भारतीय समाज में वृद्धावस्था : समय, समाज और स्थिति


यह देश भारत, जिसमे हम वर्तमान हैं और जिसे विश्व-गुरु के रूप में जानने, समझने तथा बताने का प्रयत्न करते हैं, यह हमारी अभिलाषा भी होती है कि संसार-संसृति में निवास करने वाला कोई अन्य व्यक्ति इस देश को उसी रूप में जाने, समझे और जब बात आये कभी तो इसी रूप में व्याख्यायित भी करे| इसके पीछे जो सबसे बड़ी वजह है वह इस देश की संस्कृति है, इस देश का अपना आदर्श है, मानव जीवन को सुन्दर सार्थक और सुरुचिपूर्ण वातावरण में पुष्पित, पल्लवित और संस्कारित करने के उद्देश्य से इस देश के ऋषियों, मुनियों और महापुरुषों द्वारा कल्पित, सृजित और निर्मित समाज का एक बड़ा योगदान रहा है| समाज, जो विभिन्न प्रकार के संस्थाओं, संगठनों एवं समूहों का समन्वित रूप है, जिनमे जीवन-यापन करते हुए सभी प्रकार के स्थिति-परिस्थिति को झेलना और सहना हम अपना कर्तव्य ही नहीं समझते, गर्व भी महसूस करते हैं, उन सभी सामाजिक संस्थाओं में परिवार की अवधारणा व्यवहारिक स्तर पर मानव द्वारा कल्पित सबसे सुन्दर और सार्थक परिकल्पना सिद्ध हुई है| यह कहना कि सामाजिक परिवेश में आज जीवन-मूल्य के जितने भी आयाम हैं कहीं न कहीं वे सबके सब इस परिवार के माध्यम से ही संस्कारित और प्रचारित हैं, किसी प्रकार का अतिश्योक्ति नहीं होगा| सत्यं शिवं सुन्दरं, वसुधैव कुटुम्बकम, आदि जितनी भी उक्तियाँ सामाजिक आदर्श की प्रतिष्ठापना करती हैं और मानव-कल्याण-हित विद्वानों, आचार्यों द्वारा जनसामान्य को सुझाई गयी हैं, वे सब इसी परिवार की देन हैं| परिवार विद्वानों द्वारा सुझाए गए अब तक के समस्त प्रतिमानों का आदर्श इसलिए भी माना जाता है क्योंकि मानव व्यावहारिक संसार में चलना यहीं से आरम्भ करता है| यहीं से उसे अनेक प्रकार के नीति सिखाए जाते हैं| रिश्तों के प्रति किसकी क्या भूमिका होनी चाहिए, सबका अलग अलग उत्तरदायित्व तय किया जाता है| सबके अलग अलग प्रतिमान निर्धारित किये जाते हैं| सबकी अलग अलग भूमिकाएँ स्पष्ट की जाती हैं| छोटे बड़े का भाव, आदर-सम्मान का भाव व्यक्ति के हृदय में यहीं से उत्पन्न किया जाता है| आदर्श, करुणा, क्षमा, याचना, दया, परोपकार आदि जितने भी मानवीय गुण हैं वे सबके सब मानव को यही से प्राप्त होते हैं| अब इसे समय का बदलाव कहें या परिवर्तन का तकाजा, उपर्युक्त समस्त पारंपरिक श्रोत जिनपर हम अब तक गर्व करते आए हैं, और जो परंपरा से सबको एक एक समान उपहार- स्वरुप मिलते आये हैं या तो वे ख़तम से हो रहे हैं, इतिहास के पन्नों में सिमटते जा रहे हैं अथवा मृतप्राय हो गए हैं|

संशय इस बात में भी नहीं होना चाहिए किसी को कि परिवार की जो स्थितियां कभी हमारे ह्रदय में गर्वानुभूति की सर्जना करती थी आज वे अपना पारंपरिक आधार खो चुकी हैं| हम दो हमारे दो की अवधारणा इस तरह से भारतीय सामाजिक परिवेश पर हावी होने लगा है कि तीसरे की उपस्थिति मात्र से हमारे अन्दर विचलन की-सी स्थिति पैदा हो जाती है| ऐसा प्रायः माना जाता है कि इस विडंबना की प्रमुख वजह वह औरत होती है, जो व्याह करके लाई जाती है| उसका वह नवीन आकर्षण ही पति को परिवार से अलग होने के लिए बाध्य करता है| पर क्या इस सच्चाई से बचा भी जा सकता है कि दोष उस पति का और उसके परिवार का भी उतना ही होता है, क्योंकि वे उसे ठीक से समझने की कोशिस ही नहीं करते| यह एक प्रचलित लोकोक्ति है कि “ताली एक हाथ से नहीं बजती|” दोनों हाथों के परस्पर सहयोग से ही ताली में ध्वनि-स्थिति का सृजन होता है| दरअसल, हमारे यहाँ संयुक्त परिवार की जो अवधारणा रही है वह बहुत ही जटिल और दुरूह रही है| हम कभी कभी जब पारिवेशिक-स्थिति-विशेष का जायजा लेने की कोशिश करते हैं तो प्रायः होता ये है कि एकपक्षीय निष्कर्ष निकालकर अपने समीक्षात्मक दृष्टिकोण पर प्रसन्न हो उठते है| आलोच्य विषय विल्कुल भी इतना सरल नहीं है कि किसी एक पक्ष के आधार पर निर्णय किया जा सके| यह प्रयास दो विन्दुओ में स्पष्ट किया जा सकता है|

(१)

ध्यान देने की जरूरत है कि समय तेजी से बदला है| समय-बदलाव के साथ साथ आज के स्थिति-परिस्थति के स्वरुप में भी व्यापक परिवर्तन हुए हैं| अब वह समय नहीं रहा कि सब गांवों में ही रहें| दिन भर किसी तरह से खा-पी-टहलकर समय गुजार ले जायें| यदि सुखपूर्ण जीवन की परिकल्पना को साकार करना है तो बाहर निकलना ही पड़ेगा| “देश की चोरी परदेश की भीख” कोई बहुत दिनों की कहावत नहीं है| यह आज के युवाओं की सोच है| यह सोच गलत भी नहीं है और बुरा भी नहीं है| पर इस सोच के सार्थक कदम का अनुसरण कितने व्यक्ति आसानी से कर पाते होंगे? इस मुद्दे पर गहन चिंतन की आवश्यकता है| एक समय वह था जब गाँव में कोई दो-चार ही परदेशी के रूप में हुआ करते थे| शादी-विवाह की भी अजीब स्थिति थी, यह किसी से छिपी नहीं है| कहीं अनमेल विवाह की स्थिति हुआ करती थी तो कहीं निर्धनता और आर्थिक तंगहाली की परिस्थिति| गाँव से निकलने के बाद परदेश में भी ऐसी सुविधाएँ कहाँ हुआ करती थी कि व्यक्ति कमाता और अपने साथ-साथ अपने पूरे परिवार का भरण-पोषण कर पाता| अब वे स्थितियां नहीं रह गयी हैं| दूसरे जीवन साथी के चुनाव में भी अब एक पक्ष की मनमर्जी न होकर दोनों पक्षों की सहमति आवश्यक हो गयी है| परिणामतः पति-पत्नी दोनों नौकरी के क्षेत्र में पदार्पण कर चुके हैं|

सच पूछा जाय तो पति-पत्नी के वनवास और माता पिता के प्रवास का दौर यहीं से सुरु होता है| जहां माता-पिता ग्रामीण परिवेश को छोड़ना अपनी तौहीनी समझते हैं| परिवार और परंपरा का विछोह समझते हैं वहीँ पति-पत्नी की मजबूरी ये हैं कि वे शहर छोड़कर गाँव जा नहीं सकते और यदि वे जाएँ भी तो किस आधार पर? कौन देगा उन्हें जीवन-यापन का दैनिक खर्च? कौन पढ़ायेगा उनके बच्चों को ? और वे जो माता-पिता गाँव छोड़ने के लिए विल्कुल भी राजी नहीं हैं, उनके दवा-दारू से लेकर खान-पान की जिम्मेदारी कैसे और कौन निभएगा? इस स्थिति पर यदि ध्यान से विचार किया जाय तो जहां पति-पत्नी की मजबूरी है, बेबसी है, लाचारी है, शहर का न छोड़ना और चाहकर भी माता-पिता के साथ जीवन के अनमोल क्षण न बिता पाना, वहीँ माता-पिता की अपनी जिद होती है, घर और परिवेश विशेष को न छोड़ने की| इस अर्थ में कि उनकी गृहस्थी, उनका समाज, उनके नात-रिश्तेदार उनसे बिछड़ जायेंगे, दूर हो जायेंगे| माता-पिता की अपनी विवशताएँ हैं तो पति-पत्नी की अपनी विवशताएँ हैं| बात जब आती है तो दोनों ही एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाते हैं| यह आरोप-प्रत्यारोप इन्हीं मात्र तक सीमित हो तो कोई बात नहीं| यह सम्पूर्ण समाज का विषय हो उठता है| समाज वह जो समझता कम और उछालता ज्यादा है| सारे युवा पथ-भ्रष्ट, आचार-भ्रष्ट, संस्कार-च्युत और अनैतिक, अव्यावहारिक तथा असामाजिक यहीं से हो उठते हैं जबकि सभी माता-पिता किसी भी स्थिति और स्वभाव से क्यों न हों यकायक प्रासंगिक, करुणामूर्ति, लावारिस, लाचार तथा असहाय के रूप में यहीं से विभूषित होने लगते हैं| आरोप-प्रत्यारोप के आवरण में क्षरण सम्पूर्ण पारिवारिक स्थिति की होती है| आगे चलकर यही वजह सामाजिक-विघटन का प्रमुख कारण सिद्ध होती है| समाज की समाजिकत्व और परिवार की परिपूर्णता अपने अक्षुण रूप में यथावत बनी रहे इसलिए अंततः समझौता यहाँ भी उस युवा-वर्ग को ही करना पड़ता है| क्योंकि प्रेमचंद ने “बूढ़ी काकी” कहानी में कहा है कि “बुढ़ापा बहुधा बचपन का पुनरागमन हुआ करता है|”

(२)

दूसरी स्थिति एक और यथार्थ का दिग्दार्शन कराती है| माता-पिता, जो अपने जीवन का एक एक पल हमारे पालन-पोषण से लेकर सेवा-सुश्रूषा तक अर्पित कर देते हैं| स्वयं के मान-सम्मान, सुख-सुविधाओं को त्यागकर दुःख, गम, विपदा का वरण कर लेते हैं, इसलिए कि हमारा जीवन ठीक तरीके से गुजरता जाए| समय-समाज के झंझटों में ही न सिमटकर पढ़-लिखकर हम अनवरत विना किसी रुकावट के उन्नति-पथ पर चलते जाए| पर जब हम उस लायक होते हैं, उन्हीं माता-पिता के एहसानों को, उनके द्वारा किए गए त्याग और बलिदानों को विस्मृत कर बैठते हैं| उनका साथ, उनका प्यार, उनकी शिक्षाएं, उनका आँचल सबकुछ हमारे लिए अप्रासंगिक सा-हो उठता है| जिनकी उपस्थिति के लिए हम बचपन से लेकर युवापन की दहलीज पर पहुंचने तक व्याकुल रहते हैं| जिनका आँचल, जिनकी छाया मात्र छोड़ने की परिकल्पना भर से हम विचलित हो उठते हैं, जो अपना सम्पूर्ण जीवन परिवारिक सुख का आनंद न लेने के बजाय खेत, खलिहानों, कंपनियों एवं फैक्टरियों में व्यतीत कर जाता है कि हमे किसी प्रकार के आर्थिक परिस्थिति का सामना न करना पड़े वही माता-पिता यकायक हमारे लिए अप्रासंगिक क्यों हो उठते हैं? क्या इसलिए कि अब वे पैसा कमाने के काबिल नहीं रह जाते? अब वे अपना कार्य स्वयं नहीं कर पाते, दूसरों पर निर्भर हो जाते है? या फिर इसलिए कि अब उनमें वह शील, वह तेज, वह सहनशीलता नहीं रह पाती? ज्ञान से, बुद्धि से, समय-समाज में चल रहे नवीन आचरणिक प्रवृत्ति से समझौता कर पाने में उनकी पारंपरिक सोच उनका साथ नहीं दे पाती, इसलिए? अथवा इसलिए कि उगते सूरज से लेकर ढलते शाम तक की सम्पूर्ण उम्मीदें वे अपने संतति को सौंप बैठते हैं?

एक माली अपने बगीचे में बृक्ष इसलिए लगता है कि वे फले, फूले, और अपने सुन्दर रूपाकर्षण के माध्यम से उसके साथ-साथ सम्पूर्ण समाज को आनंद और खुशबू से आक्षादित करे| पर जब वही वृक्ष उसकी इस अभिलाषा को पूर्ण करने के बजाय एक और मार्ग का अनुसरण कर बैठे, फल और फूल देने के बजाय बंजर हो जाए फिर उसकी आशाओं को, उसकी आकांक्षाओं को कितनी क्षति पहुंचती होगी? कितना दुःख होता होगा उसे? यह वही जानता है, जिसने उस वृक्ष को पाला, पोषा और बड़ा किया है| उसे नहीं जो उसके हांड, मांस और खून द्वारा पोषित होकर उस बंजर भूमि की शोभा बढ़ाता है| वह अपना पूरा जीवन ज्येष्ठ की तपती दुपहरी, माघ-पूस की कडकडाती ठण्ड और असाढ़, सावन की मूसलाधार बारिस में गुजार ले जाता है, लेकिन न तो उस वृक्ष की परवरिश में कोई कमी करता है और ना ही तो उसकी सुन्दरता में किसी प्रकार का आंच आने देता है| यही स्थिति समाज में माता-पिता की होती है| वे लाख परिस्थितियों में घिरे होने के बावजूद अपने संतान की सुख-सुविधाओं का ख्याल रखते हैं| खिलाने-पिलाने से लेकर पढ़ाने-लिखाने तक का पूरा बंदोबस्त करते हैं| अपने सुवर्णमयी काया को सूर्य की तपती अग्नि के सम्मुख इसलिए तपाकर कंकड़ीले पत्थर के रूप में परिवर्तित कर देते हैं कि चाँद की-सी शीतलता उनमें बराबर बनी रहे| यही चाँद जब बड़ा और तेजोद्दीप होता है सूर्य के उस परिवर्तित रूप को देखना तक अपनी तौहीनी समझता है| उसके साथ व्यतीत किये जाने वाले एक एक पल को अपने जीवन की सबसे विसंगतिपूर्ण समय के रूप में चिह्न्हित करता है|

ऐसा अक्सर देखा उन्हीं को जाता है जो पढ़-लिखकर किसी बड़े ओहदे को प्राप्त कर लेते हैं| माता-पिता यदि ग्रामीण-अंचल में रहे हैं, किसानों का जीवन जिए हैं, यह उन पढ़े लिखे सज्जनों के लिए और भी अभिशाप बन जाता है| भला वे अफसर और उनके माता पिता गाँव के अनपढ़, गंवार| क्या कहेगा उनका वह समाज जिसमे वे रहते हैं| जो उनको बड़ा आदमी समझते हैं| इज्जत की दृष्टि से पलकें बिछाए रखते हैं| यदि यह जान जाएगें कि इनके जन्मदाता निरा अनपढ़, गंवार, गंवई परिवेश से हैं फिर इज्जत में तो बट्टा लगने से रहा| यह उनकी अनभिज्ञता ही होती है कि यह यशोगान उन्हीं के सौभाग्य से प्राप्त हुआ है| इनकी जिन इच्छाओं के प्रति युवा-ह्रदय में क्षोभ उत्पन्न होता है, उन्हीं इच्छाओं को वे सहर्ष स्वीकार कर पूर्ण किया करते थे| माता-पिता के प्रति संतान की ये उपेक्षा-दृष्टि समाज में एक विकट और दयनीय परिस्थिति को जन्म देती है| इस परिस्थिति से उपजे यथार्थ का आभाष उन्हें तब होता है, जब माता-पिता का आवरण उनके समय-स्वरुप पर प्रतिस्थापित होता है| विडंबना की बात तो ये है कि समाज में इन स्थितियों का सूत्रपात करने वाले ही आगे चलकर सामाजिक-विघटन का रोना रोते हैं|

पूर्वजों को लेकर वर्तमान समय में जो वाद-संवाद की स्थिति पैदा हुई है, वह किसी एक समय, एक स्थिति या एक परिवेश मात्र की उपज नहीं है, इस वस्तुस्थिति का जिम्मेदार आज की सम्पूर्ण सामाजिक संरचना है| आधुनिकता के बाद उत्तराधुनिकता की उपभोगप्रिय व्यक्तिवादी स्वार्थलिप्सा में संलिप्त परंपरा विरोधी असामाजिक प्रवृत्तियों से असंयमित अंधी मानसिकता ने हमारे मानसिक और बौद्धिक स्थिति को पंगु बना दिया है| वर्तमान का आग्रही और अतीत को पूर्ण रूप से नकार चुकी युवा पीढ़ी भविष्य के किस स्थिति और किस मार्ग का अनुसरण कर रही है, यह एक गहरे अर्थबोध का विषय है| यदि इस पर समय रहते गंभीरता स न विचार किया गया तो आने वाले दिनों में परिवार और समाज नाम की कोई स्थिति संभव भी होगी, यह कहना और सोचना खुली आँखों स्वप्न देखने के बराबर होगा| यही स्थिति यदि अनवरत वर्तमान रही तो दो राय इसमें भी नहीं है कि क्या पता आने वाले समय में हर गली अनाथालय और प्रत्येक चौराहा वृद्धाआश्रम के रूप में नजर आये|

अनिल कुमार पाण्डेय

शोधार्थी, हिंदी-विभाग

पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़

१६००१४ | मो० ८५२८८३३३१७

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