मन्नू भण्डारी की आत्मकथा में दाम्पत्य बोध


एक कहानी यह भी किसी कहानी के सामानान्तर एक कहानी है। किसी के ( सामानान्तर कहानी ) साथ चलने वाली है। मन्नू भण्डारी राजेन्द्र यादव के साथ चलने वाली है। मन्नू भण्डारी राजेन्द्र यादव के विषय में लिख रही है कि ( अपनी इस आत्मकथा में दो लेखको के दाम्पत्य जीवन में बंधने के बाद किस तरह की यंत्रणा झेली है इसका उन्होंने काफी विस्तृत रुप से चित्रण किया है ) विवाह के पश्चात् राजेन्द्र यादव का सामानान्तर जिन्दगी जीने का फलसफा उन्हें भौचक्का कर गया, जबकि उन्होंने ये सोचा था कि एक पेशे के दो लोगों के साथ रहने से उनके लेखन में इजाफा ही होगा। मन्नू जी के शब्दों में “ पर जिन्दगी शुरु करने के साथ ही लेखकीय अनिवार्यता के नाम पर राजेन्द्र ने सामानान्तर जिन्दगी का आधुनिकतम पैटर्न थमाते हुए तब कहा कि देखो छत जरुर हमारी एक होगी, लेकिन जिन्दगियाँ अपनी-अपनी होगी। बिना एक दूसरे की जिन्दगी में हस्तक्षेप किये।”1 अगर देखा जाय तो कथाकार राजेन्द्र यादव हिन्दी साहित्य में आधुनिक कथा साहित्य की श्रृखला में अग्रणी स्थान पर उभरते नक्षत्र थे और हैं।

दाम्पत्य जीवन से संबंधित प्रेम से इतर कई मुद्दे उभर कर हैं। यह आत्मकथा महानगरीय जीवन पर आधारित है इस आत्मकथा की अनूठी विशेषता है जो नगरीय परिवार की आत्मकुंठाओं, हीनताओं आदि से भरे खट्टे एवं कड़वे जीवन का चित्रण प्रस्तुत करती है। आधुनिक विघटित होते समाज का संशयग्रस्त अतृप्त और हीनताओं से अक्रान्त एक सर्वव्यापी मानव यहाँ एक परिवार के परिवेश में टूटता सा दिखाई देता है। मन्नू भण्डारी और राजेन्द्र यादव मुख्य दम्पति के रुप में हैं साथ ही अन्य दाम्पत्य जोड़ियों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

यहाँ विवाह नामक सामाजिक संस्था भी न केवल विघटित होती बल्कि एक नकार से उभरती हुई दिखाई देती है। जैसे वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाय तो नगरीयकरण का स्वरुप पारिवारिक संबंध, वैवाहिक संबंधों के परिवर्त्तन, विवाह संस्था का नाकार, दाम्पत्य जीवन का द्वन्द्व तो दूसरी तरफ फशनपश्ती में अकेलापन, संत्राश, घुटन यांत्रिक जीवन सांस्कृतिक मूल्यों का विघटन अर्थ के पीछे भागता मनुष्य आदि अनेक महानगरीय जीवन की प्रवृत्तियों का चित्रण है।

राजेनद्र यादव के लिए यदि यह कहा जाय इस आत्मकथा का मुख्य स्वर टूटन ही है तो अतिशयोक्ति न होगी। कथा स्थितियों में संदर्भ बहुलता से है जहाँ टूटने की व्यथा भोगने की विकल्पता निश्चित होती है। टूटन की स्थिति से बचने का प्रयास करते हुए विघटन की प्रक्रिया का वे बड़ी तीब्रता से बोध कराते हैं। यह विघटन व्यक्ति परिवार और समाज तीनों ही स्तरों पर बहुविध प्रसंगों में रेखांकरत हुआ है। जिसके मूल में मूर्त अमूर्त कई कारण हैं। राजेन्द्र यादव के दाम्पत्य बिखराव के मूल में पनपती संतान समस्या को व्याख्यायित ही नहीं करती अलगाव की वेदना को सहते पिता के वात्सल्य भाव को भी रेखांकित करती है। बच्ची रचना से प्यार तो बहुत था राजेन्द्र यादव के शब्दों में “ मेरी सिर्फ एक बेटी है। वह बहुत समझदार है। बचपन से ही वह अपनी पढ़ाई लिखाई के लिए काफी सिंसियर है। फिर भी एक जगह ---वह परिपक्व मस्तिष्क की है जो भी करेगी, ठीक ही करेगी।”2 एक आम पिता अपने बच्चों के चलने फिरने से लेकर समाज में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है, पर राजेन्द्र यादव जिम्मेदारी निभा नहीं पाते। ऱाजेन्द्र यादव एक पिता के साथ-साथ किसी के पति तथा रचनाकार भी हैं। पति-पत्नी के संबंध को देखा जाय तो कोई भी पत्नी नहीं चाहेगी कि उसका पति बँटा हुआ पति हो। दुर्भाग्य से यादव जी तीन हिस्सों में बँटे हुए थे, एक रचनाकार या विचारक के रुप में, एक जिम्मेदार पिता के रुप में और एक पत्नी के पति के रुप में। पत्नी की भी हो परम्परावादी, आधुनिकता या खुद बाहर काम करने वाली, उसे बँटा कटा या खण्डित व्यक्तित्व वाला पति नहीं चाहिए। वह सम्पूर्ण मानकर ही चलता है कि पत्नी के लिए एकमात्र परमेश्वर वही है।

कोई भी लेखक, रचनाकार संगीतज्ञ कवि या किसी भी क्षेत्र में विशिष्टता प्राप्त व्यक्ति सर्वप्रथम मनुष्य होता है, इसके बाद ही कुछ और। मनुष्य की सृजनशीलता और व्यक्तित्व, दोनों के आधार पर ही उसकी विशिष्टता तय की जाती है। ऐसे ही एक विशिष्ट चर्चित कथाकार, उपन्यासकार विचारक और सम्पादक राजेन्द्र यादव। कई दशकों से भी यादव जो हिन्दी कथा मासिक हंस का संपादन और प्रकाशन कर रहे हैं। आर्थिक संकटों से जूझते हुए भी ( हंस ) को जीवित ही नहीं रखा बल्कि सर्वोपरि शिखर स्थान पर ला खड़ा किया है। पत्रिका के माध्यम से कई नये रचनाकारों को पहचान भी दी है। आज जबकि बड़े-से बड़े संस्थानों के वरदहस्त पत्रिकाएँ भी एक-एक कर ध्वस्त होती जा रही है। ऐसे में हंस का निरन्तर प्रकाशन, वह भी बिना किसी बड़े संस्थान के सहयोग के या फिर बिना किसी खास विज्ञापन की सुविधा के निश्चित ही सराहनीय है, दुस्साहस कहा जाएगा राजेनद्र यादव का। पति पत्नी बनते ही संबंधों और जिम्मेदारियों का एक खास किस्म का सामाजिक संस्कार मिल जाते हैं, और वैवाहिक परम्परा रुपी कवच में सुरक्षा महसूस करते हैं, भविष्य और सुरक्षा का खतरा पुरुष से अधिक स्त्री को होता है। इन्हीं दबावों के कारण पति-पत्नी के रिश्ते बहुत बदले हैं।

राजेन्द्र के शब्दों में “ हम जिस मानसिकता से आए थे उसके अनुसार हमें प्रेमिका के रुप में घर-घर से स्वतंत्र मगर पत्नी के रुप में एक व्यक्तित्वहीन, समर्पित स्त्री चाहिए थी जो अपने को असर्ट न करें।”3 पुरुष अक्सर चाहते हैं कि पत्नी अपने पति के प्रति पूरी तरह समर्पित हो। उनका अपना कोई व्यक्तित्व नहीं हो। अपने पति के लिए ही उन्हें सारा संघर्ष सारा परिश्रम और त्याग देना होना चाहिए। एक प्रकार से अपने पति को बनाने में पत्नी की निर्णायक भूमिका होनी चाहिए। दरअसल मर्दवादी मानसिकता की सोच एक समर्पित किस्म की सेविका या परिचायिका की जरुरत होती है। स्वतंत्र व्यक्तित्व वाली बराबर की मित्र दूर रहकर ही बनी रह सकती है। वैवाहिक संबंधों के बावजूद एक मित्र भी हो इस तरह के सामाजिक संस्कार हमारे नहीं थे। बौध्दिक रुप से जरुर पुरुष वर्चस्व को कायम रखने हेतु अपनी पत्नी को चरणों तले दासी बनाकर रखना चाहते हैं पर सामाजिक स्त्री पुरुषवादी मानसिकता का विरोध कर सुरक्षित हो रही हैं, पुरुषों की धारणा है कि पत्नी सीमित स्वतंत्रता में रहे उनकी प्रतिभा को उजाकर करने में ही जीवन कृतार्थता महसूस करें। पुरुष पत्नी को उनकी उन्नति प्रतिभाशाली को बढ़ाने के वजाय अपने को आघात महसूस करते हैं। उधर स्त्रियों की चली आती मानसिकता है सुख और सुरक्षा के लिए समझौता पुरुष से भय और अपनी कमजोरियों को स्वीकारने का फायदा उठाकर मनमानी करता है अगर वह घर से निकाल दी जाएगी उनके चरित्र पर लांक्षण लगेंगे कहाँ मुँह दिखाएँगी। यह भय स्त्री को पुरुष के हर अत्याचार को सहने का तर्क देता है। हालाँकि आर्थिक रुप से स्वतंत्र नहीं हैं। आदमी बच्चों का वास्ता दाकर उसकी सामाजिक असुरक्षा का खाका खींचकर और शारीरिक कमजोरियों का बखान करके जैसे चाहता हैउन्हें वैसा ही नचाता है। अगर कोई गुलाम अपने पर होने वाले अत्याचारों का प्रतिरोध नहीं करता वह भी अपराध का भागीदार होता है। वह औरत के भीतर इस संस्कार को ठोंक –ठोंककर बैठा देना चाहता है कि मैं जो कुछ भी कर रहा हूँ तुम उसी की हकदार हो, तुम्हारी भलाई इसी में निहित है।

इस दृष्टि से देखा जाय तो मन्नूजी तथा राजेन्द्र यादव के बीच मतभेद होंगे उसमें दोनों ओर धोखे की भावना बनी रहती है। क्योंकि यदि पत्नी है तो उसे जो स्टीरियों टाइप पति बताया जाता है, वैसा उसको पति में नहीं मिलता। उधर पति को उस तरह की पत्नी नहीं मिलती। इसलिए मतभेद होते हैं दूरियाँ होती हैं, टकराहटें होती हैं। क्योंकि जमाना बदल गया है स्त्री शिक्षित होने के कारण वह पुरानी व्यक्तित्वहीन पत्नी से अलग है। इस अर्थ में विवाह संस्था भयानक संकट से गुजर रही है। और सवाल उठ रहे हैं कि परिवार या विवाह कीवहमें जरुरत भी या नहीं।

यौनाचार के विषय में बात करें तो राजेन्द्र यादव इस घिसे पीटे हिन्दी साहित्य से आजिज आ गए हैं। वे मानते हैं कि हिन्दी की गोबर मिट्टी में पिछड़ेपन की बदबू से बजबजाते परिवेश की एक तरफ घिनौनी तस्वीर है और दूसरी तरफ “अपने छायावादी संसार में आंतरिक सुकुन खोजते निरुपाय बुध्दिजीवी अपनी-अपनी पुस्तकों और गोष्ठियों में छटपटातें अकेलों की यह बेचैन भीड़,आपस में संवाद खोजती और फिर कछुए की तरह वापस खोल में सिमटती हुई।”4 हर आदमी नर है और औरत मादा इनके बीच सिर्फ यौनिकता का रिश्ता है। अपनी मां की समगी बहन उस नर के लिए मादा है। यही है राजेनद्र यादव की क्रांतिकारी दृष्टि की विरासत । उन्होंने स्त्री विमर्श दलित विमर्श के जरिये प्रभुत्वशाली और परम्परावादी विचारधारा को चुनौती दी है। रुढियों को तोड़ने का माद्दा राजेनद्र यादव में है। उनकी नकीरवादी मान्यता इन दोनों विमर्शों के केन्द्र में है। स्त्री मुक्ति विमर्श का सबसे बड़ा सवाल है देह मुक्ति का। अपने साथ उसे पुरुष को भी मुक्त करना होगा अभी तो स्थिति यह है कि पहले उसे मर्द अपनी सम्पत्ति की तरह इस्तेमाल करता था। किसी ने का भी है कि गलत समय में गलत जगह पैदा हो गए। “ईमानदारी और साफगोई की बात यह है कि दूसरे जहाँ अपनी हिपोक्रैशी के तहत इसे छुपाते फिरते हैं। राजेनद्र जी नहीं छुपा पाते। संभव है तालस्ताय हेमिग्वें जैसे यूरोपीय लेखकों का खुलापन उनका आदर्श हो। इसलिए मुझे यह भी लगता है कि वे गलत समय में गलत जगह पैदा हो गए अब हो गए तो हो गये, ये क्या जा सकता है।”5

अन्ततः पुरुष जीवन प्रक्रिया की जटिलता ने उसे दोहरा जीवन जीने के लिए विवश किया है। उसका एक एकमात्र उद्देश्य अकेलेपन को काटना है और जिन्दगी को खुशहाल बनाना ही होता है। अकेलेपन को काटने के लिए जब व्यक्ति एक दूसरे को हथियार बनाता है वह किसी न किसी तरह गुंथता जाता है। युगीन विघटन ने व्यक्ति को भी आधा अधूरा बना दिया है। इससे उनके अंदर की रिक्तता का ही आभास होता है। अक्सर पति पत्नी में देखा जाता हैकि पत्नी पति से भी समायोजन और समझौता करने की अपेक्षा रखती है। संबंध विच्छेदन पत्नी की तरफ से होता है क्योंकि वह एक दबंग आत्मनिर्भर महिला है। इस समानता के बाव ने खोखले दाम्पत्य महल को ढहाया ही है। दाम्पत्य की सफलता के लिए लचीलापन आवश्यक होता है। प्रेम संबंधों में आए भावनात्मक पथराव या विघटन में (कोई भी बाह्य संदर्भ परिवेश या मूल्य कारण नहीं हैं) बल्कि व्यक्ति के भीतर ही कुछ ऐसी दरकन आ गयी कि वह किसी से पूर्णतः जुड़ नहीं पाता या जुड़कर जिन्दगी भर साथ निभाने की प्रतिबध्दता पर अमल नहीं कर पाता सेपेरेशन ही उनके पास तनाव मुक्ति का एकमात्र विकल्प रह जाता है। प्रेम को स्वीकारने का तात्पर्य है अकेलेपन को गले लगाना क्योंकि मानव नियति प्रेम के अकेलेपन में ही गति पाती है। दोनों ही अपने संबधों को स्थायीत्व देना चाहते हैं। दूर रहने पर एक दूसरे के लिए भावुकतापूर्ण आवेगों को महसूस करते हैं, मिलने के लिए व्याकुल होते हैं जीवन की भी यही विडम्बना है कि मूल सत्य या गहराई से व्यक्ति इतना अक्रान्त है उससे हटकर ऊपरी सतह में ही रमता है।

निष्कर्षतः राजेनद्र यादव एक अच्छे पिता, पति तो नहीं बन सके लेकिन, पिता की जिम्मेदारी दायित्व के साथ-साथ एक पति का दायित्व का वहन भी ठीक से किए इन सब का दायित्व वहन करने के साथ-साथ वे एक अच्छे रचनाकार तो साबित हुए ही। उनकी सोच वर्त्तमान समय से दो जेनेरेशन आगे की है। वे आम लोगों की सोच से भी आगे की है और आज हमारे बीच देदिब्यमान हैं।

संदर्भ ग्रन्थ – 1. एक कहानी यह भी, मन्नू भण्डारी। पृष्ठ संख्या 119, पहला संस्करणः 2007, दूसरा संस्करणः 2009। प्रकाशक- राधाकृष्ण प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड 7/31, अंसारी मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली- 110002. शाखाएँ अशोक राजपथ, साइंस काँलेज के सामने, पटना-800006,पहली मंजिल, दरबारी बिल्डिंग, महात्मा गांधी मार्ग, इलाहाबाद-211001.

2. एक कहानी यह भी मन्नू भण्डारी। पृष्ठ संख्या 214. पहला संस्करणः 2007 दूसरी आवृतिः 2009 प्रकाशक राधाकृष्ण प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड 7/31, अंसारी मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली- 110002.

3. जवाब दो विक्रमादित्य राजेन्द्र यादव, पृष्ठ संख्याः 218, वाणी प्रकाशन 21-ए, दरियागंज, नयी दिल्ली द्वारा प्रकाशित। प्रथम संस्करणः 2003(c) लेखकाधीन विनायक कम्प्यूटर्स, दिल्ली- 110032 द्वारा शब्द संयोजित। नागरी प्रिंटर्स, दिल्ली- 110032 में मुद्रित।

4. संवेद (पत्रिका)- 54, वर्ष- 4 अंक- 7 जुलाई, 2012 सम्पादक, किशन कालजयी सहायक सम्पादक राजीव रंजन गिरि पुखराज जौगिक सम्पादकीय सहयोग नीरु अग्रवाल प्रबन्ध सम्पादक कुमकुम कुमारी सम्पादकीय सम्पर्क एस.3/78-79 सेक्टर-16, रोहिणी, दिल्ली- 110089.

5. पाखी सृजन की उड़ान वर्षः 03,अंक 12, सितम्बर 2011. संपादक प्रेम भारद्वाज प्रसार प्रबंधक अमित कुमार पृष्ठ सज्जा मान सिंह टनवाल। प्रकाशक इडिपेंडेंट मीडिया इनिशिएटिव सोसायटी बी-107, सेक्टर-63, नोएडा-201303,गौतमबुध्द नगर, उत्तर प्रदेश।

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