“बुजुर्ग सम्मान : तथाकथित आधुनिकता के दौर में संघर्ष करता विषय” अखिलेश कुमार गौतम

अगर पश्चिमी परिभाषाओं के आधार पर अपने अतीत की, अपने वर्तमान के साथ तुलनात्मक पड़ताल करें तो आज का दौर यक़ीनन आधुनिकता का दौर कहलाएगा । ये दौर लोगों को एक तरफ बेहद स्वतंत्र और दूसरी तरफ अत्यधिक नियंत्रित जीवन शैली को एक साथ लेकर जीने के लिए तैयार करता प्रतीत होता है । हर दौर की अपनी कुछ जरूरतें और विशेषताएँ होती, जो उस दौर में रहने वाले लोगो को प्रशिक्षित करने और आचरण करने की कुछ सीमाएं निर्धारित करती हैं । यह प्रक्रिया इतनी सतत एवं अमूर्त होती है की इससे होने वाले बदलावों को हम अक्सर स्पष्ट रूप से देख नहीं पाते बस अधिक से अधिक महसूस ही कर पाते हैं , इसका कारण शायद समय की अपेक्षाओं का दबाव या गहन विश्लेषण की कसरत के प्रति उदासीनता हो सकता है । वर्तमान में हम सब आधुनिकता को लक्ष्य बना के दौड़ रहे हैं एवं जिन परिभाषाओं को हम इस दौड़ का आधार मानते हैं उनके अनुसार ये दौड़ एक अंतहीन दौड़ है । यक़ीनन आधुनिकता ने हमको काफी कुछ दिया है , हमारे जीवन को सरल बनाने का लगभग हर एक यंत्र दिया है , हम एक समूह से हट कर अपने लिए सोचने को वक़्त एवं संसाधन जुटा पाये हैं, ये भी आधुनिकता का ही तोहफ़ा है, लेकिन इस दौरान हम में एक और प्रवृति पैदा हुई , अपनी बुनियादों के प्रति लापरवाह होने की प्रवृति , समय के साथ साथ हम जितने वस्तुनिष्ठ होते गए उतने ही सीमित आयामी और संकीर्ण होते गए , जितना हम भविष्य की चमक-दमक के प्रति मुग्ध होते गए उतने ही पीछे छूटते वक्त और व्यक्तियों के प्रति उदासीन होते गए । आधुनिकता ने जहां एक तरफ हमें सोचने का एक बिलकुल नया आयाम दिया वहीं दूसरी तरफ हम में अपने से भिन्न विचारों के साथ रहने का असंतोष और उन्हे पिछड़ा घोषित करने की प्रवृति भी विकसित की । इस पूरी प्रक्रिया में हमारे समाज के बुजुर्ग , जो अपने के जीवन के अंतिम पड़ाव में अधिक सहयोग और संवेदनशीलता की मांग करते हैं, कहीं ना कहीं मुख्य धारा से अलग-थलग हो गए । आज जब हम मानवतावाद की विस्तृत परिभाषाएँ गढ़ रहे हैं, वहीं हम दूसरी तरफ मानवतावाद के सरलतम व्यवहार को यूँ ही अनदेखा करते हुए आगे बढ़ रहे हैं, यहाँ महत्वपूर्ण सवाल ये उभर के सामने आता है की ऐसा कब तक चल सकेगा । यह विषय वर्तमान भारत में बुजुर्गो से जुड़े मुद्दों , चुनौतियों और उसकी स्थिति के संदर्भ में एक विशेष विश्लेषण की मांग करता है।

बदलता सामाजिक ढाँचा

दिन प्रतिदिन हमारा समाज बदल रहा है, उसके व्यवहार और उसके सरोकार सब बदल रहें है । इन बदलावों में एक बड़ी भूमिका हमारी बदलती जीवन शैली , दूर होते कार्यक्षेत्र और बाज़ार की जरूरतें, निभा रही हैं । अब परिवारों का ढाँचा भी वो नहीं रहा जो आज से कुछ दशक पहले तक था । जैसे जैसे हम स्वकेंद्रित होते गए वैसे वैसे परिवार भी संयुक्त से एकल होते गए , इस सभी बदलावों के लिए हम मात्र कुछ कारकों को ही जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते, अपितु इस संबंध में सभी महत्वपूर्ण कारकों की खोज करने लिए लिए हमे एक गहन और विस्तृत विश्लेषण की अनिवार्य जरूरत होगी लेकिन हम यह विश्वास के साथ कह सकते हैं की इन बदलावों ने मानवीय संबंधों की बुनावट में भी कुछ मूलभूत बदलाव किए । इन बदलावों ने हमारे घरों के बुजुर्गों पर प्रत्यक्ष ही प्रभाव डाला है जो की काफी हद तक नकारात्मक ही है, क्योंकि वे संबंधो की बुनावट में ऐसे स्थान पर हैं जहां पर उन्हे अधिक देखभाल और सहारे की जरूरत थी, लेकिन इन परिवर्तनों की वजह से वे अकेले ही रह गए ।

वर्तमान में कुछ प्रमुख चुनौतियों से सामना करते बुजुर्ग

अकेलापन – अकेलेपन की समस्या बुढ़ापे में सामने आपने वाली कुछ प्रमुख चुनौतियों में से एक है, एक सामाजिक संस्था हैल्प ऐज़ इंडिया के अध्ययन की माने तो देश में इस समय लगभग 3 करोड़ बुजुर्ग किसी न किसी प्रकार से अकेलेपन के शिकार हैं । बच्चों का कहीं और जा कर बस जाना , अपने साथी को खो देना , बीमारियाँ आदि जैसे कारणों की वजह से बुजुर्ग अक्सर अकेले हो जाते हैं । जीवन के जिस पड़ाव में उन्हें किसी के साथ की , किसी की देखभाल के सबसे अधिक आवश्यकता होती है , उस पड़ाव में उसके साथ कोई नहीं होता , जिसके कारण अवसाद और असुरक्षा की भावना उनमे घर करने लगती है ।

आय के सीमित स्रोत – चूँकि उम्र के इस पड़ाव में वे आर्थिक रूप से उत्पादक नहीं रहते इसलिए उन्हे आर्थिक रूप से किसी पर निर्भर होना पड़ता है और इस स्थिति में उनको अक्सर अपनी गरिमा और आत्मसम्मान के साथ समझोता करने के लिए बाध्य होना पड़ता है । कुछ अध्ययन हमे बताते हैं की पैसे की तंगी के कारण भारत में अधिकांश बुजुर्गों को एक उम्र के बाद भी काम करना पड़ता है, जबकि वो उस काम को करने के लिए ना शारीरिक रूप सक्षम होते हैं और ना ही मानसिक रूप से । हैल्प ऐज़ इंडिया संस्था का ही एक अध्ययन हमे बताता है की भारत में 65-70 वर्ष की आयु के बाद 90% बुजुर्गों को अपने गुज़ारे के लिए किसी ना किसी प्रकार के काम में लगे रहना होता है ।

स्वास्थ्य समस्या- उम्र के इस पड़ाव पर अपनों के साथ साथ जब अपना स्वास्थ्य भी साथ छोड़ने लगता है, तो बुजुर्गों के लिए स्थिति और भी भयानक हो जाती है । सीमित आर्थिक साधन और सस्ती स्वास्थ्य सेवाओं की बदतर हालत बुजुर्गों को और अधिक तोड़ देते हैं ।

आज भारत को जवान लोगो का देश कह कर इसमे अपार संभावनाओं को तलाशा जाता है , जो लाज़मी भी है, लेकिन एक वक़्त के बाद मनुष्य जीवन का अंतिम पड़ाव बुढ़ापा ही है । वर्ष 2009 में भारत में लगभग 9 करोड़ लोग 60 वर्ष की आयु से अधिक थे और अगर भविष्य का अनुमान लगाया जाये तो 2050 तक ये आंकड़ा 32 करोड़ के आसपास पहुँचने की उम्मीद है । यहाँ में ये तर्क देने का प्रयास बिलकुल नहीं कर रहा हूँ, की 50 वर्ष बाद भारत में श्रमशक्ति और प्रतिभाओं की कुछ कमी होने वाली है, यहाँ में सिर्फ ये कहना चाहता हूँ की हम कब तक समाज के इस वर्ग के प्रति असंवेदनशील हो कर चल पाएंगे , क्या आज वक़्त नहीं आ गया है की मात्र कुछ मुट्ठी भर गैर सरकारी संस्थाओं और कुछ सरकारी योजनाओं से आगे बढ़ कर इस विषय में सोचा जाए ।

आधुनिकता का वास्तविक अर्थ – हम अक्सर आधुनिकता का अर्थ पश्चिमीकरण से लेते हैं , जो की आधुनिकता की एक भ्रामक समझ का प्रचार करती है । पश्चिम से प्रेरित जीवन शैली , महंगे यंत्र , विलासिता और महंगी गाड़ियों को जब हम आधुनिकता का पर्यायवाची मान लेते हैं, तो आधुनिकता की वास्तविक परिभाषा से स्वतः ही दूर होते चले जाते है । वास्तव में आधुनिक होने का अर्थ है आधुनिक सोचन ना की आधुनिक साधनों का प्रयोग करना । दीपांकर गुप्ता अपनी पुस्तक “मिसटेकन मॉडर्ननिटी” में वास्तविक आधुनिकता की कुछ विशेषता सुझाते हैं –

Ø व्यक्ति की गरिमा को बनाये रखना

Ø सार्वभौमिक नियमों का पालन करना

Ø जन्म के विशेषाधिकार पर व्यक्तिगत उपलब्धि की उचाई

Ø सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही

इस प्रकार ये विशेषताएँ आधुनिकता को मानवीय मूल्यों और व्यक्ति की गरिमा में स्थापित करती हैं । परन्तु हम अपने दैनिक जीवम में आधुनिकता का कोई और ही अर्थ लगाते हैं, जिसका परिणाम हमें समय समय पर देखने को मिलता है , कहीं मानवीय मूल्यों के ह्रास के रूप में तो कहीं खोखले होते संबंधों के रूप में । अब जरूरत है की हम आधुनिकता का सही अर्थ समझे और मानव जीवन के वास्तविक लक्ष्यों के प्रति जागरूक हों ।

निष्कर्ष – अब समय आ गया है की हम थोड़ी देर रुक कर उनके विषय में सोचे , जिन्होंने अपना पूरा जीवन समर्पित कर हमें नयी दिशाएँ खोजने में मदद की और हमें अपने कुशल निर्देशन में आधुनिकता की चौखट पर ला कर खड़ा कर दिया है । आज हमे कुछ वक़्त निकालना होगा उनके लिए, जिन्हें हम अपनी रोजमर्रा की दौड़ में कहीं पीछे छोड़ चुके हैं । भविष्य के लिए सोचना किसी भी मायने में गलत नहीं है, लेकिन उसके लिए अपनी बुनियादों की उपेक्षा करना यकीनन किसी भी तरह से तर्क संगत नहीं ठहराया जा सकता है । अब जरूरत हैं की हम आधुनिकता की घिसीपिटी परिभाषाओं को छोड़ कर आधुनिकता के वास्तविक मायनों को समझे, जो किसी भी लक्ष्य को प्राप्त करने से पहले से पहले मानवीय मूल्यों के प्रति हमारी ईमानदारी सुनिश्चित करवाने पर बल देते प्रतीत होते हैं ।

अखिलेश कुमार गौतम

Akhilesh.gautam09@gmail.com

पीएचडी शोधार्थी ,

केन्द्रीय शिक्षण संस्थान , शिक्षा विभाग ,

दिल्ली विश्वविद्यालया ।

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