भारत में दलितों या शुद्रों की सामाजिक स्थिति पर एक समाजशास्त्री दृष्टिकोण: डॉ.अजय कुमार

असिस्टेन्ट प्रोफेसर, मा.दुर्गा सर्वोदय महाविद्यालय

अरवल सुलतानपुर उ0प्र0

भारतीय समाज-व्यवस्था का एक पारम्परिक अंग है जिसका अन्त होने की संभावना को लगभग नकार दिया गया है। बाबा साहब अम्बेडकर ने माना है- कि ‘‘जाति व्यवस्था को भारतीय समाज व्यवस्था का सबसे बड़ा दोष है’’ सर्वप्रथम इस जाति की पहेली को सुलझाने की कोशिश की गयी है और जाति के आधार पर किए गए उत्पीड़न की शुरूआत वर्ण व्यवस्था (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र) के निर्माण से प्रारम्भ होती है और दिनों-दिन ये वर्ण संकर और अधिक भागों में विभाजित होने लगती हैं। समाज के चैथे वर्ण से एक और वर्ण उत्पन्न होता है जिसे चर्तुवर्ण व्यवस्था में कहीं पर भी स्थान नहीं दिया जाता। इसे अतिशूद्र,अस्पृश्य, अंत्यज, अछूत कहा जाता है और इसी के आधार पर इस वर्ग पर होने वाले उत्पीड़न की सीमा और अधिक बढ़ जाती है।

यही उत्पीड़न इस जाति-वर्ण मे अन्य समाज के वर्गों के प्रति अनादर और विद्रोह की भावना को पैदा करता है। इसके परिणाम स्वरूप उत्पीडि़त जातियों मे चेतना की भावना पनपती है। यह चेतना उत्पीडि़त समाज को आपस में एकजुट होने में सहायता करती है और यही सामाजिक चेतना राजनीतिक चेतना की ओर अग्रसर होती है। इस चेतना के गोलबन्दीकरण तथा लामबन्दीकरण में सबसे कारगार हथियार समूह की भिन्न पहचान बनती है और इसी पहचान के आधार पर विभिन्न जाति समूह आपस में एकजुट होने लगते हैं। इसी क्रम में विभिन्न सामाजिक मंचों का निर्माण होता है। इसी लामबन्दीकरण को और अधिक प्रभावी और सक्रिय बनाने के लिए इन जाति समाजों के द्वारा विभिन्न पहचान चिन्हों को भी निर्मित किया जाता है और लामबन्दीकरण को और अधिक सक्रिय किया जाता है। इसी आधार पर राजनीति में सक्रियता को भी बढ़ाया जाता है। समाज के पंचम वर्ग, जो अत्यज एवं अस्पृश्य समाज था, ने समय के साथ इस समाज की अमानवीयता के खिलाफ विद्रोह की आवाज बुलन्द करनी प्रारंभ की जिसे विभिन्न समाज सुधारकों का भी सहयोग मिला। इस तरह अस्पृश्य समाज के प्रति अमानवीयता और उत्पीड़न के खिलाफ आन्दोलनों को कुछ भागों में विभाजित करके देखा जा सकता है।

(क) साधु, सन्तों महात्माओं के द्वारा चलाये आन्दोलन-

इन आन्दोलनों की शुरूआत भक्तिकालीन लेखन से प्रारम्भ होती है। जब कबीर, रैदास जैसे कवियों के द्वारा अपने दोहों और छंदों के द्वारा अमानवीयता पर आधारित समाज व्यवस्था का विरोध किया गया है। फागु, बनसोडे, चोखेमेला जैसे कवियों के द्वारा इस विरोध परम्परा को आगे बढ़ाया जाता है। इसी क्रम में इन सन्तों में एक और धारा पनपी जिसने इस व्यवस्था के खिलाफ सड़कों पर उतर कर आन्दोलन किया। सन्त जाडगे जैसे सन्तों ने महाराष्ट्र में रहते हुए जाति व्यवस्था का विरोध किया बल्कि साथ ही साथ अस्पृश्य लोगों के लिए धर्मशालाएँ और सार्वजनिक उपभोग के संस्थानों का निर्माण किया। अस्पृश्य समाज के छात्रों के लिए छात्रावासों का निर्माण करवाया और अगड़ी जातियों के खिलाफ एक सशक्त आन्दोलन चलाया और केला मन्दिर आदि तमाम कार्यों में नेतृत्व किया।

(ख) सुधारवादी आन्दोलन-

ये वे आन्दोलन थे जो वर्ण व्यवस्था में तो विश्वास करते थे पर इस आधार पर किए जा रहे उत्पीड़न और अमानवीयता को निंदा भी करते थे। जिसमें दयानन्द सरस्वती, महात्मा गांधी, नेहरू सवारकर, एम0सी0 रानाडे आदि समाज सुधारकों को शामिल किया जा सकता है।

(ग) आमूल-चूल परिवर्तनवादी-

इन आन्दोलनों ने समाज व्यवस्था को बदल कर नई व्यवस्था की संरचना पर बल दिया। डॉ.अम्बेडकर इस आमूल-चूल परिवर्तनवादी विचार के समर्थक थे जो वर्णव्यवस्था, जाति व्यवस्था का विरोध ही नहीं अपितु, इसके समूल नाश की कल्पना करते थे। ज्योतिबा फुले डॉ.अम्बेडकर, आयंकली, रामास्वामी पेरियार, स्वामी अछूतानन्द, मांगुराम आदि को इसमें शामिल किया जा सकता है। समाज के अंत्यज वर्ण ने अपनी पहचान को अपनी एकजुटता का माध्यम बनाया और इन समाजों में जन्में क्रान्तिकारी आन्दोलनकर्ताओं ने इस अंत्यज, अस्पृश्य समाज को भिन्न पहचानों समूह के तले संगठित किया। ज्योजिबा फुले ने जहाँ इस समाज को ‘बहुजन’ नाम से प्रदर्शित किया वहीं डॉ.अम्बेडकर ने इसे डिप्रेस्ड कहा तथा गांधी ने हरिजन और दक्षिणपंथी लोगों ने ‘वंचित समाज’ कहा। इस प्रकार इस समाज को विभिन्न पहचानों के तले रखा गया। परन्तु 1970 के दशक मे महाराष्ट्र के पेन्थर आन्दोलन ने दलित शब्द का उद्भव किया जिसने इस अस्पृश्य, उत्पीडि़त, समाज को बृहतर फलक पर एक स्पष्ट पहचान को इंगित किया और समाज व्यवस्था में अपनी भिन्न और विशेषीकृत अस्मिता को स्थापित किया। इस नए उपनाम के नीचे सभी अस्पृश्य जातियो ने आना उचित समझा और इसी का परिणाम है कि आज यह दलित शब्द समाज के बहिष्कृत वर्ग की प्रतिनिधि पहचान बन गया है। इसी दलित पहचान के तले यह समाज लामबन्ध हो रहा है और यही गोलबन्दी इस समाज को राजनीति में स्थापित करने में सहायक सिद्ध हो रही है।

आज दलित समाज विभिन्न दलों में सक्रियता के साथ भाग ले रहा है। जहाँ एक ओर उसके स्वयं के द्वारा संचालित दल आज भारतीय राजनीतिक क्षेत्र में स्थापित हो रहे हैं, वहीं अन्य दलों में भी दलित सक्रियता बढ़ रही है। विभिन्न दलों में विद्यमान दलितों की क्या स्थिति है इसे तो उन दलों में उनकी सक्रियता के आधार पर देखा जा सकता है। यद्यपि भारतीय संविधान में दलित समाज (अ0जाति/अ0जनजाति) के लिए संसद और विधानसभा की सीटों में आरक्षण की व्यवस्था है जिसके परिणामस्वरूप लोकसभा और विधानसभाओं में दलित चुन कर आ रहें हैं पर राजनीतिक दलों में अपवाद स्वरूप ही दलितों को किसी सामान्य सीट से चुनाव प्रत्याशी बनाया जाता है। बात रही उनको दल के कार्यप्रणाली में शामिल करने की तो वो भी नाम मात्र की है। विभिन्न दलित नेताओं से विचार-विमर्श के उपरान्त यह जानने में आया कि दलितों को आज भी अपने दल में अगड़ी जाति के नेताओं के समकक्ष सम्मान नहीं दिया जाता है और न ही उन्हें निर्णय-निर्माण में सक्रियता से भाग लेने दिया जाता है। आज भी राज्यों व केन्द्र सरकारों में दलितों को नवरत्न कहे जाने वाले मंत्रालयों का प्रमुख नहीं बनाया जाता। सभी राजनीतिक दल इस मामले में ‘हमाम’ में सब नंगे हैं, जैसी स्थिति में ही दिखते हैं। यदि हम राष्ट्रीय दलों की बात करें तो ऐसा सर्वप्रथम दल कांग्रेस है जिसने जगजीवनराम के रूप में एक दलित के रूप में एक दलित को राष्ट्रीय अध्यक्ष ही बनाया था। जिसका परिणाम कांग्रेस का सम्पूर्ण बहुमत से अधिक सीटों के साथ चुनावों मे विजयी होना रहा था। इसी क्रम में डी0 संजीवैया को भी अध्यक्ष बनाया गया जिसका दल को फायदा पहुँचा है तथा विभिन्न राज्यों में मुख्यमंत्री पद भी दलितों को मिला है। पर यह बदलाव 1980 के बाद से ही राजनीति में दिखता है। मण्डल कमीशन के बाद दलित, उत्पीडि़त जाति के लोगों को राजनीतिक दलों के अलावा एक और महत्वपूर्ण कारक था भारतीय राजनीतिक में दलितों, शोषितों के द्वारा संचालित दल बहुजन समाज पार्टी का गठन और भारतीय राजनीति में जर्बदस्त दस्तक। इसने सभी राजनीतिक दलों को चिन्तित कर दिया। जिसका परिणाम हुआ कि आजादी के बाद पिछड़े समाज का एक नेता एच0डी0 देवगौड़ा के रूप में अपनी बार प्रधानमंत्री बना। यह इस दलित पिछड़े समाज के एकजुटतीकरण की बढ़ती प्रवृत्ति का ही परिणाम था कि भाजपा ने बंगारू लक्ष्मण को दल का राष्ट्रीय अध्यक्ष निर्वाचित किया। कल्याण सिंह को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया तथा सूरजभान को उत्तर प्रदेश का राज्यपाल बनाया तथा डिप्टी-स्पीकर लोकसभा नियुक्त किया था। सत्य नारायण जाटिया, संघ प्रिय गौतम, संजय पासवान जैस नेताओं को केंद्रीय मंत्रालयों में जगह प्रदान की गयी। दल के संगठन में, विजय सोनकर शास्त्री, थवरचन्द, गहलोत, कैलाश मेघवाल, अशोक अर्गल आदि कई दलित नेताओं को आगे बढ़ाया गया इसी सबका परिणाम था कि गोविन्दाचार्य का दल में संगठन मंत्री और उमा भारती, शिवराज सिंह चैहान आदि को राजनीति में आगे बढ़ाया गया।

दलित से बहुजन की ओर बढ़ता यह समाज अस्पृश्य समाज के साथ पिछड़े समाज के गठजोड़ के बाद बहुजन समाज के रूप में सामने आया जिसे ज्योतिबा फुले के बाद कांशीराम ने अधिक प्रचलित पहचान दी। जहाँ दलित को मात्र अस्पृश्यों के साथ जोड़कर देखा जा रहा था वहीं बहुजन को कांशीराम ने अनुसूचित जाति/जनजाति/पिछड़ा वर्ग और धर्मान्तरित अल्पसंख्यक वर्ग के साथ मिलाकर, भारतीय राजनीति में जमी पड़ी जातियों को एक चुनौती दी और उन्हें बहुजनों का विशालकाय रूप प्रस्तुत किया गया तथा ‘अल्पसंख्यक समाज पर अल्पसंख्यक समाज का राज नहीं चलेगा।’ का नारा उद्घोषित किया गया। कांशीराम ने कहा कि यह समाज देश की जनंसख्या का 85 प्रतिशत से अधिक है तथा राजनीति और सामाजिक हिस्सेदारी में इनकी भूमिका नगण्य है और दूसरी ओर 15 प्रतिशत से कम अगड़ी जाति के लोग राजनीति और समाज पर पूरा कब्जा किए हुए हैं। यह व्यवस्था तो लोकतांत्रिक नहीं है क्योंकि लोकतंत्र तो बहुसंख्यक जनता को सहभागिता का नाम है पर वर्तमान सरकार अल्पसंख्यकों के द्वारा संचालित है। इस प्रकार इन्होंने दलितों-बहुजनों को जाग्रत कर और उनको राजनीतिक सत्ता में हिस्सेदारी दिलाने हेतु बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की। इस दल ने अम्बेडकरवाद को अपनी विचारधारा को आधार बना कर अपने संघर्ष की शुरूआत की और उत्तर प्रदेश में चार बार सरकार बनायी। इसी के साथ 2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में सम्पूर्ण बहुमत प्राप्त कर 14 सालों के बाद एक स्पष्ट बहुमत प्राप्त सरकार प्रदेश को दी है। बहुजन समाज पार्टी की इस सफलता में उसकी भिन्न और विकासवादी राजनीति ने अपनी कारगर भूमिका का निर्वहन किया। बसपा ने नारों और प्रतीकों के माध्यम से दलित पहचान को उद्वेलित करने का कार्य किया परन्तु अन्य राजनीतिक दलों के द्वारा नारों और प्रतीकों का बखूबी प्रयोग किया गया। दलित समाज की राजनीतिक हिस्सेदारी और सत्ता के आंदोलन के बढ़ते कदमों ने विभिन्न दलों को एक संकेत दिया है कि अब हमें उचित स्थान प्रदान करने अन्यथा हम बहुसंख्यक समाज को अपना उचित स्थान प्राप्त करना आता हैं क्योंकि आज दलित बहुजन समाज की देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सहभागिता बढ़ रही है जो इस देश के शासन को अधिक लोकतांत्रिक चरित्र की ओर लेकर आ रही है। इसी का परिणाम है कि विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्री दलित और पिछड़े वर्ग के लोग बन रहे हैं और छोटे दलों का उभार हुआ है। जो दलितों और पिछड़ों के द्वारा संचालित हो रहे हैं। विभिन्न राजनीतिक दलों ने विभिन्न राज्यों में अपने दलों में दलितों को उचित पद देना प्रारम्भ किया है।

परन्तु आज भी दलितों को चाहे वो किसी भी राजनीतिक दल में क्यों न हो, उन्हें कम से कम दलित मुद्दों पर एकजुटता होना चाहिए। दलितों को दलों से भिन्न ‘काॅमन प्लेटफार्म-फाॅर दलित’ बनाना चाहिए जिसमें पिछड़ों के साथ लेना आवश्यक होगा क्योंकि लोकतंत्र लोगों की ताकत को सलाम करता है। दलितों-पिछड़ों का गठजोड़ लोगों की ताकत का प्रतीक है। इस ताकत के आधार पर यह बहुसंख्यक समाज भारतीय राजनीति अपनी उचित भूमिका का निर्वाह कर पाएगा। साथ ही साथ पिछड़े समाज व्यवस्था में दलितों और पिछड़ी जातियों को जाति और उपजाति के विचार को समाप्त कर एक गठजोड़ की बात सोचनी चाहिए। यह जातियों को बांटने के लिए ब्राह्मणवाद द्वारा प्रयोग किया गया एक वैचारिक शस्त्र है जैसे अंग्रेजों ‘फूट डालों और शासन करो की नीति’ का प्रयोग किया था। इसी प्रकार से ब्राह्मणवादी विचार समूह इन दलित-पिछड़ी जातियों को विभाजित करने और उनमें असमानता के विचारों को पैदा करने का सदैव प्रयास करता है।

दलितों-बहुजनों को शिक्षित संगठित होकर संघर्ष करने के रास्ते की ओर अग्रसर होना ही होगा। इसके साथ इन्हें ये सब अपना ही है और इसे अपनी ताकत और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल होकर अपना बनाना होगा और साथ ही साथ आगे बढ़े दलित समाज को पीछे छूट गए दलित समाज को आगे बढ़ने के अधिक अवसर प्राप्त हों, इसके लिए संघर्ष करना चाहिए। अक्सर आगे बढ़े दलितों को ब्राह्मणवादी लोग अपने समकक्ष सम्मान प्रदान कर उन्हें अन्य दलित समाज से काट दे रहे हैं जिससे आरक्षण जैसा प्रावधान मात्र दलितों के आगे बढ़े दलित समूह में ही केन्द्रित होकर रह गया है। अब दलितों में ‘अभिजात्यवर्ग’ का प्रादुर्भाव हुआ है जो समाज के पीछे छूट गए दलितों से अपने को अलग किए हुए है, जो दलित आन्दोलनके लिए शुभ संकेत नहीं है। आगे बढ़े दलित समाज को पीछे छूट गए दलितों को आगे बढ़ाने में अधिक प्रयास किए जाने की आवश्यकता है, तभीएक बहुसंख्यक समाज का आन्दोलन हो पाएगा और समाज व्यवस्था के वर्तमान स्वरूप को भी तभी बदला जा सकता है।

हाल के वर्षों दलित महिलाओं के प्रति बलात्कार के मामले बढ़े जा रहे हैं। वैसे तो दलितों को अछूत माना जाता है। दलितों का स्पर्श भी उनको अपवित्र कर देता है। परंतु घृणित कार्य के वक्त छुआछूत कहाँ रह जाती है यह एक ज्वलंत प्रश्न है? भारत के दलित इतिहास पर गौर किया जाए, तो हमें ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता कि इन दलित वर्गों के लोगों ने देश-हित के विरूद्ध कोई कार्य किया हो।

दलित राजनीति में एक नया तत्त्व उभर रहा है, वह है कि हर राष्ट्रीय स्तर का दलित नेता अपने को दूसरे से श्रेष्ठ समझता है। अगर कोई दलित नेता किसी प्रदेश में अच्छा कार्य कर रहा है, तब दूसरे प्रदेश का दलित नेता उ0प्र0 आकर उस प्रदेश के दलित वोटों मे सेंध लगाने की कोशिश करता है ताकि वह उस राज्य में अच्छा कार्य कर रहे दलित नेता के वोटों को काट सकें और यह प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। जबकि होना यह चाहिए कि प्रत्येक दलित नेता अपने-अपने प्रदेश में दलितों को संगठित करें तथा मजबूत होकर एक-दूसरे की सहायता करे। तभी दलित आंदोलन को एक नयी चेतना तथा मजबूती मिलेगी। आज यह दलित नेता दलित आंदोलन को कमजोर कर रहे हैं। आज दलित आंदोलन दलितों की उपजातियों के आधार पर बंट गया है।

आज के कम्प्यूटर युग में दलित बच्चे कहाँ तक पहुँच पाएंगे यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है क्योंकि उन्हें केवल आरंभिक शिक्षा ही मिल पाती है। कम्प्यूटर की उच्च शिक्षा के खर्च का भार इस वर्ग के लोग वहन नहीं कर सकते, अतः इन दलितों को केवल टाइपिंग आदि का ही कार्य मिल रहा है। इनकी तुलना अंग्रेजों द्वारा बनाए गए क्लर्क वर्ग से की जा सकती है जो मैकाले की योजना थी।

अंग्रेजी राज में यदि ज्योतिबा फुले, डॉ.अम्बेडकर आदि लोगों ने दलित उत्थान में प्रश्न है। संविधान ने तो हमें बहुत कुछ दिया, परंतु उसे प्रावधानों पर सही तौर से अमल नहीं हो पाया है। देश में भूमि सुधार ठीक तरीके से नहीं हो पाया है, और जो हुआ भी है तो उसका लाभ मंझोली जातियों को ही मिला है जबकि दलित वही के वहीं रह गए। पिछले 50 वर्षों में लगभग 70 प्रतिशत ग्रामीण दलितों ने अपने गांवों को छोड़ दिया है। इसका मुख्य कारण जीविका की तलाश है। इन दलितों के पास गांवों में भूमि नहीं है, और जो थोड़ी बहुत है भी बेकार हैं। अच्छी भूमि तो चकबंदी-प्रक्रिया द्वारा उच्च वर्गों द्वारा छीन ली गई है। यही कारण हैं कि आज अधिकतर भूमिहीन व सीमान्त किसान दलित वर्ग के ही लोग हैं।

दलितों के पास जो कपड़े व चमड़े से संबंधित उद्योग थे, जो आज उच्च वर्ग के हाथों में हैं क्योंकि अब इन उद्योगों में मुनाफा है तथा इनकी विदेशी में मांग है। परंतु ये लोग दलितों के व्यवसाय कब्जाने पर भी अछूत नहीं कहलाते, यह एक मानवीय विडंबना नहीं है तो और क्या है? दलितों के विकास के लिए कई सरकारी योजनाएँ बनाई गई, परंतु उसका लाभ ठेकेदारों को ही मिला। जैसे कि राजीव गांधी ने कहा था, कि एक रूपये में केवल 15 पैसे ही विकास के लिए नीचे के तबके तक पहुँच पाते हैं। ऐसा नहीं है कि सरकार ने दलितों के उत्थान के लिए योजनाएँ नहीं बनाई, परंतु सरकार उनका क्रियान्वयन ठीक से नहीं कर पाई।

देश में दलितों पर अत्याचार होते हैं। इन अत्याचारों पर लगाम लगाने के लिए राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर आयोगों का गठन हुआ है। परंतु यह आयोग उस तरह कार्य नहीं कर पा रहें हैं जिस प्रकार उन्हें करना चाहिए।

रंगभेद के विरूद्ध विश्व सम्मेलन का आयोजन संयुक्त राष्ट्र संघ के द्वारा डरबन मे 31 अगस्त से 7 सितम्बर 2001 में किया गया था। वैसे तो यह सम्मेलन रंगभेद के विरूद्ध था परंतु भारत के दलित प्रतिनिधियों ने इस सम्मेलन में भारतीय समाज में हो रहे दलितों के शोषण के प्रति विश्व समुदाय का ध्यान खींचने का प्रयाश किया। भारत में फैला यह जातिवाद रंगभेद की तुलना में काफी घातक है। अभी हाल में ‘भोपाल’ में दलितों के विकास के लिए एक सम्मेलन किया गया। जिसमें एक दस्तावेज भी प्रकाशित किया गया जिसको की ‘भोपाल दस्तावेज’ के नाम से जाना जाता है। इस दस्तावेज में दलितों के विकास के लिए कई सुझाव दिए गए। परंतु यह सुझाव वास्तविक स्तर पर लागू किए जाने योग्य नहीं हैं।

डॉ.अजय कुमार

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आज देश के दलितों की समस्या के समाधान के लिए हमें एक ठोस कार्यक्रम की आवश्यकता है। आज कागजी कार्यों व कार्यक्रमों के स्थान पर वास्तविक क्षेत्र के कार्य करने की आवश्यकता है। दलित वर्ग भारतीय जनसंख्या का एक बड़ा भाग है तथा इस वर्ग के विकास का अर्थ होगा पूरे भारत विकास। आज देश के पूर्ण उत्थान के लिए यह आवश्यक है कि दलित जातियों के उत्थान के लिए कार्य किए जाय।

सन्दर्भ ग्रन्थ सूची:-

1. वेयर एकट- भारतीय संविधान

2. सम सामयकी- पत्र तथा पत्रिकाये

3. सामाजिक विचार धारा- आर.एन.मुखर्जी

4. भारतीय सामाजिक विचारक- एस.एल.दोषी

5. कास्ट इन इण्डिया- 1916-17डॉ.भीमराव अम्बेडकर

6. कास्ट इन इण्डिया- जे.एच.हट्टन

7. अनुसंधान परिषद पुस्तकालय इलाहाबाद विश्वविद्यालय

8. केन्द्रीय संग्रहालय- बी.एच.यु. वाराणसी

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