तमाशा : एक साझी विरासत रुपाली उत्तमराव अलोने


पी. एचडी. जनसंचार

महाराष्ट्र की लोक परम्परा में लोकनाट्य विशिष्ट स्थान रहा है। ‘नाटक’ और ‘गायन’ प्रत्येक मराठी के दिल में बसता है। लोकनाट्य में प्रयुक्त किये जाने वाले गीत और मानवीय हाव-भाव इस कला को विशिष्टता प्रदान करती है। हालांकि बदलते आधुनिक युग मे महाराष्ट्र के ग्रामीण भागों में लोकनाट्य की परम्परा धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है। बावजूद इसके यहां की लोक संस्कृति आम जन के मन में अपना विशिष्ट महत्त्व रखती है। रहन-सहन में विविधता के बाद भी सांस्कृतिक एकता स्पष्ट तौर से दिखाई पड़ती है। यही वजह है कि मराठी संस्कृति में लोकनाट्य का अपना एक स्वतंत्र स्थान है। ऐतिहासिक काल से शुरू हुई लोकनाट्य की परंपरा आज भी कायम है।

प्राप्त साक्ष्यों के अनुसार लोकनाट्य का प्रारम्भ 1843 से माना जाता है। शुरुआती दौर में लोकनाट्य के विषय धार्मिक कथाओं, ऐतिहासिक तथ्यों और स्वदेश प्रेम के इर्द-गिर्द ही घूमते थे। पर बदलते वक्त ने इनकी विषयवस्तु में काफी बदलाव किया। धार्मिक कथाओं से शुरू हुआ यह सिलसिला सामाजिक समस्याओं पर भी प्रकाश डालने लगा है। यही वजह ही महाराष्ट्र की संस्कृति और जनजीवन को समझने के लिए यहां के लोकनाट्य सबसे महत्वपूर्ण माध्यमों में से एक हैं। इन नाटकों पर तिलक, चिपलुणकर जैसी विभूतियों के विचारों का प्रभाव था। 1880 में अण्‍णासाहेब किर्लोस्‍कर लिखित 'संगीत शाकुंतल' का मंचन हुआ। संगीत नाटक, कीर्तन, ऑपेरा, शास्‍त्रीय संगीत, महफिल, तमाशा, कर्नाटक संगीत से एकदम अलग नाट्य विष्‍कार था। 1910 से मराठी रंगमंच ने स्वर्ण काल देखा, जिस में किर्लोस्‍कर और गोविंद बल्‍लाल देवल के बाद कृष्‍णाजी प्रभाकर खाडिलकर, राम गणेश गडकरी जैसे सिद्धहस्‍त लेखकों ने 'मानापमान', 'स्‍वयंवर', 'एकच प्‍याला' जैसे अनेक अजरामर नाटकों को जन्‍म दिया। जिनका मंचन आज भी हो रहा है।

उस ज़माने में महिलाओं को नाटक में काम करना मना था, जिसके कारण किसी मोहक का बिल सुरीली आवाज के आदमी को ही स्‍त्री की भूमिका निभानी पड़ती थी। स्‍त्री की भूमिका करने वालों में और उन्‍हें ज्‍़यादा अमर बनाने वालों में प्रमुख नाम नारायणराव राजहंस का लिया जाता है, जो 'बालगंधर्व' के नाम से प्रख्‍यात हैं, जिन्‍होंने अपने गायन और रूप से सबका मन मोह लिया था। उनकी समकालीन महिलाएं तो उनके किये गए फैशन को अपनाती थीं। मास्‍टर दीनानाथ मंगेशकर, नानासाहेब फाटक, भालचंद्र पेंढारकर ने अपने गाँवों में रंगमंच पर इतिहास रचा। शुरू-शुरू में इन नाटकों की अवधि पाँच अंकों की रहती थी जो रात में 10 बजे शुरू होकर सुबह पाँच बजे तक चलते थे। बदलते समय के अनुसार उसे कम कर दिया गया और धीरे-धीरे नाटक 3 अंकों का बन गया। अब तो 2 अंक के नाटक होने लगे हैं, जिनकी अवधि ढाई या तीन घंटे होती है।

'संगीत-नाटक' मराठी रंगमंच की विश्‍व रंगमंच को एक महत्‍वपूर्ण देन है। नाट्यानंद, काव्‍यानंद और स्‍वरानंद का संगम अर्थात् 'नाट्य संगीत'। संगीत नाटकों की परंपरा इस आधुनिकता और पश्चिमीकरण के भंवर में भी अपना स्‍थान अक्षुण्‍ण बनाए हुए है। समय के अनुसार 'संगीत-नाटक' में आविष्‍कार होते गए और नए-नए प्रयोग किए गए। लोगों की रुचि देखकर उस में सरलता लाई गई। इसमें पं. जितेन्‍द्र अभिषेकी का कार्य महत्‍वपूर्ण रहा। उन्‍होंने सुगम नाट्यगीत तैयार कर अपनी अलग पहचान बनाई। 1960 से 80 की अवधि में विद्याधर गोखले और वसंत कानेटकर जैसी विभूतियों ने दर्शकों को भानेवाले संगीत नाटकों का निर्माण किया। आज के दौर में तो पार्श्‍व संगीत के आधार पर रिकार्ड किए गए गाने पेश किए जाते हैं। इस प्रकार नया रूप लेकर पेश किए गए नाटकों को सभी लोगों ने पसंद किया। श्रीकांत मोघे, प्रशांत दामले जैसे अभिनेताओं ने 'लेकुरे उदंड जाहली', 'एका लग्‍नाची गोष्‍ट', जैसे नाटकों को लोकप्रिय बनाया। अब तो मराठी नाटकों में सामूहिक नृत्य भी होता है। रंगमंच का इतिहास सामाजिक परिवर्तन से भी जुड़ा है क्‍योंकि अत्रे, रांगणेकर के नाटकों में महिला कलाकारों ने रंगमंच पर काम करना प्रारंभ किया। उस जमाने में ज्‍योत्‍सना भोळे, मीनाक्षी, जयमाला शिलेदार जैसी अनेक अभिनेत्रियों ने रंगमंच की सेवा की। आचार्य अत्रे, पु.ल. देशपांडे ने अपने हास्‍य नाटकों को लोगों के बीच अजर-अमर बनाया है। पु.ल. देशपांडे के 'बटाट्याची चाळ' तो एकपात्री प्रयोग का शानदार उदाहरण है। उन्‍होंने अपना अलग दर्शक वर्ग तैयार किया।

मराठी दर्शकों का सबसे पसंदीदा नाट्य प्रकार है 'फार्स', जिस में स्वर ऊँचा अभिनय चटकीला होता है। 'फार्स' नाट्य कृतिको लोकप्रिय बनाने में बबन प्रभु और आत्‍माराम भेंडे दोनों का महत्‍वपूर्ण योगदान रहा है। 'दिनूच्‍या सासूबाई राधाबाई', झोपी गेलेला जागा झाला' ये उनके फार्स तो बहुत ही लोकप्रिय रहे थे और आज भी लोकप्रिय हैं। मराठी नाटकों में अनेक नवीनतम विषयों को स्‍थान दिया गया। महिलाओं पर आधारित समस्‍याओं पर नाट्य लेखन हुआ जिस ने समाज के जागरण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। 'संगीत शारदा', 'एकच प्‍याला' जैसे नाटक तो कालजयी कृतियों के उदाहरण हैं। 'कुलवधु', 'महानंदा', 'चार-चौघी', 'आई रिटायर होतेय' स्‍त्री-जीवन से संबंधित थे जिन्‍होंने विचारों को प्रेरित किया।

वैसे तो महाराष्ट्र में विभिन्न प्रकार के लोकनाट्य प्रस्तुत किए जाते हैं, परंतु इन लोकनाट्य में‘ तमाशा’ का सबसे ज्यादा प्रभाव दिखाई देता है। तमाशा भारत के लोकनाटक का शृंगारिक रूप है, जो पश्चिम भारत के महाराष्ट्र राज्य में 16वीं शताब्दी में शुरू हुआ था। अन्य सभी भारतीय लोकनाटकों में प्रमुख भूमिका में प्राय: पुरुष होते हैं, लेकिन तमाशा में मुख्य भूमिका महिलाएँ निभाती हैं। 20 वीं सदी में तमाशा व्यावसायिक रूप से बहुत सफल हुआ। तमाशा महाराष्ट्र में प्रचलित नृत्यों, लोक कलाओं इत्यादि कोन या आयाम देता है। यह अपने आप में एक विशिष्ट कला है। शुरुआत तमाशा नाटक का ही एक रूप है। इसकी शुरुआत महाराष्ट्र में 16 वीं सदी में हुई थी। यह लोक कला यहाँ की अन्य कलाओं से थोड़ी अलग है। 'तमाशा' शब्द का अर्थ है- मनोरंजन। कुछ शोध कर्ताओं का मानना है कि संस्कृत के नाटक रूपों- प्रहसन और भान से इसकी उत्पत्ति हुई है। इस लोक कला के माध्यम से महाभारत और रामायण जैसी पौराणिक कथाओं को सुनाया जाता है। इस में ढोलकी, ड्रम, तुनतुनी, मंजीरा, डफ, हलगी, कड़े, हारमोनियम और घुँघरुओं का प्रयोग किया जाता है। स्थान मुख्य रूप से तमाशा महाराष्ट्र के' कोल्हाटी' समुदाय द्वारा किया जाता है। इस कला को प्रस्तुत करने के लिए किसी मंच इत्यादि की आवश्यकता नहीं होती है।इसे किसी भी खुले स्थान पर किया जा सकता है। कृष्ण संबंधी कथाएँ तमाशा के शुरू होते ही सबसे पहले भगवान गणेश की वंदना की जाती है। इस के बाद गलवाना या गौलनियर गाए जाते हैं। मराठी धर्म-साहित्य में ये कृष्णलीला के रूप हैं, जिस में भगवान कृष्ण के जन्म की विभिन्न घटनाओं को दर्शाया जाता है। चरित्र नृत्य शृंखलाओं के अलावा तमाशा में नटुकनी, सौंगाड्या और अन्य चरित्रों द्वारा अनेक प्रकार के शब्दिक कटाक्षों और कूट प्रश्नों द्वारा वाद-प्रतिवाद भी किया जाता है। नटुकनी का चरित्र महिलाएँ निभाती हैं। इस लोक कला में यमन, भैरवी और पिलु हिन्दुस्तानी राग मुख्य रूप से प्रयोग किए जाते हैं। इस के अतिरिक्त अन्य लोकगीतों का भी प्रयोग किया जाता है। इसके अंत में सदैव बुराई पर अच्छाई और असत्य पर सत्य की विजय का संदेश दिया जाता है।

गणपती की प्रार्थना समाप्त होने पर ढोलकी और कडे की गुंज दर्शकों के कानों में गुंजने लगती है। इस के बाद नृत्यांगनाएं ‘लावणी’ प्रस्तुत करती हैं। तमाशा में शिव और पार्वती के बीच ‘लावणी’ विधा में सवाल-जवाब होते हैं। ‘लावणी’ तमाशा के बिना अधूरी-सी है। यह तमाशा का अभिन्न भाग है। ‘लावणी’ ‘लावण्य’ शब्द से बना है। जिसका आशय सुंदरता से है। नौ मीटर लंबी पारंपारिक साडी पहने, गहनों से सजी लावणी नृत्यांगनाएं जब सोलह श्रृंगार कर पैरों में घुंगरु बांध अपने शरीर को लहराती है तो दर्शक मंत्र मुग्ध हुए बिना नहीं रह सकते। इसके बाद गलवाना या गौलनियर (गौळ्न) गाए जाते हैं। यह भगवान कृष्ण के जन्म की विभिन्न घटनाओं को दर्शाता है। तमाशा में चरित्र नृत्यों के अलावा नटुकनी, नाच्या (सोंगाड्या) और शाब्दिक कटाक्षों व कुट प्रश्नों के द्वारा वाद-विवाद भी किया जाता है। नटुकनी का चरित्र महिलाएं ही निभाती हैं। नाच्या हास्य पात्र की भूमिका करता है जो बेहद महत्वपूर्ण होता है। यह कभी कहानी को आगे बढाने के काम करता है, कभी सूत्रधार बनजाता, कभी विदुषक तो कभी नर्तक बन जाता है। नृत्य करने वाली मुख्य नृत्यांगना के साथ ही इस की भूमिका जरुरी होती है। अधिकतर तमाशों में यह भूमिका पुरुष ही निभाते आए हैं। मराठी लोकनाट्यों में पुरुष द्वारा स्त्री की भूमिका निभाने की परंपरा बहुत पुरानी है।कई-कई नाटको में पुरुषों ने स्त्री की भूमिका बैगैर किसी फुहडपन के इतने उम्दा तरिके से निभाई है कि नाटक देखते वक्त कोई जान नही सकता की वह कलाकार पुरुष है।

तमाशा में ‘तुर्रा-कलगी’ परंपरा का प्रभाव देखने को मिलता है। इसलिए इसमें ‘झगडा’ या सवाल-जवाब होते हैं। तमाशा करने वाली मंडली अपने को ‘तुर्रा’ और ‘कलगी’ का नाम देती है। तमाशा किसी एक विशिष्ट थीम को लेकर किया जाता है। यह पौराणिक, एतिहासिक और लोककथा पर आधारित होती है। जिसमें संदेश, गीत, संगीत और हसीं-मज़ाक भी शामिल होता है। हर पात्र अपने आप में बेहतरीन होते हैं। इन कहानियों के संवाद लिखित नहीं होते हैं। पात्रों को स्वयं के विवेक से बोलना पड़ता है। बीच-बीच में जब नाच्या अपने कला का प्रदर्शन करता रहता है तो दर्शकों का उत्साह बढ़ता जाता है। इसकी वजह से तमाशा में प्रस्तुत की गई कहानी मनोरंजक हो जाती है।

लेकिन बाजारीकरण के इस युग में तमाशा के भाव और व्यवहार दोनों व्यापक परिवर्तन की दौर से गुजर रहे हैं। आज तमाशा रिकार्डों, कैसटों, फिल्मों और टि.वी के माध्यम से सभी दर्शकों के बड़े हिस्से तक पहुँच रहा है। तमाशा को केवल मनोरंजन के साधन के रूप में नहीं सांस्कृतिक धारा के रूप में भी देखा जा रहा है। यह कला कहानियों और संगीत के माध्यम से शहरी और ग्रामीण, साक्षर और निरक्षर दर्शकों को एक दूसरे से जोड़ती है। यह चलता-फिरता समूह शहरों में गांव से आए कामगारों के लिए गांव की जिंदगी की खबर लाता है और दूसरी तरफ गांव को शहरों के सामाजिक इतिहास और परिवर्तन से अवगत कराता है। इस नजरिए से तमाशा को अंतर्वती या मध्यमवर्ती (इन्टरमीडिएटरी) थियेटर भी कहा जा सकता है। सिनेमा, टी.वी और कंप्यूटर के युग में भी दर्शकों के बीच तमाशा अत्याधिक लोकप्रिय नाट्य है। तमाशा की प्रसिद्धि केवल महाराष्ट्र में ही नहीं है। राजस्थान के जयपुर में भी तमाशा की गौरवशाली परंपरा है। यह महाराष्ट्र की ही देन है। बदलते समय के साथ तमाशा भी तकनीकी रूप से बदलता जा रहा है। इसमें नए-नए प्रयोग किये जा रहे हैं। साथ ही इसके पारंपरिक गरिमा को बचाए रखने का काम आज भी जारी है। अब तो मराठी नाटककला सात समंदर पार जा पहुंची है। जहां-जहां भारतीय डायस्पोरा की पहुँच है वहां-वहां उनकी संस्कृति देखने को मिलती है। मराठी मूल के भारतीय डायस्पोरा विदेशों में भी मराठी नाटक करते हैं और अपने संस्कृति को बचाने के साथ-साथ इसके संरक्षण के लिए भी लगातार प्रयत्नशील रहते हैं। पर्व विशेष पर यहां बड़े-बड़े आयोजन होते हैं और भारतीय नाट्य कलाकार आमंत्रित किए जाते हैं। इस प्रकार यह एक ऐसे स्थल के रूप में उभर रहा है जहां नाट्यकला की बारीकियों और तकनीकों का आदान-प्रदान हो रहा है। यह मराठी साहित्य और रंगमंच को गौरवान्वित करने वाली प्रक्रिया है।

महाराष्ट्र लोकनाट्य तमाशा को समृद्ध करने में मराठी फिल्मों में बहुत योगदान दिया है। फिल्मों में तमाशा प्रदर्शन को दर्शक बहेद पसंद करते है। मराठी में कई ऐसी फिल्में हैं जो ‘तमाशा’ पर आधारित हैं। इनमें प्रमुख रूप से‘पिंजरा’,‘सांगते ऐका’,‘एक होता विदुषक’,‘तमाशा’ और 'नटरंग' काफी लोकप्रिय है। इन मराठी फिल्मों ने इस विशिष्ट परंपरा को न केवल पुनर्जिवित करने का प्रयास किया है बल्कि इन्हें आम दर्शकों के साथ जोड़ने में भी मुख्य भूमिका निभाई है।

मराठी समाज की इतनी महत्वपूर्ण लोककला होने के बावजूद इस कला से जुड़े हुए कलाकार तमाम तरह की विसंगतियों के शिकार हैं। सिनेमा कलाकारों की तुलना में ये नाट्य कलाकार कहीं नजर नहीं आते। जी तोड़ मेहनत करने के बाद भी न तो इन्हें उचित मेहनताना मिलता है, न ही पहचान। इन कलाकारों की सामाजिक स्थिति भी बेहद दयनीय है। बढ़ते मनोरंजन कर ने नाट्य व्यवसाय को पंगु बना दिया है। इसके लिए सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियाँ दोनों जिम्मेदार हैं। किसी भी कला विकसित और संरक्षित करने के लिए राजाश्रय और लोकाश्रय की आवश्यकता होती है। तमाशा के मामले में बड़े पैमाने पर लोक और राज्य दोनों ही स्तरों पर पुख्ता प्रयासों आभाव दिखाता है। यद्यपि मराठी नाटक, और कलाकारों को प्रोत्साहन देने के लिए तथा उनकी कला को रंगमंच प्रदान करने के लिए ‘मराठी राज्य नाट्य स्पर्धा’ का आयोजन होता है, जिसमें अहमदाबाद, इंदौर, भोपाल, दिल्ली जैसे अन्य राज्यों से प्रविष्टियाँ आती हैं। लेकिन यह इस कोशिश को मुहिम बनाने की जरूरत है ताकि इस लोककला की खुशबू इतिहास के पन्नों में गुम न हो जाए।

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