भारत निर्माण महात्मा गांधी से नरेंद्र मोदी तक (‘Narendra Modi to Mahatma Gandhi Bharat Nirman’)



सारांश .

मेक इन इंडिया भारत सरकार द्वारा देशी और विदेशी कंपनियों द्वारा भारत में ही वस्तुओं के निर्माण पर ज़ोर देने के लिए बनाया गया है । इसका उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 25 सितम्बर 2014 को किया था | प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 25 सितम्बर 2014 को विज्ञान भवन के कार्यक्रम के दौरान इसकी घोषणा की थी। मेक इन इंडिया का मकसद देश को मैन्युफैक्चरिंग का हब बनाना है । घरेलू और विदेशी दोनों निवेशकों को मूल रूप से एक अनुकूल माहौल उपलब्ध कराने का वायदा किया गया है ताकि 125 करोड़ की आबादी वाले मजबूत भारत को एक विनिर्माण केंद्र के रूप में परिवर्तित करके रोजगार के अवसर पैदा हों । इससे एक गंभीर व्‍यापार में व्‍यापक प्रभाव पड़ेगा और इसमें किसी नवाचार के लिए आवश्‍यक दो निहित तत्‍वों – नये मार्ग या अवसरों का दोहन और सही संतुलन रखने के लिए चुनौतियों का सामना करना शामिल हैं। राजनीतिक नेतृत्‍व के व्‍यापक रूप से लोकप्रिय होने की उम्‍मीद है। लेकिन ‘मेक इन इंडिया’ पहल वास्‍तव में आर्थिक विवेक, प्रशासनिक सुधार के न्‍यायसंगत मिश्रण के रूप में देखी जाती है। इस प्रकार यह पहल जनता जनादेश के आह्वान- ‘एक आकांक्षी भारत’ का समर्थन करती है |

पृष्ठभूमि.

सोलहवी लोकसभा के चुनाव के लिए तमाम राजनीतिक दलों ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में कहा था कि अगर वे सत्ता में आए तो आर्थिक विकास के विभिन्न क्षेत्रों के लिए प्राथमिकता से कार्य करेंगें | हाल में ही कि अग्रर्णी मत के संगठन गैलप ने अपने सर्वेक्षण में कहा कि भारत के लोकसभा में विकास और अर्थव्यवस्था सबसे महत्वपूर्ण मुद्दे है | सर्वेक्षण में करीब 35 फीसदी भारतीयो नें माना है कि अर्थव्यवस्था खराब होती जा रही है |[2] चुनाव पूर्व सर्वेक्षण में भी अधिकांश मतदाताओ ने महगाई ,भ्रष्टाचार , रोजगार और विकास जैसे अहम मुद्दे पर ज़ोर दिया था | अगर देखा जाये तो पिछ्ले तीन वर्षो के दौरान भोजन से जुड़ी हुई कई आवश्यक वस्तुओ कि खपत में तकरीबन 40 % कि भारी कमी देखने को मिली है |[3] इसके अलावा सन 2013 में भारत भ्रष्टाचार के मामले में 177 देशो की सूचि में 94 वे स्थान पर था |[4]

बल्कि पिछले कुछ वर्षो में इसमे सत्तत गिरावट ही देखने को मिली है | यहा तक कि सन 2014 में व्यापार की दृष्टि से भारत को 189 देशो की सुचि में 134 वा स्थान प्राप्त हुआ |[5]जबकि 2006 में यह 116 वें पायदान पर था | वही दूसरी तरफ आर्थिक क्षेत्र के मोर्चे पर भारत 2013 में 153 देशों की सूचि में 111 वें स्थान पर था |[6]

वैश्विक नवाचार सूचि ( ग्लोबल इन्नोंवेशन इंडेक्स ) में भारत कों 143 देशों की सूचि में से 76 वे क्रम में रखा गया था[7] जबकि वैश्वीक प्रतिस्पर्धात्मक सूचि

📷 Source. World Bank[8]

( ग्लोबल प्रतिस्पर्धात्मक इंडेस्क ) में शामिल 144 देशों में भारत का स्थान 71 वा है | रोजगार भी एक अहम चुनावी मुद्दा और देश के लिए समस्या रही हैं | सेवा के क्षेत्र की रफ्तार भी मंद पड़ हुई थी | संन 2013-14 में तो विकास दर घटकर 5 % से भी कम रह गयी थी ऐसे में लोगो को ऐसे नेतृत्व की ऊपेछा थी , जो विकास दर बढ़ाने का हौसला रखे और देश को आर्थिक मजबूती भी प्रदान कर सके |

📷

The GDP contribution of various sectors of Indian economy has evolved between 1951 to 2013, as its economy has diversified and developed[9]

जो बाज़ार की निराशाओ को आशा में बदल सके | तेज़ी से आर्थिक एवं कारोबार संबंधी नीतिगत फैसले ले सके | देश को ऐसी सरकार चाहिये थी जो सब्सीडी या आर्थिक पुनर्वितरण की नीतियों को सही तरीके से लागु करने की दिशा में कदम बढ़ा सके | बुनियादी क्षेत्र में निवेश को प्राथमिकता दे सकें तथा शेयर बाज़ार को नई गति दे सके | बाज़ार ने भी यह उम्मीद बाध रखी थी कि चुनाव के बाद केंद्र में स्थिर सरकार बनेगी | हुआ भी यही बाज़ार ने जैसा सोचा वही हुआ | चुनाव के बाद नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में बीजेपी कि सरकार बनी और नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने |

प्रधानमंत्री बनने के दो महीने के बाद ही 15 अगस्त 2014 ( प्रथम भाषण प्रधानमंत्री के रूप में ) स्वतन्त्रता दिवस केमौके पर देश के 1 अरब 25 करोड़ से ज्यादा भारतीय जनता को अपने विज़न से अवगत कराने मंच पर आये | यही पर नरेंद्र मोदी[10] ने पहली बार “ मेक इन इंडिया “ कि बात कही थी और कहा था कि भारत खुद निर्माणकर्ता है | पर कौशल ,योग्यता , निर्माण के साधन कहा है | उन्होने अपने भाषण में 5 लक्ष्यों पर लोगों का ध्यान केन्द्रित किया |

परिचय.

Ø मध्‍यावधि की तुलना में विनिर्माण क्षेत्र में 12-14 प्रतिशत प्रतिवर्ष वृद्धि करने का लक्ष्‍य ।

Ø देश के सकल घरेलू उत्‍पाद में विनिर्माण की हिस्‍सेदारी 2022 तक बढ़ाकर 16 से 25 प्रतिशत करना |

Ø विनिर्माण क्षेत्र में 2022 तक 100 मिलियन अतिरिक्‍त रोजगार सृजित करना।

Ø ग्रामीण प्रवासियों और शहरी गरीब लोगों में समग्र विकास के लिए समुचित कौशल का निर्माण करना |

Ø घरेलू मूल्‍य संवर्द्धन और विनिर्माण में तकनीकी ज्ञान में वृद्धि करना ।

Ø भारतीय विनिर्माण क्षेत्र की वैश्विक प्रतिस्‍पर्धा में वृद्धि करना ।

Ø भारतीय विशेष रूप से पर्यावरण के संबंध में विकास की स्थिरता सुनिश्चित करना

‘सरकार द्वारा संचालित जिन सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को फिर से काम लायक बनाने का फैसला किया गया है। उनमें एचएमटी मशीन टूल्‍स लिमिटेड, हैवी इंजीनियरिंग कॉरपोरेशन, नेपा लिमिटेड, नगालैंड पेपर एंड पल्‍प कंपनी लिमिटेड और त्रिवेणी स्‍ट्रेक्‍चरल्स शामिल हैं |’[11]

उन्होने अपने भाषण में 5 लक्ष्यों पर लोगों का ध्यान केन्द्रित किया |

Narendra Modi; “Make In India” Campaign: Top 5 Quotes from the P.M Make In India Speech.

📷Narendra Modi; “Make In India” Campaign: Top 5 Quotes from the P.M Make In India Speech[12]

v कौशल , योग्यता , निर्माणकर्ता

v एफ.डी.आई ( नरेंद्र मोदी के शब्दो में एफ.डी.आई का मतलब “फ़र्स्ट इंडिया डेवलपमेंट” इसका चिन्ह अशोक चक्र से लिया गया है | जहा अशोक चक्र विकास के रूप में दर्शाया गया है | वही शेर को क्षमता और ताकत के रुप में दिखाया गया है |

v देश को सम्बोधित करते हुये मोदी ने कहा कि ...मै आपका समय बर्बाद नहीं करने आया हूँ | मै आप लोगो को FDI प्रदान करने आया हूँ | देश मै बहुत ही योग्यता हैं |

v रोजगार

v फैक्ट्री

यदि हम नरेंद्र मोदी के भाषण का विश्लेषण करते तो पता चलता है कि “ उन्होने कौशल, योग्यता, रोजगार , एफ.डी.आई ,फैक्ट्री पर अपनी बात रखी है | 15 अगस्त 2014 को पहली बार जिस अभियान को शुरू करने कि बात कही गई थी | उसका खाका इतना जल्दी और इतने व्यापक रूप में प्रस्तुत कर दिया जाएगा | इसका पता 25 सितंबर 2014 को विज्ञान भवन,नई दिल्ली से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मेक इन इंडिया अर्थात भारत निर्माण योजना कि शुरुआत से पता चला | इस कार्यक्रम मै देश के 3000 से ज्यादा कोपरेट के साथ ही विदेशी कंपनियो के प्रतिनिधि भी शामिल थे | प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी समय मेंक इन इंडिया की वेबसाइट (www.makeinindia.com) और उसका लोगों भी लांच किया | जिसका मुख्य उद्देश्य देश को वैश्विक विनि-निर्माण का हब बनाना एवं बड़े पैमाने पर रोजगार सृजित करने के अलावा व्यापार और आर्थिक वृद्धि को गति देना है | आटो-मोंबाएल्स से एग्रों-प्रोड़क्ट्स, हार्डवेयर से सॉफ्टवेयर , सेटेलाइट से सबमरिंस , टेलीविज़न से टेलिकॉम ,फार्मा से बायोंटेक , पेपर से पावर प्लांट्स , रोड़े से बिजनेस , हाउसेस से स्मार्ट सिटिज , फ्रेंडशिप से पार्टनरशिप , प्रॉफ़िट से प्रोंग्रेस जो भी आप बनाना चाहे : मेक इन इंडिया |[13]

📷 Corruption perception index 2014[14]

इन सब को लिखते हुए मेरे मन में कई प्रश्न भी उठ रहे थे कि सपने देखना और उसे पूरा करना दोनों अलग-अलग बाते है | सपने देखने में कोई बुराई नहीं है | लेकिन सपने देखने के बाद उसे पूरा करने का प्रयास न करना बुरा है | 15 अगस्त 2014 को लाल किले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद एक सपना देखा और देशवासियों को भी दिखाया | कहने का तात्पर्य है कि सपने दिखने का कार्य तथा उसे पूरा करने का वादा आज से नहीं भारत कि आज़ादी से किया जा रहा है आस्ट्रिन – ब्रिटिश अर्थशास्त्री “फ़्रेडरिक आगस्ट्रस हायक”1899-1922 ने क्या खुब कहा है– कि समानता के लिए कार्य करना और समान व्यवहार करना दोनों बिल्कुल अलग-अलग चीजे है उनका मानना है कि यदि समाज में वास्तव में समानता लानी है तो आपकों उसके लिए बड़ी –बड़ी योजनाए बनाने की जरूरत नहीं है आपको बस करना ये है कि आगे से सबके साथ समान व्यवहार शुरू कर दे |यदि हम थोड़ा गौर करे तो पता चलता है कि नरेंद्र मोदी के मेक इन इंडिया के भाषण से तथा उदेश्य से आदिवासी तथा मजदूर वर्ग पूरा गायब है | आज हम अपना गणतन्त्र दिवस मना रहे है | तब कितने भारतीय है |जो इस तथ्य कों मानते है कि देश कों आजाद होने पर और लोकतांत्रिक देश बनने पर आदिवासियो कों बहुत कम मिला है,जबकि उन्हे बहुत कुछ खोना पड़ा है | इसी से पता चलता है कि रेल तथा हथियार में एफ.डी.आई कों तो बढ़ाया जा रहा है | लेकिन आदिवासियो कि भागीदारी इस मेक इन इंडिया में कितनी रहेगी कुछ पता नहीं है | आदिवासियो के साथ हमेशा ही त्रासदी रही है | आदिवासी नदी तथा घने जंगलो के बीच रहते है | उद्योगो कों बढ़ावा मिलने के कारण आदिवासी बसेरे तथा आजीविका के साधन विभिन्न बाध खनन परियोजनाओ के भेट चढ़ गए | प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उद्योगो कों लगाने कि तो बात कर रहे है | पर कितने पेड़ काटे जाएगे,कितनी नदियो कों सुखाया जायेगा,कितनों कों अपनी जमीन छोड़नी पड़ेगी इन सब का जवाबदेने के बदले शुन्य है ? ऐसा नहीं है कि मेक इन इंडिया कि बात करने वाले सिर्फ नरेंद्र मोदी है | महात्मा गांधी अपनी पुस्तक मेरे सपनों का भारत और हिन्द स्वराज में मेक इन इंडिया कि बात कर चुके है |

महात्मा गांधी के शब्दो में – मै ऐसे सविधान की रचना करवाने की कोशिश करूंगा | जो भारत कों हर तरह से गुलामी और परालंबन से मुक्त कर दे | मै ऐसे भारत की परिकल्पना करुगा,जिसमे गरीब से गरीब लोग भी यह महसूस करेगे कि यह उनका देश है | जिसके निर्माण में उनकी आवाज का महत्व है |[15] जैसा की मैंने पहले ही कहा है कि प्रधानमंत्री के मेक इन इंडिया में न तो आदिवासी है और न ही वह मजदूर वर्ग है जो सुबह इसलिए उठता है कि शाम के लिए भोजन का जुगाड़ कहा से हो | नरेंद्र मोदी पहले आदमी की बात करते है |तो वही महात्मा गांधी भारत के उस अंतिम आदमी की बात करते है जिसमे आदिवासी और मजदूर वर्ग है अब इसी में से प्रश्न उठने लगा है कि एक आदमी उद्योगो का समर्थन कर रहा है | तो दूसरी तरफ महात्मा गांधी उद्योगो कों अभिशाप मानते थे | इन्ही बातों कों आगे बढ़ाते हुए अंबेडकर उद्योगो का समर्थन रोज़गार के नाम पर करते है ये तीनों व्यक्ति कोई आम आदमी नहीं है | तीनों ने अपने तरीके से देश कि जनता कों ही नहीं बल्कि विश्व के लोगो कों भी प्रभावित किया है |

पर तीनों के मेक इन इंडिया में काफी अंतर है | बक़ौल महात्माँ गांधी – समान्य बुद्धि रखने वाले व्यक्ति की हैसियत से मै जानता हुँ कि मनुष्य उद्योगो के बिना जिंदा नहीं रह सकता है | इसलिए मै उद्योगों के खिलाफ नहीं हो सकता | लेकिन यंत्र उद्योगो के बारे में एक बड़ी चिंता यह है कि यंत्र से उत्पादन बड़ी तेज़ी से होता है और उसके साथ इस प्रकार की अर्थव्यवस्था आ जाती है | जिसको मै समझ नहीं सकता | मै चाहता हू की हमारे देश के करोड़ो लोग सुखी और प्रसन्न रहे और आध्यात्मिकता की दृष्टि से उनका विकास हो | इस उदेश्य की पूर्ति के लिए हमे यंत्रो की जरूरत नहीं है |[16]डॉ भीम राव अंबेडकर ने इसका खंडन करते हुए कहा की न्यास सिद्धान्त क्या है |[17]

डॉ अंबेडकर के अनुसार , गांधी का न्यास सिद्धान्त आर्थिक दृष्टि से नितांत ही अव्यवहारिक है क्युकी जाति-पति वर्ग-संरचना आदि कुछ ऐसी बाते है | जो यथार्थ स्थिति कि परिचायक है | जिनके होते हुए पुजीपतियों से यह आशा करना कि वह अपनी धन-संपति का जन-हित में प्रयोग करेगे एक स्वप्नलोक की खुशहाली के अलावा कुछ भी नहीं है [18]यदि औरत –आदमी सुबह से शाम तक चर्खा चलाने तथा शारीरिक श्रम में ही लगे रहेगें तो उन्हे आराम तथा और मनोंरजन के लिए अवकाश कैसे मिल पायेगा | उन कहना है की दोष आधुनिक मशीनों और सभ्यता का नहीं है |[19]ऐसा नहीं है कि उद्योगो का समर्थन सिर्फ अंबेड़कर ही करते है | सेंत –साइमनवादियों ने कहा हरेक कों उसकी योग्यता के अनुसार,हरेक योग्यता कों उसके कामों के अनुसार [20]यहा पर कितना अंतविरोंध है | एक तरफ तो लोग उद्योगो का समर्थन कर रहे है तो दूसरी तरफ कुछ लोग इसका विरोध कर रहे है | जबकि उदेश्य है सबकी भागीदारी सुनिश्चित करना है | कितनी अजीब बात है की त्रासदियों के अलावा पिछ्ले दो दशको में आदिवासी ईलाको में मावोदियों चरमपंथियो के बढ़ते प्रभाव के रूप में एक और त्रासदी जुड़ गई है | सरकार ने इनकी समस्याओ की ओर ध्यान देने के बजाय ग्रीन हंट जैसा आपरेशन शुरू कर दिया है | एड़म स्मिथ इसी से जुड़ी बात कहते है कि – निर्धन लोगो के साथ असल में त्रासदी,दरसल उनकी आकाक्षाओ की विपन्नता है | मेक इन इंडिया के अंतगर्त अपने देश मे जरूरत की वस्तुओ का निर्माण खुद अपना देश करेगा |

महात्मा गांधी ने भी स्वदेशी की बात बहुत पहले ही कर चुके थे |रोटी के लिए हर मनुष्य को मजदूरी करना और शरीर को झुकाना चाहिए ,यह ईश्वर का कानून है |[21]पर गांधी इसका जवाब नहीं देते है की कमर कहा झुकाना है | इसी तरह की बात नरेंद्र मोदी का कहना है कि भारत में श्रम काफी सस्ता है | पिछले दिनों एक शोध में बताया गया की चीन की तुलना में भारत में श्रम काफी सस्ता है |[22]निसंदेह अपने सस्ते श्रम बल के कारण चीन लगातार वर्षो तक आर्थिक विकास के मोर्चे पर दमदार प्रदर्शन कर रहा है लेकिन अब सस्ते श्रम बल की कमी चीन के विकास की चुनोतियाबनती जा रही है | एक तरफ नरेंद्र मोदी हाथ की शक्ति को उद्योगो में लगाने की बात करते है तो वही महात्मा गांधी हाथ की शक्ति को अर्थात श्रम को देश के निर्माण तथा अहिंसा में लगाना चाहते है |[23]

बहुत साल पहले अलिशा चियाँन का एक गीत काफी लोकप्रिय हुआ था “एक दिल चाहिए बस मेड़ इन इंडिया “| भारत में मेड़ इन इंड़िया के जमुले की जगह मेक इन इंड़िया की योजना भारत में पूरे तामझाम के के साथ प्रस्तुत की गई है | जिसमे सिर्फ सवाल किया गया है जवाब का कही पता नहीं है यह उसी तरह से हैं जिस तरह से देरीदा सिर्फ प्रश्न करते है जवाब नहीं देते है ? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उद्योगपतियों के पलायन की चिंता तो है पर मजदूरो का पलायन नज़र नहीं आया | मेक इन इंड़िया के जरिये नरेंद्र मोदी दुनिया भर के उद्योगपतियों को भारत का पता उसी तरह देना चाहते है जिस तरह देरीदा का कहना है , किताब का अंत लिखने की शुरुआत[24] विकास के इस पहिये में श्रमिकों के लिए कौन सा स्थान उन्हे मिलेगा, इस पर बात नहीं हुई है | यदि उद्योगपतियों ने श्रम नियमों में मनमानी कि और अपना विरोध होने पर उद्योग हटाने की धमकी दी ,तो सरकार किसका साथ देगी ?

यही लेनिन की बात बरसबस याद आ जाती है कि क्या करे ? तब लेनिन साफ तौर पर कहते है कि सपने हमे देखने चाहिए |[25]और कुछ नहीं तो बस इस लिए की दिल बैठ न जाए रूह मुर्दा न हो जाए |[26]शायद नरेंद्र मोदी लोगो कि रूह मुर्दा न हो जाए मेक इन इंडिया जैसी धीमी ज़हर बड़ी सफ़ाई के साथ लोगो को पीला रहे है | यह सर्वविदित है कि आदिवासियो का बसेरा ज़्यादातर अयस्क व बॉक्साईट जैसी खनिज संपदा की पहाड़ियो के ऊपर है |उद्योग लगाने के लिए जमीन कहा से आएगी ? कितने किसानो के खेत मेक इन इंडिया के भेट चढेगे ? कितने जंगल कटेगे , कितने तालाब पाटे जाएगे ,उधोयगो से जो प्रदूषण होगा उसका समाधान कैसे होगा ?महात्मा गांधी जहा शांति सेना की स्थापना के लिए शांति सेना कि बात करते थे | जिसमे स्त्री और पुरुष दोनों होगे | सभी धर्मो के प्रति समान श्रद्धा होगी | लोग अहिंसा में विश्वास करेगे और एक दूसरे का सम्मान करेगे |[27]रक्षा एक ऐसा क्षेत्र है – जो लोगो के जीवन से जुड़ा है वही पर एफ.डी.आई की मंजूरी 49 % कर दी गयी है अर्थातअब विदेशी कंपनिया ज्यादा से ज्यादा हथियार भारत में भेज सकती है तथा सरकार बड़ी खुशी – खुशी अपनी पूजी देश के बाहर भेज़ सकती है |जिन हथियारो की वजह से वियतनाम युद्ध ,चाइना संघर्ष (1928-1949) जापान दूतीय विश्वयुद्ध पाकिस्तान के साथ युद्ध चीन के साथ युद्ध |

इन्ही युद्ध की वजह से संसाधन के स्रोत पूरी तरह नष्ट हो गए ,लोकतन्त्र ध्वस्त हो गया ,मौलिक अधिकरों का हनन हुआ |[28]आज सरकार का उसी दिशा में आगे बढ़ना और निवेश करना जिसका विरोध हमेशा से गांधी जी किया करते थे | यह सवाल नरेंद्र मोदी से करना चाहिए कि यह कहा तक ठीक है कि आप एक तरफ तो गांधी के सिद्धांतों कि बात करते है तो वही दूसरी तरफ आप हथियारो में निवेश करते है | प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने मेक इन इंडिया में कहते है कि सरकार का मंत्र “ हर देशवासी पर भरोसा पर इस भरोसे में स्त्री कहा हैं – जब नारा ही सब का साथ – सब का विकास | तो इसमे स्त्रियों कि जगह कहा है ?बिना स्त्रियोंका सम्मान किए कोई देश विकास नहीं कर सकता है |[29]यही कारण है कि ये तत्व जो उदेश्य है केवल सैद्धांतिकी अर्थ में ही समाजवादी व्यवस्था के हो सकते है | ऐतिहासिक अर्थ में नहीं |[30]

लेकिन तब सवाल पैदा होता है कि इस स्थिति में और किस तरह से अपने अंतिम लक्ष्य को हासिल करेगे | इस का जवाब सीधा है | जब नारा ही हैं– सब का साथ सब का विकास तो सबकों साथ लेकर के ही चलना पड़ेगा | सभी के सिद्धांतों को अपनी नीतियों में सही तरीके से लागू करना ही पड़ेगा | महात्मा गांधी भारत को गावों का देश मानते थे | वह पंचायती व्यवस्था कि बात करते थे | आजादी नीचे से शुरू होनी चाहिए | इसका मतलब था कि हर गाव को अपने पैर खड़ा होना होगा ,अपनी जरूरत खुद पूरी करनी होगी |[31]पर यहा तो सात लाख गावों में अब हीरों ,सूजकी ,होंडा,डाबर ,हिंदुस्तान लीवर ,कोलगेट ,पर्मोलिव ,पेप्सी ,कोका, एल-जी सैमसंग जैसी कंपनिया को अब बाज़ार दिखाई देने लगा है | अब गांवों में मोटर-साईकिल,कार,टीवी और सौंदय-प्रसाधनों से जुड़ी चीज़ों की भरमार होगी | साबुन , टूथपेस्ट ,शैंपू जैसे उत्पादको की पहुच पहले से गावों में हो चुकी थी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खुन में सच-मुच व्यापार है | उन्होने अभी हाल ही में कहा है कि सरकार व्यापार नहीं कर सकती है लेकिन व्यापार में मदद जरूर कर सकती है | इसका अभिप्राय यह है कि गावों में बाज़ार कि संभावनाओ कि ओर इशारा कर दिया है |

निष्कर्ष.

अब देखना है कि ये व्यापारी गावों कि कितनी तस्वीर बादल पाते है ? गाव वालो कि क्रय शक्ति कैसे बढ़ेगी , वे इन उत्पादो को खरीदने के लिए रूपिया कहा से लायेगे | मुंबई स्थित अर्थशास्त्री अजय शाह का कहना है कि भारत में एक बड़ा तबका मुक्त अर्थव्यवस्था पर आधारित मुक्त विचारों वाला मुल्क बनने कि चाह रखता हैं | पर भारत कि इस दिशा मे क्रमिक विकास होने के आसार कम ही दिखते है ऐसा इस लिए है कि नरेंद्र मोदी की मेक इन इंडिया की सफलता काफी हद तक सभी राज्यो की सहभागिता पर ही निर्भर करती है क्योकि निवेश राज्यों को ही तो करना है | मेक इन इंडिया के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा भारत में रेल-सड़क यातायात और अपर्याप्त बंदरगाह है. अगर भारत में निर्माण ईकाइया स्थापित की जाती हैं, तो उत्पाद को गंतव्य तक पहुँचाने के लिए ज़रूरी ट्रांसपोर्ट सुविधा का बंदोबस्त करना ज़रूरी होगा | यूपीए सरकार का दूसरा कार्यकाल घोटालों और भ्रष्टाचार के आरोपों के साए में बीता | इससे भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को भी नुकसान पहुंचा | पुराने और नए निवेशकों का विश्वास कमाना मोदी सरकार के आगे एक बड़ी चुनौती होगी | भारत में बीते कई वर्षों से टैक्स व्यवस्था में सुधार की मांग की जा रही है |

अब तक टेलिकॉम से लेकर कई अन्य क्षेत्र की कंपनियां टैक्स संबंधी मामलों के सिलसिले में भारतीय अदालतों के चक्कर काट चुकी हैं ऐसे में आसान और पारदर्शी टैक्स व्यवस्था की ज़रूरत महसूस होती है | यू तो आर्थिक विकास के लिए गांधी को लाना बहुत बड़ी चुनौति है | जिस प्रकार महात्मा गांधी ने राजनैतिक स्वतन्त्रता का विचार सरल तरीके से प्रस्तुत किया | शायद ही आर्थिक स्वतन्त्रता के विचार को भी यू प्रस्तुत किया जा सके यह बड़े संयोग कि बात है कि महात्मा गांधी इसे द ब्युटीफूल ट्री कहते थे तो दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी इसे मेक इन इंड़िया कहते है|आज के भारत को निश्चित ही मुक्त बाज़ार के गांधी की जरूरत है | सवाल यह है कि क्या हम उन्हे समय रहते तलाश पाएगे ?

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विवेक पाठक

पी-एच.डी अहिंसा और शांतिअध्ययन 2014 -15

ईमेल –vivek.pathak371@gmail.com

फोन नंबर – 08726099846 , 09604754981

महात्मा गांधीअंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा (महा )

गांधी हिल्स -442001

[1]https://www.google.co.in/search?q=logo+in+make+in+india&espv=2&biw=1517&bih=741&tbm=isch&tbo=u&source=univ&sa=X&ved=0CDAQ7AlqFQoTCJeE4ZS8xsgCFQyQjgodrD4JVw&dpr=0.9#imgrc=KRFg17APvRtF0M%3A


[2] स्रोत - गैल सर्वेक्षण संस्था,अमेरिका


[3] स्रोत – उधोग मंडल ऐसोचैम के सर्वेक्षण 2013


[4]स्रोत – ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल , 2013


[5]स्रोत – विश्व बैंक , 2014


[6]स्रोत – कनाडाई फ्रेज़र इंस्टिच्युट, 2013


[7]स्रोत – कार्नेल यूनिवरसिटि अमेरिका के द्वारा किया गया एक सर्वेक्षण


[8] http://www.worldeconomics.com/Papers/India%20Growth%20Monitor_965d58bd-e8c5-4666-8d13-3726dafc7f60.paper


[9]https://en.wikipedia.org/wiki/Economy_of_India#/media/File:1951_to_2013_Trend_Chart_of_Sector_Share_of_Total_GDP_for_each_year,_India.png


[10] स्रोत – प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 15 अगस्त 2014 को लाल किले के प्राचीर से दिये गये भाषण का चुनिन्दा अंश , लोकमत समाचार 16 अगस्त 2014


[11] http://hi.vikaspedia.in/social-welfare/92894092493f92f93e901-90f935902-91593e93094d92f91594d93092e/92e947915-907928-90790292193f92f93e-91593e93094d92f91594d93092e


[12]https://www.google.co.in/search?q=logo+in+make+in+india&espv=2&biw=1517&bih=741&tbm=isch&tbo=u&source=univ&sa=X&ved=0CDAQ7AlqFQoTCJeE4ZS8xsgCFQyQjgodrD4JVw&dpr=0.9#imgrc=6fOismzvuEOe7M%3


[13]स्रोत – 2014 ,करेंट अफ़ियर्स सितम्बर 26


[14] https://en.wikipedia.org/wiki/Economy_of_India#/media/File:Transparency_international_2014.png


[15] गांधी , महात्मा ,संपादक, हरि व्यास गांधी की ऊपेछा : पृ 3


[16] गांधी , महात्मा मेरे सपनों का भारत : पृ 45


[17]डॉ.जटाव ड़ी. आर ,डॉ अंबेड़कर के आर्थिक विचार : पृ 39


[18] (वही पृ 40 )


[19]वही पृ 42


[20]प्लेनाखानोव ,ग्यार्गी काल्पनिक समाजवाद की धाराए , पृ 49


[21]गांधी , महात्मा मेरे सपनों का भारत पृ. 52


[22]स्रोत – नियंत्रण शोध अध्ययन संगठन टावर्स वाट्सन


[23] Das , Rattan Gandhi in 21 & Century p .19


[24]पचौरी , सुदेश देरीदा : विखंडन की सैद्धांतिकी पृ .30


[25] प्ले ,खानोगार्गी .काल्पनिक समाजवाद की धाराए . पृ .19


[26] वही पृ 20


[27] गांधी ,महात्मा मेरे संपनों का भारत ,पृ .166


[28] Rummel.R.J, Death by Government’s. 135


[29] स्रोत – बराक ओबामा का दिया गया भाषण से चुने अंश


[30] लग्ज़मबर्ग , रोज़ा , सुधार अथवा क्रांति पृ 32 )


[31] गांधी ,महात्मा मेरे सपनों का भारत. पृ .36

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