नागार्जुन की लोकधार्मिता


नागार्जुन के काव्य में लोकधार्मिता पर बात करने से पहले यह आवश्यक है कि हम लोक के वास्तविक अर्थ को समझें। ‘लोक’ शब्द से सामान्य, अतिसामान्य जन और उसका परिवेश ध्वनित होता है। मार्क्स के हवाले से कहें तो यह सर्वहारा का पर्याय है। यों तो आजकल लोक शब्द अंग्रेजी के ‘फोक’ का हिंदी पर्याय समझा जाता है लेकिन हमारी साहित्य परंपरा बहुत पहले से ही ‘लोक’ के श्रम, संघर्ष, शक्ति एवं महत्ता को ज्यादा बेहतर ढंग से समझा। हमारे पहले कला-चिंतक और सौन्दर्यशास्त्रीय आचार्य भरतमुनि ने अकारण ही लोक को कविता और नाटक के केन्द्र में नहीं रखा, उसका एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य था। वे जानते थे कि लोक ही वह शक्ति है, जो निःस्वार्थ भाव से पूरे विश्व में श्रमरत है और उन्हीं के मजबूत भुजाओं पर संसार टिका है। फिर भी समाज में उनकी स्थिति बहुत दयनीय है, दमनीय है। वे न वेद पढ़ सकते हैं न सुन सकते हैं। फलतः उन सबकी सुविधा के लिए पंचमवेद के रूप में ‘नाट्यशास्त्र’ की रचना की गई। ’दुखार्तानां........ नाट्ययमेतद् भविष्यति’ अर्थात् नाटक का मूल प्रयोजन लोक के दुखी, थके-हारे, निराश और जीवन के बोझ से दबे तथा आक्रान्त लोगों को संबल देना है। उनमें आत्मविश्वास जगाना कि जीवन में तमाम कष्टों के बावजूद वहाँ जीने के लिए कुछ -न-कुछ श्रेष्ठ बचा रहता है।’1 कालिदास और भवभूति के यहाँ भी लोक की महत्ता प्रतिपादित है। कबीर तो लोक संवेदना से आप्लावित कवि हैं। तुलसी भी जब लोक की पीड़ा देखें तो वे कह उठे- ‘खेती न किसान को....... का करी’। आ. रामचन्द्र शुक्ल ने भी अपनी आलोचना के लिए ‘लोक’ को ही प्रमाण के रूप में चुना और उसका उपयोग एक महत्त्वपूर्ण अवधारणा के रूप में किया। लोक संग्रह, लोकमंगल, लोकरंजन आदि पारिभाषिक शब्द उसी लोकदृष्टि की उपज हैं।

‘लोक’ शब्द कहते ही आजकल लोकगीत, लोककला, लोकनाटक, लोकनृत्य, लोकसंस्कृति और लोकभाषा जैसे शब्द याद आते हैं। साहित्य विमर्श में अधिकतर जनता, जनवाद, जनवादी, जनमत जैसे शब्दों का प्रयोग होता है जो वस्तुतः ‘लोक’ के ही समानार्थक हैं।

नागार्जुन जब खुद को ‘जनकवि’ कहते हैं तो तो लोक से ही उसका तात्पर्य है। उनका संघर्ष लोक का ही संघर्ष है। नागार्जुन ने अपने साहित्य से लोकधर्मी परंपरा को आगे बढ़ाया। उनकी कविता का केन्द्रीय विषय वे आम आदमी हैं जो बहुसंख्यक हैं, पीडि़त हैं और जो निर्माण कार्य में लगे हुए हैं। कृष्णा सोबती से बातचीत में वे कहते हैं- ’मैं साधरण हूँ, अपने को साधारण ही कहलवाना पसंद करता हूँ। मैं तथाकथित विशिष्ट लेखकों की जमात में नहीं हूँ। सामान्य की कोशिश मेरी हड्डियों तक में रची- बसी है। विशिष्ट लेखक तो घुसे रहते हैं साहित्यिक गुफाओं में। घुसेड़े रहते हैं अपने को इन्टेलेक्चुअल बेसमेंट में, जब तक खुद ही गुफा न बन जायें। अँधेरे में ही रहेंगे ताकि अपना व्यक्तित्व उस पृष्ठभूमि में और चमके। कुछ अनोखा नजर आये। हशमत मियां, ऐसी बौद्धिक बेसमेंट नौंटकी का मैं कायल नहीं हूँ।’2 उनके ये बयान उनकी कविताओं में पूर्णतः चरितार्थ होते हैं जब वे लिखते हैं-

’प्रतिबद्ध हूँ, जी हाँ, प्रतिबद्ध हूँ-

बहुजन समाज की अनुपल प्रगति के निमित्त-

संकुचित ‘स्व’ की आपाधापी के निषेधार्थ

अविवेकी भीड़ की ‘भेडि़या-धसान‘ के खिलाफ

अंध-बधिर ’व्यक्तियों’ को सही राह बतलाने के लिए

अपने आप को भी ‘व्यामोह’ से बारंबार उबारने के खातिर,

प्रतिबद्ध हूँ, जी हाँ, शतधा प्रतिबद्ध हूँ ।‘3

नागार्जुन का सम्पूर्ण काव्य-संसार इस बात का प्रमाण है कि उनकी यह प्रतिबद्धता हमेशा स्थिर और अक्षुण्ण रही, भले ही उन पर विचलन के आरोप लगते रहे। उनके समय में छायावाद, प्रगतिवाद, हालावाद, प्रयोगवाद, नयी कविता, अकविता, जनवादी कविता और नवगीत आदि जैसे कई काव्य-आन्दोलन चले और उनमें से ज्यादातर कुछ काल तक सरगर्मी दिखाने के बाद चलते बने, पर बाबा की कविता इनमें से किसी में बँध कर नहीं रहीं बल्कि मुक्त होकर आगे बढ़ती रही एवं रास्ता दिखाती रही। बाबा अपने काव्य -सरोकार ‘लोक’ से ग्रहण करते हैं इसी कारण उनके यहाँ अपने समय और परिवेश के साथ-साथ लोक की समस्याओं, चिन्ताओं, संघर्षो एवं सौन्दर्य के साथ प्रत्यक्ष और गहरा जुड़ाव दिखता है। इसी जुड़ाव की दम पर वे कालिदास जैसे बड़े अभिजात्य कवि से, संस्कृत की क्लासिक परंपरा पर विचार करते हुए प्रश्न पूछते हैं तो उनका प्रश्नाकुल होना अनुभव, संवेदना और परंपरा के कई स्तर उजागर करते हुए कवि की रचना प्रक्रिया को भी उजागर करता है -

‘कालिदास, सच-सच बतलाना

परपीड़ा से पूर-पूर हो

थक-थक कर और चूर-चूर हो

अमल-धवल गिरि के शिखरों पर

प्रियवर, तुम कब तक रोये थे ?

रोया यक्ष कि तुम रोये थे ?

कालिदास, सच-सच बतलाना!‘4

यहाँ ’सत्य-सत्य‘ नहीं अपितु ’सच-सच‘ जैसे शब्दों की प्रतिष्ठा से यह ध्वनित होता है कि बाबा की लोकधर्मिता ही उनकी रचनाधर्मिता है। विजेन्द्र ने लिखा है कि ‘लोकधर्मी सौन्दर्यशास्त्र का गहरा संबंध हमारी धरती, जड़ों और जातीयता से है। जो कविता जितनी लोकधर्मी सौन्दर्यशास्त्र को रचेगी वह उतनी ही हमारे देशवासियों की क्रियाशीलता तथा इच्छा-अनिच्छा को कहेगी। वहाँ अनुभव की समृद्धि होगी। संवेगों और भावों की संश्लिष्टता होगी। इसी प्रक्रिया में हम उस लोक लय के करीब आ सकते हैं जो आज भी असंख्य लोगों की जुबान पर जिन्दा हैं।‘5 बाबा की कविता इसी लोकधर्मी सौन्दर्यशास्त्र को रचती है जब वे कहते हैं-

‘निकलेंगे झोपड़ों से छोकरे उलंग

रहेगा जामुन का-सा देह का रंग

सिखायेंगे झरनों को बहने का ढंग

ढुलेंगे छन्द मादल-बाँसुरी के संग

छोटी-छोटी नदियाँ तक गायेंगी अभंग

लो यह उमड़-उमड़ आया.....‘6

नागार्जुन की नज़र अति साधारण में भी भव्य सौन्दर्य देख लेती है जो श्रम से पैदा होता है। रिक्शेवाले के बिवाइयों से फटे ‘खुरदरे पैर’ को देखकर उनका हृदय द्रवित हो जाता है, लेकिन उस रिक्शेवाला का पैर उनके लिए ‘वामन’ के पैर से भी बढ़कर है-

‘खूब गये

दूधिया निगाहों में

फटी बिवाइयोंवाले खुरदरे पैर.............

एक नही, दो नहीं, तीन-तीन चक्र

कर रहें थे मात त्रिविक्रम वामन के पुराने पैरों को

नाप रहे थे धरती का अनहद फासला

घंटों के हिसाब से।’7

इसी तरह बाबा ‘कलकत्ता’ महानगर की चाल में रहने वाले लोगों के विकट जीवन संघर्ष का भी चित्रण किया है-

‘चुरते रहते हैं ढाई सौ प्राण

सत्रह कोठरियों में

हैजा भी नहीं होता

काली माई को दया भी नहीं आती

एक बम्बा है तीन लैट्रिन

देखकर पानी का मोर्चा, पसीने को आती है शर्म

ऊपर देखते हैं खाली बाल्टियों के ढेर

पितरों की प्यासी रुहें

अँगूठा चूसती है नवजात बच्ची

खिड़की से लटका दिया है लाल खिलौना’8

ऐसी विकट परिस्थितियाँ जहाँ पानी पसीने के बराबर मिलता हो, और यह माना जाता हो कि इक्कीसवीं सदी की समस्या पेट्रोलियम की है, पानी की नहीं । ऐसी विषम परिस्थिति में कवि, अगूँठा चूसती नवजात बच्ची और ‘लाल’ खिलौने के माध्यम से जीवन में आस्था प्रकट करता है।

बाबा की खास बात है कि उन्होंने उस विषय को कविता में प्रवेश कराया जो नहीं हो सकते थे, साहित्य की ये जो पवित्र सी दुनिया है उस सभ्रांत दुनिया में ऐसे चरित्रों का समावेश कराया जिनके लिए कविता में जगह नहीं थी। मिसाल के तौर पर उनकी एक कविता ‘पैने दाँतोवाली’-

‘धूप में पसरकर लेटी है

मोटी-तगड़ी, अधेड़, मादा सुअर.................

जमना-किनारे

मखमली दूबों पर

पूस की गुनगुनी धूप में

पसरकर लेटी है

वह भी तो मादरे हिंद की बेटी है

भरे-पूरे बारह थनोंवाली!‘9

बाबा यह सब कुछ अपनी लोकनिष्ठा की बदौलत कर पाते हैं। बाबा अपनी कविताओं में बहुत से लोकप्रिय काव्यरूपों को अपनाते हैं जिसे सीधे लोक से लेकर आते हैं। अपनी कविता में वे भारतेन्दु को याद करते हैं और उन्हीं के तर्ज पर ‘पहेलियाँ‘ एवं ‘मुकरियाँ’ लिखते हैं। ‘पैरोडी’ भी लिखते हैं- ’कांग्रेस जन को तेणे कहिए’, ‘चनाजोर गरम’, ‘हर गंगे’। ‘मंत्र कविता’ जो उनकी सर्वोत्तम पैरोडी है देहातों में झाड़-फूँक करके उपचार करने वाले ओझा की शैली में हैं-

‘ओं भैरो, भैरो, भैरों, ओं बजरंगबली

ओं बंदूक का टोटा, पिस्तौल की नली

ओं डालर, ओं रूबल, ओं पाउंड

ओं साउंड, ओं साउंड, ओं साउंड

ओम् ओम् ओम्

ओम् धरती, धरती, धरती, व्योम् व्योम् व्योम्

ओं अष्टधातुओं की ईंटों के भट्ठे

ओं महामहिम, महामहो, उल्लू के पट्ठे

ओं दुर्गा दुर्गा दुर्गा तारा तारा तारा

ओं इसी पेट के अंदर समा जाए सर्वहारा

हरिः ओं तत्सत् हरिः ओं तत्सत्।’10

बाबा ने दोहे भी लिखे हैं। दोहा जो कि हिंदी का अपना छंद है। जिसकी समृद्धशाली परंपरा है जो सम्भवतः अन्य भाषा में नहीं मिलते उसमें भी बाबा ने कलम चलाकर उसे और समृद्ध किया है-

’खड़ी हो गई चाँपकर, कंकालों की हूक।

नभ में विपुल विराट सी, शासन की बन्दूक।।

जली ठूँठ पर बैठकर, गई कोकिला कूक।

बाल न बाँका कर सकी, शासन की बन्दूक।।‘11

इन दोहों में भी बाबा के बगावती तेवर हैं जो हमेशा शोषण से मुक्ति के लिए संघर्ष करते हैं। इन दोहे से एक चित्र भी बनता है कि कंकाल (आदमी) तो नहीं खड़े हो रहे हैं लेकिन उसको चापकर उसकी हूक खड़ी हो गयी जो जबाब दे रही है। ये हूक, ये जबाब, कोयल के कूक की तरह संगीतमय है जिस पर शासन की बन्दूक बेअसर है।

आज हमारा समाज विभिन्न समस्याओं से जूझ रहा है। एक ओर जहाँ अकाल, भुखमरी, बेरोजगारी, अशिक्षा और भ्रष्टाचार है वहीं दूसरी ओर अभिजात वर्ग सुख-सुविधा का जीवन व्यतीत कर रहा है। अभिजात वर्ग की छोटी से छोटी समस्याओं को बहुत बड़ी एवं जरूरी समस्या बनाकर पेश किया जा रहा है वहीं बहुसंख्यक समाज की बड़ी समस्याओं पर पर्दा डाला जा रहा है। आवारा पूँजी आज देश में सांस्कृतिक संकट पैदा करती हुई फल-फूल रही है जिसे राजसत्ता एवं धर्मसत्ता दोनों का प्रश्रय मिला हुआ है। ‘वह मनुष्य को नष्ट करता है, तो उसे नई मनुष्यता कहता है, वह संहारकारी न्यूट्रान बम को मानवीय बम कहता है, क्योंकि उस बम के प्रभाव से मुनष्य शरीर का कोई नुकसान नहीं होता, वह घुटने से सिर्फ मर जाता है।’’12

इस व्यवस्था ने मनुष्य को मनुष्य का शत्रु बना दिया है। अतः इस समाज के अन्तर्विरोध को दूर करना बाबा के काव्य का लक्ष्य है। रामविलास शर्मा, ’अपनी धरती अपने लोग’ में लिखते हैं- ‘नागार्जुन की हँसी एक साधारण श्रमिक की है, ऐसी हँसी जो पूँजीपतियों, उनके हितसाधक नेताओं, असमंजस में पड़े हुए मध्यवर्ग के बाबुओं को देखकर आती है। ट्राम के निचले दर्जे में कुली मजदूर ठसाठस भरे हैं । उनमें फँस गया कोई भद्रलोक। नागार्जुन उसकी परेशानी का मजा लेते हुए पूछते हैं- ‘छूती है निगाहों को/कत्थई दाँतों की मोटी मुस्कान/ बेतरतीब मूँछों की थिरकन/ सच-सच बतलाओ/ घिन तो नहीं आती है?/ जी तो नहीं कुढ़ता है।’ शमशेर की नाजुकखयाली है- कत्थई दाँतों की मोटी मुस्कान, बेतरतीब मूँछों की थिरकन- लेकिन एकदम भिन्न सन्दर्भ में, एक भिन्न उद्देश्य की पूर्ति के लिए।’13

बाबा की कविताएँ अपने समय के सम्पूर्ण परिदृश्य का जीवंत एवं प्रामाणिक दस्तावेज हैं। उदय प्रकाश ने बाबा की कविताओं की तरफ संकेत करते हुए लिखा है- ‘हम उनकी रचनाओं के प्रमाणों से अपने देश और समाज के पिछले कई दशकों के इतिहास का पुनर्लेखन कर सकते हैं।’ उनकी नजर सिर्फ लोक के सकारात्मक पक्ष पर नहीं टिकती अपितु उसके नकारात्मक पक्ष की पड़ताल करते हुए उसकी आलोचना भी करती है। जिस तरह लोक को कोई सर्वमान्य और निर्विवाद अवधारणा में नहीं बाँध सकता उसी तरह उनकी कविताओं में अभिव्यक्त लोक को भूगोल की सरहदों में नहीं खड़ा किया जा सकता। वह तो सम्पूर्ण विश्व में संघर्षरत है। इसके साथ ही भाषा की सहजता, जातीय बोध और लोकधर्मिता इनके काव्य की विशिष्ट विशेषता है। इनकी कविता धरती की कविता है, जहाँ लोक जीवन अपने वैविध्य में प्रस्तुत हुआ है। नामवर सिंह ने बाबा की कविताओं के बारे में लिखा है कि- ‘मिथिला की ठेठ गाँवों की मिट्टी से लिपटा यह ‘यात्री’ देश-देशान्तर के अनुभवों और दृश्यों से इतना सम्पृक्त हो उठा है कि सामाजिक चेतना उसकी सरस्वती में शतधा स्थापित हो उठीं -कहीं व्यंग्य की तिक्त बौछार, तो कहीं करूणा के मार्मिक उत्स, कहीं गँवई प्रकृति के यथार्थ चित्र, तो कहीं शहरी ढोंग का उद्घाटन। भाषा की तदनुरूप, कहीं प्रांजल तो कहीं ठेठ बोलचाल।’14 जाहिर है नागार्जुन अपनी कविताओं के माध्यम से उस जन की लड़ाई लड़ रहे थे, जो आज भी दबा है कुचला और उपेक्षित है और उसी से शक्ति भी प्राप्त करते हैं। ’मुझे संघर्षशील जनता का विपन्न बहुलांश ही शक्ति प्रदान करता है।‘15 नागार्जुन की यही लोकधर्मिता उन्हें कालजयी रचनाकार बनाती है।

संदर्भ ग्रंथ सूची

1. सौन्दर्यशास्त्र: भारतीय चित्र और कविता, विजेन्द्र, अभिषेक प्रकाशन, 2006, पृ. 3

2. आलोचना (त्रैमासिक), संपादक- नामवर सिंह, अंक 56-57, पृ. 231

3. खिचड़ी विप्लव देखा हमने: नागार्जुन, संभावना प्रकाशन, हापुड़, 1980, पृ. 57

4. सतरंगे पंखों वाली: नागार्जुन, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ. 44

5. सौन्दर्यशास्त्र: भारतीय चित्र और कविता, विजेन्द्र, अभिषेक प्रकाशन, 2006, पृ. 81

6. हजार-हजार बाहों वाली: नागार्जुन, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली,1981, पृ.113

7. नागार्जुन: प्रतिनिधि कविताएं, संपादक- नामवर सिंह, राजकमल प्रकाशन दिल्ली, 1986, पृ. 34

8. प्यासी पथराई आँखें: नागार्जुन, अनामिका प्रकाशन, इलाहाबाद, 1982, पृ. 18

9. नागार्जुन: प्रतिनिधि कविताएं, संपादक- नामवर सिंह, राजकमल प्रकाशन दिल्ली, 1986, पृ. 77

10. वही, पृ. 108

11. वही, पृ. 100

12. परिकथा, सम्पा.- शंकर, जुलाई अगस्त 2009, पृ. 23

13 अलाव, सम्पा.- रामकुमार कृषक, नागार्जुन जन्मशती विशेषांक, जनवरी-फरवरी 2011, पृ. 104

14. ‘नागार्जुन‘ मूल्यांकन पुनर्मूल्यांकन, सम्पा.- परमानंद श्रीवास्तव अभिव्यक्त प्रकाशन, 2006, पृ. 21

15. नागार्जुन का रचना संसार: विजय बहादुर सिंह, संभावना प्रकाशन, हापुड़, 1982, पृ. 11

शोधार्थी

सर्वेश पाण्डेय

हिन्दी विभाग

डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय

सागर (म.प्र.)

मो.नं. - 9452483702

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