प्रगतिशील-काव्य में प्रेम की प्रगतिशीलता पर एक बहस:अनूप बाली

प्रगतिशील-काव्य में प्रेम की प्रगतिशीलता पर एक बहस

अनूप बाली

प्रेम का सामाजिक या राजनैतिक परिस्तिथियों के साथ कोई अन्तर्विरोध नहीं होता (या अनिवार्य तौर पर नहीं हो सकता), बल्कि विशिष्ट तरह का प्रेम विशिष्ट सामाजिक और राजनैतिक परिस्तिथियों में आकार ग्रहण करता है, वह उन्ही परिस्तिथियों का प्रतिफल होता है. सामाजिक और राजनैतिक परिवर्तनों के साथ ही साथ प्रेम के स्वरूपों में भी परिवर्तन होते ही हैं, चाहे उसे आप स्त्री-पुरुष संबंध की सीमित चाहरदीवारी में ही देखें. दूसरी ओर वर्गों वाले समाज में, प्रेम का एक वर्ग-चरित्र भी होता ही है. उच्च वर्ग के लोगों लिए प्रेम के मायने निम्न वर्ग के लोगों से कुछ न कुछ अलग होंगे ही होंगे. वर्ग-चरित्र और सामाजिक-राजनैतिक परिस्तिथियाँ, इन्ही के आपसी संबंधों के आधार पर समय की निरंतर प्रवाहमान धारा में, प्रेम के स्वरूप बदलते रहते हैं. प्रेम को राजनितिक और सामाजिक गतिविधियों से अलग करके देखना, किसी विचारक की विकृत दृष्टि ही हो सकती है, क्योंकि वह प्रेम की असीम व्यापकता को मात्र ‘एकान्तिक प्रेम’ में सीमित कर रहा है. ‘एकान्तिक प्रेम’ अवश्य समाज में अपना अस्तित्व रखता है, मगर केवल वह ही मात्र प्रेम का स्वरूप नहीं है. प्रेम के और भी स्वरूप हैं, उसकी और भी विशेषताएं हैं. हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध और विद्वान आलोचक-विचारक आचार्य रामचद्र शुक्ल एकान्तिक प्रेम पर विचार करते हुए, अपने निबंध “लोभ और प्रीति” में लिखते हैं, “एकांत प्रभाव उस अंतर्मुख प्रेम में देखा जाता है जो प्रेमी को लोक के कर्म क्षेत्र से खींचकर केवल दो प्राणियों के छोटे से संसार में बंध कर देता है. उसका उठना-बैठना, चलना –फिरना, मरना-जीना सब उसी घेरे के भीतर होता है. वह उस घेरे के बाहर कोई प्रभाव उत्पन्न करने के उद्देश्य से कुछ भी नहीं करता. उसमे जो साहस, धीरता, दृढ़ता, कष्ट-सहिष्णुता आदि दिखाई देती है वह प्रेम मार्ग के बीच प्रेमोन्माद के रूप में, लोक के बीच कर्तव्य के रूप में नहीं. सारांश यह कि इस प्रकार के प्रेम का क्षेत्र सामाजिक और पारिवारिक जीवन से विछिन्न होता है. उसमे प्रियपक्ष का प्रबल राग जीवन के अन्य सब पक्षों से पूर्ण विराग की प्रतिष्ठा कर देता है.” (आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के श्रेष्ठ निबंध, लोभ और प्रीति, पृष्ठ संख्या 84), इसी तरह उसी निबंध में शुक्लजी प्रगतिशील प्रेम की भी बात करते हैं वे लिखते हैं, “प्रेम का दूसरा स्वरूप वह है जो अपना मधुर और रंजनकारी प्रकाश जीवन-यात्रा के नाना पथों पर फेंकता है! प्रेमी जगत के बीच अपने अस्तित्व की रमणीयता का अनुभव आप भी करता है और अपने प्रिय को भी करवाना चाहता है! प्रेम के दिव्य-प्रभाव से उसे अपने आसपास चारों ओर सौन्दर्य की आभा फैली दिखाई पड़ती है, जिसके बीच वह बड़े उत्साह और प्रफुल्लता के साथ अपना कर्म-सौन्दर्य प्रदर्शित करता है! वह प्रिय को अपने समग्र जीवन का सौन्दर्य जगत के बीच दिखाना चाहता है! यह प्रवृत्ति इस बात का पूरा संकेत करती है कि मनुष्य की अन्त:प्रवृत्ति में जाकर प्रेम का जो विकास हुआ वह सृष्टि के बीच सौन्दर्य-विधान की प्रेरणा करने वाले एक दिव्य-शक्ति के रूप में!” (वही, पृष्ठ संख्या 85). शुक्लजी इस तरह के प्रेम को समाज और सृष्टि दोनों ही से जोड़ कर प्रेम की विस्तृत प्रगतिशीलता को प्रकट करते हैं. एकान्तिक प्रेम की अवस्था पर विचार करती कविताओं का हिंदी-उर्दू में भरमार है. पूरा छायावाद ही इस तरह की कविताओं से भरा पड़ा है. हालाँकि इन एकान्तिक प्रेम कविताओं की अपनी उपयोगिता भी है, किन्तु समस्या तब उत्पन्न होती है जब कविता से कवि सामाजिकता को पूरी तरह अलग कर देता है. ऐसा नहीं है कि कवि को अपनी कविता में सामाजिकता का कोई विशेष वर्णन करना ही चाहिए, बल्कि उसके वर्णन किये बगैर भी वह समाज जहाँ से वह आता है, उसकी मानसिकता कहीं न कहीं उस कविता में अभिव्यक्त हो ही जाती है. लेकिन जब वे सजगता से सामाजिकता को अलग रखने की कोशिश करता है (जोकि वह कर ही नहीं सकता) तब समस्या उत्पन्न हो जाती है. यहाँ मैं प्रेम कविता में सामाजिकता और राजनैतिक-विमर्श की भूमिका को समझने-समझाने का प्रयास कर रहा हूँ.

मैंने पीछे वर्ग-चरित्र और राजनितिक-सामाजिक गतिविधियों के आपसी संबंधों के माध्यम से प्रेम को जोड़ने की कोशिश की है. इम्तियाज़ अली की एक फ़िल्म ‘हाईवे’ इस संबंध को बेहतरीन तरीके से पेश करती है. इम्तियाज़ के पटकथा लेखन की विशेषता यह है कि वे अपनी हर नयी फिल्म में हर नयी प्रेम-कहानी के साथ, प्रेम के कए स्वरूपों को पेश करते हैं (रॉकस्टार अपवाद है). फिल्म की कथा मुख्य रूप से दो चरित्रों जिन्हें आलिया भट्ट और रणदीप हुड्डा ने निभाया है, के आस-पास घूमती है. आलिया भट्ट जहाँ एक ओर एक अमीर परिवार से सम्बन्धित हैं, तो वहीँ रणदीप हुड्डा एक क्रिमिनल है, जिसने हाईवे से आलिया का अपहरण कर लिया है. कहानी इस अपहरण के पुरे सफ़र के इर्द-गिर्द आकार ग्रहण करती है. फिल्म की बेजोड़ पटकथा इस बात का तर्कसंगत जवाब देती है कि कैसे उस लड़की के किडनैप होने के बावजूद बाहर आकर उसे अच्छा लग रहा है, कि क्यों वे रणदीप हुड्डा की तरफ आकृषित हो रही है और कैसे उन दोनों के बीच प्रेम के भाव अपना आकार ग्रहण कर रहें हैं. यहाँ हम वर्ग-चरित्र के बावजूद उस सामाजिक-राजनैतिक गतिविधि को समझ सकते हैं, जो उन्हें करीब ला रहें हैं. दोनों ही चरित्र एक स्तर पर पितृसत्तात्मक समाज के शारीरिक और मनोवैज्ञानिक शोषण से पीड़ित हैं, और यही उन दोनों की समान सतह है, जहाँ वे मिल रहें हैं. फिल्म के कथ्य का बारीक अध्यन यहाँ मेरा लक्ष्य नहीं है, यहाँ मेरा लक्ष्य केवल प्रेम के भीतर सामाजिकता, राजनीति और वर्ग-चरित्र को रेखांकित करना है. साहित्य की ओर लौटे तो, यहाँ हमें प्रेम और राजनितिक-सामाजिक संबंधों का निर्वाह दीखता तो है, पर कविता में वे या तो कम हो जाता है या फिर एक खास तरह की काट सोच लेता है. प्रेम कविताओं में कवि प्रेम से समाज की यात्रा में प्रेम को भुलाते हुए, समाज की समस्याएँ देख कर प्रेम की उपेक्षा कर देते हैं, इसीलिए साहिर लुध्यानवी कह उठते हैं:

मेरी मायूस मोहब्बत की कहानी मत छेड़

अपनी मायूस उमंगों का फसाना न सुना | (तल्खियाँ, मुझे सोचने दे, साहिर लुधियानवी पृष्ठ संख्या 30, हिंदी बुक सेंटर)

तो फैज़ भी इस परिस्तिथि को कुछ इस तरह अभिव्यक्त करते हैं:

मुझसे पहले-सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग

मैं तो समझा था तू है तो दरख्शा है हयात

तेरा ग़म है तो ग़मे-दहर का झगड़ा क्या है

तेरी सूरत से है आलम में बहारों का सबात

तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है

तू जो मिल जाए तो तक़दीर नगूँ हो जाए

यूँ न था, मैंने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाए

और भी ग़म हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा

राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा! (सारे सुखन हमारे, मुझ से पहली-सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग, पृष्ठ संख्या 147,फैज़ अहमद फैज़, राजकमल प्रकाशन)

इतना भर कह कर फैज़ प्रेम की राहत और समाज की राहत (जिसका स्वप्न हर कवि के पास होता है) के बीच के अन्तर्विरोध को प्रकाशित करते हैं. पर क्या उन दोनों के बीच अन्तर्विरोध है? मेरे विचार में यह कवि-दृष्टि पर ही निर्भर करता है कि वे उसको अन्तर्विरोध के रूप में देखता है या प्रेम की राहत को समाज की राहत तक पहुँचने के लिए एक प्रेरणा-स्रोत के रूप में. मुझे ऐसा लगता है कि यह पलायन एक तरह से प्रेम-कविता की सम्पूर्णता के लिए समस्या ही है, क्योंकि इन तरह की कविताओं में कवि प्रेम-कविता में सामाजिकता का, राजनीती का चित्रण तो करता है, किन्तु प्रेम को सामाजिकता और राजनीती से बिलकुल अलग कर देता है, निस्संदेह अलग-अलग कवियों के लिए यह तरीके अलग-अलग ही होंगे. पंजाबी कवि पाश अपनी कविता “मैं अब विदा लेता हूँ” में इस तरह से यह करते हैं :

मैं अब विदा लेता हूँ

मेरी दोस्त, मैं अब विदा लेता हूँ

मैंने एक कविता लिखनी चाही थी

सारी उम्र जिसे तुम पढ़ती रह सकतीं

उस कविता में

महकते हुए धनिये का ज़िक्र होना था

ईख की सरसराहट का ज़िक्र होना था

उस कविता में वृक्षों से चोती ओस

और बाल्टी में चोए दूध पर गाती झाग का ज़िक्र होना था

और जो भी कुछ

मैंने तुम्हारे जिस्म में देखा

उस सबकुछ का ज़िक्र होना था....................

..........लेकिन बहुत ही बेस्वाद है

दुनिया के इस उलझे हुए नक्शे से निपटना

और यदि मैं लिख भी लेता

शगनों से भरी वह कविता

तो उसे वैसे ही दम तोड़ देना था

तुम्हें और मुझे छाती पर बिलखते छोड़कर

मेरी दोस्त, कविता बहुत ही नि:सत्व हो गयी है

जबकि हथियारों के नाख़ून बुरी तरह बढ़ आये हैं

और अब हर तरह की कविता से पहले

हथियारों से युद्ध करना ज़रुरी हो गया है...( लहू है कि तब भी गाता है, मैं अब विदा लेता हूँ, पृष्ठ संख्या 59, परिकल्पना प्रकाशन)

साहिर अपनी नज़्म “किसी को उदास देखकर” में प्रेम और सामाजिकता के अन्तर्विरोध को कुछ यों पेश करते हैं:

...........

तुम्हारे ग़म के सिवा और भी तो ग़म हैं मुझे

निजात जिनसे मैं इक लहज़ा प् नहीं सकता |

ये ऊँचे-ऊँचे मकानों की ड्योढ़ीयों के तले

हर एक गाम पे भूके भिकारियों की सदा |

हर एक घर में ये इफ़लास और भूख का शोर

हर एक सिम्त ये इंसानियत की आहो-बक़ा

ये कारख़ानों में लोहे का शोरो-गुल जिसमे

है दफ़न लाखों ग़रीबों की रूह का नग्मा | (तल्खियां, किसी को उदास देखकर, पृष्ठ संख्या 20, साहिर लुधियान्वी, हिंदी बुक सेंटर)

इस तरह प्रेम और सामाजिकता का यह अन्तर्विरोध इनकी कविताओं में दीखता है. जैसा की मैंने पहले कहा कि यह कवि-दृष्टि पर ही निर्भर करता है, की वे इसे अन्तर्विरोध के रूप में चित्रित करता है या प्रेरणा-स्रोत के रूप में. कवि मुक्तिबोध इस परिस्तिथि को प्रेरणा-स्रोत के रूप में स्वीकार करके प्रेम और सामाजिकता के एक नायाब ही संबंध को हमारे सामने पेश करते हैं. कविता “सहर्ष स्वीकारा है” में यों तो सामाजिकता के साक्षात् दर्शन नहीं होते, पर कविता के भाव-चित्रों में प्रेम का यह प्रेरणा स्वरूप दर्शन और यह संबंध स्वत: प्रकट हो ही जाते हैं, जैसे

ज़िन्दगी में जो कुछ है, जो भी है

सहर्ष स्वीकारा है;

इसलिए कि जो कुछ भी मेरा है

वह तुम्हें प्यारा है |

गरबीली गरीबी यह, ये गंभीर अनुभव सब

यह विचार-वैभव सब

दृढ़ता यह, भीतर की सरिता यह अभिनव सब

मौलिक है, मौलिक है

इसलिए की पल-पल में

जो कुछ भी जाग्रत है अपलक है-

संवेदन तुम्हारा है! ! (मुक्तिबोध रचनावली-1, सहर्ष स्वीकारा है,पृष्ठ संख्या 349 गजानन माधव मुक्तिबोध, राजकमल प्रकाशन)

मुक्तिबोध की इस कविता की खूबसूरती केवल इतनी हीं नहीं कि यहाँ प्रेम सामाजिकता के लिए प्रेरणा-स्रोत है, बल्कि इस कविता की महानता यह भी है कि सामाजिकता को अपने में आत्मसात करते हुए यह कविता पुरे जीवन को ही अपने में भर लेती है. प्रेम और जीवन के एक अद्भुत ही संबंध को यह कविता चित्रित करती है, काव्य-नायक जीवन की जटिलताओं में लापता होकर भी, प्रेमिका से अलग नहीं हो सकता, क्योंकि उनको जोड़ने वाला यह जीवन है, और उससे लापता होकर भी, उसके साथ जीया हुआ उसका जीवन जो अनुभव बनकर उसके पास हमेशा बना ही रहेगा, लापता करके भी उसे उसकी प्रेमिका से अलग नहीं कर सकता:

सचमुच मुझे दंड दो कि हो जाऊं

पाताली अंधेरों की गुहाओं में विवरों में

धुंए के बादलों में

बिलकुल मैं लापता

लापता कि वहां भी तो तुम्हारा ही सहारा है! !

इसलिए कि जो कुछ भी मेरा है

या मेरा जो होता-सा लगता है, होता-सा संभव है

सभी वह तुम्हारे ही कारण के कार्यों का घेरा है, कार्यों का वैभव

अब तक तो ज़िन्दगी में जो कुछ था, जो कुछ है

सहर्ष स्वीकारा है

इसलिए कि जो कुछ भी मेरा है

वह तुम्हें प्यारा है!

प्रेम का ऐसा ही प्रेरणा स्वरूप दर्शन और जीवंत संबंध को आज के कवि दिनेश कुमार शुक्ल ने भी अपने काव्य-संसार में एक नए रूप में प्रस्तुत किया है. अपनी कविता “दुस्साहस” की अमूर्तता के भीतर वे इस तरह के चित्र खींचते हैं, ऐसे बिम्ब प्रस्तुत करते हैं, कि प्रेम और जीवन के नए संबंध, उन संबंधों के नए अर्थ पाठक को प्राप्त होते हैं:

लो सम्भालो यह स्यमन्तक मणि

उदास हृदयाकाश से तोड़ लाया हूँ यह अंतिम नक्षत्र

यह भोर का तारा

इसकी फीकी दीप्ति में

तुम कैसे पढ़ पाओगी मेरा लिखा

इस लिखावट में भरेगा तो वक्त ही भरेगा अब

किन्ही नए अर्थों की रोशनी (आखर अर्थ, दुस्साहस, पृष्ठ संख्या 67, दिनेश कुमार शुक्ल, भारतीय ज्ञानपीठ)

ऐतिहासिक सामाजिकता को प्रेम के अनोखे ही पक्ष से जोड़ते हुए कवि ने आगे लिखा है:

जैसे-जैसे धुंधले होते हैं प्रतिबिम्ब

संकेत जैसे-जैसे होते हैं अस्पष्ट

अश्रव्य आहट पड़ती है कनपटी पर हथोड़े-सी

तब कहीं जाकर

आँखों में बनता है थोड़ा-सा जल

पीठ पर थोड़ी-सी पृथ्वी

आम और जामुन की गंध में तब कहीं जाकर

महकता है थोड़ा-सा प्रेम

भय को भेदकर

तब थरथराते हैं दो गुलाब

कांपते हैं दो पहाड़ आनंद में

तुम्हारी देह के समुद्र में

पुनर्जीवित होते देखता हूँ

मर्मान्तक कथाओं के निरपराध मारे गये शिशुओं को (वही, पृष्ठ संख्या 68)

इसी तरह कवि कुंवर नारायण की एक अन्य कविता “एक अजीब सी मुश्किल” प्रेम को सामाजिकता से जोड़ते हुए मानवीयता, इंसानियत के सबसे महत्वपूर्ण पहलू से हमें जोड़ देती है, जिसकी उपेक्षा अनुभूत करके ही कवि शायद यह कविता लिखने के लिए प्रेरित हुआ हो:

एक अजीब-सी मुश्किल में हूँ इन दिनों-

मेरी भरपूर नफ़रत कर सकने की ताक़त

दिनोंदिन क्षीण पड़ती जा रही

अंग्रेजो से नफरत करना चाहता

जिन्होंने दो सदी हम पर राज किया

तो शेक्सपियर आड़े आ जाते

जिनके मुझ पर न जाने कितने ही एहसान हैं |

मुसलामानों से नफ़रत करने चलता

तो सामने ग़ालिब आकर खड़े हो जाते |

अब आप ही बताइए किसी की कुछ चलती है

उनके सामने?......( इन दिनों (2002), एक अजीब सी मुश्किल, कुंवर नारायण- प्रतिनिधि कविताएँ, पृष्ठ संख्या 185, राजकमल प्रकाशन)

तो इस तरह अपने जीवन के विविध अनुभवों, द्वन्द्वों के साक्षात्कार द्वारा, कवि अपनी कविता में प्रेम के प्रेरणा-स्वरूप को, उसके सामाजिक सम्बन्धों को अपनी विशिष्ट शैली में प्रस्तुत करता है. और जहाँ कोई कवि प्रेम के इस विस्तृत विशालाकार स्वरूप से बचने की कोशिश करता है, तब प्रेम और सामाजिकता का अन्तर्विरोध ही सामने आता है. अन्तर्विरोध हो सकता है, किन्तु वह परिस्थिति की समय-स्थापना के अनुसार होगा, जिसका विश्लेषण उस कविता में या उस कविता से अलग कवि की दृष्टि में दिख जाएगा, किन्तु प्रेम से पलायन एक अलग ही समस्या खड़ी कर देती है, जहाँ प्रेम के विस्तृत स्वरूप को बेहद ही सीमित कर दिया जाता है. प्रेम केवल रुकावट के रूप में सामने आता है, जैसा कि एकान्तिक-प्रेम का गुण होता है. प्रगतिशील प्रेम कभी रुकावट नहीं हो सकता, वह हमेशा प्रेरणा बनकर ही प्रकट होगा. फैज़, साहिर और पाश की वे नज्में एक तरह से प्रगतिशील काव्य में प्रेम का अप्रगतिशील चित्रण हैं, जबकि मुक्तिबोध, दिनेश कुमार शुक्ल और कुंवर नारायण की यह कविताएँ प्रेम की प्रगतिशीलता के नए ही क्षितिज को छूती हैं.

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