घासलेटी साहित्य बनाम पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ - निकिता जैन


कहते हैं कि साहित्य वह है जो समाज की सही तस्वीर प्रस्तुत करे या ऐसे मापदंड स्थापित करे जिससे समाज में एक सकारात्मक परिवर्तन हो सके | लेकिन ऐसा क्यों होता है कि जब कोई लेखक समाज का असली चेहरा हमारे समक्ष लाता है तो हम उसकी नियत को गलत समझकर उसके साहित्य को ‘घासलेटी साहित्य’ का नाम दे देते हैं | घासलेटी साहित्य को एक ऐसे साहित्य का पर्याय माना गया है जो पढ़ने लायक न हो, अश्लील हो अथवा जिसमें भाषा का प्रयोग असंगत ढंग से किया गया हो | इसमें कोई दो राय नहीं है कि इस प्रकार के साहित्य को हिंदी साहित्य के विद्वान एक उत्कृष्ट साहित्य की संज्ञा नहीं देंगे ( न ही दी है ) | लेकिन मुद्दा केवल यह नहीं है कि ऊपर बताई गयी विशेषताओं के आधार पर ही हम किसी के साहित्य को घासलेटी बता दें , और यह स्वीकार कर लें की अमुक लेखक/लेखिका का साहित्य इस लायक नहीं है कि उसे पढ़ा या उस पर बहस की जा सके | केवल किसी लेखक की भाषा के आधार पर उसके द्वारा लिखे साहित्य को घासलेटी घोषित कर देना केवल एक पक्षीय फैसला है | जैसा की पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ के साहित्य के साथ हुआ | उनके साहित्य को घासलेटी साहित्य की संज्ञा देकर छापने के योग्य नहीं समझा गया | घासलेटी साहित्य विरोधी आन्दोलन मुख्यत: अनैतिकता को प्रश्रय देने वाली रचनाओं के खिलाफ चला था लेकिन ‘उग्र’ की रचनाएँ कहीं भी अनैतिकता को बढ़ावा नहीं दे रही थीं बल्कि उनकी रचनाएँ तो सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ आवाज़ उठा रही थीं फिर उनके साहित्य को घासलेटी कहना का एक ही कारण हो सकता है वो है साहित्य में प्रयोग उनकी भाषा | जिस शब्दावली का प्रयोग ‘उग्र’ के साहित्य में हुआ है उस समय वैसी शब्दावली को साहित्य में नहीं अपनाया गया था | न के बराबर ही ऐसे लोग थे जो अपने विचारों को इतनी उत्तेजना के साथ स्वतंत्र रूप में अपने साहित्य में व्यक्त करते थे | लेकिन केवल भाषा के आधार पर किसी के साहित्य को घासलेटी बताकर उसे पूरी तरह नकार देना यह मापदंड अस्वीकार्य है | क्योंकि हर लेखक की अपनी एक अलग भाषा होती है और वह पूरी तरह स्वतंत्र है कि जो वह लिख रहा है उसमें वह कैसी भाषा का प्रयोग करे | अगर कोई लेखक/लेखिका अपनी रचना में चालू भाषा का प्रयोग कर रहा है तो यह भी देखना आवश्यक है कि उसकी रचना में पात्र किस परिवेश से आ रहे हैं और किन परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं | दूसरे शब्दों में कहा जाए तो विषयवस्तु की डिमांड भी रचना में भाषा का सृजन करती है या कराती है | ज़ाहिर सी बात है किसी भोजपुरी बोलने वाले एक अनपढ़ आदमी से हम यह उम्मीद नहीं लगा सकते कि वह शुद्ध हिंदी या संस्कृत में बात करे (हो सकता है कुछेक इन भाषाओँ को जानते हों ) तो फिर हम यह उम्मीद लेखक से कैसे कर सकते हैं कि वह जिन परिस्थितियों का चित्रण कर रहा है उसमें उसकी भाषा संयत ही रहेगी | एक लेखक पन्नों पर क्रोध और प्रेम में अन्तर केवल अपने शब्दों के माध्यम से ही दिखा सकता हैं वहां उसे पाठकों के सामने एक दृश्य का निर्माण करना होता है जिससे पाठक उसके मंतव्य को समझ सकें और अपने इस उद्देश्य को पूर्ण करने के लिए कई बार लेखक/लेखिका ऐसी भाषा का प्रयोग करते हैं जो कि शायद हम किसी के सामने नहीं बोलते या नहीं बोल सकते |

‘उग्र’ जी के साहित्य को केवल शब्दावली के आधार पर ही घासलेटी बता दिया गया है क्योंकि उनकी रचनाओं की कथावस्तु कहीं से भी घासलेटी नहीं है | निस्संदेह उन्होनें अपनी कई रचनाओं में ऐसे शब्दों का प्रयोग किया है जो कि आखों और कानों को नहीं भाते | लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि उनका साहित्य पढ़ने योग्य नहीं है ( आज के सन्दर्भ में तो बिलकुल ऐसा नहीं है) | ‘उग्र’ जी ने अधिकतर अपने साहित्य में समकालीन सामाजिक परिस्थितियों का वर्णन किया है | स्वतंत्रता के पूर्व एवं आज़ादी के पश्चात समाज में हो रही उथल-पुथल जैसी कि- धार्मिक अंधविश्वास, स्त्री पर होने वाले अत्याचार, साम्प्रदायिक परिस्थितियों इत्यादि को ‘उग्र’ ने अपने साहित्य का आधार बनाया है | समाज के बदलते हुए स्वरुप को वह भलीभांति अपनी रचनाओं में चित्रित करते हैं | जब कोई रचनाकार अपनी लेखनी द्वारा समाज की विविधता के दर्शन करवाता है तो लाज़मी है कि उसकी भाषा में एकरसता विद्यमान नहीं होगी | और यही प्रयोग ‘उग्र’ ने अपनी रचनाओं में किया है | उन्होनें एक उद्देश्य के साथ अपनी भाषा का रूप ऐसा रखा है कि पढ़ते समय पाठक प्रत्यक्ष रूप से उस रचना की गहराई में उतर जाए | पाठक को वो परिस्थितियां अपनी लगें ताकि वह सच्चाई से वाकिफ हो सके | एक रचनाकार का प्रमुख उद्देश्य यही होता है कि वह अपनी रचना के प्रत्येक पहलू से पाठकों को रूबरू करवाए | ‘उग्र’ ने भी ये ही किया है, उनकी कई कहानियाँ ऐसी हैं जिनको पढ़कर कहीं भी ऐसा एहसास नहीं होता कि इस रचनाकार के साहित्य को अश्लील साहित्य का दर्जा देकर उपेक्षा की गई है | इनकी ‘ईश्वरद्रोही’ कहानी केवल विषयवस्तु की लिहाज से ही नहीं बल्कि भाषा की दृष्टि से भी उच्च कोटि की कहानी है | ‘ईश्वरद्रोही’ साम्प्रदायिक दंगों पर आधारित कहानी है | जिसमें एक हिन्दू एक मुसलमान भिखारिन को न केवल अपने घर में पनाह देता है बल्कि उसे अपनी बेटी बनाकर रखता है और जब मोहल्ले के मुसलमानों को उस लड़की के मज़हब पता चलता है और वो चाहते हैं कि उस लड़की को हिन्दू के घर से निकाल कर उसे दीन इस्लाम में मिला लें तब वह शख्स जो तर्क उपस्थित करता है उसकी भाषा देखिये – “ उस दीन मुसलमान कहाँ थे जब भिखारिन भूखों मर रही थी ? उस दिन दीन इस्लाम कहाँ था जब अपने को मुसलमान कहने वाले कुत्ते उसके पाक दामन को गन्दा करने पर उतारू थे ? अरे यारों ! शैतानी, बदमाशी और लड़ाई का नाम ‘दीन इस्लाम’ नहीं है | काहे को खुदा और मज़हब को बदनाम करने पर कमर कसते हो ?”1 इस प्रकार की भाषा को क्या अश्लील कहा जा सकता है ? इस उद्धरण से स्पष्ट है कि ‘उग्र’ की भाषा केवल सहज ही नहीं बल्कि व्यंग्यपूर्ण एवं सीधे दिल पर चोट करने वाली भाषा है | प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से लेखक ने प्रत्यक्ष रूप से कहा है कि हिन्दू या मुस्लिम होना नहीं बल्कि एक इंसान होना ही मानव का सबसे बड़ा धर्म है जिसे लोग समझने में असमर्थ हैं | ‘उग्र’ ने प्रस्तुत कहानी में गोपालजी के माध्यम से एक ऐसे ईश्वरद्रोही की परिकल्पना की है जिसका सबसे बड़ा मज़हब इंसानियत है | ‘गोपालजी’ कहानी में एक ऐसे ईश्वरद्रोही के रूप में चित्रित हैं जो मजहब को केवल एक संस्कृति का सूचक मात्र मानता है | उनके लिए मज़हब का सम्बन्ध केवल एक मनुष्य की पोशाक से है जिससे यह पता लगता है कि वह किस संस्कृति या धर्म से ताल्लुक रखता है | इसके अलावा किसी का कोई मज़हब हो क्या फर्क पड़ता है – “ मेरी नज़र में मज़हब की उतनी ही इज़्ज़त है जितनी पोशाकों की | लुंगी लगाने वाला धोती पहनने वाले को काफिर नहीं कह सकता | पगड़ी पहनने वाला तुर्की टोपी वाले को मलेच्छ नहीं कह सकता | अपनी –अपनी पसंद है | आप दीन-इस्लाम को मानते हैं—लूंगी पहनिए ; राम हिन्दू धोती पहने | मैं कुछ भी नहीं हूँ –आदमी हूँ, जो जी में आएगा पहनूंगा | पोशाकों के लिए लड़ना मुसलमान नहीं, हिन्दूपन भी नहीं, गधापन है |”2 पोशाकों को लक्ष्य करके किस प्रकार मजहबों की आड़ में दंगे करने वालों पर निशाना साधा गया है, यह ‘उग्र’ की भाषा का ही कमाल है | अपनी इसी तर्क शक्ति से वह अपने आलोचकों को चारों खाने चित कर देते हैं |

‘उग्र’ ने आज़ादी से पूर्व और स्वतंत्रता के पश्चात् की परिस्थितियों को करीब से देखा था इसलिए उनके साहित्य में भी दोनों समय कालों का चित्रण हुआ है | जिन लोगों ने उनके साहित्य को अश्लील साहित्य करार दिया है शायद वह उनके साहित्य के पीछे छिपे उद्देश्य को समझने में कामयाब नहीं हो सके हैं | इस बात से इनकार नहीं है कि उनकी एक-दो कहानियां ऐसी हैं जिसमें आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया गया है – ‘दोज़ख की आग’ एक ऐसी ही कहानी है जिसमें यथार्थ परिस्थितियों को चित्रित करने के लिए उनकी भाषा थोड़ी असंगत प्रतीत होती है | लेकिन यहाँ पर ‘उग्र’ एक सामाजिक मुद्दे को प्रभावी ढंग से चित्रित करने के लिए ऐसा करते हैं | प्रस्तुत कहानी में यह दर्शाया गया है कि कैसे मज़हब के नाम पर एक-दूसरे को मरने –मारने पर तैयार लोग केवल इंसानियत का ही गला घोंटते हैं | इन दंगों से न तो मरने वाले के परिवार सुखी रहते हैं हैं और न ही मारने वालों के | इसके अलावा, दंगों के नाम पर जो लोग शहीद होने का दावा करते हैं उन्हें दोज़ख में जाकर अपने कर्मों का हिसाब कैसे पल-पल तड़प कर देना पड़ता है, इसका चित्रण भी किया गया है | कहानी एक ऐसे व्यक्ति की बातों से शुरू होती है जो व्यक्ति सांप्रदायिक दंगों में मारा जा चूका है और अब दोज़ख में पहुंचकर वहां से अपनी परिवार की बदहाली पर रो रहा है | कहानी का केंद्रीय बिन्दु इस ओर इंगित करता है कि जो व्यक्ति धर्म के नाम पर धार्मिक उन्माद करते हैं उन्हें ऊपर जाकर खुदा को जवाब देना होता है | क्योंकि भगवान या अल्लाह यह नहीं देखता कि कौन हिन्दू है, कौन मुसलमान, किसे कम सजा दी जाए या किसे ज्यादा, उसकी नज़र में तो इंसानियत का खून करने वालों की एक ही सजा है और वह सजा कहानी का मुख्य पात्र भोग रहा है अपने ही मित्रों द्वारा अपनी ही बीवी का अपमान देखकर – “ इसके बाद बहुत सी ऐसी तस्वीरें दिखाई गयीं जिनका वर्णन नहीं किया जा सकता | जिन्हें किताब में, दिल में आँखों में जगह नहीं दी जा सकती | सबका अर्थ यही था कि पेट के कारण मेरी स्त्री वेश्या हो गई , खुदा की तस्वीर मिट्टी में मिल गई |” 3. लेखक ने एक काल्पनिक प्रसंग द्वारा यह दर्शाया है कि दंगों से आजतक किसी का भला नहीं हुआ है | जो लोग धर्म के नाम पर इंसान को इंसानियत का खून करने के लिए कहते हैं वह किसी के दोस्त नहीं हो सकते और न ही उनसे यह उम्मीद की जा सकती है कि वह तुम्हारे परिवार को बख्श देंगे | ऐसे लोगों को खुदा भी माफ़ नहीं करता – “ जिस स्थान के लोग ईश्वर या खुदा, धर्म या मज़हब, पैगम्बर या अवतार के नाम पर हत्या, घृणा,रक्तपात, लूट,दाह और पाप का प्रचार करते हैं, उस स्थान पर दोनों जहान के मालिक, सर्वेश्वर, परमेश्वर का कोप वज्र की तरह टूटता है |”4 ‘उग्र’ अपनी कल्पनाशक्ति के माध्यम से पाठकों के सामने एक जीती-जागती ऐसी तस्वीर प्रस्तुत कर देते हैं जो केवल उस काल में ही नहीं बल्कि वर्तमान समय में प्रासंगिक है | इनके लेखन की ये ही विशेषता है कि वह एक कहानी के माध्यम से राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक सभी समस्याओं से परिचित करवाते हैं | इसी तर्ज पर उनकी अगली कहानी ‘मूसल ब्रह्म’ है जिसमें उन्होंनें गाँवों में होने वाले धार्मिक अंधविश्वासों के ऊपर से पर्दा उठाने की कोशिश की है | प्रस्तुत कहानी में कैसे गोसाईंन एक ज्योतिषी का खून करके ताल्लुकदार के साथ मिलकर गाँव में यह अफ़वाह फैलाती है कि जल्दी ही यहाँ पर प्रकोप आएगा और उसका निवारण उसके पास है और फिर पीपल ब्रह्म की पुजारिन बनकर लोगों को ठगती है, इसका चित्रण किया गया है | ‘उग्र’ ने कहानी में धार्मिक अंधविश्वास के अलावा सरकारी नौकरशाही पर भी व्यंग्य कसा है कि अब्दुल्ला ताल्लुकदार जैसे कितने लोग आम जनता का खून चूसते हैं और उनका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता | कहानी के अंत में लेखक ने ये साफतौर पर प्रदर्शित किया है कि जब तक आम जनता अपनी आँखें नहीं खोलेगी तब तक पीपल पुजारिन जैसे लोग बार-बार जन्म लेते रहेंगे और हम उनको पूजते रहेंगे – “ गोसाईंन को आजन्म कारावास दंड मिला | अब्दुल्ला छूट गया, पर उसके गाँव वालों ने उसे गांव से निकाल बाहर किया | सुना है अब अब्दुल्ला ‘साईं जी’ हो गया है |”5 यहाँ पर लेखक चुटकी लेते हैं कि कैसा देश है अपना जहाँ एक गोसाईंन जेल जाती है तो कहीं ओर दूसरा साईं पैदा हो जाता है |

‘उग्र’ अपनी कहानियों में न केवल समसामयिक मुद्दों को उठाते हैं बल्कि उसका चित्रण बहुत ही सशक्त ढंग से करते हैं | वह कथानक में ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न कर देते हैं कि पाठक को वह स्थितियां अपनी सी लगने लगती हैं | एक ओर जहाँ वो ग्रामीण लोगों को उनके अंधविश्वास के लिए फटकार लगाते दिखाई पड़ते हैं तो दूसरी और उन्हीं ग्रामीण किसानों की दशा पर आंसू भी बहाते हैं | जमींदारों ने कैसे –कैसे किसानों का शोषण करके अपनी जमीन-जायदाद में इजाफा किया है और कैसे किसान और उसके परिवार वाले आत्महत्या करने को मजबूर हो गए हैं इसका चित्रण उनकी कहानी ‘अभागा किसान’ में मिलता है | कहानी में एक शोषित किसान की गाथा को दर्शाया गया है जिसमें किसान की बेबसी और जमींदार की कठोरता के प्रदर्शन होते हैं | लेकिन कहानी में केवल इतना ही नहीं है, यहाँ पर लेखक जमींदार के दरियादिल बेटे के ज़रिये यह दर्शाते हैं कि ज़रूरी नहीं कि हर जमींदार बुरा ही हो, इंसान अमीरों के यहाँ भी पैदा होते हैं | इस कहानी का सबसे मजबूत पक्ष इसका अंत है जहाँ किसान की पत्नी भूख से बिलखते अपने बच्चों की हत्या करके अपने को मार लेती है और उनका अंतिम संस्कार करते हुए किसान पत्थर का जाता है – “ ........अब मुझे खाने की तकलीफ भी न होगी | आप अपने रुपये सहज लें...........भिक्खन को गले से लगाकर द्वारकानाथ बच्चों की तरह फूट-फूट कर रोने लगा, पर अभागे भिक्खन की आँखों में आंसू नहीं थे |”6 ये ही है भारतीय किसानों की नियति जो कभी उन्हें तो कभी उनके परिवार वालों को असमय ही मृत्यु के दर्शन करवा देती है | किसान हमेशा से अभागा ही रहा है जहाँ वह दूसरों के पेट के लिए अनाज पैदा करता है वहीँ उसके खुद के बच्चे भूखों मरते हैं और ये ही कारण है कि आजकल किसान गाँव छोड़कर शहरों में पलायन कर रहे हैं | लेखक इस कहानी में केवल जमींदारी या जमींदारों पर ही नहीं बल्कि उस सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था पर भी चोट करते हैं जो गरीबों से मुंह मोड़े खड़ी हुई है |

‘उग्र’ ने केवल सामाजिक समस्याओं को ही नहीं बल्कि वात्सल्य, करुणा को भी अपनी कहानियों का आधार बनाया है | फिर चाहे वह प्रेमी –प्रेमिका का प्रेम हो, देश-प्रेम हो या मनुष्य का मनुष्य के प्रति प्रेम हो |‘मलंग’, ‘जल्लाद’, ‘माँ’ कुछ ऐसी कहानियां हैं जिनमें प्रेम, वात्सल्य को एक नए रूप में परिभाषित किया गया है | ‘मलंग’ में जहाँ एक पति के कर्तव्यनिष्ठ प्रेम को चित्रित किया गया है तो वहीँ ‘माँ’ में देशप्रेम को | दूसरी ओर ‘उग्र’ ने ‘जल्लाद’ में एक जल्लाद के वात्सल्य और करुणा भाव को बखूबी उभरा है | एक जल्लाद की छवि समाज की नज़रों में एक निर्दयी, क्रूर हत्यारे के रूप में होती है लेकिन वह ही जल्लाद जब किसी जेल से छूटे मुजरिम को अपना बेटा मानकर अपने घर में पनाह देता है तो उसका वात्सल्य भाव एक जल्लाद को कैसे एक पिता में परिवर्तित कर देता है, इसका चित्रण किया गया है | कहानी के अंत में अपने मुंह बोले पुत्र की फांसी से पहले अपने आप को सूली पर लटका लेना यह साबित करता है कि कोई इंसान पेशे से भले ही कसाई या जल्लाद हो लेकिन दिल सबके भीतर होता है – “ उसी दिन दोपहर को कुछ लोगों ने रामस्वरूप को शहर के बाहर एक बरगद की डाल में फांसी पर टंगे देखा !”7

उपर्युक्त कहानियों के उदाहरणों से यह बात पूरी तरह सपष्ट हो जाती है कि चाहे बात भाषा की हो या विषयवस्तु की किसी भी दृष्टि से पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ का साहित्य घासलेटी साहित्य की श्रेणी में शुमार नहीं किया जा सकता | जिस लेखक की कल्पनाशक्ति इतनी दृढ़ एवं सशक्त हो, जिसने समाज के हर तबके के लोगों को केंद्र में रखकर उनकी समस्याओं एवं हालातों से रूबरू करवाया हो उसके साहित्य को हम अनैतिक कैसे कह सकते हैं | केवल इस तर्ज पर अगर इनके साहित्य को बेढंगा कहा जाए कि बीच-बीच में कहीं इन्होंनें कुछ आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया है तो यह सरासर अन्याय होगा | क्योंकि वर्तमान के कुछ लेखकों की रचनाओं की तुलना अगर ‘उग्र’ के साहित्य से की जाये तो ‘उग्र’ का साहित्य उनके मुकाबले उच्च कोटि का साबित होगा | साहित्य का अध्येता होने के नाते यह हमारा कर्तव्य है कि हम पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ जैसे साहित्यकार की रचनाओं को प्रकाश में लाकर उसकी महत्ता से पूरे हिंदी जगत को परिचित करवाएं ताकि ऐसी साहित्यकारों की लेखनी का ध्येय सफल हो सके जिन्होंनें अपने समय से आगे की परिस्थितियों और समस्याओं को हमारे समक्ष प्रस्तुत किया है |

सन्दर्भ :-

1. ‘विशिष्ट कहानियां –पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’’, संकलन – संपादन :- डॉ. कृष्णदेव झारी, प्रथम संस्करण -2010, गुप्ता प्रकाशन, हरियाणा , पृष्ठ संख्या – 157-158

2. ‘विशिष्ट कहानियां –पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’’, संकलन – संपादन :- डॉ. कृष्णदेव झारी, प्रथम संस्करण -2010, गुप्ता प्रकाशन, हरियाणा , पृष्ठ संख्या – 158

3. ‘विशिष्ट कहानियां –पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’’, संकलन – संपादन :- डॉ. कृष्णदेव झारी, प्रथम संस्करण -2010, गुप्ता प्रकाशन, हरियाणा , पृष्ठ संख्या –77

4. ‘विशिष्ट कहानियां –पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’’, संकलन – संपादन :- डॉ. कृष्णदेव झारी, प्रथम संस्करण -2010, गुप्ता प्रकाशन, हरियाणा , पृष्ठ संख्या – 73

5. ‘विशिष्ट कहानियां –पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’’, संकलन – संपादन :- डॉ. कृष्णदेव झारी, प्रथम संस्करण -2010, गुप्ता प्रकाशन, हरियाणा , पृष्ठ संख्या – 36

6. ‘विशिष्ट कहानियां –पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’’, संकलन – संपादन :- डॉ. कृष्णदेव झारी, प्रथम संस्करण -2010, गुप्ता प्रकाशन, हरियाणा , पृष्ठ संख्या – 26

7. ‘विशिष्ट कहानियां –पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’’, संकलन – संपादन :- डॉ. कृष्णदेव झारी, प्रथम संस्करण -2010, गुप्ता प्रकाशन, हरियाणा , पृष्ठ संख्या – 194

परिचय :-

निकिता जैन

पीएच.डी शोधार्थी, अम्बेडकर विश्वविद्यालय,दिल्ली |

“21वीं सदी की हिंदी पत्रिकाओं के स्त्री विशेषांकों का तुलनात्मक अध्ययन” विषय पर एम.फिल |

मोबाइल -9953058803,

ईमेल – nkjn989@gmail.com

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