धूमिल की काव्य चेतना-डॉ॰ उमेश चन्द्र शुक्ल

एम॰ए॰,पी-एच॰डी॰

एसोसिएट प्रोफेसर

अध्यक्ष ,हिन्दी विभाग

महर्षि दयानंद कॉलेज परेल ,मुंबई -400012

shuklaumeshchandra@gmail.com

103 ओशियन व्यू आर॰एन॰पी॰ पार्क भाईन्दर (पूर्व)

ठाणे ,मुंबई पिन -410015

की-वर्ड – धूमिल, उमेश चंद्र शुक्ल ,साठोत्तरी हिन्दी कविता,

साठोत्तरी हिन्दी कविता की जमीन पर खड़े धूमिल के सामने बड़ा ही मौलिक प्रश्न सर उठाये खड़ा था की आखिर कविता क्या है । कवि कर्म की जिम्मेदारियाँ और सरोकार अगर कुछ है तो किसके प्रति है । कविता के तत्वों में से किस तत्व के साथ गलबहियाँ की जा सकती है। भावना का प्रबल आवेग छणिक आनन्द की अनुभूति तो करा सकती है और कविता कुछ समय के लिए हमारे तनाव दूर तो कर सकती है ,किन्तु जीवन को सही तरीके से परिभाषित नहीं कर सकती । जीवन के कठिन संघर्षों का राही ही विपरीत परिस्थितियों में भी जीवन की सही-सही व्याख्या कर सकता है । कविता का जीवन से गहरा नाता है अर्थात जीवन की विशद व्याख्या ही कविता है और कविता के तत्वों में भाव और कला के साथ बुध्दि तत्व की सघन छावं में ही सही-सही जीवन की कविता लिखी जा सकती है । इस प्रकार कविता जीवन जीने की कला का सूत्र है और जीवन सूत्र में दोष या जीवन सूत्र को समझने की समझ में कमी हमें भ्रमित कर सकती है धूमिल के यहाँ कविता जीवन की सच बयानी है।चुनौती है, जिसका स्थायी भाव विसंगतियों को मुंहतोड़ जवाब देना है i इतना ही नहीं आम आदमी क साथ खम ठोककर खड़ा रहने में है। धूमिल की कविता कला से ज्यादा कविता विचारों की वाहक है और विचारों के सम्प्रेषण में सार्थकशब्द और सही वक्तव्य ही कविता का पर्याय बन सकती है और जीवन को पूरी तरह समझनेऔर समझाने में सहायक हो सकती है । अतः “धूमिल सडक से संसद” तक की खोज खबर लेते है Iराजनीतिक विघटन ,मोहभंग ,सत्ता की दलाली ,बाजार के दबाव ,अकाल भुखमरी हताशा ,जीवन के साथ छद्म मूल्यों के बंधन में घुटते आदमी की आवाज को बुलंद करना हीकवि और कविता की सार्थकता और काम्य है । इससे इतर शायद ही कुछ हो । शासनव्यवस्था का पोस्ट-मार्टम ,कडवे सच को मुखर शब्द ,चुप्पी को तोड़ने की जिद हीकविता का कथ्य बनती है । धूमिल भावनाओं को सही शब्द देते हुए कविता को परिभाषित करते है कि वक्तव्य की सार्थकता स्वयं में कवित्व का आधार है — “एक सही कविता पहले एक सार्थक वक्तव्य होती है।” इस बात के मूल में कवित्व के बीज का प्रस्फुटन और कविता की भाषा में आदमी के आदमियत का विकास करने में ही रचना और रचनाकार की सार्थकता है। जीवन की अव्यवस्था को व्यवस्थित ,जीवन सूत्रों में साज कर मनुष्य की मनुष्यता का विकास ,जिसे अगर काव्यात्मक ढंग से कहना हो तो हम कह सकते है की कविता आदमी में जीवन जीने का सलीका ,तहजीब और जीवन की सार्थकता की तमीज पैंदा करती है । व्यवस्थित जीवन का सूत्र कविता के आईने में देखा जा सकता है । कविता को जीवन अंकुरण ,प्रस्फुटन,जीवन विकास की संभावनाओं का अनंत स्रोत कहा जा सकता है । कविता आदमी को आदमी बनाने की तमीज पैंदा करती है । जिसके मूल में सार्थक वक्तव्य ही है ,काव्य सौन्दर्य तो कविता के अन्दर की खुशबू है ।कविता का अंकन,जीवन को परिभाषित करने जैसा है —

कविता / भाषा में / आदमी होने की तमीज है ।।

कविता की सार्थकता काव्य-सौन्दर्य से इतर विचारों के प्रतिस्थापन का साध्य है,कवि का काम्य भाव सौन्दय से परे रुग्ण शासन व्यवस्था का प्रच्छालन करने के साथ समाज व्यवस्था की खामियों को आईना दिखाना तथा दूषित व्यवस्था के समाधान की ओर ले जाने का मार्ग प्रशस्त करता है ।पेट ,पीठ की पीड़ा और व्यवस्था के दमन चक्र से पिसती जनता के पास जीवन की जद्दों-जहदमें विचार की ताकत पर बल देना आशा की किरण का दिखाई पड़ने जैसा है । धूमिल का बेचैन कवि ,जीवन संघर्ष की कठोरचट्टानों से संघर्ष करता ,विचारों वाहिका बन भ्रष्ट व्यवस्था पर करारी चोट करता है । विचारों का निकष ही धूमिल की शक्ति है - “न मैं पेट हूँ / न दीवार हूँ / न पीठ हूँ अब मैं विचार हूँ ।”-सुदामा प्र. पाण्डेय का प्रजातंत्र, पृ. 43 आज के हालात में जब व्यवस्था के नाम पर अव्यवस्था स्थायी रूप से हमारे उपर शासन करने लगी है । ऐसी सूरत में कविता की ताकत ही कवि में संघर्ष की माद्दा पैदा करती है ।संघर्ष की राह में उर्जा का असीम स्रोत है । कविता की समझ और विचारों के घर्षण में उत्पीडित व्यक्ति की सी दशा में कविता व्यथित व्यक्ति का वक्तव्य है तो भोगे हुए यथार्थ का कडवा सच भी है अर्थात धूमिल की नजर में कविता जीवन संगिनी सदृश्य हमेशा हमारे साथ रहती है । एकालाप की संक्षिप्तता,बौखलाहट ,और भीड़ ,भ्रष्ट व्यवस्था के काकश में घिरना रचनात्मक प्रक्रिया की ओर गति करने की दिशा है । जिस जमीन पर जीवन का समाधान शब्दांकित होकर उद्घोष करता है ,इसी बात में कविता की सार्थकता निहित है —

“कविता

घेराव में

किसी बौखलाये हुये

आदमी का संक्षिप्त एकालाप है।”

काव्य सत्य को जब स्वयं को सत्य बतलाने के लिए,अदालती भाषा में कहे तो कह सकते है की झूठ की अदालत में सत्य को अब सत्य कहने के लिए शपथ की आवश्यकता पड़ने लगी है । असत्य और अनाचार का बोलबाला ही चहुमुखी छाया है । असत्य का सिक्का बेलौस गति से संचालित है और सत्य को किसी झूठ की छाव में सर छुपाना पड़ रहा है। भ्रष्टाचारियों के शासन में चहुओर अपराधियों का बोलबाला है । सत्य और ईमानदारी ,धर्म और न्याय को निर्दोष व्यक्ति की तरह अपराधियों की भीड़ में शपथ लेकर कहना पड़ रहा है की वो गलत नहीं है । इससे बड़ी मानसिक पीड़ा और संत्रास शक्ति है ।क्या हो सकता है – “कविता \ शब्दों की अदालत में \ अपराधियों के कटघरे में \ खड़े एक निर्दोष आदमी का \ हलफनामा है। ” धूमिल बुद्धजीवियों,कवियों और पत्रकारों के बारे में लिखते हुये वे सवाल करते हैं की इस दौर में सर्जक की जिम्मेदारी क्या है,कलम को किस ओर चलना चाहिए ।कवि कर्म और जिम्मेदारियों के बीच आखिर चयन करना है तो किसका करू । धूमिल की यही दृष्टि युगीन रचनाकारों से कवि को विशेष और अलग दर्जा दिलाती है । आत्मा की आवाज का चितेरा कवि मित्रों को सावधान करता है तो दूसरी ओर अपनी रचना प्रतिबध्दता को भी रेखांकित करता चलता है । जिसके आलोक में हम विद्रोही तेवर के कवि का सही-सही मुल्यांकन कर सकते है । धूमिल की कविता को समझना साठोत्तर भारत के इतिहास का अध्ययन करने सरीखा है । ऐसे दौर में धूमिल कविता का नया सौन्दर्य शास्त्र रचते है तो कविता का नया व्याकरण तैयार करते है। धूमिल का सवाल युगीन जागृत जनचेतना से है, न की आम आदमी से, आम आदमी की चिन्ता ही धूमिल की चिन्ता है । इसी का समाधान ही कवि के कवि होने की सार्थकता में निहित है क्यों की जाग्रत व्यक्ति के पास सवालों का होना लाजिमी है । धूमिल के सरोकार हमें प्रतिछाया सदृश्य कदमताल करते दिखाई पड़ते है ।धूमिल के यहाँ कविता विचारों की वाहिका का प्रतिनिधित्व करती है –

“आखिर मैं क्या करूँ

आप ही जवाब दो?

तितली के पंखों में

पटाखा बाँधकर भाषा के हलके में

कौन सा गुल खिला दूँ

जब ढेर सारे दोस्तों का गुस्सा

हाशिये पर चुटकुला बन रहा है

क्या मैं व्याकरण की नाक पर रूमाल बाँधकर

निष्ठा का तुक विष्ठा से मिला दूँ ? “

आज के कठिन समय में प्यार के बारे में लिखते हुये “धूमिल” कहते हैं:-

“एक सम्पूर्ण स्त्री होने के

पहले ही गर्भाधान की क्रिया से गुज़रते हुये

उसने जाना कि प्यार

घनी आबादीवाली बस्तियों में

मकान की तलाश है।”

बेकारी, गरीबी, बढ़ती जनसंख्या अव्यवस्था के बारे में लिखते धूमिल बिना किसी संकोच में बेवाक बयानी कर जाते है । कविता की मजबूत बाह पर सवार धूमिल का कवि बढती आबादी के कारणों को जब चिन्हित करता है तो सुनने में अटपटा लगता तो है किन्तु कालसत्य कथ्य हमें धूमिल से ले जाकर जोड़ता है । बेकारी का दारुण चित्रण ,बेकारी के दिनों की बरक्कत अवांछित जन्म पाए बच्चे ,अव्यवस्था की व्यवस्था को कुछ दूर और खीच ले जाएगी । बढती आबादी ,खैरात में मिले अनाज ,क्रमशः वोट बैंक में इजाफा ,बेकारी की लाईन में कुछ लोगो का बढ़ जाना मात्र खबर बनकर रहजाती है ।

“मैंने उसका हाथ पकड़ते हुये कहा-

‘बच्चे तो बेकारी के दिनों की बरकत हैं’

इससे वे भी सहमत हैं

जो हमारी हालत पर तरस खाकर,खाने के लिये

रसद देते हैं।

उनका कहना है कि बच्चे हमें

बसन्त बुनने में मदद देते हैं।”

सातवें दशक में आतंकवादी गतिविधियाँ ,जातीय संगठन ,प्रांतवाद की उफान ,भाषाई विभाजन ,की वजह से देश में एकता ,क्रान्ति के क्या मायने रह गये हैं । समय के साथ सबकुछ अधोगामी हुआ है । समय के साथ तटस्थता का होना भयानक खतरे का संकेत है । मौन बेहतर श्रोता ,विरक्ति का भाव ,या कुछ और है इतने भ्रमित है की कुछ पता ही नहीं चल रहा है । दया का प्रवाह ,सहयोग का भाव मात्र अकाल ,विपरीत परिस्थितियों में गजब का ऎका देखने को मिलता है —

“वे चुपचाप सुनते हैं

उनकी आँखों में विरक्ति है

पछतावा है

संकोच है

या क्या है कुछ पता नहीं चलता

वे इस कदर पस्त हैं-

कि तटस्थ हैं

और मैं सोचने लगता हूँ कि इस देश में

एकता युद्ध की और दया

अकाल की पूंजी है।

क्रान्ति –

यहाँ के असंग लोगों के लिये

किसी अबोध बच्चे के-

हाथों की जूजी है।

सातवें दशक के यथार्थ का चित्रं शोषण की विकृत मानसिकता और राजनीति के विभत्स चेहरे का निरावरण है । इस व्यवस्था में अपराधी तत्वों के मजे हैं,आज क व्यवस्था में सत्य को ठाँव नहीं तो झूठ और बेईमानी को सारा वितान है । अपराधी तत्व सामाजिक ,राजनैतिक तथा आर्थिक मुद्दों पर मजे मार रहे है । भारतीय लोकतंत्र का मन्दिर अपराधियों का चारागाह बन गया है । नीति नियामक संस्था अपराधियों के हाथ की कठपुतली बन गयी है ।जीवन जीने की संभावनाओं पर विराम लगाने का प्रश्न संसद के मंथन का प्रश्न जैसा है धूमिल का कवि कविता की भाषा में चुनौती देता है। विचारो की अभिव्यक्ति के सारे खतरें उठाते हुए को अपने सरोकारों के प्रति जागरूक सार्थक विचारों की वाहिका ,जनमत की आवाज बन, जमीनी सच्चाई को कविता के साचें में उतरना ही कविता की सर्वोत्तम सार्थकता है ।विपरीत समय से होड़ ही कविता का प्रथम और अन्तिम सत्य है। जीवन को यथातथ्य,सकारात्मक दिशा ही कविता की सच्ची परिभाषा है । असंसदीय व्यवस्था के खिलाफ धूमिल की मुखर आवाज को सुना जा सकता है—

क्या आजादी सिर्फ तीन थके हुए रंगों का नाम है

जिन्हें एक पहिया ढोता है \

या इसका कोई खास मतलब होता है ।

धूमिल की तीखी नजर सत्ता के नियामकों तथा दम तोड़ते लोकतंत्र पर है । सत्ता की आड़ में अनैतिकता पाँव पसार रही है ।जन सेवक के नाम पर जन शोषक की आराधना ,पूजा-अर्चा की जा रही है । एक तरफ ईमानदारी को फाँके करने पड़ रहे है तो बेईमान की रसोई खुशबूदार चावलों केव्यंजन से सुवासित है । बेईमानी का फलना-फूलना ईमानदारी का गला घोटना साथ साथ है । धूमिल की कविता जनसेवकों के चारित्रिक पतन को घोर भर्सना ही नहीं करताबल्कि भ्रष्ट व्यवस्था को उखाड़ कर फेकनें की चुनौती देता है —

“और जो चरित्रहीन है

उसकी रसोई में पकने वाला चावल

कितना महीन है। ” -- मुनासिब कार्रवाई ,धूमिल की कविताएं सं॰ डॉ॰ शुकदेव सिंह पृष्ठ 24

कवि दृष्टि में हम इक्कीसवीं सदी के भारत की तस्वीर देख सकते है धूमिल की

सातवें दशक की कविताएँ समय को पढ़ रही थी की आगत सदी में व्यवस्था की भयावहता बढ़ने वाली है ।धूमिल के आईने में हम लोकतंत्र के पतन और नौकरशाही के तुगलकी फरमान के बीच बदहाली को अभिशप्त एक करोड़ इक्तीस लाख जनसंख्या वाले विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की विफलता को देख सकते है –

” मुझसे कहा गया कि संसद ,

देश की धड़कन को \ प्रतिबिंबित करने वाला

दर्पण है ,जनता को \ जनता के विचारों का नैतिक समर्पण है

लेकिन क्या यह सच है? \या यह सच है कि

अपने यहां संसद \ तेली की वह घानी है,

जिसमें आधा तेल है \ और आधा पानी है

और यदि यह सच नहीं है ।” – पटकथा ,धूमिल की कविताएं सं॰ डॉ॰ शुकदेव सिंह पृष्ठ-64

नेताओं के छद्म रूप ,सेवा के नाम पर ,लोकतान्त्रिक प्रक्रिया का हवाला देकर जनता को वोट बैंक के रूप में तब्दील किया जाना ,धूमिल को व्यथित करता है । संसद को लोकतंत्र का मंदिर कहने वाले जनसेवकों की कथनी और करनी में जमीन और आसमान का फर्क है । संसद का स्थायी भाव धोखा होता जा रहा है ,या कह दे की संसद में झूठ का बोलबाला है । दलाली,गुंडागर्दी अपराध ,घोटालें और भौतिक संसाधनों को होड़ तो दूसरी तरफ भुखमरी के शिकार लोग और सूखा ,बदहाली तथा सरकार की भूख को लेकर मंथन की किस तरह भूखी-नंगी जनता को वोट बैंक के रूप में भुनाया जाय । दलगत राजनीति ,साम्प्रदायिकता ,जातीवाद ,भाषावाद ,क्षेत्रवाद ,आदि मनभावन ,लोक लुभावन नारों के बीच सत्य का घुटता गला । सत्य को अब इस बात का मलाल रहने लगा है की उसने सत्य क्यों बोला ,अब ईमानदार आदमी को ईमानदार होने का प्रमाण-पत्र देना पड़ता है की उसने जो भी कहाँ सच ही कहाँ ,बिना उचित प्रमाण -पत्र के सत्य को पहचानना नहीं जा रहा है । सत्य की जगह प्रमाण सत्य ने गहरी जगह बना ली है । सच कहना अब सबसे बड़ा गुनाह है और धूमिल का कवि सच वयानी के लिए पूरीकी पूरी भ्रष्ट व्यवस्था से जूझ पड़ता है। समाज सत्य ,जीवन सत्य और स्वयं सत्य का स्थापन ही कवि की सामर्थ्य है तो दूसरी ओर देश को दिशा देने की चिन्ता है । ईमानदारी की सही पहचान करना ,कराना तथा सच के साथ मुठ्ठी बाधें धूमिल चुनौती दे रहे है —-

” तो यहाँ एक ईमानदार आदमी को

अपनी ईमानदारी का मलाल क्यों है?

जिसने सत्य कह दिया है ।”

सच कहें तो मोचीराम कविता में धूमिल के कथन और मोचीराम की बातचीत में सातवें दशक की कविता की दशा और दिशा की ओर संकेत है तो दूसरी तरफ देश की बदहाली का अंकन है । लोकतंत्र के नाम लूट तंत्र के खिलाफ सजग होती आम आदमी की पैनीदृष्टि है ,जिसे धूमिल का कवि पढ़ कर चुप नहीं बैठता बल्कि आम आदमी की आवाज को मुखर करता है । कही यह दृष्टि,आवाज ,चेतना मर न जाय । पक्षाघात की शिकार व्यवस्था का विकल्प मोचीराम तथा मोचीराम सरीखे लोग ही हो सकते है । समय की माँग को पहचान कवि कल्पना के आकाश को छोड़ जीवन के क्रूर सच के साथ संघर्ष करता है ।परिवर्तन की इस प्रक्रिया में व्यवस्था को समूल उखाड़ फेकनें की आवश्यकता पर बल देता है । चहुओर फैले घटाटोप में आशा की चमक मोचीराम की वाणी का ओज ,धूमिल की युग दृष्टि ,क्रांतिकारी चेतना हिन्दी कविता की नई परिभाषा रचती है । जिसके केंद्र में जीवन की अपराजय को उखाड़ फेकना है—-

“ बाबू जी सच कहूँ ,

मेरी निगाह में ,

हर आदमी एक जोड़ी जूता है ,जो मरम्मत के

लिए खडा है । ” - धूमिल की कविताएं सं॰ डॉ॰ शुकदेव सिंह पृष्ठ 12

धूमिल की कविता मोचीराम की पंक्तिया अपने समय का कड़वा सच है । जिसके आईने में हम कवि कर्म और कविता कि सार्थकता का मूल्यांकन कर सकते है ।धूमिल की सजग काव्य चेतना दृष्टि तथा जीवन दर्शन के मूलभूत सिद्धांतो का अवलोकन करने पर हमें मोचीराम के रूप में एक क्रान्तिकारी चेतना से लैस सजग सर्जक मिलता है। जिसे अपने देशकाल,परिवेश,समय,समाज ,लोकतंत्र,सत्ता,अफसरशाही,बेईमानी ,घूसखोरी ,घोटालें,शोषण ,अव्यवस्था ,दलगत राजनीति ,भाषावाद ,क्षेत्रवाद ,जातिवाद,प्रांतवाद आदि शोषण के औजारों से परिचित है ।धूमिल की कालजयी दृष्टि से कुछ भी बच नहीं सकता जैसे धूमिल की लम्बी कविता के मोचीराम की नजर और सोच से कोई बच नहीं नहीं सकता। धूमिल के कवि का परकाया प्रवेश में सिद्धहस्त होना ही धूमिल की शक्ति है।धूमिल कविता को औजार के रूप में प्रयोग करता है । सामाजिक ,सांस्कृतिक ,साम्प्रदायिक ,आर्थिक धार्मिक तथा राजनीतिक विसंगतियों से संघर्ष की जिद में मोचीराम के रूप में लम्बी कविता और मोचीराम नामक जीवंत कविता के सजग पात्र की सर्जना कर जाते है।

संदर्भ ग्रंथ सूची-

1. धूमिल की कविताएं सं॰ डॉ॰ शुकदेव सिंह

2. संसद से सड़क तक –सुदामा पाण्डेय धूमिल

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