भूमंडलीकरण के परिप्रेक्ष्य में इक्कीसवीं सदी के हिन्दी उपन्यास(‘रह गईं दिशाएं इसी पार’ के विशेष


--- श्री.सुर्याबा जगन्नाथ शेजाल

‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की संकल्पना लेकर चलनेवाले एवं अध्यात्म की दृष्टि से श्रेष्ट भारत देश में विश्वकल्याण एवं जनकल्याण की परंपरा पहले से ही विद्यमान है | विश्व का हर व्यक्ति अपने ही परिवार का सदस्य है , उसका हित मतलब सम्पूर्ण परिवार का हित अर्थात संसार का हित, यह भावना तो भारतीय तत्त्वज्ञान का मूल मानी जाती है | परंतु, वसुधैव कुटुम्बकम् की इस मूल अवधारणा को पीछे छोड़ एक नयी व्यवस्था का उदय हो चुका है, जिसमें इस वैश्विक परिवार एक सदस्य अमीर है और दूसरा गरीब, इसमें परिवार का एक सदस्य दूसरे पर प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से नियंत्रण प्रस्थापित करने का प्रयास कर रहा है| आज तक हम जिसे ‘विश्व ही हमारा घर है ’ के अनुसार चलते थे, इसी अवधारणा के आधुनिक रूप में भूमंडलीकरण का उदय हो चूका है |

‘Globalisation’ इस अंग्रेजी शब्द के लिए हिन्दी में भूमंडलीकरण, विश्वायन, जगतीकरण, वैश्विकरण आदि शब्द प्रचलित हैं | भूमंडलीकरण का मुख्य लक्ष्य यह है की ‘एक विश्व-अर्थतंत्र और विश्व-बाजार का निर्माण जिससे प्रत्येक राष्ट्र को अनिवार्य तौर पर जुड़ना होगा|’(1) इस व्यवस्था के साधन के रूप में कंप्यूटर , इन्टरनेट और संचार के आधुनिकतम साधन, विविध उपग्रह आदि का उल्लेख किया जा सकता है | इन्हीं कारणों से संसार के विविध राष्ट्रों, समुदायों और व्यक्तियों के बीच में अंतर नाम की जो बाधा थी वह नष्ट हो चुकी है|

भूमंलीकरण के मुख्य रूप से दो पक्ष है - आर्थिक और सांस्कृतिक| ये दोनों पक्ष एक दूसरे पर निर्भर हैं| भूमंडलीकरण के आर्थिक पक्ष से बाजारवाद, उपभोक्तावाद या पूंजीवाद जुडा हुआ है | सांस्कृतिक पक्ष के मूल में विभिन्न देशों की संस्कृतियों को एक-दूसरे से जुड़ने एवं एक दूसरे को प्रभावित करने की भावना है | परन्तु आज इस भावना को नाम-मात्र ही देखा जा रहा है | इस विस्तृतम उद्देश्य को संकुचित अर्थ के साथ आंका जा रहा है | आज की सच्चाई यह है की की विश्व की समस्त संस्कृतियां एक-दूसरे से मिलकर जनकल्याण एवं विश्वकल्याण की भावना से प्रेरित दिखाए नहीं दे रही हैं, बल्कि इस भावना का पश्चिमीकरण मात्र होकर रह गया है, जिसकी चर्चा आगे की जाएगी |

भूमंडलीकरण को आज ‘अमेरिकीकरण ’ भी कहा जा रहा है , इस विचार के पीछे बहुत से कारण है, जिनका विश्लेषण करने पर पर इस अवधारणा को समझा जा सकता है| दुनिया के सभी देशों की संस्कृतियों को, अर्थनीतियों को अमेरिका ने अपने रंग में रंग दिया है | जिस तरह से विश्वयुद्धों की श्रृंखला के पहले संसार का ‘ ब्रिटिशीकरण ’ हुआ था, उसी तरह से प्रथम एवं द्वितीय विश्वयुद्धों के बाद संसार का ‘अमेरिकीकरण’ हो रहा है| इसके पीछे पूंजीवाद, उपभोक्तावाद, नवसाम्राज्यवाद आदि नीतियां हैं | इंग्लैंड ने ईस्ट इंडिया कम्पनी के माध्यम से माध्यम से जो साम्राज्य उपनिवेश के लिए निर्माण किया था , आज उसी तरह का उद्देश्य लेकर अमेरिका चल रहा है | इस ‘ब्रिटिशीकरण’ का ‘अमेरिकीकरण’ होने के पीछे का इतिहास भी देखना जरूरी है | वस्तुतः सन १९४४ में ब्रेटन वूड्स सम्मलेन में अमेरिका ने यूरोप और जापान की अर्थव्यवस्था में सुधार लाने हेतु दो आंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं की स्थापना करवाई, उनमें एक आंतर्राष्ट्रीय विश्व बैंक (इंटरनेशनल बैंक फॉर रिकन्सट्रक्शन एण्ड डेवलेपमेंट) है और दूसरी ‘अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोश’ आदि हैं | इन संस्थाओं की स्थापना करने के पीछे अमेरिका का उद्देश्य यह था की वाशिंग्टन डी.सी. स्थित राष्ट्र-संघ के मुख्यालय से इन संस्थाओं के ऊपर नियंत्रण प्रस्थापित किया जा सके | ब्रेटन वूड्स के आयोजन में संसार के अनेक अर्थशात्रियों ने भाग लिया था, उसमे में ब्रिटेन के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जे.मेनार्ड कीन्स भी थे, अर्थव्यवस्था पर अमेरिका के वर्चस्व को लेकर वे इस बात को जानते थे कि इससे संसार में आर्थिक असमतोल निर्माण होगा | जो उन्होंने उस समय कहा था वह आज सच होता हुआ दिखाई दे रहा है, जब अमेरिका में आर्थिक संकट निर्माण हो जाता है, तब इसका परिणाम विश्व के लगभग समस्त देशों पर दिखाई देता है, इसलिए हेनरी किसिंजर ने भूमंलीकरण को ‘अमेरिकीकरण’ की संज्ञा से अभिहित किया है और यही कारण है कि ‘प्रत्येक देश की राष्ट्रिय अस्मिता, भाषा, संस्कार, बोलियाँ, भाषाएँ, लोकसंस्कृति सब कुछ मटियामेट होकर अमेरिकीकरण की प्रक्रिया में अपनी निजता खो चुके हैं, जो कुछ बचा है, वह क्षरण की प्रक्रिया में है |”(2)

संस्कृति को स्पष्ट करते हुए डॉ.किरणपाल सिंह अपने एक लेख में कहते हैं –व्याकरणिक दृष्टि से देखा जाए तो ‘संस्कृति’ शब्द ‘कृ’ धातु में ‘सम्’ उपसर्ग तथा ‘क्तिन्’ प्रत्यय लह्गाकर बना है | अत: संस्कृति का अर्थ हुआ सम्यक् कृति: और सम्यक् कृति किसी शुभ-चेष्टा या श्रेयस्कर कर्म को कहा जा सकता है| संस्कृति का सबंध संस्कार से है , जो मानव जीवन के परंपरागत क्रिया- कलापों का द्योतक है | संस्कृति का सीधा सबंध संस्कार से है, संस्कृति का क्षेत्र अति व्यापक है, इसीलिए संस्कृति को किसी एक निश्चित परिभाषा में बांधना विद्वानों के लिए कठिन नहीं तो सुगम कार्य भी नहीं रहा है | डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन के अनुसार, “संस्कृति विवेक का जीवन को भली प्रकार से जान लेने का नाम है|” आ.हजारीप्रसाद द्विवेदी ने भारतीय दृष्टीकोण अपनाते हुए संस्कृति को इन शब्दों में परिभाषित किया है- “संस्कृति मनुष्य की विविध साधनाओं की सर्वोत्तम परिणति है |” एक तरह जहाँ डॉ.नगेन्द्र संस्कृति को धार्मिकता से जोड़ते हुए कहते हैं , “संस्कृति मानव जीवन की वह अवस्था है जहाँ उसके प्राकृत राग-द्वेषों में परिमार्जन होता है |” तो वहीं दूसरी तरफ राष्ट्र-कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ यह कहते हुए “असल में संस्कृति जिंदगी एक तरीका है और यह तरीका सदियों से जमा होकर उस समाज में छाया रहता है, जिससे हम जन्म लेते हैं ” इसे सामाजिक रूप प्रदान करते है |(3)

हिन्दी साहित्य के वरिष्ट कथाकार के रूप में संजीव का योगदान ‘किशनगढ़ के अहेरी’, ‘सर्कस’ , ‘सावधान नीचे आग है’, ‘धार’, ‘पांव तले की धूप’, ‘जंगल जहाँ शुरू होता है’, ‘रानी की सराय’, ‘डायन’ आदि उनके महत्वपूर्ण उपन्यास हैं ही साथ ही ‘रह गईं दिशाएं इसी पार’ इस उपन्यास को विशेष रूप से देखा जा रहा है जो ४६ विभिन्न शीर्षकों में विभाजित है| सन २०११ में प्रकाशित यह उपन्यास शोध-आधारित उपन्यास है, बचपन से संजीव के मन में जो जिज्ञासा है, उसकी झलक हमें उनके इस उपन्यास में दिखाए देती है, इस उपन्यास के सम्बन्ध में अनेक विद्वानों ने विचार प्रकट किए हैं, सभी ने इस उपन्यास को अलग-अलग दृष्टि से देखा-परखा है और इस समीक्षा श्रृंखला की पहली कड़ी के रूप में राजेंद्र यादव को देखा जाएगा, क्योंकि इस उपन्यास की भूमिका ही राजेन्द्र यादव द्वारा लिखी गयी है | राजेन्द्र यादव लिखते हैं –“ रह गईं दिशाएं इसी पार’ कथाकार संजीव का बेहद महत्वाकांक्षी उपन्यास है, जिसे उन्होंने दसियों वर्ष लगाएं हैं | यह एक वैज्ञानिक खोज का उपन्यास है | इसमें टेस्ट ट्यूब बेबी के बहाने जन्म, मृत्यु, जीवन, मरण,जेंडर, ईश्वर और दूसरे शब्दों में उपन्यास एक ऐसी प्रयोगशाला है, जहाँ निरंतर परीक्षण चल रहे हैं और इन प्रयोगों का अंजाम दे रहे हैं देशी-विदेशी पात्र |” राजेन्द्र जी आगे लिखते हैं , संजीव के इस उपन्यास के पात्रों को न किसी देश की सीमा है, न काल की| वे कहीं भी सहजता से आ-जा सकते हैं | मैं इसे वैज्ञानिक उपन्यास कहना ज्यादा पसंद करूंगा |” राजेन्द्र यादव मानते हैं कि वैज्ञनिक परिवेश में लिखा गया यह उपन्यास हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं अपना एक अलग ही महत्त्व रखता है | यह उपन्यास किस परिवेश को ध्यान में रखकर लिखा गया है इस विषय को लेकर अलग-अलग मत प्रकट किए गए हैं, जिस तरह से इस उपन्यास को राजेन्द्र यादव ने वैज्ञानिक उपन्यास माना है, राजेश राव द्वारा लिए गए साक्षात्कार में जब संजीव को पूछा गया कि क्या यह उपन्यास साइंस फिक्शन है? तब संजीव ने सीधा उत्तर दिया- “ नहीं, यह एक सामाजिक उपन्यास है ’’|

‘ रह गईं दिशाएं इसी पार ’ संजीव का एक ऐसा उपन्यास है, जिसमें लगभग सभी विषयों को समावेशित किया गया है, स्थानीय समस्याओं से लेकर वैश्विक समस्याओं तक के सभी विषयों को संजीव ने अपने इस उपन्यास में स्पर्श किया है| मैं इस उपन्यास को भूमंडलीकरण की दृष्टि से देखने की कोशिश करना चाहूँगा, जैसा कि हम जानते हैं, साहित्य समाज का दर्पण होता है, जो भी बदलाव मनुष्य के व्यवहार में आता रहता है, उसका प्रभाव साहित्य की सभी विधाओं के माध्यम से प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से व्यक्त होता है, साहित्य ही एक ऐसा माध्यम है जिससे प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक की सभी घटनाओं की झलक मिलती है | साहित्य में अलग अलग समयों पर विभिन्न मोड़ आते रहते हैं , भूमंडलीकरण की शुरूआत सामान्यत: १८५७ से जाती है और सन १९९१ इस वर्ष से इसके प्रति विशेष दृष्टी से देखा जा रहा है | आधुनिक संचार माध्यमों के कारण संसार के किसी एक कोने में घटित घटनाएं कुछ ही पलों में संसार के दूसरे कोने के लोगों तक आसानी से पहुंच जाती हैं , जिसका प्रभाव एक दूसरे पर जल्द ही दिखाई देता है |

भूमंडलीकरण के कारण मनुष्य के पारिवारिक-जीवन में बहुत ही परिवर्तन आने लगा है, रिश्तों में एक उलझन सी महसूस हो रही है, रिश्ते समझने के लिए भी मनुष्य को अपने मस्तिष्क पर जोर देना पड रहा है , वे आसानी से समझ में नहीं आ रहे हैं, रह गईं दिशाएं इसी पार में इसी तरह की उलझन दिखाई देती हैं, रह गईं दिशाएं इसी पार का केंद्र है-कोलकाता का अतुल मेंशन, जहाँ विस्नु बिजरिया और उनका परिवार रहता है, एलिस और विस्नु बिजरिया अतुल के माता पिता हैं , कैथरिन अतुल की नानी है, करणी देवी- दादी है और किस्नु (बाद के कृष्णानन्द) ये परिवार के अन्य सदस्य हैं | विस्नु बिजरिया की विदेशी पत्नी उसके शारीरिक कारणों से अपने पेट में गर्भ को पलने में असक्षम पाई जाती है तब गर्भ को पलने के लिए दूसरी कोख को ढूंढा जाता है, ढूँढने के बावजूद भी ऐसी कोख नहीं मिल पाती जहाँ यह गर्भ पल सके, अंत में एक ऐसी कोख मिल जाती हैं जो इस गर्भ को पालने के लिए योग्य है | और वह कोख उसकी है जिससे एलिस ने जन्म लिया था अर्थात् कैथरिन की | और टेस्ट ट्युब बेबी के रूप में कैथरिन के पेट से एक बच्चा जन्म लेता है वह है –अतुल, ‘जिम’ यह उसका और एक नाम है| यह देखने पर हर किसी के मन में इस तरह के प्रश्न निर्माण होना स्वाभाविक है कि अतुल का श्रीमती कैथरिन से नानी का रिश्ता है या मां का? , विस्नु बिजरिया का कैथरिन से सास का रिश्ता है या पत्नी का?, उसी तरह से एलिस का कैथरिन से मां का रिश्ता है या सौतन का? इसी संदर्भ में अजय सोच रहा है– “जिम अपनी मां को क्या कहेगा मां या बहन? क्या कहेगा अपनी नानी को- नानी या मां? और विस्नु बिजरिया को पापा या जीजा? इस तेज रफ़्तार से भागती दुनिया में किसी रिश्ते का कोई मतलब भी बचा है क्या?”(4)

भावनिक परिवर्तन की दृष्टि से जब देखेंगे तो जो आत्मीय जुडाव बच्चों का अपने माता-पिता के साथ रहता था वह आज-कल दिखाई नहीं दे रहा है |बच्चों के प्रति माता-पिता के मन में संभवत: यही इच्छा रहती है कि अपनी संताने समाज के अच्छे नागरिक बनें, उनको मान सम्मान मिले परंतु, स्वाभाविक रूप से उनके मन में यह इच्छा रहती है कि वे अपने बुढ़ापे के दिनों में अपनेपन का सहारा बन पाए| लेकिन इस आधुनिक व्यवस्था के कारण बच्चें अपने जन्मदाताओं से दूर रहने के लिए मजबूर है इसके पीछे बहुत से कारण हो सकते है, ऐसी परिस्थिति में बच्चे एवं उनके माता-पिताओं के बीच में फोन, ई-मेल, एवं अन्य इन्टरनेट आधरित साधनों से संवाद हो रहा है, लेकिन एक बात यहां पर ध्यान देना जरूरी कि यह ‘संवाद’, ‘सुसंवाद’ का रूप नहीं ले रहा है| डॉ.जैक्सन ने अजय से किए संवाद को यहाँ देखा जा सकता है, “सुनो, वहां बहुत से एंग्लों इंडियंस हैं, बच्चे आस्ट्रोलिया, न्यूजीलैंड, इंग्लैंड ,साऊथ अफीका, मैकलुस्कीगंज, या कहीं और जा बसे हैं, इन बूढों-बूढियों की देख-भाल करने को कोई नहीं हैं |” (5)

भूमंडलीकरण के कारण भाषागत परिवर्तन आ रहा है, भारत में एक लंबे समय तक अंग्रेजों का साम्राज्य था, अंग्रेजों की कामकाज की भाषा अंग्रेजी थी, यही कारण है की भारत के हर व्यक्ति की भाषा में कहीं-ना-कहीं अंग्रेजी के शब्द दिखाई देते हैं | ऐसा जरूरी नहीं है कि वह व्यक्ति पढ़ा-लिखा हो, जो लोग अशिक्षित हैं उनकी भाषा में इस तरह के शब्द दिखाई देते हैं, जो अंग्रेजी भाषा से प्रभावित हैं, संजीव के इस उपन्यास में भी इस तरह की कुछ बातें दिखाई देती हैं, जैसे, देबू ठाकूर भारतीयता के अनुसार अंग्रेजी शब्दों को किस तरह ढालते हैं यह व्यक्त करते हुए संजीव लिखते हैं, ‘जयन्त! देबू ठाकुर भी खूब हैं | जैक्सन को जयकिशन, जायंट को जयंत बोलते हैं, पीटर को पुत्तर | अंग्रेजी का भारतीयकरण | नहीं समझ में आता तो फिर ट्रांस्लेट करते हैं | उन्हें गुमान हैं की मेम साब लोगों के साथ रहते-रहते इतनी अंग्रेजी तो उन्हें आ ही गयी है की एम्.ए.,बी.ए. को भी फेल कर दे|’(6) अंग्रेजी सर्वनामों की उलझन भी यहाँ जिम और अजय के संवाद से और संजीव के निरीक्षण से दृष्टिगोचर है, “आ जाइए यहीं |” हिन्दी बोलते वक्त वह अपनी आदत के मुताबिक अजय को कभी आप और तुम कहता, यह शायद ‘यू’ (You) के दो मुंहे हिन्दी अनुवाद फल था |’(7)

आज कल लोगों की खान-पान की पद्धतियों में परिवर्तन आने लगा है, भोजनालयों में पश्चिमी ढंग अपनाया जाने लगा है, आज से कुछ दशक पहले और इक्कीसवीं सदी के पहले दशक की जब हम तुलना करते हैं तो हमें आसानी से समझ में आ जाता है कि खान-पान की पद्धति में कितना अंतर आ चूका है, पश्चिम की आदतों का शिकार आज का युवा ही हो रहा है | क्योंकि, पश्चिमी वातावरण में रहकर उसको इस प्रकार की आदते लग रही हैं, जब अजय जिम के जन्म-दिवस के समारोह में जाता है, तब वह एक अकेलापन महसूस करत है क्योंकि, उसके लिए यह पश्चिमी वातावरण नया है , जैसे – ‘इस तनहाई में एक बार फिर प्रोफ़ेसर सत्यप्रकाश ने आगे बढ़कर अजय को सहारा देकर पूछा-

“आप ड्रिंक-विंक नहीं लेते ?”

“विंक ले लेता हूं, ड्रिंक नहीं ”

“सीख लीजिए,काम आएगा| लीजिए दीक्षित हो लीजिए | एक साथ नहीं, घूंट-घूंट सोडा या पानी के साथ, रॉ नहीं | लाइए मैं तैयार कर देता हूं | हां, बाई द वे आपके शोध का विषय क्या हैं ?”

“जीवन के रहस्य|” पहला घूंट जीवन की तरह ही बेस्वाद-सा !’(8) इस उदाहरण के माध्यम से हम देख सकते हैं कि आज का युवा को मद्य की आदतें किस तरह से लग रही हैं |

दापंत्य जीवन की जब बात की जाएं तो आज के कुछ युवा विवाह के बंधन में रहना पसंद नहीं करते,वे पूर्णत: स्वंतत्र रहना चाहते हैं, उसके जीवन के विभिन्न लक्ष्य हैं, जिनको पूरा करने में वह लगा हुआ है | ‘लिव्ह इन रिलेशनशिप’ इस व्यवस्था को पर्याय के रूप में यहां लेखक ‘कॉन्ट्रैक्चुअल मैरेज’ का उल्लेख करते हैं | जिम विशाल से इस विवाह के सम्बन्ध में कहता है,

“शादी का मतलब ही समझौता है |”

“अपनी फ्रीडम से |”

सामाजिकता और परिवार में अपने-अपने फ्रीडम का कुछ न कुछ त्याग तो करना ही पड़ता है | अगला भी तो ‘स्व’ ,अपने ‘ईगो’ का तुम्हारे लिए बलिदान कर रहा है|” (9)

और एक संवाद में जिम, अजय से कहता है, “विवाह ! यहिई तो असली मुसीबत है |” वह उठकर चहलकदमी करने लगा, “क्या बेला, क्या मधु, क्या जूली, क्या कोई दूसरी औरत – में किसी से भी विवाह नहीं कर सकता| मैं उसके लिए बना हूं| हद से हद कॉन्ट्रैक्चुअल मैरेज | जब तक मन किया साथ रहा, फिर अलविदा कह कर मुक्त कर दिया, मुक्त हो गया खुद भी | जीवन भर के लिए किसी बाड़े में गाय और सान्ड़ की तरह बंद रहना मिझे गवारा नहीं | आय हेट दिस सिस्टम | ये पतिव्रत्य, ये जनम-जनम की दासी, सती और यौन शुचिता के बॉटल नेक से निकलना ही पड़ेगा हमें |” (10) इसके अलावा, समलैंगिगता को भी महत्त्व दिया जा रहा है, और इसे संविधानिक मान्यता भी मिल रही है, किसी भी बात के दो अंग होते हैं किसी की दृष्टी से वह सही है तो किसी की दृष्टी से गलत | बीसवीं सदी के अंतिम तीन दशक और इक्कीसवीं सदी का यह डेढ़ दशक आदि में यह अंतर दिखाई दे रहा है, संजीव ने इस बात विषय पर लक्ष्य आकर्षित किया है, जिम के जन्मदिवस के अवसर पर डॉ जिया को उद्देश्य में रखकर उनके मित्र कहते हैं , “सुनो इधर एक फाइन जोक इवाल्व कर रहा है| सन् ७० के दशक में अपने बेटे से कहती हैं , “बेटा अपनी जाति की लड़की से ही शादी करना| सन् ८० में कहती है, बेटा अपने धर्मवाली लड़की की से ही और २००९ में क्या कहती है मालूम .... बेटा लड़की से ही शादी करना|” (11) विवाह व्यवस्था के इस तरह के विकल्पों को भारत में विभिन्न नजरों से देखा जा रहा है, हालाँकि, इसको भारत में कैसे और कब अपनाया जाएगा, यह तो आनेवाला समय ही बता पाएगा|

भूमंडलीकरण के इस दौर में व्यक्ति की स्वयं से, व्यक्ति की व्यक्ति से , समुदाय की समुदाय से, राज्य की राज्य से प्रतियोगिता शुरू हो चुकी है, हालांकि इसका स्वरूप इतना बड़ा नहीं है, इस प्रतियोगिता का विकराल रूप तो वह है जो राष्ट्र एवं राष्ट्र के बीच में है| अपने राष्ट्र का प्रभुत्व अन्यों के ऊपर निर्माण करना यही एक केन्द्रीय भावना लोगों के मन में रही है |इस सदी में मनुष्य की सोच में परिवर्तन दिखाई दे रहा है, उसकी इच्छाएं बढ़ती जा रही हैं| वह खुद की वर्तमान दशा से खुश नहीं है, वह हर पल अपनी तुलना दूसरों से करने लगा है| और यही कारण है कि वह संघर्ष कर रहा है क्योंकि यह युग मांग है| इस उपन्यास में संजीव एक जगह यही व्यक्त करते हुए दिखाई देते हैं - ‘....और इस आदमी की लिप्सा का कोई अंत नहीं| वह लड़ाईयां मोल लेता है| उसे जीत चाहिए| पूरे ब्रह्मांड पर जीत| ब्रह्मांड का अन्त है, पर इस मनुष्य की लिप्सा का कोई अंत नहीं| एक जीत के बाद उसे दूसरी जीत चाहिए| वह जितना ही सहज और सुखी होना चाहता है, उतना ही जटिल और दुखी हो जाता है| कुछ गांठे खुलती हैं, कुछ और गांठे बन जाती हैं |’ (12) जो परम्परागत मान्यताएं थी, उनको आज किस दृष्टि से देखा जा रहा है, इस संदर्भ में संजीव और एक जगह लिखते हैं, ‘जीत के लिए उसे जनशक्ति चाहिए, ऊर्जाओं का स्वामित्व चाहिए, तकनीक चाहिए, अर्थ, मनोबल और कौशल चाहिए| राष्ट्र चाहिए ताकि उस पर अपना वर्चस्व स्थापित कर सके, धर्म और अनुशासन का पथ चाहिए ताकि दुसरे सर न उठ सके, धर्म चाहिए, इस्केप्स चाहिए| मन फिर छूंछा होने लगता है, मनोरंजन चाहिए या फिर वैराग्य की शरणस्थली| ये भी कुछ देर के बाद उबने लगते हैं| राख की परत चढ़ने लगती है- सुख यहां नहीं कहीं और चिलक रहा है कहीं| कहां ....? पता नहीं ’ (13)

इस तरह से ऐसे बहुत से प्रसंग हैं जिन्हें भूमंडलीकरण की दृष्टि से देखा जा सकता है , जिसमे भूमंडलीकरण के परिप्रेक्ष्य में स्त्री-पुरुष सम्बन्ध, दाम्पत्य जीवन के सम्बन्ध,अन्य पारिवारिक सम्बन्ध, वैचारिक परिवर्तन, खान-पान, भाषा, जीवन के प्रति देखने का दृष्टिकोन एवं अन्य बिदुओं को देखा जा सकता है| इसके अलावा जैसे पहले ही उल्लेख किया है कि उप्नाय्स विभिन्न विषयों को लेकर चलता है , उपन्यास की भूमिका के अंत में राजेन्द्र यादव जी ने भी स्पष्ट रूप से कहा हैं – “सही बात तो यह है कि इस जटिल उपन्यास पर कोई भी राय देने की क्षमता मुझमें नहीं हैं |” (14) इसलिए ‘रह गईं दिशाएं इसी पार’ इस उपन्यास को भूमंडलीकरण के परिप्रेक्ष्य में जिस तरह से मैंने देखा है, वह मेरे सीमित अध्ययन की परिणति मानना चाहूँगा |

संदर्भसूची

1. अभय कुमार दुबे. भारत का भूमंडलीकरण. स्था.न. : वाणी प्रकाशन , २००३. संस्क. प्रथम , पृ.क्र.४३९.

2. पुष्पपाल सिंह. भूमंलीकरण और हिन्दी उपन्यास. नई दिल्ली : राधाकृष्ण, २०१२. पृ.सं. ८ .

3. विदेशों में भारत की सामासिक संस्कृति की वाहिका: हिन्दी . डॉ.किरनपाल सिंह. झारखंड : हिन्दी विद्यापीठ पत्रिका , अप्रैल-जून २०१५ .

4. संजीव. रह गईं दिशाएं इसी पार. नई दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, २०१२. संस्क. प्रथम, पेपरबैक में, पृ.सं.४३.

5. वही, पृ.सं.२३.

6. वही, पृ.सं.२८.

7. वही, पृ.सं.२६८.

8. वही, पृ.सं,२७.

9. वही, पृ.सं.४३.

10. वही, पृ.सं.२०७.

11. वही, पृ.सं.२७० .

12. वही, पृ.सं.११४.

13. वही, पृ.सं.११५.

14. वही,पृ.सं.१०.

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