नव उपनिवेशवादी समस्याओं से जूझता कथाकार धर्मेन्द्र प्रताप सिंह


अतिथि सहायक आचार्य

हिन्दी विभाग, बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर केन्द्रीय विश्वविद्यालय

लखनऊ-226025

मोबाइल-0945476741

ई मेल- dpsingh777@gmail.com

‘और सिर्फ तितली’ प्रदीप सौरभ का हाल की में वाणी प्रकाशन से प्रकाशित नवीनतम उपन्यास है। इससे पहले वे ‘देश भीतर देश’, ‘मुन्नी मोबाइल’ और ‘तीसरी ताली’ उपन्यासों के माध्यम से पाठकों के बीच अपनी सार्थक उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं। ‘मुन्नी मोबाइल’ में एक ऐसी स्त्री की कहानी है जो अत्यधिक महत्वाकांक्षी होने के कारण सफलता अर्जित करती है और अन्ततः सभी सफलताओं को प्राप्त करते हुए भी दुःखद अन्त की ओर अग्रसर होती है। उपन्यास में दिखाया गया है कि बाजार एक स्त्री को अति महत्वाकांक्षी बनाकर उसे गलत रास्तों पर ले जाकर अन्ततः निगल जाता है। ‘तीसरी ताली’ हिजड़ों के जीवन को केन्द्र में रखकर लिख गया एक अलग पृष्ठभूमि का उपन्यास है। ‘देश भीतर देश’ भारत की आंतरिक संरचना केा उद्घाटित करने वाला उपन्यास है। यह पूर्वोत्तर नागरिकों से साथ हो रहे भेदभाव को आधार बनाकर लिखा गया है।

‘और सिर्फ तितली’ में प्रदीप सौरभ ने आज के नव उपनिवेशवादी युग की ज्वलन्त समस्याओं यथा- आधुनिक शिक्षा नीति की खामियाँ, पुरानी और जर्जर हो चुकी शिक्षा पद्धति, नौकरी की तलाश में दर-दर भटकते पढ़े-लिखे बेरोजगार युवा, निजी शिक्षण संस्थाओं द्वारा किए जा रहे उनके शोषण, सूचना और संचार क्रांति के युग में बुजुर्गों का एकाकीपन, निरन्तर पतित हो रहे नैतिक और आध्यात्मिक मूल्य, डोनेशन के बोझ से टूटती अभिभावकों की कमर, देश में निरन्तर फैल रहे भ्रष्टाचार, युवाओं का देश छोड़कर विदेश की ओर हो रहे पलायन, दहेज आदि को प्रमुखता से उठाया है और साथ ही इसके मूल कारणों की ओर पाठकों का ध्यान ले जाने का सकुशल प्रयास भी किया है। यह सही है कि प्रदीप सौरभ पूरे उपन्यास में इन समस्याओं से निपटने का कोई कारगर उपाय नहीं ढूढ़ पाये लेकिन इनके मूल में जाने का पूरा प्रयास किया है। समस्याओं के बोझ से आज का युवा ऐसे दब गया है कि वह कोई भी स्थायी निर्णय ले पाने में स्वयं को असमर्थ पाता है। आपसी समझ के अभाव में तलाक आज के समय की बड़ी समस्या बन चुका है जिसका प्रभाव बच्चों के मानसिक विकास पर पड़ता है और उम्र बढ़ने के साथ ही मनुष्य अकेलेपन का शिकार होता है।

उक्त उपन्यास कांवेन्ट स्कूलों की मुनाफा कमाने की संस्कृति और दिल्ली जैसे महानगर की प्रारम्भिक शिक्षा का शोधपरक अध्ययन प्रस्तुत करता है। उपन्यास में दिखाया गया है कि आज की पढ़ी-लिखी युवतियाँ जब सफलतापूर्वक स्कूली शिक्षा प्राप्त करने के बाद नौकरी के लिए घरों से बाहर निकलती हैं तो उन्हें किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है और उनका किन-किन रूपों में शोषण होता है। पूरा उपन्यास इन युवतियों का शिक्षण संस्थाओं में हो रहे मानसिक और शारीरिक शोषण की बानगी है। युवा वर्ग सफलता प्राप्त करने के लिए अपनी योग्यता के बावजूद स्कूल के प्रबन्धकों द्वारा शरीरिक शोषण का शिकार होता है। उपन्यास की नायिका तान्या के माध्यम से कथाकार ने इस तथ्य को सफलतापूर्वक उद्घाटित किया है।

कथाकार का मानना है कि आज के कान्वेंट स्कूल बच्चों को नैतिक शिक्षा का पाठ पढ़ाने और संस्कारित करने में पूरी तरह असफल सिद्ध हो रहे हैं। ये स्कूल केवल मुनाफा बनाने के उद्देश्य से फल-फूल रहे हैं। सूचना और संचार के इस युग में बच्चे समय से पहले युवा हो रहे हैं और अभिभावकों द्वारा नज़रअंदाज करना उन्हें मानसिक उलझनों का शिकार बना रहा है। अभिभावकों के सपनों और व्यस्तता भरी जीवन शैली ने उनका बचपन छीन लिया है। यूरोप में बच्चों को छः वर्ष की अवस्था में स्कूल भेजा जाता है जबकि हमारे यहाँ तो डेढ़ वर्ष की अवस्था में ही उन्हें स्कूल भेजने की प्रवृत्ति शुरू हो गई है। इस संदर्भ में उपन्यास की महिला पात्र रोहिला सरकार अपना मत व्यक्त करती हुई कहती हैं- “हमने बच्चों का बचपन छीन लिया है। खेलकूद क्या होता है, उनको पता ही नहीं है। खिलौने तो हम उन्हें मंहगे से मंहगे लाकर दे देते हैं, लेकिन उनमें उनको फन की बजाय हिंसा और रफ्तार सीखने को मिलती है। बच्चे आभासी दुनिया में मस्त हैं। वे बचपन की अठखेलियों से दूर हो गये हैं।“ (और सिर्फ तितली, पृ0-102)

‘और सिर्फ तितली’ में आज की एक अन्य बड़ी समस्या को उद्घाटित किया है जिसकी चपेट में दुनिया के काफी देश आ चुके हैं और कमोवेश भविष्य में भारत की ऐसी ही स्थिति होने की संभावना उपन्यासकार ने व्यक्त की है। आज का युवा वर्ग सफलता प्राप्त करने के बावजूद विवाह से दूर भाग रहा है। नायिका पूरे उपन्यास में अपने विवाह को लेकर आशंकित है और जिनकी शादियाँ हो चुकी हैं उन पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करती है? कहानी के वे पात्र जो विवाह करते हैं, वे भी शादी के पश्चात् उल्लासपूर्वक जीवनयापन करने में स्वयं को असहज महसूस करते हैं। शादीशुदा जीवन की असफलताएँ पूरे उपन्यास पर काले बादल की भाँति छायी हुई हैं जो जीवन में निरन्तर विपत्तियों की बरसात करती हैं। आज के युवाओं का एकाकी जीवन जीने की प्रवृत्ति ने परिवार नामक संस्था को खतरे में डाल दिया है, जबकि यदि बच्चों के दृष्टिकोण से देखा जाय तो यही परिवार उन्हें संस्कारित और सफलतापूर्वक जीवन जीने में महती भूमिका निभा सकता है। पूरा उपन्यास उच्च वर्ग से आये बच्चों की प्रवृत्तियों का एक बानगी मात्र है।

प्रदीप सौरभ ने स्त्री जीवन की विसंगतियों का बखूबी चित्रण किया है। तान्या के पिता अध्यापक थे और उन्हें रिश्तेदारों और समाज से उलाहना सुनना पड़ता था कि लड़की जवान होने के साथ ही पढ़ाई भी पूरी कर चुकी है। अब इसकी शादी कर देनी चाहिए। लेकिन लाख प्रयास करने के बाद भी कोई योग्य हमउम्र लड़का तान्या के लिए नहीं

मिलता। काफी प्रयास के बाद आर्मी के कैप्टन अभिषेक से उसकी शादी पच्चीस लाख में तय हो जाती है। इसके बाद अभिषेक का असली रंग तब सामने आता है जब वह तान्या से कहता है कि “एक शर्त पर मैं शादी कर सकता हूं! तुम अपने पापा से कहो कि वह मुझे पच्चीस लाख दे दें। मैं उससे अपनी बहन की शादी कर फिर तुमसे शादी कर लूंगा।“ (और सिर्फ तितली, पृ0-65)

दिल्ली जैसे महानगरों में बुजुर्गों का दुर्दशा को भी उपन्यासकार ने उठाया है। रियान के दादा के माध्यम से प्रदीप सौरभ बताना चाहते हैं कि जब आज बच्चे उम्र से पहले ही युवा हो रहे हैं तो बुजुर्गेां के पास समय काटने के लिए कुछ भी नहीं बच रहा है। दादा की कहानियाँ अब रियान को पुरानी और उबाऊ लगने लगी थी जो अपने पोते के साथ उनके समय बिताने का मुख्य साधन हुआ करता था। वे अक्सर रियान को देश विभाजन पर आधारित कहानियाँ सुनाया करते थे। लेखक ने यह भी दिखाया है कि लन्दन जैसे शहरों में रहने वाले नागरिकों का बुढ़ापा कितना भयावह होता है और वे अकेलेपन में अपनी जिन्दगी बसर करते हैं। चेलसी ऐसी ही पात्र है जिसके यहाँ तान्या पेइंग गेस्ट के रूप में रुकती है। रिटायर होने से पहले चेलसी ब्रिटिश सरकार के रोड सेफ्टी डिपार्टमेंट में काम करती थी और नौकरी के दौरान ही उसके पति की मृत्यु हृदयाघात से हो गयी थी। उनका एक बेटा भी था जो शादी के बाद अपनी माँ से अलग रहने लगा था। चेलसी के पास किसी चीज की कमी नहीं थी। कमी थी तो उनके देखभाल करने वाले और अकेलेपन को बाँटने वाले की। लेखक ने इस अकेलेपन की ओर इशारा करते हुए कहा है कि- “लम्बी रातें और कड़कती ठण्ड लन्दन में अकेले रहने वाले बुजुर्गों के मन में एक खास तरह का अवसाद पैदा करती है। ठंड उन्हें डराती है। उनके जीवन का अँधेरा और सघन कर देती है। अक्सर एकाकीपन का अँधेरा उन्हें आत्महत्या के लिए प्रेरित करता है।“ (और सिर्फ तितली, पृ0-116)

प्रदीप सौरभ ने उपन्यास को व्यापकता प्रदान करते हुए अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन और जन लोकपाल की लड़ाई को भी इसके कथ्य में शामिल किया है और अपना मत व्यक्त करते हुए कहा है कि देश में भ्रष्टाचार से बड़े भी और कई मुद्दे यथा- किसानों की आत्महत्या, गरीबी, बेरोजगारी, शोषण, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि हैं। अन्ना का पूरा आन्दोलन युवाओं में इस आशा का संचार कर रहा था कि अब वह समय आ गया है जब देश भ्रष्टाचार से मुक्त हो जायेगा। लेकिन इस आन्दोलन की असफलता से देश के करोड़ों नागरिकों को निराशा से भर दिया। यही कारण है कि दीपांकर मिश्रा अमेरिका वापस चला जाता है जो अपनी नौकरी छोड़कर देश के लिए अपना सब कुछ बलिदान करने के उद्देश्य से अन्ना हजारे के आन्दोलन में शामिल हुआ था।

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