बहुजन हिताय राजा - ‘छत्रपती शिवाजी’ (‘वीर शिवाजी’ उपन्यास के संदर्भ में)


प्रा. सचिन मदन जाधव

सद्गुरु गाडगे महाराज कॉलेज,

कराड जिला – सातारा (महाराष्ट्र)

09226336206

भारतवर्ष में राजाओं की परंपरा पुरानकालों से देखी जा सकती है। विरासत में मिली राजगद्दी को संभालने और व्यक्तिगत स्वार्थ तथा ईष्र्याबोध से राज्य की वृध्दि में अनेक राजाओं ने अपने जीवन को समाप्त किया। इतिहास के कुछ पन्नों पर अपना नाम दर्ज कराकर वे सदा के लिए इतिहास का अंग बन गए। भारत में मध्ययुगीन काल में जब चारों ओर यवनों का आधिपत्य स्थापित हो चुका था और भारतवर्ष के क्षत्रिय यवनों द्वारा प्राप्त जागीर पर अपने आपको धन्य मानते थे और यवनों के सत्ताविकास के लिए अपनों पर ही तलवारे उठाते थे ऐसे देश धर्म से च्यूत हो चुके काल में बीजापुर के सुलतान के जागीरदार शाहजी भोसले के घर में ‘शिवाजी’ नामक बालक ने जन्म लिया। लेखक मनु शर्मा ने इसी इतिहास पुरुष शिवाजी के पौरुष और धर्मपरायनता को लेकर उनके जीवनकार्य को प्रकट करनेवाले उपन्यास ‘वीर शिवाजी’ की रचना की। जन्म पूर्व काल की स्थितियाँ कुछ ऐसी बनी कि माँ जीजाबाई को अपने पिता के किले पर बंदी बनाकर रखा गया। शायद अभिमन्यू के समान शिवाजी ने गर्भावस्था में ही दासतामुक्ति के पाठ पढ़े हो। राजनीतिक वातावरण और राजनीतिक चालें तो वे बचपन से ही अनुभव कर रहे थे। जीजाबाई जैसी वीरांगणा के संस्कारों ने शिवाजी को अन्याय के सामने झुकना कभी सीखाया नहीं इसलिए अपने पिता शाहजी के साथ बीजापुर दरबार में जाने के बाद भी उन्होंने सुलतान को शाही सलाम नहीं किया। राजमार्ग पर होनेवाली गोहत्या को बंद करने के लिए मजबूर किया।

माँ जीजाबाई और दादोजी कोणदेव की छत्रछाया में शिवाजी नीति के पाठ सीखते गए। दादोजी राजकार्य में शिवाजी को अपने साथ रखते। जिससे उनकी राज-काज की समझ समय के पहले ही बढ़ गई थी। शिवाजी ने दादोजी कोणदेव के साथियों के पुत्रों से गहरी दोस्ती बनाकर उनकी सहायता से स्वराज्य की नीव ड़ाली। ऐसाजी कंक, तानाजी मालसरे, नेताजी पालकर की सहायता से तोरणा किला हासिल किया। उसकी मरंमत कराई। उसी किले के नजदीक रायगढ़ किले का निर्माण किया। शुरु में दादोजी कोणदेव की सुलतान और शाहजी के प्रति इमानदारी ने इसका विरोध किया परंतु बाद में शिवाजी को प्रोत्साहित करते हुए वे कहते है, ‘‘बेटा, तू बड़ा योग्य है। मुझे विश्वास है कि तू एक न एक दिन अवश्य हम लोगों का नाम अमर करेगा। माता, धरती माता तथा गऊ माता की सदा सेवा करना। अपनी माता की सेवा में प्राणों तक का उत्सर्ग करने पड़े तो पीछे मत हटना। यही सच्चे पुत्र का धर्म है।’’(पृ. 46) शिवाजी ने एक एक करके शाहजी की पुरी जागीर पर अधिकार जमा लिया। बीजापुर के सुलतान ने शिवाजी को सबक सीखाने के लिए और किले वापस पाने के लिए बाजी घोरपडे के माध्यम से शाहजी को बंदी बनाकर शिवाजी से किलों की माँग की परंतु शिवाजी ने प्रजा हित में प्राप्त किए प्रांत को सुलतान को व्यक्तिगत हित (पिता शाहजी को छुडाने) के लिए सुलतान को लौटाना ठीक नहीं समझा। शिवाजी ने कूटनीति करके मुगलों से संधि करके पिताजी को मुक्त कराया और प्रजाहित को ठेस भी पहुँचने नहीं दी।

शिवाजी की कर्तव्यदक्षता में बदले की भावना को कोई महत्त्व नहीं था। शाहजी द्वारा बाजी घोरपडे के छल का बदला लेनेवाला पत्र प्राप्त होने पर भी शिवाजी ने बाजी के प्रति कोई कार्रवाही नहीं की। कुछ वर्षो पश्चात बीजापुर के आदिलशाह के कहने पर इखलास खाँ, खवास खाँ, बाजी घोरपडे और व्यंकोजी भोसले (शिवाजी के सौतेले भाई) ने सामुहिक आक्रमण की योजना बनाई तब शिवाजी में अपने बचाव में मुधोल पर आक्रमण किया जिसमें बाजी घोरपडे मारे गए। मुधोल से लौटते समय बाजी पुत्र मालोजी को पुश्तैनी दुश्मनी भुलने संबंधी सलाह दी। ख़वास खाँ को खानापुर में पराभूत किया। भाई व्यंकोजी के साथ युध्द न करने की नीति का समर्थन करते हुए शिवाजी नेताजी से कहते है, ‘‘मैं अपने भाई पर आक्रमण करके जघन्य पाप नहीं करना चाहता। यदि उसने चढ़ाई की तो लाचार होकर सामना करना ही पडेगा। .... तुम जिसे शत्रु समझते हो मैं उसे पथभ्रष्ट भाई समझता हूँ।’’ (पृ.144) शिवाजी ने इसी नीति के कारण मातृद्रोह करनेवाले औरंगजेब का साथ नहीं दिया।

बीजापुर की राजमाता ने शिवाजी की दमन करने के लिए दस हजार सैनिकों के साथ अफजल खाँ को भेज दिया। वह उत्पात मचाता हुआ निरंतर आगे बढ़ रहा था। उसके उत्पात से जनता में हाहाकार मचा था साथ ही शिवाजी भी चिंतातूर हो गए थे लेकिन स्वतंत्र राष्ट्र के अस्तित्व के लिए अपने साथियों को समझाते हुए कहते है, ‘‘मुझे इस समय भावुक नहीं बनना है। भविष्य को हर पहलु से देखना है, ‘‘क्योंकि आज की अदूरदर्शिता कल हमारे देश और जाति के लिए घातक हो जाएगी। मेरे न रहने पर उद्देश्य की पूर्ति का भार आप सब पर होगा। इसे मत भूलिएगा। जिस किसी को भी नेता चुनिएगा, उसकी आज्ञा का पालन वैसे ही कीजिएगा जैसे आप मेरी आज्ञाओं का पालन करते है।’’(पृ.104) शिवाजी ने पुरी रणनीति बनाकर अपनी जान जोखिम में डालकर अफजल खाँ से भेंट ली लेकिन उनसे जैसे ही दगा किया उसपर पलटवार करके उसे मार डाला। इस युध्द में जितने भी सैनिक कैदी बनाए गए सबको शिवाजी ने बिना चोट पहुँचाए छोड़ दिया क्योंकि शिवाजी की लड़ाई व्यक्ति से नहीं विचारों से थी। शिवाजी की ओर से लडते हुए ‘जो मराठे सैनिक मारे गए थे, उनकी विधवाओं को पेंशन दी गई। मृत

पिता के तरुण पुत्रों को पिता की नौकरी मिली। घायल सैनिकों को पुरस्कार दिए गए । यह पुरस्कार सौ रुपये से लेकर आठसौ रुपये तक था।’ (पृ. 113)

शिवाजी अपनी सेना का विशेष ध्यान रखते थे। ये राष्ट्र के आधार होने के साथ साथ उनपर उनकी पारिवारिक जिम्मेदारियों भी थी। इसलिए शिवाजी ऐसी युध्दनीति बनाते जिसमें कम-से-कम जान की जोखिम हो। इसलिए उन्होंने खुले में युध्द करने के बजाय छुपकर युध्द करने की नीति अपनाई थी। पनहाला के घेरे को तोडकर जब वे विशालगढ़ की ओर भागे तब फजल खाँ उनका पीछा करता हुआ निकट पहुँचा तब शिवाजी के साथ बाजीप्रभु देशपांडे ने शिवाजी को आगे निकल जाने और खुद को अन्य सैनिकों के साथ शत्रु पक्ष को रोके रखने के लिए रुकने की बात कही। उसका विरोध करते हुए शिवाजी ने कहा, ‘‘मैं यह नहीं चाहता कि मैं भाग जाऊँ और तुम सब मारे जाओ। इस बलिदान के पवित्र महायज्ञ में मैं भी अपनी आहुति देकर भाग्यवान बनना चाहता हूँ।’’(पृ.119) बाजीप्रभु ने इस बात को नकारते हुए और प्रजाहितैषी शिवाजी की महत्ता को अधोरेखित करते हुए कहा, ‘‘हम लोगों के मर जाने पर भी यदि आप जीवित रहेंगे तो हमारे जैसे लाखों तैयार हो जाएँगे, किंतु आपको खोने पर हमें दुसरा शिवाजी नहीं मिलेगा।’’(पृ.119) शिवाजी ने हमेशा ऐसी युध्दनीति अपनाई जिसमें युध्द ही न करना पड़े या बहुत कम सैन्यहानी हो। बाजी श्यामराजे, अफजल खाँ, शायस्ता खाँ आदि लोगों पर किए गए हमलो में अपनी जान जोखिम में डालकर सैन्यहानी होने से बचाई थी। इसीलिए तो तत्कालिन काल के शासक शिवाजी को जादूगर मानते थे। युध्द हुआ नहीं कि शिवाजी की जीत हो जाती। विरोधी की बड़ी से बड़ी सेना देखते रह जाती और शिवाजी सबपर हावी हो जाते।

वास्तव में शिवाजी युध्द विरोधी थे। उन्होंने स्वजनों पर कभी भी अपनी ओर से तलवार नहीं उठाई। उनकी तलवार राष्ट्रहित में यवनों के विरोध में ही उठी। सभी राष्ट्र पुतों के साथ उन्होंने सामज्यस्य बनाए रखने की कोशिश की। यशवंत सिंह, मिर्जाराजा जयसिंह को भी राष्ट्रप्रेम का पाठ पढ़ाया। मिजऱ्ाराजा जयसिंह को अपनी गुलामी की याद दिलाते हुए शिवाजी कहते है, ‘‘देशभक्त की असफलता पर भविष्य की आँखे आँसुओं अध्र्य चढ़ाती है, किंतु दास की सफलता पर भी उनमें घृणा के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता। मुगल शासन का बोझ अपने कंधे पर उठाने से अच्छा होता कि मातृभूमि का बोझ आप अपने कंधे पर उठाते।’’ ( पृ.161) स्वतंत्र राष्ट्र की रक्षा के लिए उन्होंने मुगलों से पुरंदर में संधि की। अपनी जान जोखिम में डालकर औरंगजेब से मिलने गए लेकिन जाने से पहले ऐसी व्यवस्था बना गए कि उनके जिवित वापस न लौटने पर भी राष्ट्रसेवा का कार्य आगे बढ़ता रहे। अंग्रेजो के विरुध्द उन्होंने दूरदर्शिता का परिचय देकर अपनी जलशक्ति बढ़ाई जिससे उनके शासन काल में उनके राज्य में अंग्रेज पाॅव पसर न पाए। यही दूरदर्शिता भारतवर्ष के परवर्ती शासक दिखाते तो भारत कभी भी अंग्रजों का गुलाम न बनता।

शिवाजी महाराज की शासन व्यवस्था सामान्य लोगों के हितों को समर्पित थी। आग्रा से लौटते समय एक सामान्य स्त्री द्वारा लूट की शिकायत करने पर उसे उसकी लूट के कई गुणा अधिक धन दिलाया। गोलकुंडा यात्रा में सैनिकों को सक्त हिदायत थी कि सामान्य लोगों तथा किसानों को न सताया जाए। शिवाजी महाराज की सत्ता का केंद्र बिंदू सामान्य व्यक्ति होने से उन्हें जनसमर्थन प्राप्त था। शिवाजी के राज्याभिषेक का यही मूल कारण था। सामान्य लोगों के सामने दोहरे लगान की समस्या थी क्योंकि मुगल और आदिलशाह उन्हें राजा नहीं मानते थे। जनता दुविधा में रहती कि अपना लगान किसे दे। जनता को उसका स्थायी उत्तर मिले व दोनों ओर से लुटी न जाए । साथ ही शिवाजी द्वारा स्थापित शासन व्यवस्था जनता के प्रति उत्तरदायित्व स्वीकारें आदि कारणों से उन्होंने राज्यभिषेक कराया।

स्त्रियों के प्रति शिवाजी का दृष्टिकोन सदा ही सम्मानजनक रहा है। आबाजी सोनदेव ने कल्याण लूट के साथ अनजाने में कल्याण किलाध्यक्ष की बहू उठा लाई । इस भूल को स्वीकारते हुए उसे सम्मान के साथ बीजापुर पहुँचाया गया और अपने साथियों को समझाते हुए कहा,‘‘ हमें ऐसी घटनाओं से बचना चाहिए । हमें दुसरे के घर की महिलाओं का उतना ही सम्मान करना चाहिए जितना हम अपने घर की महिलाओं का करते हैं।’’ ( पृ. 54) शिवाजी के कर्नाटक मुहिम में भी बेलबाड़ी में सावित्रीबाई नामक पटेलिन ने शिवाजी के आक्रमण का डटकर मुकाबला किया। शिवाजी के साखुजी गायकवाड नामक सैनिक ने उसे धोके से पकड़ा और बेइज्जत किया। सावित्रीबाई को शिवाजी के सामने लाया गया तब सावित्रीबाई के रौद्र रुप ने सारी कहानी बताई। शिवाजी ने संकोचते हुए उसे कहा, ‘‘मेरा सिर अपने पापों के कारण लज्जा से झुक गया है। तुम्हारे साथ जिसने ऐसा व्यवहार किया, वह सचमुच नीच है। पाप ने उसे अंधा बना दिया है और मैं उसे सदा के लिए अंधा बना दूँगा।’’ (पृ. 230) शिवाजी का न्याय सबके लिए समान था। इसीलिए अपने पुत्र शंभूजी द्वारा एक स्त्री पर किए गए अत्याचार पर उनकी प्रतिक्रिया बड़ी तीव्र थी। ‘‘यदि किसी और ने ऐसा अपराध किया होता तो मैं उसे प्राणदंड देता, किंतु जब मेरे पुत्र ने ऐसा अपराध किया तो मैं उसे प्राणदंड से कठोर दंड दूँगा। आज पूरा महाराष्ट्र देख ले कि पाप का प्रायश्चित कितना कठोर होता है। इतिहास शिवाजी के इस न्याय को कभी न भूले।’’ (पृ. 231)

शिवाजी की न्यायप्रियता, कर्तव्यदक्षता, जातिगत स्वाभिमान, राष्ट्रप्रेम, निडरता आदि गुणों ने उन्हें सामान्य राजाओं की श्रेणी से कई ऊँचा स्थान प्राप्त करा दिया । वे देश की विशेषता महाराष्ट्र की जनता के हृदयसिंहासन पर आज भी विराजमान है। लोग उन्हें देवताओं की तरह पूजते है। बच्चे युवाओं के वे हमेशा आदर्श रहें। उनके नाम का जयघोष सोए हुए लोगों में भी जोश भर देता है। ऐसे महान व्यक्तित्व की बारिकियों को लेखक मनु शर्माजी ने सजीव इतिहास के साथ संवेदनशीलता से प्रस्तुत किया है। लोग वीर शिवाजी के कार्य को युगो-युगों तक याद करते रहेंगे।

संदर्भ -

1) मनु शर्मा, वीर शिवाजी (उपन्यास), विद्याविहार प्रकाशन, 1660, कूचा दखनीराय, दरियागंज, नई दिल्ली - 110002

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