‘‘आलोचना का अर्थ और आलोचकीय दायित्व”राम चन्द्र पाण्डेय


शोधछात्र का.हि.वि.वि., बनारस

किसी भी रचनाकार द्वारा सृजित कृति के वास्तविक प्रतिपाद्य का, उसके सबल न्यून पक्षों का, रचना को दीप्त करने वाले सौन्दर्य विधायक तत्त्वों का, उसकी सामाजिक सांस्कृतिक उपादेयता का युक्तियुक्त अथवा सर्वांगपूर्ण विश्लेषण ही आलोचना है।

रचनाकार सामाजिक सांस्कृतिक यहाँ तक कि कभी-कभी नितान्त वैयक्तिक जीवन संघर्षों, जीवनजन्य विविध अनुभवों को रचना के रूप में रूपायित करता है, जन सामान्य की अनुभूतियों को साधारणीकृत कर उन्हें शब्दमय रूप प्रदान कर रचना के रूप में प्रतिष्ठित करता है जबकि आलोचक रचना की आत्मा में प्रविष्ट होकर उसके मूल कथ्य को उसके वास्तविक प्रतिपाद्य को उद्घाटित कर सम्प्रेषणीयता प्रदान करता चलता है। रामस्वरूप चतुर्वेदी के शब्दों में- ‘‘ जीवन में अर्थ का सन्धान रचनाकार करता है और रचना में अर्थ का सन्धान आलोचक।‘‘ वस्तुतः रचनाकार विविध जीवन अनुभवों को साधारणीकृत कर अपनी सम्पूर्ण भावात्मक सत्ता और बौद्धिकता का संश्लेष कर रचना के रूप में रूपायित करता है तो वहीं आलोचक अपनी सम्पूर्ण मानसिक सत्ता और भावात्मक हृदय के साथ रचना के अर्थपूर्ण तत्त्वों को सम्प्रेषणीय बनाने का कार्य करता है। आलोचना की यह सजग प्रक्रिया साहित्य को दीर्घजीवी तो बनाती ही है साथ ही साथ परवर्ती रचनाकारों के लिए प्रेरणा एवं पथप्रदर्शन का कार्य भी करती चलती है। यह अपने व्यापक अर्थ में रचना के मूल्यांकन के सन्दर्भ में समूची साहित्य परम्परा में उसकी अन्तर्वस्तु के वैशिष्ट्य को भी रेखांकित करती चलती है, उसके भविष्योन्मुखी तत्त्वों को गतिशील बनाकर विश्लेषित, आलोकित तथा निर्देशित भी करती चलती है।

आलोचना के ये प्रतिमान साहित्य की समृद्ध परम्परा और परिवेश से ही निर्मित होते हैं- ‘आलोचना के प्रतिमान रचना की परम्परा और परिवेश से प्राप्त होते हैं केवल रचना से नहीं।‘1

आलोचना मनुष्यता अथवा ‘मानुष धर्म‘ की व्यापक भूमि पर पल्लवित होती है उसी से उर्जा प्राप्त करती है। व्यापक सामाजिक जीवनजन्य अनुभवों, गहन अध्ययनबोध, साहित्य की परम्परा का व्यापक अनुशीलन आलोचना को विश्वसनीय प्रामाणिक एवं मजबूत धरातल पर प्रतिष्ठित करता है। उसे एक सुव्यवस्थित आधार प्रदान करता है।

‘‘आलोचना शब्द अपने विशिष्ट अर्थ में केवल व्यक्तिगत लेखक या पुस्तक की आलोचना नहीं है, केवल निर्णयात्मक आलोचना तथा साहित्यिक अभिरुचि का परिचायक नहीं है, अपितु साहित्यिक सिद्धान्तों के प्रति अब तक जो भी सोचा या विचारा गया है- इसकी प्रकृति, इसका सृजन पक्ष, इसके प्रभाव, इसके कार्य, मानव की अन्य प्रक्रियाओं से इसका सम्बन्ध, इसके प्रकार, साधन, तकनीक, उद्भव एवं इतिहास उसका भी परिचायक है।‘‘2

उपर्युक्त विवेचना में आलोचना को बड़ी व्यापकता के साथ परिभाषित किया गया है। वस्तुतः आलोचना सच्चे अर्थों में रचना के सर्वांगीण पक्षों की युक्तियुक्त विवेचना ही है। आलोचना का यह कार्य कभी भी आसान नहीं हुआ करता, क्योंकि वह स्वयं में व्यापक साहित्यानुशीलन और इतिहासबोधपरक सजगता की अपेक्षा रखती है। इतिहास बोध और व्यापक साहित्यानुशीलन इसलिए और भी अनिवार्य है क्योंकि बिना इनके रचना के मूल उत्स तक पहँुचा ही नहीं जा सकता। जैसा कि मैथ्यू अर्नाल्ड ने कहा है- ‘‘ आलोचना का प्रमुख उद्देश्य संसृति द्वारा ज्ञात एवं विचारित सर्वोत्कृष्ट बातों का ज्ञान करना तथा उनसे दूसरों को इसलिए अवगत कराना है कि सत्य एवं यथार्थ विचारों का स्रोत स्फुरित हो सके।‘‘

वास्तविक तथ्यों का यथार्थ परक विश्लेषण ही आलोचना की सृजनात्मकता को निर्मित करता है। यही सृजनात्मकता किसी कृति के साथ-साथ आलोचना को सार्थकता एवं प्रतिमान के निर्धारण का भी कार्य सम्पादित करती है। डा. नामवर सिंह जी ने सत्य ही कहा है- ‘‘उद्घाटन कार्य ही साहित्य का रचना-कार्य है- वास्तविकता का निर्माण वह उद्घाटन से ही करता है।‘‘3 वस्तुतः वास्तविकता के उद्घाटन का कार्य जितना साहित्यकार का है उससे कहीं अधिक आलोचक का भी। क्योंकि रचनाकार तो सांस्कृतिक अनुभवात्मक स्वरों को उद्घाटित करता है जबकि आलोचक रचनाकार के द्वारा उद्घाटित वास्तविकता का व्यापक परीक्षण करता है, उसके वास्तविक प्रतिपाद्य को, उसकी उपादेयता को निर्धारित करता है। रचना के अर्थपूर्ण तत्त्वों को सम्प्रेषणीय बनाना आलोचना का धर्म है।

रचना जहाँ युग-परिवेश के स्वरों को अभिव्यक्ति प्रदान करती है, वहीं आलोचना रचना को उसके युग परिवेश से सम्बद्ध कर उसके सम्प्रेषणीयार्थ को जनसमूह के मानस तक प्रसारित करती है, रचना के माध्यम से परम्परा का (समूची साहित्यिक परम्परा का) पुनर्मूल्यांकन तथा परिष्करण भी किया करती है। डा0 नामवर जी के शब्दों में-‘‘ आलोचना समय-समय पर सुधरती-बदलती है।’’4

आलोचना की इस प्रक्रिया में आलोचना की स्थापनाएँ ही महत्त्वपूर्ण नहीं हुआ करती है बल्कि उसकी चिन्तन-पद्धति का भी विशेष महत्त्व होता है। आलोचक तर्क की कसौटी पर रचना का मूल्यांकन करता है परीक्षण और परिरक्षण भी। मूल्यांकन और पुनर्मूल्यांकन की यह प्रक्रिया साहित्य की सृजनात्मकता को द्रुततर ही किया करती है। आलोचना की इस चिंतन-पद्धति की सृजनात्मकता पर विचार करते हुए डा. नामवर सिंह जी लिखते हैं-‘‘किसी आलोचना के निष्कर्ष महत्त्वपूर्ण नहीं हुआ करते, निष्कर्ष के पीछे जो चिन्तन-प्रणाली है, वह महत्त्वपूर्ण हुआ करती है। इसके साथ ही एक और चीज होती है तर्क और युक्ति। तर्क, युक्ति और मूल्य प्रणाली के साथ ही किसी आलोचक की पहचान उसकी संवेदनशीलता से जानी जाती है, आंकी जाती है।‘‘5

आज प्रायः प्रत्येक साहित्यकार साहित्य की सृजन प्रक्रिया में आलोचना की भूमिका को, उसकी रचनात्मकता को, उसकी भविष्योन्मुखी चिन्तन सरणि को, उसकी तर्ककेन्द्रित वैचारिकता अथवा मूल्यांकन प्रविधि को, उसकी महत्ता को असंदिग्ध होकर स्वीकारते हैं। मैनेजर पाण्डेय जी के शब्दों में-‘‘लेखक के रचनात्मक अभिप्राय और उसकी आस्था के सर्जनात्मक प्रतिफलन का विश्लेषण हो और पाठक की चेतना के निर्माण में रचना के योगदान का मूल्यांकन भी। जाहिर है इससे आलोचना धर्म कुछ कठिन हो जायेगा, किन्तु आलोचना में कठिनाई से बचाव कहाँ है।‘‘6

वस्तुतः कलाकृति के वास्तविक सत्य का अनुशीलन तथा उसके सौन्दर्य विधायक तत्त्वों का यथार्थ उद्घाटन करना ही आलोचना है। आलोचना का वास्तविक कर्तव्य रचना के समूचे अर्थ तन्तुओं को उद्घाटित कर उन्हें भाष्यमान बनाना ही है। राजेन्द्र कुमार जी के शब्दों में- ‘‘दृष्टि को संदृष्टि बनाना ही आलोचना है।‘‘

संदर्भ ग्रन्थ सूची-

1. मैनेजर पाण्डेय,साहित्य और इतिहास दृष्टि, पृ0 सं0 174

2. शिवकरण सिंह, आलोचना के बदलते मानदण्ड और साहित्य, पृ0 सं0 44

3. नामवर सिंह, आलोचक के मुख से, पृ0 सं0 98

4. नामवर सिंह, आलोचक के मुख से, पृ0 सं0 98

5. नामवर सिंह, आलोचक के मुख से, पृ0 सं0 96

6. मैनेजर पाण्डेय,साहित्य और इतिहास दृष्टि, पृ0 सं0 72

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