कला: चित्रकला


“कलानां प्रवरं चित्रं धर्मकामार्थमोक्षदं”[1]

अभिव्यक्ति मानव की नैसर्गिक वृत्तियों का एक अंग है. मानव अपने मन के भावों को किसी न किसी रूप में अभिव्यक्त करने की इच्छा अवश्य रखता है. अभिव्यक्ति के इन्हीं रूपों अथवा माध्यमों को हम ‘कला’ का नाम देते हैं. इस प्रकार हम कह सकते हैं कि ‘कला सृजन’ मानव की स्वाभाविक प्रवृत्तियों में से एक है. मानव जीवन का कला से अत्यंत घनिष्ठ संबंध है और कला का मानव जीवन में अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान है. विचार करें तो कला प्रकृति के कण कण में व्याप्त है. वह सर्वत्र अपने आप को कला रूप में व्यक्त करती है. काल्पनिक जगत हो अथवा दृश्य जगत, वृक्ष, वन, नदियां, फूल, फल, घाटियां, झरने, तारे, आकाशगंगा, उषा, संध्या, सब अपने सौंदर्य से हमारा मन अपनी ओर आकृष्ट कर लेते हैं. प्रकृति का ऐसा संस्पर्श ही मनुष्य के हृदय में मानवता को जन्म देता है. शायद इसीलिए इस सृष्टि को देवशिल्प कहा गया है. संपूर्ण जगत को देवताओं द्वारा उकेरा गया चित्र (जगचित्र) माना गया है:-

“पश्य देवस्य काव्यं न ममारं न जीर्यति . . . अथर्व जगचित्र नमस्तस्मै कलाश्लाघाय, शूलिनो.”[2]

कला के साथ मनुष्य का संबंध इसके प्रारम्भ से ही रहा है. इनका विकास एक दूसरे के समानान्तर ही हुआ है. मनुष्य ने अपने विकास के साथ साथ कला को भी परिष्कृत और परिमार्जित किया है तो कला का स्वरूप भी मानवता के लिए सदैव कल्याणकारी रहा है. वाचस्पति गैरोला लिखते हैं कि, “कला कल्याण की जननी है. इस धरती पर मनुष्य की उदय-वेला का इतिहास कला के द्वारा ही रूपायित हुआ है. कला इस विराट विश्व की सर्जना शक्ति होने के कारण सृष्टि के समस्त पदार्थों में व्याप्त है. वह अनंत रूपा है और उसके इन अनंत रूपों की अभिव्यक्ति एवं निष्पत्ति का आधार कलाकार (परमेश्वर) है.”[3]

कलाओं के विकास की दृष्टि से देखें तो उसको पूर्वकाल की अपेक्षा वर्तमान काल में अधिक लोकप्रियता प्राप्त हुई है. कला एवं शिल्प संबन्धित प्राचीन ग्रंथों में इसे ‘हस्तकौशल’, ‘चमत्कार प्रदर्शन’, एवं ‘वैचित्र्य’ मात्र माना गया है. साथ ही इस धारा को साहित्य की धारा से भी विलग करके देखा गया है. उसको वस्तु का रूप संवारने वाली विशेषता कहा गया है,- “कलयति स्वरूपं आवेशयति वस्तूनि वा”[4] परंतु परवर्ती युगों में इसकी सीमा को विस्तार मिला है. वह अपनी धारा से विस्तृत होकर साहित्य, संगीत में भी स्थापित हुई है.

कला के विभिन्न रूप हैं. ‘चित्रकला’ भी उनमें से एक विशिष्ट एवं अत्यंत प्राचीन रूप है. इतिहासकारों कि मान्यता है कि आदिम काल मे जब भाषा और लिपिचिह्नों का आविर्भाव नहीं हुआ था तो मानव रेखाओं के संकेतों से ही स्वयं को अभिव्यक्त करता था. गुफाओं के अंदर आज जो शिलाचित्र मिलते हैं, वे चित्रकला आदि के ही प्रमाण हैं. तब का मानव जीवन प्रकृति के सन्निकट था. जीवन के विकास की प्रारम्भिक अवस्था थी इसलिए तत्कालीन चित्रांकन भी पेड़, पशु, पक्षियों, सूरज तक ही सीमित थे. प्राचीन कलाओं का प्रकृति से सामीप्य न केवल भारत अपितु विश्व की समस्त जातियों की संस्कृति में मिलता है. प्रकृति को एक अदृश्य शक्ति के रूप में भी स्वीकार किया गया. इस अदृश्य शक्ति के चित्रांकन के प्रयास के फलस्वरूप ही प्राचीन ब्रह्मा – विष्णु, महेश आदि देवताओं का आविर्भाव भी माना जा सकता है.

चित्रकलाओं के प्रागैतिहासिक शुरुआत की जानकारी के लिए हम नेवासा की ताजा खुदाई का उदाहरण ले सकते हैं जिसमे दो मृदभांड के टुकड़े मिले हैं. इन पर दो सींगों वाले हिरण तथा एक कुत्ते का चित्रण है. इन्हें भारत में रचनात्मक चित्रकला के प्राचीनतम नमूनों के रूप में देखा जाता है. सिंधुघाटी से भी ज्यामितीय एवं वनस्पति चित्रण वाले मृदभांड मिले हैं जो मात्रा में पर्याप्त होने पर भी अभी चित्रकला के विकास के बारे मे बताने मे अक्षम हैं. कला की उत्कर्षता का प्रमाण हमें मिलना शुरू होता है ऐतिहासिक काल अथवा बौद्धयुग में. इस काल का सबसे महान सम्राट अशोक हुआ. यहीं से भारतीय राजकुलों द्वारा पल्लवित एवं संरक्षित कला के अभ्युदय को प्रस्तुत किया जाना समीचीन है.

गुप्त एवं उत्तर गुप्तकालीन चित्रकलाओं के अवशेष बाघ (गुफा संख्या ४, ५०० ई०) अजंता, ( गुफा सं० १,२,१६,१७,१९,छठी शताब्दी) अजंता तथा (गुफा सं० ३, छठी शताब्दी) बादामी में मिलते हैं. इसके अतिरिक्त कन्हेरी, औरंगाबाद, पीतलखोरा तथा श्रीलंका में सीगरी की शिलाकृत गुफा से भी पाँचवी एवं छठी शताब्दी के चित्रों के अवशेष मिलते हैं.

अशोक के बाद दक्षिण के शुंग, सातवाहन राजाओं ने भी साहित्य और कला की उन्नति के लिए अनेक महत्त्वपूर्ण कार्य किए. इनमें भी बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार के लिए कला का माध्यम प्रचलित रहा . कुषाण राजा कनिष्क के समय महायान संप्रदाय की प्रतिष्ठा हो जाने के बाद ‘गांधार शैली’ विशुद्ध रूप में अभिव्यक्त होने लगी. इस काल कि कला के नमूने तत्कालीन सोने के सिक्कों, मूर्तियों एवं मंदिरों में देखने को मिलते हैं.

मुग़ल काल की चित्रकला अपनी उत्कृष्टता के लिए विश्वविख्यात है. अकबर के दरबार में अनेक भारतीय तथा फारसी चित्रकार मौजूद थे. इस काल के कला कि एक उल्लेखनीय विशेषता थी एक ही चित्र में विभिन्न कलाकारों द्वारा मिलकर तैयार किया जाना. जहांगीर के काल में चित्रकला अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच गई थी. मुग़ल दरबार मे अनेक नए चित्रकार भी प्रशिक्षित हुए और विभिन्न राजपूत राज्यों की राजधानियों में अपनी कला का प्रदर्शन करने लगे. इन चित्रकारों ने देश की महान कथाओं और आख्यानों, राम तथा कृष्ण कि कथाओं, भागवत तथा गीत गोविंद के आख्यानों आदि का आकर्षक चित्रण किया. ‘किशनगढ़’ शैली तथा ‘कोटा’ शैली ऐसी ही चित्रकला शैली थी. इसी प्रकार हिमालय, कुल्लू और कांगड़ा घाटियों में भी उत्कृष्ट चित्रकला का विकास हुआ.

इन्हीं चित्रकलाओं के समानान्तर ही भारत के विभिन्न प्रदेशों मे लोक चित्रकलाओं का विकास होता रहा है. लोक चित्रकला से तात्पर्य उन चित्रकलाओं से है जो किसी अंचल विशेष कि कलाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं. लोक चित्रकलाओं में महिलाओं की मुख्य भूमिका रही है. ये उत्तर प्रदेश की कोहबर, बिहार की मधुबनी, चौक पुरना और रंगोली जो अन्य नामों से भी जानी जाती है जैसे कि अल्पना, अलोपना, अइपन, भूमिशोभा, कोलम. इनमें से बहुत सी चित्रकलाएं दीवारों या ज़मीन पर मिट्टी का लेप कर उनमें रंग भरने से बनायी जाती हैं. यह कृतियां मन को मोह लेती हैं. महिलाओं के लिए यह उनके जीवन का अभिन्न अंग है. महिलाएं ही इस स्वस्थ साझी विरासत की वाहक हैं और शताब्दियों से अपनी भूमिका का बखूबी निर्वाह करती आयी हैं.

भारत में प्रचलित कुछ लोक चित्रकलाओं का विवरण इस प्रकार हैं :

झोती : उड़ीसा के आदिवासियों और ग्रामीणों की लोक कला है. इसमें ज़मीन और दीवार पर रेखाएं खींचकर सुरक्षा की कामना और बुराई को दूर करने का प्रयास किया जाता है.

कलमकारी : आंध्रप्रदेश का श्रीकलाहास्ती ज़िला कलमकारी के लिए प्रसिद्ध है. कलम से की जाने वाली कारीगरी को कलमकारी कहते है. इस लोककला में बांस से बनी नुकीली कलम और सब्जियों द्वारा तैयार किए गये रंगों का प्रयोग किया जाता है. रंगों का प्रयोग प्रतीकात्मक रूप में किया जाता है. कलमकारी को चित्र कहानी कहते हैं और इन को बनाने वाले कलाकारों में अधिकतर महिलाएं हैं.

तंजौर और मैसूर चित्रकला : दक्षिण भारत में तंजौर और मैसूर चित्रकला बहुत प्रचलित है. इस विधा में कृष्ण के बाल रूप और यशोदा की आकृतियों की प्रधानता है. इसमें अन्य हिंदू देवी-देवताओं को भी चित्रित किया जाता है. यह चित्रकारी मुख्यतया पूजाघर की दीवारों के लिए की जाती है. इन चित्रों को उभारा जाता है और इनमें चटक रंगों का प्रयोग होता है. रंगों के साथ सोने का पानी और नगों का प्रयोग इस चित्रकला को और भी सुंदर बना देता है. तंजौर और मैसूर चित्रशैलियों के बनाने की प्रक्रिया में अनेक अंतर हैं. परंतु दोनों ही शैलियां मनमोहक हैं.

कुमाउँनी चित्र : उत्तराखंड की कुमाउँनी चित्रकला में जन्माष्टमी के समय कृष्ण लीलाओं का चित्रण किया जाता है. इस चित्रकला में पारम्परिक रंगों का प्रयोग कर कागज पर मनमोहक चित्रों की रचना की जाती है. इस प्रकार के चित्र अन्य त्योहारों और अवसरों के लिए भी बनाए जाते हैं.

पटना कलम : पटना कलम बिहार की एक लोकप्रिय शैली है. 18वीं, शताब्दी के आस-पास इस क्षेत्र में इसका प्रचलन बढ़ा. इसलिए इस शैली में मुगल और यूरोपीय शैली का मिश्रण देखने को मिलता है. इस शैली के चित्रकार मुगल कलाकारों के वंशज थे जो मुगल काल के पतन के बाद पटना के आसपास आकर बस गए. यह शैली अपने रंगों और हाथ से बने कागज़ के प्रयोग के लिए प्रसिद्ध है. यह चित्र अधिकतर बिहार के लोगों के जनजीवन को दर्शाते हैं.

पिछवाई चित्रकला : यह चित्र मंदिरों के गर्भगृह को सजाने के काम में लाए जाते हैं. इन चित्रों का प्रयोग देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के पीछे लगाने के लिए होता है. इस चित्रकला का मुख्य केंद्र राजस्थान का नाथद्वारा मंदिर है. यह चित्र कपड़े पर पारंपरिक रंगों का प्रयोग कर बनाए जाते हैं. यह त्योहार के रंग, विषय और भाव की अभिव्यक्ति करते हैं.

फड़ चित्रकला : फड़ चित्रकला कपड़े पर होती है यह भी राजस्थान की लोकप्रिय लोकलाओं में से एक है. इस प्रकार के चित्र भीलवाड़ा क्षेत्र में अधिक पाये जाते हैं. यह चित्र ग्राम देवी, देवताओं, नायकों की कथाएँ दर्शाते हैं. इन चित्रों को लेकर लोक गायक गाँव-गाँव घूमते हैं और इन कथाओं का बखान करते हैं.

उष्ट कला : राजस्थान के बीकानेर में ऊँटों की खाल पर नक्काशी और चित्र बनाने की एक कला है. यह ईरान से मुगल काल में यहाँ आई और बीकानेर में प्रचलित हो गई जो अब भारतीय संस्कृति का हिस्सा हो गई है.

वर्ली चित्रकला : वर्ली चित्रकला महाराष्ट्र की लोकप्रिय चित्रकलाओं में से है. रेखाओं और त्रिकोणों का प्रयोग कर इस चित्रकला में जीवन चक्र को दिखाया गया है. इन चित्रों को बनाने के लिए सफेद रंग का प्रयोग होता है. यह रंग चावल के चूरे से बनते हैं. इन चित्रों को आदिवासी अपने घर की बाहरी दीवारों पर चित्रित करते हैं.

तनखा चित्रकला : यह चित्रकला नेपाल और सिक्किम के पहाड़ी क्षेत्रों में अधिक की जाती है. तनखा चित्रकला के चित्रकार अधिकतर बौद्धधर्म के अनुयायी होते हैं. यह चित्र बुद्ध के जीवन के विभिन्न पक्षों और जातक कथाओं के चित्रों के साथ, देवी-देवताओं, दैत्यों आदि की कथाएँ भी चित्रित करते हैं.

इस प्रकार हमदेख सकते हैं कि लोक कलाएं भले ही अपने स्वरूप में अलग अलग हों पर उनके मूल में कल्याण कि ही भावना होती है. आज हम बाजार और विज्ञान के युग में भले ही इनकी महत्ता भूलते जा रहे हैं परंतु ये कलाएं ही हमारी विरासत को सम्मृद्ध करती हैं तथा एकता को बढ़ावा देती हैं. इनके संरक्षण में ही मानव मात्र की भलाई है.

ध्रुव कुमार

[1](विष्णु धर्मोत्तर पुराण) (७०० अ.ऊ.


[2] काव्यप्रकाश, 4/5 ।


[3] भारतीय चित्रकला का संक्षिप्त इतिहास (वाचस्पति गैरोला), लोकभारती प्रकाशन, २००९


[4] शिवसूत्रविमर्शिणी, क्षेमराज

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