‘ओस की बूँद’ में राजनीतिक द्वंद्व यासीन अहमद


‘ओस की बूँद’ राही मासूम रज़ा का तीसरा उपन्यास है । यह आज़ादी के तुरंत पाश्चात का उपन्यास है। उस समय पुरानी मान्यताएँ, परम्पराएँ, विश्वास आदि टूट रहे थे । भारत में एक नवनिर्माण की पृक्रिया चल रही थी । अधिकतर व्यक्ति अपने भविष्य को लेकर आषंकाओं से घिरे हुए थे तथा अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिए प्रयासरत थे । पाकिस्तान के निर्माण के कारण उन मुसलमानों पर जिन्होंने भारत में ही रहने का मन बना चुके थे भारत के बटवारे और पाकिस्तान के निर्माण का सम्पूर्ण उत्तरदायित्व उन पर डालकर उन्हें भी पाकिस्तान भेजे जाने की अफवाहों का बाज़ार गर्म था ।

स्वातंत्र्ता के पश्चात कांग्रेस पार्टी राष्ट्रीयता और देशप्रेमी तथा देशभक्त होने के प्रमाण का पर्याय बन चुकी थी । इसलिए विभिन्न राजनीतिक व गैर राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता एवं पदाधिकारी कांग्रेस पार्टी की सदस्यता ग्रहण करके स्वयं को देशभक्त एवं राष्ट्रवादी सिद्ध करने में तन्मयता से प्रयासरत थे । विरोधी विचारधारा अथवा पार्टी के लोग जब परिस्थितिवष अपनी विचारधारा एवं पार्टी को छोड़कर दूसरी पार्टी के सक्रिय सदस्य बनते हैं तब वह राजनीतिक द्वंद्व के शिकार होकर किस प्रकार अपनी राजनीति को चमकाते हैं । राही मासूम रज़ा ने ‘ओस की बूँद’ मे इसी कथ्य को लेकर अपनी लेखनी चलायी है ।

‘ओस की बूँद’ उपन्यास मुख्यतः राजनीतिक उथल-पुथल से प्रेरित ‘घटना प्रधान’ उपन्यास है । इसके एक पात्र श्री हयातुल्लाह अंसारी पाकिस्तान के समर्थन में वक्तव्य जारी किया करते थे । यह गाज़ीपुर जिले के ‘मुस्लिम लीग’ के नायब सदर थे जबकि वास्तविकता यह थी कि इनके सारे बयान जिला कमैटी मुस्लिम लीग के सेकेट्री श्री वज़ीर हसन तैयार करते थे । श्री अंसारी तो केवल उन बयानों पर दस्तख़त करके और उन बयानों साथ में अपनी तश्वीर पत्र-पत्रिकाओं में छपवाकर प्रसन्न हो लिया करते थे, “वह गरदन झिटकतें-वज़ीर के सिवा और कौन जानता है? वज़ीर हसन की या उसके बाप की....।”1 इसी के साथ एक बार एक संवाददाता से बातचीत करते हुए श्री हयातुल्लाह अंसारी कहते है कि “गाँधी एक बगला भगत है। ऊपर से कुरान पढ़ता है मगर कट्टर मुसलमान-दुश्मन है और जवाहर लाल एक बहरूपिया है और जो हमें सियासत का नाटक दिखला रहा है़...........”2

पाकिस्तान बननें के पश्चात उन्हें अपने दिये हुए बयान जोकि वास्तव में वज़ीर हसन के होते थे । याद आनें लगे जिसके कारण उनकी रातों की नींद गायब हो गयी, “उनकी स्क्रैप-बुक उन्हें डरावनें सपने दिखाने लगी । ..अब मै किसी को कैसे समझाऊँगा कि यह बयान वास्तव मे वज़ीर हसन के हैं... क्या यह तश्वीर भी वज़ीर हसन की है!... ।”3 एक अन्जाना डर लगातार हयातुल्लाह अंसारी को सता रहा था इसलिए डर से बचने के लिए उन्होंने अपनी पहचान जिन्नाह टोपी जोकि उन्हें अत्यन्त प्रिय थी अपने नौकर को दे दी तथा अपने आपको भारतीय तथा राष्ट्रभक्त सिद्ध करनें के लिए, “श्री गाँधी आश्रम से एक गाँधी टोपी खरीद लाए और दो-चार दिन बाद बनारस के एक समाचार पत्र में उनका एक बयान छपा कि भारत के मुसलमानों को कांग्रेस में चले जाना चाहिए । पाकिस्तान एक गलती है... ।”4

यह राजनीतिक उथल-पुथल का दौर था इसी में श्री हयातुल्लाह अंसारी के भाग्य का सितारा चमक उठा और जिस डर से वह अपनी रातों की नींद खो चुके थे वह भी खत्म हो गया क्योंकि उनके घर का पुराना बोर्ड उतर कर एक नया बोर्ड लगा दिया गया था । जिस पर, “ ‘मोलवी’की जगह ‘श्री’ लिखा गया । ‘नायब सदर जि़ला मुस्लिम लीग की जगह ‘नायब सदर जि़ला कांग्रेस कमैटी लिखा गया । ‘अलीग’ मिटाया तो नही गया, परन्तु अक्षर बहुत छोटे कर दिये गए ।”5 श्री वज़ीर हसन खाँ जो कि दीनदयाल के बचपन के मित्र थे और पाकिस्तान के समर्थन में श्री हयातुल्लाह अंसारी के बयान लिखा करते थे। पाकिस्तान बनने पर जब उनका इकलौता पुत्र अली बाक़र खाँ पाकिस्तान जा रहा था। तब भी उन्होंने पाकिस्तान न जाकर भारत में ही रहने का फैसला किया, “मैं एक गुनहगार आदमी हूँ और उसी सरज़मीन पर मरना चाहता हूँ जिस पर मैनें गुनाह किए है ।”6 मुस्लिम समाज में भाषा को लेकर भी षंसय की स्थिति बनी हुई थी क्योंकि मुस्लिम समाज उर्दू-फारसी भाषा को इस्लाम से जोड़कर देखता है । इसलिए उर्दू भाषा के स्थान पर हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाना भी उस समय के भारतीय मुसलमानों ने अपने खि़लाफ़ साजिश माना इसीलिए जब वज़ीर हसन की पोती ‘शहला’ मीराबाई की कविता गुनगुना रही थी तो वह चिन्तित होते हुए सोचने पर मजबूर हो गये कि “...क्या हिन्दुस्तान में रहने की यह कीमत देनी होगी? और उस एक पल में उन्होंने यह फै़सला किया कि उन्हे दीनदयाल से नफरत है यह जो पाकिस्तान बना है, यह हिन्दुओं की एक बड़ी शाजिश थी ।”7 दीनदयाल के भाई और पदमा के पिता रामावतार द्वारा कँवर वज़ीर हसन की पुरानी हवेली के खण्डहरनुमा अवशेष के बीच खड़े मंदिर में शंख बजाने पर जब मुसलमानों ने वज़ीर हसन को भड़काना चाहा और उन्हें डरपोक कह कर हिन्दुओं से झगड़ा करने के लिए उत्तेजित करना चाहा तो उन्होंने कहा कि “अरे जब हम ई मंदिर के वास्ते अल्लाह मियाँ से ना डरें तो दीनदयाल या आपकी क्या हैसियत है! ऊ मंदिर हमारे घर में है और हम कह रहें है कि पूजा होगी ।”8

राजनीतिक कारणों से ठाकुर वज़ीर हसन को पुलिस ने गिरफ़तार कर लिया तथा उसी रात मे उनके बचपन के मित्र तथा वर्तमान वैचारिक विरोधी दीनदयाल ने जमानत देकर छुड़ा लिया घर आने पर उनके अंदर सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक विचारों मे द्वंद्व प्रारम्भ हो गया सही औेर ग़लत पर विचार करते हुए कमरें में उस जगह को देखने लगे जहाँ कभी ‘कायदे-आजम’ मुहम्मद अली जिन्नाह की तश्वीर टंगी हुई थी उसके ना होने से दीवार पर एक गहरा निशान बन गया था वास्तव मे यह निशान दीवार पर नही, वज़ीर हसन के हृदय पर लगा हुआ था ‘कायदे-आजम’मुहम्मद अली जिन्नाह की तश्वीर अपने कमरे से तो निकाल दी थी परंतु हृदय से लीगी विचारधारा नही निकल रही थी। हृदय में इसी तुफान के चलते ठाकुर वज़ीर हसन फै़सला किया कि “मुस्लिम लीग गयी अपनी...में । हम अली बाक़र ना है । हम वज़ीर हसन है । वक्फ-अल्लाह के मोतवल्ली ।”9 इसी के साथ वह चुप-चाप घर से निकलकर मंदिर की तरफ चल देते है जहाँ पर अब पी0 ए0 सी0 का पहरा था । क्योंकि उन्हे उस शंख को कुएँ में से निकालना था जिसे रामावतार ने कुएँ में इसलिए फैक दिया था कि राजनीतिक लोग झगड़ा कराकर अपना उल्लू सीधा करना चाहते थे । बूढ़े वज़ीर हसन खाँ ने रात के अंधेरे में उस शंख को कुएँ से निकालकर सुबह की नमाज़ उसी मंदिर में पढ़ी इसके पश्चात उन्होंने शंख बजाया। दूसरे दिन समाचार-पत्रों में यह ख़बर प्रमुखता से छपी कि एक मुसलमान मंदिर में मुर्ति को खंडित करने के प्रयास कर रहा था उसी समय शंख कुएँ से स्वयं निकलकर बजने लगा और मंदिर की सुरक्षा में लगे पी0 ए0 सी0 के जवानों द्वारा मार गिराया गया ।

ठाकुर वज़ीर हसन खाँ राजनीतिक द्वंद्व की भेंट चढ़ा दिये जाते है और लौग उस शंख के दर्शन करने के लिए आने लगे जिसके बारे मे यह जोर-शोर से प्रचारित किया गया था कि वह स्वयं प्रकट होकर बजने लगा था । राजनीतिक द्वंद्व के चलते समाचार-पत्रों ने यह ख़बर प्रकाशित करने का दायित्व वहन नही किया कि वज़ीर हसन की मौत पर उन के वैचारिक विरोधी दीनदयाल ने कहा था कि “हम ई नही मान सकते वज़ीर हसन के बारे में ।”10

संदर्भ-

1. राही मासूम रज़ा, ओस की बूँद, तीसरा संस्करण 1988, राजकमल प्रकाशन प्रा0 लि0, नयी दिल्ली, पृ. 14

2. वही, पृ. 14

3. वही, पृ. 14

4. वही, पृ. 15

5. वही, पृ. 15

6. वही, पृ. 19

7. वही, पृ. 29

8. वही, पृ. 48

9. वही, पृ. 50

10. वही, पृ. 51

अतिथि प्रवक्ता, हिन्दी विभाग, ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती उर्दू, अरबी-फारसी विश्वविद्यालय, लखनऊ

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