निर्मला पुतुल की कविता में आन्तरिक उद्वेगधीरेन्द्र सिंह


(शोध अध्येता)

हिंदी विभाग

डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर म.प्र.470003

मो.न. 09005939570

ईमेल-dhirendra.sam2012@gmail.com

मनुष्य अपने परिवेश से सीखता ही नहीं है अपितु उसे प्रभावित भी करता है| साहित्य और समाज का यही अंतर्संबंध जीवन को उर्जस्वित करता है,और विचार के लिए विवश भी| मानवीय जीवन की संसक्ति उन्हीं मूल्यवान तत्वों को सहेजने पर बल देता है,जिससे हमारा समाज अपनी गतिकी में प्रेरणा बन सके| संवेदनात्मक सजगता मानव मात्र की प्रगति का केंद्रीय फलक है,जिस पर आयामित होकर जीवन और जगत के समस्याओं की पड़ताल की जा सकती है| वर्तमान समय और समाज अनेक बिडंबनाओं से घिरा हुआ है| अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पहरा लगा उसकी विकसनशील प्रवृत्ति पर कुठाराघात किया जा रहा है| आखिर क्या कारण है,कि आज अनेक साहित्यकारों द्वारा पुरस्कार लौटाने की घटना जन मानस के समक्ष दृष्टिगोचर हो रही है| साहित्यकार समाज का मार्गदर्शक होता है,किन्तु यदि उसी के मार्ग को अवरुद्ध कर दिया जायेगा,तब हमारा समाज किस दिशा व गति में प्रगति कर रहा है,हम समझ सकते हैं?संथाली भाषा की कवयित्री निर्मला पुतुल समाज के बाधक तत्वों से आदिवासी जनों को सचेत रहने की सलाह देती हैं, क्योंकि आजकल मनुष्य अपनी पहचान तक छुपाने लगा है –“बायोडाटा में आदमी दिखता है/वह होता नहीं है/और जो होता है वह दिखता नहीं

है/बायोडाटा एक आवरण है/जो बदलता है आदमी आवरण की तरह/अपने जरुरत के मुताबिक/बायोडाटा एक नकाब है अपने भीतर/के आदमी को ढकने का| ”1

आदिवासी अपने संस्कार और सस्कृति के संरक्षण के निमित्त हमेशा आदर्श रहे हैं| समाज में अनेक सामाजिक राजनीतिक तथा आर्थिक बदलाव देखने को मिलते हैं,किन्तु आदिवासी समाज अपनी परंपरा,मूल्य और प्रकृति के प्रति अटूट लगाव से कभी समझौता नहीं किया| समाज का अन्य तबका भौतिकतावाद के दिखावे में आ गया किन्तु आदिवासी अपनी अस्मिता,सांस्कृतिक पहचान और जीवन के प्रति अदम्य साहस का मूल मंत्र ही जपते रहे| उन्हें निराशा लेश मात्र भी नहीं छू पाई है,वे अपनी दुनिया में ही जीवन राग खोजने के हिमायती बने रहे | प्रकृति प्रेम के प्रति निष्ठावान भाव तथा सहज व्यक्तित्व ही आदिवासियों की अपनी थाती है,जिस पर उन्हें गर्व है| किन्तु वैश्वीकरण के प्रभाव ने आदिवासियों की सहज व स्वच्छ दुनिया में विष घोल दिया है जिसके कारण विस्थापन जैसी समस्या का सामना करना पड़ रहा है| कहने को तो विकास हो रहा है पर उस विकास से कितनों को लाभ हो रहा है यह विचारणीय प्रश्न है| आखिर उस विकास के बरक्स जिन्हें विस्थापित किया जा रहा है,उनके पुनर्वास की जिम्मेदारी भी तो बनती है,पर विकास की बलि पर चढ़े कोई और तथा फायदा किसी और को मिले,यह कैसी नैतिकता है? कैसा विकास है | यहाँ यह ध्यातव्य है कि आदिवासी समाज पर आधुनिक विकास के पड़ रहे प्रभाव की चिंता तो निर्मला पुतुल को है ही,साथ ही ऐसे विकास के खिलाफ वह अपनी असहमति भी दर्ज कराती हैं| अपनी एक कविता ‘तुम्हारे एहसान लेने से पहले सोचना पड़ेगा हमें’ में वे आधुनिक विकास के पैमाने को प्रश्नांकित करती हैं –“अगर तुम्हारे विकास का मतलब/हमारी बस्तियों को उजाड़कर कल कारखाने बनाना है तालाबों को भोथकर राजमार्ग/जंगलों का सफाया कर आफीसर्स कालोनियां बसानी हैं और पुनर्वास के नाम पर हमें हमारे ही शहर के सीमा से बाहर हाशिये पर धकेलना है/तो तुम्हारे तथाकथित विकास की मुख्यधारा में/शामिल होने के लिए सौ बार सोचना पड़ेगा हमें| ”2

कहने को तो हम अपने आपको उत्तर-आधुनिक मानते हैं| वैश्वीकरण,औद्योगीकरण,पूंजीवाद आदि अनेक उपमानों से अलंकृत होते हैं किन्तु इस आपाधापी भरे अंधी दौड़ में क्या हमें समाज के सभी तबकों का ध्यान है?या हम अपने ही मुह मियां मिट्ठू नहीं बन रहें हैं| आज हम समतामूलक समाज का सपना देख रहें हैं| साथ ही अपने लोकतान्त्रिक होने का दावा भी ठोक रहे हैं,पर अपनी संस्कृति,सभ्यता,परम्परा,इतिहास आदि मूल्यों को भूलते जा रहे हैं,क्या इसी से समाज का कल्याण होगा?नहीं,हमें मूल्यवान तत्वों की महत्ता को स्वीकार कर उसके सापेक्ष कार्य करना होगा| समाज के प्रत्येक नागरिक की भागीदारिता को सुनिश्चित करना होगा,जिससे समरसता का माहौल बन सके| पर्यावरण संतुलन व पारिस्थितिकी के प्रति आदिवासी जनों की भूमिका सराहनीय है| यहाँ तक कि अपनी पीड़ा अपने ऊपर हुए अन्याय की व्यथा को भी वह प्रकृति से ही व्यक्त करते हैं| आदिवासी स्त्रियों को जंगल में संरक्षण की आस भी प्रकृति व जंगल में रहने वाले जीव जंतुओं से ही है| वह उलाहना भी उन्हें ही देती हैं| “पहरेदार की तरह अडिग खड़ा/महुआ सखुआ के बरसों पुरानी सजीवता के किस्से/खूब सुन रही थी तुम्हारी/पर उस रोज तुम सब के सब/कहाँ गुम हो गए थे?/जाहेर एरा,मराड,बुरू भी/न जाने किसके चढ़ावे से मदहोश होकर/कहाँ किस खंडहर पर ओघडाए हुए थे/जो बचा नहीं सके मेरी मासूम बहनों की इज्जत| ”3

उत्तर-आधुनिक समय अस्मितामूलक विमर्शों का है,जिसमें स्त्री दलित एवं आदिवासी परिधि से केंद्र में आये हैं | अपनी उपस्थिति का एहसास वे अपनी लेखनी द्वारा भी करा रहे हैं| तथा अपनी जड़ों की तलाश में क्रियाशील एवं तल्लीनता से लगे हुए हैं| जहाँ तक अभिव्यक्ति का प्रश्न है,आदिवासी स्त्री और आदिवासिओं की वेदना पीड़ा संत्रास आदि भाव खुलकर व्यक्त हो रहे हैं| अपमान, घुटन,उपेक्षा,विपन्नता एवं अपने अस्तित्व को खोजती स्त्री समय व समाज से अनेक तीखे प्रश्न भी करती हुई दीखती है | भूख व गरीबी की वजह से कई आदिवासी लड़कियां अचानक गायब हो जाती हैं| उनका कुछ अता –पता नहीं चलता बल्कि गणना की संज्ञा से परे हो जाती हैं| आदिवासी स्त्री समाज पर होने वाले अत्याचार,यौनशोषण एवं बदहाली पर क्षुब्द होकर निर्मला पुतुल तथाकथित सभ्य समाज के प्रति प्रश्नाकुल होती हैं| “मेरा सब कुछ अप्रिय है उनकी/नजर में/प्रिय है तो बस/मेरे पसीने से पुष्ट हुए अनाज के दाने/जंगल के फूल,फल,लकड़ियाँ/खेतों में उगी सब्जियाँ घर की मुर्गियां/उन्हें प्रिय है मेरी गदराई देह| ”4

आदिवासियों के प्रति समाज का दोहरा मानदंड है| एक उन्हें जंगली, बर्बर, शिकारी, मूर्ख, गंवार, जाहिल,बने रहने के पक्ष में हैं,तो दूसरा आदिवासिओं को भी मुख्यधारा में जोड़ने की पक्षधरता रखता है | वास्तव में नागर सभ्यता ने आदिवासियों को बहुत नुकशान पहुचाया है | संस्कृति व सभ्यता से दूर कर उन्हें, कहीं का नहीं छोड़ा है | मुख्यधारा के लोगों का दृष्टिकोड़ बहुत ही अनुचित एवं हतोत्साहित करने वाला है –“पिछड़ा असभ्य जंगली/ कहकर पुकारा है हरदम/मूर्ख गंवार अनपढ़ जाहिल समझकर/धकियाया है/रोका है एक सुनिश्चित/साजिश के तहत/मुख्यधारा में आने से हमें| ”5

स्त्री का समाज की निर्मिति में बखूबी योगदान होता है | वह अनेक कष्टों को सहकर भी समाज के उत्थानार्थ अपनी इच्छाओं का दफ़न करती हैं | निर्मला पुतुल की कविताएँ अपने की आहट को बहुत ही जल्द भाँप लेती हैं | गहराई से तंत्र के षड़यंत्र की पहचान करती हैं | संसार के बाह्य और आतंरिक हिस्से में चल रही हलचल की सूक्ष्म पड़ताल करती हैं | घटनाएँ हमारे समय और उसकी बुनावट को प्रभावित करती रहती हैं | किन्तु निर्मला पुतुल आदिवासी समाज के घटनाओं की परत दर परत पड़ताल करती हुई ,उस पर प्रतिक्रिया भी व्यक्त करती हैं | ‘औरत’कविता में स्त्री की मन:स्थिति,अस्मिता संकट,समाज में व्याप्त असुरक्षाबोध सरीखे अनेक सवालों की अभिव्यक्ति के साथ हमें दिखाई पड़ती हैं| स्त्री का जीवन किस तरह हादसों का पर्याय बन गया है,कविता का केन्द्रीय विषय है | घर परिवार समाज को ज्योतिर्मय करने वाली स्त्री अपने जीवन में अंधकार ही अंधकार पाती है ,प्रकाश की मात्र कल्पना ही करते रहने में उसका पूरा जीवन खप जाता है | स्त्री सदियों के बोये हुए दुःख को झेलती है, किन्तु फिर भी उसकी आकांक्षा जन-कल्याण में ही निहित होती है| स्त्री के व्यक्तित्व का बिम्बांकन ‘औरत’कविता के माध्यम से देखा जा सकता है –“सब कुछ सहती है/मन ही मन गुनती है/लकड़ी सी घुनती है /आँसू पीती है /घूट-घूट जीती है /मोम सी पिघलती है/कुछ न कहती है /रोज जन्मती मरती है/घर भर की पीड़ा सहती है /सबकी सुनती है | ”6

दरअसल जिस तरह से आदिवासी युवापीढ़ी उत्साही होकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों,उद्योगधंधों,कारखानों आदि की चपेट में आ रही है| अपनी उद्यमिता व श्रम को पूंजीवाद को समर्पित कर रही है,यह सुखद संकेत नहीं है| यह जिस साजिश के तहत हो रहा है निर्मला पुतुल की कविता उस साजिश की शिनाख्त करती है-“इस ऊबड़ खाबड़ धरती पर रहते/कितनी सीधी हो बहामुनी कितनी भोली हो तुम/की जहाँ तक जाती है तुम्हारी नजर/वहीँ तक समझती हो अपनी दुनिया/जबकि तुम नहीं जानती कि तुम्हारी दुनिया जैसी/कई दुनियाएं शामिल है इस दुनिया में/नहीं जानती/कि किन हांथों से गुजरती/तुम्हारी चीजें पहुँच जाती हैं दिल्ली| ”7

समकालीन कवि निर्वासन पर अपनी असहमति व्यक्त करता है चूँकि विस्थापन की समस्या बहुत गहरी है| औपनिवेशिक समय में विस्थापन की समस्या मूलतः आदिवासिओं के गौर आदिवासिओं के पास हस्तांतरण से जुड़ी हुई है | आजादी के पश्चात् तो सरकारी नीतियों और परियोजनाओं द्वारा विस्थापन ने एक भयावह रूप ले लिया है| समूचे देश से भयभीत करने वाली सूचनाएं आने लगी| मुख्य प्रश्न ज्ञान और संवेदना का है| विस्थापन एक त्रासदपूर्ण स्थिति का नाम है जिसका प्रभाव अनेक पीढियों तक रहता है| विस्थापन का एक मनोवैज्ञानिक व सांस्कृतिक पक्ष भी है| जो नीति व परियोजना जनता को निर्वासित करेगी उसके मुनाफे में विस्थापितों को हिस्सेदार बनाया जाये,और विस्थापन एक सम्पूर्ण प्रक्रिया के रूप में माना जाए| संथाली भाषा की संवेदित कवयित्री निर्मला पुतुल विस्थापन की समस्या को स्त्री से जोड़कर देखती हैं-“धरती के इस छोर से उस छोर तक ?/मुट्ठी भर सवाल लिए मैं /दौड़ती –हांफती –भागती.../अपनी जमींन,अपना घर/अपने होने का अर्थ | ”8

समकालीन हिंदी कविता में आदिवासी जीवन संघर्ष,तनाव,विस्थापन,जल, जंगल और जमीन की पीड़ा को व्यक्त करने वाले प्रमुख कवियों में हैं–रामदयाल मुंडा,हरिराम मीणा,महादेव टोप्पो,ग्रेस कुजूर,रणेंद्र,रमणिकागुप्ता,उदयप्रकाश,एकांतश्रीवास्तव,विनोदकुमारशुक्ल,चंद्रकांतदेवताले,ज्ञानेन्द्रपति,ऋतुराज,निर्मला पुतुल आदि| जिन्होंने अपने दुःख सुख बया किये हैं साथ ही जनता की भावनाओं को साधारणीकृत भी|

दरअसल जनविरोधी राजनीतिक व्यवस्था अपने वर्गीय हितों के लिए एक अवास्तविक प्रजातंत्र की स्थापना करती है तथा संवैधानिक नियमों,कानूनों,घोषणाओं के जरिये जब तक संभव हो लोक संस्कृति को विलंबित करने का षड़यंत्र रचती है| प्रयास यही रहता है कि जन संस्कृति का विलोपन हो जाए| किन्तु हम पातें हैं कि आदिकाल से लेकर आज तक भारतीय लोकभाषाएं विशेषतौर से आदिवासी भाषाओं ने शासक वर्ग के इस हमले का पुरजोर विरोध किया,साथ ही समय के हर दौर में मरने से मना किया है,तथा प्रतिरोध की संस्कृति से उत्पन्न कविताओं,गीतों,मुहावरों,लोकोक्तिओं व अभिव्यक्ति के अनेक रूपों में खुद को और अधिक सबल बनाया है| अपनी मूल्यवान वस्तु को बचाने का हर संभव प्रयास उनके द्वारा किया जाता है| “अपनी बस्तियों को/नंगी होने से/शहर की आबो –हवा से बचाएँ उसे/...जंगल की ताजा हवा/नदियों की निर्मलता/पहाड़ों का मौन/गीतों की धुन/मिट्टी का सोंधापन/...आओ,मिलकर बचाएँ/कि इस दौर में भी बचाने को/बहुत कुछ बचा है,अब भी हमारे पास| ”9

बाजारीकरण के इस दौर में आदिवासियों को नकारने का प्रयास हो रहा है| उनकी संस्कृति और सभ्यता को उनकी सामाजिक संरचना से काटकर सुरक्षित रखने की एसी बातें की जाती हैं,जैसे वे जीवित नहीं बल्कि मृतप्राय हों| जबकि वह सदियों से लड़ते रहें हैं और आज भी अपने अस्तित्व तथा अपने पहचान की लड़ाई लड़ रहें हैं| बावजूद इसके समाज से उन्हें ख़ारिज करने का चलन जारी है| बाजार आदिवासियों के ही नहीं बल्कि आम मनुष्य के जीवन मेंभी शत्रु की भूमिका में ही प्रस्तुत हुआ है | वह आम जिंदगी में ऐसे घुल-मिल गया है कि हमें पता ही नहीं चलता हम कब उसकी गिरफ्त में आ जाते हैं| निर्मला पुतुल और मंगलेश डबराल की चिंता लगभग समान है-“अंततः हमारा शत्रु भी एक नये युग में प्रवेश करता है/अपने जूतों कपड़ों और मोबाइलों के साथ/...हमारा शत्रु किसी एक जगह नहीं रहता/लेकिन हम जहाँ भी जाते हैं पता चलता हैं वह और कहीं रह रहा है/अपनी पहचान को उसने हर जगह घुला-मिला दिया है| ..हमारे शत्रु के पास बहुत से फोन नंबर हैं ढेरों मोबाइल/वह लोगों को सूचना देता है आप जीत गए हैं/..आप बहुत सारा कर्ज ले सकते हैं बहुतसारा सामान खरीद सकते हैं| ”10

देह और बिस्तर से परे स्त्री की दुनिया का अपना गणित भी है,जिसे पुरुषवादी,सामंतवादी समाज को समझना होगा| आज की स्त्री घर के मिथ और इसकी आड़ में रचे जा रहे आदिम षड़यंत्र को धीरे-धीरे समझने लगी है तथा उसका प्रतिकार भी कर रही है| निर्मला जी की कविताओं में वह स्त्री है जिसकी मुक्ति-यात्रा सृजन की प्रक्रिया में अनवरत लगी हुई है| वह स्त्री जो यथास्थिति के व्याकरण को अस्वीकार करती है| वह प्रकृति के बीच अपना स्वतंत्र जीवन चाहती है,अंकुश विहीन| वह जाति और धर्म की परिभाषा से अलग प्रेम और पहचान के अस्मिता की तलाश में है,वह सत्ताधारियों की मंशा पर सवाल करती हुई उससे मुक्त होने का रास्ता तलाशती है| “तन के भूगोल से परे/एक स्त्री के/मन की गांठें खोलकर/कभी पढ़ा है तुमने/उसके भीतर का खौलता इतिहास?/...क्या तुम जानते हो/एक स्त्री के समस्त रिश्ते का व्याकरण?/...अगर नहीं| तो फिर जानते क्या हो तुम/रसोई और बिस्तर के गणित से परे/एक स्त्री के बारे में...?| ”11

निर्मला पुतुल की कविता स्त्री संवेदना,उससे जुड़े भाव,विचार और उसकी निष्पत्ति से निकले हुए अर्थ की गंभीरता को ही व्यक्त नहीं करती अपितु चिंतन के लिए विवश भी करती है| उनकी कविता में प्रकृति और जीवन में अभेद संबंध दृष्टिगत होता है| ये लोकधर्मी चेतना की कुशल चितेरी बनकर उभरी हैं| स्त्री मुक्ति उनकी कविता का मुख्य स्वर है| स्त्री मुक्ति की इनकी अवधारणा बिल्कुल मौलिक एवं प्रासंगिक है| प्रेम के त्याग को भी मुक्ति से अभिहित करती हैं बशर्ते उससे स्त्री के अधिकारों का हक़ न छिने| लोकभाषा और लोक सस्कृति के प्रति इनका गहरा अनुराग है| प्रेम की अनेक छवियों का दिग्दर्शन ही नहीं बल्कि उसे जीवन-संघर्ष से जोड़कर देखने की बात करती हैं| निर्मला पुतुल आमलोगों के प्रति अपनी जिम्मेदारी को जानते हुए उसका निर्वहन भी करती हैं| स्त्रियों को हक़ दिलाने में उनकी संकल्पधर्मिता देखते ही बनती है| -“स्त्रियों को इतिहास में जगह नहीं मिली/इसलिए हम स्त्रियाँ लिखेंगे अपना इतिहास/हमारा इतिहास उन/इतिहास की तरह नहीं होगा/जिस तरह लिखे जाते रहे/अब तक इतिहास/हम खून से लिखेंगे अपना इतिहास/...हम समय की छाती पर पाव रखकर/चढ़ेंगे इतिहास की सीढ़ियाँ/और बुलंदियों पर पहुंचकर/फहराएंगे अपने नाम का झंडा/कुछ इस तरह/हम स्त्रियाँ दर्ज कराएंगी/इतिहास में अपना इतिहास| ”12

निर्मला पुतुल शोषण,अनाचार,वैषम्य तथा रुढियों से मुक्त एक स्वाधीन चेत्ता समाज की स्थापना के प्रयास में निरंतर क्रियाशील हैं| निर्मला पुतुल की ही तरह, उन्हीं के ही मनोभाव से मिलती जुलती कविता है ‘मेरी लिंडवर्ग’ की जिसमें वे लिखती हैं –“मैं जिससे प्रेम करती हूँ/चाहती हूँ/कि/वह मुक्त रहे/यहाँ तक कि/मुझसे भी| ”13

प्राय:स्त्री की स्वतंत्रता का तात्पर्य लगाया जाता है कि वह पुरुष से,प्रेम से,परिवार,घर तथा समाज से मुक्त होना चाहती है जबकि ऐसा है नहीं,वह मात्र समाज में अपना स्वतंत्र अस्तित्व चाहती है| जिसमें उसका अपनापन हो वह जब जो चाहे अपनी मन माफिक कर सके| बंधन को वह नकारती है| अपनी दुनिया में उसका अपना राज हो,किसी भी हस्तक्षेप के प्रति वह विरोध दर्ज कराती है| -“अपनी कल्पना में हर रोज/एक ही समय में स्वयं को/हर बेचैन स्त्री तलाशती है/घर प्रेम और जाति से अलग/अपनी एक ऐसी जमीन/जो सिर्फ उसकी अपनी हो| ”14

वर्तमान समय में जहाँ हम सामाजिक,राजनीतिक,आर्थिक सवालों के घेरे में खड़े हैं,वहीं साहित्य में उत्तर-आधुनिकता कला के मृत्यु की घोषणा कर रही है और दूसरी ओर बाजारवाद,उदारीकरण के नाम पर सांस्कृतिक मूल्यों पर निरंतर हमला जारी है,ऐसे समय में जब पूरी दुनिया में ‘ग्लोबल विलेज’की संकल्पना पनप रही है तब साहित्य भी इससे अछूता नहीं रह सकता| अभिव्यक्ति के इस खतरे के प्रति निर्मला पुतुल की कविता शिद्दत के साथ प्रस्तुत होती है| वह उन तमाम लेखक,लेखिकाओं,कवियों,विमर्शकारों से सवाल करती हुई,कहती हैं कि वह अपनी फेहरिस्त में उन्हें भी शामिल करें जो आज सबसे पीछे की क़तार में है| उन्हें ही नहीं जो मात्र सुविधा लेने के लिए अपने आप को पिछड़ा घोषित करते हैं | वह कहती है-“एक स्त्री पहाड़ पर रो रही है/और दूसरी स्त्री/महल की तिमंजिली ईमारत की खिड़की से बाहर/झांककर मुस्कुरा रही है/ओ,कविगोष्ठी में स्त्रियों पर/कविता पढ़ रहे कवियों/देखो,कुछ हो रहा है/इन दो स्त्रियों के बीच छूटी हुई जगहों में,/..एक स्त्री गा रही है/दूसरी रो रही है/और इन दोनों के बीच खड़ी एक तीसरी स्त्री/इन दोनों को बार-बार देखती कुछ सोच रही है/..क्या तुम बता सकते हो/यह तीसरी स्त्री क्या सोच रही है?| ”15

निर्मला पुतुल ने अपनी कविताओं में स्त्री व आदिवासी अस्मिताओं को उभारा है| एक ओर जहाँ आदिवासी जीवन-संघर्ष,इतिहास है,वहीं दूसरी ओर विडंबनात्मक अंधकार भी है| चूँकि निर्मला पुतुल के जीवन का स्त्री पक्ष भी आदिवासी स्त्री जीवन,संघर्ष और दुःख के साथ प्रस्तुत हुआ है| जीवनानुभव और जगत सचाई दोनों का बड़ा ही मंजुल समन्वय देखने को मिलता है| भाषाई स्तर पर देखें तो निर्मला पुतुल के यहाँ अभिधात्मकता अधिक है चूँकि वह अपनी बात कहने के लिए किसी लच्छेदार भाषा के बजाय सरल एवं सहज आम जन की भाषा प्रयोग में लाती हैं| जिससे आमजन को भी बात समझने में परेशानी न हो| वैसे भी दो टूक व बेबाक टिप्पड़ी के लिए तो काफी चर्चित हैं ही| गहरी संवेदना,तीखा समाजबोध और एक्टिविस्ट दृढ़ता के कारण निर्मला पुतुल की कविताओं की खासी पहचान है| वस्तुतः उनका चिंतन जीवनवादी है,वह अपने समाज की बुराइयों को दूर कर मनुष्यता के उद्घाटन पर बल देती हैं| निर्मला जी समय के बदलाव को स्वीकार कर उसे अनुभव से संपृक्त करती हैं| अनुभव को व्यक्त करने का उनका अदम्य साहस देखते ही बनता है| एक ओर जहाँ उनके काव्य में वेदना है वहीं दूसरी ओर विद्रोह भी| निर्मला पुतुल अपनी भाषा,कथ्य,शिल्प और मुहावरों के लिए अलग ही पहचान रखती हैं| वे समकालीन दौर की एक ऐसी कवयित्री हैं जो कविता की प्रचलित रुढियों,बिम्बों,फैशनों के विरुद्ध जाकर एक अलग ही राह पर चलने में यकीन रखती हैं| सच्चे अर्थों में वह बुनियादी सवालों से टकराती ही नहीं हैं अपितु मनुष्यता के पक्ष में पहल भी करती हैं|

सन्दर्भ ग्रन्थ सूची-

1. निर्मला पुतुल –बेघर सपने,आधार प्रकाशन,पंचकूला हरियाणा,पृष्ठ संख्या, 31

2. निर्मला पुतुल-अरावली उद्घोष,93

3. निर्मला पुतुल –बेघर सपने,आधार प्रकाशन,पंचकूला हरियाणा,पृष्ठ संख्या, 89

4. निर्मला पुतुल-नगाड़े की तरह बजते हैं शब्द,भारतीय ज्ञानपीठ,नई दिल्ली,पृष्ठ संख्या,73

5.डॉ.नवीन नंदवाना (सं.)समवेत अर्धवार्षिक शोध पत्रिका,हिमांशु पब्लिकेशन्स,उदयपुर,पृष्ठ संख्या,71

6. निर्मला पुतुल- बेघर सपने,आधार प्रकाशन,पंचकूला हरियाणा,पृष्ठ संख्या,104

7. निर्मला पुतुल-नगाड़े की तरह बजते हैं शब्द,भारतीय ज्ञानपीठ,नई दिल्ली,पृष्ठ संख्या,12 -13

8. निर्मला पुतुल-अपने घर की तलाश में,रमणिका फाउंडेशन,नई दिल्ली,पृष्ठ संख्या,3

9. निर्मला पुतुल-नगाड़े की तरह बजते हैं शब्द,भारतीय ज्ञानपीठ,नई दिल्ली,पृष्ठ संख्या,12 -13

10.मंगलेश डबराल-नये युग में शत्रु,राधाकृष्ण प्रकाशन,नई दिल्ली,पृष्ठ संख्या,14-15

11 .निर्मला पुतुल-नगाड़े की तरह बजते हैं शब्द,भारतीय ज्ञानपीठ,नई दिल्ली,पृष्ठ संख्या,8

12. निर्मला पुतुल- बेघर सपने,आधार प्रकाशन,पंचकूला हरियाणा,पृष्ठ संख्या,74-75

13.अभिषेक कश्यप(सं.)कविता का लोकतंत्र,अक्षर शिल्पी,दिल्ली,पृष्ठ संख्या,47

14. निर्मला पुतुल-नगाड़े की तरह बजते हैं शब्द,भारतीय ज्ञानपीठ,नई दिल्ली,पृष्ठ संख्या,9

15. निर्मला पुतुल- बेघर सपने,आधार प्रकाशन,पंचकूला हरियाणा,पृष्ठ संख्या,18

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