मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यासों में ग्रामीण यथार्थ डॉ. शशि शर्मा


समकालीन हिन्दी उपन्यासकारों‍‍ में मैत्रेयी पुष्पा एक बहुचर्चित और जाना-पहचाना नाम है । ‘बेतवा बहती रही’, ‘इदन्नम’, ‘चाक’, ‘झुला नट’, ‘अल्मा कबूतर’, ‘अगनपाखी’, ‘विजन’, ‘कही ईसुरी फ़ाग’ आदि इनके प्रमुख उपन्यास है । ‘इदन्नम’ उपन्यास के द्वारा वे एक सशक्त उपन्यासकार के रूप में पहचान बनाती है । उनके उपन्यास उनके प्रामाणिक अनुभव की प्रतिक्रिया है । ग्रामीण पृष्ठभूमि को आधार बनाकर मैत्रेयी पुष्पा ने उपन्यास लिखे हैं । उनके प्राय: उपन्यासों की पृष्ठभूमि में ब्रज प्रदेश और बुन्देलखण्ड का ग्रामीण जीवन अपनी तमाम विद्रूपताओं और विसंगतियों के साथ मौजूद हैं । आजादी के उपरांत भी ग्रामीण समाज में कोई विशेष बदलाव देखने को नहीं मिला । रूढ़िवादिता, जातिगत-वैषम्य, स्त्री शोषण, अशिक्षा, अंधविश्वास जैसी पतनोन्मुख स्थितियों में ग्रामीण समाज आज भी जकड़ा हुआ है जिसकी वजह से विकास की गति अत्यन्त धीमी पड़ गई

है । परंपरागत सोच और दृष्टि को परिवर्तित कर नई प्रगतिशील सोच को अपनाने में ग्रामीण समाज हिचकता है । ऐसा नहीं है कि भूमंडलीकरण, शहरीकरण, आधुनिकीकरण का प्रभाव ग्रामीण समाज पर नहीं पड़ा है । इन सब के प्रभावस्वरूप अधिकतर भोगवादी मानसिकता का विस्तार ही हुआ है।

मैत्रेयी पुष्पा ने अपने उपन्यासों में ग्रामीण जीवन का रेशा-रेशा उघाड़ दिया है । चोर-डाकुओं के भय से ग्रामीण समाज आज भी आक्रांत है । पुलिसों के होने के बावजूद सुरक्षा-व्यवस्था का नामोनिशान नहीं है । ‘बेतवा बहती रही’ उपन्यास में लेखिका ने ग्रामीण समाज में व्याप्त सुरक्षा-व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है । उदय जब उर्वशी को लेकर सिरसा पहुँचता है, तब तक काफ़ी रात हो चुकी होती है । उनके कदमों की आहट से ग्रामीणों में भय और आतंक छा जाता

है । लेखिका लिखती है - “ धीरे-धीरे अच्छी-खासी जगार पड़ गयी, रात के समय आये राहगीरों से उठी उथल-पुथल । क्या जाने कौन हैं ? लोग चौकन्ने हो उठे । गाँव-पुरवा का सुरक्षा-रहित वातावरण। अपने दम पर दस्यु-दल से जुझता हुआ जियें तो भाग्य का खेल ! मरे तो समय की गर्दिश ! पुलिस-पहरे सब व्यर्थ ।"1

ग्रामीण समाज जातिगत कट्टरता से इस कदर ग्रसित है मानो जातिगत भेदभाव से मुक्त होते ही उनका अस्तित्व खतरे में आ जाएगा । ‘इदन्नम’ उपन्यास की बऊ के माध्यम से लेखिका ने इस कुरीति से ग्रस्त मानसिकता का बखूबी अनावरण किया है । बऊ जाति- पाति को मानती है -“ यहाँ तो रीति रसम ही अलग हैं । शहरों में कुछ भी होता रहे, अंग्रेजी पढ़े लोग न मानें जाति-बिरादरी, पर अपने गाँव-पुरवों में ऐसी अनीत नहीं है अभी ।/ आज भी बसोर बड़ी जात के कुएं पर नहीं

चढ़ते । नीचे कीचड़-काद में बसोरिनें गगरी टिकाए बैठी रहती हैं । फ़ुरसत पड़ने पर भरे जाते हैं उनके घैला-गगरी ।"2

मैत्रेयी पुष्पा के कई पात्र जैसे ‘इदन्नम’ उपन्यास के दादा और मन्दाकिनी, ‘बेतवा बहती रही’ का उदय आदि इस भावना को मिटाने प्रयास करते हैं । ‘इदन्नम’ की बऊ जहाँ जाति-पाति की प्रबल समर्थक है, वही दादा इस सामाजिक विषमता को जड़ से उखाड़ने के लिए कृतसंकल्प है । गनपत के शब्दों में - “ तुम देखती नहीं बऊ, ब्याह-कारज तक में चमरटोला की पंगत सबसे पहले

बिठाएंगे । और फ़िर उन्हीं के ऐंगर लोधी-कुरमी बैठ जाते हैं । यादव, छ्त्री और संग-संग पुजारी महाराज भी !"3

जातिगत अस्पृश्यता ग्रामीण समाज के विकास को अवरूद्ध कर देता है । ‘बेतवा बहती रही’ उपन्यास में कामता काका के प्रसंग को उठाकर उपन्यासकार ने हमारी ओछी मानसिकता पर प्रहार किया है । जब अस्पृश्य जाति के कामता काका रमतूला बजाते हुए बेहोश हो जाते हैं तब उदय उन्हें उठाकर मन्दिर के पुजारी की खटिया पर लिटा देता है और दौड़कर पुजारी के घर से लोटा-भर पानी लाकर कामता कक्का पर पानी के छीटॆं मारने लगता है । कामता काका के जाने के उपरान्त पुजारी महाराज खटिया पर गंगाजल छिड़कते हैं ताकि खटिया शुद्ध हो जाये । सवर्णों द्वारा निर्मित पवित्रता का यह मानदंड असल में मानवीय मूल्यों का हनन है । सजीव इंसान जन्म लेते ही विभिन्न जातियों में वर्गीकृत हो जाता है और निर्जीव खटिया, लोटा आदि निम्न जाति के स्पर्श मात्र से अपवित्र । विचारणीय तथ्य यह है कि गंगाजल छिड़कने मात्र से यदि निर्जीव खटिया शुद्ध होकर सवर्ण के लिए उपेक्षित नहीं रह जाती है तो फ़िर शुद्धिकरण की इस प्रक्रिया से सजीव मनुष्यों को क्यों उपेक्षित रखा जाता है । क्या शुद्धिकरण की यह प्रक्रिया सजीव मनुष्यों पर लागू नहीं हो सकती है ? उनके उपन्यास इस प्रश्न पर गम्भीर विचार की मांग करती है ।

अशिक्षा, परंपरागत रूढ़ियों के प्रति अन्ध श्रद्धा और प्रगतिशील सोच के अभावस्वरूप ग्रामीण समाज से जातिगत भेदभाव को दूर करने के तमाम प्रयास विफ़ल हो जाते हैं । शिक्षा के प्रचार-प्रसार से इन कुरीतियों को खत्म किया जा सकता है परंतु विडंबना यह है कि जातिगत भेदभाव की चरम स्थिति शिक्षा संस्थानों में ही देखने को मिलती है । ‘चाक’ उपन्यास के मास्टर नेंकसेराम खटिक जाति के होने की वजह से ग्रामीणों की उपेक्षा का शिकार होते हैं । उनका तबादला कर दिया जाता है । ग्राम्य समाज में यह धारणा कि सवर्ण ही सही शिक्षा दे सकते हैं क्योंकि शास्त्र में सवर्ण को बुद्धिमान घोषित किया गया है, अपनी जड़ें गहरी कर चुका है ।

मैत्रेयी पुष्पा ने अपने कई उपन्यासों में समकालीन शिक्षा संस्थानों का जायजा लिया है । शिक्षा संस्थानों में अनुसूचित जाति के मेधावी छात्रों के प्रति उपेक्षा और अनादर का भाव निरन्तर बढ़ता ही जा रहा है । अनारक्षित कोटे में स्थान पाने वाले अनुसूचित जाति के छात्र भृगुदेव को डाक्टरी की पढ़ाई के दौरान कई तरह की यातनाओं से गुजरना पड़ता है । मन्दा को लिखे गए पत्र में वह अपनी आपबीती व्यक्त करता है -“ इसी तरह तिरस्कृत रहना है तो पढ़कर भी क्या होगा ? दलित दर्जे से एक भी सीढ़ी ऊपर चढ़ने की आज्ञा न अनपढ़ को है, न पढ़े-लिखों को ।/... विद्या, शिक्षा आदमी को पशु से अलग करती है, ज्ञान उसको ब्रह्म के पास पहुंचाता है तो फ़िर यहां अपवाद क्यों ? /.. शिक्षा का नतीजा मैंने देख लिया था,..... मेरे कारण या मनुस्मृति के कारण ? जहां शूद्रों को पढ़ने का अधिकार नहीं !/... लेकिन गाँव के मास्साब ने तो सिखाया-बताया था कि गुरू की जाति का धर्म-कर्म केवल विद्यादान करना होता है अर्थात सब तरह से गुरू ।"4

मैत्रेयी पुष्पा का बुन्देलखंड के ग्रामीण परिवेश के साथ आत्मिक जुड़ाव है । उसकी दुर्दशा उन्हें भीतर तक पीड़ा देती है । अपनी पीड़ा को वे ‘चाक’ उपन्यास के पात्र श्रीधर के माध्यम से अभिव्यक्त करती है -“ गाँव ऐसी ही तो आत्मा है जिसके भाग्य में विनाश की ओर जाना लिखा है ।"5

राजनीतिक वर्चस्व से गाँवों की स्थिति सुधरने के बजाए निरंतर बिगड़ती जा रही है । आर्थिक, सामाजिक, न्यायिक, शिक्षा आदि सभी क्षेत्र राजनीतिक प्रभाव से ग्रसित है । समाज के ये कर्णधार समाज का विकास न करके विनाश करने में व्यस्त है । उनके सारे कृत्यों के केन्द्र में निजी स्वार्थ निहित है । इन्हीं कारणों से मैत्रेयी पुष्पा ‘वोट संस्कृति का पुरजोर विरोध करती है । ‘इदन्नमम’ उपन्यास में दादा के माध्यम से वह अपने विचारों को जाहिर करती हुई चुनाव-व्यवस्था की विसंगतियों को उजागर करती है -“ वोटों के कारण पार्टीबन्दी होती है गांव में । बस्ती का विभाजन होता है ।... और चुनाव के दिन मौहर ठोंक के कागज घोपि आए मतपेटिका में । कर दिया पीठ पर वार । काढ़ लिया बदला ।/ न मीत का पता, न बैरी का । ऊपर से भले ही भले । मिठबोला चुनाव हुआ यह ? ”6

राजनीति वास्तव में छलनीति है । इसमें जो जितना पारंगत होगा, सिक्का उसी का चलेगा । यही कारण है कि हर राजनेता का दो चेहरा होता है । एक चुनाव पूर्व का भोला-भाला, कर्तव्यपरायण, जन-निष्ठावान चेहरा और दूसरा चुनाव पश्चात का घोर स्वार्थी, कर्तव्यविमुख, निज निष्ठावान चेहरा - “ जब तक हम एक बात को समझ पाए, तब तक तो हमारे नेता लोग चार पहेलिया और धर देते हैं हमारे सामने । वह भी ऐसे, जैसे कुनैन को शक्कर में लपेट दिया हो । सरकार और विपक्षी दलों का गोरखधन्धा मछेरे का जाल-सा फ़ैला है । कहा-कहा तक बचे आदमी ।"7

लेखिका ने चुनावी महापर्व की वास्तविकता को बड़ी सूक्ष्मता से ‘चाक’ उपन्यास में उकेरा

है । अतरपुर ग्राम का चुनावी अभियान राजनीति के कई पहलूओं पर प्रकाश डालता है । एक-एक वोट के लिए ‘साम,दाम, दंड, भेद’ हर तरह के पैंतरे अपनाये जाते हैं । पैसे पानी की तरह बहाये जाते हैं । इतना ही नहीं जरूरत पड़ी तो जातिगत वैषम्य की आग भी भड़कायी जाती है । लेखिका के शब्दों में -“ चुनाव माने दंगल! ऐसा दंगल जिसमें गांव के हर आदमी को कुश्ती लड़नी है । पैंतरे पर पैंतरा, दांव पर दांव लगाने की जुगत में अलावों को घेरे रहते हैं लोग - आधी-आधी रात तक ”8

समकालीन समय की यह एक कड़वी सच्चाई है कि चुनावी पर्व के लिए लाखों-करोड़ों रूपये उस देश में खर्च हो रहे हैं, जहां लाखों लोग अपनी मू्लभूत आवश्यकताओं से वंचित है । अपनी मौलिक जरूरतों को पूरा करने के कशमकश में वे आत्महत्या करने को बाध्य हो रहे हैं । आज स्थिति यह है कि स्वस्थ प्रतिस्पर्धा में असमर्थ राजनेता ‘वोट बैंक’ को कब्जे में करने के लिए अर्थ और बाहुबल दोनों का बखूबी इस्तेमाल करते हैं । ‘चाक’ उपन्यास में लेखिका लिखती है -“लड़कियां वोट देकर जब ससुराल जाएंगी तो सबको एक-एक धोती और डलिया देकर बिदा किया जाएगा ।”9

उपन्यासकार ने लोकतांत्रिक संवैधानिक व्यवस्था में चुनाव प्रक्रिया की सच्चाई को अनावृत ही नहीं किया है बल्कि दादा के माध्यम से उसपर प्रहार भी किया है - “ वे लोग, जीभ-जुबान से लोकसभा-विधानसभा में लड़ते हैं । स्याही-कलम से अखबारों में, और करम-आचरण से हम-औरों के बीच मचवाते हैं महाभारत । इन्हीं सबकी भरपाई कर रहे हैं हम लोग । कुपरिणाम भोग रहे हैं ।..... “ लो यहाँ मार-काट मचवाकर सोग मनाते हैं दिल्ली-लखनऊ में । असुँआ बहाते हैं सोक सभाओं में ।”10 लोकतंत्रीय संविधान की असफ़लता और निरर्थकता का इससे बेहतर उदाहरण नहीं हो सकता कि जिसकी समस्या को लेकर संसद में हंगामा किया जाता, जिसको दुख से उबारने का आश्वासन हर चुनावी भाषण में दिया जाता है, वह लोकतन्त्र का सिरमौर ‘आमजन’ वास्तव में हाशिए पर है ।

राजनीतिक पक्षपात की शिकार ग्रामीण स्कूलों के प्रति उपन्यासकार की चिंता उनकी संचेतनता का पर्याय हैं । सरकारी स्कूलों की वास्तविक स्थिति दयनीय है विशेषकर पिछड़े इलाके के स्कूल । स्कूलों में मूलभूत सुविधाएँ अनुपलब्ध है । टूटा-फ़ूटा और पुराना सामान देकर सरकार अपना सरोकार पूरा कर लेती है । ‘चाक’ उपन्यास में श्रीधर सरकार की इस दुर्नीति पर क्षोभ प्रकट करते हुए कहता हैं - “ टाट-पट्टी, मेज-कुर्सी, खेल का समान, संगीत का सामान, घड़ी आदि देने का या तो वादा मत करो, या फ़िर ईमानदारी से दो । पढ़कर हम ईमानदार बनना चाहते हैं, झूठ और मक्कार नहीं । सवाल यह है कि यह सामान अतरपुर के लिए फ़टा-पुराना, टूटा-फ़ूटा ही भेजा जाएगा । बहुत हुआ तो जोड़-गाँठ करा दी । लेकिन कजरौठ के लिए सबकुछ साबुत नया चमकदार क्यों ? इसलिए कि वहाँ एम.एल.ए. जी का निवास-स्थान है ।"11 उपन्यासकार ने बड़ी बेबाकी से ग्रामीण शिक्षा व्यवस्था की दुर्गति के कारकों पर प्रकाश डाला है । इस सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता कि स्वार्थपरक राजनीति से प्रभावित शिक्षा व्यवस्था में स्वस्थ परिवेश और स्वस्थ व्यक्तित्व का निर्माण एक ‘यूटोपिया’ है ।

मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यासों में ग्रामीण स्त्रियों की कई तस्वीरें मिलती हैं । उनके उपन्यासों के ग्रामीण स्त्री पात्र सामंतवादी सोच को खुली चुनौती देती है । वे ग्रामीण परिवेश की रूढ़ियों को नकारती हुई नारी को पैरों तले रौंदनेवाली सामाजिक संरचना का पुरजोर विरोध करती है । मन्दाकिनी, सारंग, कुसुमा आदि ऐसी ही स्त्री पात्र है । स्त्री विमर्श के संदर्भ में लेखिका का मंतव्य है- “ मेरे लिए स्त्री विमर्श का अर्थ स्त्री की स्वतंत्रता, इच्छा और अस्मिता हैं ।”12 स्त्री का अपना अस्तित्व है, अपनी समझ, अपनी आकांक्षा और अपना मन है पर पुरूषवर्चस्वादी समाज इसे मानने को तैयार नहीं है । पुरूष स्त्री को पददलित करने में ही अपने पुरूषत्व की सार्थकता समझता है । उपन्यासकार ने अपने उपन्यासों के माध्यम से उस सामाजिक संरचना का विरोध किया है, जहाँ स्त्री और पुरूष के लिए अलग-अलग नियम बनाये गये हैं । पुरूष जो भी करे जायज है किंतु स्त्री वही करे तो नाजायज है । स्त्री को हरेक बात के लिए नैतिकता-अनैतिकता के कठघरे में खड़ा किया जाता है पर पुरूष को नहीं । समाज के दोमुँहे रूप पर लेखिका लिखती है- “ जानवरों के बाद अगर किसी को खूंटे से बाँधा जाता है तो वे हैं आँगन लीपती, घर सहेजती, खेतों में काम करती औरतें । श्रीधर को शहरों में पनप रही विभिन्न संस्थाओं के नाम याद आते हैं - नारी उत्थान केन्द्र, सहेली, जागो री, नारी सहायता केन्द्र...पता नहीं वे किन नारियों के लिए हैं ? प्रौढ़ शिक्षा, नारी शिक्षा पर व्याख्यान देने से फ़ायदा ? यहाँ तो बेटी का जन्म होते ही खेरापतिन दादी चन्दना की कथा याद कराने लगती हैं ,कि बेटी जन्मी है तो खबरदार भी करती रहना इसकी जननी ! कि इसको कितने, और कहाँ तक पाँव बढ़ाने हैं । ...... कचेहरी-कानून इनके लिए भी हैं, लेकिन वहाँ तक इनका जाना? चली भी जायँ तो हर ओर हमलावर घेरने लगते हैं ।"13 स्त्री के प्रति समाज का नजरिया कभी उदारवादी नहीं रहा है । आज ‘स्त्री भ्रूण हत्या’ एक बहुत बड़ी समस्या बनी हुई है । भौतिक दृष्टि से हम आधुनिक तो बन गये हैं पर लड़कियों को लेकर हमारी सोच अभी भी दकियानुसी है । यह स्थिति केवल ग्रामीण समाज में ही नहीं है, शहरी शिक्षित समाज भी इससे बुरी तरह ग्रसित है ।

स्त्री का घर की चारदीवारी लाघनाँ ग्रामीण समाज में घोर अपराध समझा जाता है । ‘चाक’ उपन्यास की नायिका सारंग जब राजनीति में आती है, तब उसे पुरूषों की फ़ब्तियाँ मिलती है - “मर्दवाली औरत के मर्द का मरना हो जाता है । समझना चाहिए सारंग को । ये बातें भले घरों की औरतें को शोभा नहीं देती । गजाधर बाबू से कहना पड़ेगा, गाँव को पतुरियाघर न बनाओ ।"14

मैत्रेयी पुष्पा ने अपने उपन्यासों में ग्रामीण औरतों की वास्तविक स्थिति को स्पष्ट किया

है । अपने स्त्री पात्रों के माध्यम से वे स्त्रियों को अपने अधिकारों के लिए जागरूक करती है । उसे पुरूष के समकक्ष खड़ा कर पुरूष और औरत के लिए बनाये गये अलग-अलग नियमों से मुक्त करती है । अगर पुरूष अपनी मर्यादा को लांघकर भी पवित्र है तो स्त्री पर अपवित्रता का लांछन लगाना कहाँ तक जायज है ? मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यासों के स्त्री पात्र हमें सोचने के लिए विवश करती है । मैत्रेयी पुष्पा की स्त्री चेतना पर आलोचक विजय बहादुर सिंह के विचार अवलोकनीय है -“ मैत्रेयी जब कहती है कि मेरी स्त्रियाँ “पुरूषवादी पदावली में भरोसा नहीं करती, यौन शुचिता के वृहत्तर सरोकारों के विषय में मेरे पात्र सोचते हैं”तब उनके लेखन में हमें ‘स्वतन्त्रता’ के एक नए अर्थ का प्रकाश फ़ैला दिखाई देता है । यह ‘प्रकाश’ जितना स्त्री आजादी के लिए किए जाने वाले विद्रोह का है, उतना ही उस नई सामाजिक संरचना का भी जिसमें वर्चस्ववादी ताकतें मर्यादित की जा सकेंगी और सामाजिक संबंधों का आधार लिंगभेद न होकर मानवतापरक और सहज होगा । मैत्रेयी का लेखन इसी रूप में स्त्री-विमर्शवाद की निरन्तर रूढ़ और संकीर्ण होती जाती सीमाओं का अतिक्रमण करता है ।"15

समग्रत: मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यासों में ग्रामीण जीवन की कई तस्वीरें मिलती है । उन्होंने ग्रामीण जीवन को करीब से देखा और समझा है । रूढ़िवादी मानसिकता और राजनीतिक उपेक्षा से गाँवों का तेजी से विकास नहीं हो रहा है । गाँव हमारी आत्मा है और आत्मा को जीवित रखना हमारी सर्वोपरि जिम्मेदारी है । देश के सही विकास के लिए गाँव का द्रुत विकास वर्तमान समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है । यह विकास आर्थिक, शैक्षिक, नैतिक और मानसिक सभी स्तरों पर अनिवार्य है ।

सन्दर्भ सूची :

1. पुष्पा मैत्रेयी, बेतवा बहती रही, किताबघर प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृ. 100

2. पुष्पा मैत्रेयी, इदन्नमम, राजकमल प्रकाशन प्रा. लि.,नयी दिल्ली, पृ. 38

3. वही, पृ. 39

4. वही, पृ. 394

5. पुष्पा मैत्रेयी, चाक, राजकमल प्रकाशन प्रा. लि.,नयी दिल्ली, पृ. 203

6. पुष्पा मैत्रेयी, इदन्नमम, राजकमल प्रकाशन प्रा. लि.,नयी दिल्ली, पृ. 38

7. वही, पृ. 20

8. पुष्पा मैत्रेयी, चाक, राजकमल प्रकाशन प्रा. लि.,नयी दिल्ली, पृ. 274

9. वही, पृ. 424

10. पुष्पा मैत्रेयी, इदन्नमम, राजकमल प्रकाशन प्रा. लि.,नयी दिल्ली, पृ.20

11. पुष्पा मैत्रेयी, चाक, राजकमल प्रकाशन प्रा. लि.,नयी दिल्ली, पृ.203

12. सं. डॉ विजय बहादुर सिंह, मैत्रेयी पुष्पा : स्त्री होने की कथा, किताबघर प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृ.64

13. पुष्पा मैत्रेयी, चाक, राजकमल प्रकाशन प्रा. लि.,नयी दिल्ली, पृ.345

14. वही,पृ.367

15. सं. डॉ विजय बहादुर सिंह, मैत्रेयी पुष्पा : स्त्री होने की कथा, किताबघर प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृ.64

डॉ शशि शर्मा

शिक्षिका

कालीपद घोष तराई महाविद्यालय

बागडोगरा

मो. 9832321080

135 views

Recent Posts

See All

भक्तिकालीन साहित्य का सामाजिक सरोकार"-दीपक कुमार

शोधार्थी, दिल्ली विश्वविद्यालय “वर्ण–व्यवस्था लगातार चोट करने वाले इस आन्दोलन ने भक्ति के द्वार सभी जातियों के लिए खोल दिया और ‘जात–पात पूछे ना कोई, हरि को भजै सो हरि का होई’, जैसा नारा देकर सभी को एक

©2019 by Jankriti. Proudly created with Wix.com