख अपनी ‘हे प्रिय भारत ! हे प्रिय भारत ! कविता में लिखती है –

वयं च राष्ट्र सेवका :

समस्तदेव पूजका

विविध धर्म रक्षका:

परस्परस्य भावका:

अमृता: सकला: वयम् ||17

सौ.अनुराधा तारगाँवकर

कवयित्री सौ.अनुराधा तारगाँवकर का नाम आधुनिक संस्कृत साहित्य में किसी परिचय का मोहताज नहीं है | राष्ट्र को समर्पित अपनी कविता में वे लिखती हैं -

हे प्रिय भारत, हे प्रिय भारत |

उतंगस्त्वं इह जगति |

हिन्दसागर: तव चरणे | द्वौ रत्नाकरौ तट सुबाहु

हिमाद्रिस्तव मस्तके | गंगायमुने कण्ठभूषणे||

नानाभाषा नानाधर्मा: महासंस्कृते: त्वं निधानम् ||

दयाक्षमायो: अमृतसिन्धु: | मानवता हि तव मनसि ||18

डॉ. सावित्री देवी शर्मा –

इसका जन्म 15 अप्रैल सन 1930 ई. में हुआ था | इनके पिता का नाम पं. रामस्वरूप पाराशरी है |

प्रकाशित रचनायें – संस्कृतकाव्याजलि (काव्य संग्रह ) , संस्कृत गीताञ्जलि | इन्होंने ‘संस्कृत –गीताञ्जलि:’ में लिखा है –

राष्ट्रहितं सर्वोपरि नित्यं मन्तव्यं सौहार्दपरै: |

स्वार्थभावं परित्यज्य ध्यातव्यं लोकहितं पुण्यं ||19

डॉ.शशि तिवारी –

दिल्ली विश्वविद्यालय के मैत्रेयी महाविद्यालय की उपाचार्या डॉ.तिवारी लिखती हैं -

पश्य मम भारतम् , पश्य मम भारतम्

अत्र वेदामृतम् अत्रसंस्कृतामृतम्

अत्र विद्यामृतम् अत्र गंगामृतम्

पश्य मम भारतम् ||

शोभते भूतले राजते सर्वदा

देवतैर्वन्दितं ज्ञानयोगावृतम्

पश्य मम भारतम् ||

यत्र बाईबिल –गीता –कुरानादिभि:

यस्य गुणगायनं भूरि मधुरं कृतम्

पश्य मम भारतम् ||20

उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर विचारणीय है कि- देश और समाज के अभ्युदय के लिए हम सबको मिलजुल कर रहना चाहिए तथा आपसी फूट से बचना चाहिए | आपसी फूट का ही दुष्परिणाम था की विदेशियों ने समय-समय पर हमें गुलाम बनाया | उपरोक्त नीतियों व गुणों को अपना कर आज भी राष्ट्र में राष्ट्रीय एकता को अक्षुण्ण बनाया जा सकता है |

सन्दर्भ –सूची

1.ऋग्वेद 1/80/1

2. राष्ट्राभिवर्धनम् सूक्त 1/29/2

3.अभिराज यशोभूषणम् पृ 30-31)

4.सत्याग्रहगीता ,पृ. 1,आधुनिक संस्कृत कवयित्रियाँ,डॉ.अर्चना कुमारी दुबे,नवजीवन पब्लिकेशन निवाई ,(राज.)|2006 ई.,पृ.171

5. वही ,पृ. 36; वही पृ.171

6 .चन्द्रचरितम् ,पृ.14 ; वही ,पृ.150

7 . वही ,पृ.18 ; वही पृ.264

8 . वही ,पृ.61; वही ,पृ.216

9 .वही ,पृ.186 -187 ; वही पृ.150

10 .वही ,पृ.203 ; वही पृ.151

11 .नववर्ष-शुभकामना –संस्कृतामृतम् ,जनवरी 1991 ई. पृ.3 ; वही पृ.154

12 .आह्वाहनम् –पारिजातम् –अगस्त 1995ई. पृ.21 ; वही पृ.154

13 .कथय कथम् –विश्वसंस्कृतम् ,मार्च 1999ई.| पृ.50 ; वही पृ.156

14 .विजयते भारतभू: पावनी –संस्कृतमंजरी 1999 ई. पृ.1; वही पृ.156

सम्पर्क-

शोधार्थी , संस्कृत एवं प्राकृत भाषा विभाग

लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ |

कमरा न.77 बीरबल साहनी शोध छात्रावास

लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ-226007

मो.9454067032

16 .उद्बोधगीतिका –संस्कृतमञ्जरी –सितम्बर 1999ई. पृ.17 ; वही पृ.157

17 .अमृता: सकला वयम् –संस्कृतामृतम् 1992ई. पृ.13 ; वही पृ.159

18 .हे प्रिय भारत ! हे प्रिय भारत –गीर्वाणसुधा,1994ई. पृ.11 ; वही पृ.159

19.राष्ट्रहितं , संस्कृत-गीताञ्जलि: , पृ.23 ; वही पृ.184

20.संस्कृत मञ्जरी ,वर्ष-7 , जनवरी-मार्च 1998 ,पृ.27

0 views

©2019 by Jankriti. Proudly created with Wix.com