जब बेजुबानों को मिलेगी आवाज़ अनिल कुमार पाण्डेय


पी-एच.डी. शोधार्थी (पत्रकारिता एवम् जनसंचार)

महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय चित्रकूट ( म.प्र.)

देश की आजादी के शुरुआती वर्षों में लोक प्रसारक के रुप में केवल ऑल इंडिया रेडियो की ही सेवाएं हुआ करती थी। लेकिन पचास के दशक के अतिंम वर्ष में दूरदर्शन का प्रसारण शुरु हो जाने से रेडियो के प्रति आम लोगों का रुझान और इसकी लोकप्रियता दिनोंदिन कम होने लगी थी। वर्तमान में भी रेडियो की लोकप्रियता और इसकी श्रोता संख्या अपनी विशाल भौगोलिक पहुंच होने के बाद भी टेलीविजन की तुलना अत्यंत सीमित है। परिणामत: एक जमाने में लोगों की दिनचर्या का हिस्सा रहे रेडियो की वापसी के तहत देश में एफ.एम प्रसारण सेवाएं प्रारंभ की गई जिसमें रेडियो के कार्यक्रमों को बेहतरीन आवाज़ गुणवत्ता के साथ बिना किसी व्यवधान के सुना जा सकता था। वहीं इन सेवाओं से प्रसारित कार्यक्रमों का कलेवर और विषयवस्तु परंपरागत ए.एम. प्रसारणों से भिन्न थी। रेडियो की वापसी का यह कार्यक्रम सफल रहा। देश में पहले एफ.एम. प्रसारण की शुरुआत वर्ष १९७७ में मद्रास से हुई थी।

वर्ष 1995 में उच्चतम न्यायालय से आए एक आदेश ने रेडियो प्रसारण की दशा और दिशा दोनों को ही बदल दिया। ‘रेडियो तरंगें जनता की सम्पत्ति है’ का आदेश मिलने के साथ ही रेडियो तरंगों को जनता के लिए खोल दिया गया। यही वह ऐतिहासिक आदेश था जिसके चलते व्यावसायिक एफ.एम. सेवाएं अस्तित्व में आ सकीं। ये सत्य है कि एफ.एम. प्रसारण ने निश्चित रुप से आम जनमानस में रेडियो की लोकप्रियता को एक बार पुन: स्थापित किया परन्तु उस समय रेडियो अन्य लोक प्रसारकों की तरह ही रहा। दूरदर्शन को मिलते विस्तार और लोकप्रियता के कारण रेडियो की लोकप्रियता लोगों के बीच दिनोंदिन घटती गई। आम आदमी ख़ासकर ग्रामीण जन जो की रेडियो के सच्चे श्रोता होते हैं उनके द्वारा चाही गई विषयवस्तु को कभी भी सही प्रतिनिधित्व नहीं मिला, गांव की जनता को बिलकुल भी नहीं। कारण स्पष्ट है देश की भाषायी, सांस्कृतिक और सामाजिक विविधता। इस समस्या के समाधान के तहत् और लोगों को रेडियो कार्यक्रमों में अधिकाधिक सहभागी बनाने के उद्देश्य के तहत रेडियो प्रसारण के तीसरे चरण की शुरुआत हुई। जिसे स्थानीय रेडियो प्रसारण की संज्ञा दी गई। इसका प्रसारण एक समुदाय विशेष के लिए (सीमित क्षेत्र में) लिए किये जाने के कारण ही इसे सामुदायिक रेडियो के नाम से जाना जाता है। इस तरह के प्रसारण में संबंधित क्षेत्र में रहने वाले श्रोताओं की जरुरतों को ध्यान में रखकर उनकी ही भाषा में यहां तक कि उनके द्वारा ही कार्यक्रमों का निर्माण कर प्रसारित किया जाता है। प्रसारण की इस व्यवस्था में संबंधित क्षेत्र के श्रोताओं से निरंतर फीडबैक लिये जाने की व्यवस्था होती है। सामुदायिक रेडियो स्टेशन पचास वॉट के ट्रांसमीटर से चलने वाले एफ.एम.रेडियो स्टेशन होते हैं। इनके कवरेज का क्षेत्र पांच से पंद्रह किलोमीटर तक होता है। इन स्टेशनों को सूचना प्रसारण मंत्रालय द्वारा स्थापित नीति दस्तावेज के तहत संचालित किया जाता है। इसके तहत इनके वाणिज्यिक उपयोग पर रोक है और इनके कार्यक्रमों से प्राप्त होने वाली आय इन्हीं पर व्यय करने का प्रावधान है। सामुदायिक रेडियो में विज्ञापन प्रसारित किए जा सकते हैं लेकिन अत्यंत ही सीमित रुप में।

सामुदायिक रेडियो प्रसारण का मूलभूत उद्देश्य लोक संस्कृति का संवर्धन करना है जिससे ग्रामीण अपनी संस्कृति खासकर स्व भाषा और बोली के प्रति गौरव का अनुभव कर सकें। साथ ही इनसे प्रसारित कार्यक्रमों से ग्रामीण जनता को शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण के प्रति जागरुक भी बनाना है। सामुदायिक रेडियो का प्रसारण इस लिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वैश्वीकरण के इस दौर में गांव- देहात में रहने वाले लोगों को मुख्यधारा की मीडिया में जगह पाना लगभग असंभव सा है ऐसे में सामुदायिक रेडियो ग्रामीण जनता को उनकी अपनी भाषा में अपनी बात लोगों से साझा करने का मौका देता है। देश में ग्रामीण इलाकों में अभी भी मूलभूत अधोरचना का अभाव है। सड़कों का अभाव है। बिजली सिर्फ नाम के लिए ही आती है। ग्रामीणों की माली स्थिति ठीक नहीं है वह अलग। ऐसे में गरीब जनता के लिए सामुदायिक रेडियो ही उनकी अपनी बोली में दुनिया से जुड़ने का एक मात्र साधन होता है। भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में सामुदायिक रेडियो का आंदोलन चल रहा है। श्रीलंका जैसा छोटा सा देश सामुदायिक रेडियो के जरिए पूरे देश में महिला सशक्तिकरण को प्रचारित कर रहा है। कुछ इसी तरह से भारत में भी महिला सशक्तिकरण जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे को सामुदायिक रेडियो के जरिए विमर्श का विषय बनाने की कोशिश की जा रही है। सही मायने में सामुदायिक रेडियो सामाजिक विकास के एक उपकरण की तरह है। ऐसे में सामुदायिक रेडियो के स्थापना के लिए लागू की गई नियमावली में नीतिगत सुधार की आवश्यकता है। इसकी जटिल आवेदन प्रक्रिया के कारण ही बहुत से निवेदन सिर्फ इसकी आवंटन प्रक्रिया का हिस्सा रह जाते हैं, जिसके चलते सामुदायिक विकास का सपना लिए खड़े विभिन्न संगठनो का सपना अधर में ही रह जाता है।

सामुदायिक रेडियो में इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक के अंतिम वर्ष तक देश और समाज के हाशिए पर पहुंच चुके लोगों का मीडिया बनने की अभूतपूर्व क्षमता है। सामुदायिक रेडियो की इन्हीं क्षमताओं को पहचानते हुए हाल ही में देश के वित्तमंत्री अरुण जेटली ने इसके विकास के लिए सौ करोड़ रुपए की सहायता की घोषणा की है। इसके तहत देश में 600 नए व मौजूदा सामुदायिक रेडियो स्टेशनो की सहायता की जाएगी। वर्तमान में देश में तकरीबन 170 सामुदायिक रेडियो स्टेशन कार्य कर रहे हैं। चार सौ से अधिक स्टेशन सरकार से अनुज्ञप्ति प्राप्त करने के इंतजार में है। ऐसे में सामुदायिक रेडियो एक सशक्त लोकतांत्रिक माध्यम के रुप में उभर रहा है। आने वाली सदी इस ग्रामीण माध्यम की होगी ऐसी उम्मीद इसके वर्तमान को देखकर की जा सकती है। ऐसी स्थिति सही मायने में बेजुबानों को आवाज़ देने जैसी होगी।

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