देह-दर्शन के खिलाफ लामबन्दी का पैगाम (आज बाज़ार बन्द है)


आज बाज़ार बन्द है। उपन्यास के माध्यम से दलित लेखक मोहनदास नैमिशराय ने महिलाओं की समस्याओं को उजागर किया है। जिसमें देह सम्मोहन से तनाव के बीच छटपटाती राष्ट्र में बेटियों के जीवन की विभिन्न परिस्थितियों पर सटीक और बेबाक टिप्पणी करते हैं।औपन्यासिक कथा थाने पर वेश्याओं द्वारा पथराव से शुरू होती है। वेश्याओं के कोठों से सटा इबादतपुर थाना था। इस थाने में तैनात पुलिस कर्मचारियों के बीच पैसा का लेन-देन हमेशा चर्चा का विषय बना हुआ था। इबादतपुर का थाना और वेश्यालय दोनों पुराने शहर में ही थे। जितना पुराना वेश्यालय था उतना ही पुराना थाना। इस थाने में पुलिस कर्मचारियों की वेतन के अलावा ऊपरी कमाई होती थी, यहाँ पोस्टिंग्स के लिए पुलिस वालों की होड़ लगी रहती। सभी चाहते थे कि हमारी पोस्टिंग्स यहाँ हो जाए। क्योंकि यहाँ पर आर्थिक सुख के साथ शारीरिक सुख भी मिलेगा।

संभोग दर्शन इस विश्व में आदिकाल से काबिज रहा है। इस दर्षन के आगे सारे दर्शनफीके रहे हैं। पुरूष की शारीरिक भूख मिटाने के लिए भारतीय समाज में, खासकर हिन्दू समाज ने वेश्यावृत्ति को जायज माना है। अगर सही मायने में कहा जाए तो मंदिर से स्त्री उत्पीड़न की परम्परा से शुरूआत हुई है। वेश्यावृत्ति समाप्त करने के लिए बहुत ही कम महापुरूषों ने आवाज उठाये। ओशो ने संभोग से समाधि तक के दर्शनको सही माना। महात्मा गाँधी भी आजीवन तक भजन- कीर्तन करते रहे। ऐसा कदम उठाने वाले डॉ. अम्बेडकर ने धर्म परिवर्तन आन्दोलन के समर्थन में 16 जून 1936 को देवदास ठक्कर के हाल में बंबई की वेश्याओं ने एक सभा किये, जिसमें वेश्याओं से लेकर देवदासी बड़ी संख्या में एकत्र हुई थी। इस सभा को सम्बोधित करते हुए डा. अम्बेडकर ने कहा था कि “आप हमारे साथ धर्म परिवर्तन करें अथवा न करें यह मेरे लिए अधिक महत्व का विषय नहीं है। परन्तु मैं आग्रह करता हूँ यदि हमारे साथ आंदोलन में रहना चाहती हैं तो आपको अपना यह अपमानित जीवन त्यागना चाहिए।”1

डॉ. अम्बेडकर जी यह कहना चाहते थे कि धर्म परिवर्तन में भाग ले रही हैं तो आप धर्म परिवर्तन करो या न करो लेकिन वेश्यावृत्ति को त्यागना होगा। वरिष्ठ दलित कथाकार मोहनदास नैमिशराय ने इस उपन्यास में मंदिर में रहने वाली देवदासियों, कोठा पर रहने वाली वेश्याओं एवं अनाथालय में रहने वाले बच्चों का मार्मिक चित्रण बहुत ही बरीकी से किया है।

डॉ. अम्बेडकर वेश्यावृत्ति से मुक्ति दिलाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने दलित आन्दोलन के साथ स्त्री की भी पुरजोर वकालत किये। ब्रिटिश भारत में लाखों की तादात में वेश्याएँ थीं। जो हिन्दू धर्म की परम्पराओं, कुरीतियों एवं प्रथाओं की देन थीं। धर्म परिवर्तन की सभा में डॉ. अम्बेडकर अपना विचार रखते हुए कहते हैं कि ’’आप मुझसे पूछोगे। तुम अपनी जीविका कैसे चलाओगी उसके लिए सैकड़ों रास्ते हैं। मैं आपसे पुनः आग्रह करता हूँ कि तुमको इस अपमानित जीवन को त्याग देना चाहिए। आपको चाहिए कि अन्य महिलाओं की तरह शादी कर सामान्य जीवन जीयें, न कि ऐसी परिस्थितियों में रहें जो आपको वेश्यावृत्ति की ओर अनिवार्य रूप से घसीटती हों।‘2

वेश्याओं के प्रति लोगों की मानसिक धारणा बनी थी, वह तो उल्टा ही हुआ। अधिकतर लोगों की यह धारणा थी, कि वेश्याएँ कपड़े उतारने और रूपये-पैसे छीनने वाली होती हैं। मगर ऐसा नहीं है सभी वेश्याएँ ऐसी नहीं होती। वह आम महिलाओं की तरह व्यवहार करती हैं।

अमृता प्रीतम की कहानी ’बृहस्पतिवार का व्रत‘ भी इसी वेश्यावृत्ति की समस्याओं, उनके जीवन संघर्ष पर आधारित है। जिस तरह वेश्याएं सज-धजकर रोज अपने धन्धे पर जाती है जैसे कोई सरकारी कर्मचारी दफ्तर जाता है। इस कहानी में पूजा परिवर्तित नाम की वेश्या ने कहा आज तो वृहस्पति का दिन है तुझे नहीं पता शबनम। ’’मैं आज सोच रही थी कि हमारे धन्धे में इस बृहस्पति में छुट्टी का दिन क्यों माना गया है।‘‘ ’’हमारे संस्कार‘‘ शबनम के होंठ पर बल खाकर हँसने जैसे हो गये। वह कहनी लगी-’’औरत चाहे वेश्या भी बन जाए परन्तु उसके संस्कार नहीं मरते।‘‘3

औरत किसी भी जाति, धर्म की हो या वेश्या ही क्यों न हो परन्तु उन पर धर्म इस कदर आरूढ़ हो गया है कि वे अपना वर्तमान छोड़कर पुनर्जन्म सुधारने के लिए संस्कार पर आस्था प्रकट करती हैं। वास्तव में औरत वेश्या क्यों न हो परन्तु उनका संस्कार कभी नहीं मरता।

पत्रकार टीम जिस कोठे पर वेश्याएं रहती थी, उस कोठे के मालिक के पास पहुँचते हैं। मकान मालिक से पूँछते हैं कि आप अपना मकान इन वेश्याओं को क्यों देते हो? मकान मालिक का बयान सुनिए - ’’देखिए महाशय, यह कोई बस्ती नहीं है। बाज़ार है और बाज़ार भी ऐसा जहाँ महिलाओं की अस्मिता बेची और खरीदी जाती है। उस बाज़ार में किरायेदारों के रूप में आने वालों पर आप लोग नजर नहीं रखेंगे तो कैसे काम चलेगा।‘‘4

मकान मालिक कहता है कि हम इन्हें शरीफ औरतें समझते है इसलिए देते हैं।

लेखक मोहनदास नैमिशराय ने पत्रकार टीम के माध्यम से वेश्याओं के जीवन संघर्ष अस्मिता एवं उनकी समस्याओं को परत-दर-परत उकेरते हैं। वेष्याओं से साक्षात्कार लेने के लिए जब पत्रकार की टीम वेश्या के कोठा पर पहुँचते है तो डरी, सहसी वेश्याओं में भूचाल आ जाता है तभी कुछ क्षण के बाद सवाल-जवाब शुरू करते हैं। तभी पास में खड़ी वेश्याएं उबल पड़ी थी, ’’इन मर्दों ने ही तो हमारे जिस्मों को भट्टी बना दिया है। हम भीतर-बाहर से खूब जलती हैं। कहते-कहते वह भावुक सी होने लगी थीं।‘‘5 यह सुनकर पत्रकार टीम कुछ भी बोल नहीं पाते हैं लेकिन एक पत्रकार अपने स्वर में सयंत रखकर फिर बोला कि आपसे कुछ सवाल करना चाहता हूँ। यह सुनकर एक वेश्या बोली जल्दी कीजिए हमारे धन्धे का टाइम हो गया है। तभी अविनाश पत्रकार ने कहा था कि अभी तो शाम हुई नहीं, यह सुनकर वेश्या ने जवाब दिया कि ’’अब ग्राहक का कुछ पता है क्या? किसी की वीबी तो है नहीं हम कि आने वाले का खसम समझकर मना कर दें। वह आया नहीं कि दनदनाते हुए कहता है। चल जल्दी खोल, इधर लेट, तिरछी हो, ऐसे हो। हाड़मास का शरीर न हुआ रबर की हम गुडि़या हों जैसे। जिस तरह से भी ग्राहक चाहता है हमें बिस्तर बनना ही पड़ता है।‘‘6

यह पुरूष सत्ता समाज स्त्री को हाड़मांस की शरीर न समझ कर वह रबर की गुडि़या समझ रखा है। स्त्री को एक स्त्री न समझकर एक बिकने वाली वस्तु समझता है। जब पत्रकार टीम वेश्याओं की दर्द को नजदीक से देखते हैं तो वह आवाक् रह जाते हैं। तभी वेश्या पत्रकार से कहती है कि आप लोग कौन हो, जो हमारे जख्मों को क्यों कुरेदते हो। हमारे समस्याओं के बारे में अपने-अपने अखबार में छापोंगे, छप जाने से क्या हमारी समस्याएं दूर हो जायेगी।

लोकतंत्र के चैथे खम्बे के संवाहक यानी गंगा यमुना के रिर्पोटर के नाम से पत्रकार टीम थी। गंगा यमुना के रिपोर्टर जब साक्षात्कार लेने के लिए जब वेश्याओं के कोठों पर वे पहुँचते हैं। तब पार्वती (परवर्तित नाम की वेश्या) से जवाब-सवाल शुरू होता है। पार्वती की ओर इशारा करते हुए रश्मि बताती है कि ’’यह पार्वती है।‘‘

’’बिना शिव की पार्वतीशिव ने पहले इसे मन्दिर में बैठाकर देवदासी बनाया फिर मन्दिर से चकले में भेज दिया। पहले मन्दिर के पुजारी ने इसके शरीर को भोगा। फिर गाँव के पटेल ने बाजी मारी। दोनों का मन भर गया तो गाँव के सामंत-साहूकार की बारी आई यानी हमारे समाज में जिसका जितना मान-सम्मान, उतना ही देवदासी को भोगने के लिए उनके अधिकार सुरक्षित होती हैं। अब रात में काले चोर के रूप में देवता आते हैं और इस देवी को भोगते हैं।‘‘7

हम समझ सकते हैं कि स्त्रियों के शोषण का यह चक्र यहाँ अचानक से नहीं आया बल्कि शोषण का यह क्रम काफी पुराना है। हिन्दू समाज ने धर्म के साथ जोड़कर स्त्रियांे का उपभोग किया। जो कि कुछ परिवर्तित रूप में आज भी अनवरत् जारी है। जिसे हम यह कह सकते कि धर्म के आड़ में व्यभिचार जारी है।

उसी कोठे में एक वेश्या अपनी दारूण कथा को कैसी बयां करती है कि मैं वेश्या वृत्ति में लिप्त कैसी हो गयी हूँ। उस वेष्या की दर्दनाक घटना को स्वयं पत्रकार के सामने उजागर करती है। कि, ’’मैं हिन्दू है, पर अपने आप को हिन्दू नहीं मानती। मैं मुसलमान बना दी गई, मैं यानी शबनम बाई पर मुसलमान होते हुए भी अपने को हिन्दू मानती हूँ। एक नवाब जादे की मोहब्बत में फंस गई। एक बरस तक अपने जाल को उसने काट दिया। इसलिए कि जाल बुनना और काटना मर्दों की फितरत हैं। एम.ए. किया था मैंने इतिहास से। पर एक बेबफा मुसलमान से मोहब्बत कर न सिर्फ अपने इतिहास से कट कर रह गई बल्कि भूगोल से अलग-थलग हो गई। न अपना शहर रहा और न बस्ती। सोचती थी पी-एच.डी. करने के बाद नई पीढ़ी को शिक्षा बाटूंगी। बाटना यह सब पड़ा।‘‘8

स्त्रियों की गरीबी, मजबूरी एवं परिस्थितियों को नजर अंदाज कर पुरुष शोषण करने से नहीें चूकते। उनका सामाजिक, आर्थिक, मानसिक एवं शारीरिक शोषण इस पितृसत्तात्मक समाज में खूब हो रहा है। पुरुष अपने पुरूषत्व मोह-माया जाल में फसाकर दोहन करती है। तथा उनके अस्मिता के साथ खेलते हैं। उनको सपना दिखाने का काम पुरूष ही करता है तथा उनका सपना को चकनाचूर कर दिया जाता है।

कोठे पर जितनी वेश्याएं है उन सब की अलग-अलग समस्यांए एवं मजबूरियां है। वह कोठा वाली कैसी बनी। इन जख्मों को बयां नही कर सकती। कोठे पर तीन शेष वेश्याओं की तरफ इशारा कराते हुए अधेड़ उम्र की महिला ने कहा था। इसके बारे में भी जानना चाहते हैं तो मैं बताए देती हँ। यह है हसीना और मुमताजो हसीना अनाथालय में पली बढ़ी वह अनाथ थी। भाग कर वह यहाँ आ गई। क्योंकि वहाँ भी यही काम होता था और यहाँ भी अनाथालय और चकले में हम औरतों की स्थिति एक जैसी रही है। फर्क इतना है कि वहाँ सरकारी ग्राहक होते हैं और यहाँ प्राइवेट, बीच में बोल उठी रश्मि ‘‘यानी’’ उसने जवाब में‘कहा था यानी अनाथल में सरकारी साण्ड होते हैं जो फोकट में महिलाओं को भोगते है। जैसे सरकारी टेलीफोन, सरकारी बिजली, वैसे ही औरत भी वहाँ सरकारी सम्पति बन जाती है। यहाँ फर्क है। थोड़ा औरत को बिस्तर बनाने से पहले अपनी गांठ ढ़ीली करने पड़ती है।’’9 वास्तव में अनाथालय में लड़के -लड़कियां एवं औरतें कोई भी सुरक्षित नही है। उनको सरकारी सम्पति मानकर उसके साथ व्यभिचार करते है। इस वेष्या को न माँ- का प्यार मिला और बाप का। सिर्फ मर्दों की वासना जरूर मिली। ऐसी घटनाएं आये दिन होती रहती है। समाज इतना दूषित हो गया कि रिष्तों को कालंकित करते रहते है। कई बार हसीना अनाथालय से भागी। दलाल ने पुलिस से मिलकर थाने में बंद करवा दिया वहाँ भी वही हुआ, जो कोठे पर होता है कोठे पर आकर तो ग्राहक पैसा भी देता है। हवालात में तो बिना पैसे के ही दो रात तक देह उत्पीड़न चलता रहा। चूंकि खाल खींचने वाले खाकी वर्दी वाले थे इसलिए किससे यह बेचारी शिकायत करती। ऊपर के अफसर से जाकर फरियाद करती तो वह भी वही फरमाइष करता। यानी पहले उसके शरीर से खेलता फिर उसकी बात सुनता। तब तक उसे कितनों को बिस्तर बनाना पड़ता। इसकी कोई गिनती नही होती। गिनती कर भी नहीं सकता ग्राहकों को गिने या पुलिस वालों को।’’10

कोठे पर जितनी औरतें हैं उतनी ही उनकी कथाएं भी है। यह सुनकर पत्रकार टीम दंग रह गये। उनकी व्यथाएं उन्हें मचने लगी थी। वास्तव में क्या समाज में औरतों को इतने भयानक सच से जूझना पड़ता है। एक-एक वेष्या के जीवंत होते चित्र पत्रकार के आंखों के सामने तैरने लगे थे।

मनुष्य के जन्म से कलाओं के विकास की नैसर्गिक प्रक्रिया परंपराओं/ संस्कारों में रही जो समय-समय पर रूपांतरित होती रही है प्रकृति के काल प्रवाह में मानव में जब-जब भी इतिहास बोध जागृत होता है, तब-तब उसके सामने नए तरह का संस्कार उभरता आखिर दलितों को भी तो दुख और तकलीफों से इतर के वे पल चाहिए। जिनमें वे अपने लोकगीतों, संगीत और परंपराओं को याद करें। उदाहरण के लिए पष्चिम बंगाल में दलितों में बाउल गायन की परंपरा रही। छत्तीसगढ़ में पंथीगीत रची बसी। उत्तर प्रदेष, बिहार में नौटंकी परंपरा रही। महाराष्ट्र में तमाषा एवं लावनी परंपरा रही। ’’दलित समाज में लोक नाट्य, कला तथा लोकगीतों की परंपरा रची बसी रही। सबका इतिहास है, सबकी संस्कृति। सवर्णों के त्योहारों के बहाने उनमें हिन्दू परंपराओं का प्रवेष कराया गया। उनके नायकों को खलनायक बना दिया। दक्षिण में दलित महिलाओं को देवदासी और उत्तर प्रदेष तथा मध्यप्रदेष में बेड़नी नाम से उन्हें वेष्या बना दिया।‘‘11

अधेड़ उम्र की महिला ने फर्ष पर सोई हुई महिला के तरफ इषारा करते हुए, कहती है कि, ’’यह है फूल, पर अब कांटा रह गयी है। अपने बच्चे को पढ़ाने की ख्वाहिष है इसके भीतर। उसी के लिए यहाँ मर खप रही है।‘‘ एक-एक वेष्या के जीवंत होते चित्र उनकी आंखों के सम्मुख तैरने लगे थे। तभी वेष्याओं की चुप्पी टूटी थी। ’’ये बाज़ार बन्द हो जाए तो जानते हो क्या होगा?‘‘

रष्मि नाम की वेष्या पूछ बैठी थी,

’’क्या होगा?‘‘

’’बच्चें जो महंगे पब्लिक स्कूल में पढ़ते हैं, वे अपने घर बैठ जाएंगे। हजारों आधुनिक बनी वीबियाँ महंगी लिपिस्टिक लगाना भूल जायेगी।‘‘ मर्द महंगी शराब के लिए तरस जाएंगे। उनके घरों के एयरकंडीनषन बन्द हो जाएंगे।12 इसके अलावा बाज़ार से लाखों रूपये माहवारी वासूला जाता है और उसके साथ उन्हें जवान जिस्म भी चाहिए। ये सब बन्द हो जायेगा।

उपन्यास में वेश्याओं के मनोभावों का सषक्त वर्णन करते हुए स्त्रियों की वेदना को व्यक्त किया है। ’’आईये हुजूर, हमारी बोटी-बोटी काट डालिये, पर हमें पैसा दीजिए। हम भूखी हैं। हमारे जिस्म संभोग के लिए तड़पते हैं। सदियों से यही हमारा सनातन धर्म है। हमें रोंदिये, मसलये, पर हमें पैसा दीजिए। हमें उलटा टांगिये, या तिरछा करिये, गोद में बैठाईये या जमीन पर हमें पैसा दीजिए।‘‘13

स्त्रियाँ स्वयं इस दर्द को समझती है। पुरुषसत्ता समाज स्त्रियों की अस्मिता के साथ खेलता है। वह स्त्री को केवल उपभोग वाली वस्तु की समझता रहा है। दलित स्त्रियाँ तो परंपरा और संस्कारों में बंधकर सनातन से उनका शोषण होता रहा है।

लेखक ने महानगरों में रहने वाली वेष्याओं की बेवसी का मार्मिक चित्रण इस उपन्यास में किया है स्पष्ट किया है कि बिकने के लिए खुद स्त्री नहीं होती उनकी वेबसी उन्हें मझधार में लाकर खड़ा करती है, जिसकी पीड़ा उन्हें जीवन भर सताती है। सरिता जैसी अन्य पात्र मीरा की स्थिति ऐसी ही है - ’’शाम का समय था मेरा हल्के-हल्के कदमों से गीले रेत पर अकेली ही चली जा रही थी। हवा में नमी थी सामने पीड़ों की अनगिनत कतारें जिनके लिए साए तले घूमते हुए पुरुष बंबई का वही बाज़ार था, बिकने के लिए। जहाँ खरीददार भी आते थे बंबई ऐसी ही अनगिनत जगहों पर बिकती थी। बिकना अब उसकी विवषता बन गई थी।‘‘14

आधी रात बीती होगी कि दल्ला एक नई लड़की ले आया। शबनब बाई ने उस लड़की को देखकर पूँछा था, दल्ला से। ’’इसे कहाँ से ले आया? मुस्कराते हुए दल्ला बोला था। हीरा है यह शबनम बाई हीरा कहां से लाया हूँ इसे यह जानकर क्या करेगी?‘‘ उम्र लगभग 18 वर्ष था। चांदनी में डूबा हुआ संगमरमरी बदन था। उसे देखकर शबनम बाई ने अपने दिनों की याद आ गई थी। दल्ला उसे रंडी बनाने की जद्दोजहद में लग गया था। कहा कि

’’तुझे जिस्म बेचना ही होगा।‘‘

लड़की के स्वर से आत्म विश्वास उभरा था,

’’नहीं मैं अपना जिस्म नहीं बेचूंगी। जब तक मैं जिन्दा हूँ तब तक मुझे कोई छू भी नहीं सकता।‘‘

’’तू जिंदा भी रहेगी और तेरे इसी शरीर को मैं नुचवाऊंगा भी‘‘

दल्ला आंखे दिखाते हुए भभका था।

’’तू दल्ला है ना तूने तो अपनी मां और बहनों को भी कोठे पर बैठाया होगा‘‘ अच्छे खासे रोष में जैसे उबल पड़ी थी वह क्यों तेरी मां बहन कोठे पर नहीं बैठ सकती और मैं बैठ सकती हूँ। क्या मैं किसी की बहन नहीं बोल?‘‘ बोल न भड़वे बोलता क्यों नहीं?

दल्ले के पास जवाब में एक नहीं शब्द न था। होता भी वैसे। अपने सभी को प्यारे लगते हैं। उन पर लगी सुई की चुभन से भी तड़प होती है। रिश्तों के वजूद ऐसा ही होता है। उस लड़की का अचानक उसके आंसुओं का बोध टूट पड़ा था। उसके मुंह से हृदय विदारक चीख निकल पड़ी थी। ’’मैं किससे अपनी इज्जत बचाने की भीख मांगू। क्या मेरा कोई नहीं है?‘‘ शबनम बाई क्या तुम भी मुझे मुक्त नहीं करा सकोगी?‘‘15 मुक्ति की याचना को बार-बार उसकी आंखों में पढ़ा था उसने। पर अपने वाली लड़की में न हीनता थी और न दीनता। कमाल या आत्मबल था उसके भीतर टूटना तो जैसे जानती ही नहीं थी वह। अंतिम समय तक अपनी अस्मिता की रक्षा करने में सक्षम रही। तथा अपनी आबरू बचा सकी।

समाज में देखा जाये तो जातीय आधार पर महिलाओं का शोषण होता रहा है। दलित वर्ग की महिलाएं पीढ़ी दर पीढ़ी शोषित होती है इस वेदना को लेखक ने उपन्यास में चिंतित किया है। ’’हमें पहले देवदासी बनाया फिर वेष्या। एक ही जाति की कुमारी लड़कियों को देवदासी क्यों बनाया जा रहा है? उसने कई बार मंदिर में जाकर एक सवाल पूछा था। एक व्यक्ति को सजा पा उसके परिवार को या फिर उसकी जाति को या उसकी जाति की एक पीढ़ी को। यहाँ तो दलित जातियों की सभी पीढि़यों को यह सजा भोगनी पड़ती रही है।‘‘!6 अन्ततः कह सकते हैं कि उपन्यास के माध्यम से लेखक महिलाओं की विषम परिस्थितियों को उजागर करने का सफल प्रयास किया है किस तरह से समाज में महिलाएं विवष होकर जी रहीं है एवं नगरीय वातवारा में किस प्रकार वेबस होकर बिकने की पीड़ा को सहन करती आ रही है। खोई हुई अस्मिता की तलाष में संघर्ष करती राष्ट्र की बेटियों के जीवन की घटनाओं एवं दुर्घटनाओं के हर पहलू को उजागर किया गया है।

उपन्यास के माध्यम से लेखक ने समाज के सामने उजागर किया है कि महिलाओं में समय के साथ सोच में भी परिवर्तन होने लगा। वेश्यावृत्तियों से मुक्त होकर उनमें अस्मिता के भाव जागने लगा है। वे समाज में सम्मानपूर्वक जीवन यापन करना चाहती हैं। भले ही समय-समय पर वेष्यावृत्ति को कर्मवाद और भाग्यवाद के विचार से जोड़ा जाता रहा है किन्तु अब महिलाओं में जैसे-जैसे चेतना आने लगी है। समाज में वेश्यावृत्ति कम होती जा रही है। लेखक ने इस उपन्यास के माध्यम से एक बड़े-बड़े महानगरों में रहने वाली महिलाओं की बेवसी का मार्मिक चित्रण किया है। बिकने के लिए खुद स्त्री नहीं चाहती, किन्तु उनकी वेबसी उन्हें मझधार में लाकर खड़ा करती है। जिसकी पीड़ा उन्हें जीवन भर सताती है।

संदर्भ ग्रन्थ

1. मोहनदास नैमिशराय - आज बाज़ार बन्द है, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, सं. 2009, पृष्ठ 6

2. वही, पृष्ठ 7

3. अमृता प्रीतम - प्रतिनिधि कहानियाँ (वृहस्पतिवार का व्रत) किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली, सं. 2011, पृष्ठ 14,

4 मोहनदास नैमिशराय - आज बाज़ार बन्द है, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, सं. 2009, पृष्ठ 617

5. वही, पृष्ठ 26

6. वही, पृष्ठ 26

7. वही, पृष्ठ 33

8. वही, पृष्ठ 34

9. वही, पृष्ठ 34

10 वही, पृष्ठ 35

11. सं. आयवन कोस्का - फारवर्ड प्रेस (मासिक पत्रिका) प्रकाशन फाॅर वर्ड प्रेस, नेहरू प्लेस, नई दिल्ली, अंक-10, अक्टूबर 2015, पृष्ठ 40

12. मोहनदास नैमिशराय - आज बाज़ार बन्द है, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2009, पृष्ठ 35

13. वही, पृष्ठ 43

14. वही, पृष्ठ 36

15. वही, पृष्ठ 66

16. वही, पृष्ठ 45

शोधार्थी

मनोज कुमार

हिंदी विभाग

डॉ. हरीसिंह गौर विष्वविद्यालय सागर म.प्र.

मो.09165754931

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