यशपाल की कहानियों में यौन स्वछंदता मो0 शाबान खान


शोधार्थी, हिन्दी विभाग

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय

अलीगढ़

ई. मेल-shabanamu08@gmail.com

हिन्दी कथा साहित्य में प्रेमचंद युग के बाद मनोवैज्ञानिक कथाकारों की एक लंबी जमात सामने आई। इनमें जैनेन्द्र, देवराज, अज्ञेय तथा यशपाल विशेष उल्लेखनीय है। इन कथाकरों ने फ्रायड, एडलर तथा युंग के मनोविज्ञान को लेकर लेखन आरम्भ किया। अपनी कहानियों तथा उपन्यासों में यौन सम्बन्धों का खुला चित्रण किया। इनके यहाँ स्वछंद यौन संबंधों का कोई महत्व नहीं बल्कि महत्व है उसके कारणों का। इन कहानीकारों ने जिस प्रकार यौन संबंधों का चित्रण किया है, उसके मूल में सामाजिक विकृतियाँ, एकाकी जीवन, अतृप्त इच्छाएँ तथा आर्थिक विषमताएँ ही थी। अज्ञेय, देवराज तथा जैनेन्द्र की कहानियों में सामाजिक विषमता, एकाकी जीवन तथा अतृप्त इच्छाएँ ही यौन सम्बंधों के मूल में हैं, जबकि यशपाल की कहानियों में आर्थिक समस्या ही प्रधान समस्या है। यद्यपि यशपाल के यहाँ भी सामाजिक विकृति से उत्पन्न यौनाचार का चित्रण मिलता है। हिन्दी कथा साहित्य में यशपाल एक ऐसे कथाकार है, जिन पर माक्र्सवाद के साथ ही फ्रायड का भी प्रभाव पड़ा- “यशपाल में फ्रायड और माक्र्स मानों अपने शाश्वत विरोध का परित्याग कर साथ-साथ गलबांही लेकर घूम रहा है।’’1 फ्रायड के दर्शन को लेकर इन्होंने बहुत सी कहानियाँ लिखी, जिसमें प्रायः स्त्री पुरूष संबंधों को ही विषय बनाया गया है। ’ज्ञानदान’ कहानी संग्रह में संकलित ’ज्ञानदान’, ’गण्डेरी’ तथा ’80/100’ कहानियों का विषय यौन सम्बंध ही है। इसके साथ ही ’तुमने क्यों कहा था मैं सुंदर हूँ’, ’दो मुंह की बात’, ’धर्मरक्षा’ तथा ‘जिम्मेवारी’ आदि भी यौन सम्बंधों की कहानियाँ है। इन विभिन्न कहानियों के आधार पर ही यशपाल पर तरह-तरह के आरोप लगाए जाते रहे- “जहाँ तक इनकी रचनाओं का प्रश्न है, उनमें यौन ग्रन्थियों का ही जलवा अधिक जाहिर है। अपनी कृतियों में स्त्री-पुरूष को खुलकर यौन सम्बंध स्थापित करने की वकालत की है।”2

इस प्रकार विभिन्न आलोचकों ने कहा कि इनकी कहानियों का उद्देश्य यौन सम्बन्धों को बढ़ावा देना अथवा कुत्सित प्रभाव छोड़ना आदि माना है। परन्तु यह इस प्रकार का मूल्यांकन सही नहीं है। किसी लेखक का मूल्यांकन करते समय हमें उसके व्यक्तित्व और विचारधारा दोनेां को ध्यान में रखना चाहिये। यशपाल एक प्रगतिशील लेखक का उपन्यास पढ़कर सिर्फ इसलिए तिलमिला गए कि उसमें एक स्त्री अपने परिवार के पोषण के लिए गैर पुरूष से सम्बंध बनाती है और जब उसका पति उससे इस पाप के लिए पूछता है तो वह तर्क के साथ सफाई देती है । जिस पर यशपाल की प्रतिक्रिया कुछ इस तरह है- “यह है हमारी गिरवट की सीमा। आज ऐसा साहित्य बन रहा है, जिसमें व्यभिचार के लिए सफाई दी जाती है। यह साहित्य हमारी संस्कृति का आधार बनेगा।’’3 इस प्रकार की विचारधारा वाला व्यक्ति यौन संबंधों को बढ़ावा कैसे दे सकता है? यशपाल एक लेखक से पहले एक विचारक है। इसलिए ही उनकी कहानियों में विचारों की प्रधानता रहती है।’’ यह पहले मुनि है और बाद में ऋषि। यह कहानी के लिए कहानी नहीं लिखते।’’4 यही कारण है कि कथाकार समाज की समस्याओं पर विचार करके उसे कहानी का रुप देता है। इसी वजह से उनकी यौन सम्बंधों पर आधारित कहानियों में आर्थिक समस्या, सामाजिक विकृति अथवा अतृप्त इच्छाएँ ही पतन की जिम्मेदार हैं। वे इन समस्याओं का समाधान चाहते हैं। “यशपाल अपने पाठकों की समस्याओं को जानते हैं और उन्हें सब प्रकार की रूढि़यों से मुक्त करना चाहते हैं। इसलिए यशपाल की कहानियों में ‘नग्न चित्रण’ सोदेश्य है, यौन सम्बन्धों के प्रति इनका दृष्टिकोण स्वस्थ और उपयोगितावादी है।’’5

यशपाल जीवन की सार्थकता इस संसार में ही मानते है। वे प्रायः स्त्री-पुरूष को एक-दूसरे का पूरक मानते है। स्त्री और पुरूष दोनों का आपसी मिलन इस संसार की धुरी है। यदि ब्रह्यचर्य पालन और स्त्री विरक्त जैसी धारणाओं का पुरूष पालन करता है, तो यह प्रकृति के नियम के विरुद्ध और सांसारिक उत्तरदायित्व से मुँह मोड़ना है। इन्हीं विचारों को लेकर उन्होंनें अपनी कई कहानियों में वैराग्य का विरोध किया है। ‘ज्ञानदान’ और ‘धर्मरक्षा’ कहानियाँ विशेष उल्लेखनीय है। ‘ज्ञानदान’ कहानी ब्रह्यचारी ऋषि की कन्या सिद्धि और कठोर तपस्वी तथा ब्रह्यचारी ’नीड़क’ को केन्द्र में रखकर आगे बढ़ती है। नीड़क कठोर तपस्वी और आजीवन ब्रह्यचर्य का पालन करने वाला ऋषि है जो सदैव ब्रह्यचर्य का ही उपदेश देता है। परन्तु एक दिन पक्षियों का कलरव देखकर वह ज्ञान और वासना पर विचार करने लगता है। अभी नीड़क इन विषयों पर विचार ही कर रहा था कि सामने स्नान करती, यौवन के रंग में रंगी सिद्धि को निर्वस्त्र देखकर वह ज्ञान और वासना में और उलझ जाता है। तपस्वी को अनुभव होता है कि जो सामने ईश्वर के आदेश से प्रजनन का माध्यम है वही सत्य ज्ञान है। अपने मन में आए नवीन संचरण शक्ति के आवेश में वह सिद्धि के निकट जाकर कहता है- “जीवन की एक कड़ी के बाद दूसरी फिर तीसरी क्रमशः चलती है। जीवन के क्रम को चलाना ही सृष्टि का प्रधान कार्य है।’’6 नीड़क के द्वारा कहे ये शब्द ही इस कहानी का उद्देश्य है, जिसके लिए यशपाल ने यह कथा कही। वैराग्य जीवन पर आधारित कहानियों की श्रृंखला में एक नाम ’धर्मरक्षा’ कहानी का भी आता है। प्रोफेसर बृह्यबृत स्वयं ब्रह्यचर्य का पालन करते हैं और अपनी पुत्री ज्ञानवती को भी ब्रह्यचर्य के मार्ग पर चलाने का प्रयास करते हैं; परन्तु घर के नौकर से ज्ञानवती के सम्बंध हो जाते हैं। इसके साथ ही एक पिता जिसने अपने अंदर की वासना के ज्वर को ब्रह्यचर्य से हमेशा के लिए दबा दिया था, वह अपनी पुत्री से ही व्यभिचार करने का प्रयास करता है। इस कहानी में यशपाल ने केवल वैराग्य का विरोध ही नहीं किया अपितु यह माना कि वासना को दबाना उसे और प्रज्वलित करना है। कहानी में लेखक ब्रह्यचर्य, वैराग्य तथा सन्यास जैसी मान्यताओं की खिल्ली उड़ाते हुए दिखाई पड़ता है। “राधा रमण ने लाहौर के ‘ऐग्लोवैदिक’ कालेज में पढ़ते समय अब्रह्यचर्य से विनाश और ब्रह्यचर्य से शक्ति के मार्ग को पहचाना।’’7

यशपाल की यौन संबन्धी कहानियों में एक ओर सन्यास, वैराग्य तथा ब्रह्यचर्य का विरोध दिखाई पड़ता है तो दूसरी ओर वे समाजिक यर्थाथ का नग्न चित्रण से गुरेज़ नहीं करते । समाज में विभिन्न मानसिकता के लोग रहते हैं इनमें से कुछ ऐसे भी होते हैं जो स्त्री को सदैव भूखे भेडि़यें की तरह देखते हैं। अपनी अतृप्त वासना की तृप्ति के लिए तरह-तरह के प्रपंच करते हैं। सार्वजनिक स्थानों पर नृत्य करती कोई स्त्री हो अथवा खुली सड़क पर विचरण करने वाली भद्र महिला, वे केवल उनकी अश्लील टिप्पणियों का ही शिकार होती हैं। ऐसी मानसिकता वाले इंसान रुपी जानवरों को लेकर ‘गण्डेरी’, ‘80/100’ तथा ‘जिम्मेवारी’ कहानियों की रचना यशपाल ने की है। ‘गण्डेरी’ कहानी में मंच पर नृत्य करती नृत्यांगना की कथा है, जिसे तरह-तरह की अश्लील टिप्पणियों के साथ ही गालियों को भी सुनना पड़ता है। जबकि ‘80/100’ कहानी में पढे़ लिखे युवकों द्वारा स्त्रियों को उनके सौन्दर्य पर नम्बर देने की घटना का चित्रण किया गया है। ये युवक अपनी अश्लील हरकतें करते समय अपने परिवार की स्त्रियों को भूल जाते हैं। कथा का अंत लेखक ने उन्हें यही याद दिलाकर किया है।

यशपाल माक्र्सवादी कहानीकार हैं। इस कारण आर्थिक विषमता वर्ग विभाजन तथा आर्थिक समस्याएँ उनकी रचनाओं का आधार रहे हैं। यौन सम्बंधी कहानियों में भी आर्थिक विषमता को उन्होंने वैश्यावृत्ति तथा चरित्रहीनता के लिए दोषी माना आर्थिक तंगी से परेशान स्त्रियों द्वारा अपने जिस्म की नुमाइश से लेकर जिस्मफरोशी के धंधा करने तक का चित्रण लेखक ने ’कोकला डकैत, ’गण्डेरी’ तथा ’आबरू’ कहानियों में किया है। ’कोकला डकैत’ कहानी में एक ऐसी पहाड़ी स्त्री की कथा है, जो सिर्फ कुछ पैसों के लिए चलते फिरते राहगीरों को अपना शरीर सौंप देनें के लिए तैयार है, लेकिन फिर भी कोई खरीदार नहीं। मजबूरन वह लूटपाट करना शुरू कर देती है। उसके जीवन की इससे बड़ी और क्या त्रासदी हो सकती है कि वह टके के भाव अपनी कीमती इज्जत बेचने के लिए तैयार है, लेकिन बाजार में कोई खरीदार नहीं। ठीक इसी तरह आर्थिक विषमता की यौन सम्बंधी कहानी ’गण्डेरी’ है। इस कहानी में जवानी से फिसलती एक ऐसी नृत्यांगना और गाने वाली की कथा है, जो लोगों को पेट की आग के लिए रिझाना चाहती है, लेकिन लोग रीझने की बजाय खीझ रहे हैं। “उनकी आँखों में न मद था न मस्ती, बल्कि थी निराशा और कातरता। मानों वे दोनों हाथ फैलाकर कह रही थी-मैं तुम्हें रिझा रही हूँ, तुम रीझते क्यों नहीं? तुम्हारा मनोरंजन हो, तुम्हारा दिल बहले तो एक टुकड़ हमें भी मिले।’’8

यशपाल यर्थाथवाद के मुसाफिर है; इसलिए उनके यहाँ यर्थाथ केवल यर्थाथ रुप में मिलता है। वे उस पर कोई लीपा पोती नहीं करते हैं । इनके यहाँ आदर्श केवल उतना ही मिलता है, जितना कि होना चाहिये। उनकी कहानियाँ उस बोरी की तरह नहीं जिसमें आदर्श रूपी सामान को जबरदस्ती ढूँस ढूँस कर भरा गया हो। यही कारण है कि वे यर्थाथ की रस्सी को अपने हाथों से छूटनें नहीं देते। इसी वजह से वे मानव जीवन की सच्चाई और स्वभाविकता से मुँह न चुराकर आँखों में आँख डालकर बात करते हैं। इसी यर्थाथ और स्वभाविकता को लेकर उन्होंने ‘तुमने क्यों कहा था मैं सुंदर हूँ’ कहानी की रचना की। यह कहानी यौन स्वछन्दता का खुला दस्तावेज़ है। इसमें भुवाली में टी0बी0 का इलाज करवा रहे निगम और पड़ोसी माया की कथा है। माया का पति काफी अच्छी हैसियत वाला है, जिसने माया से दूसरा विवाह किया। क्षय रोग हो जाने की वजह से उसने माया को इलाज के लिए भुवाली भेज दिया। लेकिन स्वयं कभी भी वह प्रौढ़ व्यक्ति माया से मिलने नहीं आया। माया को जितना कष्ट रोग से है उससे कहीं ज्याद तकलीफ अपने अकेलेपन, अतृप्त इच्छाओं और जीवन की थकावट से है रोग के इलाज के लिए आवश्यक है- “पूर्ण विश्राम, अच्छा भोजन और प्रसन्न रहना।’’9 यह प्रसन्नता ही तो उसके जीवन में नहीं है। माया को यह प्रसन्नता मिलती है निगम में। इस प्रसन्नता के साथ ही वह निगम में अतृप्त इच्छाओं की पूर्ण तृप्ति तलाश करती है। इसी प्रसन्नता और तलाश से माया का रोग बराबर कम होता रहता है। परन्तु माया से रोग फिर से न फैल जाए, इस डर से निगम ने इस खुले निमंत्रण को ठुकरा दिया- “निगम के सिर में रक्त के हथौडे़ की चोटें सी अनुभव हो रही थीं। उसके शरीर के सब स्नायु तन गये क्या हो रहा है? शरम्!...बीमार लड़की।’’10

यशपाल के यौन स्वछंदता पर आधारित कहानियों के विश्लेषण में यह बात तो स्पष्ट है कि उन्होंने जिस यर्थाथ का सहारा लिया, वह नग्न यर्थाथ है। “यदि नग्न चित्रण से पाठक तिलमिला उठता है और इससे उसे ठेस लगती है तो चित्रण का उद्देश्य अस्वस्थ न होकर स्वस्थ है। यशपाल नग्न चित्रण में रखते नहीं है’’11 परन्तु उनके इस प्रकार के चित्रण की उपयोगिता है। उन्होंने वैराग्य, सन्यास, आर्थिक विषमता तथा समाज की कुत्सित मानसिकता को ही शारीरिक शोषण एवं यौनाचार का कारण माना है। जिसका वह समाधान करना चाहते

सन्दर्भ सूची-

1. ‘आलोचना’, डा0 देवराज, अक्टूर 1952 प्र0 78

2. ‘हिंदी उपन्यास और यर्थाथवाद’, त्रिभुवन सिंह प्रथम संस्करण पृ0 318

3. ‘फूलों का कुर्ता’, विप्लव प्रकाशन, प्रथम संस्करण पृ0 06

4. ‘आलोचना’ 1929 पृ0 73

5. ‘यशपाल की कहानी कला’, कुमारी अनुविग, प्रथम संस्करण 1966 पृ0 75

6. ‘ज्ञानदान’ विप्लव प्रकाश , पांचवा संस्करण 1959 पृ0 18

7. ‘धर्मरक्षा’, ’फूलों का कुर्ता’ कहानी संग्रह, विप्लव प्रकाशन चैथा संस्करण 1959 पृ0 83

8. ‘गण्डेरी’, ’ज्ञानदान’ संग्रह विप्लव प्रकाशन पाँचवा संस्करण 1959 पृ0 36

9. ‘तुमने क्यों कहा था मैं सुंदर हूँ’, विप्लव प्रकाशन, तीसरा संस्करण1965 पृ0 105

10. वही पृ0 116

11. ‘यशपाल की कहानी कला’ कुमारी अनुविग प्रथम संस्करण 1966 पृ0 75

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