मुस्लिम बहुल इण्डोनेशिया में विश्व संस्कृति मंच: डॉ. गौतम कुमार झा

शोध आलेख

मुस्लिम बहुल इण्डोनेशिया में विश्व संस्कृति मंच

डॉ. गौतम कुमार झा

असिस्टेंट प्रोफेसर, सेन्टर फॉर चाइनीज़ एण्ड साउथ-एशियन स्टडीज़, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली-110067

Email: gautamkjha@gmail.com

इण्डोनेशिया के राष्ट्रपति सुसिलो बाम्बांग युधोयनो, जिनके नाम में ही इण्डोनेशिया की संस्कृति में भारतीय संस्कृति की अमिट छाप दिखायी पड़ती है, ने बाली में एक तीन दिवसीय अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन “सतत विकास में संस्कृति की शक्ति” का उद्घाटन कर सतत विकास के लिये संस्कृति की शक्ति को एक प्रधान साधन के रूप में अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया है ।

इस सम्मेलन में लगभग 30 देशों और 17 संस्कृति मंत्रालयों से लगभग एक हज़ार से अधिक प्रतिभागियों ने भाग लिया । कार्यक्रम में मुख्यतः कलाकारों, कारीगरों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, शिक्षाविदों, प्राचीन-परम्पराओं एवं संस्कृतियों के संरक्षण में लगे विद्वानों एवं अनेक गैर सरकारी संगठनों की सहभागिता रही ।

इस सम्मेलन के प्रमुख वक्ताओं में अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार विजेता और नालंदा विश्वविद्यालय के वर्तमान कुलाधिपति प्रो. अमर्त्य सेन, इण्डोनेशिया के राष्ट्रपति सुसिलो बाम्बांग युधोयनो एवं विश्व प्रसिद्ध पत्रकार फरीद ज़कारिया सम्मिलित हैं ।

अपनी सांस्कृतिक धरोहर के प्रति चिन्तित इण्डोनेशिया सरकार द्वारा आहूत इस भव्य अन्तरराष्ट्रीय सांस्कृतिक सम्मेलन के सम्बन्ध में कुछ तथ्यों पर विमर्श प्रासंगिक है-

हाल ही में संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव बान की मून ने संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम में सांस्कृतिक पहलुओं को शामिल करने का आह्वान किया है । संयुक्त राष्ट्र संघ का मानना है कि उनके अनेक विकास कार्यक्रम विशेषकर 2011 की अनेक परियोजनायें विफलताओं से जूझ रही हैं, जिसका कारण सांस्कृतिक पहलुओं को नज़रअन्दाज़ करना रहा है । संयुक्त राष्ट्र संघ ने माना है कि जनसमुदाय तक पहुँचने के लिये संस्कृति की शक्ति को स्वीकार करना ही होगा ।

यहाँ पर यह ध्यान देने योग्य बात है कि 2009-10 में जब पूरा विश्व आर्थिक संकट से गुजर रहा था एवं विकसित देशों की स्थिति अत्यन्त दयनीय थी तब विकासशील देशों जैसे इण्डोनेशिया पर इस संकट का मात्र आशिंक प्रभाव पड़ा । इसका श्रेय निश्चय ही सांस्कृतिक सम्पदाओं से परिपूर्ण इस देश की सांस्कृतिक शक्ति को ही जाता है ।

मुस्लिम बहुल इण्डोनेशिया, जो संसार का सबसे बड़ा द्वीपसमूह है, जिसमें लगभग 17 हजार छोटे-बड़े द्वीप एवं 300 से अधिक विविध जातीय समूह हैं, स्वयं को रामायण एवं महाभारत से सम्बद्ध मानने में गौरवान्वित महसूस करता है । यहाँ के 88.2% मुस्लिमों में जावा मूल के 41%, मलय मूल के 15% एवं 3% सुण्डानीज़ मूल के हैं । इनका दैनंदिन जीवन हिन्दू संस्कृति से ओत-प्रोत है ।

भारतीय संस्कृति की छाप लिये इण्डोनेशिया की पूरे विश्व में अपनी पृथक् पहचान है । ध्यान देने योग्य बात यह है कि यह देश संसार की सर्वाधिक मुस्लिम जनसंख्या का घर है । इण्डोनेशिया सामान्यतः शान्तिप्रिय देश है । यह देश जहाँ पर नव इस्लामिक कट्टारपंथी निरन्तर धार्मिक उन्माद को बढ़ाने का प्रयास करते रहे हैं, दृढ़ता के साथ धर्मनिरपेक्षता का पक्षधर है ।

बाली, इण्डोनेशिया का हिन्दू राज्य माना जाता है । यह अपने सांस्कृतिक परिवेश और भोगोलिक वातावरण को लेकर पूरे विश्व में एक महत्त्वपूर्ण पर्यटन केन्द्र बनता जा रहा है । पिछले वर्ष जून 2012 तक के आँकड़ों पर यदि ध्यान दिया जाये तो हम देखेंगे कि प्रतिमाह पर्यटकों की संख्या में 15.5% की वृद्धि देखी गयी है, जो यहाँ बढ़ते पर्यटन-उद्योग को रेखांकित करती है ।

बाली में आयोजित यह “विश्व सांस्कृतिक मंच” इस वर्ष के सबसे बड़े सम्मेलनों में से एक है । इसके द्वारा जहाँ एक ओर इण्डोनेशिया ने अपने धर्मनिरपेक्ष छवि को पूरी तरह प्रदर्शित करने का प्रयास किया, वहीं दूसरी ओर विश्वविख्यात विद्वानों अमर्त्य सेन एवं फरीद ज़कारिया ने इण्डोनेशिया की संस्कृति को भारतीय संस्कृति से जोड़ने एवं दोनों में परस्पर समानता पर प्रकाश डाला । इससे निश्चय ही भारत एवं इण्डोनेशिया के मध्य सांस्कृतिक सेतु सुदृढ़ होंने का मार्ग प्रशस्त हुआ है ।

संस्कृति पर आधारित विकास कार्यक्रम सामाजिक समरसता में वृद्धि करते हैं । संस्कृति और समाज परस्पर पूरक हैं । बाली विश्व के दर्शनीय स्थलों में अपना एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। इसका सौन्दर्य और इसकी संस्कृति प्रत्येक व्यक्ति को अपनी तरफ आकर्षित करती है । यही कारण है कि गुरुदेव रबीन्द्र नाथ ठाकुर 1927 में जब अपनी यात्रा के दौरान बाली पहुँचे तो अनायास ही उनके मुँह से निकल पड़ा-

“मैं इस द्वीप में जहाँ भी जाता हूँ, मुझे भगवान् का दर्शन होता है ।”

पं. जवाहरलाल नेहरू ने बाली के प्राकृतिक सौन्दर्य और सांस्कृतिक वैभव को देखकर इसे “विश्व की सुबह” कहकर सम्बोधित किया और श्री अटल बिहारी बाजपेयी ने बाली में अपने आगमन पर अतीव हर्ष के साथ कहा कि “ मेरे बचपन का सपना सच हो गया।”

आज हिन्दू सांस्कृतिक विशिष्टता को संजोये निरन्तर अपने पर्यटकों की सेवा में तल्लीन बाली, सांस्कृतिक बदलाव एवं बढ़ते भौतिकतावाद की आँधी से बचा पाने में स्वयं को असमर्थ अनुभव कर रहा है । तेजी से विस्तार लेते पर्यटन उद्योग के कारण वह पर्यटकों को पाश्चात्य सुख-सुविधाओं को प्रदान कर रहा है, जिसके चलते कहीं न कहीं स्थानीय संस्कृति प्रभावित हो रही है । बाली जैसे दिव्य, ईश्वरीय परिवेश में भी विलासिता और भौतिकता अपना पैर निरन्तर पसार रही है । भौतिकतावाद की आँधी को देख ऐसा लगता है मानो वह बाली की बलि देने के लिये आतुर बैठी है और बाट जोह रही है कि किस दिन इस समावेशी संस्कृति की इतिश्री की जाय । प्रकृति के रम्य पालने में झूलता बाली द्वीप, जहाँ दैनंदिन जीवन का प्रारम्भ प्रातः ईश्वर की वन्दना होता है, पूर्णतः कृषि पर आधारित है और पग-पग पर यहाँ धार्मिक जीवन के विविध पहलुओं के दर्शन होते हैं । गली, मोहल्ले, चौराहे और नुक्कड़ धार्मिक वातावरण की सुन्दर झलक प्रस्तुत करते हैं । कलात्मकता अपने वैभवशाली रूप में यहाँ विचरण करती है । यदि इसे लोकसंस्कृति का पालना कहा जाय तो अतिशयोक्ति कदापि न होगी । आज भी बाली अपने सांस्कृतिक राशि को संजोये हुये आगे बढ़ रहा है । तेजी से बढ़ते हुये वैश्वीकरण की बयार से बाली भी प्रभावित हो रहा है, यह बात एक कटु यथार्थ के रूप में पूरे इण्डोनेशिया के समक्ष उपस्थित है । वैश्वीकरण की आँधी और बढ़ते पर्यटन के कारण बाली अपनी पहचान खोकर मात्र पर्यटन स्थल बनने की ओर अग्रसर है, यह विषय यहाँ के सामान्य जन से लेकर पण्डितों , विद्वानों एवं स्वयं राष्ट्रपति के लिये गम्भीर चिन्ता का विषय है । इसी चिन्ता को ध्यान में रखते हुये यहाँ “विश्व सांस्कृतिक मंच” का आयोजन किया गया और संस्कृति के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालते हुये संस्कृति-रक्षण की आवश्यकता पर बल दिया गया ।

बाली की चिन्तायें एवं उसके संकट लगभग वही हैं जो संकट समूचे दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों अथवा ये कहें कि विकासशील देशों के समक्ष है । एक स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता के अनुसार अब बाली के युवाओं में कृषि के प्रति आकर्षण नगण्य होता चला जा रहा है । ’सुबाक’ जो कि बाली में पहाड़ी क्षेत्रों में धान के ढालदार, सीढ़ीनुमा खेतों को पर्याप्त मात्रा में समान जल उपलब्ध कराने के लिये विकसित एक सामाजिक एवं धार्मिक जल-प्रणाली है, अब अपना गौरव खोती जा रही है । इस प्रणाली द्वारा सभी खेतों को समान जल उपलब्ध करवाने के लिये अधिक मानव-श्रम की आवश्यकता पड़ती है । युवाओं द्वारा खेती से मुँह मोड़ने के कारण आज पर्याप्त संख्या में लोग नहीं मिल पाते जो कि ’सुबाक’ प्रणाली द्वारा ठीक से सभी खेतों को जल उपलब्ध करवा सकें । जो बाली वासी स्वयं को ’सुबाक’ से जोड़कर बहुत गौरवान्वित अनुभव करते थे आज वही ’सुबाक’ की दुर्दशा देखकर अतीव दुःख का अनुभव कर रहे हैं ।

बाली में तीव्र गति से पर्यटन-उद्योग के विकास, बढ़ते नगरीकरण, होटल तथा मनोरञ्जन क्षेत्रों की बढ़ती माँग के कारण कृषि योग्य भूमि पर दबाव बढ़ रहा है, फलस्वरूप भूमि की उँची कीमत लगायी जा रही है, जो स्थानीय कृषकों को अपनी भूमि बेचने के लिये प्रेरित करती है । विडम्बना की बात यह है कि इण्डोनेशिया, जो कभी धान-उत्पादन में आत्मनिर्भर हुआ करता था आज अपने पड़ोसी देशों से धान के आयात पर निर्भर है । वहाँ का युवा वर्ग अब जल्दी से रोजगार कर तुरन्त पैसा कमाना चाहता है, उनमें सामाजिक एवं सांस्कृतिक क्रियाकलापों के प्रति कोई आकर्षण नहीं है ।

प्रो. जेन हैण्ड्रिक और पत्रकार विष्णु वर्द्धन , जिन्होंने बाली हिन्दू दर्शन पर एक किताब “त्रि हित कराना” लिखा है, के अनुसार जीवन में तीन सामंजस्यपूर्ण पहलुओं का होना अनिवार्य है । वे कहते हैं कि ईश्वर ने हमें जीवन दिया है और इस प्रकृति का सृजन किया है । प्रकृति मनुष्य की आवश्यकताओं को पूरा करती है । अतः मनुष्य को गाँवों की पारम्परिक संरचना बनाये रखने के लिये कुछ उत्तरदायित्व का निर्वहन करना आवश्यक है जैसे-

१. पूजा करने के लिये मन्दिर का निर्माण ।

२. प्रकृति का संरक्षण ।

३. समस्या पर सामूहिक रूप से बहस और उसका समाधान करना ।

पिछले कई दशकों में बाली के लोग पाश्चात्य सभ्यता की ओर अग्रसर हो रहे हैं । उनकी संस्कृति और परम्परा आज अनुष्ठान मात्र बनती जा रही है । बाली सहित समूचे इण्डोनेशिया पर इस संकट को देखते हुये ऐसा लगता है कि आगे आने वाले समय में इस देश की पहचान मात्र एक पर्यटन एवं मनोरंजन स्थल के रूप में सिमट कर रह जायेगी । हमारे समक्ष थाईलैण्ड का पर्यटन स्थल फुकेट और पटाया की दशा इस बात का एक प्रत्यक्ष उदारहरण है कि कैसे एक देश अपनी सांस्कृतिक विरासत से पूर्णतः वंचित होकर मात्र पर्यटन की दूकान बनकर रह गया ?

इण्डोनेशिया का विश्व संस्कृति मंच तेजी से विलुप्त होती अपनी सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण एवं उसके विकास हेतु निश्चय ही एक महत्त्वपूर्ण पहल है । इस कार्यक्रम से न केवल सांस्कृतिक समुदायों में एक चेतना का प्रवाह हुआ है बल्कि उनका अपनी संस्कृति के प्रति विश्वास और दृढ़ हुआ है ।

वैश्वीकरण एवं अरब इस्लाम के बढ़ते प्रभावों को देखते हुये इण्डोनेशिया, जो कि एक धर्मनिरपेक्ष देश है, के राष्ट्रपति सुसिलो बाम्बांग युधोयनो की चिन्ता स्वाभाविक है । यह विश्व सांस्कृतिक मंच (World Cultural Forum) उनकी अपने सांस्कृतिक विरासत के क्षरण के प्रति बढ़ती चिन्ता का ही परिणाम है । इस कार्यक्रम में इण्डोनेशिया सहित विश्व के विभिन्न देशों से आये प्रतिनिधियों द्वारा संस्कृति-संरक्षण एवं सम्वर्द्धन पर की गयी चर्चा एवं संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा अपने कार्यक्रमों में सांस्कृतिक पहलुओं का सम्मिलन निश्चय ही इण्डोनेशिया सहित विश्व के अनेक सांस्कृतिक रूप से सुदृढ़ देशों की संस्कृति को अक्षुण्ण रखने के लिये एक मार्ग प्रस्तुत करता है ।

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