भारत में नदियों की वर्तमान स्थिति ( Current Situation of Rivers in India)-अभिषेक कुमार राय

एम. फिल समाज कार्य

महात्मा गांधी फ्यूजी गुरुजी समाजिक कार्य अध्ययन केंद्र

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा

प्रकृति ने मानव के अस्तित्व को सतत बनाये रखने के लिये नदी जल, जंगल, मृदा आदि अनेक प्रकार के प्राकृतिक संसाधनों को जन्म दिया। इनमें प्रमुख हैं नदियां। नदियां सदियों से मानव सभ्यता और संस्कृति की साक्षी हैं। सभ्यता और संस्कृति के सदियों प्राचीन इतिहास की साक्षी नदियों ने कई सभ्यता और संस्कृति के सृजन और विध्वंस को अत्यंत करीब से देखा, जिसे मानव ने माँ, माई, मैया के रूप में पूजा, जो संसार में एक विशिष्ट भाव है। इस भाव में नदियों के संरक्षण और प्रबन्धन की भावनाएं अन्तर्निहित हैं, परन्तु अब मानव के जीवन की भागमभाग और अपने अस्तित्व को प्रदर्शित करने के लिये, प्राकृतिक संसाधनों को संजोने एवं उनके संरक्षण के नजरिये में परिवर्तन आया है और जिसके कारण यह उनके उपभोग का मानस ही रह गया है। आज नदियों का जल आय-व्यय का साधन बन गया जिसे मनुष्य वस्तु के रूप में अपने निहित स्वार्थ के कारण नदी के स्वास्थ्य को धीरे-धीरे क्षीण करता जा रहा है, लेकिन वह यह नहीं जानता कि वह अपने अस्तित्व को भी चुनौति दे रहा है।

विकास कोई आज की धारणा नहीं है। प्राचीन समय से मनुष्य पर्यावरण के साथ समायोजन करते हुए विकास की ओर अग्रसर रहा, किन्तु इसकी प्रक्रिया आज इतनी तीव्र है मनुष्य ने नदी को क्या बना कर रख दिया है। प्रारम्भिक विकास के सोपानों को पार करने में उसे लाखों वर्ष लगे, किन्तु आधुनिक युग में उसकी गति (औद्योगीकरण, नगरीकरण, भूमंडलीकरण) ने जो तेजी पकड़ी है, वह आश्चर्य में डाल देती है उसमें मनुष्य का चेहरा और उसका परिवेश कुछ इस तरह बदल दिया है कि रूपान्तरण की प्रक्रिया कुछ सहज नहीं प्रतीत होती। पहले विकास पर्यावरण पर निर्भर था, और प्राकृतिक संसाधन, जीव-जन्तु की अवस्थाओं में ढल कर होता था। प्रकृतिक का एक पूरा तंत्र है जिसके साथ स्थल, जल, वायु और जीव की एक पूरी व्यवस्था जुड़ी है। यह एक परिवार की भाँति एक दूसरे के सहयोगी है। एक के बिना दूसरे की कल्पना नहीं की जा सकती। लेकिन आज मनुष्य ने तकनीकी शक्ति, प्रौद्योगिकी, आधुनिक विज्ञान को अपने विकास क्षेत्र में प्रमुखता दे रहा है जहां केवल उपभोक्तावाद को बढ़ावा मिल रहा है, और मनुष्य अपने प्राकृतिक परिवेश से दूर होता जा रहा है। (चातक गोविंद, 2006 पृ. 98-111)

मानव विकास का सीधा संबंध नगरीकरण, औद्योगीकरण, विद्युत परियोजनाओं, खनन, परिवहन, ऊर्जा संसाधन आदि कई क्रिया-कलापों से है। नागरीकरण सभ्यता के विकास का ही एक चरण है, जो मानव को सुख सुविधा जुटाने में बड़ा योगदान करता है। आधुनिक समय में नदियों के तटों पर आधुनिक शहरों का बड़ी तेजी से विस्तार हुआ है। जिस नदी तट पर शहर नहीं भी थे वह आज शहर कुकुरमुत्तों की तरह उग आए है। जब कही नया नगर उठ खड़ा होता है तो वहाँ पर्यावरण संबंधी सैकड़ों समस्याएँ आ खड़ी होती है। नगर बसता है तो जनसंख्या का विकेन्द्रीकरण होता है और उसके लिए मकान, दुकान, शौचालय, नालियाँ, जल, दफ्तर, फैक्ट्री आदि कई चीजों की अवश्यकता होती है। फलतः एक पूरी व्यवस्था अपेक्षित होती है जिससे कि शहर को साफ-सुथरा रखा जा सके और अन्य अवश्यकताओं की पूर्ति की जा सके। जिसका उदाहरण हम अपने शहरों में भी देख सकते है। जहां नदियों का पानी टैंकरों, पाइप लाइनों से पीने के लिए घरों में आता है और नालियों से सीवेज में जाता है। सीवेज का गंदा पानी पुनः नदियों में गिरा दिया जाता है। साथ ही नदी तटों पर बसे शहर धरती के पेट में असंख्य छेद कर भूगर्भीय जल को खीच कर प्यास बुझा रहे है और उसी जल का व्यापार भी कर रहे है। कुछ शहरों में बड़े-बड़े पाइप लाइन से नदियों का पानी पीने के लिए दूर भेजा जाता है जहाँ नदियां नहीं है। ये हमारा आज का आधुनिक साफ-सुथरा शहर है जो प्राकृतिक संसाधनों का हरण तो करी रहा है साथ ही आधुनिक मानव के मस्तिष्क का भी हरण कर इस प्रक्रिया को बढ़ाने में मददगार साबित हो रहा है। (सिंह शिवबहाल, 2014 पृ. 30-31)

पानी हमारे सांस्कृतिक जीवन का एक आधारभूत तत्व है। ‘रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून’ ये सूक्ति मनुष्य को सचेत करती है और पानी के महत्व को रेखांकित भी करती है। जल जीवन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण संसाधन है, जो मनुष्य को पीने के लिए ही नहीं बल्कि खाना पकाने, धुलाई, सिंचाई, जलीय जीवजंतु के जीवन आदि के लिए महत्वपूर्ण है। लेकिन आज उद्योगों का अवशिष्ट, कचरा, सीवेज का गंदा नाला, इस्तेमाल की गयी वस्तुओं के अवशेष आदि को लोग नदियों में फेक रहे है, परिणाम आज जीवन का आधार नदियां गंदगी ढोने वाली मालगाड़ी बन कर रह गई है। कारखानों द्वारा छोड़े गए विषैले रसायनों, कृषि में प्रयुक्त कीटनाशकों से नदी का जल प्रदूषित होता है जो मनुष्यों, मछलियों, जीवजंतुओ,पशुओं के लिए गंभीर खतरा बना हुआ है। आज देश की कई नदियां घटिया जल आपूर्ति नीति, निम्न जल शोधन प्रणाली तथा समुचित अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली के अभाव के कारण नदी जल के प्रदूषण का गंभीर सामना कर रही है, जो उनकी स्वयं की निर्मित प्रणाली का परिणाम है।

काशी हिंदू विश्वविद्यालय के नदी वैज्ञानिक प्रो. यू.के. चौधरी का मानना है कि “नदियाँ हमारी जीवन रेखा हैं। इन्हें हर कीमत पर बचाया जाना चाहिए। नदी का सीधा संबंध पानी, मिट्टी एवं वायु से होता है। अगर इन नदियों का अस्तित्व समाप्त हो गया तो नदियों के हरे-भरे क्षेत्र को रेगिस्तान में बदलते देर नहीं लगेगी। न केवल पीने के पानी बल्कि खेती के लिए गंभीर समस्या पैदा हो जाएगी। वैज्ञानिकों का मानना है कि नदी के किनारे खेती होनी चाहिए। अगर उनके दोनों किनारों पर कब्जा करके अट्टालिकाएँ खड़ी की जाती रही, जैसा वर्तमान नदियों के तटों पर हो रहा है, तो नदियों की सांसें थम जाएँगी और हमारी जीवनदायिनी नदियाँ इतिहास के पन्नों तक सीमित रह जाएँगी”। (पाठक, 2015)

काशी हिंदू विश्वविद्यालय के पर्यावरणविद प्रो. बी डी. त्रिपाठी का मानना है कि“नदियों का पर्यावरण संतुलन दिनोदिन बिगड़ रहा है जो मानव जीवन के लिए खतरे का संकेत है। नदियों का सीधा संबंध वायुमंडल से होता है। अत्यधिक जलदोहन एवं मल-जल की मात्रा बढ़ने से नदियों के जल में लेड, क्रोमियम, निकेल, जस्ता आदि धातुओं की मात्रा बढ़ती जाती है जो मानव जीवन के लिए खतरे की घंटी है”। (पाठक, 2015)

आज भारत की पवित्र नदियों में सरस्वती जहां एक ओर अपना अस्तित्व खो चुकी हैं, वहीं गंगा, यमुना और ब्रह्मपुत्र अपने अस्तित्व के लिये संघर्षरत हैं। मानव नदियों के उपभोग के लिये तो सदैव तत्पर है, लेकिन उसके जल के लेखा जोखा, उसके स्वास्थ्य, संरक्षण, प्रबन्धन और गुणवत्ता व मात्रा के बारे में तनिक भी विचार न के बराबर कर रहा है। अब जरा एक नजर नदियों की स्थिति पर भी डाल लेते हैं ताकि हम अपनी जिम्मेदारी को ठीक से समझ लें और उसे अधिक वक्त के लिए टालें नहीं बल्कि तत्काल नदी संरक्षण में अपनी भूमिका तलाश लें। नदियां हमें जीवन देती हैं लेकिन विडम्बना देखिए कि हम उन्हें नाला बना दे रहे हैं। पवित्र मानी जाने वाली गंगा भी इससे अछूति नहीं है। पवित्र गंगा का आंचल उसके स्वार्थी पुत्रों ने कुछ जगहों पर इतना मैला कर दिया है कि उसके वजूद पर ही संकट खड़ा हो गया है। धार्मिक क्रियाकलापों से गंगा उतनी दूषित नहीं हो रही जितनी कि तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या, जीवन के निरंतर ऊंचे होते हुए मानकों, औद्योगीकरण और शहरीकरण के हुए अत्यधिक विकास के कारण मैली हो रही है। गंगा सहित अन्य नदियों के प्रदूषित होने का सबसे बड़ा कारण सीवेज है। बड़े पैमाने पर शहरों से निकलने वाला मलजल नदियों में मिलाया जा रहा है जबकि उसके शोधन के पर्याप्त इंतजाम ही नहीं हैं। जिसके परिणाम स्वरूप नदी जैव विविधता व परिस्थितिकीय तंत्र को भी खतरा उत्पन्न हो गया है। यही हाल रहा तो मनुष्य की आगे आने वाली पीढ़ी को भयंकर कठिनाई होगी।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने अपने अध्ययन में कहा है कि देशभर के 900 से अधिक शहरों और कस्बों का 70 फीसदी गंदा पानी पेयजल की प्रमुख स्रोत नदियों में बिना शोधन के ही छोड़ दिया जाता है। कारखाने और चीनी मिले भी नदियों को प्रदूषित कर रहे हैं। हमने जीवनदायिनी नदियों को मल-मूत्र का अड्डा बनाकर रख दिया है। नदियों में सीवेज छोड़ने की गंभीर भूल के कारण ग्वालियर की दो नदियां स्वर्णरेखा नदी और मुरार नदी आज नाला बन गई हैं। इंदौर की खान नदी भी गंदे नाले में तब्दील हो गई है। कभी इन नदियों में पितृतर्पण, स्नान और अठखेलियां करने वाले लोग अब उनके नजदीक से गुजरने पर नाक मुंह सिकोड़ लेते हैं। यह स्थिति देश की और भी कई नदियों के साथ हुई है। देश की 70 फीसदी नदियां प्रदूषित हैं और मरने के कगार पर हैं। इनमें गुजरात की अमलाखेड़ी, साबरमती और खारी, आंध्रप्रदेश की मुंसी, दिल्ली में यमुना, महाराष्ट्र की भीमा, हरियाणा की मारकंडा, उत्तरप्रदेश की काली,असि और हिंडन नदी सबसे ज्यादा प्रदूषित हैं। गंगा, नर्मदा, ताप्ती, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, महानदी, ब्रह्मपुत्र, सतलुज, रावी सभी बदहाल स्थिति में हैं। (CENTRAL POLLUTION CONTROL BOARD, 2015)

राष्ट्रीय जल प्रवाह पद्धति में प्रदूषण खतरे के निशान के ऊपर पहुंच गया है। राष्ट्रीय परिवेश अभियांत्रिकी शोध संस्थान (नीरी) के वैज्ञानिकों द्वारा शोध सर्वेक्षण से पता चलता है कि देश का लगभग 70% भूगर्भीय जल मानवीय उपयोग के लिए अनुपयुक्त हो चुका है। एक सर्वेक्षण के अनुसार बंबई महानगर के उपनगर अम्बरनाथ और उल्हास नगर के बीचों-बीच से होकर जो कालू नदी बहती है उसमें भारी धातुओं का जमाव पाया गया है। इस नदी के किनारे पाए जाने वाले पायक्रस पौधे की पत्तियों में पारा मिला हुआ है। जो दुधारू जानवर इसका सेवन करते हैं उनके दूध में पारा मिला हुआ पाया गया और यही दूध जब बच्चे पीते हैं तो यह पारा उनके शरीर में पहुंच जाता है। झारखंड की शोक नदी के नाम से मशहूर दामोदर नदी बोकारो और राऊरकेला लौह व इस्पात संयंत्रों के बीच स्थित है विभिन्न कोयला धुलाई संयंत्र से प्रतिमाह 82,000 टन कोयला साफ किया जाता है और इस सफाई के दौरान 1800 टन कोयला इस नदी में बह जाता है। एक अध्ययन के अनुसार इस नदी में अवशिष्ट ठोस पदार्थों की मात्रा 1,00,000 मिली ग्राम प्रति लीटर पाई गई है। जबकि जल की अधिकतम सहनीय क्षमता 100 मिली ग्राम प्रति लीटर मानी जाती है। इतना ही सिंदरी खाद कारखाने से 10 से 15 टन सल्फेरिक एसिड दुर्गापुर केमिकल्स से 25 से 10 टन दूषित पदार्थ आकर मिलता हैं। एक और अध्ययन के अनुसार दुर्गापुर के निकट 08 औद्योगिक ईकाइयां हैं। जो लगभग 1.59 लाख घनमीटर अवशिष्ट पदार्थ दामोदर नदी में प्रतिदिन डालती हैं।[1]

बिहार में सोन नदी की स्थिति और भी खराब है वहां मिर्जापुर के समीप स्थित कागज और रसायन उद्योग की इकाइयों से उत्पन्न खतरनाक अवशिष्ट इतना अधिक है, जिसके कारण क्लोरीन अंश रिहंद जलाशय के समीप 62 पी.एम.पी. हो गया है, जबकि इसकी घुलनशील ऑक्सीजन का स्तर नदी में गिरकर 0.2-1-2 किग्रा प्रति लीटर न्यूनतम आ जाता है। जिससे जल जीवाणुओं का अस्तित्व खतरे में आ जाता है। पश्चिमी बंगाल की हुगली नदी उर्जा संयंत्रों के गर्म पानी तथा अन्य उपयुक्त औद्योगिक अवशिष्टों के कारण इतनी प्रदूषित हो चुकी है कि नदी की मछलियों और उनके अंडों तक का विनाश होना प्रारंभ हो चुका है। इस नदी के किनारे स्थित कागज की लुगदी उद्योग से लगभग 114 लाख तरल अवशिष्ट नदी में जाकर समाहित हो रहा है इसके अतिरिक्त कलकत्ता महानगर का समस्त मलमूत्र भी इस नदी में आकर मिलता है।

तमिलनाडु की कावेरी नदी भी प्रदूषित होने से नहीं बची है। क्योंकि यह भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड द्वारा छोड़े गये रसायन से प्रभावित हो रही है। केरल की चालियार नदी का जल अवशिष्ट पदार्थों के कारण भूरा पड़ गया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस नदी के समीप स्थित रेयन फैक्ट्री द्वारा फेंके गए उच्चस्तरीय पारे के कारण नदी की मछलियों तक के अस्तित्व को खतरा पैदा हो गया है। इसी प्रकार का पारा विष (मरकरी) उड़ीसा की रसकुल्या तथा महाराष्ट्र की थाने क्रीक नदी में भी पर्याप्त मात्रा में पाए जाने के प्रमाण मिले हैं। दूषित पदार्थों के अलावा कई उच्च तापमानीय जल नदियों में डालते हैं जिससे जल के निचले भाग में रहने वाले जीवजंतुओं का अस्तित्व संकट में पड़ जाता है, ऐसा माना जाता है कि जल में पाए जाने वाले जीवाणुओं के लिए 25% से 30% तापमान अनुकूल नहीं होता और 30% से 35% का तापमान जैविक मरुस्थल माना जाता है जिसमें यह वहां जीवित नहीं रह सकते। (इंडिया वाटर पोर्टल: नदियों के जीवन पर प्रभाव)

इस प्रदूषण की सर्वाधिक मात्रा देश के पवित्रतम नगर बनारस में पाई जाती हैं जहां गंगा के किनारे शव जलाए जाते हैं या अनंनत जल धारा को समर्पित किए जाते हैं। कुछ समय पूर्व तक जनमानस की यह धारणा थी कि गंगाजल कभी खराब नहीं होता है और ना ही इससे छूत रोग होने का खतरा रहता है। पर शव पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार अब पवित्र गंगा स्नान के उपयुक्त नहीं रह गई हैं क्योंकि इसमें नहाने से चर्मरोग होने की सम्भावनाएं हैं और इसका प्रमाण है गंगा शुद्धि अभियान क्योंकि इस शब्द के चेतना में आते ही गंगा जल के प्रदूषित होने तथा सम्भाव्य खतरों की कहानी स्पष्ट होती है। (सत्येंद्र सिंह: गंगा)

चंबल का पानी भी धीरे-धीरे कई स्थानों पर उपयुक्त नहीं रहा इसके पानी से भूगर्भीय जल के विषाक्त होने का खतरा पैदा हो गया है। इसका कारण चंबल के किनारे बसा औद्योगिक शहर कोटा जो अपना पूरा योगदान इसे प्रदूषित करने में दे रहा है। उज्जैन के समीप शिप्रा नदी की भी लगभग यही स्थित है। जल प्रदूषण की यह समस्या राष्ट्रीय समस्या है। लेकिन सरकार तब तक कुछ कर सकने में समर्थ नहीं हो सकती जब तक सामान्य जन में जन जागृति न हो। भारत सरकार 1981-90 ने पेयजल और सेनिटेशन अंतरराष्ट्रीय घोषणा पत्र पर दस्तखत कर सराहनीय कार्य किया जिसका मुख्य उद्देश्य विश्व के तमाम लोगों को स्वच्छ और सुरक्षित जल एवं सेनिटेशन प्रदान करना है। लेकिन घोषणा पत्र पर हस्ताक्षर करने से दायित्व की इतिश्री नहीं हो जाती इसके लिए भारत सरकार और हम सबको मिलकर देश के पानी के स्रोतों को स्वच्छ और शुद्ध रखना होगा इस दिशा में सामाजिक चेतना जागृत करने का सरकार व प्रबुद्ध लोगों के द्वारा प्रयास होने चाहिए। अंत में समाज से यही अपील है कि पानी की बर्बाद करने से खुद को तथा अपने से संबंधित लोगों को बचाएं, तथा समाज के हर व्यक्ति को यह बताने का प्रयास करें कि पानी को लहू की तरह सुरक्षित रखिए क्योंकि दोनों के बिना जीवन की कल्पना नहीं है। (सत्येंद्र सिंह: गंगा)

भारत सरकार ने करोड़ों रुपये जल और नदी के संरक्षण पर खर्च कर दिए हैं लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात ही है। नदियां साफ व स्वच्छ होने की जगह और मैली होती गई है। आखिर नदियों को बचाने की रणनीति में कहां चूक होती रही है? क्यों हम अपनी नदियों को मैला होने से नहीं बचा पा रहे हैं? क्या किया जाए कि नदियों का जीवन बच जाए? क्या उपाय करें कि नदियां नाला न बनें? इन सब सवालों पर मंथन जरूरी है। समाज का जन जागरण जरूरी है। प्रत्येक मनुष्य को यह याद दिलाने की जरूरत है कि नदी नहीं बचेगी तो हम भी कहां बचेंगे? नदी के जल की कल-कल है तो कल है और जीवन है। नदियों में मल-मूत्र (सिवेज), औद्योगिक कचरा छोड़ना सरकार को तत्काल प्रतिबंधित करना चाहिए। नदियों के संरक्षण के अभियान में अब तक समाज की भागीदारी कभी सुनिश्चित नहीं की गई। जबकि समाज को उसकी जिम्मेदारी का आभास कराए बगैर नदियों का संरक्षण और शुद्धिकरण संभव नहीं है। यह आंदोलन है, भले ही सरकारी कई योजनाए लाये वह सफल नहीं होंगी। हम जानते हैं कि समाज की सक्रिय भागीदारी के बिना कोई भी आंदोलन अपने लक्ष्य को नहीं पा सकता। इसलिए सरकार, प्रबुद्ध समाज को प्रयास करना चाहिए की वह नदियों को समाज से जोड़े। ताकि नदी संरक्षण की दिशा में एक बड़ी मुहिम की शुरुवात हो सके।

प्रख्यात पर्यावरणविद् स्वर्गीय महंत वीरभद्र मिश्र के शब्दों में इन नदियों के तट पर हर साल होने वाले वरुणा महोत्सव, तमसा महोत्सव, गोमती महोत्सव जैसे खर्चीले आयोजन कर सरकार अपने कर्तव्य को पूरा मान लेती है पर जब तक इन नदियों को बचाने के लिए कारगर मुहिम को जन आंदोलन का रूप नहीं दिया जाएगा तब तक नदियों को विनाश से बचाना संभव नहीं।

संदर्भ:

1. चातक गोविंद.(2006). पर्यावरण व संस्कृति का संकट. नई दिल्ली: तक्षशिला प्रकाशन.

2. शिवबहाल सिंह.(2014). विकास का समाजशास्त्र. जयपुर: रावत पब्लिकेशन

3. पाठक अ.(2015). WEBDUNIYA. जीवनदायिनी नदियों पर खतरे के बादल.

4. CENTRAL POLLUTION CONTROL BOARD. (2015). Water Quality of Rivers at Interstate Borders. New Delhi: CENTRAL POLLUTION CONTROL BOARD.

5. सिंह सत्येंद्र.(2009). गंगा. राजस्थान: तरुण भारत संघ.

[1] CENTRAL POLLUTION CONTROL BOARD. (2015). Water Quality of Rivers at Interstate Borders 20-32

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