यौनिक विज्ञापनों का एक अध्ययन (जेंडर न्याय के सन्दर्भ में) (A Study of Sensual Commercials in Conte

शोध पत्र सार:

मानव सभ्यता के विकास के पहले दिन से ही समाज में स्त्री-पुरुषों के संबंधों की शुरुआत हुई लेकिन जहाँ शुरुआती काल में ये संबंध बराबरी के समीकरण वाले थे वहीँ सभ्यता में खेती के विकास के साथ ही दोनों का कर्मक्षेत्र भी बंटने लगा और फिर उनके बीच जैविक विभेद (जो कि प्राकृतिक था) के साथ-साथ जेंडर विभेद भी बढ़ने लगा. जेंडर विभेद जिसके पीछे का कारण जैविक नहीं सामाजिक व्यवहार और सांस्कृतिकरण, सामाजीकरण की प्रक्रिया है और इसी अन्यायपूर्ण व्यवहार ने पित्रसत्तात्मक सामाजिक निर्मिती को जन्म दिया. पित्रसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था स्त्री-पुरुष के बीच की असमानताओं के लिए जैविक निर्धारणवाद को स्वीकार करती है अर्थात स्त्रियों पर पुरुषों के सामाजिक आधिपत्य को प्राकृतिक या कुदरती मानकर जायज और अपरिवर्तनीय ठहराती है. यह धारणा स्त्रियों की हीनतर सामाजिक स्थिति और उनके उत्पीड़न को सदियों से वैधता प्रदान करती रही है.

जेंडर विभेदीकरण को लगातार बनाए रखने वाली पित्रसत्तात्मक संरचना को चुनौती देने का साहस पश्चिम में पिछली सदी के पचासवें दशक में तो भारत में अस्सी के दशक में किया गया. जिस विभेद को अपरिवर्तनीय और प्राकृतिक मान लिया गया था उसी को नारीवादियों ने चुनौती दी. उन्होंने पश्चिम विचारक मिशेल फूको के तर्ज पर कहा- ‘Knowledge Works as Weapon of Power’ अर्थात ज्ञान या समाज की सत्ता जिसके हाथ में है समाज के नियम भी वही निर्धारित करता है; इसलिए उन्होंने पित्रसत्तामक सामाजिक व्यवस्था को चुनौती दी और एक-एककर इस सहज बना दिए गए विभेद के पीछे के सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक कारणों की तलाश की और साबित किया कि ये प्राकृतिक और अपरिवर्तनीय नहीं है. उन्होंने लैंगिक संबंधों में जनतांत्रिक समानता लाने पर बल दिया. जेंडर विमर्श के रेडिकल, मार्क्सवादी, उदारवादी विचार परम्पराओं ने स्त्रियों पर समाज द्वारा आरोपित मूल्यों पर सवाल खड़े किए और बताया कि ये सामाजिक अनुकूलन का परिणाम है. रेडिकल नारीवादियों ने जहाँ स्त्रियों की देहमुक्ति का नारा दिया वहीँ मार्क्सवादियों ने इसके पीछे विभेदकारी श्रम विभाजन को जिम्मेदार ठहराया. आशय यह है कि जिस तरह जैक देरिदा अपने विखंडनवाद के सिद्धांत में अर्थ की विभिन्नता की बात करते हैं उसी तरह जेंडर विमर्श में भी कई व्याख्याएं सामने आती हैं. जेंडर विभेद हम टी. वी. विज्ञापनों या धारावाहिकों में भी देखते हैं जहाँ स्त्रियों को स्टेरियोटाईप भूमिका में ही चित्रित किया जाता है.

विभिन्न सचेत विमर्शों के परिणामस्वरूप सामाजिक स्थिति में भी बदलाव आया. हम कह सकते हैं कि आज का समाज जेंडर आधार पर उतना विभेदकारी और अन्यायपूर्ण नहीं है जितना कि कुछ दशक पहले था. इसके पीछे भी कई कारण हैं; मसलन शिक्षा, जागरूकता, राजनीतिक, सामाजिक, क़ानूनी सक्रियता और रोजगार के अवसरों में दखल शामिल है. साहित्यिक स्तर पर भी कई रचनाकारों ने आधी दुनिया की संवेदना, पीड़ा को पुरजोर तरीके से उठाया और सामंजस्यपूर्ण, समानतापूर्ण संबंध पर बल दिया. उन्होंने स्त्री के अस्तित्व को मानवीय रूप में अनुभव करने और करवाने की प्रस्तावना की.

इस तरह कहा जा सकता है कि हालांकि जेंडर विभेद का इतिहास बहुत पुराना है और पिछले कुछ दशकों में होने वाले विचारों में परिवर्तन ने सामाजिक स्थिति को काफी हद तक बदला भी है और अभी भी कई पड़ाव बाकी हैं और हां; मीलों हम चल आएं हैं लेकिन मीलों अभी चलना है.

शोध विस्तार:

‘चिड़िया गाती थी पेड़ पर/ चहक-चहककर/ पेड़ काट दिए गए/ चिड़िया चुगती थी दाना आँगन में /फुदक-फुदककर/ आँगन संकरे कर दिए गए/ चिड़िया नहाती थी तलैया में/ छपक-छपककर/ तलैया पाट दी गई’1

जेंडर समाजशास्त्र का शब्द हैजिससे मनुष्यों के अलग-अलग व्यवहार को चिन्हित किया जाता है. जेंडर नाम के शब्द की प्रस्तावना John Money ने 1955 में की. उन्होंने समाज में Biological सेक्स और जेंडर को अलगाते हुए कहा कि ये दो शब्द मानव समाज के दो पक्षों की ओर इशारा करते हैं. ये दो शब्द मानव समाज में स्त्री-पुरुष के फर्क और पहचान को स्पष्ट करने वाले शब्द हैं लेकिन जहाँ Sex इस फर्क के जैविक पक्ष को सामने लाता है वहीँ जेंडर फर्क के साथ गुंथे हुए सांस्कृतिक पक्ष को सामने लाता है जो सामाजिक व्यवहार से निर्धारित होता है, जो बच्चों के जन्म से लेकर आखिर तक उनका साथ नहीं छोड़ता है. सेक्स का संबंध प्रकृति से और जेंडर का संबंध संस्कृति से है – इस कथन पर सभी नारीवादी विचारक एक है. वास्तव में जेंडर शब्द एक सोच है, एक विचारधारा है जबकि सेक्स पूरी तरह से एक जैविक सच है. सेक्स को जेंडर तक पहुँचाने के पीछे जो बल काम करता है उसकी पहचान पितृसत्ता के रूप में की जाती है. पितृसत्ता शब्द को आठवें दशक में नारीवादी विचारकों ने Introduce किया. उन्होंने पितृसत्ता को ऐसी व्यवस्था बताया जिसमें पुरुषों का स्त्रियों पर वर्चस्व रहता है और वे उसका शोषण और उत्पीड़न करते हैं.यह ऐसी व्यवस्था है जो पुरुष और स्त्री की असमानता के लिए ‘जैविक निर्धारणवाद’2 मत को नकारता है. पितृसत्तात्मक व्यवस्था स्पष्ट करती है कि सामाजिक व्यवस्था में स्त्री या पुरुष का वर्चस्व कोई व्यक्तिगत घटना नहीं बल्कि एक व्यापक सांस्कृतिक सोच है. गर्डा लर्नर के अनुसार –‘पुरुषों का समाज के सभी महत्त्वपूर्ण सत्ता प्रतिष्ठानों पर कब्ज़ा रहता है और महिलाएं इस सत्ता से वंचित रहती हैं. यह तथ्य ये साबित करता है कि पुरुष स्त्रियों से अधिक श्रेष्ठ हैं और इसलिए महिलाओं पर पुरुषों का आधिपत्य स्वाभाविक और वाजिब है.’3

इस सामाजिक व्यवस्था की बुनावट को समझने के लिए ये जानना जरुरी है कि आखिर पुरुषों को स्त्रियों पर वर्चस्व की जरुरत ही क्यों पड़ी. दरअसल पितृसत्ता के मूल में स्त्रियों की प्रजनन क्षमता है जिस पर पुरुषों का नियंत्रण मान लिया गया है. अतीत से सन्दर्भ लें तो आदिम काल में स्त्रियों की प्रजनन क्षमता को कबीले का संसाधन माना जाता था. पुरुष-स्त्री दोनों साथ-साथ शिकार पर जाते थे; विवाह नामक संस्था तब अस्तित्व में ही नहीं थी और स्त्री-पुरुष आपस में किसी से भी शारीरिक संबंध बनाने के लिए स्वतंत्र थे और बच्चे का पालन-पोषण कबीले की सामूहिक जिम्मेदारी होती थी. लेकिन जैसे-जैसे खेती का विकास हुआ और लोगों ने अपनी संपत्ति बनानी शुरू की तो उनमें ये चाह भी उत्पन्न हुई कि उनकी अर्जित संपत्ति उनके जैविक संतान को ही मिले जो तत्कालीन व्यवस्था में संभव नहीं था. फलतः एक ऐसी व्यवस्था की जरुरत आन पड़ी जिसमें किसी स्त्री की यौन सेवा सिर्फ एक ही पुरुष तक सीमित रहे और इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए विवाह नामक संस्था का जन्म हुआ और पितृवंशात्मक उत्तराधिकार का जन्म हुआ जिसमें शक्ति का हस्तांतरण पिता से पुत्र की ओर होता है. जब स्त्रियों का उपयोग बच्चे के प्रजनन के लिए होने लगा और धीरे-धीरे कबीला समाज कमजोर पड़ने लगा तो स्त्रियों का काफी समय घर में व्यतीत होने लगा जिससे पुरुषों ने उनकी श्रम-शक्ति पर भी नियंत्रण क्षमता हासिल कर ली और उनका आपस में कार्यक्षेत्र भी बंटने लगा. अब घर के भीतर-बाहर स्त्रियों को काम करने देने का अधिकार पुरुषों के पास हो गया जिससे स्त्रियाँ घरेलू कामों में सिमटने लगीं. इसे ‘पैतृकवाद’ द्वारा भी समझा जा सकता है जिसमें मुखिया का अपने परिवार पर नियंत्रण रहता है बदले में वह अन्य सदस्यों को आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा मुहैया करता है. परिवार के अन्य सदस्य इस सुरक्षा में प्रायः संतुष्ट रहते हैं. पैतृकवाद लिंग आधारित श्रम विभाजन के साथ-साथ लिंग आधारित सत्ता संबंधों को भी मजबूत करता है. इस व्यवस्था में स्त्री-पुरुष अपने जीवन में सचेत रूप से पितृसत्ता की उपस्थिति को महसूस नहीं कर पाते हैं और समाज में स्त्रियों की अधीनता को प्राकृतिक मानने लगते हैं.

वास्तव में पितृसत्ता सभी तरह के विभेद और उत्पीड़न को प्राकृतिक या कुदरती कहकर अपरिवर्तनीय और जायज ठहराती है. वे इसके मूल में जैविक फर्क देखते हैं जबकि पुरुष-स्त्री में जैविक फर्क बहुत मामूली है. जाति व्यवस्था और और नस्लवाद दो ऐसे बड़े उदाहरण हैं जो जैविक निर्धारणवाद को स्पष्ट कर देते हैं. इस मान्यता के अनुसार कुछ वर्ग या जाति पैदायशी तौर पर श्रेष्ठ है. अन्य, बौद्धिक क्षमता और निपुणताओं में उनसे कमतर हैं. ये ठीक उसी तरह है जैसे स्त्रियों को पुरुषों से कमतर मानना. ये मान्यता ही स्त्री उत्पीड़न को सदियों से वैधता प्रदान करता रहा है.

इसके उलट नारीवादियों ने बताया कि अलग-अलग समाज और संस्कृतियों में पुरुषत्व एवं नारीत्व की अवधारणा अलग-अलग है इसलिए उनका कहना है कि स्त्री-पुरुष की क्षमताओं के फर्क को जैविक संरचना से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए क्योंकि यह बच्चों के लालन-पालन की प्रक्रिया है जो लिंगों की क्षमता में भेद पैदा करती है. बचपन से ही लड़के-लड़कियों में भेदभाव शुरू हो जाता है. कपड़े के चुनाव, खेलकूद, व्यवहार इत्यादि के फर्क यद्यपि बहुत सामान्य होते हैं लेकिन धीरे-धीरे बढ़कर यही उनके अनुकूलन में बड़ा अंतर पैदा करते हैं. जैसे-लड़कों के खिलौनों में अक्सर बन्दुक, सिपाही, कार, हवाई जहाज इत्यादि मिलेंगे तो लड़कियों के खिलौने गुड्डे-गुड़िया, टेडीबियर, किचेन सेट इत्यादि ही होते हैं.इसी प्रकार लड़कों को क्रिकेट, कबड्डी, फुटबॉल खेलने की छूट मिलती है जबकि लड़कियों के लिए ये खेल अमूमन प्रतिबंधित होते हैं. बहादुरी, दिलेरी को पौरुष तो शर्मीलेपन, भावुकता जैसे मूल्योंको नारीत्व का गुण मान लिया जाता है. यहाँ तक कि कोई पुरुष अगर रोता भी है तो कहा जाता है- ‘क्या लड़कियों की तरह रो रहे हो’ या फिर कोई स्त्री बहादुरी दिखाती है तो उसे उसका व्यतिगत गुण नहीं माना जाता है बल्कि कहा जाता है कि मर्दों की तरह हिम्मती है. यहाँ मशहूर कवि सुभद्राकुमारी चौहान की ओज वाली कविता याद कर लेना मुनासिब होगा- ‘खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी’4– क्या ये झाँसी की रानी की व्यक्तिगत वीरता नहीं थी. यहीं से विचार पैदा होता है- ‘औरत पैदा नहीं होती बना दी जाती है’5. सच बात है कि लड़कियों को बचपन से सिखाया जाता है- सहनशील बनो जबकि लड़कों के उदंड रहने पर भी कहा जाता है- लड़का है, धीरे-धीरे सुधर जाएगा. जिन मूल्यों की शिक्षा लड़कियों को दी जाती है; अगर वो सही है तो लड़कों को भी वही सीख देनी चाहिए और गलत है तो दोनों के लिए होना चाहिए. ‘स्त्रियों पर आरोपित पवित्रता, मृदुता और आज्ञाकारिता के गुण प्राकृतिक विशिष्टता होने की बजाय मुख्यतः यौन वस्तुओं के रूप में उन्हें गढ़े जाने का नतीजा होती हैं.’6बीज रूप में ये सारे गुण स्त्री और पुरुष दोनों में विद्यमान होते हैं. सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और साहित्यिक ढांचा ही कुछ ऐसा होता है जो पुरुषों में कुछ खास गुण और स्त्रियों में खास तरह के गुण विकसित कर देता है. मर्दाना स्त्री और स्त्रैण पुरुष तो गाली के समान है. इसमें एक गुण समूह को विकसित करने का अर्थ दूसरे को धता बताना नहीं है. जरुरत तो दोनों गुणों का सार ग्रहण करने की है. अर्धनारीश्वर की भारतीय अवधारणा के पीछे संभवतः यही मान्यता रही होगी.

इसी प्रकार लिंग आधारित श्रम विभाजन के पीछे कोई प्राकृतिक नहीं बल्कि विचारधारात्मक मान्यताएं हैं क्योंकि एक तरफ तो स्त्रियों को शारीरिक रूप से कमजोर एवं कठिन श्रम के लिए अनुपयुक्त माना जाता है तो दूसरी तरफ घर के भीतर और बाहर ज्यादा मेहनत वाले काम करती हैं; जैसे-लकड़ी के बड़े-बड़े गट्ठर ढोना, ईंटें ढोना, धान की रोपाई इत्यादि. अक्सर समान काम के लिए स्त्री को पुरुषों की तुलना में मेहनताना भी कम ही मिलता है.

नारीवाद ने जेंडर पहचान के निर्माण के विषय में अनेकानेक विचार प्रदान किए हैं और स्त्रियों की शक्तिहीनता, उत्पीड़न तथा अधीनीकरण की व्यवस्थित सैद्धांतिक व्याख्या की है. विभिन्न नारीवादी सिद्धांत प्रवृत्ति, अंतर्वस्तु और प्रभाव के बारे में भिन्नता रखते हैं. विभिन्न सैद्धांतिक और दार्शनिक परिप्रेक्ष्यों में अवस्थित नारीवादी सिद्धांतों में तमाम विभिन्नताओं के बावजूद कुछ साझे सरोकारों को चिन्हित किया जा सकता है. दरअसल परिवार, शिक्षा, काम राजनीति, संस्कृति सभी जेंडर, सत्ता, वर्ग, नस्ल और लैंगिकता के संबंधों के जरिए सामाजिक संरचनाबद्ध होते हैं. जेंडर संबंध ऐतिहासिक तथा सामाजिक तौर पर निर्मित और अनुकूलित है न कि स्वाभाविक और अपरिवर्तनीय अतः इन संबंधों का पुनर्गठन संभव है. इस तरह सभी प्रकार के नारीवादी चिंतन का केन्द्रीय सरोकार इसी अनुकूलित सामाजिक सत्ता व्यवहार की सटीक पहचान करना है. अब तक नारीवाद सिद्धांत की जितनी धाराएं प्रमुख रूप से सामने आती हैं उनमें उदारवादी,समाजवादी/मार्क्सवादी और रेडिकल नारीवाद महत्त्वपूर्ण है.

अठारवीं सदी के आसपास उदारवादी नारीवादियों ने मानवीय गरिमा और स्त्रियों के जीवन की वास्तविक हकीकत के बीच व्याप्त अंतर्विरोधों को प्रखरता से सामने रखा था. इस विचारधारा ने आज़ादी और समानता के जनतांत्रिक मूल्य और स्त्री की अधीनता के बीच के अंतर्विरोध को भी रेखांकित किया. इस धारा ने जेंडर आधारित विभेद और परिवार तथा समाज में महिलाओं की दोयम स्थिति को तर्कसंगत ठहराने वाली आम धारणाओं को सामाजिक अनुकूलन और जड़ीभूत सांस्कृतिक मूल्यों की उपज के तौर पर समझने की भी कोशिश की. हिंदी कथाकार मृदुला गर्ग लिखती हैं- ‘मेरे लिए नारीवाद का मतलब ही है, धर्म और संस्कृति द्वारा बनाई गई हर परिभाषा और छवि का दुबारा आंकलन करना. परंपरा स्त्री को संस्कृति की रक्षिका मानती रही है. नारीवाद ने सीख दी है कि हर स्त्री अपने कर्म को सामूहिक मापदंडों पर न तौलकर अपने विवेक के आधार पर तौले.’7 समानता और न्याय की धारणाओं के सन्दर्भ में उदारवादी नारीवाद ने विवाह नामक संस्था के मूल्याङ्कन का प्रयास किया. ये सभी विचार महिलाओं की समानता, क़ानूनी अधिकार की मांग, समान अवसरों तक पहुंच, सार्वजनिक दायरों में शामिल होने के प्रति महिलाओं के अधिकार तथा मानव के तौर पर अपने अन्दर निहित संभावनाओं को पूरा करने का अवसर आदि मसलों पर आधारित अभियानों का आधार बने.

उदारवादी नारीवाद उदारवाद की दार्शनिक परंपराओं की देन है, जो 17वीं सदी से 18वीं के बीच पश्चिम में हुए सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक बदलाव की उपज थी. इस बदलाव ने औद्योगिकीकरण और शहरीकरण की प्रक्रिया को तेज किया फलतः नई वर्ग संरचना में मध्य वर्ग का प्रभावी उदय हुआ जिसने समान अवसर, मानवतावादी मूल्य और समान नागरिक अधिकारों की वकालत की. जेरेमी बेंथम, जॉन स्टुअर्ट मिल, मेरी वोल्स्टोन क्राफ्ट जैसे विचारकों ने मानवीय स्वभाव में बदलाव, कानूनी सुधार औरसमाज सुधार (शिक्षा, चयन की आज़ादी, पुरुषों पर निर्भरता में कमी) द्वारा महिलाओं की सामाजिक और राजनीतिक स्थिति में बदलाव लाने के लिए जो सैद्धांतिक आधार तैयार किया उसने बाद में नारीवाद के विकसित विचार के लिए नींव का काम किया. उदार नारीवाद मौजूदा अन्यायपूर्ण परिवार व्यवस्था का प्रतिरोध नहीं करती बल्कि सुधारवादी प्रक्रिया में विश्वास करती है. यह धारा सामाजिक व्यवस्था में पितृसत्ता की गहरी जकड़न की भी अनदेखी करती है.

मार्क्सवादी नारीवाद को समझने के लिए एंगेल्स की किताब ‘परिवार, व्यक्तिगत संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति’ बहुत उपयोगी है. एंगेल्स का कहना है कि ‘शुरुआती समाज में स्त्रियाँ घरों के अन्दर उत्पादन के साधनों पर और पुरुष घर के बाहर के उत्पादन के साधनों पर नियंत्रण रखते थे. चूँकि ऐतिहासिक तौर पर घर के बाहर का उत्पादन ज्यादा महत्त्वपूर्ण होता गया इसलिए स्त्री मुक्ति तब तक संभव नहीं है जब तक स्त्रियाँ घरेलू काम छोड़कर घर के बाहर के उत्पादक काम को नहीं स्वीकारतीं.’8 इनका मानना है कि पूंजीवाद के नेतृत्व में पितृसत्ता न केवल समर्थन पाती है बल्कि सुदृढ़ होती है. पूंजीवादपूर्व समाज में खेत के साथ घर भी उत्पादन का स्थान था और पुरुष, स्त्रियाँ, बच्चे इस उत्पादन में संयुक्त रूप से भाग लेते थे. औद्योगिक पूंजीवाद के आगमन के साथ, सभी उत्पादन घरों के बाहर फैक्ट्रियों में किया जाने लगा. जैसे-जैसे उत्पादन की ये प्रणाली विकसित होती गई, स्त्रियाँ और बच्चे उत्पादन की इस प्रक्रिया से बाहर होते चले गए और ये विचार हावी होता गया कि स्त्रियों को घरों में रहकर अपने पति और बच्चों की देखभाल करनी चाहिए. जो स्त्रियाँ घर के बाहर अब भी कार्यरत थीं उन्हें कम मजदूरी वाले रोजगारों में जाना पड़ा. अब ये धारणा प्रबल होने लगी कि स्त्रियों की आय पूरक होती है और पुरुष वास्तविक जीविकोपार्जन करते हैं.भारतीय समाज में देखें तो बीड़ी बनाने, लेस बनाने, टोकरी वगैरह बनाने को अक्सर फुर्सत में किया जाने वाला काम मान लिया जाता है. इस तरह पूंजीवाद महिलाओं के उत्पीड़न को सघनता देता है और पूंजीवाद के बने रहने के लिए इस उत्पीड़न में इजाफा जरुरी भी है पारिवारिक संरचना के भीतर मार्क्सवाद मानता है कि जब कोई स्त्री पत्नी बनती है तो वह अपने समूचे व्यक्तित्व और सेवाएँ पति को समर्पित कर देती हैं. पति की सत्ता इसी बात में अन्तर्निहित होती है कि वह अपनी पत्नी के व्यक्तित्व और उसके घरेलू काम सभी पर कितना नियंत्रण रखता है इसलिए स्त्रियों को आज़ादी तब तक हासिल नहीं हो सकती जब तक स्त्रियों को घरेलू काम के पैसे नहीं मिलते. इस तरह विवाह एक प्रकार से अधीनता का संबंध है भले ही स्त्रियाँ इसे स्वेच्छा से अपनाती हैं. मार्क्सवाद ये भी मानता है कि स्त्रियों के घरेलू श्रम ने पुरुष और पूंजीवाद दोनों को लाभ पहुँचाया है. घर के भीतर, स्त्री का अवैतनिक श्रम दो चीजें मुहैया करता है- देखभाल और भोजन आदि बनाने के कारण पुरुष श्रमिकों को दैनिक श्रम; दूसरे बच्चा जनने और उसके पलान-पोषण के जरिए भविष्य की श्रम शक्ति. इस प्रकार लिंग के आधार पर श्रम विभाजन में स्त्री पूंजीवाद और पुरुष दोनों की सेवा करती हैं.

मार्क्सवादी नारीवाद भी ये मानती है कि स्त्रियों का उत्पीड़न मूलतः परिवार में उनकी पारंपरिक स्थिति के कारण ही होता है लेकिन इनका जोर श्रम पर होता है यानी स्त्रियों को सार्वजनिक उत्पादन से बाहर कर दिया गया जिसके कारण वह घर की निजी दुनिया में घरेलू कामों में बंधकर रह जाती हैं. यद्यपि मार्क्सवादी नारीवाद ने पूर्व की अपेक्षा पितृसत्ता का बेहतर और ज्यादा वैज्ञानिक विश्लेषण किया लेकिन यह सिद्धांत भी प्रजनन और लिंग के आधार पर श्रम विभाजन को उतनी गंभीरता से नहीं लेता है और स्त्रियों के श्रम को पूंजीवाद के सन्दर्भ में ही देखता है. इस विमर्श की सबसे बड़ी सीमा ये है कि पूरा विमर्श पुरुष द्वारा स्त्री के यौन उत्पीड़न की तुलना में पूंजी को ही ज्यादा उत्पीड़क और दोषी मानता है; जो उत्पीड़न का केवल एक पक्ष दिखाता है.

रेडिकल नारीवाद की शुरुआत साठ-सत्तर के दशक में मूलतः उदारवादी नारीवाद के खिलाफ प्रतिक्रियास्वरूप और स्थापित लिंगवाद के खिलाफ हुई थी. चूँकि इसकी शुरुआत ही पुरुष लैंगिकवाद के खिलाफ हुई थी इसलिए अपने प्रारंभिक स्वरुप में यह अतिप्रतिक्रियावाद का शिकार हो गया लेकिन समय के साथ-साथ ये उग्रता थोड़ी कम हुई लेकिन मूल चेतना वही रही. सीमोन द बुआ की किताब ‘स्त्री उपेक्षिता/ द सेकेण्ड सेक्स ने मील के पत्थर का काम किया. इसी किताब ने सबसे पहले ये स्थापना की कि स्त्री पैदा नहीं होती बल्कि बना दी जाती है. रेडिकल नारीवाद का मानना है कि गर्भाधान, बच्चे के जन्म, पालन-पोषण की समस्याओं के कारण स्त्रियाँ प्राकृतिक स्थिति में खुद को कमजोर महसूस करती रही हैं. नतीजतन उत्तरजीविता के लिए वे पुरुषों पर निर्भर रहने लगीं. स्त्रियों की इस निर्भरता का फायदा उठाते हुए पुरुषों ने अधीनता के सार्वभौम ढांचे का निर्माण किया. ‘द डाएलेकटिक्सऑफ़ सेक्स: द केस फॉर फेमिनिस्ट रेवोल्यूशन’ नामक किताब में शुलामिथ फायरस्टोन ने इस उत्पीड़न को समाप्त करने के लिए प्रजनन में स्त्री की भूमिका ही समाप्त करने का प्रस्ताव रखती हैं और इसके लिए तकनीकी क्रांति का आह्वान करती हैं.9 यह विचार कहता है कि स्त्री-पुरुषों की स्थितियों में फर्क सामाजिक संरचना की देन है जो पितृसत्तात्मक व्यवस्था में असामान्य रूप से बढ़ जाता है. उत्पीड़न की इस स्थिति को केवल पितृसत्ता को नष्ट करके ही ख़त्म किया जा सकता है. इसलिए रेडिकल नारीवाद ने एक पूर्ण यौन क्रांति, जो परंपरागत यौन पहचानों को नष्ट कर देगी का नारा दिया. इस धारा ने स्त्री- समलैंगिकवाद, पुरुषों से पूर्ण अलगाव जैसे उग्र प्रस्ताव रखे साथ ही पितृसत्ता के हर प्रतीक पर पुरजोर हमला किया. रेडिकल नारीवाद ने दरअसल उस मायावी दुनिया की सचाई को उजागर किया जिसमें पुरुष स्त्रियों के शरीर पर और फिर उनके पूरे व्यक्तित्व पर अपना नियंत्रण कर लेते हैं.

यद्यपि नारीवाद की इस धारा ने विमर्श की पूरी पद्धति को एक क्रान्तिकारी मोड़ दिया लेकिन इसकी कुछ सीमाएं ऐसी हैं जिसपर विचार करना अपरिहार्य है. रेडिकल विचार परंपरा समूची असमानता के लिए जिम्मेदार पितृसत्ता के ऐतिहासिक, आर्थिक और भौतिक आधार की अनदेखी करती है और जैविक निर्धारणवाद के तर्क में फंस जाती है जो एकांगी दृष्टि की ओर ले जाता है. दूसरा, रेडिकल नारीवाद पुरुष मुक्त स्त्री जीवन की कल्पना करती है लेकिन वर्तमान व्यवस्था में समूचे आर्थिक आधार पर पुरुषों का आधिपत्य है और जब तक इस क्षेत्र के समीकरण में सुधार नहीं होता है तब तक पुरुष मुक्त स्त्री जीवन की कल्पना दूर की कौड़ी ही लगती है. इसी तरह एक ऐसे स्त्री-समाज की कल्पना करना जिसमें पुरुष पूर्णतः अनुपस्थित रहे, एक प्रकार से सामाजिक अतिवाद की ओर ले जाता है. दरअसल जरुरत पुरुषों से मुक्ति की नहीं होनी चाहिए बल्कि बराबरी का हक पाने की है. विमल थोराट कहती हैं- ‘सत्ता केंद्रों और सत्ता समीकरणों के विरोध के लिए वैचारिक सोच पैदा करके व्यवहारिक स्तर पर इसमें विद्रोहात्मक रवैया पैदा करना स्त्री-विमर्श की मूल चेतना है.’10

विमर्शों से अलग जमीनी हकीकत को समकालीन भारतीय सन्दर्भ में देखें तो पितृसत्ता की सक्रिय उपस्थिति हमें विवाह के तरीके, पारिवारिक ढांचा, रोजगार के अवसर जैसे क्षेत्र में दिखाई देती है. परिवार के भीतर किसी एकल पुरुष या निःसंतान पुरुष को प्रायः अभागा माना जाता है जबकि यदि कोई महिला भी ऐसी ही हालत में हो तो उसे अशुभ और संभवतः खतरनाक मान लिया जाता है.दहेज़ जैसी रस्में और दायित्व व्यापक और खर्चीले होते हैं,जो सामाजिक परम्पराओं के दबाव में लगभग अनिवार्य मान लिया गया है, के कारण लड़कियां बोझ मान ली जाती हैं.विवाह के माध्यम से लड़कियों की यौनिकता पर नियंत्रण रखना समुदाय को बांधे रखने और व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरुरी बना दिया गया है. समाज में काम का लैंगिक विभाजन, जिसमें स्त्रियों का कार्यक्षेत्र घर है और पुरुषों का बाहर काम करके रोजी-रोटी कमाना होता है. स्त्रियों के घरेलू काम चूँकि प्रत्यक्ष रूप से उत्पादक नहीं होते हैं इसलिए महत्त्वहीन मान लिया जाता है और ये जुमला भी सुनने मिल जाता है – ‘घर का ही काम तो कर रही हो’; हालांकि घर के काम अंतहीन होते है जो 24 घंटे लगातार चलने वाला काम है जबकि हर अन्य क्षेत्र में काम के घंटे निश्चित होते है. रोजगार बाज़ार और उद्योग क्षेत्र में भी श्रम का पक्षपातपूर्ण विभाजन साफ़ दिख पड़ता है. महिलाओं के लिए शिक्षिका, नर्स, रिसेप्शनिस्ट जैसे काम मुफीद माने जाते हैं. आज भी सामाजिक मान्यता तो यही है कि घर तो पुरुष की कमाई से ही चलता है इसलिए स्त्री भी परिवार की मुखिया हो सकती है ये अस्वाभाविक बात मान ली जाती है.

21 वीं सदी में जनसंचार के सबसे बड़े माध्यम में से एक विज्ञापनों को भी देखें तो यहाँ भी स्त्रियों की जो छवि चित्रित की जाती है वो बहुत ही अन्यायपूर्ण और सामंती है. विज्ञापन आधुनिक औद्योगीकृत समाज का अनिवार्य हिस्सा है. विभिन्न आकर्षक विज्ञापनों के माध्यम से व्यावसायिक प्रतिष्ठान अपने उपभोक्ताओं की कामनाओं को उद्दीप्त (Stimulate) कर उनको संज्ञानात्मक (Cognative) स्तर पर प्रभावित करते हैं. इस तरह उपभोक्ता का मनोविज्ञान और फिर व्यवहार विज्ञापनों द्वारा निर्धारित किया जाता है.

विज्ञापनों में पुरुष और स्त्री विभिन्न मनोवृति और सामाजिक भूमिका के साथ चित्रित किए जाते हैं. जहाँ पुरुष प्रायः कार्यकारी और प्रबल (Predominant) भूमिका में दीखते हैं वहीँ महिलाएं प्रायः सहयोगी या पारिवारिक भूमिका और Pleasure Provider के रूप में आती हैं; उनकी सर्जनात्मकता या कार्यकारी भूमिका सिरे से गायब दिखती है. विज्ञापनों में कपडे धोने की मशीन, कपडे की धुलाई के साबुन, रसोई के सामान की खरीदारी करते हुए, रसोई में काम करते, बच्चे की देखभाल करते हुए हर बार स्त्रियाँ ही दिखाई जाती है,यही सोच बच्चों से जुड़े विज्ञापनों में भी दीखता है; सभी तरह के हेल्थड्रिंक माएं ही और लड़कों को ही पिलाती दिखाई जाती हैं. इसके बावजूद कि हम सब जानते हैं कि आज घर के बाहर के कार्यक्षेत्र में कोई ऐसा हिस्सा नहीं है जहाँ स्त्रियों ने अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज नहीं कराई है, बल्कि कई जगह तो वे शीर्ष पदों पर कार्यरत हैं. इस तरह के विज्ञापनों को स्त्री की मुक्ति के साधनों के रूप में दिखाना उनकी समाज स्वीकृत घरेलू भूमिका को और मज़बूत ही बनाता है. इसी तरह कई विज्ञापनों में सिर्फ पुरुषों की यौनिक कामनाओं को लक्ष्य बनाते हुए महिलाओं को ख़ास तरह की कामोत्तेजक भंगिमा में चित्रित किया जाता है जिससे उनका वस्तुकरण संभव होता है. ऐसे विज्ञापन निश्चित सामाजिक निर्मिति (Social Constructs) को बनाए रखने में औजार (Tool) का काम करते हैं जिसका नकारात्मक प्रभाव हम बढ़ते यौन अपराधों में देख सकते हैं. इसे Erving Goffman‘Commercial Realism’11 कहतेहैं.

हालांकि विज्ञापन प्रसारण अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार में शामिल है, लेकिन अधिकार के साथ कुछ जिम्मेदारियां भी निहित होती हैं और व्यावसायिक प्रतिष्ठान जेंडर आधारित सामाजिक निर्मिति (Social Constructs) को बदलने की अपनी जिम्मेदारी से मुक्त ही नहीं बल्कि उसे बनाए रखने में सक्रिय दीखते हैं.

देश की शीर्ष 50 विज्ञापन एजेंसियों में एक में भी महिला कार्यकारी भूमिका में नहीं हैं. विज्ञापनों की आत्म नियमन (Self-Regulatory) करने वाली संस्था ASCI के भी प्रमुख 46 पदों में से सिर्फ 10 पर महिला कार्यरत हैं और इसके मिशन/चिंताओं में भी(to maintain & enhance the public confidence in advertising)12 जेंडर प्रश्न सिरे से गायब है. 1997 के विशाखा केस के फैसले में उच्चतम न्यायालय ने निर्देश दिया था कि 10 से ज्यादा कर्मचारी वाले सभी प्रतिष्ठानों में Sexual Harassment Cell होना ही चाहिए लेकिन व्यावसायिक प्रतिष्ठानों ने आजतक इस पर अमल नहीं किया है.

उपर्युक्त बातें बताती हैं कि व्यावसायिक प्रतिष्ठान, जो कि अपने विज्ञापनों से अन्यायपूर्ण सामाजिक निर्मिति (Social Constructs) को बदलने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं; लेकिन अपने पितृसत्तात्मक नियंत्रण और सामंती स्वरुप के कारण वे यहाँ लगातार विफल रहे हैं.

इस तरह हम देखते हैं कि यद्यपि अतीत से लेकर वर्तमान तक स्त्री विमर्श के विभिन्न आयामों के माध्यम से सामंती समाज में जागरूकता पैदा कर सामाजिक निर्मिती को बदलने का लगातार प्रयास किया जाता रहा है पर समाज की विभिन्न संस्था अपनी मूल सामंती स्वरुप के कारण इस अन्यायपूर्ण निर्मिती को बदले की इच्छाशक्ति नहीं दिखाती है फलतः बाहरी तौर पर स्थिति बहुत हद तक बदली हुई दिखने के बावजूद हक़ीकत आंतरिक रूप में नहीं बदलती है.

‘वे कहते थे/ बोला न करो/ कुछ गलत बोल गई तो/ लेने के देने पड़ेंगे/ वे कहते थे/ चला न करो/ अपनी मर्जी से/ कहीं गलत चल पड़ी तो/ लेने के देने पड़ेंगे/ एक दिन मैंने कहा/आज मैं चूल्हा नहीं जलाती/ नमक गलत पड़ गया तो/ कपडे नहीं धोती/ कपड़े मैले रह गए तो/ घर साफ़ नहीं करती/ सफाई ठीक नहीं हुई तो/ लेने के देने पड़ेंगे’13 - अनामिका

सन्दर्भ सूची

1. ममता उपाध्याय, आजकल, मई, 2011 (महिला लेखन विशेषांक)

2. निवेदिता मेनन, नारीवादी विचारधारा में जेंडर विभेद, नारीवादी राजनीति:संघर्ष और मुद्दे, (सं-साधना आर्य, जिनी लोकनीता, निवेदिता मेनन), दिल्ली विश्विद्यालय प्रकाशन, 2001

3. Gerda Lerner, Creation of Patriarchy, Oxford University Press, 1986

4. सुभद्राकुमारी चौहान, झाँसी की रानी (कविता)

5. सीमोन द बुआ, स्त्री उपेक्षिता, 2005

6. उदारवादी नारीवाद, मालती सुब्रह्यण्यम, नारीवादी राजनीति:संघर्ष और मुद्दे, (सं-साधना आर्य, जिनी लोकनीता, निवेदिता मेनन), दिल्ली विश्विद्यालय प्रकाशन, 2001

7. मृदुला गर्ग, आजकल, मई, 2011 (महिला लेखन विशेषांक)

8. फ्रेडरिक एंगेल्स, परिवार, व्यक्तिगत संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति, राहुल प्रकाशन, दिल्ली, 2009

9. शुलामिथ फायरस्टोन, डायलेकटिक्स ऑफ़ सेक्स: द केस फॉर फेमिनिस्ट रेवोल्यूशन, उद्धृत- रेडिकल नारीवाद, सीमा दास, नारीवादी राजनीति:संघर्ष और मुद्दे, (सं-साधना आर्य, जिनी लोकनीता, निवेदिता मेनन), दिल्ली विश्विद्यालय प्रकाशन, 2001

10. विमल थोराट, आजकल, मई, 2011 (महिला लेखन विशेषांक)

11. Goffman, E. (1979). Gender advertisements (1st Harper colophon ed.). New York, NY: Harper & Row.

12. Moto, The Advertising Standard Council of India

13. अनामिका, आजकल, मई, 2011 (महिला लेखन विशेषांक)

14. विमल थोराट,आजकल, मई, 2011 (महिला लेखन विशेषांक)

Mukesh Burnwal

Asst. Prof., Vivekananda College

Vivek Vihar, Delhi University

Mob. – 9810418613

Mukesh0341@gmail.com

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