राजनीति के संदर्भ में आधुनिकता एवं उत्तराधुनिकता - डॉ. मो. मजीद मिया


क) आधुनिकता एवं उत्तराधुनिकता दोनों के अलग-अलग रास्ते हैं एवं दोनों के ही सकारात्मक एवं कमजोर पक्ष भी हैं। दोनों पक्षों को समझे बिना आधुनिक एवं उत्तराधुनिक का सही अध्ययन कर पाना सम्भव नहीं हैं। आधुनिकता की सबसे सबल पक्ष है लोकतन्त्र, सामाजिक न्याय तथा प्रगति संबंधी धारणाओं की सेक्युलर व्याख्या। पिछले दिनों के जनान्दोलन में भारत मे ये आदर्श तथा उनके अभ्यास का महत्व घटा नहीं बल्कि और बढा है। हम उत्तराधुनिक काल में पहुँच तो गए हैं, पर लोकतन्त्र, न्याय एवं प्रगति सम्बन्धी आधुनिक राजनीतिक आदर्श के साथ अब हमारा कोई सरोकार नहीं है कहकर समसामयिक इतिहास को गलत ढंग से समझना नहीं है।

कमजोर पक्ष – 18वीं एवं 19वीं शताब्दी के आधुनिक यूरोप मे लोकतन्त्र, न्याय एवं प्रगति सम्बन्धी धारणा परिभाषित होकर भी, इस सिद्धांत के परिधि के अन्दर विशिष्ट वर्ग- खासकर गोरे, उच्च-मध्यवर्गीय यूरोपी लोग ही मात्र आते हैं। देखा गया है कि बहुत समय तक महिलाए उचित राजनीतिक, आर्थिक अधिकार नहीं पाई थी। यूरोप में लोकतन्त्र की बातें होने के बावजूद भी अफ्रीका एवं एशिया के साथ संसार के अन्य भू-भागों तक औपनिवेशवाद तथा दासत्व वाले सोंच के लोग प्रश्रय लेते रहे हैं। सामाजिक न्याय एवं लोकतन्त्र सभी का नहीं हो सका है। आज देखा जाए तो प्रगति और विकास कुछ लोगों या समूह का मात्र होकर रह गया है।

सबल पक्ष – राजनैतिक एवं नैतिक मुद्दा को परलौकिक सेक्युलर धरातल में विस्थापित करने के साथ-साथ आधुनिकता ने संस्कृति जगत एवं जीवन के हरेक वृहत ‘वैज्ञानिक’ विश्व दृष्टि का निर्माण किया है।

कमजोर पक्ष – वैज्ञानिकों की दृष्टि यूरोपीय परिप्रेक्ष्य में विकसित होने के कारण उसे विश्व व्यापी कहकर प्रस्तुत किया जाता है। जबकि ओपनिवेशवाद के इतिहास से पहले ही विज्ञान तथा शहरीकरण के छुटपुट अभ्यास एशिया एवं अफ्रीकी देशो में भी हुआ था। पर पश्चिमी आधुनिकता ने खुदकों केंद्र में स्थापित कर लिया और एशिया एवं अफ्रीकी देश उनके आधुनिकता के स्वरूप का पीछा करते हैं यह बातें कहते हुए नजर आते हैं। यूरोपियों ने विश्व के सामने कला, साहित्य, शैली एवं विज्ञान के क्षेत्र मे खुद को विश्व व्यापी बनाते हुए यह समझते हैं कि पूर्वी एवं दक्षिणी देश मात्र प्रतिमान के रूप में आगे बढ़ा है। वे लोग आज पूरे विश्व को पश्चिमी आधुनिकता के रंग में पुनःनिर्माण करके एक ही ‘समानधर्म’ वाला विश्व बनाने का प्रयास कर रहे हैं।

सबल पक्ष – आधुनिकता के सांस्कृतिक/सौंदर्यपरक पाटो – आधुनिकतावाद के अंतर्गत शैलीगत प्रयोग के माध्यम से आधुनिकता के विरोधाभाष की आलोचना किया जा रहा है। इसे छोडकर उपभोक्ता संस्कृति के अंदर होने वाले मानव के यांत्रिकरण के विरोध करके कुछ प्रयोग से उच्च एवं लोकप्रिय संस्कृति के बीच की खाई मिटाने तक की कोसिस की जाती रही है।

कमजोर पक्ष – के अंतर्गत आधुनिकवाद, उच्च आधुनिकतावाद में रूपांतरित होते जाने के कारण इसकी राजनीतिक तीक्ष्णता घटती जा रही है और जिसकी वजह से उच्च संस्कृति एवं लोकप्रिय संस्कृति के मध्य की खाई घटने की वजाए बढ़ता ही जा रहा है।

ख) उत्तराधुनिकतावाद मे भी आधुनिकतावाद की तरह ही सबल एवं कमजोर पक्ष दोनों हैं।

समस्या – उच्च एवं लोकप्रिय संस्कृति के बीच की दूरी मिटने के साथ-साथ कला, साहित्य एवं संस्कृति के उपभोक्ता संस्कृति के बाजार में बिकने वाला कोकाकोला, जूते, कपड़े, श्रिंगार के प्रसाधन, कॉमिक तथा मोबाइल जैसे वस्तुए बनाने लगी है। मार्क्सवादीयों ने इसी कारण आधुनिकतावाद के पक्ष में एवं उत्तराधुनिकता के विपक्ष में तर्क दिए हैं। आधुनिकतावाद के संस्कृति में कला, साहित्य एवं उपभोक्ताओं के बीच एक अंतर था। उसी अंतर का प्रयोग कर आधुनिकवादी लेखकों एवं कलाकारों ने उपभोक्ता संस्कृति की आलोचना करने के साथ उसे समीक्षात्मक दूरबीन से देखने की सुरुयात की थी। अब उत्तराधुनिकतावादी संसार में यह अंतर नहीं रहा और कला एवं साहित्य भी सुपर मार्केट में बिकने वाला उपक्रम बन गया। दूसरे शब्दों में वह भी पूंजीवाद के पिछले चरण व पूंजीवादी संस्कृति का नमूना बन गया है।

सबल पक्ष – उत्तराधुनिकता मे ‘सत्य’ एकात्मक, बहुल तथा सार्विक न होकर स्थानिक होता है, इस मान्यता का समर्थन करते हुए बहुसंस्कृतिक, बहुभाषी तथा बहुजातिय समाज निर्माण के लिए महत्वपूर्ण सैद्धांतिक योगदान दिए हैं। उच्च वर्गीय यूरोपीय लोगों का सिद्धान्त मात्र गलत एवं सही न होकर, काला-गोरा, अमीर-गरीब, पुरुष-महिला, कृषक तथा साहूकार तक सभी का अपना-अपना सिद्धान्त एवं दृष्टिकोण होने का मत जाहीर किया गया है। इस प्रकार का विचार लोकतान्त्रिक है और इसी के माध्यम से उत्तराधुनिकता ने लोकतन्त्र, सामाजिक न्याय तथा विकास संबंधी आधुनिक मान्यताओं एवं कथनों का पुनः लेखन करता है। वह यह तर्क देते हैं कि, आदर्श कुछ लोगों के बदले सभी के लिए उपलब्ध होना होगा, साविक न होकर स्थानिक होना होगा। अर्थ एवं प्रविधि के क्षेत्र में भी उत्तराधुनिकता ने स्थानिकता की ही वकालत करता हैं। विकास एवं प्रगति संबंधी यूरोपीय मोडेलों के सार्विकता को अस्वीकार करने वाले स्थान का विकास एवं वहाँ के भू-राजनीति, संस्कृति एवं सामाजिक परिप्रेक्ष मे रखकर समझना होगा साथ ही आर्थिक विकास के मुद्दा को केंद्र के साथ नहीं बल्कि स्थानिकता के साथ जोड़कर देखना होगा। इस प्रकार के आग्रह के कारण स्थानिकता, बहुलता, बहुल सत्यप्रति, बहुसंस्कृतिक, बहुजातिय, बहुभाषिक संघों ने निर्माण क्रम में उत्तराधुनिकता महत्वपूर्ण सैद्धांतिक योगदान दे सकता है।

कमजोर पक्ष – उत्तराधुनिक धारणा को भारत के समसामयिक परिप्रेक्ष्य ने गलत साबित कर दिया है यह तर्क पहले ही कह चुका हूँ। मार्क्सवाद, आधुनिकता, उत्तराधुनिकता के द्वारा भाषिक लेख में मात्र सीमित होकर एतिहासिक एवं राजनीतिक मुद्दा से हट रहा है यह तर्क भी प्रस्तुत कर चुका हूँ। मुख्य समस्या है, “कोई भी सत्य अंतिम सत्य नहीं होता” यह उत्तराधुनिक विचार कहता है। एक दृष्टिकोण से देखने से तो लगता है कि ऐसा विचार प्रगतिवादी सोंच दिखाता है, इस लिए कहता हूँ- “उच्च जाती तथा वर्ग के लोगों के द्वारा प्रतिपादित किए गए शब्दों को हमेशा के लिए अंतिम सत्य कहकर स्वीकार नहीं किया जा सकता। उसे पुनः संसोधित कर देखना होगा, इसके लिए बारंबार लेखन को दुहराना होगा”।

नया समस्या – महाआख्यान तथा इतिहास के साथ ही अंतिम सत्य के मापदंड भी अस्वीकार करने के साथ-साथ उनमे सत्य के बीच विरोधाभाष एवं द्वंद ने जन्म लिया है। ऐसी अवस्था मे कौन सा ‘सत्य’ सही या गलत कहकर किस प्रकार अलग किया जाए?- इसे अंतिम सत्य के अस्वीकृति के साथ-साथ सही-गलत ठहराने के लिए कोई मापदंड नहीं रहा। तब क्या किया जाए?- क्या ‘अर्थ एवं सत्य’ की लगातार चाटुका से आनंद लेते हुए रोमांटिक उत्तराधुनिक प्रदेश में आंखे बंद करके रहना है। कुछ लोगों को एसी उत्तराधुनिक चाटुका से आनंद लेते समय किसी भी उम्र दराज नागरिक से सही एवं गलत को समझना होगा। आज सभी लोग सत्य एवं अफवाह, फ़ैक्ट एवं फिक्सन को अलग करने की विवस्ता को उठा कर जी रहे हैं। खासकर भारत में सत्य अंतिम न होकर सापेक्षित है तथा कोई भी सत्य अंतिम नहीं है यह सोंच प्रचलित है। इस बात को कहने से पहले क्या हम लोकतन्त्र को निरंकुशता से अलग नहीं करेंगे- न्याय को दमन से अलग नहीं करेंगे। अभी की अवस्था में नया संविधान बनाने के लिए तो सभी नागरिक को सही-गलत, क्या तथ्य, क्या कल्पना, क्या सत्य, कौन क्या असत्य है, इसे अलग करने की आवश्यकता है। क्या ऐसी अवस्था में हमे खुद को उत्तराधुनिक एवं नए सोंच के साथ जोड़ना होगा?- दूसरे शब्दों में आधुनिकता एवं उत्तराधुनिकता दोनों का सबल एवं कमजोर पक्ष एक दूसरे के साथ जुड़ा है।

इस सम्बंध मे मेरा व्यक्तिगत मत है कि हम दोनों के कमजोर पक्ष को अस्वीकार करें, सबल पक्ष के चयन एवं संगठन के साथ ही ‘नए’ प्रकार के भारतीय आधुनिकता के रास्ते को ढूँढे। दूसरे शब्दों में हमे एक ऐसे आधुनिकता का निर्माण करना होगा, जो सामाजिक न्याय, लोकतन्त्र एवं विकास संबंधी पूर्वआधुनिक तथा अपने उत्तराधुनिक का पुनः लेखन खुद कर सके। हमे अपने सत्य एवं अर्थ को दुहराते हुए आगे चलकर खुद को, नए शब्द को नए ढंग से समझना होगा। उत्तराधुनिकता पुनः लेखन की प्रविधि है, तो आधुनिकता वह मूल पाठ है जिसे उत्तराधुनिकता पुनः दोहराकर लिख रहा है। ‘आधुनिक’ मूलपाठ ही नहीं होता तो उत्तराधुनिकता पुनः लेखन संभव भी न होती और यदि वही आधुनिकता खुद का पुनः लेखन करना छोड़ देता तो उत्तराधुनिकता की कल्पना ही नहीं किया जा सकता था और वह धीरे-धीरे पुराना होता चला जाताहै। इस लिए विवाद आधुनिकता एवं उत्तराधुनिकता के बीच की विरोधाभाष नहीं बल्कि उसका लगातार संवादन है।

आधुनिकता एवं उत्तराधुनिकता के बदले लगातार विकशित समाज मे अन्य संभावनाएँ भी देखा जा रहा है, खासकर उदारवादी एवं मानवतावादी तथा मार्क्सवादी विचारों के बीच संवादकीय संभावना को। आज वाम दलों द्वारा मार्क्सवादी विचार का अनुसरण करना खुद का महाआख्यान है। लोकतन्त्र के पक्षधर कांग्रेस जैसे दल का अनुसरण करने वाला उदारवादी एवं मानवतावादी विचार भी आधुनिकता का ही दूसरा महाआख्यान है। गुजरे दीनों में वाम दलों ने मुख्य रूप से सामाजिक न्याय के आधुनिक आदर्श को बहुत प्रश्रय दिया। इसी प्रकर कांग्रेस जैसे केंद्र तथा केंद्र से ज्यादा लेफ्ट दलें लोकतन्त्र की आधुनिक आदर्श को अपना मुख्य राजनीतिक मुद्दा बनाए हुए हैं।

एक दृष्टि से देखने से यह उत्तरआधुनिक समय भी इस समय संविधान एवं राज्यव्यवस्था की पुनः लेखन मात्र नहीं होकर आधुनिक महाआख्यानो का पुनः लिखाव हो रहा है। आज वाम दलों ने मात्र सामाजिक न्याय की बातों को छोड़ कर लोकतन्त्र की भी बाते करना शुरू कर दिया हैं। केंद्र ने भी अलोकतांत्रिक आचरण दिखा कर नक्सली के साथ सिद्धान्त के रूप में लोकतन्त्र स्वीकार किए हुआ हैं। इसी तरह लोकतांत्रिक आदर्श की रक्षा के लिए उत्तराधुनिकता लम्बे समय तक लड़ता रहा है और कांग्रेस जैसे दलों ने भी आंदोलन के जरिए पिछले दिनो में सामाजिक न्याय के बारे में बातें उठाते रहे हैं। दूसरे शब्दों में कहे तो कांग्रेस ने नक्सली तथा सभी दलों के साथ आंतरिक रूप से पुनः लेखन के जरिए अपना आधुनिक आदर्श एवं आख्यानों को पुनः दोहरा रहे हैं। इसके फलस्वरूप समृद्ध भविष्य के लक्षण भी दिख रहे हैं।

सामाजिक न्याय एवं लोकतन्त्र को छोडकर आधुनिकता का दूसरा मुख्य आदर्श था, विकास एवं प्रगति। आज का आधुनिक भारतीय जनता सामाजिक न्याय एवं लोकतन्त्र के सिद्धान्त को मात्र चुइंगम की तरह चबाने को तैयार नहीं है। जनता को दैनिक जीवन मे विकास एवं प्रगति की प्रत्याभूति चाहिए जैसे पीने का पानी, सड़क, विद्यालय, रोजगार आदि। क्या विभिन्न राजनीतिक दलें आधुनिकता की प्रगति एवं विकास संबंधी आदर्श को सर्वसाधारण के दैनिक जीवन का भाग बना सकेगा?- या फिर संवाद के जगह विवाद, सहकार्य के जगह हमेश विवाद कर देश के भविष्य को पुनः विगत के तरफ धकेल कर ले जाएंगा?- तो फिर राजनीतिक दलें तथा उनके नेताएँ एवं कार्यकर्ताएँ न उत्तराधुनिक रह सकेंगे न ही आधुनिक......................

To-Dr. Md Mazid Mia

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