मौन की साधना –असाध्यवीणा: डॉ॰ उमेश चन्द्र शुक्ल

एम॰ए॰,पी-एच॰डी॰

एसोसिएट प्रोफेसर

अध्यक्ष ,हिन्दी विभाग

महर्षि दयानंद कॉलेज परेल ,मुंबई -400012

shuklaumeshchandra@gmail.com

103 ओशियन व्यू आर॰एन॰पी॰ पार्क भाईन्दर (पूर्व)

ठाणे ,मुंबई पिन -410015

1961 में प्रकाशित 'आँगन के पार द्वार 'काव्य संकलन में संग्रहित अज्ञेय की सबसे लम्बी कविता असाध्य वीणा अज्ञेय की सृजनात्मक क्षमता का प्रमाण है ।घटनाओं की क्षिप्रता ,चिंतन की गंभीरता,भाव की सबलता ,कथ्य के लिए सटीक शब्दावली का चयन ,सामासिकता तथा अनावश्यक वाग्जाल,कथोपकथन का न होना लम्बी कविताओं की मुख्य विशेषता है ।असाध्य वीणा सर्जक अज्ञेय की काव्य-शक्ति का प्रमाण है । लम्बी कविताओं में राम की शक्ति पूजा ,सरोज स्मृति ,अँधेरे में ,मोचीराम ,गीत फरोश,जैसी दर्जनों कविताओं के साथ असाध्य वीणा जैसी लम्बी कविताएँ साहित्य की धरोहर है ।असाध्य वीणा कविता के कथानक और स्वरूप को लेकर लोगों के अपने अलग दृष्टिकोण है। कोई इसे साहस और आस्था की खोज कहता है तो कोई रागात्मक ऐश्वर्य की रहस्यमयी परिणति स्वीकारता है तो कोई ऐसे रुमानियत का रहस्यवाद में विलय कहता है ।जो भी हो समीक्षकों ने असाध्य वीणा को सिद्ध करने का पूरा प्रयत्न किया है।जीवन के असाध्य की सिद्धि का संकेत असाध्य की सिद्धि ही सम्भवतः अज्ञेय का भी श्रेय रहा हो ।"आ गये प्रियंवद !केशकम्बली !गुफा-गेह " कविता का आरम्भ लम्बे इंतज़ार के बाद आगत के आने की सूचना से शुरू होता है।कितनी बेकली ,बेसब्री ,जानने की उत्सुकता आदि अनेक भावों को अपने में समेटे है।राजा के दरबार में प्रियंबद का आना आशा का संचार है।असाध्य वीणा अब साध्य होगी। जीवन के अनसुलझे रहस्य खुलेंगे। आने वाले साधक की वेश-भूषा कठिन साधना की ओर संकेत करता है।आनेवाल केशकम्बली है ,केश कम्बली होना अर्थात अनुभवी होना ,अनुभव सिद्ध होना ,कठिन साधक होना ,साधना के गूढ़ रहस्यों को सिद्ध करने वाला साधक केश कम्बली जिसे प्रियंवद के साथ केशकंबली के नाम से भी पुकारा जाता है।आनेवाला साधक कठोर साधना के लिए गुफा को ही अपना गेह बना लिया है अर्थात गुफा ही जिसका घर हो ,गुफा गेह शब्द भी प्रियंवद के लिए प्रयुक्त होता है। कितना सब कुछ प्रिय पाठक यूँ मेरी वाणी भी मौन हुई 'पंक्तियाँ अत्यंत प्रभावोत्पादक और नाटकीय है।

" कविता का आरम्भ ही साधना के पथ का अनुगमन करने लगता है । कवि की वाणी का मौन होना ,अपने आप में विशेषअवस्था की और गति करना है । जहाँ निरंतर तलाश का भाव ,अनंत पथ के गूढ़ रहस्य से संवाद की आकांक्षा मुखर हो उठती है ।"इस काव्य कथा का आरम्भ अत्यंत प्रभावोत्पादक और सच्चे अर्थ में नाटकीय है ,पर यही बात कविता के अंत के विषय में नहीं कहीं जा सकती । ----तुरंत बाद 'प्रिय पाठक ! यूँ मेरी वाणी भी ,मौन हुई ' कहकर कवि ने अपनी अतीतोन्मुखी साधना की उदाराशयता को सिमित और संकुचित बना दिया है । कहाँ अद्वैतवाद और कहाँ क्षणवाद ?" 1 इस सृष्टि में असाध्य वीणा को साधने वाले,वीणा की झंकार सुनने ,सुनाने वाले स्वयं साधक अज्ञेय है । तलाश भी उनकी और तलाशी भी उन्हीं की जीवन साधना की झंकार सुनने के आकांक्षी अज्ञेय सर्वोत्तम पथ का अनुगमन करते है ।अज्ञेय के साधक की यहीं तलाश ,जीवन साधना के राजपथ पर विचरण करना चाहता है।" असाध्य वीणा साहित्यकार की रचना प्रक्रिया तक सीमित नहीं है।यह विधाता की वह सर्वोत्तम रचना प्रक्रिया है ,जिसे साधना सदैव दुष्कर रहा है।असाध्य वीणा और कुछ नहीं ,यह हमारी मानवीय काया है।हमारा शरीर ही वीणा-रूप झंकृत होने वाले सुरों का उद्गम-स्रोत है।"2. आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टि सम्पन्न अज्ञेय भारतीय धर्म-दर्शन से ऊर्जा ग्रहण करते है ।भारतीय धर्म-दर्शन,वेदांत,मिथक और जीवन पद्धति में वीणा को जीवन के सुर-ताल-लय से जोड़कर देखा गया है।जीवन वीणा की सिद्धि जीवन में मुक्ति का पथ है। जीवन के रहस्यों को जान लेना ही जीवंत होने का प्रमाण है । इसी की तलाश असाध्य में छुपी है।" हम अपना स्थूल शरीरी जीवन जी कर चले जाते हैं या मिट जाते हैं। पर हम आत्मज ज्ञान की दिशा में उन्मुख तक नहीं हो पाते। उपनिषदों में ऐसे ही मनुष्य को आत्महंता कहा गया है । असाध्य वीणा का सम्यक परिज्ञान हमें आत्महंता होने की भूमिका से बचाता है ।"3. अज्ञेय ने सम्भवतः मानवीय काया को ही वीणा माना गया है । "असाध्य वीणा अपनी ऐतिहासिक और प्रतीकात्मक संदर्भों के कारण महत्वपूर्ण रचनाओं में एक है।असाध्य वीणा कविता के कथा का मूल आधार आकोकुरा की पुस्तक 'दि बुक ऑफ टी'में संग्रहित है। यह कथा जापान के साथ-साथ चीन में भी प्रचलित है।इस कथा के अनुसार किरी नामक एक विशाल पवित्र वृक्ष से एक जादूगर ने एक वीणा बनायी।चीन के सम्राट ने वीणा को संभाल कर रखा था और राजा चाहता था कि कोई वीणा बजाए पर अभी तक कोई वीणा बजा न सका था।सम्राट को इस बात का विश्वास था की वीणा अवश्य बजेगी। किन्तु ऐसा हो न सका।समय के साथ वीणा असाध्य वीणा के नाम से प्रसिद्ध हो गई ।सम्राट का विश्वास अभी भी अटल की वीणा बजेगी और वीणा बजती भी है।कलावन्तों के असफल हो जाने के बाद अंत में राजकुमार पीवो अपनी साधना द्वारा वीणा बजाता है।वीणा के शब्दों का फूटना सम्पूर्ण समस्याओं का समाधान मिल जाने जैसा है।

असाध्य वीणा में राजा अनिश्चयवाचक शब्दों का प्रयोग करते है।अज्ञेय ने बौद्ध दार्शनिक धर्मकीर्ति के नाम की जगह वज्रकीर्ति नाम का प्रयोग करते है।प्रियम्वद के लिए अजित केशकंबली के नाम पर केशकंबली सम्बोधन का प्रयोग किया है। अजित केशकंबली शून्यवाद अर्थात विज्ञानवाद का पोषक था तो धर्मकीर्ति हठयोग का दोनों के नाम का प्रयोग कर कवि प्रियंवद के गुणसूत्र को रेखांकित करता है।यहाँ वीणा भौतिक अस्तित्व,सत्य का प्रतीक है।सत्य की तलाश ,सत्य की साधना,हिन्ह्र साधक का प्रेय हुआ करता है ।सत्य को पा लेना जीवन की सार्थकता है ।जीवन की तलाश में राजा वीणा की साधना अर्थात सत्य की पहचान कराना चाहता है।सब कुछ असाध्य वीणा के विषय में इतना पता है की इसे बौद्ध साधक वज्रकीर्ति ने किरीटी तरु से इसकी रचना की है।यह वीणा साधक वज्रकीर्ति के सम्पूर्ण जीवन की साधना का सुपरिणाम है,लौकिक धरातल पर किरीटी तरु सम्पूर्ण ब्रम्हांड का सूचक है । सृष्टि का सम्पूर्ण विस्तार अपने में समेटे हुए यही अलौकिक धरातल पर परब्रम्ह है,महामौन है,जिसमें जीवन का संगीत सुसुप्तावस्था में भूमा सा है।वीणा उस असीम विस्तार आकाश से लेकर पाताल तक व्याप्त,ध्वनियों ,जीवन की तमाम गतिविधियों ,प्राकृतिक परिवर्तनों ,जय-पराजय को अपने में समेटे है। सृष्टि का अटल साक्षी और जीवन की सम्पूर्ण गतिका ग्राहक जिसमें शब्द विश्राम कर रहे है।वीणा को साधक की और साधक को वीणा की तलाश है।राजा का अटल विश्वास है की सनातन वीणा अवश्य बजेगी।अवश्य बजेगी और साधक वज्रकीर्ति की जीवन साधना सफल होगी।वीणा निर्मिति के साथ ही साधक की जीवन लीला समाप्त हो गई।जीवन सत्य की तलाश में भटकते साधक की साधना का पूर्ण होना और जीवन लीला का समाप्त होना। साधक की मुक्ति का संकेत है।वीणा से परिचय साधना के द्वार से साक्षात्कार है । साधक वज्रकीर्ति अपने जीवन की अनंत यात्रा पर निकल पड़ा अर्थात इस जीवन से मुक्त हो गया । -

" यह वीणा उत्तराखण्ड के गिरी-प्रान्तर से

- घने वनों में जहाँ तपस्या करते हैं व्रतचारी -

बहुत समय पहले आयी थी ।

पूरा तो इतिहास न जान सके हम :

किन्तु सूना है

वज्रकीर्ति ने मंत्रपूत जिस

अति प्राचीन किरीटी -तरु से गढ़ा था -

कंधों पर बादल सोते थे ,

उस की करि-शूण्डओं सी डालें

हिमवर्षा से पूरे वन-यूथों का कर लेती थीं परित्राण ,

कोटर में भालू बसते थे ,

केहरि उसके वल्कल से कंधे खुजलाते थे ।

और-सुना है-जड़ उस की जा पहुँची थी पाताल लोक ,

उसकी गंध-प्रवण शीतलता से फण टिका नाग वासुकि सोता था।

उसी किरीटी तरु से वज्रकीर्ति ने

सारा जीवन ऐसे गढ़ा :

हठ साधना यही थी उस साधक की - --------

वीणा पूरी हुई ,साथ साधना ,साथ ही जीवन लीला ॥"4.

राजा साधक के वीणा के असाध्य होने की सूचना देते हुए कहते है की अब यह असाध्य वीणा के रूप में जानी जाने लगी है । आज तक कोई इसे नहीं साध सका । सभी जाने-माने कलावंत ,साधक,साधना की विद्या को जानने वाले आए किन्तु वीणा साधने में असफल रहे,,सभी का दर्प ,घमंड चूर-चूर हो गया।साधना की असफलता दर्प में निहित है । साधन की पवित्रता,पूर्ण समर्पण,सतत जिज्ञासा का भाव,होने के साथ-साथ साध्य से जुड़ाव होना अति महत्वपूर्ण है। अकुंठ भाव से साधक प्रियंवद स्विकार करता है की वह कलावन्त अर्थात कला की साधना करने वाला नहीं है।स्वयं को कला के प्रति समर्पित शिष्य मानता है।यही शिष्यत्व का भाव प्रियंवद की शक्ति है और साधना के गूढ़ रहस्य को अपने में समेटे है।किसी भी सिद्धि के लिए सिखने का भाव प्राथमिक शर्त है ।असाध्य को को साधने का सूत्र प्रियंवद के कथन में निहित है। साधना के लिए वज्रकीर्ति ,प्राचीन किरीटी तरु और अभिमन्त्रित वीणा तीनों को महत्वपूर्ण मानता है ।वीणा अर्थात भौतिक जीवन सत्य ,प्राचीन किरीटी तरु सम्पूर्ण संसृति एवं कठोर साधना करने वाला हठ योगी प्रियंवद ,तीनों के साथ समायोजन के लिए शिष्यत्व का भाव होना ,वीणा को समझने का टूल्स होगा --

" राजन !पर मैं तो

कलावन्त हूँ नहीं ,शिष्य ,साधक हूँ -

जीवन के अनकहे सत्य का साक्षी !

वज्रकीर्ति !

प्राचीन किरीटी-तरु !

अभिमन्त्रित वीणा !

ध्यान मात्र इनका तो गद्गद विह्वल कर देने वाला है । "-5

---.

भौतक अस्तित्व अर्थात वीणा की साधना को अज्ञेय ने मनोजगत में संचरित होने वाले संगीत को समरस होकर सुना था।जीवन से मुक्त होने के लिए आत्मज्ञान का होना अति आवश्यक है।बिना आत्मज्ञान के ब्रम्हज्ञान नहीं हो सकता। और ब्रम्हज्ञान के अभाव में ब्रम्ह से साक्षात्कार नहीं हो सकता है। अज्ञानता की स्थिति में जीवन अपूर्ण ,भटकन भरा होगा ।परम पुरुष,परमब्रम्ह स्वयं असाध्य वीणा सदृश्य है।हमारी काया उसी परम सत्ता का अंकन है,परम सत्ता स्वयं काया में रूपांतरित होकर जगत में आती है । परम सत्ता से जुड़ जाना अर्थात स्वयं से मुक्त हो जाना है । प्रियंवद जैसा साधक ही निर्लिप्त भाव से उसकी साधना कर सकता है। अन्यथा गुणी ,कलावंत ,ज्ञानी होने का भाव हमारे अहं को पुष्ट करता है।भ्रमित होकर हम साधना में असफल होते है।आत्मज्ञान की साधना अति आवश्यक है।आत्मज्ञान समर्पण के भाव को बल प्रदान करता है ----

" गा तू !

यह वीणा रखी है :तेरा अंग -अपंग !

किन्तु अंगी ,तू अक्षत ,आत्म-भरित ,

रस-विद् ,

तू गा :

मेरे अँधियारे अन्तस् में आलोक जगा

स्मृति का

श्रुति का -

तू गा ,तू गा ,तू गा ,तू गा !"6.आँगन के पार द्वार -पृष्ठ 76

यहाँ अज्ञेय खण्ड को अखण्ड से जोड़कर ,जीवन में ऊर्जा संचय का सूत्र प्रदान करते है।"‘‘अंग की अपंगता, अंग की खण्डता, अंग की रिक्तता और अंग की विरसता अंगी के साथ जुडकर दूर हो जाती है।’’-7

यह रूपांतर विराट की असति के प्रति अर्पणीय होकर विराट की अस्ति को अपने में समाहित करने की उपलब्धि को ही प्रमाणित करता है ।"8प्रियंवद के कथन में समर्पण का भाव सत भाव है । सम्पूर्ण सृष्टि में घटित होने वाली घटनाओं ,गतिविधियों में उसी ब्रम्ह की ऊर्जा निहित है। न तो वीणा मैंने बजाई,न ही वीणा को बनाने वाला कोई वज्रकीर्ति है।"वज्रकीर्ति के रूप में स्वयं ब्रम्हा ने वीणा को गढ़ा है।राजा कोई भौतिक पुरुष नहीं बल्कि हमारे भीतर का प्रभुताकांक्षी ,भौतिक पदाभिलाषी है ,जो केवल शासित करना जानता है। रानी और कोई नहीं मन की स्रोतस्विनी है । हमारे भीतर की अनंत इच्छाओं की उद्गम स्थली है । मनु स्मृति में विगत कथा का आवाहन परम पुरुष की व्यापकता है,'ओ पूरे झारखण्ड अग्रज ' का झारखण्ड निखिल ब्रम्हांड है और अग्रज परम पुरुष ब्रम्हा है।गुफा-गेही केश-कम्बली आत्म गुफा में वास करने वाला है । पर इस दैवत वीणा को पहचानना सहज साध्य नहीं है। इसे साधना कामना-त्याग और अपने सर्वात्मना समर्पण करने पर ही संभव है। उसे ही अज्ञेय ने अपनी कविता में निरूपित किया है। इस कविता में पुरुष अदृश्य है और प्रकृति साकार है।सांख्य दर्शन मानता है कि प्रकृति शैलूषि है,वह नटी है। वह रूप परिवर्तन करती है ,नृत्य करती है परम पुरुष को रिझाती है । असाध्य वीणा में इसी प्रकृति का साक्षात्कार है,जिसके व्याज से पुरुष तक पहुँचने द्वार खुलता है। संगीत की लय में सब का एक साथ डूबना परम पुरुष का अपने-अपने अनुरूप अनुभावन है। कविता के अंत का मौन कुछ नहीं ,उसी परम पुरुष का निःशब्दता से साक्षात्कार है।"9असाध्य वीणा का साध्य होना। जीवन का प्रकृति के साथ लय,तुक,ताल बैठाने की साधना है।सब कुछ उसी परम सत्ता का है।इस तरह का समर्पण भाव जीवन के असाध्य को सिद्ध करने में सहायक है।

"सुना आप ने जो वह मेरा नहीं ,

न वीणा का था :

वह तो सब-कुछ की तथता थी।

महाशून्य

वह महामौन

अविभाज्य ,अनाप्त ,द्रवित ,अप्रमेय

जो शब्दहीन

सब में गाता है। "10 .---.

असाध्य वीणा कविता में मौन की साधना पर बल दिया गया है । मौन ही महामौन की अनहद ध्वनिं का श्रवण कर सकता है।" पूरी कविता मौन की ओर लौटने की,एक ओर व्यष्टि से समष्टि में डूबने की तथा समष्टि से व्यष्टि में अलग-अलग उतरने की प्रक्रिया का आख्यान है,--इसके एक सार भाग में वज्रकीर्ति साधना के द्वारा वीणा गढ़ी ,तो उस वीणा में समग्र सृष्टि की वाणी भी समाहित हो गई ।"-11इस तरह वीणा समष्टि में व्यष्टि और व्यष्टि में समष्टि के विलयन का ऐसा साधन द्वार है जिसके सहारे साधक अन्तःएवं वाह्य की यात्रा सहज रूप से कर सकता है । अर्थात जीवन में मुक्त होने का सूत्र वीणा में निहित है।" जब दोनों परस्पर साकांक्ष हो जाए और दोनों के बीच पूर्ण रागात्मक सम्बन्ध स्थापित हो जाए तब विराट व्यक्ति की ओर उन्मुख जाता है,सृष्टि की धारा फव्वारे की तरह एक केंद्र से ऊपर जाकर अनेक केन्द्रों को छूने लगती है।"12 यहाँसाधक का परम सत्ता जुड़ाव नाल-कुच्छी योग का होता है।साधक का वीणा से जुड़ाव इस कदर गहरा होता जाता है कि" वीणा का यह स्रष्टा के अखण्ड ,अशेष ,प्रभामय ,स्वयंभू मौन का जागरण बन जाता है।"13साधक का मौन में ही उस परमसत्ता से संवाद होता है । संवाद मात्र से मैं ,अहम का भाव विनष्ट जाता है अगर कुछ शेष बचता है तो वह होता मात्र 'वह '।भारतीय धर्म ,दर्शन एवं मिथक के अनुरूप काया रूपी वीणा ही दैव वीणा है। इसी जीवन रूपी वीणा की साधना आत्मसमर्पण ,आत्मविलय ,आत्मसाक्षात्कार एवं समन्वय से सिद्ध किया जा सकता है।जिसकी इति परमात्म-रूप आत्म स्वरूप की प्राप्ति में निहित है। "अतीत तक पहुँचे बिना सोया हुआ वह संगीत नहीं जगाया जा सकता,जो वाद्य यंत्र अंतर्निहित है। "-14

" नमस्कार कर मुड़ा प्रियंवद केशकम्बली\लेकर कम्बल

गेह-गुफा को चला गया ।

उठ गयी सभा।सब अपनेअपने काम लगे ।

युग पलट गया ।

प्रिय पाठक !यों मेरी वाणी भी

मौन हुई । " 15 --. पंक्तियाँ मौन में ब्रम्ह से साक्षात्कार की सामर्थ्य का रेखांकन करती है है।मौन की साधना में ही ब्रम्ह के साक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त होता है।"अंतिम पंक्तियाँ इसलिए आवश्यक थी की वाणी की सार्थकता मौन में है ,वह मौन ऐसा कि 'वह'केवल व्यक्ति को विराट सत्ता में डुबोने के बाद पुनः पार तिरने पर मिला।" 16-यहाँ अहं की सत्ता का विनष्ट होना,प्रथम शर्त है और मैं का समष्टि के साथ तादात्म्य ही जीवन का उद्देश्य दृष्टिगत होता है ।--

" तात !प्रियंवद! लो ,यह सम्मुख रही तुम्हारे

वज्रकीर्ति की वीणा

यह मैं ,यह रानी ,भरी सभा यह :

सब उदग्र ,पर्युत्सुक ,

जन-मात्र प्रतीक्षमाण ॥ "17

प्रियंवद के आसन पर बैठते ही,राजा का संकेत समझ कर सेवकों द्वारा 'असाध्य वीणा' को लाना। सभी की उत्सुक दृष्टि की क्या साधक वीणा सिद्ध कर लेगा । वीणा अपनी सार्थकता को प्राप्त होगी।सारी सभा की प्रश्नानुकूलता भरी दृष्टि प्रियंवद के चेहरे की और लगी है।साधक स्वयं के अस्तित्व को भूलकर वीणा की साधना में लीन हो जाता है । सबसे पहले प्रियंवद कंबल बिछाकर वीणा को उचित आसन देता है। अपनी अंतरात्मा में वीणा के होने के पूर्ण अस्तित्व की तलाश करता है ।पलक मुदना,वीणा के सम्पूर्ण अस्तित्व को स्वीकार करना,वीणा का ध्यान करना,वीणा के प्रति सम्पूर्ण समर्पण भाव रखते हुए ---

"पलक मूँदकर ,प्राण खींच ,करके प्रणाम ,अस्पर्श छुअन से "वीणा को आसन से उठाकर गोद में रखते हुए अस्पष्ट स्वर में बुदबुदाते हुए कहता है की मैं तो साधक हूँ,कठिन साधना का। साधना का पथ स्वयं के समर्पण के भाव से गति करता है।वीणा पर मस्तक झुका देता है।वीणा के प्रति सम्पूर्ण समर्पण का भाव,सभा को लगता है की साधक वीणा पर मस्तक झुका सो रहा है। ऐसी समय साधक प्रियंवद स्वयं को ,वीणा को ,तथा असाध्य के सिद्धि पर विचार करता है।साधना तभी पूर्ण होगी जब साध्य ,साधन और साधक में तालमेल हो।प्रियंवद ,वीणा का ध्यान करता है ,उस किरीटी तरु स्मरण करता है जिससे वीणा निर्मित है।वीणा के सर्जक वज्रकीर्ति की वीणा का ध्यान मात्र साधक को पुलकित करने वाला है,प्रियंवद का मौन साक्षात्कार,संवाद वज्रकीर्ति की साधना,समर्पण ,साधन और सम्पूर्ण परिवेश से होने लगता है--

" समाधिस्थ संगीतकार का हाथ उठा था

काँपी थी उँगलियाँ ।

ग ग ग ग ग ग ग

सहसा वीणा झनझना उठी ||" --18

इसी साथ ही अखंड ब्रम्हांड का सच,गहन मौन मुखर हो उठा,वीणा के तारों से झंकृत सारी राजसभा आश्चर्य चकित है ।अक्षर ब्रम्ह,अखण्ड ब्रम्हाण्ड के महामौन की साधना की प्रभा प्रस्फुटित होने लगी।राजा तथा दरबारियों मानस पर घिर आए गहन अन्धेरें में जीवन आशा के प्रकाश की किरणें नव-नव ताल दिए नर्तन करने लगी।ध्वनि मिश्रित ज्ञान की आभा से प्रदीप्त राज सभा में उपस्थित हर व्यक्ति का वीणा की झंकार से निःसृतध्वनि संकेतों में जीवन मुक्ति के अनसुलझे रहस्यों से सहज साक्षातकार होने लगता है।सबकी पात्रता अलग-अलग है तो तो सभी की उपलब्धि भी अनूठी है।जीवन के सारे रहस्यों का समाधन वीणा की झंकार में निहित है।जीवन सत्य का आभाष मात्र सफलता के सूत्र ढूढ़ निकालता है ।असाध्य वीणा में निहित जीवन ध्वनि भगवान भाष्कर,आदित्य की इंद्रधनुषी छटा के साथ यूटोपिया में स्वयं के अहं से घिरे जागतिक एवं आध्यात्मिक मनुष्यों के संयोजन का माध्यम बनता है।एक साथ सभी को अपने प्रश्नों का उत्तर मिल जाता है ।सारी प्रश्नानुकूलता क्षण मात्र में मिट गयी।वीणा के रस बोध में सारे साथ-साथ डूबे पर सभी अलग-अलग जीवन भव को पार करते है।राज-काज में लिप्त राजा की राजकीय,प्रशासकीय ,एवं अन्य सभी तरह की समस्याओं का समाधान होता दिखाई पड़ता है।कविता का मुक़्क़म्मल प्रभाव मात्र इतना है,की साधना की तपस्या साधक के गुणों में विशेष आध्यात्मिक तत्वों के साथ समरस होने का भ्रम जीवंत होता दिखाई पढता है --

जाकी रही भावना जैसी ,हरि मूरत देखी तिन तैसी ॥19 अज्ञेय जीवन जगत के तमाम झंझावातों से जूझते मनुष्य के लिए जीवन में मुक्ति के मार्ग की तलाश करते है।लौकिक एवं पारलौकिक मुक्ति की राह में साधना भारतीय धर्म-दर्शन,परम्परा की नाव पर सवार होकर जीवन को पार उतारने का रहस्य खोलते है।हम अपनी पात्रता ,क्षमता के अनुकूल ही ब्रम्ह से साक्षत्कार कर सकते है।असाध्य वीणा में भी यही दिखाया गया है।मन का पवित्र भाव ,सम्पूर्ण आत्म समर्पण,गहन साधना के बल पर पराशक्ति,अलौकिक ब्रम्ह से संवाद सकता है।असाध्य जीवन वीणा की साधना परम तत्व,परमात्मा में विलीन होने की प्रक्रिया है।स्वयं के अहम का विलयन बंधनों से मुक्ति राजमार्ग खोल देता है।अभी तक वीणा की साधना के लिए साधक,कलावंत ,गुनी और ज्ञानी आए थे।जिन्हें अपनी साधना पर घमंड था।वीणा के असाध्य होने का कारण भी अहं भाव का होना है। वीणा का झंकृत होना सभी तरह की समस्याओं से मुक्ति देने वाला है।वीणा की झंकार में सृष्टि के नव सृजन का बीज अंगड़ाई ले रहा है।समय की गति,थमने लगी है।युग परिवर्तन के सारे साजो-सामान असाध्य वीणा में निहित है।राज सभा बीते युग की जड़ता से आक्रांत जीवन वीणा के साध्य होने का इंतजार कर रहे है । यही इंतजार की बेकली कविता के प्रथम चरण में दृष्टिगत होती है ,जो क्रमशःजड़ से जोड़ते हुए,पूरे परिवेश अर्थात सत्ता के केंद्र राजा-रानी और सभा में मौजूद सभी दरबारियों को वीणा के माध्यम से अज्ञेय भारतीय संस्कृति से साक्षात्कार कराते है।राजा की सम्पूर्ण समस्याओं का निदान वीणा की ध्वनि से हो उठता है। समस्याग्रत राजा की सारी समस्याओं का समाधान वीणा की स्वर लहरी से निसृत होता है।राजमुकुट सिरिस के फूल सदृश्य हल्का लगने लगा अर्थात राजा की सारी उलझनें जाती रही।राजा के निश्चिन्त होने में प्रजा के सुख -सम्बृद्ध का द्वार खुल जाता है-वीणा की झंकार हर व्यक्ति के लिए उसकी क्षमता ,सामर्थ्य के अनुसार है -- --

राजा ने अलग सुना :

" जय देवी यशः काय

वर माल लीये

गाती थी मंगल गीत ,

दुन्दुभि दूर कहीं बजती थी ,

राज-मुकुट सहसा हलका हो आया था ,मानो हो फल सिरिस का

ईष्या ,महदाकांक्षा ,द्वेष चाटुता

सभी पुराने लुगड़े से झर गये ,

निखार आया था जीवन-कंचन

धर्म-भाव से जिसे निछावर वह कर देगा ।"20

अस्ति-नास्ति के बीच युग परिवर्तन का संकेत मुखर हो उठता है।रानी को सभी भौतिक संसाधनों से मुक्ति की राह दिखाई पड़ती है।वस्त्र ,आभूषण सब अंधकार के संगी-साथी है।अब रानी संकल्प लेती है की अब उसकी साधना का प्रेय एकमात्र प्यार की साधना है। सारी सभा ने अपनी-अपनी सोच के अनुकूल वीणा के निर्माण की प्रक्रिया ,वज्र कीर्ति की साधना,असाध्य होने के कारणों की पड़ताल करते है --

" श्रेय नहीं कुछ मेरा :

मैं तो डूब गया था स्वयं शून्य में --

वीणा के माध्यम से अपने को मैं ने

सब कुछ को सौंप दिया था --

सुना आपने जो वह मेरा नहीं ,न वीणा का था :

वह तो सब कुछ की तथता थी

महाशून्य

वह महामौन

अविभाज्य ,अनाप्त ,अद्रवित ,अप्रमेय

जो शब्दहीन

सब गाता है ॥ " 21

असाध्य की साधना के लिए मात्र साधन की पवित्रता मुख्य नहीं अन्य अनेकानेक कारकों को भी सिद्ध करना होता है।महामौन से महामौन तक की यात्रा में स्वयं के अस्तित्व का सम्पूर्ण विलयन,दास भाव से समर्पण,साधना में स्वयं के अस्तित्व का उत्सर्जन ,सहज सत्य की स्वीकारोक्ति,अहं और वहम् से उपर उठकर महामौन से संवाद,वज्रकीर्ति की तथता को नमन तथा मौन का मुखर की ओर गति करना ,महामौन का अविभाज्य ,अनाप्त तथा अद्रवित हुए उस परम सत्ता से साक्षात्कार जो शब्दहीन होते हुए भी मानव मात्र में प्राणवायु के रूप में संचारित है। इसी जीवनी शक्ति का मुखर होना ही असाध्य से साध्य की और उर्धगामी गति करना है। वीणा के ध्वनन में युग परिवर्तन की झंकार निहित ये।केशकम्बली कम्बल लेकर गुफा गेह को निकल पड़ता है।युग बदलने के बाद पुनश्च सभी अपने अपने जिम्मेदारियों का निर्वाह करने लगे। लेखकीय दायित्व भी यही है की कवि की वाणी की जगह पाठक के उत्कर्ष ,स्वस्ति कल्याण में निहित है । वीणा की ध्वनि का मौन ,कवि की वाणी का मौन अपने में युगपरिवर्तन सूचक बनकर उभरता है ।अज्ञेय का कवि अपने युग को शब्द देकर असाध्य को साध्य बनाने का सूत्र दिखाई पड़ता है।मौन ने निहित सृजन की अनंत संभावनाओं का पुंज,मौन की मुखर साधना ॥

संदर्भ ग्रन्थ--

1 . हिन्दी साहित्य और संवेदना का विकास, इलाहाबादः लोकभारती, 2001, पृष्ठ 35

2. शब्द पुरुष अज्ञेय की असाध्य वीणा:साभिप्रायता का संदर्भ-पाण्डेय शशिभूषण 'शीतांशु'

3. शब्द पुरुष अज्ञेय की असाध्य वीणा:साभिप्रायता का संदर्भ-पाण्डेय शशिभूषण 'शीतांशु'

4. आँगन के पार द्वार -पृष्ठ 72

5. आँगन के पार द्वार -पृष्ठ 72

6. आँगन के पार द्वार -पृष्ठ 76

7.नरेंद्र शर्माहिन्दी साहित्य और संवेदना का विकास, इलाहाबादः लोकभारती, 2001 पृष्ठ 180

8.नरेंद्र शर्माहिन्दी साहित्य और संवेदना का विकास, इलाहाबादः लोकभारती, 2001 पृष्ठ 183

9.शब्द पुरुष अज्ञेय की असाध्य वीणा:साभिप्रायता का संदर्भ-पाण्डेय शशिभूषण 'शीतांशु'

10.आँगन के पार द्वार -पृष्ठ-84

11. असाध्य वीणा ,रीति विज्ञान-विद्यानिवास मिश्र ,नई दिल्ली राधाकृष्ण प्रकाशन ,1973 पृष्ठ -170

12. असाध्य वीणा ,रीति विज्ञान-विद्यानिवास मिश्र ,नई दिल्ली राधाकृष्ण प्रकाशन ,1973 पृष्ठ -172

13.असाध्य वीणा ,रीति विज्ञान-विद्यानिवास मिश्र ,नई दिल्ली राधाकृष्ण प्रकाशन ,1973 पृष्ठ -172

14.अतीतोन्मुखी साधना ,धर्मयुग ,नवम्बर 1964 पृष्ठ -15

15. आँगन के पार द्वार -पृष्ठ-82

16. नरेंद्र शर्माहिन्दी साहित्य और संवेदना का विकास, इलाहाबादः लोकभारती, 2001 पृष्ठ-172

17. आँगन के पार द्वार -पृष्ठ- 72

18. आँगन के पार द्वार -पृष्ठ- 79

19. -रामचरितमानस -तुलसीदास

20. आँगन के पार द्वार -पृष्ठ- 80

21. आँगन के पार द्वार -पृष्ठ- 82

डॉ. उमेश चन्द्र शुक्ल

अध्यक्ष , हिन्दी-विभाग

महर्षि दयानंद कॉलेज

परेल मुंबई - 400012

निवास ----

103 ,ओशियन व्यू

आर.एन.पी.पार्क गार्डेन

आर.एन .पी .पार्क

भायंदर (पूर्व ) ठाणे -पिन -401105

मो . 09324554008

shuklaumeshchandrashukla@gmail.com

की-वर्ड – अज्ञेय,असाध्य वीणा,आँगन के पार द्वार,उमेशचंद्र शुक्ल,शुक्ल

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