जनकृति-वर्ष 5, अंक 49. मई 2019 [राजनीतिक-विमर्श विशेषांक]

GIF 2017- 2.0202

SGIF 2015- 4.127

परामर्श मंडल

डॉ. सुधा ओम ढींगरा (अमेरिका),प्रो. सरन घई (कनाडा), प्रो. अनिल जनविजय (रूस), प्रो. राज हीरामन (मॉरीशस), प्रो. उदयनारायण सिंह (कोलकाता), स्व. प्रो. ओमकार कौल (दिल्ली), प्रो. चौथीराम यादव (उत्तर प्रदेश), डॉ. हरीश नवल (दिल्ली), डॉ. हरीश अरोड़ा (दिल्ली), डॉ. रमा (दिल्ली), डॉ. प्रेम जन्मेजय (दिल्ली), प्रो.जवरीमल पारख (दिल्ली), पंकज चतुर्वेदी (मध्य प्रदेश), प्रो. रामशरण जोशी (दिल्ली),डॉ. दुर्गा प्रसाद अग्रवाल (राजस्थान), पलाश बिस्वास (कोलकाता), डॉ. कैलाश कुमार मिश्रा (दिल्ली), प्रो. शैलेन्द्र कुमार शर्मा (उज्जैन), ओम पारिक (कोलकाता), प्रो. विजय कौल (जम्मू ), प्रो. महेश आनंद (दिल्ली), निसार अली (छत्तीसगढ़),

संपादक

कुमार गौरव मिश्रा

सह-संपादक

जैनेन्द्र (दिल्ली), कविता सिंह चौहान (मध्य प्रदेश)

कला संपादक

विभा परमार

संपादन मंडल

प्रो. कपिल कुमार (दिल्ली), डॉ. नामदेव (दिल्ली), डॉ. पुनीत बिसारिया (उत्तर प्रदेश), डॉ. जितेंद्र श्रीवास्तव (दिल्ली), डॉ. प्रज्ञा (दिल्ली), डॉ. रूपा सिंह (राजस्थान), स्व. तेजिंदर गगन (रायपुर), विमलेश त्रिपाठी (कोलकाता), शंकर नाथ तिवारी (त्रिपुरा), बी.एस. मिरगे (महाराष्ट्र), वीणा भाटिया (दिल्ली), वैभव सिंह (दिल्ली), रचना सिंह (दिल्ली), शैलेन्द्र कुमार शुक्ला (उत्तर प्रदेश), संजय शेफर्ड (दिल्ली), दानी कर्माकार (कोलकाता), राकेश कुमार (दिल्ली), ज्ञान प्रकाश (दिल्ली), प्रदीप त्रिपाठी (महाराष्ट्र), उमेश चंद्र सिरवारी (उत्तर प्रदेश), चन्दन कुमार (गोवा)

सहयोगी

गीता पंडित (दिल्ली)

निलय उपाध्याय (मुंबई, महाराष्ट्र)

मुन्ना कुमार पाण्डेय (दिल्ली)

अविचल गौतम (वर्धा, महाराष्ट्र)

महेंद्र प्रजापति (उत्तर प्रदेश)

विदेश प्रतिनिधि

डॉ. अनीता कपूर (कैलिफोर्निया)

डॉ. शिप्रा शिल्पी (जर्मनी)

राकेश माथुर (लन्दन)

मीना चौपड़ा (टोरंटो, कैनेडा)

पूजा अनिल (स्पेन)

अरुण प्रकाश मिश्र (स्लोवेनिया)

ओल्या गपोनवा (रशिया)

सोहन राही (यूनाइटेड किंगडम)

पूर्णिमा वर्मन (यूएई)

डॉ. गंगा प्रसाद 'गुणशेखर' (चीन)

Ridma Nishadinee Lansakara, University of Colombo, Sri Lanka

सोनिया तनेजा, हिन्दी प्राध्यापिका, स्टैंफ़र्ड विश्वविद्यालय, (कैलिफोर्निया)

डॉ. इन्दु चौहान, संयोजक, हिन्दी स्टडि प्रोग्राम, यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ पेसिफिक, (फ़िजी )

Ekaterina Kostina, Saint Petersburg University

Anna Chelnokova, Saint Petersburg University

संपादन मण्डल

(बहुभाषी अंतरराष्ट्रीय मासिक पत्रिका)

संपर्क

डॉ. कुमार गौरव मिश्रा, 4-a, बागेश्वरी अपार्टमेट, आर्यापुरी,

रातू रोड़, रांची, झारखंड, भारत

8805408656

वेबसाई-www.jankritipatrika.com

ईमेल- jankritipatrika@gmail.com

संपादक की कलम से....


राजनीति का नया दौर.....

17वीं लोकसभा के चुनावी परिणाम हम सभी के समक्ष है। जनता ने मोदी सरकार को प्रचंड जीत के साथ संसद भेजा है। यह जनादेश उम्मीदों का जनादेश है। यह नए भारत के निर्माण हेतु मोदी पर किए गए विश्वास का जनादेश है। 2014-19 के अपने प्रथम कार्यकाल में पीएम मोदी जनता के समक्ष यह विश्वास पैदा करने में सफल रहे कि जनता की उम्मीदों को पूरा करने में उनके अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं है। आखिर पीएम नरेंद्र मोदी पर जनता के इस विश्वास का कारण क्या है ? मोदी सरकार के प्रथम कार्यकाल में युवाओं, किसानों का जो गुस्सा सड़कों पर दिखा वो वोटों में तब्दील क्यूँ नहीं हुआ ? विपक्षी पार्टियां जनता के बीच अपनी बात पहुंचाने में नाकाम क्यूँ रही ? क्या वर्तमान राजनीति ने राजनीति की नयी लकीर खींची है ? इन सभी प्रश्नों के जवाब खोजे जाने आवश्यक है।

2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान जनता के मध्य यूपीए 2 के दौरान हुए भ्रष्टाचार का मुद्दा प्रमुख था। इसके अतिरिक्त भी राष्ट्रीय सुरक्षा, महंगाई, महिला सुरक्षा, बेरोजगारी इत्यादि कई मुद्दे थे, जिनसे जनता त्रस्त थी और नरेंद्र मोदी ने इन सभी मुद्दों पर जनता के गुस्से को आवाज़ दी। नरेंद्र मोदी ने गुजरात मॉडल को सामने रखकर जनता को अच्छे दिन का ख्वाब दिखाया और जनता ने भी नरेंद्र मोदी पर भरोसा जताते हुए मोदी जी को पूर्ण बहुमत के साथ संसद भेजा। यह ऐतिहासिक जीत थी आखिर दशकों बाद किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिला था।

मोदी सरकार ने अपने प्रथम कार्यकाल में कई महत्वपूर्ण फैसले लिए, जिसमें नोटबंदी, जीएसटी इत्यादि प्रमुख है। इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय सुरक्षा के मसले पर मोदी सरकार के कड़े फैसलों जैसे 2 बार किए गए सर्जिकल स्ट्राइक ने जनता के मध्य सकारात्मक संदेश दिया। पीएम नरेंद्र मोदी ने अपने प्रथम कार्यकाल में डिजिटल इंडिया, आयुष्मान भारत, उज्ज्वला योजना, स्वच्छ भारत अभियान जैसे कार्यों के माध्यम से करोड़ों जनता के समक्ष विकास की तस्वीर प्रस्तुत की। इस दौरान अल्पसंख्यकों के मध्य अपनी छवि सुधारने एवं भरोसा बनाने हेतु मुस्लिम महिलाओं हेतु तीन तलाक का कानून प्रस्तुत किया। यह मोदी सरकार के कार्यों पर विश्वास ही था कि बीजेपी ने 2014 के बाद से भारत के कई राज्यों में अपनी सरकार बनी।

इस आधार पर क्या यह कहा जाए कि मोदी सरकार ने 2014 में अच्छे दिन, 2 करोड़ रोजगार, किसानों, महिला सुरक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर जो वादे किए थे वो पूर्ण किए तो जवाब होगा ‘नहीं’। मोदी सरकार के प्रथम कार्यकाल के शुरुआती दौर में ही रोहित वेमुला, फ़ेलोशिप, संस्थानों के निजीकरण के मुद्दे पर युवा सड़कों पर उतरे। तमिलनाडु के किसानों का दिल्ली में प्रदर्शन हो या मुंबई में महाराष्ट्र के किसानों का प्रदर्शन, इन प्रदर्शनों ने मोदी सरकार के दावों को खोखला साबित किया। इसके अतिरिक्त जिन अल्पसंख्यकों का भरोसा मोदी जीतना चाह रहे थे उन अल्पसंख्यकों पर गोरक्षा के नाम पर देशभर में हिंसा हुई और इस समस्या ने इतना विकराल रूप लिया कि पीएम को स्वयं आगे आकर गोरक्षा के नाम पर हो रहे हिंसा पर बोलना पड़ा। महिला सुरक्षा के दावे भी खोखले साबित हुए क्योंकि देशभर में बलात्कार की घटनाओं में कमी नहीं हुई यहाँ तक की उनकी ही पार्टी के मंत्रियों के नाम इसमें सामने आए।

मोदी सरकार रोजगार और आर्थिक मोर्चे पर भी सवालों से घिरी नज़र आई। नए रोजगार के अवसर पैदा होने के बजाए और कम होते गए आलम यह रहा कि सरकारी आंकड़ों के अनुसार बेरोजगारी दर भयावह स्तर पर पहुँच गयी। नोटबंदी और जीएसटी जैसे फैसलों ने भी न केवल रोजगार को प्रभावित किया बल्कि जीडीपी में गिरावट दर्ज की गयी। हालांकि मोदी सरकारमुद्रा लोन योजना, कौशल विकास के द्वारा रोजगार दिए जाने का दावा करती रही और बढ़ती अर्थव्यवस्था का दावा किया।

मोदी सरकार के प्रथम कार्यकाल में एक अहम मुद्दा ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ भी रहा। इस कार्यकाल में पठानकोट और पुलवामा में हुई आतंकी हमलों ने मोदी सरकार पर सवाल खड़े किए क्योंकि एक के बदले दस सिर लाने की बात 2014 के चुनाव में पीएम ने मजबूती से कही थी। सवालों से घिरती मोदी सरकार ने उरी एवं बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक से कड़ा संदेश दिया और जनता ने मोदी सरकार के इस फैसले का दिल खोलकर स्वागत किया। पीएम ने इन सर्जिकल स्ट्राइक का जिक्र चुनावों में बखूबी किया।

अब महत्वपूर्ण बात यह है कि मोदी सरकार कई मोर्चों पर विफल रहने के बावजूद 2019 के चुनावों में जनता का भरोसा कैसे जीत पाई तो जवाब है पीएम मोदी का करिश्माई व्यक्तित्व, चुनावी प्रबंधन और विपक्ष की दिशाहीन राजनीति।

भारतीय लोकतान्त्रिक चुनावी प्रणाली में चेहरे पर चुनाव नहीं लड़ने की परंपरा है। यहां लोकसभा में चुने सांसद अपना प्रतिनिधि चुनते हैं वह देश का प्रधानमंत्री होता है और विधानसभा में चुने विधायक राज्य का मुख्यमंत्री तय करते हैं। यह तो हमारे यहां की परंपरा है लेकिन अमूमन नागरिकों से पूछ लीजिये वे चेहरों पर ही वोट देते हैं।

पिछले कई विधानसभा चुनावों और 2014 के लोकसभा चुनाव में यही हुआ और इस बार भी यही हो रहा है। कॉंग्रेस बिना चेहरे के चुनाव लड़ती है और बीजेपी ने भारत के सभी चुनावों में चेहरे को केंद्र में रखा है और जनता भी अब चेहरे को देखती है। यह बात कॉंग्रेस जितनी जल्दी समझ ले उतना बेहतर है। समय के साथ बहुत कुछ बदलता है, लोगों का चुनावों के प्रति नज़रिया भी बदला है। आप भले लाख कह लीजिये कि मुद्दों पर चुनाव जीते जाते हैं पर नतीजे आपकी बातों को गलत साबित कर देंगे। कॉंग्रेस राजीव गांधी के बाद से ही चेहरे के साथ चुनाव नहीं लड़ी है और उसके बाद से कॉंग्रेस कभी बहुमत में भी नहीं आई। बीजेपी आज के दौर में इंदिरा और राजीव गांधी का दौर वापस ले आई है उसके पास नरेंद्र मोदी जैसा चेहरा है जो अपने दम पर चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। चेहरे का केंद्र में ना होना कॉंग्रेस और विपक्षी दलों के लिए नेगेटिव प्वाइंट है।

चुनाव दौरा आए अधिकतर सर्वेक्षणों को भी देखें तो जनता ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के तौर पर अधिक पसंद किया है। यह ज़रूरी नहीं कि जनता मोदी के सभी कार्यों से संतुष्ट हो बल्कि विपक्षी पार्टियों द्वारा कोई मज़बूत विकल्प चेहरे के रूप ना दे पाने के कारण भी जनता का मोदी जी को पुनः चुना जाना हो सकता है। वर्तमान की बात करें तो नरेंद्र मोदी के समक्ष राहुल गांधी ऐसा चेहरा नहीं हैं कि किसी बड़े करिश्मे की उम्मीद की जा सके हालांकि राहुल गांधी की छवि में गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ एवं राजस्थान के चुनावों के बाद से ही व्यापक बदलाव हुए हैं लेकिन लोकसभा में राहुल गांधी को चेहरा बनाकर कॉंग्रेस नहीं जीत सकती थी यह बात विपक्षी पार्टियां भी जानती थी इसलिए चेहरे को लेकर एक आम सहमति विपक्षी पार्टियों में आम सहमति नहीं बन सकी।

अब भारतीय राजनीति और जनता चेहरे के इर्द-गिर्द ही रहेगी यह सत्य है और इसी सत्य के साथ कॉंग्रेस और विपक्षी पार्टियां आगे लड़े तो ठीक अन्यथा वो बहुत बड़े फेरबदल की उम्मीद ना करे तो बेहतर है।

एक बात जो पीएम मोदी के पक्ष में हैं वह है अमित शाह जैसा सारथी और उनकी चुनावी रणनीति। बीजेपी के पास आज के समय में प्रभावी चेहरा, धन, मजबूत संगठन और चुनावी प्रबंधन है ऐसे में विपक्ष के सामने मुद्दों पर सड़क पर उतरने और जनता के बीच जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

विपक्ष विशेष तौर पर कांग्रेस की सबसे बड़ी विफलता रही मजबूत विपक्ष की भूमिका अदा न कर पाना। यूपीए कार्यकाल के दौरान महंगाई का मुद्दा हो या भ्रष्टाचार का बीजेपी हमेशा सड़कों पर दिखी और जनता की आवाज़ को मजबूती से उठाया पर मुद्दे होने के बावजूद कांग्रेस ने मजबूती से स्वयं को प्रस्तुत नहीं किया। राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दे पर भी पार्टी के नेताओं की अनर्गल बयानबाजी ने पार्टी को पीछे धकेला वहीं अंदरूनी गुटबाजी ने पार्टी को नुकसान पहुंचाया। इसके अतिरिक्त कांग्रेस ने सॉफ्ट हिन्दुत्व का रास्ता अपनाकर अपनी ही छवि को नुकसान पहुंचाया।

वर्तमान में यदि अस्तित्व का संकट कांग्रेस के समक्ष है तो उत्तर भारत के क्षेत्रीय दलों के सामने भी गंभीर चुनौतियाँ है। यह पार्टियां जन आकांक्षाओं को समझने में नाकाम रही है। देश में सबसे अधिक युवा वोटर हैं उसमें भी फर्स्ट टाइम वोटर की बड़ी तादात है ऐसे में वर्तमान युवा क्या सोच रहा है, उसकी अपेक्षाएँ क्या है इसे जानना भी जरूरी है अब महज जाति, मजहब, धर्म के आधार पर वोट नहीं मिलेंगे। उत्तर प्रदेश, बिहार के चुनावी परिणाम भारतीय राजनीति में व्यापक बदलाव के संकेत हैं इसलिए जरूरी है कि विपक्षी दल इस संकेत को समझें।

वर्तमान युग तकनीक का है। तकनीकि माध्यम अब चुनावों में अहम भूमिका निभाते हैं इसलिए करोड़ों लोगों के बीच पहुँचने के लिए विपक्षी पार्टियों को इन माध्यमों में मजबूत होना होगा। जमीनी स्तर पर मजबूत संगठन का निर्माण करना होगा और मुद्दों को लेकर जनता के बीच जाना होगा ताकि जनता आप पर विश्वास कर सकें।

इसके अतिरिक्त भी कई सवाल हैं, कई पक्ष हैं, जिसे इस विशेषांक के माध्यम से आप समझ सकते हैं। ‘राजनीतिक-विमर्श विशेषांक’ के माध्यम से हमारा उद्देश्य है कि राजनीति के सैद्धांतिक एवं व्यवहारिक पक्ष, भारतीय राजनीति की वर्तमान दशा एवं दिशा पर विभिन्न दृष्टिकोण आप तक पहुंचे। यह इस विषय पर अंतिम अंक नहीं है हमारा प्रयास है की राजनीति के विभिन्न पहलुओं पर इस विशेषांक का दूसरा भाग भी आपके समक्ष प्रस्तुत कर सकें।

इस विशेषांक में अपने विचार रखने वाले सभी लेखकों का हम आभार प्रकट करते हैं। इस अंक में चुनावों से संबन्धित सोशल मीडिया पर लेखकों के विचारों को साभार सहित सम्मिलित किया गया है।

जनकृति में साहित्यिक रचनाओं के साथ-साथ विभिन्न क्षेत्रों के नवीन विषयों पर आधारित लेख, शोध आलेख प्रकाशित किए जाते है। इससे पूर्व बुजुर्गों पर केन्द्रित विशेषांक,विदेशी भाषा कविता विशेषांक, जल विशेषांक, थर्ड जेंडर विशेषांक, हिंदी पत्रिका विशेषांकलोकभाषा विशेषांक एवं 21वीं सदी विशेषांक कुल 8 विशेषांक प्रकाशित किए गए हैं। इनके अतिरिक्त पत्रिका के आगामी विशेषांक पूर्वोत्तर भारत विशेषांक, काव्य आलोचना विशेषांक, संपादक एवं संपादकीय विशेषांक, बाल शोषण इत्यादि प्रस्तावित है जिनपर कार्य किया जा रहा है। इन विशेषांकों में लेखन हेतु आपका स्वागत है।

जनकृति वर्तमान में विश्व के दस से अधिक रिसर्च इंडेक्स में शामिल है। इसके अतिरिक्त जनकृति की इकाई विश्वहिंदीजन से विगत दो वर्षों से हिन्दी भाषा सामग्री का संकलन किया जा रहा है साथ ही प्रतिदिन पत्रिकाओं, लेख, रचनाओं का प्रचार-प्रसार किया जाता है। जनकृति की ही एक अन्य इकाई कलासंवाद से कलाजगत की गतिविधियों को आपके समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है साथ ही कलासंवाद पत्रिका का प्रकाशन भी किया जा रहा है। जनकृति के अंतर्गत भविष्य में देश की विभिन्न भाषाओं एवं बोलियों में उपक्रम प्रारंभ करने की योजना है इस कड़ी में जनकृति पंजाबी एवं अन्य भाषाओं पर कार्य जारी है।

जनकृति के द्वारा लेखकों को एक मंच पर लाने के उद्देश्य से विभिन्न देशों की संस्थाओं के साथ मिलकर ‘विश्व लेखक मंच’ के निर्माण का कार्य जारी है। इस मंच में विश्व की विभिन्न भाषाओं के लेखकों, छात्रों को शामिल किया जा रहा। इस मंच के माध्यम से वैश्विक स्तर पर सृजनात्मक कार्य किये जाएँगे।

धन्यवाद

-डॉ. कुमार गौरव मिश्रा

इस अंक में ....

राजनीतिक-विमर्श/

Poltical Discourse


शोध आलेख एवं लेख


पृष्ठ संख्या


भारतीय राजनीतिक प्रणाली-सैद्धान्तिक और व्यवहारिक पक्ष: दिग्विजय विश्वकर्मा


8-11


वर्तमान दौर और राष्ट्रवाद की बहस: राकेश कुमार


12-17


भारतीय राजनीति: दशा और दिशा : भोला नाथ सिंह


18-20


पोस्ट-ट्रूथ पॉलिटिक्स: डॉ. हेमंत कुमार झा


21-24


शिक्षा को गढ़ती राजनीति: कौशलेंद्र प्रपन्न


25-28


मण्डल कथा : एक राजनीतिक भूचाल- वीरेन्दर


29-31


भारतीय राजनीति में महिलाऐः 1950-2009

- डॉ. अजय कुमार सिंह


32-37


मीडिया की राजनीति व राजनीति का मीडिया: आकाशदीप


38-41


राजनीति और मीडिया: द्वारिका प्रसाद अग्रवाल


42-45


राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की जरूरत

-आकांक्षा यादव


46-50


साहित्य और राजनीति: पूजा गुप्ता


51-54


महिला कहानीकारों की कहानियों में राजनीतिक विसंगतियों का चित्रण: डॉ.अंजु


55-59


चुनाव, पार्टियां, चुनावी घोषणापत्र और हम: अनूप सैनी 'बेबाक़'


60-61


कैसा चुनाव है यह: धर्मपाल महेंद्र जैन


62-63


अच्छे दिन: वेद प्रकाश


64-66


लोकतंत्र का महापर्व : चुनाव- डॉ. लता अग्रवाल


67-69


बंगाल में चुनाव पर एक सामान्य चर्चा: अरुण माहेश्वरी


70-71


ममता बनर्जी का बंगाल, भारत से टूटता बंगाल: पुष्कर अवस्थी


72-73


वीर सावरकर: विक्रम सम्पत


74-78


भारत एक खोज: पंडित जवाहर लाल नेहरू- डॉ. बीएन. सिंह


79-83


आत्मचिंतन- भगवान सिंह


84-86


राजनीति का अपराधीकरण: रामजी तिवारी


87-89


चुनाव सुधार और भारतीय लोकतंत्र: डॉ. शुचि संतोष बरवार


90-98


सादगी की मूर्ति पर्रिकर साहब’: कुमार प्रियांक


99-100



भारतीय राजनीतिक प्रणाली-सैद्धान्तिक और व्यवहारिक पक्ष


दिग्विजय विश्वकर्मा*

भूमिका

भारत मे लोकतांत्रिक प्रणाली का शासन है। भारत ने अपनी आजादी के बाद लोकतांत्रिक देश बनने का निर्णय लिया और 1950 में लिखित संविधान लागू किया और उसी के साथ भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बनकर उभरा और आज भी वो दुनिया का सबसे बड़ा और एक कामयाब लोकतांत्रिक देश है। आज़ादी से लेकर आजतक के इतिहास में केवल 2 वर्ष आपातकाल के छोड़ दिये जायें तो भारतीय लोकतंत्र का सफर एक गौरमवमय गाथा है।

लेकिन इस विशाल लोकतंत्र की कहानी में सैंद्धांतिक और व्यवहारिक पक्ष हमे अलग-2 नजर आते है और ये तब से है जब से भारत का संविधान लागू हुआ , हम ये कह सकते है कि भारतीय संविधान सिंद्धांत के रूप में जैसा है वैसा व्यवहार में नही है और न ही यहाँ अपने हुई राजनीतिक प्रणाली। भारतीय लोकतांत्रिक प्रणाली के सैद्धान्तिक और व्यवहारिक पक्ष पर कटाक्ष करने के लिए एक लाइन ही काफी है कि -- भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र तो है लेकिन क्या यह सबसे अच्छा लोकतंत्र है?


लोकतंत्र का अर्थ क्या होता हैं? जान-साधारण का सशक्तिकरण, क्या भारत मे लोकतंत्र ने लोगो को सशक्त बनाया है या उनके सामने के समस्याओं को खड़ा किया है? ये सब जानने के लिए हमे भारतीय लोकतांत्रिक प्रणाली के उन मुख्य पक्षों या बिंदुओ को देखना चाहिए जो भारतीय लोकतांत्रिक प्रणाली की विशेषता रहे है।

भारतीय लोकतांत्रिक प्रणाली

भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था एक संवैधानिक व्यवस्था है, भारतीय संविधान दुनिया का सबसे बड़ा लिखित और विस्तृत संविधान है, या संविधान न तो कठोर है और न ही कमजोर बल्कि ये इन दोनों का मिश्रण है अर्थात लचीला है।

तो सबसे पहले भारतीय संविधान के ही सिंद्धान्तों कि व्यवहारिकता को परखते है।

भारतीय संविधान में स्पष्ट लिखा है कि भारत राज्यो का एक संघ है और भारत के सभी राज्यो पर एक भारतीय संविधान लागू होता है, लेकिन भारत का एक अभिन्न अंग जम्मू और कश्मीर राज्य में उसका अपना संविधान है। यही नही उसका अपना ध्वज और प्रतीक चिन्ह है। ये साफ दर्शाता है कि भारतीय संविधान के सिद्धांत कैसे है और उनका व्यवहारिक रूप कैसा है। कुछ कह सकते है कि उसे विशेष दर्जा दिया गया है लेकिन क्यो वो इसका जवाब नही दे पाते क्योकि जिस विलयपत्र के द्वारा अन्य राज्य भारत का हिस्सा बने उसी विलयपत्र के द्वारा जम्मू और कश्मीर भी। फिर उसे ये अलग दर्जा देने का कारण? निःसंदेह ये भारतीय संविधान के सिद्धांतों का व्यवहारिक रूप से उपेक्षा करने के समान है।

दूसरा पहलू ये है कि भारतीय संविधान में कुछ भी जोड़ने और घटाने के लिए संविधान संशोधन करने पड़ता है , भारतीय संविधान में संशोधन की प्रक्रिया का उल्लेख भारतीय संविधान के अनुच्छेद 368 में दी हुई है, जिसके तहत साधारण संविधान संशोधन के लिए विधेयक को लोकसभा और राज्यसभा से 2/3 बहुमत से पारित होने अनिवार्य है। और विशेष संविधान संशोधन के लिए इस प्रक्रिया के अतिरिक्त आधे से अधिक राज्यो की विधानसभाओ द्वारा भी पारित होने चाहिए , ये भारतीय संविधान में स्पष्ट रूप से लिखा हुआ है अर्थात ये संशोधन का सिद्धांत है और ये प्रक्रिया पूरी किये बिना कोई भी लाइन या शब्द भारतीय संविधान का हिस्सा नही बन सकती। लेकिन भारतीय संविधान का ये सिद्धान्त व्यवहार में नही उतरा जब संविधान लागू हुए अभी 10 वर्ष भी नही हुए थे कि बिना संसद के किसी सदन में चर्चा किये एक धारा को संविधान का हिस्सा बना दिया गया और उस धारा का नाम है 35(A)।

भारतीय संविधान में राष्ट्रपति को यह अधिकार है कि वो आवश्यकता पड़ने पर अध्यादेश जारी कर सकता है लेकिन वो अध्यादेश 6 महीने तक ही मान्य होगा यदि उसे 6 महीने के भीतर संसद से मंजूरी नही मिलती है तो वह अध्यादेश 6 महीने बाद स्वतः ही समाप्त हो जाएगा।

लेकिन 14 मई 1954 को भारत के राष्ट्रपति ने एक आदेश दिया और उसके फलस्वरूप भारतीय संविधान में एक धारा जोड़ दी गई जिसके नाम 35(A) है। अब संविधान के सिद्धांत के अनुसार इस धारा को संविधान का हिस्सा बनाने से पूर्व सांसद के दोनों सदनों में बहस होनी चाहिए थी लेकिन नही हुई और तब से लेकर आज तक न जाने कितनी सरकार बनी और बिगड़ी लेकिन किसी ने इस धारा के ऊपर चर्चा तक करने की कोशिश नही की, सरकारो को यदि छोड़ भी दे तो किसी सांसद ने भी आजतक सदन में ये प्रश्न तक पूछने की जहमत नही उड़ाई, ये सरासर संवैधानिक सिंद्धान्तों का मज़ाक उड़ाना ही है।

न्यायपालिका

भारतीय संविधान में स्वतंत्र न्यायपालिका की स्थापना की गई है जो बिना किसी दबाव व किसी के प्रभाव में आये बिना आपने निर्णय दे तथा उसका निर्णय समस्त भारत में लागू होगा, लेकिन यहाँ भी न्यायपालिका अपने इस सिद्धांत पर खरी नही उतरती क्योकि भारत के अभिन्न भाग जम्मू और कश्मीर पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय लागू नही होता है ये एक कड़वी व्यवहारिक सच्चाई है। जिसे कुछ लोग जानते ही नही है लेकिन आज तक इस पर किसी ने चिंता तक प्रकट नही की।

भारत ने अंग्रेजो के खिलाफ लड़ाई लड़ी और स्वन्त्रता प्राप्त की तब लोगो मे यह आशा जगी थी कि अब लोगो को न्यायलयों से न्याय मिलेगा लेकिन यहाँ भी न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन ही हुआ है । न्याय की मांग है कि वादी को न्याय सरल और सुलभ तथा उसको उस भाषा मे दिया जाए जिसमे को आसानी से समझ सके , लेकिन इस नैतिक सिद्धान्त का भी व्यवहारिक रूप में पालन नही हुआ क्योकि भारतीय संविधान में भी इस सिद्धांत को स्वीकार ही नही किया गया वहाँ तो लिख दिया गया कि भारत के उच्च और उच्चतम न्यायालय की आधिकारिक भाषा औपनिवेशिक ही होगी अर्थात अंग्रेजी ।

आप भारतीय संविधान के उस अनुच्छेद को देखिए ---

अनुच्छेद 348.

उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में और अधिनियमों, विधेयकों आदि के लिए प्रयोग की जाने वाली भाषा--

(1) इस भाग के पूर्वगामी उपबंधों में किसी बात के होते हुए भी, जब तक संसद विधि द्वारा अन्यथा उपबंध न करे तब तक--

(क) उच्चतम न्यायालय और प्रत्येक उच्च न्यायालय में सभी कार्यवाहियाँ अंग्रेजी भाषा में होंगी,

(ख) (i) संसद के प्रत्येक सदन या किसी राज्य के विधान-मंडल के सदन या प्रत्येक सदन में पुरःस्थापित किए जाने वाले सभी विधेयकों या प्रस्तावित किए जाने वाले उनके संशोधनों के,

(ii) संसद या किसी राज्य के विधान-मंडल द्वारा पारित सभी अधिनियमों के और राष्ट्रपति या किसी राज्य के राज्यपाल 1*** द्वारा प्रख्‍यापित सभी अपयादेशों के, और

(iii) इस संविधान के अधीन अथवा संसद या किसी राज्य के विधान-मंडल द्वारा बनाई गई किसी विधि के अधीन निकाले गए या बनाए गए सभी आदेशों, नियमों, विनियमों और उपविधियों के, प्राधिकृत पाठ अंग्रेजी भाषा में होंगे।

(2) खंड (1) के उपखंड (क) में किसी बात के होते हुए भी, किसी राज्य का राज्यपाल 1*** राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से उस उच्च न्यायालय की कार्यवाहियों में, जिसका मुख्‍य स्थान उस राज्य में है, हिन्दी भाषा का या उस राज्य के शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाली किसी अन्य भाषा का प्रयोग प्राधिकृत कर सकेगा :परन्तु इस खंड की कोई बात ऐसे उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए किसी निर्णय, डिक्री या आदेश को लागू नहीं होगी।

(3) खंड (1) के उपखंड (ख) में किसी बात के होते हुए भी, जहाँ किसी राज्य के विधान-मंडल ने, उस विधान-मंडल में पुरःस्थापित विधेयकों में या उसके द्वारा पारित ओंधनियमों में अथवा उस राज्य के राज्यपाल 1*** द्वारा प्रख्‍यापित अध्यादेशों में अथवा उस उपखंड के पैरा (ii) में निर्दिष्ट किसी आदेश, नियम, विनियम या उपविधि में प्रयोग के लिए अँग्रेजी भाषा से भिन्न कोई भाषा विहित की है वहाँ उस राज्य के राजपत्र में उस राज्य के राज्यपाल1***के प्राधिकार से प्रकाशित अँग्रेजी भाषा में उसका अनुवाद इस अनुच्छेद के अधीन उसका अँग्रेजी भाषा में प्राधिकृत पाठ समझा जाएगा।

क्या ये प्रावधान न्याय के नैतिक सिद्धान्त का व्यवहार में न उतार कर उसका मजाक उड़ाना नही है?

विधायिका

न्यायपालिका के बाद अब हम विधायिका की बात कर लेते है प्रतिनिधित्व का सिद्धांत यह है कि प्रतिनिधित्व करने वाले लोग सदन में बैठकर लोगो की समस्याओं को हल करने के लिए कानूनों का निर्माण करे , लेकिन पिछले 70 वर्षों से हमने देखा है कि कानून-पर-कानून बनाये गए है और लोगो की समस्याओं में कोई कमी नही आई ,बल्कि उल्टा समस्याओं की संख्या बढ़ती ही गई है। इस प्रकार हम ये कह सकते है कि विधायिका अपने सिद्धांतों पर भी खरी नही उतरी क्योकि आज वहाँ गंभीर अपराधों के आरोपी बैठे हुए है जो जन-कल्याण के कानूनों का निर्माण नही कर रहे है तो इस प्रकार इसका व्यवहारिक पक्ष यह रहा कि विधायिका के सिद्धांत अपनी व्यवहारिकता पर खरे नही उतरते।

धर्मनिरपेक्षता(सेकुलरिज्म)

भारतीय राजनीतिक प्रणाली में धर्मनिरपेक्षता एक अहम व महत्वपूर्ण तत्व है ।धर्मनिरपेक्षता का अर्थ होता है कि राज्य और धर्म दोनो अलग-2 रहेंगे तथा राज्य धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप नही करेगा और राज्य सभी धर्मों को एक दृष्टि से देखेगा और यह न केवल राज्य पर लागू होता है बल्कि राज्य में लोगो का प्रतिनिधित्व करने वाले राजनीतिक दलों पर भी लागू होता है। लेकिन भारत मे इस सिद्धान्त की भी अवहेलना व्यवहारिक पक्ष में की गई है इसके लिए दो उदाहरणों पर विचार करना चाहिए ।

इस देश मे महिला अधिकारों पर जोरदार बहस होती है और नेता और संविधान महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार देने की बात करते नही थकते। लेकिन समानता के इसी सिद्धान्त का उल्लंघन व्यवहारिकता में किया गया , राजनीतिक दलों ने तो अल्पसंख्यक वर्ग का इतना तुष्टीकरण किया कि वो सीधे -2 धर्म के आधार पर वोट बैंक बनाने लगे और अल्पसंख्यकों के समर्थन प्राप्त करने के लिए वो किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार है । सेकुलरिज्म का अर्थ तो ये होता है कि धर्म का इस्तेमाल राजनीति में न हो लेकिन ऐसा हो रहा है तो ये सिद्धान्त अपने व्यवहारिक रूप में नही उतरता।

दूसरा उदाहरण राज्य द्वारा एक महिला के अधिकारों के हनन का है । सन 1986 में एक महिला शाहबानो ने अपने अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ते हुए उच्चतम न्यायालय से गुहार लगाई , न्यायालय के उस महिला के साथ न्याय किया उर उसके अधिकार की रक्षा की तथा उसके पक्ष में फैसला सुनाया लेकिन तत्कालीन सरकार ने उच्चतम न्यायालय के फैसले को पलटने के लिए एक संविधान संशोधन कर डाला एयर ये सब उसने केवल एक समुदाय विशेष के कट्टरपंथी लोगो को खुश करने के लिए किया और सुप्रीम कोर्ट ने भी उस संविधान संशोधन को असंवैधानिक घोषित नही किया जो एक महिला के अधिकारों का हनन करने वाला कानून था तो ये कैसे माना जाए कि न्यायालय को देश मे नागरिकों के अधिकारों का रक्षक की भूमिका दी गई है और यदि दी गई है तो क्या वो व्यवहारिक रूप में उसका पालन कर रहा है जवाब है - नही।

निष्कर्ष

इस प्रकार हम देखते है कि भारतीय लोकतांत्रिक प्रणाली में एक-से-एक उच्च सिंद्धान्तों को अपनाया लेकिन वो सिद्धान्त केवल सिद्धान्त बनाकर रह गए व्यवहारिक रूप में न तो वो धरातल पर उतरे और न ही उनका पालन करवाने की कोशिश की गई। भारतीय लोकतांत्रिक प्रणाली में कुछ ऐसे प्रयास तो हुए की इन सिद्धांतों और मूल्यों को लागू करने की कोशिश की गई लेकिन ये जरा सा भी सफल होती दिखाई नही दी। भारतीय लोकतांत्रिक प्रणाली का सैद्धान्तिक पक्ष ये रहा है कि इसमें सिंद्धान्तों को लिखित रुप में तो अपनाया गया, लेकिन व्यवहारिक रूप में लागू करने में असफलता ही प्राप्त हुई है , लेकिन इन सब के बावजूद भारतीय लोकतांत्रिक प्रणाली मजबूती के साथ आज भी विद्यमान है और निरंतर आगे बढ़ते हुए सुधार का प्रयास कर रही है तथा लोकतांत्रिक सिंद्धान्तों को व्यवहारिक रूप में लागू करने का प्रयास कर रही है।

नाम- दिग्विजय विश्वकर्मा

कोर्स - राजनीति विज्ञान (M.A)

मो. --- 9911426697

ईमेल - Digvijayv4@gmail.com

वर्तमान दौर और राष्ट्रवाद की बहस

नाम- राकेश कुमार

शोधार्थी

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय

वर्धा (महाराष्ट्र)

संपर्क सूत्र- 7503518676


ईमेल- mr.rakeshkumar11@gmail.com

सारांश;-

प्रस्तुत शोध आलेख धर्मनिरपेक्षता, राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय आन्दोलन, वर्तमान राष्ट्रवाद, देशद्रोही, देशभक्त और हिंसा की बहस और उसके विभिन्न परिप्रेक्ष्यों का आलोचनात्मक परीक्षण करने का प्रयास करता है|

प्रमुख शब्द :-

धर्मनिरपेक्षता, राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय आन्दोलन, वर्तमान राष्ट्रवाद, देशद्रोही, देशभक्त और हिंसा।

शोध प्रविधि ;-


प्रस्तुत शोध आलेख में द्वितीयक स्रोतों का प्रयोग किया गया है जिसमे पुस्तकें एवं अखबार शामिल है।

धर्मनिरपेक्षता :-

विविधताओं से भरे हुए लोकतंत्र की पहली और बुनियादी मांग संविधान और धर्मनिरपेक्षता ही होते है। संविधान बुनियादी सिद्धांतों का एक समूह होता है जिसके द्वारा राज्य का निर्माण और शासन होता है। संविधान शक्ति और उसके मौलिक वितरण को स्पष्ट करता है। क़ानून का निर्माण कौन करेगा, कैसे करेगा यह तय करना भी संविधान का काम है। संविधान बुनियादी नियमों का एक ऐसा समूह तैयार करता है। जिससे समाज के लोगों में समन्वय बने तथा साथ ही साथ एक विश्वास की भावना भी स्थापित हो। भारतीय संविधान ने बुनियादी नियमों का जो समूह तैयार किया है, धर्मनिरपेक्षता उसी समूह का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

डोनाल्ड स्मिथ ने अपनी कृति “इंडिया एज ए सेक्युलर स्टेट” में धर्मनिरपेक्षता को परिभाषित किया तथा राज्य, धर्म और व्यक्ति के बीच के सम्बन्धों को बताने का प्रयास किया है। वे कहते है कि “राज्य धर्मनिरपेक्ष तभी कहा जाएगा, जब उसका अपना कोई धर्म नही होगा, वह यह परवाह नही करेगा कि किसी विशेष धर्म को मानने वाले लोगों की तादाद कितनी है। राज्य व्यक्ति के साथ ऐसा कोई भेदभाव नही करेगा जिसका आधार धर्म हो। व्यक्ति को यह आजादी और अधिकार होगा कि वह अपना धर्म चुन सके। राज्य की इसमें कोई भूमिका नही होगी।”[i]

स्मिथ धर्मनिरपेक्षता के मसले पर राज्य, धर्म और व्यक्ति की कड़ी को एक चेन की तरह देखते है। जो आपस में एक-दूसरे से जुड़े हुए है लेकिन जुड़े रहने के बावजूद इनमे कुछ मौलिक अंतर है। राज्य का धर्म नहीं होना चाहिए, यदि राज्य का धर्म नहीं होगा तो धार्मिक पक्षपात का सवाल ही उत्पन्न नही होगा। दूसरी ओर व्यक्ति को अपनी आस्था और धर्म चुनने की पूरी आज़ादी होगी लेकिन इस चुनने की प्रक्रिया में राज्य कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा। धर्मनिरपेक्षता के मुद्दे पर स्मिथ की यह चेन एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास को बनाए रखने का एक साधन है।

धर्मनिरपेक्षता के पश्चिमी प्रतिमान पर डॉ. मधु दमानी कहती है कि “यह प्रतिमान धर्म एवं राज की सत्ता के सम्बन्ध को अलग करके स्फ्ष्ट करते है और फिर इस स्पष्टता की ओर प्रेरित करते है। राजसत्ता धर्म के किसी भी मामले में हस्तक्षेप नहीं करेगी और इसी प्रकार धर्म राजसत्ता के मामले में हस्तक्षेप नहीं करेगा|”[ii]

एक लोकतंत्र में धर्म और राजसत्ता को एक वैचारिक दूरी बनाकर रहने की आवश्यकता है। जब धर्म और राजसत्ता के बीच दूरी होगी तभी उन दोनों के बीच की दूरी में स्थित जनता आज़ादी के साथ सुरक्षित रह पाएगी। राजसत्ता की कोशिश होनी चाहिए कि वह नीति-निर्माण के दौरान किसी धर्म विशेष को आधार ना बनाए और धर्म को चाहिए कि वह नीति-निर्माण में कोई हस्तक्षेप ना करे ताकि नीति-निर्माण की प्रक्रिया द्वारा विभिन्न सम्प्रदायों में कोई मतभेद उत्पन्न न हो।

पंडित नेहरु ने धर्मनिरपेक्षता के प्रश्न पर कहा था- “सभी धर्मों को राज्य द्वारा समान संरक्षण देना ही धर्मनिरपेक्षता है|” नेहरु की कल्पना में एक ऐसा धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र था कि जो सभी धर्मों को समान संरक्षण प्रदान करे ताकि समाज का सुधार एक सही दिशा में हो सके। पंडित नेहरु के लिए धर्मनिरपेक्षता का अर्थ “सभी प्रकार की सामुदायिकता का पूर्ण विरोध भी था। बहुसंख्यक समुदाय की साम्प्रदायिकता की आलोचना में वे खासतौर पर कठोरता बरतते थे क्योकि इससे राष्ट्रीय एकता पर खतरा उत्पन्न होता था|”[iii]

नेहरु धर्मनिरपेक्षता को न केवल समाज सुधार के एक माध्यम के रूप में देखते थे बल्कि उनके लिए धर्मनिरपेक्षता एक ऐसी आवाज़ थी, जिसके बूते वे बहुसंख्यक समुदाय की साम्प्रदायिकता का विरोध करते थे। आज़ादी के दौर को यदि देखा जाए तो हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन ने उपनिवेशी ताकत के विरोध के लिए सभी धर्मों के लोगों को एकत्र किया था और इस राष्ट्रीय आन्दोलन ने सभी धर्मों को समान तवज्जों देते हुए आज़ादी की लड़ाई लड़ी थी। धर्मनिरपेक्षता का एक अति महत्वपूर्ण पहलू हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन से उत्पन्न हुआ था।

भारत में राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय आन्दोलन ;-

1857 के संग्राम को भारतीय इतिहास का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम माना जाता है। कुछ लेखक इस स्वतन्त्रता संग्राम को सैनिक विद्रोह मानते है। अंग्रेजों ने कैदियों की हत्या बिना न्यायिक कार्यवाही के कर दी। अंग्रेजों के इस अमानवीय व्यवहार के प्रति पूरा भारतवर्ष प्रतिरोध के लिए एक हुआ और यही एकता राष्ट्रवाद की जननी रही|

“राष्ट्रवाद एक भावना है जो किसी व्यक्ति के अंदर उसके राष्ट्र के प्रति होती है, जो उस राष्ट्र के गौरवमयी इतिहास से जुडी होती है। भारत के संदर्भ में ये और गहरी तब हो जाती है, जब ये भावना आज़ादी की लड़ाई से खुद को जोड़ लेती है। भारत जैसे तीसरे विश्व के देश के लोगों में राष्ट्रवाद की भावना का विकास आज़ादी की लड़ाई के दौरान उत्पन्न हुआ|”[iv]

भारत विविधताओं से भरा हुआ देश है। जहां कई धर्मों के लोग और कई जातियों के लोग वास करते है। इस देश की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक संरचना अन्य देशो से एकदम भिन्न है इसीलिए भारतीय राष्ट्रवाद और उसके उदय के पहलू बाकी देशों से भिन्न है।

“भारतीय राष्ट्रवाद का विचार ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक विरोधी औपनिवेशिक आन्दोलन के रूप में पैदा हुआ था। भारतीय राष्ट्रवाद द्वारा ही 1947 में राष्ट्रीय स्वतन्त्रता के लिए नेतृत्व किया गया था|”[v] अंग्रेजों के आने से और उनके शासन की स्थापना ने भारत में कई बदलाव किए। भारत की जनता ने इन सभी बदलावों को अपने सामने घटित होते हुए देखा। इन बदलावों के प्रति और ब्रिटिश शासन के तानाशाही रुख के प्रति भारत की जनता में विचार पनपने लगे थे| अंग्रेज़ी शासन ने जब अपनी क्रियाओं के माध्यम से हदें पार कर दी तब भारतीय जनता के विचार प्रतिक्रिया स्वरूप सामने आए जिसके परिणामस्वरूप भारत में राष्ट्रीय विचारों का जन्म हुआ।

भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन शुरू से ही गरीबों के पक्ष में खड़ा था। राष्ट्र के निर्मित होते सभी पहलुओं को ये राष्ट्रीय आन्दोलन विकसित कर रहा था| भारत के इस राष्ट्रीय आन्दोलन का नेतृत्व भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने किया। ये वो दौर था जब गांधी जी एक ऐसे नायक के रूप में उभर रहे थे जो आम लोगों को केंद्र में लाकर नेतृत्व कर रहे थे।

“गांधी जी के राष्ट्रीय आन्दोलन में प्रवेश से पूर्व भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन की प्रकृति अभिजनवादी थी| इसमें पश्चिमी अंग्रेज़ी शिक्षा प्राप्त लोगों के सीमित वर्ग का प्रभाव था|”[vi] दूसरी तरफ पंडित नेहरु भी धीरे-धीरे एक जननायक के रूप में आगे आ रहे थे| नेहरु एक राष्ट्रवादी थे। नेहरु मानते थे कि लोकतंत्र और नागरिक अधिकार समाजवाद के मूलभूत तत्व है| वे लोकतंत्र के प्रबल समर्थक थे और राष्ट्रीय आन्दोलन के माध्यम से एक ऐसा भारत बनाना चाहते थे जहां लोकतांत्रिक व्यवस्था हो, नागरिक अधिकार हो, समानता हो, आज़ादी हो, सुरक्षा हो विशेषकर अल्पसंख्यकों की सुरक्षा| नेहरु ने हमेशा से ही साम्प्रदायिकता का विरोध किया| नेहरु का विश्वास था कि भारतीय जनता भारतीय इतिहास को देखते हुए धर्मनिरपेक्षता के रास्ते पर ही चलेगी। शुरू से ही राष्ट्रीय आन्दोलन ने उपनिवेशवाद के विरोध में प्रदर्शन किया। राष्ट्रीय आन्दोलन ने समाज के हर पहलू लिंग. धर्म और जाति पर आधारित भेदभाव का जमकर विरोध किया| राष्ट्रीय आन्दोलन ने आम जन की ताकत को भांपा और आन्दोलन में उनकी भूमिका को उच्चतम स्थान देकर उनकी भागीदारी को मजबूत किया| भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन एक ऐतिहासिक घटना थी| उस दौर की सामाजिक स्थिति जनता को लामबंद कर रही थी, वहीं दूसरी ओर नेताओं ने लोगों की चेतना को जगाने का एक महत्वपूर्ण काम किया।

राष्ट्रीय आन्दोलन ने महिलाओं से जुड़े हुए सवालों को भी बड़ी मुखरता के साथ उठाया था। महिलाओं के राजनीतिक अधिकारों, राजनीतिक बराबरी और समानता के मुद्दों को लेकर भी राष्ट्रीय आन्दोलन काफी सक्रिय था। गांधीवादी आन्दोलन में महिलाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। “1930 के नमक सत्याग्रह आन्दोलन में कुल 80 हजार जेल भेजे जाने वालों में 17 हजार महिलाएं थी।”[vii]

वर्तमान में राष्ट्रवाद-

एक राष्ट्र के अंदर उसका एक इतिहास होता है, भाषा होती है, धर्म होते है और कुछ राष्ट्रीय प्रतीक भी होते है| उदहारण के लिए झंडा, राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत और राष्ट्रीय चिन्ह इत्यादि। ये सभी पहचान और खासकर राष्ट्रीय प्रतीक उस राष्ट्र के गौरवमयी इतिहास को बताते है। सुधा सिंह जी कहती है कि “आज राष्ट्र की पहचान के विविध रूपों में से केवल राष्ट्र के प्रतीकात्मक रूपों को चुन कर उस पर बहस हो रही है।”[viii]

मौजूदा दौर में यदि हम राष्ट्रवाद की बहस को देखें तो हम पाएंगे कि यह बहस राष्ट्र के प्रतीकों यानि राष्ट्रीय चिन्ह, झंडा, राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत और नारों के इर्द-गिर्द ही सिमट कर रह गई है। राष्ट्रवाद की यह मौजूदा बहस राष्ट्र की वर्तमान समस्यायों और उसके विकास के पहलू से भटकती हुई दिखाई दे रही है| पश्चिम के राष्ट्रवाद और भारतीय राष्ट्रवाद में एक बेहद बड़ा अंतर है। जहां एक ओर पश्चिम का राष्ट्रवाद एक भाषा, एक धर्म और एक नस्ल को लेकर पनपा था, वहीं दूसरी ओर भारतीय राष्ट्रवाद औपनिवेशिक ताकतों के विरुद्ध एक भावना के रूप में पनपा था। भारतीय राष्ट्रवाद के मूल में विविधताएं विराजमान थी। यह विविधताएं धर्म, भाषा और जाति इत्यादि को लेकर थी।

अंग्रेजों का विरोध करते हुए उस दौर के भारतीय समाज ने अपने लिए कुछ राष्ट्रीय प्रतीक निर्धारित किए ताकि विविधताओं से भरी हुई भारतीय जनता को इन प्रतीकों के माध्यम से एक किया जा सके लेकिन ये प्रतीक भारतीय राष्ट्रवाद का माध्यम थे न कि उसका मूलाधार।

भारत के राष्ट्रीय आन्दोलनकारियों ने इन प्रतीकों के माध्यम से उपनिवेशी राज के खिलाफ भारतीय जनता को एक किया और भारतीय जनता एक भी हुई लेकिन एक लम्बे समय तक इन प्रतीकों से खुद को जोड़े रखना भारतीय राष्ट्र और राष्ट्रवाद दोनों के लिए एक ज़ोखिम भरा कार्य होगा| भारतीय राष्ट्रवाद अपने साथ विविधताओं को लेकर चला है ऐसे में इन प्रतीकों को जबरन लोगों के ऊपर थोपना एक उग्र राष्ट्रवाद को जन्म देगा, जो भारतीय लोकतंत्र के लिए खतरनाक साबित होगा।

यदि हम 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को देखे तो साफ़ है कि यह संग्राम अपने आप में एक जन आन्दोलन था| इस जन आन्दोलन में कई ऐसे पहलू थे जो खुद में जनतांत्रिक थे जैसे कि सभी धर्मों के लोगों ने, सभी जातियों के लोगों ने और सभी वर्गों के लोगों ने इसमें भागीदारी की थी। सुधा जी कहती है कि “ यहाँ तक कि लैंगिक भेद से ऊपर उठ कर यह लड़ाई लड़ी गयी थी|”[ix]

1857 के संग्राम ने और इस संग्राम में भारतीय जनता की एकता यानी राष्ट्रवाद ने अंग्रेजों को झकझोर कर रख दिया था| हालांकि अंग्रेज़ 1857 के इस संग्राम को कुचलने में सफल रहे लेकिन उन्होंने भारतीय जनता की एकता की ताकत को भांप लिया था| अंग्रेजों ने भारतीय जनता की एकता को तोड़ने के लिए विभाजनकारी नीति को अपनाया और इस विभाजनकारी नीति ने भारतीय राष्ट्रवाद पर लगातार प्रहार किया| 1947 से पूर्व भारतीय जनता का एकमात्र ही लक्ष्य था – “भारत की आज़ादी”। एकमात्र लक्ष्य होने के कारण कई ऐसे मुद्दे थे, जिनपे या तो ध्यान नही दिया गया या उन्हें आज़ादी की मजबूरीवश दरकिनार किया गया। जिनमे प्रमुख थे आर्थिक विकास, जातिय व्यवस्था को तोड़ना दलितों और अल्पसंख्यकों के मुद्दे। आज हमे इस बात की जरुरत है कि राष्ट्रवाद के प्रतीकात्मक चिन्हों की बहस से पीछे हटकर इन सभी मुद्दों पर ध्यान दे।

भारतीय राष्ट्रवाद आज़ादी के उदेश्य और सामाजिक सुधारों के लक्ष्य के साथ आया था। आज़ादी तो प्राप्त हो गयी लेकिन सामाजिक सुधार के लक्ष्य आज भी अधूरे है।

देशद्रोही , देशभक्त और हिंसा-

अभिव्यक्ति की आज़ादी एक लोकतंत्र के लिए प्राणवायु के समान होती है। एक लोकतंत्र की मजबूती का पता इस बात से भी लगाया जा सकता है कि उस लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आज़ादी कितनी सशक्त है और उसकी सीमाएं क्या है? एक लोकतंत्र में जनता को सहमत और असहमत होने का दोनों ही अधिकार है लेकिन अभिव्यक्ति की आड़ में हिंसा को एक लोकतंत्र में कोई स्थान नही है। राकेश सिन्हा जी कहते है कि “राष्ट्रभक्ति पर बहस करने का अधिकार उन लोगों को नहीं है, जो हिंसा की राजनीति या हिंसा की बात करते है साथ ही जो देश को चुनौती देता है, जो देश को मिटा देना चाहता है, चाहे वह किसी भी दल या विचारधारा का हो, वह देशद्रोही है। अगर कोई व्यक्ति बहुत सारी बातों का विरोध करते हुए भी अस्मिता की रक्षा के लिए, सभ्यता की रक्षा के लिए लड़ता है तो वह देशभक्त हो सकता है|”[x]

हिंसा के बूते किसी व्यक्ति की देशभक्ति या फिर उसके देशद्रोही होने को परिभाषित नही किया जा सकता है। देशभक्ति और देशद्रोह को एक बड़े संदर्भ में देखने की जरुरत है, महज़ किसी बात से या किसी विचार से असहमत होने को हम देशद्रोह के दायरे में नहीं रख सकते और न ही जबरन चंद नारों को बुलवा देने से देशभक्ति साबित हो जाती है। देशभक्ति व्यक्ति विशेष यानि उस देश के नागरिक से सम्बद्ध होती है। नागरिक वो होता है जो अलग-अलग रूपों में होकर एक राष्ट्र का निर्माण करता है और राष्ट्रवाद वह भावना है जो देश की जनता को संगठित करती है| जहां तक एक राष्ट्रवाद देश की जनता को संगठित करने के लक्ष्य तक सीमित है तबतक वह राष्ट्रवाद सच्चे अर्थों में सही है, इसके इतर जहां एक राष्ट्रवाद प्रतिस्पर्धा करते हुए उग्रता का रूप धारण कर लेता तो वह एक फासीवादी ताकत में परिवर्तित हो जाता है जो किसी भी राष्ट्र के लिए घातक हो सकता है| हिंसा, राजनीति में न तो वैकल्पिक राजनीति को उभरने देती है और न ही वैकल्पिक विचारधारा को। विविधताओं से भरे हुए लोकतंत्र के विकास के लिए वैकल्पिक राजनीति और वैकल्पिक विचारधारा का होना बेहद ही जरुरी है अन्यथा एक लोकतंत्र की राजनीति में एक ही पार्टी और एक ही विचारधारा का वर्चस्व हो जाएगा जो किसी भी वक़्त निरंकुशता को जन्म दे सकता है।

निष्कर्ष :-

संस्कृति और सभ्यता में अंतर होता है। संस्कृति किसी मनुष्य यानि व्यक्तिविशेष के अच्छे गुणों और अच्छे विचारों का मूलाधार होती है। जब एक मनुष्य के अच्छे गुणों और अच्छे विचारों को एक मानव समाज अपना लेता है तो वह संस्कृति सभ्यता में परिवर्तित हो जाती है। संस्कृति व्यक्तिविशेष का मसला होती है और सभ्यता समुदाय से जुडी रहती है । भारत का राष्ट्रवाद कई विविधताओं को लेकर आया था। विविधता ही भारतीय राष्ट्रवाद का आधार है। भारतीय राष्ट्रवाद वह भावना थी जिसने अंग्रेजों के खिलाफ भारतीय जनता को संगठित किया। आज़ादी के दौर में एक-एक व्यक्ति ने स्वेच्छा से अपने निजी जीवन से ऊपर उठकर राष्ट्रीय आन्दोलन में भागीदारी की और योगदान दिया इसलिए भारत के राष्ट्रवाद को एक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद भी कहा जा सकता है क्योंकि इसके मूल में एक-एक व्यक्ति का योगदान है| इस सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में हर एक तबके को, हर एक धर्म को समान जगह है क्योंकि इस सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की एक ही पहचान है और वो पहचान है भारतीयता की। संस्कृति से सभ्यता जन्म लेती है और सभ्यता कई समुदायों का मिलन होती है। भारतीय राष्ट्र के निर्माण में कई सभ्याताओं का अपना एक विशेष योगदान है इसलिए भारतीय राष्ट्र को एक सभ्यताई राष्ट्र भी कहा जा सकता है|

संदर्भ ग्रन्थ:-

1. Smith Donald Eugene(1963), India as a secular state; Princenton University[1] Press.

2. सम्पादक ,चौधरी बासुकी नाथ, कुमार युवराज(2013), “आज का भारत, राजनीति और समाज” ओरियंट ब्लैकस्वान प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली।

3.

सम्पादक ,चौधरी बासुकी नाथ, कुमार युवराज(2013), “आज का भारत, राजनीति और समाज” ओरियंट ब्लैकस्वान प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली।

4. सम्पादक, सिंह अभय प्रसाद (2013), “भारत में राष्ट्रवाद” ओरियंट ब्लैकस्वान प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली।

5. G. Aloysius (1997), Nationalism without a nation in India, Oxford University Press, New Delhi.

6. Judith M. Brown, (1972), Gandhi’s Rise to Power: Indian Politics, Cambridge University Press.

7. Jayawerdena, kumari, (1987), Feminism and Nationalism in the Third World, London; Zed Press.

8. सिंह सुधा, राजनीति: समावेशी राष्ट्रवाद बनाम प्रतीकवाद, 14 मार्च 2016

http://www.jansatta.com/politics/inclusive-nationalism-versus-symbolism/76634/

9. सिंह सुधा, राजनीति: समावेशी राष्ट्रवाद बनाम प्रतीकवाद, 14 मार्च 2016

http://www.jansatta.com/politics/inclusive-nationalism-versus-symbolism/76634/

10. सिन्हा राकेश, जनसत्ता, बारादरी, रविवारीय स्तंभ, 7 मार्च 2017

http://www.jansatta.com/sunday-column/rss-thinker-rakesh-sinha-interview-over-students-union-vs-rss-ideology/268022/

भारतीय राजनीति: दशा और दिशा

भोला नाथ सिंह

वर्तमान समय में राजनीति का पतन पराकाष्ठा पर है। आज़ सभी राजनैतिक दलों का एक ही ध्येय है - सत्ता पर काबिज़ होना। इस के लिए उटपटाँग बयान देते हुए उन्हें शर्म भी नहीं आती है। किसी भी दल के पास कोई दृष्टिकोण नहीं है। सब एक दूसरे पर आरोप मढ़ने में अपनी बहादुरी दिखा रहे हैं। वे क्या करेंगे, कैसे देश को प्रगति के पथ पर आगे ले जाएँगे , इसके विषय में कुछ भी नहीं कहते।

हमारे देश के संविधान ने सभी नागरिकों को चुनाव लड़ने का अधिकार दिया है। चाहे वह अनपढ़ -गँवार, अंगूठा छाप हो या उच्च योग्यताधारी हो। इस कारण अधिकतर कम पढ़े-लिखे लोग संसद में पहुँच जा रहे हैं। ऐसे लोगों से बहुत अच्छा काम एवं अच्छे व्यवहार की अपेक्षा नहीं की जा सकती है।

जनता भी सारे गलत कार्यों के लिए सरकार को जिम्मेदार मान लेती है। न भी माने तो उसे मानने के लिए विवश कर दिया जाता है। हर दिन उसे एक ही बात बताई जाती है कि सारे अपराधों का कारण सरकार ही है। कैसे और क्यों, इसके विषय में कुछ भी नहीं बताया जाता। यानी हमारा काम सिर्फ़ दोष गिनाना है कारण बताना नहीं।

भारतीय जनता अभी इतनी शिक्षित एवं समझदार नहीं हुई है कि वह स्वयं आकलन कर सके। तर्क-वितर्क कर सही निष्कर्ष पर पहुँचे। ऐसे में नेताओं का दायित्व बनता है कि वे सही तथ्यों को जनता के सम्मुख रखें। परंतु यह देश का दुर्भाग्य है कि कोई नेता ऐसा करना नहीं चाहता। वे जनता को बरगला कर अपना उल्लू सीधा करने में जुटे रहते हैं।

भारतीय राजनीति में जाति-धर्म का दुरुपयोग खूब होता है। नेता जनता की इस कमज़ोर नब्ज़ को भलीभांति पहचानते हैं। कोई अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण में लगा है तो कोई किसी जाति विशेष को संतुष्ट करने में। ये नेता यह कभी नहीं कहते कि इस देश में सबको समान अधिकार मिलेगा। जाति और धर्म के नाम पर किसी को विशेष दर्ज़ा नहीं दिया जाएगा। न कोई विशेष प्रावधान होगा न कोई आरक्षण। संपूर्ण भारत के नागरिकों के लिए एक समान अवसर एवं कानून होंगे।

आज़ बहुत से देश प्रगति पथ पर अग्रसर हैं। आज़ादी के ७२ सालों बाद भी हम विदेशों से हथियार एवं उपकरण खरीदने को बाध्य हैं। क्यों ? क्योंकि हमारे शासकों ने कभी देश को समृद्ध करने के बारे में सोचा ही नहीं। उन्हें तो बस अपनी कुर्सी की फिक्र रही। अपना वोट बैंक तैयार करने में लगे रहे। ऐसे-ऐसे नियम बनाए गए जिनका विकास से दूर-दूर तक का नाता नहीं था। था तो बस वोट बैंक बनाने से।

जनता नाराज़ न हों इसके लिए खै़राती योजनाएँ चलाई गईं। जनता ने कभी यह जानने की कोशिश भी नहीं की कि इसके लिए धन कहाँ से आएगा। एक प्रकार से जनता को भ्रष्ट और कामचोर बनाने का प्रयास किया गया।और वे इसमें सफल भी रहे। आज फिर कहा जा रहा है कि कोई दो हजार हर माह देगा तो कोई छह हजार। ज़ुबां फिसली और कह दिया बहत्तर हजार हर महीने। यह मज़ाक नहीं तो और क्या है ?

गड़े मुर्दे उखाड़ने में हमारे नेताओं को खासे महारत हाशिल है। भाई जो है ही नहीं उसके बारे में बोलकर क्या करोगे ? न वे वोट लेने आएँगे न देने। कुर्सी पर भी वे बैठेंगे नहीं। जो वर्तमान समय में हैं उनकी बात करो और वह भी मर्यादित ढंग से। तुम हमारे प्रतिनिधि हो या बनने जा रहे हो। तुम्हारा आचरण ऐसा हो कि हम गर्व कर सकें ना कि कहीं भी हमारा सिर शर्म से झूकने को विवश हो।

नेतागिरी आज एक पेशा बन गया है। जिसे भी बिन मेहनत के धन कमाने की लालशा है वही इस क्षेत्र में उतर पड़ता है। इन नेताओं के सुख-सुविधा में हजारों करोड़ सालाना खर्च होता है जो जनता की ज़ेब से आता है। आज़ तक किसी नेता ने इस पर आपत्ति नहीं जताई बल्कि ऐसे प्रस्ताव ध्वनि मतों से पारित होते रहे। नेताओं की दोगली चरित्र यहाँ उजागर हो जाती है पर जनता सोती रहती है।

नेताओं के बिना मेहनत के ठाटबाट ने जनता को इतनी आकृष्ट किया है कि वह भी बिन मेहनत के आराम की जिंदगी जीने के बारे में ही रातदिन सोचती रहती है। धोखा देने वाला स्वयं को होशियार समझता है। उसे अपने चारित्रिक पतन पर मलाल नहीं बल्कि फ़ख्र महसूस होता है। सरकारी नौकरी आराम का पर्याय बन गई है। आज़ सरकारी संस्थाओं पर से लोगों का विश्वास उठता जा रहा है।

कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग हैं जो अपनी फिलासफ़ी दूसरों पर थोपने से बाज़ नहीं आते। माना कि आप किसी दल के समर्थक हैं या किसी उम्मीद्वार का समर्थन करते हैं पर यह जरूरी तो नहीं कि सभी उन्हीं का समर्थन करें। आपके अपने विचार हैं । किसी पर थोपने की ज़रूरत नहीं है।

यही हाल मीडिया का भी है। कोई पत्रकार किसी दल से खफ़ा है तो उसकी बुराई करने में लगा रहता है। आपका काम सही तथ्यों को प्रस्तुत करना है।आप खुद ही आरोप लगा के हैं और खुद ही सफ़ाई भी देते हैं। यह 'मीडिया' की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करता है।

मतदान करना अलग बात है और सोच समझ कर सही उम्मीद्वार का चयन करना अलग। पर यहाँ भी जाति, धर्म और क्षेत्र बाज़ी मार ले जाते हैं। यह स्वस्थ लोकतंत्र के लिए घातक है।

दलों को चाहिए कि वे अपने सोच, अपनी योजनाओं के साथ मैदान में आएँ। ऐसे बयान न दें जिससे देश कमज़ोर होता हो। आपसी मतभेद देश पर हावी नहीं होने चाहिए। पर लगता है किसी दल के पास कोई मुद्दा ही नहीं है। बस दूसरे को नीचा दिखाना ही इनका एक मात्र उद्देश्य बचा रह गया है। जनता आपस में तू-तू, मैं-मैं करने में मशगूल है।

चुनाव में संवैधानिक पदों पर भी लांछन लगाए जाते हैं। इससे हमार देश की छवि धूमिल होती है, इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए। आरोप लगाना आसान काम है। कोई भी कर सकता है पर इसका उपचार क्या है इसे भी तो सामने रखिए।

जीत जाने के बाद सरकारें अपने मन की करने लगती हैं। इस पर अंकुश कैसे लगे इस पर विचार होनी चाहिए। नोटा का परिणाम सार्थक नहीं रहा। मतदान पचास फ़ीसदी से कम भी रहा तो भी नतीजे निकलेंगे। प्रत्याशी जीतेंगे ही जितने ही वोट पड़े हों। इसका निदान निकलना चाहिए।

एक ऐसी सरकार बने जो जाति-धर्म के आधार पर भेद न करे। सबको समान अवसर मिले। न कोई आरक्षण हो न किसी धर्म को विशेष दर्ज़ा मिले। सबको समान अधिकार मिले। समान अवसर मिले। जिसमें योग्यता है वह पद का अधिकारी बने। आरक्षण के नाम पर वोट बैंक बनाने के लिए अयोग्य व्यक्ति को नियुक्त न किया जाय। देश का विकास ही एक मात्र लक्ष्य हो। सत्ता पाने की लालशा हावी न हो बल्कि देशसेवा की भावना सिर चढ़कर बोले।

नेताओं द्वारा लिए जा रहे सुविधाओं में कटौति हो।अधिकारी भ्रष्ट न हों। उनके भ्रष्टाचार पर अंकुश लगे। जनता का काम आसानी से हो । घूस लेकर अनुचित काम करने वालों की पूरी सम्पत्ति ज़ब्त कर ली जाए। इसके लिए अच्छी और ईमानदार सरकार का होना जरूरी है। जनता जागृत हो और क्षुद्र स्वार्थ से ऊपर उठकर सरकार का चयन करे।

भोला नाथ सिंह

पता- फुटलाही, पत्रालय-बिजुलिया

चास, बोकारो-८२७०१३ ( झारखण्ड)

मो० नं०-०९३०४४१३०१६


पोस्ट-ट्रूथ पॉलिटिक्स

डॉ. हेमंत कुमार झा

एसोसिएट प्रोफेसर


पाटलीपुत्र विश्वविद्यालय, बिहार

हालिया वर्षों में दुनिया में तीन ऐसी घटनाएं हुईं जिन्हें 'पोस्ट-ट्रूथ पॉलिटिक्स' से जोड़ कर देखा गया। पहला, अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प का राष्ट्रपति बन जाना, दूसरा, यूरोपीय संघ से ब्रिटेन के अलग होने का फैसला और तीसरा, भारत में नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्री बन जाना।

इन घटनाओं ने 'पोस्ट ट्रूथ' को इतना चर्चित शब्द बना दिया कि ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी ने इसे वर्ष 2016 का 'वर्ड ऑफ द ईयर' घोषित कर दिया।

विचारकों ने तो इस दौर को ही 'Post-truth era' यानी 'उत्तर-सत्य युग' कहना शुरू कर दिया, क्योंकि बीते कुछ दशकों में अंतरराष्ट्रीय राजनीति के संचालन में इस प्रवृत्ति का प्रभाव बढ़ता गया है। 1990 के दशक में अमेरिकी नेतृत्व में नाटो का खाड़ी युद्ध में उतर पड़ना और इराक को बर्बाद कर देना पोस्ट-ट्रूथ पॉलिटिक्स का एक शुरुआती अध्याय माना गया।

ट्रंप और मोदी की जीत के साथ ही ब्रेक्जिट ने साबित किया कि पोस्ट ट्रूथ पॉलिटिक्स अब दुनिया के सिर चढ़ कर बोल रही है। सत्य कहीं पीछे छूटता गया और कृत्रिम धारणाओं की निर्मिति से राजनीतिक उद्देश्यों की प्राप्ति अब राजनीति की प्रधान प्रवृत्ति बन चुकी है।

'Post-truth era' यानी 'उत्तर-सत्य युग' को परिभाषित करते हुए ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी कहता है..."ऐसा युग, जिसमें वस्तुगत सत्य की जगह

काल्पनिक या आरोपित सत्य लोगों की धारणाओं के निर्माण में सहायक हो रहे हों...।"

भारतीय राजनीति के वर्त्तमान दौर और उसमें नरेंद्र मोदी की भूमिका का व्यापक मूल्यांकन करें तो ऐसे निष्कर्ष सहज ही सामने आने लगते हैं जिनमें हम पाते हैं कि किस तरह उन्होंने और उनके चुनाव प्रबंधकों ने झूठ की खेती कर न सिर्फ राजनीतिक फसल काटी बल्कि जनहित से जुड़े वास्तविक मुद्दों को पूरी तरह नेपथ्य में धकेल दिया।

सत्य कहीं हाशिये पर पड़ा है और झूठ विजयी भाव से अट्टहास कर रहा है। कृत्रिम धारणाओं की निर्मिति ने अधिकतर मतदाताओं की मति हर ली है और वे सही-गलत या सत्य-असत्य का भेद नहीं कर पा रहे।

मोदी के नेतृत्व में भाजपा की चुनावी सफलताओं में कृत्रिम धारणाओं के निर्माण की बड़ी भूमिका रही है और इसलिये दुनिया भर के विचारकों का बड़ा वर्ग नरेंद्र मोदी को पोस्ट-ट्रूथ पॉलिटिक्स की उपज मानता है।

ट्रंप की जीत ने दुनिया को सकते में डाल दिया था और उनके 'अमेरिका फर्स्ट' के नारे ने वैश्वीकरण के अध्येताओं को दुविधा में डाल दिया था। ट्रंप ने वैश्विक राजनीति और उसमें अमेरिकी भागीदारी को नए सिरे से परिभाषित करना शुरू किया और इसे अमेरिकियों के हित मे बताना शुरू किया।यही उनका मुख्य चुनावी एजेंडा भी था। इसके लिये भ्रामक आंकड़ों और धारणाओं का जम कर उपयोग किया गया।

इन राजनीतिक घटनाक्रमों को अमेरिकी बौद्धिक समाज ने गहरे संदेह की नजर से देखा और जीवित किंवदंती बन चुके वयोवृद्ध विचारक नाओम चोम्स्की ने ट्रम्प के नेतृत्व वाली सरकार को "इतिहास की सर्वाधिक मानव द्रोही सरकार" की संज्ञा से नवाजा।

नरेंद्र मोदी की सरकार के प्रति भी चोम्स्की की धारणा कुछ ऐसी ही बनी जिसे उनके अनेक साक्षात्कारों में देखा जा सकता है। यानी , ऐसी सरकार जिसके कार्यकलापों से मनुष्यता खतरे में पड़ने लगे।

बहरहाल, ट्रम्प की तो उल्टी गिनती जल्दी ही शुरू हो गई जब अनेक सर्वे में ऐसे तथ्य सामने आने लगे कि उनकी लोकप्रियता में ह्रास की गति पूर्ववर्त्ती राष्ट्रपतियों की तुलना में सर्वाधिक है। अमेरिकी समाज अपने बौद्धिकों की बातों को गंभीरता से लेता है और जल्दी ही ट्रम्प के फैसलों और कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगने शुरू हो गए। अमेरिकी संस्थाओं ने भी ट्रंप के अनेक निर्णयों और कार्यप्रणाली का सजग विरोध किया। यह सिर्फ सजग ही नहीं, बल्कि सक्षम विरोध भी था, क्योंकि अमेरिकी लोकतंत्र परिपक्व है और वहां की संस्थाएं सत्ताधारियों की पिछलग्गू नहीं हुआ करतीं।

यद्यपि, संस्थाओं के प्रतिरोध और जनमत की सजगता ने ट्रम्प को अपनी नीतियों और कार्यप्रणाली में अनेक बदलाव लाने को बाध्य किया है, तथापि, कयास लगाए जाने लगे हैं कि ट्रम्प को अगला कार्यकाल शायद न मिले।

उधर, ब्रेक्जिट के मामले से ब्रिटेन की राजनीति में गहरे उथल-पुथल का दौर जारी है। प्रधानमंत्री टेरेसा मे और ब्रिटिश संसद इस मसले को सुलझाने में लगे हैं। धारणाओं की राजनीति अब जमीनी हकीकतों से रूबरू हो रही है।

लेकिन भारत में...?

जहां अमेरिकी और ब्रिटिश समाज अपने राजनीतिक घटनाक्रमों को लेकर गहरे आत्ममंथन के दौर से गुजर रहा है वहीं भारत में 'पोस्ट-ट्रूथ पॉलिटिक्स' की फसल नए सिरे से लहलहा रही है। नरेंद्र मोदी और उनके चुनाव प्रबंधक नए सिरे से भ्रामक धारणाओं का एक कृत्रिम माहौल रच रहे हैं।

बीते 5 वर्षों ने मोदी की "कृत्रिम और आरोपित धारणाओं पर आधारित जनविरोधी राजनीति" की एक-एक परतों को उघड़ते हुए देखा है, लेकिन, अपने अगले कार्यकाल के लिये चुनावों की देहरी पर खड़े मोदी फिर उन्हीं तौर-तरीकों को लेकर देश के कोने-कोने का चक्कर लगा रहे हैं।

इन 5 वर्षों में लोकतंत्र की स्तम्भ मानी जाने वाली भारतीय संस्थाओं की दुर्गति होती गई। जहां अनेक अमेरिकी संस्थाएं ट्रम्प के सामने अवरोध की दीवार बन कर खड़ी हुईं, भारत में वे नतमस्तक की मुद्रा में आती दिखीं।

रक्षा संस्थानों को राजनीतिक उपकरण बना कर उनसे दलगत या वैयक्तिक लाभ उठाने की प्रवृत्ति तो सबसे आपत्तिजनक है, लेकिन इन हरकतों का जितना राष्ट्रव्यापी विरोध होना चाहिये था, उसका शतांश भी नजर नहीं आया। अवसन्न विपक्ष जन चेतना और प्रतिरोध की अभिव्यक्ति में नितांत अक्षम साबित हुआ और उसकी इस अक्षमता ने भारतीय राजनीति की कलई उतार कर रख दी।

सीबीआई, प्रवर्त्तन निदेशालय, आयकर विभाग आदि पहले के दौर में भी सत्ता के अनुगामी रहे लेकिन मोदी राज में इनकी हैसियत सत्ताधारियों की कठपुतली संस्थाओं में तब्दील हो गई।

विश्वव्यापी आर्थिक मंदी के दौर में भी भारतीय अर्थतंत्र को अपनी धुरी पर बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभाने वाला बैंकिंग सिस्टम मोदी राज में अपनी विश्वसनीयता तो खो ही चुका है, इतना खोखला भी हो चुका है कि इससे संबंधित रिपोर्ट्स पढ़ने पर भविष्य की आशंकाएं भय का संचार करती हैं।

सबसे सटीक और प्रासंगिक उदाहरण चुनाव आयोग का ही लें। उस पर इतने सवाल उठ रहे हैं कि इसकी विश्वसनीयता गम्भीर संकट में है। कोई मुख्यमंत्री राजनीतिक रैली में भारतीय सेना को "मोदी जी की सेना" बता रहा है तो कोई राज्यपाल सार्वजनिक तौर पर "मोदी जी को जिताने" की अपील कर रहा है और चुनाव आयोग एक औपचारिक चेतावनी के हास्यास्पद कदम से आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं दिखा पा रहा।

दुनिया के अनेक नामचीन अर्थशास्त्रियों ने भारत सरकार पर आरोप लगाया कि उसके द्वारा जारी किए जा रहे आर्थिक आंकड़े भ्रामक तथ्यों पर आधारित होते हैं और यह मतदाताओं की आंखों में धूल झोंकने के सिवा कुछ और नहीं। लेकिन, मुख्यधारा की भारतीय मीडिया का अधिकांश हिस्सा चारण की भूमिका में प्रस्तुत होकर झूठ की इस खेती में खाद डालने का स्वामिभक्त प्रयास करता रहा है।

सर्वत्र अराजक और भ्रामक तथ्यों का बोलबाला है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया बार-बार इस तथ्य को रेखांकित करता रहा कि बालाकोट में हुए एयर स्ट्राइक में आतंकवादियों को कोई हानि नहीं हुई, लेकिन, हमारे चैनल वहां साढ़े तीन सौ मौतों और सैकड़ों मोबाइल सेटों के सिग्नल्स का निर्लज्ज हवाला देते रहे।

आंकड़े बताते हैं और असलियत भी सामने है कि रोजगार सृजन में मोदी सरकार नितांत असफल साबित हुई है लेकिन वित्त मंत्री और प्रधानमंत्री अपने प्रायोजित साक्षात्कारों में रोजगार बढ़ने के गलत तथ्य प्रस्तुत करते बिल्कुल नहीं शर्माते। वे तो आज भी नोटबन्दी को ऐतिहासिक कदम बताते बिल्कुल नहीं लजाते, जबकि उसके हाहाकारी दुष्परिणाम देश-दुनिया के सामने हैं।

इसे ही कहते हैं कृत्रिम धारणाओं की निर्मिति पर आधारित "पोस्ट-ट्रूथ पॉलिटिक्स" का जलवा, जो आज भी भारत में सिर चढ़ कर बोल रहा है। सत्य कहीं नेपथ्य में है और झूठ दनदनाते हुए इस शहर से उस शहर, इस राज्य से उस राज्य में रैलियों में गला फाड़-फाड़ कर कृत्रिम सत्य को प्रतिष्ठापित कर रहा है।

कुपोषण, भुखमरी, अशिक्षा, बेरोजगारी, बिना इलाज के मरते बच्चों आदि भयानक समस्याओं से जूझते इस निर्धन बहुल देश को महाशक्ति बनाने का आह्वान करते नरेंद्र मोदी जिस भ्रामक राष्ट्रवाद की ध्वजा लेकर रैलियों में हुंकार भरते फिर रहे हैं वह इस देश के आम लोगों पर तो भारी पड़ ही रहा है, आने वाली कई पीढियां इसके प्रतिकूल प्रभावों का सामना करती रहेंगी। सांस्कृतिक विभाजन को अगर सत्ता अपना हथियार बना ले तो इससे खतरनाक और कुछ नहीं हो सकता।

मजबूत संस्थाएं, जो लोकतंत्र के स्थायित्व की पहली शर्त्त हैं, को तहस नहस कर, उनके खंडहरों पर खड़े होकर नरेंद्र मोदी अपनी चुनावी रैलियों में "मजबूत सरकार" का नारा देते हैं।

भारत को मजबूत सरकार नहीं, मजबूत संस्थाएं, मजबूत सेना, मजबूत आंतरिक सुरक्षा तंत्र, मजबूत शिक्षा और चिकित्सा तंत्र की जरूरत है। मोदी की 'मजबूत सरकार' के दौर में मोदी-शाह की जोड़ी मजबूत बनी, उनके राजनीतिक बगलगीर मजबूत बने, सत्ता और कारपोरेट का गठजोड़ मजबूत बना, लेकिन जिन्हें मजबूत होना चाहिये था, वे सारे तंत्र कमजोर होते गए।

सरकारें तो आती-जाती रहती हैं, आती-जाती रहेंगी, लेकिन मजबूत व्यवस्थाओं से ही देश मजबूत बनता है। झूठ की खेती कर कोई पार्टी या कोई नेता अपनी राजनीतिक फसल भले ही काट ले, देश तो इससे पीछे ही जाएगा।

क्या भारतीय समाज नरेंद्र मोदी और उनके चुनाव प्रबंधकों के इस पोस्ट ट्रूथ पॉलिटिक्स को समझने में सक्षम है? सदियों से कहावत है कि काठ की हांडी दोबारा नहीं चढ़ती। इन चुनावों में न सिर्फ आम लोगों के वास्तविक हितों से जुड़े सवाल, बल्कि सदियों पुरानी यह कहावत भी दांव पर है।


शिक्षा को गढ़ती राजनीति

कौशलेंद्र प्रपन्न


भाषा एवं शिक्षा शास्त्र विशेषज्ञ

राजनीति आकाश में न तो निर्मित होती है और न ही समाजेत्तर इसका अनुकरण होता है। राजनीति दरअसल समाज और राष्ट्र का नई दिशा प्रदान करने की ताकत से लबरेज़ होती है। मानव विकास के इतिहास और भूगोल को देखें या फिर अर्थशास्त्र या फिर समाज-संस्कृति को उक्त महत्वपूर्ण आयामों को आकार देने में राजनीति की भूमिका निर्विवादतौर पर अहम रही है। राजनीति ने ही समाज के विकास और विस्थापन की स्थितियां भी पैदा की हैं। क्या इस तथ्य से मुंह मोड़ सकते हैं कि राजनीति ही थी जिसने 1947 के विश्व के इतिहास में दर्ज़ सबसे बड़ी तकसीम का अंजाम दिया। कई बार लगता है राजनीति ने शिक्षा को भी कहीं न कहीं प्रभावित करती रही है। आज़ादी से पूर्व और आज़ादी के बाद की शिक्षा नीतियों और राजनीति ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति और दिशा को तय करने में ख़ासा अहम भूमिका अदा की हैं। वह चाहे माध्यमिक शिक्षा समिति हो, कोठारी कमिशन हो, राष्ट्रीय शिक्षा नीति हो, या फिर 1977, 1985,1988, 2000 या फिर 2005 की राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा ही क्यों न हो इन तमाम समितियों, नीतियों के निर्धारण में राजनीति ने अपने छाप छोड़े हैं। दूसरे शब्दां कहें तो शिक्षा में राजनीतिक हस्तक्षेप को नजरअंदाज नहीं कर सकते। प्रकारांतर से राजनीति की दिशा तय करने में व्यक्ति की प्रमुखता भी रेखांकित की जाती रही है। जो भी व्यक्ति सत्ता में आया वह अपने राजनीतिक स्थापनाओं, मान्याओं को शिक्षा की काया में समाहित करने की पुरजोर कोशिश है। इसी का परिणाम है कि शिक्षा में जाने अनजाने वैसे कंटेंट भी शामिल किए गए जो अपने आप में विवादां को जन्म देने वाले थे। किन्तु क्योंकि सत्ता चाहती थी इसलिए उन्हें पाठ्यपुस्तकों का हिस्सा बनाया गया। मिसाल के तौर पर शंगूर

आंदोलन को वर्तमान सरकार पाठ्यपुस्तकों में शामिल कर चुकी है। वहीं दूसरी राजनेता ने अपनी आत्मकथा बच्चों के बस्ते में ठूंस दिया। वह दीगर बात है कि वह आत्मकथा क्या कंटेंट के लिहाज से समीक्षित की गई। किस विद्वत् मंडल ने समीक्षा कर अपनी रिपोर्ट सौंपी की यह आत्मकथा पढ़ने-पढ़ाने योग्य है आदि। इस प्रकार राजनीति व्यक्तियों की आत्मकथाएं पाठ्यपुस्तकों में पहले भी शामिल की जाती रही हैं किन्तु उसका अपना ऐतिहासिक और राजनैतिक विकास यात्रा को समझने के औजार के तौर पर जांचा परखा गया और तब शामिल किया गया। यदि पत्रों की बात बात करें तो नेहरू के ख़तों को बतौर पाठ्य सामग्री में शामिल किया गया है इसे पढ़ते-पढ़ाते हुए कई पीढ़ी बड़ी हुई है। राजनैतिक व्यक्तियों की जीवनियां भी शामिल की गईं जिनमें राजेंद्र प्रसाद, लाल बहादुर शास्त्री, गांधीजी, नेहरू, अब्दुल कलाम आदि। इनकी जीवनियों, संघर्षां से गुजरते हुए कहीं न कहीं हमारे बच्चों को जीवन-संघर्षों की एक झांकी तो मिलती ही है साथ ही भविष्य की रणनीति बनाने में भी मदद मिलती है।

शिक्षा न केवल समाज, बल्कि समाज से जुड़ी हर चीज को आकार दिया करती है। इसे स्वीकारने में ज़़रा भी गुरेज़ नहीं होनी चाहिए कि इस शिक्षा को गढ़ने, आकार देने में राजनीतिक इच्छा शक्ति और पार्टी की बड़ी भूमिका होती है। बल्कि राजनीति शिक्षा की पूरी कुंडली लिखती है। जब जब जो भी सत्ता में आया उसने अपने तई शिक्षा के वर्तमान और भविष्य की रूपरेखा लिखने में पीछे नहीं रहा। एक लंबा इतिहास है जब राजनीति ने शिक्षा की दिशा और दशा को ही मोड़ दिया। ज़्यादा पीछे इतिहास में न भी जाएं तो एक बड़ी राजनीतिक इच्छा शक्ति और राजनीतिक हस्तक्षेप को यहां उदाहरण के तौर पर पेश कर सकते हैं। सन् 2014 में सत्ता में आते ही वर्तमान केंद्र सरकार ने घोषणा की थी कि आगामी एक या दो साल भी अंदर नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति लाएगी। हालांकि यह भी राजनैतिक सच है कि हम हर पांच साल बाद लोकसभा चुनाव में व्यस्त होते हैं। इस व्यस्तता में हम भूल जाते हैं कि हमने पिछली बार क्या क्या घोषणाएं की थीं। उन घोषणाओं के साथ क्या किया यह किसी से भी छूपी नहीं है। सरकार आई और अब नई सरकार गठन का वक़्त भी सिर पर है, लेकिन शिक्षा नीति मालूम नहीं कहां है। जो भी नई सरकार आएगी वह फिर शुरू से इस नीति पर काम करेगी। इस पांच वर्ष में जितने लाभ हासिल करने वाले बच्चे थे वे पांचवीं पास कर छठी कक्षा में और बारहवीं पास कर कॉलेज में चले जाएंगे। कॉलेज से निकल कर जॉब की तलाश में जुट जाएंगे। सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ा कि जो नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति आनी थी उसके न आने से किन किन को किस प्रकार की क्षति हुई होगी। यह तो एक ताजा तरीन राजनीतिक घटना है। इसके अलावा समय समय पर इससे भी बड़ी घटनाएं शिक्षा जगत में घटती रहती हैं। इस ओर न तो सरकार, न राजनीतिक दलों और न नागर समाज के पेशानी पर बल पड़ता है। अपने अपने कार्यकाल संपन्न कर वे तो चले जाते हैं किन्तु पीछे एक बड़ा सवाल ज़रूर छोड़ जाते हैं कि शिक्षा की दशा और दिशा तय करने वाले किस कदर अगंभीर हैं।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति निर्माण का मसला हो या फिर राष्ट्रीय पाठ्यचर्या निर्माण, पाठ्यपुस्तक निर्माण आदि के साथ भी जिस प्रकार की गंभीरता की मांग होती है उसके साथ राजनीतिक शक्तियां अपना दल बल इस्तमाल किया करतीं हैं। वह चाहे 2000 से पूर्व की राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा हो या फिर उसके बाद की इस दस्तावेजों में भी सत्तारूढ़ पार्टियों ने अपनी दूरगामी वैचारिक पूर्वग्रहों को पीरोने में कोई भी कसर नहीं छोड़ी। यही हालत पाठ्यपुस्तक निर्माण में भी देख सकते हैं। समय समय पर वर्तमान राजनीतिक व्यक्ति को पाठ्यपुस्तकों को शामिल करना, पूर्व के पाठों को हटाने का खेल भी खूब खेला गया है। गौरतलब है कि 2000-2002 में फलां पृष्ठ को हटाया गया ढिमका पृष्ठ को न पढ़ाने के फरमान जारी किए गए। इन विवादों में कई बार उच्च न्यायालय को हस्तक्षेप करने पड़े यह दौर है 2002 का। वर्तमान सरकारें चाहे वो केंद्र की हो या फिर राज्य की अपनी अपनी राजनीति उपलब्धि को बच्चों की पाठ्यपुस्तकों ठूंस दिया गया। इसमें बंगाल, राजस्थान, बिहार आदि राज्य सरकारें शामिल हैं। सरकारें कैसे भूल जाती हैं कि सरकारें आती जाती हैं किन्तु पाठ्यपुस्तकें कम से कम पांच दस और पंद्रह साल तक चला करती हैं। इन्हें पढ़कर लाखों बच्चे युवा और प्रौढ़ बन कर समाज में विभिन्न सेवाओं में आते हैं। वे उन्हीं वैचारिक पूर्वग्रहों को अग्रसारित करने में जुट जाते हैं। जबकि शिक्षा वैज्ञानिक सोच और विवेक निर्माण की वकालत करती है। बच्चों में वैचारिक और बौद्धिक विकास में शिक्षा की अहम भूमिका को कदापि नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते।

आज़ादी पूर्व के इतिहास में झांकें तो पाएंगे कि शिक्षा और शिक्षकों की भूमिका और ताकत को हमेशा ही राजनीतिक धड़ों ने अपने हाथों में रखा और उसे अपने स्वार्थ साधक के तौर पर इस्तमाल किया। शिक्षकों की अस्मिता को कमतर करने में भी तत्कालीन सत्ताधारियों ने कोई उठा नहीं रखी। शिक्षकों को नौकरी और वेतनभोगी बनाने के लेकर उन्हें समाज के उस वर्ग में शामिल करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जहां शिक्षक वेतनभोगी होते ही समाज के अन्य वर्गां के विश्वास खोता रहा। विभिन्न शैक्षणिक समितियों ने शिक्षा की दिशा तय की हो या न की हो लेकिन यदि उनकी सिफारिशों पर नजर दौड़ाएं तो पाएंगे कि नीति, मूल्य, आदर्श की जमीन पर बहुत पुख्ता थीं। यह दीगर बात है कि उन्हें कभी भी अमल में नहीं लाया गया। कोठारी कमिटी की सिफारिशों को ही ले लें। हम आज भी कोठारी आयोग की सिफारिशों की दुहाई दिया करते हैं। वह चाहे बजट को लेकर हो, निकट स्कूल व्यवस्था की हो या फिर शिक्षकःबच्चे अनुपात से संबंधित। हमारी सरकारें सिर्फ इन सिफारिशों के साथ मजाक ही करती रहीं। वहीं 1985-88 पुनरीक्षित राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा बड़ी ही शिद्दत से पूर्व प्राथमिक से लेकर प्राथमिक और उच्च प्राथमिक, माध्यमिक आदि शिक्षा में कला शिक्षा को शामिल करती है। यह दस्तावेज़ मानती है और सिफारिश करती है कि कला की शिक्षा के द्वारा अन्य विषयों को पढ़ाया जाए। दूसरे शब्दों में कहें तो कला की शिक्षा को अन्य विषयों में पीरोया जाए ताकि कला अलग से पढ़ाने की आवश्यकता ही न पड़े। किन्तु हमने इसे कभी तवज्जो ही नहीं दिया। इसके पीछे के कारणों की परतें खोलें तो पाएंगे कि वह कहीं न कहीं राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी रही है।

तब की वर्तमान सरकार ही हैं जिसने वैश्विक उदारीकरण और वैश्विक बाजार के लिए शिक्षा के दरवाजे खोले गए थे। तब के शिक्षाविदों, शिक्षाकर्मियों ने कोई ख़ास और सशक्त विरोध नहीं किए। पूरा का पूरा विश्वविद्यालय, शिक्षायी नागर समाज मौन था। यही वो प्रस्थान बिंदु हैं जहां से 1986-88 के आस-पास भारतीय शिक्षा में बाजार और वैश्विक बैंकों के लिए ख़ासकर शिक्षा की दहलीज़ सौंपी गई थी। इस ऐतिहासिक घटना पर तत्कालीन अकादमिक महकमा, कॉलेज, विश्वविद्यालय आदि मौन साधे बैठे थे। तब क्या अनुमान लगा सकते थे कि हमारी सरकारी शिक्षा के समक्ष एक समानांतर शिक्षा संस्थानों की दुकानें खुल जाएंगी जहां आम परिवार का बच्चा प्रवेश करने की सोच भी नहीं सकता। जहां एक ओर बी एड सरकारी संस्थानों में बामुश्किलन 5 से दस हजार में हो किए जा सकते हैं वहीं निजी संस्थानों में छात्रों को अस्सी से नब्बे हजार खर्च करने पड़ते हैं। यह तो एक कोर्स का उदाहरण है पूरे भारतवर्ष के विभिन्न शैक्षणिक कोर्स की फीस पर नजर डालें तो स्थितियां एक के बाद बदत्तर ही मिलेंगी। जहां सामान्य बीए करने के लिए केंद्रीय विश्वविद्यालयों में हजारों में फीस है वहीं निजी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में लाख के पार फीस चली जाती है। ऐसे में जो समर्थ अभिभावक हैं वो तो अपने बच्चों को तथाकथित गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान कर पाते हैं बाकी सब इत्यादि में शामिल हो जाते हैं।

नब्बे के आस- पास ही तदर्थ और अतिथि शिक्षकों के द्वारा प्राथमिक उच्च प्राथमिक आदि स्कूलों में सेवाएं लेने की शुरुआत हुई। यह एक तय समय सीम के लिए विकल्प सुझाए गए थे। लेकिन हमने तो विकल्प को ही प्रमुख मान लिया। आज की तारीख में कोई राज्य छूटा नहीं है जहां तदर्थ और अतिथि शिक्षक नहीं हैं। इन अतिथियों शिक्षकों को हर साल नौ या दस माह के लिए अनुबंध में रखा जाता है और अगले साल इनकी सेवाएं जारी रहेंगी या नहीं इसके प्रति कोई तय नियम या आश्वासन नहीं होता। इस प्रकार अतिथि एवं तदर्थ शिक्षक सालों साल यानी दस पंद्रह साल तक खट रहे हैं। वह प्राथमिक स्कूलों से लेकर कॉलेज और विश्वविद्यालय आदि सब जगह हैं। अकेले दिल्ली में तकरीबन 22,000 अतिथि शिक्षक हैं। इन अतिथि और तदर्थ शिक्षकों की दशा और दिशा सुधारने के प्रति कोई गंभीर और सार्थक कदम उठाने से बचती रही है। यह अगल विमर्श का मुद्दा है कि चुनावी माहौल में इन्हें वोट बैंक ज़रूर दिखाई देते हैं इसलिए इन्हें स्थाई करने का चबेना ज़रूर बांटे जाते हैं।

न केवल एक राज्य में बल्कि हर राज्य से सूचनाएं आ रही हैं कि कितने सरकारी स्कूल या तो बंद कर दिए गए या फिर वर्तमान स्कूलों के दूसरे स्कूलों में विलय कर दिया गया। दिल्ली की ही बात करें तो अप्रैल में पूर्वी दिल्ली नगर निगम के तकरीबन पंद्रह स्कूलों को विलयन से गुजरना पड़ा। वहीं पिछले साल अक्टूबर में दिल्ली में दस सरकारी स्कूल बंद कर दिए गए। सरकारी स्कूलों को बचाने एवं मर्ज करने से बचाने के लिए किसी भी राजनीतिक दलों व सरकारों ने कोई ठोस कदम नहीं उठाए। मर्जिंग और बंद होते सरकारी स्कूलों को कैसे बचाई जाए इस बाबत कोई योजना न तो लाई गई और न नीति निर्माता धड़ों में इसके प्रति को सुगबुगाहट नहीं नजर आती है। विभिन्न नागर समाज बंद होते सरकारी स्कूलों को बचाने और मर्ज होते स्कूलों को कैसे अस्तित्व में रख सकें इसके लिए आवाज उठा रही हैं। एक अलग विमर्श का मुद्दा है कि सरकारें इसे जिस हल्के तरीके से ले रही हैं इससे एक बात तो स्पष्ट हो जाती है कि उनकी इच्छा शक्ति इन स्कूलों को बचाने से ज्यादा बंद करने की है। उसपर तर्रा तर्क यह दिया जाता है कि बच्चे नहीं हैं। शिक्षकों की कमी है आदि आदि। वर्तमान स्कूलों को गिरा या बंद कर वहां पर पार्किंग की व्यवस्था की जा रही है। इन तर्कां पर नागर समाज सचेत है।

राजनीतिक दलों को कायदे से शिक्षा की व्यवस्था और दिशा निर्माण के लिए ठोस योजना बनाने और उन्हें लागू करने की रणनीति की आवश्यकता है। वरना सरकारें चुनी जाएंगी सत्ता में रहेंगी भी और पांच वर्ष पूरा कर चली भी जाएंगी। शिक्षा ही है जो सरकारों के बनने और जाने से न तो आती है और न जाती है बल्कि शिक्षा हमेशा रहती है। यदि हमने शिक्षा को अपनी चिंता के केंद्र में नहीं रखा तो शायद हमें नहीं मालूम कि हम अपने भविष्य के साथ कैसे बरताव कर रहे हैं।

राजनैतिक -ऐतिहासिक शैक्षिक घोषणाओं की यात्राएं कई बार हमारी समझ और काल-बोध को स्पष्ट करती हैं। शैक्षणिक ऐतिहासिक घोषणाओं में 1990 का जोमेटियन का एजूकेशल फोर ऑल, ईएफए, 2000 का डकार घोषणा पत्र, 2000 का सहस्राब्दि विकास लक्ष्य, 2009 का शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2015 जब हमने सहस्राब्दि विकास लक्ष्य पूरा नहीं कर पाए और नागर समाज ने तय किया कि सतत् विकास लक्ष्य 2030 तक हम शिक्षा में गुणवत्ता, समानता और लैंगिक समतामूलक परिवेश मुहैया करा पाएंगे। उक्त घोषणाएं राजनैतिक ज्यादा थीं शैक्षिक कम। क्योंकि शिक्षा में जो लक्ष्य हासिल करने के लिए समय सीमा तक की गई थी वह हर बार अधूरी और अछूती रह गई। इसके पीछे राजनैतिक इच्छा शक्ति की कमी और रणनीति एवं योजना के स्तर पर कमियों देखी जा सकती हैं। वरना वैश्विक स्तर पर स्वीकृत घोषणाएं क्यों विफल हो गईं। क्यों आज भी भारत में करोड़ें बच्चे बुनियादी शिक्षा से महरूम हैं? क्यों भारत के बच्चे स्कूलों से बाहर हैं? कहां तो हम शिक्षा में समानता, समतामूलक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने की बातें करते हैं किन्तु वहीं हक़ीकत यह है कि हमारे लाखों बच्चे अभी भी स्कूलों तक पहुंच नहीं पाए हैं। जो बच्चे स्कूलों में हैं उन्हें ऐसी शिक्षा क्यों नहीं दे पा रहे हैं कि वे भाषा, गणित आदि विषय की बुनियादी दक्षता ग्रहण कर पाएं। तमाम सरकारी और गैर सरकारी रिपोर्ट हमें लगातार आईना दिखाती हैं कि बच्चे अपनी कक्षा के अनुरूप पढ़ने-लिखने आदि में पीछे हैं। यदि हमें सतत् विकास लक्ष्य 2030 के लक्ष्य को हासिल करने हैं तो राजनैतिक और नागर समाज की प्रतिबद्धता की आवश्यकता पड़ेगी। हमें पूरी इच्छा शक्ति और कार्ययोजना के साथ प्रबंधन की समझ का इस्तमाल करना होगा।

कौशलेंद्र प्रपन्न

भाषा एवं शिक्षा शास्त्र विशेषज्ञ


9891807914


मण्डल कथा : एक राजनीतिक भूचाल

वीरेन्दर

शोधार्थी

पीएच.डी. (हिन्दी) विभाग

दिल्ली विश्वविद्यालय

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‘राजा नहीं फकीर है, देश की तकदीर है’ बोफोर्स की आंधी में कांग्रेस को विदा करने वाला ये नारा वी.पी. सिंह के लिए लगा था। सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछडे़ वर्गों को मुख्यधारा में लाने के लिए 13 अगस्त 1990 को वी.पी. सिंह की सरकार ने उस वक्त फैसला किया था कि मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू किया जाये और ओबीसी को आरक्षण दिया जाये। 27 फीसदी ओबीसी के इस आरक्षण के फैसले के बाद सवर्ण छात्र-छात्राएँ बुरी तरह से नाराज थे और देश भर में ये आंदोलन आगे बढ़ता चला गया। आरक्षण की आग पूरे देश में इस तरह लगी कि पूरा हिंदुस्तान जाति के आधार पर दो हिस्सों में बँट गया।

पिछडे़ वर्गों को सरकारी नौकरियों में खास जगह देकर वी.पी. सिंह पिछडे़ वर्ग के लिए मसीहा बन गये वहीं दूसरी तरफ सवर्ण (अगड़ा) वर्ग अपने हकों को छीने जाने को लेकर बहुत ज्यादा नाराज था। मंडल कमीशन ने सिफारिशें की कि केन्द्र सरकार की नौकरियों में आरक्षण दिया जाये। एस.सी./एस.टी. के लिए पहले से 22.5 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान था। मंडल कमीशन ने 1980 में जिस समय यह रिपोर्ट दी थी उसी समय जनता सरकार गिर गई थी। आखिरकार इसके एक दशक बाद वी.पी. सिंह की

सरकार ने मंडल कमीशन की रिपोर्ट पर एक आदेश जारी किया।

वी.पी. सिंह को प्रधानमंत्री बने सिर्फ आठ ही महीने हुए थे। इन आठ महीनों में देश की सड़कें छात्रों के खून से लाल हो रहे थीं। दिल्ली, हरियाणा और मध्य प्रदेश देश में हर क्षेत्र से आत्मदाह करने की खबरें आने लगीं। एक ही झटके में वी.पी. सिंह ने मंडल कमीशन को लागू कर दिया। आखिर ऐसी क्या वजह थी कि 10 साल से धूल फांक रही मंडल कमीशन की सिफारिश को वी.पी. सिंह की सरकार को अचानक ही लागू करना पड़ा? और इसी बीच यह भी सवाल उठ रहे थे कि क्या मंडल कमीशन को समाज में लागू करना वाकई जरूरी था या वी.पी. सिंह की सियासी मजबूरी थी? इस पूरे मुद्दे को बेहतर तरीके से समझने के लिए 1989 के दौर को समझना होगा। जब पहली बार नहीं दूसरी बार गैर कांग्रेसी सरकार बनी। संसद के सेन्ट्रल हॉल में नेशनल फ्रंट के संस्थापक सहित, वामदल के नेता भी मिले। माईक देवीलाल सिंह के हाथों में था। देवीलाल सिंह के प्रस्ताव के आधार पर ही वी.पी. सिंह संसदीय दल के नेता चुने गये। 2 दिसंबर 1989 को वी.पी. सिंह ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। वे देश के दूसरे गैर कांग्रेसी सरकार के प्रधानमंत्री बने। देवीलाल सिंह ने हरियाणा से की ओर रूख किया। अपनी दिल्ली और हरियाणा की विरासत को अपने बेटे ओमप्रकाश चौटाला को दीं। राजनीति का इतिहास कहता है कि वी.पी. सिंह की सरकार के गठबंधन में विरासत के सवाल पर दरार पड़ गईं।

ओमप्रकाश चौटाला हरियाणा के मुख्यमंत्री बनना चाहते थे, वे मुख्यमंत्री तभी बनते जब विधायक बनते और विधायक बनने के लिए चौटाला ने उपचुनाव के लिए पर्चा दाखिल किया। चौटाला चुनाव तो जीत गये लेकिन उन पर चुनाव में धांधली करने का आरोप लगा। कहा जाता है कि इसी आरोप के चलते वी.पी. सिंह और देवीलाल सिंह के बीच दूरिया बढ़ती गईं। कहा यह भी जाता है कि ऐसे में आखिर सियासी कद को बढ़ाने के लिए वी.पी. सिंह ने सालों से धूल फांक रही मंडल कमीशन की रिपोर्ट को आगे लाने की शुरुआत की और इसका असर सिर्फ दिल्ली और उत्तर प्रदेश में ही नहीं गुजरात में भी देखने को मिला। प्रो. गौरांग ज्ञानी का कहना है कि ‘‘एक आश्चर्य की बात है जब मंडल कमीशन आया और वी.पी. सिंह ने अनाउन्समेंट किया तब गुजरात में कांग्रेस की जो सरकार थी वो मंडल कमीशन के साथ थी क्योंकि वे आरक्षण की तरफदारी करते थे लेकिन भारतीय जनता पार्टी और उसके पहले जनसंघ वो ओबीसी के आरक्षण के खिलाफ थे।’’

सियासत में कुछ भी सीधा-सीधा नहीं होता है। यही वजह थी कि देवीलाल के पुत्र मोह में भी सीधी सियासत नहीं थी लेकिन इन सब के बीच चौटाला की जीत में वी.पी. सिंह के सियासी चरित्र पर बड़े सवाल खड़े किये। लिहाजा वी.पी. सिंह को चौटाला से इस्तीफा माँगना पड़ा और चौटाला को इस्तीफा देना पड़ा। यहीं से पुत्र मोह में फंसे देवीलाल सिंह की वी.पी. सिंह से ठनी रही और उन्होंने वी.पी. सिंह को जवाब देने की ठानी। देवीलाल ने अपने बेटे को दूसरी सीट से जिताया इतना ही नहीं उन्होंने तो रातो-रात चौटाला को हरियाणा का मुख्यमंत्री भी बनवा दिया। देवीलाल उस वक्त केन्द्र सरकार में उप-प्रधानमंत्री थे। ये वही देवीलाल थे जिन्होंने खुद वी.पी. सिंह को प्रधानमंत्री बनाने का प्रस्ताव रखा था। सियासी दबाव लगातार बढ़ता जा रहा था। वी.पी. सिंह की सरकार के मंत्री एक के बाद एक इस्तीफे सौंप रहे थें लेकिन इसी बीच वी.पी. सिंह ने किसी का भी इस्तीफा स्वीकार नहीं किया बल्कि प्रधानमंत्री पद से खुद ही इस्तीफे की पेशकश रख दी। इन सब ड्रामों के बीच देवीलाल सिंह और वी.पी. सिंह के बीच मतभेद बढ़ते चले गये। ये इतना बढ़ा कि वी.पी. सिंह ने आठ महीने के अंदर ही देवीलाल सिंह को उपप्रधानमंत्री के पद से बर्खास्त कर दिया।

वी.पी. सिंह एक बात बखूबी समझ गये थे कि उनकी सरकार किसी भी वक्त गिर सकती है। ऐसे में वी.पी. सिंह ने चला एक मास्टर स्ट्रोक लेकिन सवाल ये कि मास्टर स्ट्रोक क्या था? इसका खुलासा हुआ 6 अगस्त 1990 को जब केबिनेट की मीटिंग में वी.पी. सिंह ने कहा कि वो मंडल कमीशन की रिपोर्ट को जल्द से जल्द लागू करवाना चाहते हैं। कहा ये भी जाता है कि वी.पी. सिंह को शतरंज खेलने का बहुत शौक था। वे शतरंज के बहुत अच्छे खिलाड़ी भी थे। अपने इस राजनीतिक बिसात को पूरा करने के लिए उन्होंने मंडल के मोहरे को चल दिया, जिसका असर पूरे देश में देखने को मिला। 1990 में वी.पी. सिंह की 6 अगस्त की बैठक में रामविलास पासवान और शरद यादव भी मौजूद थे। वहीं तत्कालीन सरकार वेंटिलेटर पर थी, जिसे वी.पी. सिंह ने मंडल की ऑक्सीजन का सहारा दिया।

वहीं दूसरी ओर देवीलाल सिंह ने अगस्त क्रांति के दिन यानी 9 अगस्त को दिल्ली में एक बड़ी रैली का ऐलान किया था जिसमें खुद कांशीराम आने वाले थे। कहा तो यह भी जाता है कि वी.पी. सिंह इस क्रांति से भी डर चुके थे लिहाजा मंडल के सिफारिशों के जरिए वो देवीलाल सिंह को हराना चाहते थे। असल में मंडल कमीशन की रिपोर्ट कई सालों से धूल फांक रही थी। इस आयोग का गठन मोरारजी देसाई की सरकार में किया गया था। इस मंडल कमीशन के अध्यक्ष थे उस वक्त के बिहार के मुख्यमंत्री बिन्देश्वरी प्रसाद मंडल और छह और सदस्य थे। इस मंडल का मकसद था पिछड़े वर्गों को आगे लाना। मुख्यधारा से जोड़ने के लिए खाका तैयार करना लिहाजा मंडल कमीशन ने जातियों को आधार बनाया और आरक्षण की सिफारिश की। इतिहासकार रामचंद्र गुहा के मुताबिक ‘कमीशन ने 3743 जातियों का सर्वे किया जिनकी आबादी भारत की आधी थी लेकिन प्रशासन में इनका प्रतिनिधित्व बहुत कम था। खासतौर पर बड़े पदों पर।’ कमीशन का आंकड़ा कह रहा था कि सरकारी नौकरी में 12.55 प्रतिशत ओबीसी को जबकि क्लास वन नौकरियों में हिस्सेदारी केवल 4.83 प्रतिशत ही थी। मंडल कमीशन की नियत पर शक नहीं किया जा सकता लेकिन वी.पी. सिंह के हालात उनके ईरादों पर बहुत बड़ा सवाल खड़ा कर रहे थे। वी.पी. सिंह और देवीलाल सिंह के बीच अपने वर्चस्व की लड़ाई को लेकर ओबीसी जातियों को अपने पाले में करने के लिए वी.पी. सिंह ने मंडल कमीशन तो लागू कर दिया मगर उसके बाद जो देश के हालात बने वो सभी को मालूम हैं।

सरकार ने अधिसूचना जारी करके मंडल कमीशन की रिपोर्ट को लागू कर दिया। 13 अगस्त 1990 से सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्ग के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण लागू हो गया। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण 22.5 प्रतिशत पहले से ही था। अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत लागू हुआ तो कुल आरक्षण 49.5 प्रतिशत हो गया। वी.पी. सिंह का यह दाँव उनके विरोधियों पर भारी पड़ा। किसी भी राजनीतिक दल के लिए इस फैसले का विरोध करना नामुमकिन-सा था। इस फैसले ने उन्हें एक बड़े वर्ग का मसीहा बना दिया। कई राज्यों में इस फैसले का विरोध हुआ और पुलिस फायरिंग में 50 से ज्यादा मौतों की रिपोर्ट आई। वी.पी. सिंह के इस फैसले के बाद हिन्दुस्तान चार हिस्सों में बँट चुका था। एस.सी./एस.टी. पहले से थे और मंडल कमीशन की सिफारिशों के बाद ओबीसी ओर जनरल कैटेगरी में भी बँट चुका था। यह बात और है कि मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू करने के बाद भी वी.पी. सिंह जनता के लिए महानायक नहीं बन सके।


पिछड़े वर्ग ने कभी भी वी.पी. सिंह को अपना नेता नहीं माना। इसी बीच एक दूसरी लहर ने वी.पी. सिंह को सत्ता से बाहर ही कर दिया। ये लहर थी रामजन्म भूमि की जिसमें एल.के. आडवाणी रथ लेकर निकले थे लेकिन उन्हें बिहार के समस्तीपुर में रोक दिया गया। इस घटना के बाद भारतीय जनता पार्टी ने नेशनल फ्रंट से अपना समर्थन वापस ले लिया था। वहीं वी.पी. सिंह संसद में 142 के मुकाबले 346 वोटों से हारे तो संसद में नेशनल फ्रंट भी पूरी तरह से उनके साथ नहीं था। 7 नवम्बर 1990 को वी.पी. सिंह ने अपने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद शुरु हुआ रामलला के लिए आंदोलन का युग जिसने भारत के आने वाले वक्त को मथना शुरु किया। भाजपा ने रामलला का नारा दिया और राममंदिर का वादा किया जिसका असर पूरे देश में देखने को मिला।

भारतीय राजनीति में महिलाऐः 1950-2009

डॉ. अजय कुमार सिंह

पोस्ट डॉक्टोरल फेलो, इतिहास विभाग

दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर


Mob-9450913557, email-ajaykumarsingh0@gmail.com

शोध सारांश-

भारतीय महिलाओं को समान शैक्षिक अवसर, सम्पति और विरासत में बराबर का अधिकार प्राप्त हुआ, जिससे सामाजिक स्तर पर स्त्रियों की स्थिति में सुधार आया, लेकिन राजनीति मानचित्र फिर भी नही बदला। भारत में किसी राजनीति दल ने महिला आरक्षण के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखने के बावजूद इस दिशा में कोई ठोस कदम नही उठता है। सबसे मजबूत और विशाल लोकतंत्र का दावा करने वाला हमारे देश के संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व मात्र 8.3 प्रतिशत है। राजनीतिक नेतृत्व महिला के विकास से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है इसलिए आवश्यकता है कि राजनीतिक दल और उनसे सम्बद्ध संगठन अपनी पुनर्रचना करें जहाँ महिलाओं के प्रति ज्यादा संवेदनशीलता और जबावदेही हो।

कीवर्ड-


राजनीति में महिलायें, आरक्षण, महिला सुधार, पंचायतीराज,

शोध विस्तार

भारत को स्वतंत्र हुए छह दशक बीत चुके है और बीते हुए दशक अपने गति को कायम रखते हुए परिवर्तन के नवीन आयामों को लाते रहे है। इस अवधि में समाज में बहुत कुछ बदला है। स्वतंत्रता के बाद हमारे यहां जो लोकतांत्रिक प्रणाली लाई गई वह वैश्विक व्यवस्क मताधिकार पर आधारित है। नागरिकों को मिले समान अधिकारों के साथ ही भारतीय महिलाओं को समान शैक्षिक अवसर, सम्पति और विरासत में बराबर का अधिकार प्राप्त हुआ, जिससे सामाजिक स्तर पर स्त्रियों की स्थिति में सुधार आया, लेकिन राजनीति मानचित्र फिर भी नही बदला। महिला सशक्तीकरण के संबंध में ऑफिस ऑफ द यूनाइटेड नेशंस हाई कमिश्नर फॉर हयूमन राइट्स ने लिखा है कि ‘‘यह औरतों की शक्ति, क्षमता तथा काबलियत देता है ताकि वह अपने जीवन स्तर को सुधारकर अपने जीवन की दिशा को स्वयं निर्धारित कर सके। अर्थात यह वह प्रक्रिया है जो महिलाओं को सत्ता की कार्यशैली समझने की न केवल समझ दे अपितु साथ ही साथ सत्ता के स्रोतों पर नियंत्रण कर सकने की क्षमता प्रदान करे। राजनीति के क्षेत्र में लम्बे समय से पुरूषों का वर्चस्व कायम रहा है। गाँधीजी ने कहा है कि-‘‘स्त्रियों के साथ अपने व्यवहार और बर्ताव में पुरूषों ने इस सत्य को पूरी तरह से पहचाना नही है। स्त्री को अपना मित्र या साथी मानने के बदले पुरूषों ने अपने को उसका स्वामी माना है।1

महिलाओं की स्थिति की विवेचना करने के लिए श्रीमति इंदिरा गाँधी की सरकार ने 22 सितम्बर 1971 को एक समिति का गठन किया। ‘टुवाड्र्स इक्वीलिटी’ शीर्षक से 1974 में प्रकाशित इस समिति की रिपोर्ट में कहा गया था कि ‘‘संस्थागत तौर पर सबसे बड़ी अल्पसंख्यक होने के बावजूद राजनीति पर महिलाओं का असर नाममात्र है।2’’ इस संबंध में समिति ने सुझाव दिया था कि इसका उपाय यही है कि हर राजनैतिक दल महिला उम्मीदवारों का एक कोटा निर्धारित करे और जब तक उपाय के तौर पर समिति ने नगर परिषदों और पंचायतों में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करने के लिए संविधान में संशोधन के माध्यम से ऐसा किया भी गया। पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान महिला सशक्तिकरण तथा निर्णय प्रक्रिया में उनकी सहभागिता में वृद्धि की दिशा एक क्रान्तिकारी कदम था। आरक्षण का अभिप्राय समाज में शोषण व असमानता का शिकार रही जनसंख्या को संरक्षणात्मक अवसर देना है जिससे वे भविष्य में निर्णय प्रक्रिय का हिस्सा बनें और कालांतर में स्वयं को लोकतांत्रिक शक्ति का एक महत्वपूर्ण एवं सक्रिय हिस्सा मानें। अगर महिलाओं को संसद तथा विधानमंडलें में आरक्षण प्राप्त होगा तो एक तरफ महिलाएं चुनाव प्रक्रिया का हिस्सा बनेगी और दूसरी तरफ राजनीतिक दलों में सक्रिय सहभागिता का अवसर प्राप्त होगा, जिससे महिला सशक्तिकरण की अवधारणा मूर्त रूप ग्रहण कर सकेगी। यह आरक्षण उन्हें संकीर्ण व सीमित दायरे से बाहर लाने में मददगार सिद्ध होगा।

भारत में किसी राजनीति दल ने महिला आरक्षण के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखने के बावजूद इस दिशा में कोई ठोस कदम नही उठता है। सबसे मजबूत और विशाल लोकतंत्र का दावा करने वाला हमारे देश के संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व मात्र 8.3 प्रतिशत है। ये आँकड़े पुरूष प्रधान समाज में महिलाओं के नेतृत्व की अस्वीकार्यता की संकीर्ण मानसिकता को उजागर करते है। जिसकी पुष्टि गाँधीजी के इन कथनों में है कि कानून की रचना ज्यादातर पुरूषों के द्वारा हुयी है और इस काम को करने में, जिसे करने का जिम्मा पुरूषों ने अपने ऊपर खुद ही उठा लिया है, उसने हमेशा न्याय और विवेक का पालन नही किया है।3 संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 1999-2004 में 49 महिला सदस्य थी। 15वीं लोकसभा में उम्मीदवारों की कुल संख्या 2070 थी जिनमें पुरूष के मुकाबलें 556 महिलाएं थी।

महिलाओं की परिस्थिति पर कमेटी की रिपोर्ट ‘समानता की ओर’ में उल्लेख किया गया है कि भारतीय राजनीति परिदृश्य में किसी एक कारक और राजनीतिक व्यवहार के मध्य परस्पर सम्बन्ध था। सामान्यीकरण करने में बहुत कठिनाईया है विभिन्न क्षेत्रों से राजनीतिक व्यवहार का आदर्श विभिन्न सम्बन्धों को दर्शाता है और उन पर प्रभाव डालता है क्योंकि वे सब राजनीतिक व्यवहार द्वारा अन्तर सम्बन्धित होते है जैसे महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक परिस्थिति, सांस्कृतिक मानक और विस्तृत समाज में महिलाओं की भागीदारी की ओर सभी क्षेत्रों का दृष्टिकोण।4 महिला नेतृत्व को तभी बल मिलता है जब उन्हें आरक्षण प्राप्त हो। महिला आरक्षण से सम्बन्धित विधेयक के विरोध में आम तौर पर यह तर्क दिया जाता है कि महिलाओं के लिए दावपेचों का समझना मुश्किल है क्योंकि महिला का जीवन घर-परिवार के मध्य ही व्यतीत हो जाता है। इसलिए राजनीति जैसे गुढ़ विषय को समझना एवं नेतृत्व की क्षमता को विकसित करना महिलाओं की वश की बात नही है। राजनीति में महिलाओं द्वारा सामना की जाने वाली प्रमुख बाधाओं में पहली है, राजनीति का अपराधीकरण या अपराधियों का राजनीतिकरण और दूसरा है राजनीतिक संस्कृति। राजनीतिक संस्कृति में न केवल राजनीतिक प्रक्रिया उलझ जाती है वरन् कई निर्णय पर्दे के पीछे से लिए जाते है। लेकिन भारतीय समाज में पुरूषों की तुलना में महिला उम्मीदवारों के समक्ष विश्वसनीयता की समस्या ज्यादा होती है। विश्वसनीयता की समस्या तीन तथ्यों के आस-पास घूमती है-योग्यता, दृढ़ता और चुनाव जीतने की क्षमता। हमारी चुनावी प्रणाली मुख्यतः तीन ;डद्ध मनी पावन (धनराशि), ‘मसल पावर (बाहुबल) और मिनिस्ट्रियल पावर (मंत्री पद की ताकत अर्थात् सरकारी तंत्र का दुरूपयोग) से पीड़ित है। इसे तीन ‘C’ कैश (पैसा), क्रिमिनल (अपराधी, बाहुबली) और करप्सन (भ्रष्टाचार) भी कहा जाता है। निर्वाचन आयोग द्वारा आदर्श चुनाव आचार संहिता पर सख्ती और प्रभावी ढंग से अमल कराये जाने के कारण सरकारी तंत्र की दुरूपयोग पर अब काफी हद तक रोक लग गयी है क्योंकि निर्वाचन आयोग चुनावों के दौरान सत्तारूढ़ दल अर्थात् सत्तारूढ़ गठबन्धनों द्वारा सरकारी शक्ति के दुरूपयोग पर कड़ी जनर रख रहा है। चुनावी अग्निपरीक्षाओं को पार कराने में महिला आरक्षण सहायक सिद्ध हो सकता है। स्वतंत्रता, विकास, खुलेपन एवं उदार दृष्टि का समुच्चय व्यक्ति की क्षमता और सामथ्र्य को अपरिमित बना देता है। हमें यह नही भूलना चाहिए कि राष्ट्रवादी आन्दोलन के गाँधीवादी दौर में महिलाएं बड़ी संख्या में घर की चहारदीवारी से बाहर निकली थी और स्वतंत्रता की लड़ाई में उन्होंने अहम् एवं सक्रिय भागीदारी निभाई थी। गाँधीजी ने स्पष्ट तौर पर कहा था कि ‘‘समाज महिलाओं की समानता उनके सम्मान और अधिकारों को स्वीकारे और उन्हें पतियों और परिवार के साथ बराबर की भागीदारी माने।’’5

भारत में सामाजिक विविधता का काफी महत्वपूर्ण स्थान है जिसके लिए भारतीय संविधान में कई संवैधानिक प्रावधान किए गए है। समाज के हर तबके खासकर पीछे रह गये तबको को भी देश अपना महसूस करें और राजकाज से लेकर संसाधनों में उनका हिस्सा सुनिश्चित करें, इसके लिए ही आरक्षण का प्रावधान किया गया है। महिला आरक्षण से जुड़ा सबसे बड़ा राजनीतिक प्रश्न है कि क्या यह कानून विधायिका अर्थात् संसद और विधानमण्डलों की सामाजिक विविधता को नष्ट करेगा। गाँधी का कहना है कि मैंने जिस लोकतंत्र-अहिंसा द्वारा स्थापित लोकतंत्र की कल्पना की है, उसमें सबके लिए समान स्वतंत्रता होगी।6

भारत की सामाजिक विविधता जो आजादी के बाद प्रारम्भिक लोकसभाओं में नजर नही आयी थी और अगड़े जाति समूहों का वर्चस्व विधायिका पर था वहां से देश जब काफी आगे निकल चुका है। आजादी के बाद से ही संसद और विधान सभाओं में दलितों-आदिवासियों के लिए आरक्षण था। इस समय महिला आरक्षण का विरोध जिस आधार पर किया जा रहा है, उनका तर्क यही है कि यह दशकों के सामाजिक बदलाव और पिछड़ों को उभार को फिर से नकार देगा। महिला होना अपने आप में पिछडे़पन का एक बिन्दु तो है, लेकिन जैसे कि सभी समुदायों के पुरूष बराबर नही होते, वैसे ही सभी समुदायों की महिलाएं भी बराबर नही होती। महिलाओं में भी मुस्लिम महिलाओं का पिछड़ापन ज्यादा है। भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन संगठन की संस्थापक नाईस हसन का मानना है कि महिलाओं के मुद्दे सभी वर्ग में एक से है चाहे वह मुस्लिम हो, हिन्दु हो या किसी और वर्ग की हो। मुस्लिम समुदाय में लीडरशिप की कमी है। इस समुदाय में केवल महिलाओं को मजहब के दायरे में ही बांधकर देखा जाता है। उन्हें घर के बाहर निकलने की इजाजत नही है। शिक्षा के नाम पर कुरान है और वह भी मौलानाओं द्वारा समझी गयी है। यही इस वर्ग की दुदर्शा का सबसे बड़ा कारण है। इनका मानना है कि अशिक्षा महिलाओं की प्रगति के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा है। शिक्षा से तात्पर्य डिग्रियां हासिल करना नही है शिक्षा का अर्थ है-जानकारी। अपने आस-पास के वातावरण की जानकारी और खुद को समझने की क्षमता ही जुर्म के खिलाफ लड़ने का हथियार बनती है। यही जानकारी उसे अपनी पहचान दिलाने में भी सहायक होती है।7 गाँधीजी ने कहा है कि स्त्रियों के अधिकारों के सवाल पर मैं किसी तरह का समझौता स्वीकार नही कर सकता। मेरी राय में उन पर ऐसा कोई कानूनी प्रतिबन्ध नही लगाया जाना चाहिए जो पुरूषों पर न लगाया गया हो।8

महिला कोटे के अन्दर कोटे का वही आधार है, जो वर्तमान आरक्षण है। यानि जो कमजोर है उसे विशेष अवसर मिले, ताकि वह भी लोकतंत्र में अपनी हिस्सेदारी निभाए साथ ही महिला आरक्षण के अन्दर अगर क्रिमिलेयर भी लागू हो, तभी आरक्षण का फायदा उन्हें मिलेगा, जिनको इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है। महिला आरक्षण का विधेयक लम्बे समय से लम्बित था। इस पर काफी बहस न किया गया। अगस्त 2009 के प्रारम्भिक दिनों में भी बहस न किया गया जब अनुसूचिज जाति एवं अनुसूचित जनजाति आरक्षण सम्बन्धी 109वां संविधान संशोधन विधेयक 2009 संसद द्वारा पारित किया गया। उल्लेखनीय है कि संविधान के अनुच्छेद के प्रावधानों के तहत संविधान लागू होने के 60 वर्षो की अवधि के पश्चात 25 जनवरी 2010 को उपर्युक्त आरक्षण प्रणाली को समाप्त होना था। साथ ही इस विधेयक के तहत लोकसभा एवं राज्यसभा में आंग्ल भारतीयों के लिए भी आरक्षण अगले दस सालों के लिए बढ़ा दिये जाने का प्रावधान था। इसे भी समाप्त किए जाने का प्रावधान उचित था। लेकिन ऐसा नही किया गया और सभी प्रमुख राजनीतिक दलों द्वारा वर्तमान आरक्षण प्रणाली को 10 वर्षो के लिए बढ़ा दिया गया यानि 25 जनवरी 2010 तक वर्तमान आरक्षण प्रणाली काम करेगी। महिला आरक्षण का विरोध करने वाले कोटे में कोटा की बात कर रहे है पर लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव, मायावती, रामबिलास पासवान और शरद पवार को 3 और 4 अगस्त को यह बात क्यों न याद आयी कि आरक्षण में आरक्षण का प्रावधान महिला आरक्षण में किया जाए और वर्तमान आरक्षण प्रणाली को समाप्त किया जाये।

मेरे ख्याल से किसी भी राजनीतिक दल या नेता में इतना दम नही है कि इसका विरोध विधायिका में करते। इसका कारण मूल रूप से दो है-पहला ‘पुरूष सर्वस्व की मानसिकता और दूसरा-‘वोट बैंक की राजनीति। संविधान में अनुच्छेद 330, 331, 332, 333, 334, 335 के वर्तमान आरक्षण को समाप्त कर महिला आरक्षण में आरक्षण का प्रावधान किया जाना चाहिए। भारतीय समाज में अभी तक महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने में हिचक होती है। यह बात अलग है कि महिलाऐं अपने कौशल के कारण आज चाँद तक चली गयी व सभी महत्वपूर्ण ओहदों पर आसीन हो चुकी है। गाँधीजी का मानना है कि-जिस रूढ़ि और कानून को बनाने में महिलाओं का कोई हाथ नही था और जिसके लिए सिर्फ पुरूष ही जिम्मेदार है, उस कानून और रूढ़ित्र के जुल्मों ने स्त्री को लगातार कुचला है। अहिंसा की नीवं पर रचे गये जीवन की योजना में जितना और जैसा अधिकार पुरूष को अपने भविष्य की रचना का है उतना और वैसा अधिकार महिलाओं को भी अपना भविष्य तय करने का है।’’9 राजनीति में महिलाओं के प्रतिनिधित्व के मामलें में भारत अपने पड़ोसी देश पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल से भी पीछे है। यह जानकारी 100वें अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम ;न्छक्च्द्ध की पेश हुयी एक अहम रिपोर्ट में दी गयी। यह रिपोर्ट एशिया और प्रशान्त क्षेत्र में महिलाओं की स्थिति पर केन्द्रित है।10

यू0एन0डी0पी0 के स्थानीय प्रतिनिधि पेट्रिस कोउर विजौट ने कहा कि भारत में महिलाओं को विभिन्न क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व मिलता है और उन्हें संवैधानिक अधिकार भी प्राप्त है, लेकिन इसके साथ वह हिंसा और उपेक्षा के शिकार भी है। भारत में महिलाओं की स्थिति में सुधार के लिए हमें उन्हें अधिक राजनीति प्रतिनिधित्व देना होगा।11 भारत की पहली महिला लोकसभा अध्यक्ष का कथन उपयुक्त है कि........हम वक्त के ऐसे मोड़ पर खड़े है जहां महिलाओं के सशक्तिकरण को हमारे विकास के एजेण्डों तथा नीति के एक अहम अंग के रूप में प्राथमिकता देने की जरूरत है। महिलाओं की रक्षा और कल्याण के लिए तमाम कानून है लेकिन इसे प्रभावी बनाने के लिए अक्षरशः लागू करना जरूरी है। इसके लिए समाज को मानसिकता बदलनी होगी। महिलाओं के हितों की रक्षा व उनका सशक्तिकरण हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।12

पंचायती राज संस्था, जो जमीनी लोकतांत्रिक ढांचे का निर्माण करती है, में महिलाओं की भागीदारी में ग्रामीण संरचना को सकारात्मक की दिशा में बढ़ाया है। महिलाओं को पंचायत के माध्यम से विकास प्रक्रियाओं एवं निर्णय लेने की प्रक्रिया में सहभागिता एक ओर सामाजिक, राजनीतिक न्याय तथा समानता के मध्य सम्बन्धों को अभिव्यक्त करती है तथा दूसरी ओर लोकतांत्रिक जड़ों को मजबूत करती है साथ ही महिलाएं वित्तीय संसाधनों उचित प्रयोग करती है। अपने इस क्षमता का उपयोग उन्होंने गांवों के वित्तीय संसाधनों को नियंत्रित करने में किया है। जहाँ महिलाएं पंच व सरपंच है जिन्होंने पानी, सड़क व शिक्षा के लिए प्रस्तावित बजट से कम में ही कार्य को पूर्ण कर दिखाया है। ऐसा भी नही है कि यह सारे कार्य उन्होंने सहजता से कर दिखया हैं इनके मार्ग में भी अनेक बाधाएँ आयी और आ रही है। परन्तु अनुभव और आत्मविश्वास उन बाधाओं को पार करने के रास्ते खोज लेता है।

पुरूष-सत्तात्मक समाज में महिला के नेतृत्व को स्वीकार कर पाना आसान नही है और यही कारण रहा कि ऐन-केन प्रकरेण महिला सरपंचों को अविश्वास प्रस्ताव पारित कर हटाने के प्रयास भी किये गये। इस समस्या से निपटने के लिए वर्ष 2008 के मध्य में केन्द्र सरकार ने राज्यों से यह सुनिश्चित करने को कहा कि महिला सरपंचों को डेढ़ साल से पहले अविश्वास प्रस्ताव के माध्यम से न हटाया जाए। सरकार द्वारा उठाया गया कदम न केवल महिला नेतृत्व की स्वीकारोक्ति का प्रमाण है अपितु विश्वास का प्रतीक भी है जो कि महिला नेताओं पर किया गया है। पर दुःख की बात यह है कि इस विश्वास का अभाव राष्ट्रीय स्तर के राजनीतिक मंच पर है। गाँधीजी के शब्दों में जो राष्ट्र अमर्यादित त्याग और बलिदान करने की क्षमता रखता है, वही अमर्यादित ऊचाई तक उठने की क्षमता रखता है। बलिदान जितना अधिक शुद्ध होगा, प्रगति उतनी ही तेज होगी।13

निष्कर्ष-

परिवर्तन के वाहक के तौर राजनीतिक दलों को लैगिंक विषयों के प्रति संवेदनशील होने की आवश्यकता है। यहाँ तक कि जब महिलाओं को मताधिकार मिला था, तब भी राजनीतिक दलों के भीतर उनकी स्थिति ने मात्र आंशिक सुधार ही आया था। विश्व के लगभग सभी भागों में महिलाओं बढ़ा हुआ प्रतिनिधित्व सिर्फ उन्हें सामान्य नागरिक के तौर पर स्वीकार करने के लिए नही, बल्कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में स्त्री परक दृष्टिकोण को सम्मिलित किया गया। राजनीतिक नेतृत्व महिला के विकास से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है इसलिए आवश्यकता है कि राजनीतिक दल और उनसे सम्बद्ध संगठन अपनी पुनर्रचना करें जहाँ महिलाओं के प्रति ज्यादा संवेदनशीलता और जबावदेही हो। हमें इस सत्य को स्वीकार करना हागा कि विधायिका में महिलाओं की संख्या न केवल लोकतांत्रिक प्रक्रिया को तीव्रता प्रदान करेगी बल्कि, लैंगिक समानता और न्याय के प्रति प्रतिबद्ध समाज का निर्माण ही करेगी।

संदर्भ सूची

1- महात्मा गाँधी, 1960, मेरे सपनों का भारत, पृ0 236, नवजीवन, अहमदाबाद

2- टुवर्ड्स इक्वीलिटी, 1974

3- स्पीसेज एण्ड राइटिंग्स ऑफ महात्मा गाँधी, पृ0 424

4- Towards equality report 1974 p.287-89

5- स्पीसेज एण्ड राइटिंग्स ऑफ महात्मा गाँधी, पृ0 425

6- Gandhi’s Correspondence with the Government-1942-44, Page-173

7- राष्ट्रीय सहारा, 09-03-2010

8- महात्मा गाँधी, 1960, मेरे सपनों का भारत, पृ0 236, नवजीवन, अहमदाबाद

9- यंग इण्डिया-30-07-1931

10- Power Voice and Right’s Report, July 2009 (UNDP)

11- राष्ट्रीय सहारा, 09,03,2010

12- मीरा कुमार, लोकसभा अध्यक्ष, भारत सरकार, 08 मार्च, 2010

13- यंग इण्डिया-20-08-1920


मीडिया की राजनीति व राजनीति का मीडिया

नाम :- आकाशदीप

पाठ्यक्रम :- पी. एचडी (हिन्दी)

दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली (११००७)

संपर्क सूत्र :- 7838454721


ई मेल :- akashdeepdu@gmail.com

राजनीतिज्ञों के हाथ में मीडिया आज एक बहुत ही सशक्त हथियार बन चुका है….. आज उसका स्वरूप बदलती राजनीति के साथ बदल चुका है क्योंकि राजनीति की यह पद्धति भारतीय संसदीय लोकतंत्र के अनुरूप कल्याणकारी राज्य निर्माण की योजना के ध्येय से चालित नहीं है, जिसमें शक्ति लोक समाज के हाथों में होती है बल्कि वह केन्द्रिकृत अध्यक्षीय शासन प्रणाली के अनुरूप हो चली है। जिसको ग्रहण करना इस देश के लिए यहाँ के नागरिकों के लिए आत्मघाती सिद्ध हुआ है। अभी तक तो हम सब यह जानते थे व भलीभांति परिचित थे कि भारतीय संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली में मीडिया संस्थान की भूमिका लोकतंत्र के प्रहरी की है या दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि भारत का लोकतंत्र समाचार पत्रों की आजादी पर टिका हुआ है और समाचार पत्र भ्रष्टाचार की आलोचना पर। खुली लोकतांत्रिक अर्थव्यवस्था का यह एक शानदार पहलू है कि कोई भी व्यक्ति आलोचना व संदेह के परे नहीं है, बल्कि जो व्यक्ति जितने बड़े पद पर है उसको उतना ही अधिक सार्वजनिक आलोचना के प्रति संवेदनशील होना होगा। मीडिया संस्थाओं का काम इस प्रणाली की रक्षा करने का है वह इसका प्रहरी है और प्रहरी का दायित्व यह नहीं होता कि चोरी को प्रमाणित करे कुछ बातें ऐसी होती हैं की संदेह पैदा होते ही, कार्रवाई हो जानी चाहिए मीडिया के पास संदेह के आधार पर कार्रवाई करने का अधिकार है। यह मीडिया का ही दायित्व है कि वह समाज व परस्पर भिन्न समुदाय, वर्गों व समूह के मानस को संस्कारित कर एक सामान्य भाव भूमि व वैचारिक एकता प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध हो, जिससे समाज में उच्च लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु कुछ समान नैतिक विचारों पर आम सहमति की स्थापना हो सके व लोग परस्पर समानता, बन्धुत्व व स्वतंत्रता की चेतना से संपन्न हो एक लोकतांत्रिक व्यवस्था व राष्ट्र निर्माण में प्रवृत्त हो सकें। इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु मीडिया की भूमिका निस्संदेह किसी भी राजनीतिज्ञ से ज्यादा होती है। क्योंकि वह राजनीतिज्ञ व आम जनता के बीच की कड़ी है, उसका दायित्व मध्यस्थ का है। दोनों के बीच संवाद स्थापित करने का है और ऐसा करते हुए ये उसका नैतिक दायित्व है कि वह जनता के हितों, संवैधानिक अधिकारों व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रतिनिधित्व करता है। मध्यस्थ होने के नाते उसका यह कर्तव्य है कि वह राजनैतिक क्रियाकलापों की निष्पक्ष आलोचना व समीक्षा करे व लोगों को राजनैतिक विवेक प्रदान करे जिसके बगैर उसकी विकासात्मक भूमिका अधूरी है क्योंकि उसका अंतिम लक्ष्य लोगों में निर्णय लेने का विवेक पैदा करने का है। वर्तमान में यह कर्तव्य उससे कहीं पीछे छुट गया है। भारतीय संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली में व राजनीतिक व्यवस्था में मीडिया संस्थान व प्रेस स्वतंत्र कहे गए हैं, किन्तु वह कितना स्वतंत्र हैं इसका कोई निश्चित पैमाना नहीं है। लोगों को लगता है कि प्रेस की आजादी संवैधानिक है व सुनिश्चित है। किन्तु पत्रकार कौम उनके प्रति सरकार के रवैये से असंतुष्ट है। हकीकत यह है कि प्रेस का कार्य समाज की व अपनी स्वतंत्रता के लिए लडना भी है। कभी कॉर्पोरेट जगत से तो कभी राजनीतिज्ञों से पर आज आर्थिक उदारीकरण की नीतियों के निरंतर मजबूत होने से भारतीय राजनीति व मीडिया आधुनिक राष्ट्र-राज्य की व्यवस्था स्थापित करने के ध्येय से चालित है जिसमें राष्ट्र को संचालित करने के अधिकार लोकतांत्रिक संस्थानों के पास न होकर एक केन्द्रीय व्यक्ति या प्रभुसत्ता के पास होते हैं कहने का तात्पर्य है कि शक्ति का केन्द्रीकरण हो जाता है। जैसे अमेरिकी शासन प्रणाली में सारे अधिकार अध्यक्षीय शासन के अधिन होते हैं ठीक वैसे ही और इस प्रणाली की विशेषता यह है कि इसमें किसी भी स्वायत्त संस्था व संस्थान की कोई भूमिका नहीं रह जाती उसके सारे अधिकार उससे छीन लिए जाते हैं। पिछले दिनों भारतवर्ष की राजनीति इसी ओर बढी है अकारण ही नहीं आजादी के बाद अस्तित्व में आए राजनैतिक, साहित्यिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक महत्व के संस्थानों की स्वायत्तता व स्वतंत्र निर्णय लेने के अधिकार खत्म किए जा रहे हैं। इसमें मीडिया संस्थान भी है। जिसका स्वरूप आज लोकतंत्र की स्थापना के चौथे खंभे के रूप में नहीं रह गया है । जिसकी कल्पना विधायिका, न्यायपालिका या कार्यपालिका के बाद लोकतांत्रिक प्रणाली की स्थापना के लिए महत्वपूर्ण मानते हुए आवश्यक कही गयी है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत में मिश्रित अर्थव्यवस्था के तहत जो संस्थाएं सामने आयीं उनका ढांचा नितांत भारतीय नहीं था और उनके कुछ अपने अंतर्विरोध भी थे। उनके समक्ष लक्ष्य तो ऊंचा था आधुनिक प्रगतिशील सोच व वैज्ञानिक तकनीक से लैस भारत बनाने का पर बाहरी पूंजी निवेश के माध्यम से….. इसकी चपेट में भारतीय मीडिया संस्थान भी आ गया था फलस्वरूप सोवियत संघ के पतन के तुरंत बाद ही 91 की आर्थिक उदारीकरण नीतियों के लागू होने के कारण भारतीय मीडिया से हाशिए के लोगों की आवाज गायब हो गयी और आज वह कॉर्पोरेट और नीजी पी. आर एजेंसियों व पॉलिटिशियनों के मनमुताबिक चल रहा है तो ऐसे में उसका स्वरूप विकसित देशों व कॉर्पोरेट घरानों के इशारे पर आर्थिक उदारीकरण व पूंजीवादी साम्राज्यवादी अर्थव्यवस्था को दुनिया भर में स्थापित करने भर का होकर रह गया है। आज जो मीडिया हमारे सामने है चाहे वह इलैक्ट्रॉनिक हो या प्रिंट वह पाश्चात्य विकसित देशों की मीडिया का लघु स्थानीय संस्करण भर है। जो वहां उत्पादित होता है फिर वह वस्तु उत्पाद हो या राजनीतिक खबरें उनका प्रसारण विकासशील देशों में किया जाता है जिससे विकासशील देशों के अंदरुनी मसलों व समस्याओं में सीधे व प्रछन्न रुप से हस्तक्षेप किया जाता है, अपना उत्पाद खपाने के लिए विकसित देश ये सुनिश्चित करते हैं कि विकासशील देशों की समस्याएं यूंही बरकरार रहें और इनमें हथियारों का निर्यात बढता रहे और उपभोक्तावादी वस्तुओं का बाजार दिन पर दिन फले फूले। आज ये जो पूंजी के नवउपनिवेशवादी साम्राज्यवाद का जो दौर हमारे सामने है इसका एक लक्षण यह है कि पूंजी जहाँ भी निवेश की जाती है उसका नियंत्रक वहां प्रत्यक्ष रूप से मौजूद नहीं रहता वह दूरदराज के विकसित देशों से विकासशील देशों में निवेश की गयी पूंजी को नियंत्रित करता है। ‘फ्री वर्ल्ड ‘का कॉन्सेप्ट यही है कि उसमें बाजार मुक्त होगा उसमें राज्य या केंद्र सरकार का कोई नियंत्रण नहीं होगा, उनका कार्य इतना है कि वह इस अर्थव्यवस्था के तहत नीति निर्धारण करें व देश के नागरिकों में बाजारू उपभोक्ता होने का बोध पैदा करे और यह मीडिया के बिना संभव नहीं है। आज भारतीय राजनीति की तरह मीडिया संस्थान भी कॉर्पोरेट साम्राज्यवाद की चपेट में है उससे नियंत्रित है। वर्तमान दौर की राजनैतिक व्यवस्था की कई हृदय विदारक स्थिति यह है कि सरकार जनता से अपने द्वारा किये गये विकास कार्यों का हवाला देकर वोट मांगने की स्थिति में नहीं है वह चाहे फिर (उज्ज्वल योजना, प्रधानमंत्री जन धन योजना, जी एस टी, एफ डी आई, स्टार्अप इंडिया, मेक इन इंडिया, स्कील इंडिया, नोटबंदी या फिर स्वच्छ भारत अभियान ही क्यों न हो) क्योंकि उदारवादी अर्थव्यवस्था कीहकीकत यह है कि वह 15 से 20% इलिट या अपर मध्यवर्ग के लिए है, और जिसके दायरे से 80-85% मध्य वर्गीय, निम्न मध्यवर्गीय या हाशिये पर पड़ा अंत्योदय वाला तबका बिल्कुल ही बाहर है, इसी लिए इसके लिए कल्याणकारी योजनाओं को लागू करने का स्वांग रचा जाता है जो कि आजादी के बाद से ही पास हो रही हैं पर निर्धन और निर्धन होता जा रहा है। किन्तु यह मीडिया के हाथ में है कि वह इस सबके बावजूद कैसे लोगों को शासन व सरकार के प्रति कंविंस करता है। क्योंकि उसका दखल लोगों के विवेक के भीतर तक व्याप्त है।

इस अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण आखिर है किस का?? तो इसका जवाब भी न्यूज या टीवी चैनलों पर प्रसारित धारावाहिक या एड देखकर मिल जाएगा जिन्हें देखते समय ये आभास होगा कि आप देश के नागरिक न होकर एक बाजारू उपभोक्ता भर हैं सब चीज के लिए हर तरह की खबरों के लिए आपका टीवी सब्सक्राइब होना चाहिए। मीडिया हमारे जीवन में दो अत्यावश्यक चीजों की कमी पूरी कर करता है – रोजमर्रा की महत्वपूर्ण सूचना जिससे व्यक्ति का दिमाग व व्यक्तित्व प्रभावित होता है और दूसरा मनोरंजन जिसके लिए हम मीडिया पर ही निर्भर हैं। ऐसे में उसका दायित्व एक स्वस्थ समाजिक चेतना व संस्कार पैदा करने का है जिससे नागरिक मानसिक रूप से एक आम राय कायम करने में सक्षम हो सके, समाज के एकीकरण से ही राष्ट्र निर्माण संभव हो पाता है और यह दायित्व मीडिया पर ही रहा है इसीलिए उसे लोकतांत्रिक अर्थव्यवस्था में चौथे खंभे का दर्जा प्राप्त है।

मीडिया और राजनीति दोनों ही पदबंध समान रूप से प्राचीन हैं क्योंकि राजनीतिज्ञों को प्राचीन काल से ही कबीले, समूह, समुदाय या वर्गों के समान लक्ष्यों व हितों की पूर्ति करने के लिए व राजनीति साधने के लिए जनसंचार के माध्यमों का सहारा लेना पड़ता रहा है। मीडिया (इटैलियन शब्द ‘mediace’ से बना है, जिसका अर्थ है – ‘मध्यस्थ’, या ‘माध्यम ‘) खैर तब के मीडिया का चेहरा आज के मीडिया की तरह जटिल व दोहरा नहीं था। वह स्थानीय और लोक के निकट हुआ करता था वह पारंपरिक व रीति संस्कारों से एक उच्च सामाजिक लक्ष्य की प्राप्ति के ध्येय से चालित था, वह लोक गान, लोक नाट्य, कथावाचन, सूत्रधार और विदूषक जैसे व्यंग्य और विद्रूप की सृष्टि करने वाली शैलियों व पात्रों के रूप में मौजूद था। जिसके जरिए एक लोगों के बड़े समूह के समक्ष सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक व सांस्कृतिक कार्यों की समीक्षा व विवेचना की जाती थी। और यह देश के निर्माण में व उसे एकजुट रखने में उसकी सकारात्मक निर्माणकारी भूमिका का परिचायक था।

आज हमारे समक्ष मीडिया व राजनीति दोनों ही काफी विडंबनात्मक व विद्रूप अवस्था में हैं। आज हमारे देश का नागरिक समाज बौद्धिक रूप से कंगाल है। वह अपने दायित्वों के प्रति व संवैधानिक अधिकारों के प्रति राजनीतिक रूप से निरक्षर है। और वह अपने विवेक से अपाहिज हो चुका है। देश कहां जा रहा है?? कहां खड़ा है?? या पिछले बीस तीस वर्षों में वह किस व्यक्ति या राजनेता को एक आइकन के रूप में देखता है जिसके पद चिन्हों पर चला जा सके?? ऐसे प्रश्नों का स्पष्ट रूप से उसके पास कोई जवाब नहीं है। इसलिए आप देखेंगे की न्यूज चैनलों पर प्रसारित डीबेट में नेताओं से सवाल जवाब वाले कार्यक्रम में कोई आम नागरिक नहीं मिलेगा। इस स्थिति को ऐसे समझें की तमाम मीडिया हाउस खास कर ए. बी. पी व जी न्यूज एक कार्यक्रम चलाते हैं, जिसमें एक तरफ दो तीन नेताओं को दिखाया जाता है, उनके ठीक सामने युवाओं की भीड़ दिखाई जाती है। इसके मध्य न्यूज एंकर व कैमरा डाइरेक्टर अपनी स्क्रीप्टेड भूमिका निभाते हैं। अगर विमर्श दिल्ली के सरकारी स्कूलों की शिक्षा पर आधारित है तो बहस में न तो उन स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को शामिल किया जाता है न ही उनके माता-पिता को बल्कि गाडियां विश्विद्यालयों व कॉलेजों की तरफ दौडाई जाती है और वहाँ से पढ़े लिखे छात्रों को लाया जाता है। कई बार ये छात्र सामने वाले नेता की पार्टी की छात्र विंग के होते हैं, जिन्हें पहले से ही इस कार्यक्रम की सूचना होती है और वह पहले से ही प्रशिक्षित होकर आते हैं कि सवाल जवाब क्या करने हैं।


प्रश्न खड़ा होता है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी मीडिया क्यों उनके पास नहीं जाता जिनके लिए ये कल्याणकारी योजनाएँ लागू करने का स्वांग रचा जा रहा है। आज राजनीतिज्ञों के हाथ में मीडिया सबसे उपयुक्त माध्यम है जो साधिकार ये तय कर सकता है कि देश के संस्थानों में क्या विमर्श चलेंगे व देश के नागरिकों का राजनीतिक आचरण कैसा हो। और इसी मीडिया की सहायता से राजनेता व कॉर्पोरेट अपने विरोधी विपक्ष व प्रतिद्वंदी को भी अपने राजनीतिक, आर्थिक व सांस्कृतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करते हैं। किंतु इस सबके बावजूद मीडिया ही है जिसके माध्यम से हम इस राजनीति के प्रतिरोध का रास्ता निकाल सकते हैं पर उसके लिए वैकल्पिक मीडिया की दिशा में सोचा जाना चाहिए।


राजनीति और मीडिया


-द्वारिका प्रसाद अग्रवाल*

सरकार का काम गलत है तो उस पर आवाज़ उठाने का काम मीडिया का है। दरअसल, मीडिया राजनीति का रिश्ता चोली-दामन का साथ जैसा होता है। जैसी राजनीति का स्तर होगा, वैसा ही मीडिया का सम्प्रेषण होगा। मीडिया की ज़िम्मेदारी दो-तरफा है, पहली, जनजागरण की और दूसरी, व्यवस्था की आँखें खोलने की। वैसे तो भारतीय मीडिया अपना काम ठीक कर रहा है लेकिन सत्ता का आतंक और धन का दबाव उसकी निष्पक्षता में हमेशा बाधा उपस्थित करता है। जब राजनीति व्यापार बन जाती है तो मीडिया स्वयमेव उसका हिस्सेदार हो जाता है। पानी में तैरने के बाद कपड़े गीले होना स्वाभाविक है। गीले कपड़ों में कंपकपाता पत्रकार समाचार बनाते समय नशीली ठंडक का शिकार हो जाता है और उसकी कलम कांपने लगती है। सरकार की गलतियों में उसे जनहित नज़र आने लगता है और जनहित की बात चोचलेबाजी। विरोध के स्वर लड़खड़ाने लगते हैं और महिमामंडन का वही दौर आरंभ हो जाता है जो कभी राजे-रजवाड़ों में प्रचलित था। भयभीत पत्रकार शासक से टकराने की जगह, उसके चरणचुंबन करने लगता है, राजा खुश हो जाता है और उसे इनाम-इकराम से लाद देता है। मीडिया सरकार की प्रशंसा में भजन गाने लगता है और जनता भजन की थाप पर सम्मोहित होकर तालियाँ बजाने लगती है, मगन होकर नृत्य करने लगती है।

जिस प्रकार कोई भी शासक शतप्रतिशत सही नहीं होता, उसी प्रकार मीडिया भी पूरी तरह से सही नहीं होता। यदि सही और गलत की बात न करें तो इतनी बात तो हो सकती है कि दोनों अपने-अपने सही और गलत पर नज़र रखें। अपनी गलती किसी को भी समझ में नहीं आती इसलिए उसे समझने के लिए दूसरे का सहारा लेना पड़ता है। शासक की गलती मीडिया के

पर्दे पर दिखती है जबकि मीडिया की गलती नागरिकों की निराश आँखों में दिखती है। इन दुखी आँखों के पीछे जितना दोष शासन का होता है, उतना मीडिया का भी होता है।

जब शासक हर समय चुनाव लड़ने में व्यस्त है और मीडिया हर पल धन उगाही में लगा हुआ है तब आमजन के सरोकारों की कौन फिक्र करेगा? कारोबारी मीडिया भला सरोकारी कैसे हो सकता है? कस्बे से लेकर दिल्ली तक के पत्रकार जनता की सरोकारी खबरों की कीमत वसूल करने की जुगत भिड़ाते हैं, संबन्धित अफसर या नेता या व्यापारी या ठेकेदार को जानकारी की अग्रिम सूचना देते हैं और उससे पूछते हैं कि 'समाचार को दे दें क्या?' फिर आपसी सम्बन्धों का ज़िक्र होता है, ऊपरी पहुँच का दबाव बनता है, लेन-देन की बात होती है, उसके बाद समाचार गति-प्रगति तय होती है। सकारात्मक परिणाम न आने पर खबर ज़ाहिर करना बेचारे मीडिया की मजबूरी हो जाती है और जनहित के महत्व की बात अंततः जनता तक पहुँच जाती है।

मीडिया कोई भी हो, आर्थिक संकट के दौर को लगातार झेलता है लेकिन सरकारी और गैर-सरकारी विज्ञापनों की मदद से अपने अस्तित्व को बचाता है। मीडिया पर गैर-सरकारी विज्ञापनों का प्रत्यक्ष दबाव कम रहता है लेकिन सरकारी विज्ञापन अपनी कीमत वसूलते हैं। सरकार की खिलाफ़त उन्हें मंहगी पड़ती है, विज्ञापन रोक दिए जाते हैं या उनका भुगतान अटका दिया जाता है। एक सच्ची घटना पर गौर करें; बात तब की है जब छत्तीसगढ़ नया-नया राज्य बना था। बिलासपुर के सर्वाधिक प्रसारित अखबार में मुखपृष्ठ पर नीचे की पट्टी में राज्य के मुख्यमंत्री के कामकाज पर कठोर टिप्पणियों के साथ समाचार की एक 'सीरीज' शुरू हुई। समाचार शहर-संपादक ने तैयार किया था। दो किश्तें प्रकाशित हो गयी। 'ऊपर' से फोन आया, "ये क्या हो रहा है?"

"कोई भूल हुई मुझसे?" शहर-संपादक ने पूछा।

"सी॰एम॰ के खिलाफ न्यूज़ छपेगी तो हमारे विज्ञापनों का क्या होगा?"

"मैंने समाचार प्रमाण के साथ तैयार किया है, पाठकों में अच्छी प्रतिक्रिया है। इस समाचार से सरकार को उसके कामकाज पर सही फीडबैक भी मिलेगा।"

"सरकार को कैसे फायदा होगा, यह सरकार की समस्या है, हमारी नहीं। सीरीज को बंद करो, कल से नहीं आना चाहिए।" ऊपर से आदेश आया। शहर-संपादक को नौकरी बचानी थी, बेचारा विवश हो गया, सीरीज की भ्रूणहत्या हो गयी।

इस घटना से यह समझा जा सकता है कि पत्रकारिता अलग बात है, पत्रकारिता की नौकरी अलग है।

पत्रकारिता अब जुनूनी 'मिशन' न रहा, व्यापार का गुणा-भाग हो गया है। छोटे अखबार छोटी-छोटी दूकानें हैं, वहीं पर बड़े अखबार और चैनल सुनियोजित वृहद उद्योग हैं जिन्हें लाभ-हानि की तराजू में तौल कर चलाया जाता है। अखबार के पाठक और चैनल के दर्शक उनके लिए छोले-भटूरे हैं, जिनकी कृपा से उनके बदन की चर्बी बढ़ती है। जितने अधिक पाठक या दर्शक, उतने अधिक विज्ञापन, उतना अधिक रेट, उतनी अधिक वसूली।

मीडिया में संपादक से लेकर आपरेटर तक, सब अपनी जी-जान लगा देते हैं कि जिस संस्थान से वे जुड़े हैं, वह तरक्की पर तरक्की करे लेकिन उनकी तरक्की पर मालिक की नज़र नहीं होती। मालिक जानता है कि पत्रकार नामक प्राणी के प्राण मालिक की मिल्कियत और उसके 'ब्रांड' में अटके हुए हैं इसलिए वह उनको अपना गुलाम बना कर रखता है। उसके लिखे पर कड़ी नज़र रखता है, उनकी कलम में अपनी उंगलियाँ फंसा कर लिखवाता है, बदले में खाना-खर्चा देता है और डरा-धमका कर उनसे पत्रकारिता करवाता है। कोई ज़्यादा होशियारी बताता है तो उसकी 'डेस्क' बदल दी जाती है, या उसका कहीं दूर स्थानांतरण हो जाता है, या त्यागपत्र देने के लिए मानसिक दबाव बनाया जाता है। ऐसे हालात में निष्पक्ष और साहसी पत्रकारिता कैसे संभव है?

पहले मीडिया का अर्थ था अखबार। आज़ादी के पहले और बाद में अखबारों ने अपनी भूमिका भलीभाँति निभायी। विज्ञापन मिले या न मिले, समाचार की गुणवत्ता और सत्यता पर उनका ज़ोर रहा। उन्नीस सौ नब्बे के दशक में टेलीविज़न के आगमन ने अखबारों की उपयोगिता पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया क्योंकि ताजे और सचित्र समाचार परोसने में टेलीविज़न अखबारों से बहुत आगे निकल गया। कुछ समय बीतने के बाद अखबारों ने खुद को संभाला और राजनीति, साहित्य तथा सिनेमा पर आधारित लेखों के बल पर पाठकों के मन में अपनी जगह बनाए रखने में सफलता हासिल की, साथ ही स्थानीय समाचारों के बदौलत समाचारों की ताज़गी का एहसास भी कायम रखा। दूरदर्शन द्वारा प्रसारित समाचार यद्यपि स्तरीय थे लेकिन सरकारी थे, पारदर्शी नहीं थे। दर्शक ऊबने लगे और पुनः समाचारपत्रों की ओर आकर्षित होने लगे। तब ही 'जी-टीवी' ने टेलीविज़न की दुनिया में पदार्पण किया, फिर 'स्टार-टीवी' आया और इन दोनों ने समाचार और मनोरंजन की दुनिया बदल दी, लोग पुनः टीवी से चिपक गए। उधर टेलीविज़न रंगीन हो गया, इधर अखबार भी इंद्रधनुषी रंगों में छपने लगे। उसी समय भारत बाजारवाद के लपेटे में आ गया और टेलीविज़न हो या अखबार, विज्ञापनों के मायाजाल में उलझते गए। 'कंटेन्ट' भसकते गया और 'एड' हावी हो गया। अब मीडिया धन के कब्जे में है। नया सूत्र है, Media is a network of the money, by the money, and for the money.

'मीडिया धन का, धन के द्वारा, धन के लिए।'

आज़ादी के तुरंत बाद देश हर दृष्टि से विपन्न था। अंग्रेजों ने भविष्यवाणी की थी कि हिंदुस्तानियों में प्रशासनिक दूरदृष्टि नहीं है, ये देश नहीं चला पाएंगे। अंग्रेजों की टिप्पणी तात्कालीन भारतीयों राजनेताओं के लिए बड़ी चुनौती थी जिसे भरपूर विश्वास के साथ स्वीकार किया गया। उस समय प्रशासनिक अनुभव की कमी थी और आर्थिक दरिद्रता भी। उसी समय देश-विभाजन की प्रक्रिया के दौरान दो वर्गों में आपसी संघर्ष शुरू हो गए, कोढ़ में खाज हो गया। पूरा देश सांप्रदायिक आग में झुलसने लगा, हाहाकार मच गया, लोग एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए। लाखों परिवार बेघर हो गए। सरकार के सामने शांति व्यवस्था को कायम करना, बेघर लोगों को बसाना और उनकी हरसंभव मदद करना था। तात्कालीन सरकार के समक्ष एक और बड़ी समस्या थी, देश को टुकड़ों में मिली आज़ादी के एकीकरण की। इन दोनों समस्याओं के निराकरण में सभी विचारधाराओं के नेताओं ने मिलजुलकर प्रयास किए और सद्भावी राजनीति का अभिनव उदाहरण प्रस्तुत किया।

जैसे-जैसे समय बीतता गया, नेतृत्व बदलता गया, राजनीतिक व्यवहार भी बदल गये। देश की सेवा के नाम पर सत्ता तक पहुँचना, नेताओं का धर्म हो गया और धीरे-धीरे सत्ता में आसीन दल के विरोधी दल आपस में शत्रु-सम हो गये, यहाँ तक कि प्रत्येक दल के अंदर भी आपसी शत्रुता का भाव विकसित हो गया। लोकतन्त्र में राजशाही के अवगुण घुस गये और अब गिराओ-पटाओ-निपटाओ-हटाओ की प्रवृत्ति सरे-आम हो गयी। चुनाव जीतने और सत्ता पर क़ाबिज़ बने रहने के लिए साम-दाम-दंड-भेद का वही सिलसिला जारी हो गया जिसके सूत्र महाभारत में वर्णित हैं। छल-बल की सर्वत्र जय-जयकार हो रही है। राजनीति में सब कौरव-पांडव हैं, श्री कृष्ण अंतर्ध्यान हैं। अच्छा है क्योंकि राजनेता श्री कृष्ण को याद करते हैं, उनकी बात करते हैं लेकिन किसी को भी श्री कृष्ण नहीं चाहिए, केवल उनका सुदर्शन चक्र चाहिए ताकि विरोधियों की गर्दन उतार दें। आज के कौरव-पांडव राजनीति के चतुर खिलाड़ी हैं, उन्हें मार्गदर्शक की ज़रूरत नहीं है, उसका मुखौटा पर्याप्त है।

अब राजनीति में शुचिता की कल्पना करना भी पाप है। सारे पाप राजनीति में स्वीकार्य है। देश की आज़ादी के बाद का समय था जब प्रजा के लिए राजनीति को संवैधानिक स्वरूप दिया गया था, 'हम भारत के नागरिक...', के बदले वह 'हम भारत के मतदाता...' हो गया है। मत देने के लिए नागरिक हो, मतदान के बाद उनकी दूध देने वाली गाय। निचो-निचो कर दूध निकाल लेते हैं, गाय का बछड़ा मुंह ताकता खड़ा रह जाता है।

प्रजातन्त्र में नागरिक तंत्र का मालिक होता है लेकिन भारत में चुनाव सम्पन्न हो जाने के बाद वह स्वाती की बूंद को तरसते चातक की भांति हो जाता है। शासक एक-आध बूंद टपका कर अगले चुनाव के लिए अपना वोट पक्का करने की कोशिश करता है लेकिन वोटर इतना भी मूर्ख नहीं होता, अगले चुनाव में शासक दल को उठाकर पटकने का मन बना लेता है।

तब ही मीडिया सत्ता की मदद के लिए अवतरित होता है। सत्ता और विरोधी दलों के गुणगान करता है, उनकी पुरानी भूलों को भूल जाने का अनुरोध करता है, नये सपने दिखाता है, नेताओं के उत्साहवर्धक और लच्छेदार भाषण प्रसारित करता है, नागरिक पुनः वोटर बन जाता है और आँख मूंदकर ईवीएम की एक बटन को दबाकर अपने भविष्य के सुनहरे सपने देखने लगता है।

राजनीतिज्ञ उसे सपने दिखाकर मुस्कुराता हुआ विलुप्त हो जाता है। सपने टूटने पर नागरिक अपनी आँखें मिचमिचाता हुआ जागता है। जब दृष्टि साफ होती है तो न नेता दिखता, न राजनीति समझ आती, उसे पैरों तले काँच के टुकड़े बिखरे हुए दिखाई पड़ते हैं। नागरिक उन काँच के टुकड़ों से बचता हुआ अगले पंचवर्षीय लोकतान्त्रिक यज्ञ की प्रतीक्षा करते आगे बढ़ने की धीरे-धीरे कोशिश करता है लेकिन पैरों में काँच घुसते जाते हैं, खून बहता है तब ही टेलीविज़न में हँसता-मुस्कुराता चेहरा फिर उभरता है और उससे कहता है, 'कहीं जाना नहीं, अपने घर में रहना, तुम्हारे लिए मरहम भेज रहा हूँ, मुझे तुम्हारी बहुत फिक्र है। मैं तुम्हारा सेवक हूँ, तुम मेरे मालिक हो।'

नागरिक को फिर से नींद आ जाती है।

-द्वारिका प्रसाद अग्रवाल

बिलासपुर (छत्तीसगढ़)


9893123663

PC: CNN

राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की जरूरत

आकांक्षा यादव

लखनऊ, उत्तर प्रदेश।

भारत में 17 वीं लोकसभा चुनावों की घोषणा के साथ ही राजनीति में आधी आबादी की भागीदारी का सवाल फिर तेजी से उठने लगा है। देश के तमाम राजनैतिक दल भले ही अपने भाषणों और घोषणा पत्रों में नारी-सशक्तिकरण की बातें करते हों, पर वास्तविक धरातल पर यथार्थ कुछ और ही है। वर्तमान में 543 सदस्यों वाली 16 वीं लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या मात्र 61 है,जो कि अब तक का सर्वाधिक आंकड़ा है। आज़ादी के बाद केवल 15वीं और 16वीं लोकसभा में महिलाओं के प्रतिनिधित्व में बढ़ोतरी देखने को मिली, जो इससे पहले 9% से कम रहती थी। उत्तर प्रदेश से महिला सांसदों का राष्ट्रीय औसत प्रतिनिधित्व 17.5% (14 सांसद) अपेक्षाकृत कुछ बेहतर है, जबकि महाराष्ट्र में यह केवल 12.5% (6 सांसद) और बिहार केवल 7.9% (3 सांसद) है।

भारतीय राजनीति में तमाम महिलाएं शीर्ष पर स्थान बनाने में कामयाब हुई हैं। देश की राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, विपक्ष की नेता, कैबिनेट मंत्री और विभिन्न राज्यों में मुख्यमंत्री व राज्यपाल तक महिलाएं पदासीन रही हैं। भारत की प्रथम महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांँधी, प्रथम महिला राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल, प्रथम महिला केन्द्रीय मंत्री (स्वास्थ्य मंत्री) राजकुमारी अमृत कौर, प्रथम महिला विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, प्रथम महिला रेल मंत्री ममता बनर्जी, प्रथम महिला रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण, प्रथम महिला सांसद राधाबाई सुबरायण, राज्यसभा की प्रथम महिला उपसभापति नजमा हेपतुल्ला, लोकसभा की प्रथम महिला अध्यक्ष मीरा कुमार, लोकसभा में प्रथम महिला प्रतिपक्ष

नेता सुषमा स्वराज, प्रथम महिला राज्यपाल सरोजिनी नायडू (उत्तर प्रदेश, 1947), प्रथम महिला मुख्यमंत्री सुचेता कृपलानी (उत्तर प्रदेश, 1963), प्रथम मुस्लिम महिला मुख्यमंत्री सैयद अनवरा तैमूर (असोम, 1980), प्रथम दलित महिला मुख्यमंत्री मायावती (उत्तर प्रदेश, 1995), प्रथम महिला विधायक मुत्तुलक्ष्मी रेड्डी, किसी राज्य की विधान सभा की प्रथम महिला स्पीकर शन्नो देवी जैसी तमाम महिलाओं ने समय-समय पर भारतीय राजनीति को नई ऊँचाइयाँ दी हैं। अभी तक भारत में 20 महिलाएं राज्यपाल बन चुकी हैं, जिसमें राजस्थान की पहली महिला राज्यपाल प्रतिभा पाटिल देश की पहली महिला राष्ट्रपति बनीं। विभिन्न राज्यों की मुख्यमंत्री के रूप में अब तक 15 महिलाओं ने गद्दी संभाली है। दलगत राजनीति की बात करें तो कांग्रेस पार्टी की प्रथम भारतीय महिला अध्यक्ष सरोजिनी नायडू रहीं तो कांग्रेस पार्टी में अध्यक्ष एवं संसदीय दल के नेता का दोहरा पदभार संभालने वाली प्रथम महिला नेता सोनिया गाँधी रहीं। बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती, तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी, अन्नाद्रमुक की अध्यक्ष स्वर्गीया जयललिता, पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती सहित तमाम महिला नेत्रियों ने समय-समय पर अपने दलों का नेतृत्व किया है।

उपरोक्त स्थिति देखकर किसी को भी भ्रम हो सकता है कि भारत में नारी सशक्तिकरण चरम पर है और महिलाएं न सिर्फ घर चला रही हैं बल्कि देश भी चला रही हैं। पर क्या वाकई ऐसा है या यह उपस्थिति प्रतीकात्मक मात्र है ? राजनैतिक स्तर पर ऊपरी तौर पर भले ही महिला प्रतिनिधित्व एक गुलाबी तस्वीर पेश करता है, पर इन सबके बीच भारत के संसदीय लोकतंत्र में महिलाओं की स्थिति कितनी कमजोर है, इसका पता दुनियाभर की संसदों में महिलाओं के प्रतिनिधित्व पर अंतर्राष्ट्रीय संस्था इंटर पार्लियामेंट्री यूनियन (आईपीयू) द्वारा हर वर्ष अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर जारी आँकड़ों से चलता है। इसके अनुसार भारत की संसद या विधानसभा में महिला जनप्रतिनिधियों की काफी कम उपस्थिति महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण राजनीतिक मानसिकता का प्रतीक है। संसद के निचले सदन लोकसभा की बात करें तो महिला सांसदों के प्रतिशत के मामले में भारत विश्व में 193 देशों में 153वें स्थान पर है। आँकड़ों पर गौर फरमायें तो हम यूरोप, अमेरिका और दुनिया के अन्य विकसित देशों की संसदों में महिला जनप्रतिनिधियों की संख्या के मुकाबले बहुत पीछे हैं। हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, चीन और अफगानिस्तान भी हमसे कहीं आगे हैं।

संयुक्त राष्ट्र के मंच पर 22 मार्च, 2019 को संयुक्त राष्ट्र के लिये भारत के उप स्थायी प्रतिनिधि राजदूत नागराज नायडू ने बताया कि आज भारत में 14 लाख निर्वाचित महिला प्रतिनिधि हैं। निकाय स्तर पर चुने गये कुल प्रतिनिधियों में 44 प्रतिशित महिलाएं हैं जबकि भारत के गांवों में मुखिया के तौर पर 43 प्रतिशत महिलाएं चुनी गयीं हैं। इसके आगे नायडू ने कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता में महिलाएं भले ही महत्वपूर्ण पदों पर हों लेकिन राष्ट्रीय संसद में उनका प्रतिनिधित्व अब भी कम बना हुआ है। पिछले आम चुनाव में निर्वाचित प्रतिनिधियों में मात्र 12 प्रतिशत महिलाएं चुन कर आईं। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम द्वारा तैयार एक रिपोर्ट में भी बताया गया है कि लैंगिक समानता के लिहाज 2018 में भारतीय संसद में महिलाओं की संख्या सबसे कम, महज 12 प्रतिशत है, जबकि सेनेगल जैसे देश की संसद में महिला प्रतिनिधियों की संख्या 42 प्रतिशत है।

नारी सशक्तिकरण सिर्फ एक अमूर्त अवधारणा नहीं है बल्कि इसका किसी भी देश की राजनीति से गहरा संबंध होता है। यही कारण है कि इस पर जब भी चर्चा की जाती है तो अक्सर राजनीति में महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व पर अफसोस जताया जाता है। वस्तुतः राजनीति में महिलाओं को बराबर की भागीदारी देने की बात विभिन्न राजनैतिक दलों, न्यूज चैनल्स से लेकर सार्वजनिक मंचों पर आए दिन होती है लेकिन उसके क्रियान्वयन के प्रति सभी राजनैतिक दल उदासीन ही रहते हैं। भाषणों में नारी सशक्तिकरण तथा बराबरी की बात करनेवाले दलों की असलियत चुनावों में टिकट वितरण के दौरान ही सामने आ जाती है। अधिकतर महिलाएं जिन्हें टिकट मिलता है, वे भी ज्यादातर राजनैतिक परिवारों से ही संबंध रखती हैं। कई बार तो राजनैतिक दल प्रमुख महिला प्रत्याशी के खिलाफ महिला को ही मैदान में उतारते हैं। ऐसे में एक ही महिला चुनाव जीत पाती है और इस तरह बहुत सी प्रतिभावान महिलाएं संसद या विधानसभाओं में पहुँंचने से वंचित रह जाती हैं। यही कारण है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत में विधायिका स्तर पर महिलाओं का प्रतिनिधित्व अन्य देशों के मुकाबले काफी कम है।

महिलाओं की चुनाव प्रक्रिया में भागीदारी का विश्लेषण एक पिरामिड मॉडल के रूप में किया जा सकता है। इसमें सबसे ऊपर लोकसभा में उनकी 1952 में मौजूदगी (20 सीट) बढ़कर 2014 में 61 सीट तक आ गई है, जो कि 36 फीसदी वृद्धि को दर्शाता है। इस बढ़ती संख्या के बावजूद लैंगिक भेदभाव अब भी भारी मात्रा में मौजूद है और लोकसभा में दस में से नौ सांसद पुरुष हैं। 1952 में लोकसभा में महिलाओं की संख्या 4.4 फीसदी थी जो 2014 में करीब 11 फीसदी थी, लेकिन यह अब भी वैश्विक औसत 22 फीसदी से कम है। यदि चुनावों में खड़ी महिलाओं के सापेक्ष उनका प्रतिशत देखें तो दूसरे लोकसभा चुनाव में खड़ी होने वाली महिला उम्मीदवारों में 48.89 प्रतिशत, तीसरे चुनाव में 46.97, चौथे चुनाव में 43.28, पांचवें चुनाव में 24.49, छठें चुनाव में 27.14, सातवें चुनाव में 19.58, आठवें चुनाव में 25.15, नौवें चुनाव में 14.64, दसवें चुनाव में 11.51, ग्यारहवें चुनाव में 6.68, बारहवें चुनाव में 15.69, तेरहवें चुनाव में 17.25, चौदहवें चुनाव में 12.68, पंद्रहवें लोकसभा चुनाव में 10.61 प्रतिशत ने जीत दर्ज की।

दुनिया भर में राजनीतिक जीवन में महिलाओं द्वारा हासिल की गयी बढ़त और लैंगिक भेदभाव के खिलाफ संघर्ष जारी रखने की प्रतिबद्धता के बीच संसद तक महिलाओं की पहुँच कई कारणों से प्रभावित होती है जिसमें संसदों तक महिलाओं को पहुँंचाने में आरक्षण एक मुख्य माध्यम है। आईपीयू के अनुसार आरक्षण महत्वाकांक्षी, व्यापक होना चाहिए और उसे प्रभावकारी बनाने के लिए उसका क्रियान्वयन होना चाहिए। भारत में महिलाओं के मुद्दों के प्रति राजनीतिक दलों की गंभीरता महिला आरक्षण बिल को पास करने में असफलता से ही साफ हो जाती है। पिछले कुछ चुनावों के प्रमुख राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों पर नजर डालने से साफ हो जाता है कि उनमें लैंगिक मुद्दे प्रमुखता रखते हैं। महिला सशक्तिकरण यानी उन्हें सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक आधार पर बेहतर स्थान देने के वादे कमोबेश हर राजनीतिक दल के पिटारे में है। मगर सच्चाई इन लोकलुभावन वादों से कोसों दूर है। संसद और विधानसभा में राजनीतिक दल महिला आरक्षण बिल पारित करने की हुंकार जरूर भरते हैं, लेकिन जब राजनीतिक नुमाइंदगी की बात आती है तो 10 फीसदी टिकट भी महिलाओं को नहीं दिये जाते। महिला उम्मीदवारों को जीतने लायक नहीं माना जाता। जिन महिलाओं को टिकट दिया भी जाता है उनमें से ज्यादातर किन्हीं राजनीतिक दल के नेताओं की सगी-संबंधी होती हैं। ऐसे में आर्थिक और सामाजिक बंधनों से मुक्त होने के लिए संघर्ष कर रही आम महिलाओं को वाजिब प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाता। महिलाओं का राजनीतिक स्तर सुधारने के उद्देश्य से उठाये गये पहले कदम के रूप में सरकार द्वारा 1992 में 73 वें और 74 वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा क्रमशः पंचायतों और नगर पालिका स्तर पर महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षण का प्रावधान किया गया। इससे प्राथमिक स्तर पर राजनीति में महिलाओं की भागीदारी तो सुनिश्चित हो गई किन्तु इससे आगे संसद में कोई फर्क नहीं पड़ा। तब संसद में भी महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए एक नये विधेयक की जरूरत महसूस की जाने लगी। यदि महिला आरक्षण कानून लागू हो जाये, तो लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या स्वतः 179 हो जायेगी।

महिला आरक्षण विधेयक को सर्वप्रथम 12 सितम्बर, 1996 को 81वें संविधान संशोधन के साथ एच.डी. देवगौड़ा की संयुक्त मोर्चा सरकार ने लोकसभा में पेश किया, लेकिन 1997 में 11वीं लोकसभा भंग होने के साथ ही यह विधेयक भी ठंडे बस्ते में चला गया। अंतिम बार महिला आरक्षण विधेयक, 2008 (108वाँ संविधान संशोधन विधेयक) को राज्यसभा ने अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के एक दिन बाद 9 मार्च 2010 को पारित किया था, लेकिन 9 साल बीतने के बाद भी यह लोकसभा से पारित नहीं हो पाया है। लोकसभा का कार्यकाल पूरा हो जाने की वज़ह से यह विधेयक रद्द हो जाता है। इस विधेयक में महिलाओं के लिये लोकसभा और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है। व्यावहारिक तौर पर देखें तो राजनैतिक दल स्वयमेव अपने स्तर पर भी टिकट बँटवारे के समय महिलाओं को आरक्षण दे सकते हैं, पर आज तक किसी राजनैतिक दल ने इस संबंध में कदम नहीं उठाया। आज तक के विधानसभा व लोकसभा चुनावों का चार्ट देखा जाय तो इन पार्टियाँ ने 33 प्रतिशत कौन कहे, 10 प्रतिशत भी महिलाओं को टिकट नहीं दिया।

भारत में महिला आंदोलन इस वक्त संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के सवालों पर सकारात्मक कार्रवाई को लेकर बँंटा हुआ है। यह मूलतः दो बातों पर केंद्रित है- पहला कुल मिलाकर महिला आरक्षण का कोटा बढ़ाने को लेकर और उसमें पिछड़ी जाति की महिलाओं को लेकर और दूसरा अभिजात्यवाद के मुद्दे पर। निस्संदेह संसदीय सीटों पर मिले आरक्षण में जिस प्रकार अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को शीर्ष स्तर पर पहचान मिली है, उसी प्रकार विधायिका में महिलाओं को आरक्षण मिलने से उनकी राजनीतिक और सामाजिक हैसियत में भी सकारात्मक बदलाव आएगा। समाज के दलित-पिछड़े वर्ग से आने वाली महिला प्रतिनिधियों के साथ कैसा व्यवहार होता है, किसी से नहीं छुपा है। बिहार से मुसहर जाति की एक सांसद को टी.टी. ने ट्रेन के वातानुकूलित कोच से परिचय देने के बावजूद इसलिये बाहर निकाल दिया क्योंकि वह वेश-भूषा से वातानुकूलित कोच में बैठने लायक नहीं लगती थीं।

दुनिया भर में महिलाओं को भेदभाव, हिंसा, पार्टियों के ढांचे, गरीबी और धन की कमी के चलते संसदों से दूर रखा जाता है। लोकसभा और फैसले लेने वाली जगहों, जैसे कि मंत्रिमंडल में महिलाओं का कम प्रतिनिधित्व सीधे-सीधे राजनीतिक ढांचे से उनको सुनियोजित ढंग से बाहर रखने और मूलभूत लैंगिक भेदभाव को रेखांकित करता है। आईपीयू के मुताबिक सरकार में मंत्री पद संभालने के मोर्चे पर भारत दुनिया में 37वें नंबर पर है। नरेंद्र मोदी के 27 केंद्रीय मंत्रियों के मंत्रिमंडल में छः महिलाओं को जगह मिली है। यह 22.2 फीसदी है। दुनिया के 273 सदनों में से 43 (15.8 फीसद) में अध्यक्ष पद महिलाओं के हाथ में है। इनमें लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन भी हैं। हालांकि महिलाएं राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर ठीक-ठाक संख्या में राजनीतिक दलों का प्रतिनिधित्व करती हैं लेकिन इन राजनीतिक दलों में भी उच्च पदों पर महिलाओं की उपस्थिति कम ही है।

आज देश में कुल मतदाताओं की संख्या में आधी संख्या महिला वोटरों की है, पर उनकी संख्या के हिसाब से उन्हें समान आधार पर नेतृत्व कभी नहीं मिला। सवाल यह उठता है कि एक तिहाई आरक्षण का आधार क्या है और एक तिहाई आरक्षण ही क्यों ? अगर जनसंख्या को आधार बनाना है तो यह आरक्षण स्त्री-पुरुष अनुपात के हिसाब से होना चाहिए। साथ ही यह आरक्षण केवल लोकसभा और विधानसभाओं में ही क्यों? इसके साथ ही इसका प्रावधान राज्यसभा और विधान परिषदों में भी होना चाहिए। संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण एक तस्वीर बदलने वाला मुकाम साबित हो सकता है क्योंकि यह कदम न सिर्फ पितृसत्तात्मक सोच को बदलेगा बल्कि इससे महिला-समर्थक कानूनों को भी बढ़ावा मिलेगा। इससे कन्या शिशु के बारे में भी धारणा बदलेगी। फिलहाल पंचायती राज में महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण देने की बात चल रही है। जब संसद में महिलाएँ सशक्त बनती हैं, और वह भी बड़ी संख्या में, तो वह ज्यादा से ज्यादा लोगों की प्रतिनिधि हो जाती हैं। ऐसे में महिलाओं को बोझ समझने वाली पूरी सोच को ही बदला जा सकता है। यदि संसद में 33 प्रतिशत महिलाएंँ हैं तो वे महिलाओं के हितों और जरूरतों को आगे बढ़ाने के लिए तेजी से पार्टी लाइन में आगे बढ़ेंगीं। 33 प्रतिशत आरक्षण तो बस एक शुरूआत है और असली लक्ष्य बराबरी होना चाहिए। तभी स्त्रियों के अधिकारों उनकी समस्याओं, स्त्री विमर्श तथा उनकी मुक्ति संबंधी विषयों पर संसद में खुलकर बहस हो सकती है।

वक्त के साथ महिलाओं ने सफलता के तमाम नए आयाम रचे हैं। शिक्षा, नौकरी, पैतृक सम्पत्ति में बराबरी का हक पाने के साथ ही आई.टी. एवं विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी अपनी योग्यता सिद्ध की है। ऐसे में इसमें कोई शक नहीं कि महिलाएं राजनीति में बेहतर कर सकती हैं। संभवतः पितृसत्तात्मक राजनीति में इसे स्वीकार करने का माद्दा नहीं है। यही वजह है कि महिलाएं तमाम विरोध के बावजूद अगर टिकट पा भी जाती हैं तो उनके पक्ष में उनकी पार्टी के लोगों को कई बार खड़े होने में हिचक होती है। कई बार राजनीति के प्रति उदासीनता भी महिलाओं को इस क्षेत्र में आगे बढ़ने से रोकती है। व्यवस्था परिवर्तन के लिए राजनीति एक सशक्त माध्यम माना गया है। इसमें उन्हें अपनी भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी। राजनैतिक दलों की पहल पर ही महिलाओं की राजनीति में भागीदारी आसानी से बढ़ सकती है। दलों के संगठनात्मक ढाँचा खड़ा करने से लेकर टिकट वितरण तक महिलाओं का स्थान तय करना होगा। अब महिलाओं को अपनी मंजिल खुद तय करनी होगी और इस मंजिल को पाने के लिये खुद ही रास्ते तलाशने होंगे। सत्ता में महिलाओं की भागीदारी का अनुपात किसी भी देश की सार्थक प्रगति का मापदंड है। अब समय आ गया है कि हमारे देश की राजनीति और राजनेता महिलाओं के प्रति अपनी सोच को उदार बनायें और उन्हें समुचित स्थान दें।

आकांक्षा यादव,

टाइप 5 ऑफिसर्स क्वार्टर नंबर-15,

संचार कॉलोनी, अलीगंज, लखनऊ-226024

मो.-09413666599

ई-मेल : akankshay1982@gmail.com


साहित्य और राजनीति

पूजा गुप्ता


दिल्ली विश्वविद्यालय

जिस प्रकार राजनीति एक शासन पद्धति है,ठीक उसी प्रकार साहित्य एक जीवन पद्धति है,जिस प्रकार राजनीति का उद्देश्य अच्छी शासन पद्धति द्वारा खुशहाल जीवन देना होता है,ठीक उसी प्रकार साहित्य की चिंता भी मनुष्य मात्र में सुखमय जीवन की इच्छा व बेहतर समाज बनाने का प्रयास है!

अगर इतिहास देखे तो साहित्य और राजनीति की यह पारस्परिकता नई नहीं है! संस्कृत साहित्य से परिचित लोग जानते है कि वाणभट्ट की कादंबरी मे शुकनासोपदेश राजनीति के बारे मे एक गंभीर उपदेश है! प्रसिद्ध ग्रंथ पंचतंत्र की रचना ही राजकुमारो को राजनीति की शिक्षा देने के लिए हुई थी! कालिदास ने भी अपनी रचनाओ मे राजनीति पर टिप्पणी की है !शूद्रक के मृच्छकटिकम (मिट्टी की गाड़ी) और विशाख के मुद्राराक्षस की बात ही क्या,ये तो शुद्ध रूप से राजनीतिक नाटक थे!साहित्य समूचे समाज से जुड़ा हुआ है जिसका एक अनिवार्य अंग राजनीति है, इसलिए राजनीति से उसकी दूरी अस्वाभाविक है! साहित्य राजनीति की दिशा तय करता है! कबीर,प्रेमचंद,केदारनाथ अग्रवाल इसके उदाहरण है! साहित्य और राजनीति को अलग-थलग करके देखना यह साहित्य और राजनीति दोनों का अति सरलीकरण है, हमे याद होना चाहिए कि आज़ादी के पूर्व गुलामी के विरुद्ध लड़ाई साहित्यकारो और राजनेताओ ने कंधे से कंधा मिलाकर लड़ी थी! ”न खिचो कमानो को न तीर निकालो /जब तोप मुक़ाबिल हो तो अखबार निकालो!” यह पंक्ति

तत्कालीन ब्रिटिस हुकूमत के विरुद्ध साहित्यकरो ने दी थी! उस समय ‘प्रताप पत्रिका’ द्वारा आज़ादी का अलख जगाना प्रेमचंद के कहानी संग्रह “सोजे वतन” पर प्रतिबंध लगाना इत्यादि दर्शाता है कि साहित्यकार राजनीति के प्रति कितने संजीदा थे! राम नरेश त्रिपाठी से लेकर माखन लाल चतुर्वेदी तक कई कवियों ने जेल यात्राए भी की!

आज़ादी के बाद भारतीय मानस मे सरकार के प्रति उपजा असंतोस व नक्कसलबाड़ी आंदोलन को खुल कर वैचारिक समर्थन दिया,इंदिरागांधी के आपातकाल के खिलाफ नागार्जुन जैसे कवियों ने खूब जमकर लिखा और जेल की हवा भी खाई!

कवि कविता लिखता है,या इतिहास? निश्चित ही वह कविता लिखता है,लेकिन अगर उसकी कविता इतिहास दर्ज करने के दर्प या इतिहास मे दर्ज होने की आकांक्षा से परे, ईमानदारी से अपने समय को दर्ज करती है,तो इतिहास अपने आप उसमे दर्ज होता जाता है!नागार्जुन एक कुशल जासूस की तरह अपने समय की गहन पड़ताल करते है,और अपनी कविता को समय की गवाही देने के लिए शब्द और साहस देते है! अपने समय मे संघर्षरत उज्ज्वल-कज्जवल शक्तियों की पहचान का विवेक और तंत्र के वजाय जन के पक्ष मे खुलकर खड़े होने का साहस नागार्जुन को एक समय-सजग एक राजनीति कवि बनाता है ! कवि प्रदीप जैसे रचनाकार जब ‘साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल’ लिख रहे थे,तब नागार्जुन की घुच्ची आंखे गांधी जी के चेलों की लीला को देख रही थी:

सेठों का हित साध रहे है,तीनों बंदर बापू के

युग पर प्रवचन लाद रहे है तीनों बंदर बापू के......!

पूंजी की चाकरी मे लगी राजनीति को नागार्जुन कितनी स्पष्टता से देख रहे थे देश पर अधिकांश समय राज करने वाले नेहरू-गांधी परिवार के तीसरे प्रधानमंत्री राजीव गांधी को अस्सी के दशक मे जाकर यह रहस्य पता चल पाया कि केंद्र से अगर एक रुपया भेजा जाता है तो आम आदमी तक उसमे से सिर्फ 15 पैसे ही पहुचते है! आज कल उनके पुत्र राहुल गांधी भी कुछ ऐसी ही बात कर रहे है!राजीवगंधी ने अगर 1958 मे लिखी

नागार्जुन कि कविता ‘नया तरीका अपनाया है राधे ने इस बार’ पढ़ ली होती तो बहुत पहले पता चल जाता कि 85 पैसे कहा और कैसे चला जाता है! इस कविता मे वे कालाबाजारी और राजनीति के नेक्कस को बहुत सहजता से समझाते है!

‘नया तरीका अपनाया है राधे ने इस बार

बैलों वाले पोस्टर साटे,चमक उठी दीवार

उस दौर मे दो बैलों की जोड़ी कॉंग्रेस का चुनाव चिनह थी! दीवार पर बैलों वाले पोस्टर चिपकाने और सरकारी गल्ला नेपाल भेजने के अंतसंबंध को समझते है!नेहरू के बाद लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने! इस नए भाग्य विधाता के राज मे महंगाई और अन्य संकट ने किस तरह जनता कि कमर तोड़ दी है!फिर नागार्जुन शास्त्री युग के बारे मे लिखते है, ‘जनता मुझसे पुछ रही है क्या बतलाऊँ /जन कवि हूँ मै साफ कहूँगा क्यूँ हकलाऊँ’!

वही 1966 मे नागार्जुन ‘शासन की बंदूक’ में शासन कि इस बंदूक की सिर्फ लानत-मलानत करके नहीं रह जाते,बल्कि बिल्कुल साफ शब्दों में उसकी पराजय का घोष भी करते हैं! सन 1973 में बंग-विजय के बाद इंदिरागांधी का आत्मविश्वास चरम पर था! वही नागार्जुन के तेवड़ भी कड़े हो गए और 1975 में कविता लिखी जिसका शीर्षक ‘बाघिन’ था!

इस बाघिन को रखेंगे हम चिड़ीयां घर में

ऐसा जन्तु मिलेगा भी क्या त्रिभुवन भर में

ऐसी पंक्तियां लिखने के लिए कितने साहस की जरूरत रही होगी,इसका अंदाज़ा वही लगा सकता है,जिसने 1974-75 के दौड़ को देखा हो! इंदिरागांधी ने 1975 मेँ देश मेँ आपातकाल लगाया,लंगड़ी लोकशाही से तानाशाही की तरफ बढ़ते घोड़े की टाप को वो बहुत साफ-साफ सुन रहे थे

‘इन्दु जी,इन्दु जी क्या हुआ आपको’ शीर्षक कविता मेँ वे बचपन का नाम लेकर इंदिरागांधी को चेतावनी देते हैं! 1976 मेँ लिखी उनकी कविता ‘चंदू मैंने सपना देखा’ मेँ नये युग की आहट को साफ-साफ सुना जा सकता है!फिर वह दिन भी आया जब लगा कि जनता ने लड़ाई जीत ली है,लेकिन जीत जनता की नहीं जनता पार्टी कि हुई थी! उस जीत के बाद 1977 मेँ मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने तो जन कवि ने उन्हे भी चेतवानी दे दी!

तुम पर बोझ न होगी जनता,खुद अपने दुख दैन्या हरेगी

हाँ,हाँ तुम बूढ़ी मशीन हो,जनता तुमको ठीक करेगी

इसी तरह एक और हिन्दू हृदय सम्राट बाल ठाकरे को नागार्जुन बेखौफ होकर लोकतन्त्र का काल बताते है!

बाल ठाकरे,बाल ठाकरे,लोकतन्त्र का का काल ठाकरे.....

नेहरू से लेकर राजीवगांधी तक और समाजवाद की स्थापना से लेकर उसके ध्वंस तक का समूचा भारतीय राजनीतिक मानस नागार्जुन की कविता मेँ बोलता है!इन्ही के साथी मुक्तिबोध ने राजनीतिक साहित्य को गंभीर बनाया! इनकी उपस्थिती वैचारिक तीव्रता के लिए ही मानी जाती है!कभी रामधारी सिंह दिनकर ने कहा

था कि,साहित्य राजनीति का अनुचर नहीं स्वतंत्र है! उसे पूरा अधिकार है कि जीवन के विशाल क्षत्र मेँ से वह अपने कार्य के योग्य वे सभी द्रव्य उठा ले जिन्हे राजनीतिक अपने काम मेँ लाती है!अगर राजनीति अपनी शक्ति से सत्य कि प्रतिमा तैयार कर सकती है,तो साहित्य मे भी इतनी सामर्थ्य है कि वह उसके मुख मेँ जीभ भर दे!

रघुवीर सहाय और धूमिल द्वारा राजनीतिक प्रतिष्ठान की गहन आलोचना के उदाहरण रघुवीर सहाय की कविता ‘अधिनायक’ और धूमिल का समूचा काव्य संग्रह ‘संसद से सड़क’ तक है!इनकी कविताओं मेँ राजनीतिक विसंगतियाँ, आम आदमी की पीड़ा, संघर्ष,व्याकुलता, अत्यंत तीव्रता एवं तिक्षन्ता से उभरती है!सठोत्री के दौर के हिन्दी साहित्य मेँ मोहभंग की जो अनुगूँज सुनाई देती है,उस अनुगूँज मेँ सहाय की आवाज़ भी शामिल थी! तब शोसक वर्गो की नुमाईदगी करने वाले राजनेता किसी रचनाकार को भी अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता नहीं देना चाहते थे!तब कविता पर भी सेंसरसीप लागू हो गई थी! ‘फिल्म के बाद चीख’ कविता मेँ सहाय ने शोषक वर्गो द्वारा साहित्य अनुशासन के बारे मेँ चुटकी लेते हुए लिखा है : “संसद एक मंदिर है जहाँ किसी को द्रोही कहा नहीं जा सकता/दूध पिये मुह पोछे आ बैठे .........! पूंजीवादी जनतंत्र मेँ भी मनुष्य और मनुष्य के बीच असमानता और सामाजिक अन्याय का बोलवाला है,इस व्यवस्था मेँ भी गरीब को रोटी नसीब नहीं हो रही है! ‘नेता क्षमा करें’ कविता मेँ उन्होने लिखा है, ‘मैं तुम्हें रोटी नहीं दे सकता/ना उसके साथ खाने के लिए गम .................!

एक आलेख मेँ मैंने दर्ज़ ये किस्सा पढ़ा था कि ‘सीढ़ियां उतरते हुए नेहरू लड़खड़ा गए और दिनकर ने उन्हे सहारा दिया ;प्रधानमंत्री ने कहा- शुक्रिया,और राष्ट्रकवि ने कहा जब-जब राजनीति लड़खरायेगी,तब-तब साहित्य उसे सहारा देगी! इसका एक उदाहरण ‘असहिष्णुता आंदोलन’ है!

राजनीति सिर्फ एक मात्र राजनीति नहीं होती है बल्कि एक सत्ता और शासन भी होती है,जिनके द्वारा लिए गये छोटे से छोटा निर्णय भी नागरिक को प्रभावित करते है!उनके अविवेकपूर्ण निर्णय समाज मेँ विनाश के इबारत लिख सकते है,इसलिए सत्ता के प्रतिरोध मेँ साहित्यकार अपनी कलम की तागत दिखाता रहता है! मैं इन सभी बातों को एक वाक्य मे समाहित कर देना चाहती हूँ! ‘साहित्य समाज का दर्पण है’! और इस समाज मे अनेक प्रकार के लोग हैं,और सत्ता पर राज़ करने के लिए इन्ही मेँ से कुछ लोगो का समुदाय बनता है और फिर अनेक प्रकार के नीतियो का बीज पनपता है फिर जिसकी नीति सबसे दमदार होती है वही इस सत्ता का शासक बन जाता है!जब राजनीति समाज से पनपती है, तो साहित्यकार क्या अलग दुनियाँ से आएगें ? नहीं न तो ये स्पष्ट है की साहित्य और राजनीति समाज मे ही फलते-फुलते हैं! जब दोनों का उदेश्य सामाजिक जीवन की बेहतरी ही है तो फिर दोनों अलग-अलग कैसे हो सकते हैं साहित्य को राजनीति से कोई जन्मजात दुश्मनी नहीं बल्कि उनके जनहितकारी मुद्दो को लेकर मत वैभिन्य होता है! साहित्यकार अपनी कलम के द्वारा समाज मे हो रहे अच्छे-बुरे समाजिक तत्वों और सत्ता का आईना जनता को समय-समय पर दिखाती रहती है!और ये जरूरी भी है! सहित्य की भूमिका संकीर्णता मेँ नहीं अपितु व्यापकता मेँ देखने की जरूरत है!


महिला कहानीकारों की कहानियों में राजनीतिक विसंगतियों का चित्रण डॉ.अंजु

सहायक आचार्य , हिंदी विभाग

राजकीय कन्या महाविद्यालय , अजमेर

ईमेल – dranjukalyanwat@gmail.com


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शोध सार ( Abstract ) -

हिंदी कहानी लेखन में स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व से लेकर अद्यतन महिला कहानीकारों का सरोकार सामयिक परिवेश के व्यापक मुद्दों से रहा है । इसके अंतर्गत उन्होंने घर - परिवार की देहरी में कैद स्त्री से लेकर व्यापक सामाजिक सरोकारों को अभिव्यक्ति देते हुए राजनीतिक विसंगतियों और उनसे उपजी विद्रूपताओं को अपनी बेबाक लेखनी के द्वारा कहानियों में सटीक अभिव्यक्ति दी है ।

स्वातंत्र्योत्तर भारत में विदेशी गुलामी से मुक्ति के पश्चात प्रजातांत्रिक व्यवस्था में जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा अपना उल्लू सीधा करने के लिए आम जन की भावनाओं से खिलवाड़ करना , उन्हें मोहरा बना विद्वेष फैलाना , समाज के हर क्षेत्र में भ्रष्टाचार को बढ़ावा देना , नैतिक मूल्यों का अवमूल्यन , राष्ट्रीय हितों की अनदेखी और आमजन की समस्याओं के निराकरण में अरुचि एवं नौकरशाहों के माध्यम से अपने व्यक्तिगत स्वार्थों की पूर्ति जैसी अनेक राजनीतिक विसंगतियों की महिला कहानीकारों ने उसकी जड़ में जाकर पड़ताल की है । राजनीति के अमानवीय व घृणित पहलुओं को अपनी कहानियों का कथ्य बनाकर आमजन के सामने राजनीति के कलुषित चेहरे को बेपर्दा करने का प्रयास किया है । जिसमें उन्हें अपेक्षित सफलता भी प्राप्त हुई है।


विवेच्य शब्द ( Key words )- राजनीति ,सामाजिक विद्वेष ,भ्रष्टाचार ,नैतिक मूल्य , अवमूल्यन , आम जन।

शोध विस्तार :-

स्वाधीनता प्राप्ति से पूर्व कहानी लेखन में सक्रिय उषा देवी मित्रा , सुभद्रा कुमारी चौहान, होमवती देवी , शिवरानी देवी प्रेमचंद आदि कहानीकारों ने तत्कालीन राजनीति के सकारात्मक पहलू एवम् विसंगतियों को कहानियों के माध्यम से उजागर किया। उषा देवी मित्रा ने स्वाधीनता आंदोलन को दृष्टिगत रखते हुए ' नीम चमेली ' कहानी में गांधी जी से प्रेरित स्वदेशी और चरखा आंदोलन को कहानी में अभिव्यक्ति दी है। सुभद्रा कुमारी चौहान ने राजनीति केंद्रित कहानियों में राष्ट्रीय भावना, देशद्रोह, हिंदू - मुस्लिम समस्या को उठाया है। ' अमराई ', ' तांगेवाला ', ' गुलाब सिंह 'आदि कहानियों में भारतीय जनमानस की स्वतंत्रता प्राप्ति की लालसा और ब्रिटिश हुकूमत के प्रति घृणा - भाव को वाणी दी है।

होमवती देवी की स्वातंत्र्योत्तर काल की कहानियों यथा -' स्वप्नभंग ' ,' स्पेशल ट्रेन ' , ' चने ', 'पुरुषार्थ ', ' जनसेवक ' आदि में स्वाधीन भारत में कांग्रेस एवं सरकारी कर्मचारियों के चारित्रिक पतन , देश विभाजन के कुपरिणामों , सांप्रदायिक उपद्रव एवं शरणार्थियों की समस्याओं का यथार्थ अंकन हुआ है। शिवरानी देवी प्रेमचंद की ' राशन ' कहानी में राशन - व्यवस्था का कुप्रबंधन , रिश्वतखोरी , भ्रष्टाचार, ब्लैक आदि अनेक समस्याओं को एक साथ उठाया है।

स्वातंत्र्योत्तर भारत के राजनीतिक परिदृश्य में उथल -पुथल देखने को मिली। स्वतंत्रता देश के विभाजन की कीमत पर मिली । स्वतंत्र भारत के निवासियों ने अनेक सुंदर सपने संजोए जो राजनीतिक अवमूल्यन और स्वार्थपरता की भेंट चढ़ गए। इस दौर की सबसे बड़ी विसंगति राजनेताओं का भ्रष्ट होना रहा। भ्रष्ट राजनेता चरित्र , त्याग और आदर्शों का नकली मुखौटा पहने आमजन को भ्रमित करते हैं । मृदुला गर्ग ने ' टोपी ' कहानी में गांधीवादी नेताओं और स्वातंत्र्योत्तर भारत के परिवेश का व्यंग्यात्मक अंकन किया है । ऐसे भ्रष्ट माहौल में देश और समाज के हितेषी बने सेवक शरण जैसे लोग बड़े सधे हुए तरीके से स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व के संघर्ष को भुना रहे हैं ," अरे बंसल , लो इस बार तुम्हारा काम हमने कर दिया । एक ज़बरदस्त सोर्स हाथ लगा है। मेरठ में कोई एक सज्जन हैं , गांधी संस्थान के व्यवस्थापक । पता चला है कि ऐसे लाइसेंस उन्हें मिल जाया करते हैं और वे उन्हें प्रीमियम पर बेच देते हैं। मैं ना कहता था , आदमी वह खेल गहरा खेलता है । बस , तुम आज ही मिल कर बात पक्की कर लो । सुना है , वह भी इलाहाबाद यूनिवर्सिटी का पढ़ा हुआ है । नाम शरण कुमार । काम आसान हो गया न , क्यों ?" 1 इन्हीं की ' उलटी धारा ' कहानी में गांधीवादी सिद्धांतों का दिखावा करने वाले नेताओं की कलई खोलते हुए तीखा व्यंग्य किया गया है । कथानायक श्याम सिंह है। होली के दिन भांग के नशे में भारत - चीन युद्ध में उसकी प्रेम की दवा के कमाल की बात बताता है । वह इस प्रेम की दवा को अपनी गांधीवादी प्रेमिका को पिलाकर वश में कर लेता है । जो पिलपिले खद्दरधर्मियों के गीत गाया करती थी और आजादी के लिए संघर्ष करने को प्रेरित करती थी। दवा के नशे में उसका यह गांधीवादी ढोंग बेनकाब हो जाता है ," ..... अब प्रेमा का हाल क्या बयान करूं। दूध का घूंट भरा था कि तड़पकर बोली , यह साड़ी है गधे का बोझ। देखते - देखते उसने अपने बदन से उतार फेंकी। अगले दिन मुझसे मिली तो कीमती रेशमी साड़ी पहने थी । खुशमिज़ाजी से मुझसे बात की खालीस अंग्रेजी में , वह भी घुड़सवारी और पोलो से शुरू करके , लंदन कैंब्रिज में हुई मेरी तालीम के बारे में।"2

कहानी के अंत में मृदुला जी ने भारतीय राजनेताओं की मौकापरस्त दल - बदलू नीति पर भी करारा व्यंग्य किया है , " ऐसी दवा हिंदुस्तान में ईजाद हो सकती है। यहां की हवा की करामात है , साहब । तभी ना हमारे प्यारे नेता , इस मुस्तैदी से आये दिन अपने नारे और दल - बदल लेते हैं । हो न हो , यह करामाती दवा उन्हीं नेताओं की राख से तैयार की जाती होगी। तब मायूस होने की कोई बात नहीं है। दोबारा जरूरत पड़ने तक , दवा के लिए काफी कच्चा माल जमा हो जायेगा ।"3

राजनेता सत्ता प्राप्ति के लिए समाज - सेवा को सत्ता के गलियारों में पैठ बनाने का सबसे सस्ता और सरल माध्यम मानते हैं। चित्रा मुद्गल की 'जगदंबा बाबू गांव आ रहे हैं ' कहानी में राजनेता जगदंबा बाबू निर्धनों और विकलांगों के प्रति सेवा - भाव के प्रदर्शन के माध्यम से राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति का कपट रचते हैं।जिसे चित्रा जी ने गहराई से उद्घाटित किया है। पूर्व स्वास्थ्य मंत्री जगदंबा बाबू पिछले चुनावों में मात्र सात सौ वोटों से हार कर सत्ता - सुख से वंचित रह जाते हैं। भावी चुनाव की पूर्व तैयारी के लिए वे गांव आते हैं और विकलांगों की सहायता करने वाली अपनी संस्था की ओर से तिपहिया गाड़ियां एवं अन्य वस्तुएं बांटते हैं। सुक्खन भौजी अपने विकलांग बेटे ललौना के लिए गाड़ी पाकर उसके सुखद भविष्य के लिए सपने ले ही रही होती है , तभी ठाकुर सुमेर सिंह अपने आदमियों से वह गाड़ी उठवा लेते हैं। जाते - जाते यह धमकी और दे जाते हैं कि कोई पूछे तो चोरी में चले जाने की कहे न कि लोगों को घटना की सच्चाई बताएं -" कांपती टांगो से सुक्खन भौजी ने सांकल चढ़ाई और पलटकर कुठिया के भीतर दाखिल हो हाथ में कसी ढिबरी उस दीवार की ओर उठा दी जिस पर पंचायत घर से प्राप्त अख़बार की वह कतरन चिपका आई हुई थी जिसमें गाड़ी पर बैठे हुए ललौना और बगल में हर्षित मुद्रा में ताली बजाते हुए जगदंबा बाबू की तसवीर छपी हुई थी .....।"4

शिवानी ने ' करिए छिमा ' कहानी में राजनेता के वाक्चातुर्य , चरित्रहीनता और अवसरवादी प्रवृत्ति तथा उसके बेटे के माध्यम से बिगड़ैल नेता पुत्र द्वारा हड़ताल , आगजनी आदि घटिया हरकतों के माध्यम से सस्ती लोकप्रियता बटोरने एवं युवा - पीढ़ी को दिग्भ्रमित करने का यथार्थ अंकन किया है ," विद्यार्थियों की हड़ताल हुई तो काला झंडा लिए , कुल -दीपक ने ही स्वयं पिता का पुतला जला, विद्यार्थी समाज में अपना विशिष्ट स्थान बना लिया था। जहां नेता पद प्राप्त करने में पिता को सर्वस्व त्यागना पड़ा था, वहां पुत्र ने तीन ही दिन में सात बसें जला , असंख्य सरकारी इमारतों के बेंच तोड़ , एक रेलगाड़ी उलट , नेता का सर्वोच्च पद अनायास ही प्राप्त कर लिया था । " 5 यहां राष्ट्रीय - संपत्ति को नुकसान पहुंचा , हिंसक गतिविधियों से आमजन में भय व्याप्त कर एवं जोशीले युवाओं को हिंसा की आग में धकेल सस्ती लोकप्रियता हासिल करने की राजनेताओं की कुत्सित चालें बखूबी परत - दर - परत उधेड़ी गई है। इन्हीं की ' जिलाधीश ' कहानी में वाक्पटु , दल - बदलू , डाकूओं के संरक्षक और सरकारी मुलाजिमों से सांठगांठ रखने वाले भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे राजनेता की कलाई खोली है ," फिर वह दल बदलने में शायद अपनी कमीज बदलने से भी कम समय लेता था , इसी से उसका मूल्य इधर अचानक बढ़ गया था ।... कुछ लोगों का तो कहना था कि उसका वही फार्म जिले के दस्युदल का भिंडमुरैना है।"6

वर्तमान समय में नेताओं को देश - हित से अधिक अपनी कुर्सी प्रिय है।अगर कोई उत्साही युवा राजनेता जन - हितार्थ कुछ करना भी चाहता है तो सत्ता में काबिज नेता उसे भ्रष्ट राजनीतिक गलियारों की ऊँच - नीच समझा अपनी हरामखोर बिरादरी में शामिल कर लेते हैं।प्रतिमा वर्मा की ' बाढ़ का पानी ' कहानी का यह उदाहरण दृष्टव्य है ," भाई हरिबाबू ! आप में प्रतिभा भी है ,उत्साह भी , और सिंसयरिटी भी । रचनात्मक कामों में आपका कोई सानी नहीं है , मगर सिर्फ यही राजनीति नहीं है न । स्कूल , पुस्तकालय और सेवा केंद्र खोलना , आप कितनों का भला कर लेंगे जरा सोचिए ? " 7 हरिबाबू का राजनीति को जन - कल्याण का माध्यम बनाने का सपना नेताजी की कुटिल चाल तले दम तोड़ देता है। यह राजनीति का विकृत रूप है। इसी कहानी में आगे कहानीकार ने बाढ़ जैसी भीषण प्राकृतिक आपदा में भी स्थानीय नेता मुखिया ग्रामसेवक - पटवारी के साथ मिलीभगत कर बाढ़ - पीड़ितों के लिए एकत्र चंदा अपनी तिजोरी भरने और राहत - सामग्री को बाढ़ - पीड़ितों तक न पहुंचाकर घर में दबा अनाज महंगे दामों में बेचकर दोहरा लाभ कमाता है ," अरे , नहीं ..... क्या धरा है मुखिया गिरी में।' छोटे मामा अपनी गर्वस्फीत मुद्रा में यथासंभव नम्रता घोलते हुए बोले ," थोड़ा बहुत फायदा उठाने का चांस मिलता है तो उसमें भी चार जन हिस्सा बटाने चले आते हैं। जाने अटवारी - पटवारी , ग्राम - सेवक - ऐवक का प्रपंच क्यों लगाए हैं सरकार । वह तो भला हो रिलीफ का कि तीसरे चौथे - साल बाढ़ आ जाती है । लोगों की सिफारिश ऊपर पहुंचाने में कुछ पैदा हो जाता है। "8 प्राकृतिक आपदा और निर्धनता की दोहरी मार झेल रही जनता के कष्ट से इन तथाकथित जन नेताओं का सरोकार नहीं होता और न ही कोई उत्तरदायित्व का बोध । यह वर्तमान राजनेताओं का घिनौना रूप है स्वयं की उदर - पूर्ति और भौतिक संसाधन जुटाने के लिए राजनीति को माध्यम भर मानते ह।

राजनीति में चहुँओर नैतिक मूल्यों का अवमूल्यन और भ्रष्टाचार की जड़े गहरी होती चली जा रही है। साम ,दाम, दंड ,भेद सभी नीतियों का सहारा ले राजनेता अपने स्वार्थ सिद्धि करने में लगे रहते हैं और नाम मात्र के जनप्रतिनिधि कहलाते हैं। मतदान के समय फर्जी मतदान करवाना , बूथ कैप्चरिंग आदि इनके बाएं हाथ का खेल है । राजनीति की इन्हीं विसंगतियों पर प्रकाश डालते हुए डॉ. ज्ञानचंद शर्मा लिखते हैं ," वर्तमान युग में सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार राजनीति मैं देखने को मिलता है। ये लोग पैसे के बल जाने क्या - क्या दुष्कर्म करते रहते हैं। धन का सहारा लेकर वोट ही नहीं डलवाते हैं बल्कि चुनाव परिणाम भी अपने हक में घोषित करवा देते हैं । यह लोग ( राजनीतिज्ञ ) चुनाव के समय जनता में न जाने क्या - क्या झूठे वायदे करते रहते हैं। अपने स्वार्थ हेतु जनता के हृदय में अपना विश्वास बैठाने की डींगे मारना शुरू कर देते हैं।"9

नमिता सिंह ने 'ठहरा हुआ सवेरा ' कहानी में राजनेताओं की दोगलीनीति का उद्घाटन किया है। कथानायक बबुआ अपनी स्वार्थ - पूर्ति के लिए दोहरा चरित्र अपनाता है। चुनाव में जीतने के लिए आश्वासन देता है ।लेकिन सत्ता प्राप्ति के बाद लोगों को पहचानने से भी मना कर देता है। इस पर एक ग्रामीण कहता है ," बबुआ तुम भुलाय दियो हम लोगन को । तुम तो चढ़ी गए आकाश, अब हम हुँ कन आदमी बनाय दियो।" 10 वर्तमान स्वार्थपरक राजनीतिक वातावरण में आमजन की स्थिति अत्यंत शोचनीय हो गई है। भ्रष्टाचार के चलते योग्य और सक्षम व्यक्ति को सम्मान नहीं मिलता और बबुआ जैसे भ्रष्ट व्यक्तियों को जो चापलूसी का आश्रय लेते हैं , आसानी से राजनीति में एक मुकाम हासिल कर लेते हैं। कुर्सी प्राप्त हो जाने पर आम जनता को वाचिक रूप से प्रताड़ित और उपेक्षित करना शुरू कर देते हैं ," धूल पसीने से लथपथ उसके मतदाता बबुआ के पास जाते हैं तो वह कहता है -" जरा हट कर बात करो । ठीक है ठीक है.... हम देखेंगे आपने हमें चुना है .... अपना प्रतिनिधि बनाया है - हां पिंकी की आपके लिए क्या कर सकते हैं। "11

वर्तमान राजनीति में हिंसा और भाई - भतीजावाद की आड़ में बढ़ता धृतराष्ट्रवाद भी इसकी विद्रूपता का एक कलुषित पक्ष है। जिसके कारण अच्छे लोगों को भी सद्मार्ग को त्यागकर भ्रष्ट मार्ग पर बढ़ना पड़ता है। मालती जोशी की ' शुभकामना ' कहानी में सदानंद जैसा आदर्शवादी व्यक्ति भी मंत्री के दबाव और पदोन्नति के प्रलोभन में आ जाता है । अपने भ्रष्ट आचरण का मुआयना कर स्वयं को झूठी सांत्वना देते हुए कहता है ," आजकल कौन नहीं बिकता , क्या नहीं बिकता। डिग्रियां बिकती हैं , नौकरियां बिकती हैं , गुंडे बिकते हैं , दूल्हे तो खैर बिकते ही हैं । सबकी अपनी कीमत होती है। हर कहीं राजपुरुष अपनी दुकान सजाए बैठे हुए हैं। लोगों का जमीन खरीद रहे हैं , अपना बेच रहे हैं ।"12 वर्तमान में समाज के हर क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार और बढ़ती अनावश्यक राजनीतिक दखलंदाजी की ओर इन पंक्तियों में स्पष्ट संकेत किया गया है।

राजनेता चुनाव के माध्यम से ही सत्ता पर काबिज होते हैं । सत्ता के गलियारों में अपनी पकड़ बनाने के लिए उनके लिए चुनाव जीतना आवश्यक हो जाता है। येन – केन - प्रकारेण चुनाव जीतने के लिए राजनेता धनबल , बाहुबल के साथ विभिन्न प्रकार के छल , प्रपंच और प्रलोभन जैसे अनैतिक साधनों का भी खुलेआम प्रयोग करते हैं। बूथ कैपचरिंग तो इनके लिए सामान्य - सी बात है। मैत्रेई पुष्पा ने 'शतरंज के खिलाड़ी ' कहानी में चुनाव के समय घटित होने वाली ऐसी ही घटनाओं की ओर संकेत किया है ," तुम ऐसे करो पीतम भैया , चुनाव के दिन सूरज पाल सिंह को बुलवा लो। या तो साले भूत को लूट ही ले जाएगा , या फिर पूरे के पूरे तुम्हारे खाते में। उनकी पार्टी को पूरे पचास हजार