बुजुर्गो पर लेख: सरोज उप्रेती


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प्रत्येक मनुष्य बचपन जवानी फिर बुढ़ापे का सफ़र तय करता है, बचपन प्यार खेल में कट जाता है जवानी के लिए कहा गया है जवानी दीवानी शरीर में पूरी ताकत होती है कुछ भी कर गुजरने को तैयार होता है आदमी किन्तु उम्र की तीसरी सीढ़ी पर कदम रखते ही के काम करने की और सोचने समझने की शक्ति में शिथिलता आने लगती है और उसका आत्म विश्वास डगमगाने लगता है ऐसे समय में उसे परिवार से प्यार और सहानुभूति की आवश्यकता पड़ने लगती है पहले संयुक्त परिवार होते थे बुजुर्गों को विशेष रूप से सम्मान प्राप्त होता था , उनकी राय उनके अनुभव को नज़रंदाज़ नही किया जाता था. परिवार बुजुर्ग मुखिया ने नाम से जाना जाता था. और उन्हैं आखिरी वक्त के लिए परिवार का सहारा था. लेकिन आज समय बदल रहा है ज्यादातर बच्चे अपना जीवन बेहतर बनाने के लिए संयुक्त परिवार में रहना पसंद नही करते पैत्रिक घर छोड़ कर अपना नया आशियाँ बसा लेते है. आज की पीढ़ी हम दो हमारे पर विश्वास करती है जो लोग साथ रहते भी है तो समय की व्यस्तता और विचार न मिलने के कारण वृद्धों से दूर रहना पसंद करते है बुड्ढ़े बुढ़िया अलग थलग पड जाते है. उन्हें अपनी छोटी से छोटी आवश्यकता के लिए बच्चों का मुंह ताकना पड़ता है. अगर चार बेटे है तो समस्या और भी भयानक होती है हर बेटा सोचता है मैं ही अकेले जिम्मेवारी क्यों लूँ ? और भाइयों का फर्ज भी तो बनता है. मेरा ऐसे बुजुर्ग दम्पती से सम्पर्क हुआ है जिन्होंने बताया की “ घर उनके नाम था बेटो ने हस्ताक्षर करवा कर घर अपने नाम करवा लिया,उनकी एक दूकान थी वह भी बेटो ने अपने नाम कर ली, अब उहें कोई बेटा पूछता नही दो बेटियां भी है उनकी शिकायत है की उन्हैं जायदाद से कोई हिस्सा नही मिला वो भी नाराज़ है. उन्हैं घर के कोने मैं एक छोटा सा कमरा दिया गया है. साल में तीन महीने एक बेटे के घर से खाना उनके कमरे मैं पँहुच जाता है अगर वह अपने परिवार के साथ बाहर चला गया तो उन्हैं या तो भूखा रहना पड़ता है या किसी भंडारे में जा कर खा आते है. यह तो एक परिवार की कहानी है ना जाने ऐसे कितने किस्से देखने सुनने को मिल जाते है

आज भारत सरकार द्वारा बृद्धाश्रम खुले है जो परिवारों से दूर होते है एक बार घर के सदस्य उन्हैं छोड़ आने के बाद खोज खबर नही लेते. कमरों बैठे हुए ये लोग अपने प्रिय सम्बन्धियों का इंतज़ार करते रहते है. उम्र के आखिरी मोड़ पर असहाय जीवन जीते है. यह उन वृद्धो की कहानी है जिनके बच्चो की माली हालत अच्छी है, हालाँकि गोर्मेंट ने उनके लिए पेंशन नियुक्त की है लेकिन जीवन व्यापन के लिए पूरी नही पड़ती. की बार सुनने में आया है की इनके मरने पर भी घर का कोई सदस्य लाश लेने नही आया, वैसे हर धर्म में बुजुर्गों के सम्मान की शिक्षा दी जाती है लेकिन बुजुर्गों को युवा पीढ़ी से वो अधिकार सम्मान नही मिल पाता जिसके वो हकदार है . बुजुर्गों के लिए काम करनेवाली स्वयं सेवी संस्था के आकड़ो के अनुसार अधिकांश बुजुर्गों को शारीरिक मानसिक प्रतारणा झेलनी पड़ती है. वो बहुत तनाव ग्रस्त दुखी है बहू बेटो के तानो से परेशान लेकिन साथ रहने को मजबूर अपमान का घूंट पीते रहते है हैं जो उन्हैं मृत्यु की ओर तो नही पीड़ा की ओर अवश्य धकेल देती है आज के समय भविष्य का भय बच्चो युवकों की तुलना में बुजुर्गों को ज्यादा सताता है. कई बार अकेले रहने वाले वृद्धों की नकद जेवर के लालच लुटेरे मार कर चले जाते है कभी घर के सदस्य जवाई बेटों द्वारा भी ह्त्या कर दी जाती है

आज विकसित देशो ने इस समस्या का समाधान निकला है इन देशो में वैधानिक रूप से वृद्धों के भविष्य का उत्तरदायित्व सरकार ने अपने हाथ में ले लिया है. अवकाश प्राप्त वृद्धों के लिए आवास गृह है जहाँ उन्हैं जीवन की हर सुविधा प्रदान की गई है , यहाँ खेल , स्वास्थ मनोरंजन लाइब्रेरी की सुविधा है .एक काल करने पर होस्पिटल से गाड़ी लेने आ जाती है . बीमार को इधर उधर नही भटकना पड़ता सरकार द्वारा कम से कम इतनी पेंशन निश्चित की गई है रोज का खान पान चलता रहे. बस सिनेमाघर ट्रेन हवाई जहाज़ सब जगह कन्शेसन मिलता है लेकिन दुनिया की सबसे ज्यादा जनसंख्या वाले देश भारत में यह असम्भव है. फिर भी थोडा प्रयास जाय तो इनका जीवन कुछ हद तक सरल बन सकता है इसके लिए युवाओं को आगे आना होगा वो माता पिता को बोझ न समझ कर उन्हैं सम्मानित जीवन प्रदान करें. बुजुर्ग उस वट बृक्ष सामान है जिसकी छाया से घर हरा भरा रहता है. माता पिता की दुआ से बच्चो का भविष्य फलता फूलता है. जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन अर्पण कर दिया बच्चो के लिए, पालपोष योग्य बनाया, नैतिक तौर पर इतनी जिम्मेवार तो बनती ही है की अपने माता पिता की देखरेख करें. उनके अनुभवो का लाभ उठायें. तभी बुजुर्ग अपना अंत समय ठीक से व्यतीत कर सकेंगे. उनके भी बच्चे है जैसा देखेंगे वैसा ही सीखेंगे.

सरोज उप्रेती

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