ढोलन कुंजकली उपन्यास में नारी उत्पीड़न और नैतिक धर्म कैलाश चन्द्र (शोधार्थ)


राजस्थान केन्द्रीय विश्वविद्यालय, अजमेर

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यादवेन्द्र शर्मा ‘ चन्द्र ’ कृत ढोलन कुंजकली उपन्यास राजस्थान में ढोली जाति के माध्यम से राजशाही शासन में नारी जाति की व्यथा और प्रशासनिक न्याय प्रबंध के साथ- साथ नैतिक पतन का उद्घाटन किया है , जो समाज को राजकार्य के ब्योरेवार वर्णन तथा उनके प्रति क्रिया कलाप व मानसिक संकीर्णता को प्रदर्शित करता है | आलोच्य उपन्यास मानवीय संवेदनाओं की मृत्यु का कोशगृह है | इसमें नारी व्यथा को बहुत ही नाजुक और पीड़ित व्यावहारिक दृष्टि से दर्शाया गया है | जैसे कुंजड़ी का पिता (हीरू) शराब की लत के वशीभूत होकर अपनी बेटी तक की इज्जत भी देने को आतुर हो जाता है | जब हीरू के पास पैसे नही होते हैं और उसे शराब की बहुत ही बड़ी उत्कंठा पड़ी रहती है तो वह कलाल से उधार में शराब मांगता है | कलाल उधार देने से मना करता है | वह इस शर्त पर शराब देने को राजी हो जाता है कि हीरू अपनी बेटी को मेरे घर के पिछवाड़े भेज दे और इससे भी ज्यादा गजब तब हो जाता है जब हीरू अपनी पुत्री को लाने घर चला जाता है , अपनी शराब की प्यास बुझाने के लिए , परन्तु दुर्भाग्य से उसकी पत्नी घर पर मिलती है और वह उससे डर के मारे कुछ नही बोलता और वापस आ जाता है तथा कलाल से कहता है कि आज मेरी पत्नी घर पर है , मैं फिर कभी उसे आपके पास भेज दूंगा | अब मुझे आप शराब दे दीजिए , प्लीज ! | इस घृणित उद्देश्य की पूर्ति हेतु एक पिता कहाँ तक पहुँच जाता है | यह बहुत ही मर्म स्पर्शनीय है |

इसी प्रकार कुंजड़ी की शादी हो जाने के पश्चात उसके ससुराल वाले उसे नंगा नाच नचाने और ठाकुर के यहाँ जाकर उसको वश में करके अपने घर की दरिद्रता को दूर करने के लिए क्या नहीं करतें ? उसे समझातें हैं , कहतें हैं कि यह तो ढोलन जाति का धर्म है | ढोलन नाचेगी , गायेगी नही तो कैसे पेट पालेगी ? उसको तो ठाकुरों के यहाँ नाच गाना करना ही होगा | उसे अपनी मर्यादा की पालना करनी ही होगी | न मानने पर वे लोग उसे पीटते हैं , तरह - तरह से यातनाएं देते हैं और घर से निकालने को भी तैयार हो जाते हैं | यहाँ तक की पति परमेश्वर भी उसको यह सब करने के लिए बाध्य करता है , जो स्त्री के लिए बद से बदत्तर होता है | इन सबके बावजूद भी कुंजड़ी के ना जाने पर ठाकुर किसी चोरी के इल्ज़ाम में उसके पति को पकड़ ले जाता है | घर में काफी कुहराम मच जाता है | उसकी जेठानी अबीरी उसे समझाती है कि वह तेरा पति जेल में पड़ा कराह रहा है और तू अपनी हठ पकड़े बैठी है | वह कहती है कि “ यदि तू इन बातों पर सोचती रही तो यह बातें कांटें ज्यूँ चुभने लगेंगी और इन बातों पर नही सोचेगी तो जैसा अपना वैसा पराया मरद .....मरद सब एक से ही होते हैं , देते तो हमें रोटी कपड़ा ही हैं | पर कुंजड़ी पूछती है ...और अपना धरम ? “ तो जवाब में ...” धर्म तो बड़े आदमियों की चीज है , अपने लिए तो सबसे बड़ा धरम है ..इस मादर काढ पेट की आग बुझाना | ”1 कुंजड़ी सोचती रही ....यह कैसा न्याय धर्म है ? एक आदमी तो अपनी मूछों पर ताव देकर , बिना मेहनत किए दारु पीकर मौज उड़ाता है और एक दूसरा दिनभर मेहनत मजदूरी और अपनी इज्जत देकर न्याय और धर्म की पूर्ति करता है | इज्जत में भी अपनी जोरू को दूसरों की बांहों में सौंपकर अपना धर्म निभाता है | इतने में अपने जेठ के द्वारा सूचना पाकर , कि उसका पति जेल में चिल्ला - चिल्लाकर रो रहा है | उसे काफी प्रताड़ित किया जा रहा है | वह कोठरी की दीवार से सिर टकराकर मरने के लिए बोल रहा है .... इसी पर वह लाचार हो कर अपने पतिव्रत धरम को पूरा करने के लिए अपनी दृढ़ता को ना चाहते हुए भी तोड़कर ठाकुर के साथ सोने को मंजूर करती है | वह मानती है कि पति से बढ़कर एक पत्नी के लिए कोई नही होता , वह परमेश्वर का साक्षात् रूप होता है और वह अपने पति के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार हो जाती है | वह ठाकुर के पास जाकर अपने पति को छुड़ाकर ले आती है | वह पूरी तरह से टूट चुकी होती है , फिर भी मर्यादा पालने के लिए सब कुछ सहती है | वह ठाकुरों के यहाँ मुजरे में जाती है | वहां राजाओं , ठाकुरों और सामंतो के साथ शराब और नंगा नाच गाना मन मसोस कर करती रहती है | वह अपनी आबरू को ठाकुर के सामने फैलाती है , ठाकुर नशें में मदहोश उसे बांहों में भरता है और खूब मौज - मस्ती उड़ाता है तथा वो दुखी मन से सब सहती है |

दूसरी तरफ साहुकार किरपाचंद , जो एक बड़ा सूदखोर है | वह लोगों को धन दिया करता है और बड़ी बेरहमी से ठाकुरों के माध्यम से सूद वसूला करता है | वह दूसरों की बहु , बेटियों को बुरी नजर से देखा करता है | बड़ा भोगी बनकर रहता है , अपंग है फिर भी तीन - तीन बीबियाँ रखता है तथा उन तीनों के बाप भी उनके कर्जदार हैं | उनसे भी बदसलूकी के साथ कर्ज वसूलता रहता है | उधर ठाकुर साहब भी साहुकार की तरह भोग विलास में मस्त रहते हैं | इसे अच्छी तरह से इन वाक्यों में समझा जा सकता है | जब कुंजड़ी को उसकी सेवादार नथली कहती है कि “ राजाजी बड़े भोगी है ऐसा भोगी तो तिरलोक में भी नही मिलेगा | अपनी सालियों से भी ब्याव कर लिया है क्योंकि वे फूटरी (सुंदर) थी ....और डावडिया , पासवानें , घाघरें वालिया , पड़दायतनें , रानियाँ अलग....| फिर उपर ही उपर आते –जाते दुसरे शिकार | ” 2 पूरी व्यवस्था को राजा महाराजाओं ने इस तरह बनाया कि जो उनको अच्छा लगे वो ही होना चाहिए , चाहे उससे बहुतायत समुदाय फायदे में रहे या नुकसान में | इस व्यवस्था के बारें में सोचते - सोचते कुंजड़ी , जो पड़दायतण बनी हुई थी | उसको अपने प्रियत्तम की याद आई | वह सोचने लगी कि उसके प्रियत्तम तो अपनी प्रियत्तमाओं को सामंती शोषण की नारकीय विडम्बना का जीवन जीने के लिए छोड़ चुके हैं | जीवित मुर्दें है उनके प्रियत्तम... यह कहते - कहते उसे रोना आ गया ” नथली ने उसे रोका यह क्या कर रहे हो ढोलन जी ? आपको राजाजी के हुजुर में जाना है , रोयेंगी तो काजल पसर जाएगा ......गुलाबी गालों पर काली लकीर मंड जायेगी....3 कुंजड़ी स्तब्ध हो गई क्योंकि वह रो भी नही सकी थी | वह भला कैसे रोएगी ? उसका चेहरा बिगड़ जाएगा आखिर भाग्य के भरोसे छोड़कर वह सब कुछ सहती है |

अंग्रेज अफसर (माइकेल) ने ठाकुर को कहा कि अगर वो उस बाबा को पकड़ लेते है जिसने साहुकार किरपानंद की ह्त्या की है , तो उसे अंग्रेज सरकार द्वारा बहुत मान - सम्मान और उसके साम्राज्य का पद गौरव बढ़ा दिया जाएगा | परिणामस्वरूप राजा कुंजड़ी से कुंजकली बनी पड़दायतण को तरह - तरह से प्रताड़ित करने लगा | उस वक्त कुंजड़ी को , देवदास बाबा की बात याद आई | उसने कहा था “ इन राजाओं , सामंतों की न्याय की कोई किताब नही है | इनका न्याय है इनका जूत्ता , इनकी इच्छा और इनकी सनक ” | राजशाही शासन में जो राजा और उनके सामंतों को जो रुचता था , वही उनका कानून, नीति ,नियम और संविधान होता था | 4 अगर किसी परिस्थिति विशेष में स्वार्थवश या अन्य किसी कारणवश किसी बड़े जन समुदाय का अहित होने के कार्य की परिणति करनी पड़े , तो यह पीछे हटने वाले नही थे | जैसे - कुंजड़ी पर अंग्रेज अधिकारी को शक हो गया कि जिस देवोदास बाबा ने साहुकार किरपाचंद का खून किया था , वो उसके संपर्क में था तो माइकेल ने राजा के मार्फ़त पूरी ढोलन बस्ती को पुलिस से घेरकर तहस - नहस कर दिया गया था जो केवल एक बाबा को ढूंढने के लिए | जिससे पूरी कच्ची बस्ती में कितनों को मारा काटा गया था | यह उनकी निर्दयता का प्रमाण था और वो भी किसी निर्दोष बस्ती पर | उस कच्ची बस्ती में ढूंढने के बजाय लोगों को मार - मार कर, स्त्रियों की इज्जत लूट - लूट कर उनसे काफी बद्सलूक व्यवहार किया गया | जो उनकी जिन्दगी भर की कमाई थी उन्हें कुछ ही समय में बूचड़खाने से भी बदत्तर बना दिया गया | कच्ची मिट्टी के बर्तन , भांडे , छप्पर , मचाण आदि का गर्त बनाने में देर न की | लूटेरे उनकी माँ, बहन, पत्नी इत्यादि की इज्जत लूटने में भी नही हिचके थे | उधर उस समाज के लोग बेचारे क्या करते , ये सरकार (राजा) का हुकम था, सब लोग भयभीत थे |

दूसरी तरफ राजा ने कुंजड़ी से पूछा कि बताओ वह बाबा कौन था ? उसके न बताने पर एक दिन उसके बालों को पकड़कर दूर फैंका | कुंजड़ी का सिर दीवार के लगने से खून बहने लगा | उसे पुरे दिन भूखा - प्यासा रखा गया | जब कुंजड़ी नही मानी तो माइकेल ने कहा कि “ नही रांड के डील पर दांभ चिपका दो... इसे नंगी करके सारे शहर में घुमाओ ” 5 इस जगह उसका नैतिक धर्म कितना गिर गया यह सोचने वाली बात थी | जिस भारत देश में नारी को देवता से भी ऊँचा स्थान दिया गया था “ यत्र पूज्यते नार्यस्तु तत्र रमन्ते देवता ” वाली कहावत निराधार मालुम होती दिखाई दी | आखिर मनुष्य अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर कितना गिर गया | वह उस नारी को भूल गया , जिस नारी की कोख से उसने जन्म लिया |

कुंजड़ी के न मानने पर राजा ने हारकर जल्लाद को बुलाकर उसे नंगी करके दागने को कहा | हिजड़ा फ़रसा (जल्लाद) ने आकर उसे तरह - तरह से डराने की कोशिश की , फिर उसने लोहे की राड़ें गर्म करवाई और उसे दांभ चिपकाने (दागने) की तैयारी की , परन्तु कुंजड़ी ने भी मौका देखकर , नंगी ही लोहे की राड़ें पकड़ने वाली जगह से पकड़कर उन जल्लादो को एक दो को मारकर सीढियों से जाकर छत्त पर चढ़ गई और उपर से कूदने का हवाला देने लगी | वह छत्त पर नंगी गर्म राड़ें लेकर खड़ी थी और बाकि सारे लोग उसे नीचे उतर आने के लिए बोल रहे थे |

यह कितनी बड़ी शर्म की बात थी , जो तुच्छ स्वार्थ के वशीभूत होकर राजा द्वारा कुंजड़ी के साथ कैसा बर्ताव किया जा रहा था | यह बड़ा ही दर्दनाक सत्य है कि ये लोग स्वार्थ के लिए कितना भी घृणित कार्य करने को आतुर रहते थे जो इस उपन्यास के माध्यम से विवेचित है | इसमें कुंजड़ी पहले छोटे राजा को खुश करती है | छोटा राजा (सामंत) अपने राजा को खुश करने के लिए कुंजड़ी को हथियार बनाता है और उसे बड़े राजा के हरम में पहुँचाता है | वह कुंजड़ी से कुंजकली और पड़दायतण कुंजकली बनती है , परन्तु वह अंत में उसी जाति विशेष ढोलण से ही पहचानी जाती है | इन सबसे यह अच्छी तरह से व्याख्यायित हो जाता है कि राजशाही शासन में लोगों का नैतिक धर्म कितना उज्ज्वल और स्वच्छ था | अगर पुछा जाए कि यही धर्म है उनका जो लोगों को अपने स्व - हित के खातिर किसी गर्त के अनंत्तम स्तर पर पहुंचा दें | आलोच्य उपन्यास में इस बात को अच्छी तरह व्याख्यायित किया गया जो इसे श्रेष्टत्तम उपन्यासो की श्रेणी में खड़ा करता है | इसमें यथार्थ को साहित्यिक धरातल पर लाने का अचूक प्रयत्न किया गया है | यही इस उपन्यास की सबसे बड़ी उपलब्धि है |

सन्दर्भ :

1 ढोलन कुंजकली , यादवेन्द्र शर्मा चन्द्र ; राजस्थानी ग्रंथागार – जोधपुर पेज न. 60

2 ” पेज न . 79

3 ” पेज न . 81

4 ” पेज न . 86

5 ” पेज न . 126

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