प्रेम और बलिदान की महागाथा- ‘उसने कहा था‘ राम चन्द्र पाण्डेय


अतिथि प्रवक्ता, हिन्दी विभाग

ईश्वर शरण डिग्री कालेज

इलाहाबाद

प्रकाण्ड भाषाविद् पं0 चन्द्रधर शर्मा गुलेरी कृत ‘उसने कहा था‘ कहानी युद्ध के पृष्ठभूमि में लिखी गयी प्रेम को केन्द्रीय संवेदना के रूप में चित्रित करने वाली अत्यन्त मर्मस्पर्शी कहानी है। यह हिन्दी कहानी के शिल्प विधान में एक नवीन यथार्थवादी शिल्प अख्तियार करती है, एक नवीन प्रतिमान भी स्थापित करती है। कथानायक लहना सिंह अपनी प्रेम संवेदना के दिव्य स्वरूप का प्रदर्शन करते हुए जहाँ अपने हृदय के कोमल भावों का सुन्दर प्रस्तुतीकरण करता है वहीं दूसरी ओर अपनी वीरता, त्याग, सूझबूझ तथा युद्ध-कौशल का परिचय देता हुआ प्रेम की वेदी पर अपने जीवन का बलिदान कर देता है। यह पात्र न होकर प्रेम, वीरता और बलिदान का दिव्य प्रतीक पुरुष बन जाता है।

प्रस्तुत कहानी की वास्तविक शुरुआत एक बारहवर्षीय बालक और आठ वर्षीय बालिका के आपसी मिलन तथा सहज एवं स्वाभाविक वार्तालाप से होती है। परिचय कुछ वैसा ही होता है जैसा सूरदास के यहाँ राधा और कृष्ण का होता है- (बूझत श्याम कौन तू गोरी/कहाँ रहति काकी है बेटी देखी नहीं कबहूँ ब्रजखोरी)। लड़का, लड़की की मासूमियत तथा सौन्दर्य पर सहज ही मुग्ध होकर पूछ बैठता है- “तेरी कुड़माई हो गयी?”1 और उत्तर में मिला ‘धत्‘ शब्द उसे इतना भा जाता है कि मानो उसने इजहार किया हो और लड़की ने ‘हाँ‘ कर दी हो। इस समूची घटना तथा क्षणिक वार्तालाप का क्रम क्रमशः उसके (लहना) प्यार को घनीभूत ही करता जाता है। ‘लरिकाई की यह प्रीति‘ परवान चढ़ पाती उससे पहले ही ‘लड़की‘ की ‘कुड़माई‘ ने उस बालक की सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया, मानो उसके सपनों की उस रेशमी चादर को तार-तार कर दिया जिसे उसने लड़की के मिलन के समय साथ-साथ ओढ़ने का ख्वाब देखा था। घटना कुछ यूँ घटित होती है- ‘एक दिन जब फिर लड़के ने वैसे ही हँसी में चिढ़ाने के लिए पूछा तो लड़की लड़के की संभावना के विरुद्ध बोली ‘हाँ हो गयी।‘

कब?

“कल,देखते नहीं, यह रेशम से कढ़ा हुआ सालू।”2

इस अप्रत्याशित उत्तर को पाकर लड़के की सारी चेतना जैसे कहीं विलुप्त हो गयी, उसका अन्तर्मन झकझोर दिया गया। उसके दिल पर कितना गहरा आघात हुआ था, उसकी व्यंजना (उस मौन की व्यंजना) कितनी गहरी है, इसे तो वही समझ सकता है जिसने इन पंक्तियों को डूबकर पढ़ा हो-

“लड़के ने घर की राह ली। रास्ते में एक लड़के को मोरी मे ढकेल दिया, एक छावड़ी वाले की दिन भर की कमाई खोई, एक कुत्ते पर पत्थर मारा और एक गोभी वाले के ठेले में दूध उड़ेल दिया। सामने नहाकर आती हुई किसी वैष्णवी से टकराकर अंधे की उपाधि पायी। तब कहीं घर पहुँचा।”3

उस बच्चे के प्रेम में कितनी सात्विकता कितनी पावनता है कि वो जिस लड़की को चाहता है न तो उससे इजहार करता है और न ही उसकी ‘मंगनी‘ की सूचना पर चीखता चिल्लाता है। क्योंकि सच्चे प्रेमियों को डर होता है कि उसका प्रेमास्पद नाराज़ न हो। वह हर हाल में खुश रहे, आँखों के सामने हो या कोसों दूर। यहाँ तो स्थिति यह है कि बालक अभी मात्र 12 वर्ष का है, प्रेम किसे कहते हैं यह भी शायद न मालूम हो । वो बस उस लड़की का साहचर्य चाह रहा था और लड़की की ‘ कुड़माई‘ की सूचना ने उसकी इस चाहत पर भी विराम लगा दिया था। प्रेम का बीजांकुरण हुआ ही था और उसका उन्मूलन भी बड़ी शीघ्रता से हो गया। लेकिन ध्यान देने की बात है कि लड़की के प्रति उसकी चाहत कभी भी खत्म नहीं होती जिसकी सूचना कहानी के आगे के वृत्तान्त में स्पष्टतः मिलती है। एक बात जो इस कहानी की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता है कि यहाँ जिस प्रेम का स्वरूप वर्णित है वह मूलतः ‘मौन‘ के रूप में पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है लेकिन इस ‘मौन की अभिव्यंजना‘ बहुत ही स्पष्ट है, बहुत ही गहरी भी। यहाँ वर्णित प्रेम में कही भी असंयम या अमर्यादा का लेशमात्र भी नहीं है बल्कि सर्वत्र गरिमा, महिमा, संयम और मर्यादा का दिव्य स्वरूप अभिव्यंजित है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इस कहानी के वैशिष्ट्य पर प्रकाश डालते हुए ‘हिन्दी साहित्य के इतिहास‘ में लिखा है- ‘संस्कृत के प्रकाण्ड प्रतिभाशाली विद्वान, हिन्दी के अनन्य आराधक श्री चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की अद्वितीय कहानी ‘उसने कहा था‘ सं0 1972 अर्थात् सन् 1915 ई0 की सरस्वती में छपी थी। इतने पक्के यथार्थवाद के बीच, सुरुचि की चरम मर्यादा के भीतर, भावुकता का चरम उत्कर्ष अत्यन्त निपुणता के साथ सम्पुटित है। घटना इसकी ऐसी है जैसी बराबर हुआ करती है, पर उसके भीतर से प्रेम का एक स्वर्गीय रूप झाँक रहा है- केवल झाँक रहा है निर्लज्जता के साथ पुकार या कराह नहीं रहा है। कहानी भर में कही भी प्रेमी की निर्लज्जता, प्रगल्भता, वेदना की वीभत्स विवृत्ति नहीं है। सुरुचि के सुकुमार रूप पर कहीं भी आघात नहीं पहुँचता। इसकी घटनाएँ ही बोल रही हैं, पात्रों के बोलने की अपेक्षा नहीं।4 वास्तव में शुक्ल जी ने कहानी की मूल विशेषता को अपनी सूक्ष्म आलोचनात्मक प्रज्ञा से पहचान कर संक्षिप्त में ही सही पर बड़ी सूक्ष्मता से विश्लेषित किया है। इस कहानी में एक ओर बाल्यकाल के संक्षिप्त साहचर्य मे भी प्रेम की संवेदना अपने चरम रूप में अभिव्यंजित है तो दूसरी युद्ध की पृष्ठभूमि में भी वही भावना प्रेम के रास्ते बलिदान तक के सफर को तय करती है। ‘लहना‘ का प्रेम असफल होने पर भी सच्चे अर्थों में पूर्णतः सफल है। क्योंकि पाना ही प्यार नहीं होता, खोना भी प्यार होता है, अर्पण-समर्पण भी प्यार के ही रूप हुआ करते हैं, पर इसे तो वही समझ सकता है जिसने लहना की तरह डूबकर प्यार किया हो। लहना का प्यार जो उसके हृदय में पावन एहसास के रूप में सदैव संचित रहा है इसका अवलोकन युद्ध की पीठिका पर होता है। जहाँ एक ओर वह अपनी सूझबूझ तथा वीरता का परिचय देता है वहीं दूसरी ओर सूबेदारनी को दिये हुए वचनों की रक्षा करता हुआ उसके पति एवं पुत्र की जान की रक्षा खुद के प्राणों का बलिदान करके भी करता है। युद्ध के मैदान में भयंकर सर्द रातों में लहना ने सूबेदारनी के पुत्र बोधा सिंह के प्राणों की रक्षा के लिए जो मिसाल प्रस्तुत की वह अपने आप में त्याग की पराकाष्ठा का ज्वलन्त उदाहरण है। अपनों के दर्द को दूरकर स्वयं दर्द सहना एक सच्चे प्रेमी और वीर योद्धा की ही पहचान हो सकती है। वजीरा सिंह की बातों से लहना सिंह के विशाल हृदय की एक झाँकी दृष्टव्य है-

“जैसे मैं जानता ही न होऊँ। रात-रात भर अपने दोनों कंबल उसे उढ़ाते हो और आप सिगड़ी के सहारे गुज़र करते हो। उसके पहरे पर आप पहरा दे आते हो। अपने सूखे लकड़ी के तख्तों पर उसे सुलाते हो, आप कीचड़ में पड़े रहते हो। कहीं तुम माँदे न पड़ जाना। जाड़ा क्या है, मौत है, और निमोनिया से मरने वालों को मुरब्बे नहीं मिला करते।”5

स्पष्ट है लहना सिंह जितना शूरवीर है उतना ही कोमल अन्तःकरण वाला संवेदनशील मनुष्य भी। एक ओर जहाँ उसने अपनी वाक्पटुता, सूझबूझ से लपटन साहब के वेश में आए जर्मन की असलियत को पहचान कर उसके चारों खाने चित कर दिया - ‘‘बिजली की तरह दोनों हाथों से उल्टी बन्दूक को उठाकर लहना सिंह ने साहब की कुहनी तानकर दे मारा। धमाके के साथ ही हाथ से दियासलाई गिर पड़ी। लहना सिंह ने एक कुन्दा साहब की गर्दन पर मारा और साहब ‘आँख/मीन गौट्ट‘ कहते हुए चित हो गये।‘‘6 वहीं दूसरी ओर सूबेदारनी के पति, पुत्र तथा अन्य साथियों की जान की रक्षा भी करता है स्वयं के प्राणों एवं सुविधाओं का उत्सर्ग करके।

लहना सिंह के प्यार में कितनी सात्विकता है कितनी गरिमा, कितनी उदारता है इसका मर्म तो वही समझ सकता है जिसने स्वयं किसी को डूबकर चाहा हो और वह बिना वजह किसी और की हो गयी हो, लेकिन चाहने वाले के दिन में अपनी चाहत, अपनी मुहब्बत, अपनी प्रेमिका के लिए सम्मान और समर्पण ज़रा भी कम न हुआ हो। सूबेदारनी गैर की हो चुकी है तो क्या हुआ, खुद लहना सिंह की शादी भी हो गयी है तो भी क्या हुआ, पर प्यार तो है बालपन का ही, मासूमियत भरे उसी पावन अहसास का ही।

लहना सिंह मृत्यु शय्या पर है, पर उसके प्यार का यह पावन अहसास कभी कम नहीं होने पाता। उसकी मृत्यु करीब है वह जानता है, पर उसे कोई तकलीफ नहीं बल्कि फक्र है इस बात की कि उसने अपनी प्रेमिका सूबेदारनी को दिये हुए बचनों की मर्यादा की रक्षा करने मे पूर्णतः सफलता प्राप्त की। उसे याद आती है सूबेदारनी की ये बातें कि “अब दोनों जाते हैं। मेरे भाग। तुम्हें याद है, एक दिन ताँगेवाले का घोड़ा दही वाले की दुकान के पास बिगड़ गया था। तुमने उस दिन मेरे प्राण बचाये थे और मुझे उठाकर दुकान के तख्ते पर खड़ा कर दिया था। ऐसे ही इन दोनों को बचाना। यह मेरी भिक्षा है। तुम्हारे आगे मैं आँचल पसारती हूँ।”7 और इन्हीं बातों के साये में वह जीवन की आखिरी साँसे लेता हुआ सदा के लिए अपनी आँखें बंद कर लेता है।

यह एक दिलचस्प संयोग है कि यह कहानी 2015 में अपना 100 वर्ष पूर्ण करने जा रही है और इसी वर्ष एक फिल्म ‘माँझी द माउण्टेन मैन‘ भी काफी चर्चित रही जिसमें ‘दशरथ माँझी‘ उस ‘अनकहे सत्य‘ को अपने जीवन का चरम लक्ष्य ही मान लेता है जिसे उसकी पत्नी ‘फगुनिया‘ ने कभी कहा ही नहीं, लेकिन ‘माँझी‘ जान रहा है कि यदि पहाड़ का तोड़कर रास्ता बनाया गया होता तो आज मेरी फगुनिया मेरे साथ होती। माँझी अपनी पत्नी के अशब्द अधरों की भाषा को तहेदिल से महसूस करता है, मानो वह कह रही हो कि उठ माँझी इस पहाड़ की छाती को चीर कर एक रास्ता बना जिससे अब किसी ‘फगुनिया‘ की मौत की वजह यह पहाड़ न बन सके। और माँझी ने वैसा ही किया, उसके प्रेम ने ही उसमें इतनी ताकत भर दी कि उसने पहाड़ को तोड़कर रास्ता बना दिया, और हजारों औरतों, बच्चों तथा पुरुषों की असामयिक मौत को बचा लिया, उन्हें नयी जि़न्दगी दी। दोनों की कहानियों मे गहरा साम्य यह है कि इनमें सच्चे प्रेम और त्याग तथा समर्पण की महिमा है। यहाँ प्रेम महज भोग ही नहीं, पाना ही नहीं, बल्कि खोकर भी किसी को डूबकर चाहते रहना है और उसे जीवन की एक प्रेरणा बना लेना है। अन्तर इतना है कि एक ने अपनी प्रेमिका को दिये हुए बचनों को लिए अपने प्राण का बलिदान कर दिया और दूसरे ने अपनी प्रेमिका (पत्नी) की मौत की वजह से टकराते रहना अपने जीवन का चरम लक्ष्य बना लिया। सारा जीवन उस पत्नी को समर्पित कर दिया जिसने इस संसार से बहुत पहले ही प्रयाण किया है लेकिन उसके दिल में, उसके मानस की दुनिया में, उसके श्रम में, उसकी साँसों में सदैव बसती रही है। चन्द्रधर शर्मा गुलेरी कृत ‘उसने कहा था‘ कहानी के 100 वर्ष पूर्ण होने पर ‘माँझी द माउण्टेन मैन‘ से अच्छी श्रद्धांजलि और क्या हो सकती है? ‘माँझी‘ और ‘लहना सिंह‘ का त्याग, बलिदान, प्रेम और संघर्ष हजारों सालों तक समाज, राष्ट्र एवं विश्व के प्रेमियों के लिए सदैव एक प्रेरणा का काम करता रहेगा। मज़रूह सुल्तानपुरी की एक शेर मैं इन दोनों महान प्रेमियों की तरफ से गुनगुनाता हूँ-

‘हमारे बाद अब महफिल में, अफ़साने बयाँ होंगे।

बहारें हमको ढूँढेंगी न जाने हम कहाँ होगे।

इसी अंदाज़ से झूमेगा मौसम गायेगी दुनिया,

मुहब्बत फिर हसीं होगी, नज़ारे फिर जवां होंगे।’

1- (संपादक) नंदकिशोरनवल- हिन्दी की कालजयी कहानियाँ, पेज संख्या 36

2- (संपादक) नंदकिशोरनवल- हिन्दी की कालजयी कहानियाँ, पेज संख्या 36

3- (संपादक) नंदकिशोरनवल- हिन्दी की कालजयी कहानियाँ, पेज संख्या 36

4- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हिन्दी सहित्य का इतिहास, पेज संख्या 335

5- (संपादक) नंदकिशोरनवल- हिन्दी की कालजयी कहानियाँ, पेज संख्या,38

6- (संपादक) नंदकिशोरनवल- हिन्दी की कालजयी कहानियाँ, पेज संख्या 41

7- (संपादक) नंदकिशोरनवल- हिन्दी की कालजयी कहानियाँ, पेज संख्या 45

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