रामचंद्र शुक्ल और विजयदेव नारायण साही की आलोचना-दृष्टि: जायसी के संदर्भ में आबिद हुसैन


शोधार्थी, हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, नई दिल्ली

“जायसी के बारे में मेरी अपनी एक धारणा है । बारम्बार जायसी को पढ़ते समय मुझे यह लगता रहा है कि मेरे ऊपर जो प्रतिक्रिया जायसी के काव्य की हो रही है वह कुछ भिन्न जैसी है । और यह भी मुझे शुरू से लगता रहा है कि शुक्ल जी ने जो फ्रेम-वर्क, जो चौखटा जायसी के लिए बनाया है उस चौखटे से मेरा मतांतर है ।”[1]

यह उक्ति साही की है और यही वह ठीक बिन्दु है जहाँ से आचार्य शुक्ल तथा साही की आलोचना संबंधी मान्यताओं एवं जायसी विषयक मान्यताओं पर तुलनात्मक ‘बहस’ की जा सकती है । बात केवल ‘बहस’ की नहीं है, बल्कि यह समझने की भी है कि साही को शुक्ल जी की जायसी संबंधी आलोचना में मूल आपत्ति किस बात पर है । चौखटे पर, चौखटा बनाने के कारणों पर, उस चौखटे के परिणाम संबंधी निकाले गये निष्कर्षों पर या फिर आलोचना-दृष्टि व इतिहास-दृष्टि दोनों पर । यहीं इस प्रश्न को भी उठाना ज़रूरी है कि साही की जायसी संबंधी आपत्तियाँ जायसी की ‘कृति’के कारण है अथवा साही की आलोचनात्मक बहसों की उपज है ।साही ने अपनी जायसी संबंधी उधेड़बुन के दौरान आचार्य शुक्ल को कई बार याद किया है; कभी आस्था तथा श्रद्धा के स्वर में-“इसके पहले कि मैं अपनी बात कहूँ शुक्ल जी के प्रति श्रद्धा निवेदन करना आवश्यक समझता हूँ और वह भी औपचारिक नहीं, क्योंकि कुछ बातों की शुरुआत मैं न कर सकता, अगर शुक्ल जी ने मार्गदर्शन न किया होता ।”[2]इसके साथ ही कभी खींज के स्वर में और कभी-कभी निर्गुण भावबोधके साथ जहाँ पता लगाना कठिन हो जाता है कि वे शुक्ल के प्रति क्रोध प्रदर्शन कर रहे हैं अथवा तब तक हुए कम अनुसंधानों के कारण शुक्ल के प्रति बेचारगी व्यक्त कर रहे हैं । यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि जायसी को शुक्ल ने सिद्ध फ़कीरमाना बल्कि पद्मावत में रहस्यभाव की खोज भी की, साथ ही पद्मावत में स्थान-स्थान पर बिखरी हुई दार्शनिकता से उबते भी दिखाई देते हैं।यहाँ यह देखना चाहिए कि जिस अतिरिक्त दार्शनिकता की वे जायसी के प्रसंग में आलोचना करते हैंवही दार्शनिकता तुलसीदास के प्रसंग में उन्हें बिल्कुल तार्किक लगती है । उदाहरण के लिए ‘रामचरितमानस’ के ‘अयोध्या काण्ड’ के एक प्रसंग से इस बात को समझ सकते हैं । जब राम वाल्मीकि से अपने रहने के लिए कोई उचित स्थान पूछते हैं तो उत्तर में वाल्मीकि लम्बा भाषण/वक्तव्य देते हैं, यहाँ रहिए,वहाँ रहिए, अर्थात् राम के रहने के प्रसंग में तुलसीदास दर्शन पर दर्शन देते चले जाते हैं और चौदह भवनों के वर्णन पर लगभग पाँच,छ: कड़वक खर्च करते हैं । उदाहरण स्वरूप इस दोहा को देखा जा सकता है-

“जाहि न चाहिअ कबहुं कछु तुम्ह सन सहज सनेहु ।

बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु ।।

(जिसको कभी कुछ भी नहीं चाहिए और जिसका आपसे स्वाभाविक प्रेम है, आप उसके मन में निरंतर निवास कीजिये; वह आपका अपना घर है ।)”[3]

यह सब कहने के बाद अंत में वाल्मीकि मुद्दे पर आते हुए कहते हैं कि चित्रकूट आपके रहने के लिए अत्यंत मनोरम स्थल है । वहाँ आपके लिए सभी प्रकार की सुविधा भी है, यथा-

“चित्रकूट गिरि करहु निवासू । तहँ तुम्हार सब भाँति सुपासू ।।

सैलु सुहावन कानन चारू । करि केहरि मृग बिहग बिहारू ।।

नदी पुनीत पुरान बखानी । अत्रिप्रिया निज तप बल आनी ।।

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चलहु सफल श्रम सब कर करहू । राम देहु गौरव त्रिरिबरहू ।।”[4]

आचार्य शुक्ल के अनुसार यह तुलसी की भक्ति भावना हैतब जायसी के प्रसंग में यही बात ‘दर्शन बघारने’ जैसी क्यों लगती है ? साही ने इस सवाल को नहीं उठाया उन्होंने आचार्य शुक्ल का बहुत बचाव करते हुए यह कहा कि चूँकि उनके समय तक जायसी संबंधी अधिक शोध नहीं हुए थे । इसलिए ग्रियर्सन और सुधाकर द्विवेदी के द्वारा दिये गए साक्ष्यों के आधार पर शुक्ल ने जायसी को ‘सिद्ध फ़कीर’ मानते हुए लिखा है-

“मैं यह भी समझता हूँ कि संभवतः भारतीय इतिहास की उस समय तक की जो भी ‘रिसर्च’ थी वह भी शुक्ल जी के सामने नहीं थी जो आज सन् 1982में हमारे सामने प्रस्तुत है वह आज के पचास-साठ वर्ष पहले कहाँ से होती? जितनी जानकारी आज हमें सूफ़ियों, सूफ़ी आंदोलनों, सूफ़ियों और बादशाहों के संबंधों के बारे में आज इतिहासकारों ने उपलब्ध करा दी है वह पूरी की पूरी जानकारी शुक्ल जी के सामने नहीं थी ।”[5]

जिस तरह से ग्रियर्सन और सुधाकर द्विवेदी के साक्ष्यों के आधार पर शुक्ल ने जायसी को ‘सिद्ध फ़कीर’ मान लिया । यह बात उतनी आसान नहीं लगती।उन्होंने भक्तिकाल के प्रसंग में लगातार इस तथ्य को ध्यान में रखा है अथवा ध्यान में रखने की कोशिश की है, कि कौन-सी रचना भक्तिपरक है, कौन सी नहीं? यदि उदाहरण देना ज़रूरी ही हो तो हम उस प्रसंग को याद कर सकते हैंजिस प्रसंग में शुक्ल विद्यापति पर लिखते हुए उन्हें ‘भक्ति कवि’ नहीं बल्कि ‘श्रृंगारिक रचनाकार’ घोषित करते हैं । व्यंग्य के स्वर में तथा कुछ-कुछ खींज के साथ वे लिखते हैं कि “आध्यात्मिक रंग के चश्मे आजकल बहुत सस्ते हो गये हैं । उन्हें चढ़ाकर जैसे कुछ लोगों ने ‘गीतगोविंद’ के पदों को आध्यात्मिक संकेत बताया है, वैसे ही विद्यापति के इन पदों को भी ।”[6]सवाल उठाया जा सकता है कि क्या जायसी तक पहुँचते-पहुँचते या ‘जायसी ग्रंथावली’ का संपादन करते-करते आचार्य शुक्ल सस्ते आध्यात्मिक चश्मे की बात को भूल चुके थे? परंतु ऐसा लगता तो नहीं है ।यह स्पष्ट है कि साही ने जो बात पद्मावत की आलोचना के प्रसंग में उठाई है वह शुक्ल जी के सामने भी रही होगी ।साही लिखते हैं कि पद्मावत में बहुत से अंश ऐसे हैं जिन्हें यदि पूर्वापर क्रम से हटाकर पढ़ा जाए तो वे विशुद्ध भक्ति और रहस्यवाद के कड़वक लगेंगे।

“निश्चय ही ‘पद्मावत’ में ऐसे अंश भरे पड़े हैं कि संदर्भ से काटकर केवल चार दोहे कही तो लगेगा कि सिवाय तसव्वुफ़ के और कुछ है ही नहीं इसके अंदर ।”[7]

आचार्य शुक्ल नेपूर्वापर क्रम को ध्यान में रखा तो भी वे कड़वक उन्हें रहस्यवादी ही लगे । इस संदर्भ में साही ने दो महत्त्वपूर्ण पदों का इस्तेमाल कियाहै ।‘प्रबंध वक्रता’ और ‘बौद्धिक सघनता’ । अत: हम कह सकते हैं कि शुक्ल के लिए जो जायसी का रहस्यवाद है, साही के लिए वह बौद्धिक सघनताहै । इस संदर्भ में कुछ अंश या तथ्यों की ओर ध्यान देना आवश्यक है । उस बहस से पहले पद्मावत के एक महत्त्वपूर्ण प्रसंग की ओर ध्यान देना आवश्यक है, प्रसंग है ‘मानसरोदक खण्ड’ का । आरम्भ में पद्मावती के सरोवर के नजदीक पहुँचने पर जायसी उसका सौंदर्य चित्रण करते हुए कहते हैं कि वे पद्मिनी स्त्रियाँ सरोवर के किनारे आ गई । वहीं पर उन्होंने अपने केशों का बंधा हुआ जूड़ा खोलकर बालों को बिखरा दिया । रानी पद्मिनी का मुख तो चाँद के सामान था इसके साथ ही उसके शरीर से चंदन की खुशबू भी आ रही थी । उसके कानों के चारों ओर फैले बाल मानों ऐसे प्रतीत हो रहे थे जैसे मलयगिरि को साँपों ने ढँक लिए हों । उसके मुख के चारों ओर केशों की ऐसी छाया पड़ रही थी मानों ऐसा लग रहा था कि राहु चंद्रमा की शरण में आ गया हो । केशों की श्यामता से दिन में ही सूर्य छिप गया और ऐसा प्रतीत होने लगा कि तारागणों को साथ लेकर चंद्रमा प्रकट हुआ है ।चकोर भी भूलकर उधर ही देखने लगा क्योंकि उसे मेघों के मध्य पद्मावती का मुख चंद्रमा जैसा दिखाई दे रहा है । पद्मावती के दांत बिजली के जैसे चमकते थे जबकि उसकी आवाज़ कोयल जैसी मधुर थी । उसकी जो भौहें थी वह इंद्रधनुष को लेकर बनाई गयी हो ऐसी जान पड़ती थी ।उसके नेत्र ऐसे प्रतीत होते थे मानों दो खंजन पक्षी क्रीड़ा कर रहे हों।

“सरवर तीर पदुमिनीं आई । खोंपा छोरि केस मोकराई ।।

ससि मुख अंग मलैगिरी रानी । नागन्ह झाँपि लीन्ह अरघानी ।।

ओनए मेघ परी जग छाहाँ । ससि की सरन लीन्ह जनु राहाँ ।।

छपी गै दिनहि भानु कैइ दसा । लै निसी नखत चाँद परगसा ।।

भूलि चकोर दिस्टि तहँ लावा । मेघ घटा महँ चाँद दिखावा।।

दसन दामिनी कोकिल भाषी । भौहें धनुक गगन लै राखीं ।।

नैन खंजन दुइ केलि करेहीं । कुच नारँग मधुकर रस लेहीं ।।”[8]

पद्मावती के इस दिव्यतम सौंदर्य वर्णन के साथ जायसी पद्मावती और उसकी सखियों के बीच एक संवाद लिखते हैं- पद्मावती की सखी उससे कहती है कि हे रानी ! तुम अपने मन में विचार करके देख लो । इस मायके में तो हमें चार दिन अर्थात् थोड़े से समय तक रहना है । जब तक पिता का राज है तब तक जो मन में हो कर लो ।कल को हम सब ससुराल चले जायेंगे ।फिर कहाँ यह सरोवर का किनारा मिलेगा, फिर अपने हाथ में कहाँ रह जायेगा यहाँ आना । अत: हम सब मिलकर कहाँ खेल पायेगीं ? वहाँ तो हमारी सास और ननद अपनी कड़वी बातों से ही प्राणों को हर लेंगी और कठोर ससुर आने भी नहीं देगा अर्थात् कहने का आशय यह है कि जीवन का निर्वाह किस प्रकार होगा यह भी ज्ञात नहीं है ।

“ऐ रानी मन देखु बिचारी । एही नैहर रहना दिन चारी ।।

जौ लहि अहै पिता कर राजू । खेलि लेहु जौं खेलहु आजू ।।

पुनि सासुर हम गौनब काली । कित हम कित एह सरवर पाली ।।

कित आवन पुनि अपने हाथां । कित मिलिकै खेलब एक साथा ।।

सासु नंनद बोलिन्ह जिउ लेहीं । दारुन ससुर न आवै देहीं ।।

पिउ पिआर सब ऊपर सो पुनि करै दहुँ काह ।

कहुँ सुख राखै की दुख दहुँ कस जरम निबाह ।।”[9]

यहाँइसअंशकाउदाहरणइसलिएदियागयाहैक्योंकियहपद्मावतकेरहस्यवादसेभरेहुएप्रसंगोंमेंभीअत्यंतसाधारणप्रसंगहै ।जो यह दर्शाता है कि “आज से लगभग पाँच सौ वर्ष पूर्व भारतीय समाज में नारी की पराधीन स्थिति का जायसी ने बहुत ही सूक्ष्म ढंग से चित्र उपस्थित किया है । पता नहीं हमारे समाज में यह कथन कब से चला आ रहा है कि बचपन पिता के, जवानी पति के और बुढ़ापा पुत्र के संरक्षण में बीत जाता है, यानी जन्म से लेकर मृत्यु तक औरत पिता, पुत्र और पति की परिधि में पराधीनता की साँस लेती हुई जिंदगी बसर कर देती है । इस दारुण स्थिति को जायसी ने बहुत गहरे पैठकर देखा है । सखियों के एक-एक बोल में उनकी उम्र-कैद मानों चीख-चीखकर पूरे समाज से फरियाद कर रही है ।”[10]ऐसे अनेक प्रसंग और अंश पद्मावत में देखे जा सकते हैं लेकिन ये दोनों आलोचक इस दृष्टि से कार्य करने से चूक गये जान पड़ते हैं । खैर यह उनकी सीमा नहीं कही जा सकती, यह समय की सीमा ही कही जा सकती है । फिर भी यह तो कहा जा सकता है कि अन्य अंशों में दर्शन इस अंश की तुलना में कई गुना अधिक है । हम दोनों आलोचकों की शब्दावली में कहें तो यह कह सकते हैं कि इस अंश में जायसी का ‘रहस्यवाद’ व ‘बौद्धिक सघनता’ बहुत अधिक नहीं है । यहाँ जायसी पद्मावती की सखियों से सीधा-सीधा संवाद बुलवा रहे हैं कि आज हम सरोवर के नजदीक आए हैं तो बेहतर होगा की कुछ खेल लें । इसके बाद यह खेल जीवन के क्रिया व्यापारों का बनता चला जाता है ।

साही के अनुसार जायसी रहस्यवाद की शब्दावली का प्रयोग इसलिए करते हैं क्योंकि उस समय वे और किसी शब्दावली का प्रयोग नहीं कर सकते थे ।यानी कि पद्मावत का रहस्यवाद भक्तिकालीन हिंदी की शब्दावली तथा कथन-भंगिमा की समस्याहै ।यदि कोई रहस्यवादी नहीं भी होना चाहेतो भी शब्दावली ऐसी है कि बेचारा लिखे कुछ भीरहस्यवादी ही माना जायेगा ।

“मनुष्य के अंतरतम में जो गहन भावनाएँ हैं उनको व्यक्त करने की जो शब्दावली जायसी के साथ थी चाहे वह रसायनियों की शब्दावली हो, चाहे वेदान्तियों की, चाहे हठयोगियों की, चाहे सूफ़ियों की और चाहे शुद्ध ग्रामगीतों की शब्दावली हो सबका प्रयोग जायसी ने किया हैजिसने जो पकड़ा, हिन्दुस्तान के सात बुद्धिमानों की तरह किसी ने पूँछ पकड़ी, कहा जायसी तो केवल लोकशैली के गीतकार हैं । किसी ने कहा वो तो वेदांती हैं । किसी ने कहा वे तो सूफ़ी हैं । लेकिन वस्तुस्थिति यह है कि मुझे लगता है कि जायसी के लिए हर शब्दावली एक प्रकार का प्रयोग का ढंग है कि भावना को कितने गहरे तक पहुँचा सकते हैं ।”[11]

ऊपर कहा जा चुका है कि शुक्ल के सामने यह समस्या आ चुकी थी । कहने की आवश्यकता नहीं है कि विद्यापति का कालखण्ड जायसी से पहले है । इस कारण उनकी विशुद्ध श्रृंगारिक शब्दावली में रहस्यवाद के तत्व अधिक होने चाहिए थे पर विद्यापति साही के सामने थे ही नहीं ।

अपनी ‘जायसी’संबंधी पुस्तक का आरम्भ ही उन्होंने एक विस्फोट के साथ किया है । उन्होंने कहा है कि ‘सही मायने में जायसी हिंदी के विधिवत कवि हैं । कबीर में प्रयास के चिह्न हैं जायसी में कहीं प्रयास दिखाई नहीं देता’ । ‘हिंदी का पहला विधिवत कवि’ एक विलक्षण पद है काश कि पता लगाया जा सकता कि इस पूरे पदबंध में साही का सर्वाधिक बलाघात किस अंश पर है, पहले अंश ‘विधिवत’ पर या ‘कवि’ पर ।हिंदी के पहले विधिवत कवि कबीर नहीं हैं क्यों? इस क्यों को छोड़िए । उनके बारे में साही की राय है कि उनके यहाँ ‘प्रयास के चिह्न’ है। क्यों विद्यापति और खुसरो हिंदी के पहले विधिवत कवि नहीं हैं? खुसरो की खड़ी बोली तथा विद्यापति की मैथिली में जो प्रवाह है वह पद्मावत की अगली कड़ी लग सकता है ।

कहने की आवश्यकता नहीं है कि साही और आचार्य शुक्ल दोनों की जायसी संबंधी मान्यताओं में यह बड़ा अंतर है कि शुक्लकहीं भी जायसी के रहस्यवाद को खारिज करते हुए दिखाई नहीं देते । जबकि साही की यह कोशिश है कि वे न ही रहस्यवादी थे और न ही सूफ़ी सिद्ध फ़कीर । यहाँ साही से एक प्रश्न किया जा सकता है कि यदि यह सिद्ध हो भी जाए कि जायसी एक सूफ़ी सिद्ध फ़कीर थेतो इससे पद्मावत के विवेचन पर क्या प्रभाव पड़ेगा?क्योंकि शुक्ल जी तो यह जोर देकर कह रहे हैं कि जायसी एक सूफ़ी सिद्ध फ़कीर थे,इसके बावजूद भी वे हिंदी के दूसरे बड़े कवि हैं ।इससे जुड़ा हुआ एक अन्य तथ्य यह भी हो सकता है कि कहीं पर भी साही यह बताने की कोशिश नहीं करते हैं कि जायसी को रहस्यवादी कवि मानने के कारण शुक्ल के सामने जायसी के मूल्यांकन में क्या कोई बड़ी समस्या आयी है? प्रश्न को यदि उलट दें तो यह कहा जा सकता है कि सूफ़ी सिद्ध फ़कीर न मानने के बावजूद भी साही पद्मावत की व्याख्या में नया क्या जोड़ सके? इसकी जब जाँच करते हैं तो पता चल जाता है कि उन्होंने जो कुछ भी जोड़ा है वह अपने आप में बहुत ही महत्त्वपूर्ण है, साही का स्पष्ट कथन है कि “पद्मावती ज़िंदगी का दर्शन नहीं, ज़िंदगी है । वह जायसी का तसव्वुफ़ नहीं, जायसी की कविता है ।”[12] पद्मावत को एक दार्शनिक ग्रंथ मानते हुए शुक्ल ने उसे पूर्ण जीवनगाथा तो नहीं माना परंतु उसका दर्शन अवश्य पाया । यह वह पहलू है जहाँ से हम शुक्ल तथा साही की आलोचना-दृष्टि के संबंध में एक अन्य तथ्य की चर्चा कर सकते हैं । दोनों विद्वानों को ही रहस्यवाद पसंद नहीं है । शुक्ल की आपत्ति पूरे रहस्यवाद से नहीं है बल्कि उनकी आपत्ति ‘ज्ञानात्मक रहस्यवाद’ से है । वे जायसी में रहस्यवाद की खोज तो करते हैं पर उससे उबते नहीं उसे स्वीकार करते हैं । उनके अनुसार रहस्यवाद की यह धारा ‘भावात्मक रहस्यवाद’ की धारा है । इस धारा के कवियों में न केवल जायसी बल्कि सुमित्रानंदन पंत के प्राकृतिक रहस्यवाद की भी प्रशंसा करते हैं लेकिन साही की समस्या दूसरी है । असल में यदि ध्यान दिया जाये तो यह कहा जा सकता है कि साही को रहस्यवाद से नहीं बल्कि विचारधारा से आपत्ति है । ऊपर दिये गए उद्धरण में साही के आधार पर यह बात कही जा सकती है कि पद्मावती यदि ज़िंदगी है तो ज़िंदगीका दर्शन क्यों नहीं है?दर्शन और जीवन का संबंध अन्योन्याश्रित है । दर्शन को अस्तित्व से परे और अस्तित्व से दर्शन को परे रखकर देखना क्यों तार्किक है? दर्शन अर्थात् रहस्यवाद, रहस्यवाद अर्थात् विचारधारा और विचारधारा साही को नापसंद है । यही कारण है कि वे अपना पूरा बल जायसी को सूफ़ी सिद्ध फ़कीर न मानने में लगा देते हैं । इस तरह उत्तर आधुनिक शब्दावली में कहा जायेतो वे पद्मावत पर किसी भी विचारधारा की स्वतंत्रता से घोषणा कर देते हैं ।

जीवन के प्रसंग में दर्शन की चर्चा साही ने केवल जायसी के संदर्भ में नहीं की है, न ही शुक्ल जी ने । आचार्य शुक्ल ने रहस्यवाद की दो कोटियाँ मानकर जायसी के रहस्यवाद को स्वीकार किया और साही ने हमेशा की तरह जायसी में भी किसी भी प्रकार के रहस्यवाद को खारिज किया । अपने निबंध ‘लघु मानव के बहाने हिंदी कविता पर एक बहस’ में साही ने हिंदी कविता में ‘अनुभूति और दर्शन’ के रिश्ते पर बहस करते हैं । इसके अतिरिक्त ‘शमशेर की काव्यानुभूति की बनावट’ नामक निबंध में वे मार्क्सवाद को शमशेर बहादुर सिंह की कविता में हाशिए पर रखकर उन्हें विशिष्ट सौंदर्य का कवि घोषित करते हैं ।इस संबंध में उन्होंने लिखा है कि “तात्विक रूप में शमशेर की काव्यानुभूति सौंदर्य की ही अनुभूति है । जिन लोगों का ख्याल है कि छायावाद के बाद हिंदी कविता ने सौंदर्य का दामन छोड़ दिया है, उन्होंने शायद शमशेर की कविताओं का आस्वाद करने का कष्ट कभी नहीं किया । मैं एक कदम और आगे बढ़कर कहना चाहूँगा कि आज तक हिंदी में विशुद्ध सौंदर्य का कवि यदि कोई हुआ है, तो वह शमशेर हैं । और इस ‘आज तक’ में मैं हिंदी के सब कवियों को शामिल करके कह रहा हूँ ।”[13]

वहीं प्रेमचंद की रचनाओं को वे मैक्सिम गोर्की की अपेक्षा गाल्सवर्दी के अधिक निकट मानते हैं उन्हीं के शब्दों में, “प्रेमचंद की तुलना आलोचकों ने गोर्की से की है, लेकिन ‘गोदान’ में उनकी यह तटस्थता मुझे गाल्सवर्दी के अधिक समीप जान पड़ती है । यह तो अन्वेषक बतलाएँगे कि ‘गोदान’ लिखने के समय प्रेमचंद ने गाल्सवर्दीको कितना पढ़ा था । लेकिन प्रेमचंद ने गाल्सवर्दी के नाटक ‘स्टाइफ’ का हिंदी में अनुवाद किया है, और गाल्सवर्दी एक ऐसा लेखक है, जो प्रेमचंद को ज़रुर पसंद आया होगा ।”[14] ऐसा लगता है कि साही ने इसलिए प्रेमचंद को गाल्सवर्दी के निकट माना है क्योंकि गोर्की एक खास तरह की विचारधारा से प्रेरित रचनाकार हैं। सवाल उठाया जा सकता है कि कहीं साही के लिए विचारधारा और मार्क्सवाद एक-दूसरे के पर्याय तो नहीं हैं?

अपने पूरे विवेचन में साही ने कविता कि विचारधारा से मुक्ति की बात कही है । वैसे ही एक तरह से यह भी एक विचारधारा ही है । यह बात नयी भी नहीं है । उनके अनुसार शुक्ल जी ने जायसी के आलोचना के प्रसंग में विभिन्न आलोचकों को उद्धृत किया परंतु उन्होंने कालरिज को छोड़ दियाजबकि साही ने उन प्रसंगों की आलोचना को कालरिज से जोड़ा जिससे पद्मावत के प्रसंग में अनेक नये निष्कर्ष का निकला जाना संभव हुआ ।

जिस तरह से विद्वानों ने जायसी के मित्रों की आध्यात्मिक व्याख्या की थी । उसी तरह जायसी की भी आध्यात्मिक व्याख्या की लेकिन साही ने उन आध्यात्मिक व्याख्याओं का पुरजोर खंडन किया । उनका मानना था कि इन चारों मित्रों के हवाले से जायसी को जोड़ना उन्हें सम्प्रदायबद्ध करना होगा । जायसी के कवि-कर्म की वास्तविक पड़ताल से दूर जाना है । यह जायसी के अंत:साक्ष्य के आधार पर उनके सूफ़ी-सिलसिले से जुड़े होने की जो बात शुक्ल जी ने की थी । वह इन मित्रों के संबंध में जायसी द्वारा ‘ज्ञानी’ और ‘पण्डित’ विश्लेषणों के प्रयोग के आधार पर कही गयी थीजबकि साही ने काव्य-परिप्रेक्ष्य में रखकर देखा तो इसका ‘चतुर’ और ‘विद्वान’ अर्थ ही उन्हें उपयुक्त लगा ।

“इस तरह यूसुफ़ मलिक, सलार, मियाँ सलोने और बड़े शेख, ये चार दोस्त हुए...यूसुफ़ मलिक ‘पण्डित और ज्ञानी’ हैं । जायसी की भाषा में ‘पण्डित और ज्ञानी’ का आध्यात्मिक अर्थ नहीं है । इसका अर्थ पढ़ा-लिखा, बुद्धिमान और शायद तजुर्बेकार आदमी हुआ ।”[15]केवल अनुमान के आधार पर आध्यात्मिक अभिप्रायों को खोजना साही को संगत नहीं लगा ।

इसलिए साही ने स्पष्ट रूप से कहा कि ‘तन चितउर मन राजा कीन्हा’ प्रसंग पर आधारित कुँजी वास्तव में पद्मावत के रचना-कर्म की तह तक और उसके वास्तविक अभिप्रायों तक पहुँचाने में हमारी मदद नहीं करती अपितु इसे प्रमाणिक मान लेने पर उल्टे बाधा यह होती है कि हम पद्मावत का रूपक-काव्य के ढाँचे में ‘पाठ’ करते हैं और यदि रूपक निर्वाह नहीं हो पाता तो इसे कृतिकार की असफलता मान लेते हैं । यह सही है कि जायसी के पद्मावत में तसव्वुफ़ सूचक अनेक पंक्तियाँ मिल जाती हैंजिसके आलोक में उसके आध्यात्मपरक अर्थ ग्रहण में ‘पाठक’ को सुविधा मिल जाती है ।इसके बावजूद ‘पद्मावत’ का मूल आशय, निहितार्थ- ‘तसव्वुफ़ नहीं बल्कि मानवीय प्रेम और विषाद दृष्टि’ है । इस बात की सहज स्वीकृति साही के विवेचन में देखी जा सकती है । यही कारण है कहीं-कहीं पायी जाने वाली ‘तसव्वुफ़ की झलकियों को अंशी न मानकर अंश’ ही मानने के पक्ष में खड़े होते हैं ।

आचार्य शुक्ल और साही की जायसी के संबंध में सूफ़ी दर्शन से जुड़ी जो मान्यताएँ हैंवे वास्तव में उनके पूरे इतिहास-बोध और आलोचना-दृष्टि के आलोक में ही समझी जा सकती हैं ।शुक्लका मत वास्तव में रचना के सामाजिक कर्म की पहचान के आधार पर बना, इसे वे लोकधर्म की व्याख्या से जोड़कर देखते हैं इसकारण इस मान्यता का मध्यकालीन युगबोध के साथ जुड़ना आवश्यक था । मध्यकालीन संदर्भ में युगबोध, ‘दार्शनिक मतवाद’ ही ठहरता है । इस प्रणाली के अंतर्गत ही शुक्ल ने जायसी को सूफ़ी मान्यताओं से जोड़कर देखते हैं ।

इसी प्रकार साही अपने समय की रचनाशीलता की विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए जायसी का विश्लेषण कर रहे थेऔर उनकी निश्चित मान्यता थी कि किसी भी काल की कविता को समसामयिकता की कसौटी से ही परखा जाए । इसलिए नई कवितावादी दृष्टि वहाँ काम कर रही थी और जायसी का नई कविता परक ‘पाठ’ उन्होंने प्रस्तुत कियाजिसमें उनके अनुसार विचारधारा के लिए आग्रह न था । साही कीआलोचना की जो विशिष्टता है उसकी ओर संकेत करते हुए परमानंद श्रीवास्तव लिखते हैं,

“साही की विशिष्टता यह है कि वह इस काव्य-गुण या कवि-दृष्टि को समकालीनता के परिप्रेक्ष्य में रखकर देख सके हैं । नैतिक संकट को बार-बार परिभाषित करते हुए साही आज के संकट को निरंतर याद रखते हैं । यही कारण है कि साही की पुस्तक ‘जायसी’ मध्यकालीन कवि-प्रतिभा के मूल्यांकन पर केन्द्रित होने के बावजूद ‘नयी आलोचना’ जैसा रचनात्मक स्वाद देगी ।”[16]

साही जायसी को ‘बौद्धिक सघनता’ से युक्त रचनाकार मानते हैं । यही कारण है कि वे जायसी के ‘प्रबंध कौशल’ की प्रशंसा ‘बौद्धिक सघनता’ के आधार पर करते हैं । शुक्ल ने पद्मावत को स्पष्ट दो खंडों में विभक्त रचना माना थाऔर दोनों को कल्पना और इतिहास के आधार पर एक-दूसरे से संबद्ध किया । यह तेन की विधेयवादी दृष्टि थीजिसके आधार पर शुक्ल के लिए यह ज़रूरी हो गया कि कृति में यदि ऐतिहासिक अंश हैं तो उनकी पहचान की जाए ।आचार्य शुक्ल एक तरफ पद्मावत को कल्पना और इतिहास का मिलाजुला काव्य मानते हैं तो दूसरी ओर ‘तन चितउर मन राजा कीन्हा’ वाले कड़वक के आधार पर पद्मावत को रूपक की तरह भी देखने की कोशिश करते हैं, हालाँकि वे स्पष्ट रूप में स्वीकार करते हैं कि पद्मावत की पूरी कथा पर रूपक लागू नहीं किया जा सकताहै उन्होंने लिखा है कि-“पद्मावत’ के सारे वाक्यों के दोहरे अर्थ नहीं है, सर्वत्र अन्य पक्ष के व्यवहार का आरोप नहीं है । केवल बीच-बीच में कहीं-कहीं दूसरे अर्थ की व्यंजना होती है । ये बीच-बीच में आए हुए स्थल,अधिकतर तो कथाप्रसंग के अंग हैं, जैसे सिंहलगढ़ की दुर्गमता और सिंहलद्वीप के मार्ग का वर्णन,रत्नसेन का लोभ के कारण तूफ़ान में पड़ना और लंका के राक्षस द्वारा बहकाया जाना ।”[17]पद्मावत को इतिहास और कल्पना का मिलाजुला काव्य मानकर देखना तथा इसे जायसी के विशिष्ट कल्पना या फैंटेसी के रूप में न पढ़नायह शुक्ल की सीमा नहीं है बल्कि उस समय की आलोचना-दृष्टियों की भी सीमा है ।

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि शुक्ल के युग तक आलोचना शास्त्रीयता से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकी थीउन्होंने अपने व्यावहारिक आलोचना विवेक तथा आलोचना के शास्त्रीय सिद्धांतों के बीच यथासंभव संतुलन बनाने की कोशिश करते हैं ।अगर उन्हीं की शब्दावली में कहा जाए तो कहा जा सकता है कि यही ‘विरुद्धों का सामंजस्य’ है इसके अलावा उनके सामने दूसरा विकल्प न था ।

साही के दौर तक पश्चिम में टी.एस.इलियट और हिंदी में अज्ञेय वैयक्तिक स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ चुके थे। जब वे जायसी संबंधी अपना काम कर रहे थे । तब तक मुक्तिबोध ‘कामायनी’ को किसी भी प्रकार की मिथकीय प्रतीकात्मकता से मुक्त कर चुके थे । रोला बार्थ, फूको विचारधाराओं के अंत की घोषणा कर चुके थे । संभवतः साही के मस्तिष्क में देरिदा नहीं थे न ही रोला बार्थ थे।उनकी चिंता यह थी कि किस प्रकार जायसी के अस्तित्व को एक कवि अस्तित्व की स्वतंत्र पहचान मिल सके । यही कारण है कि उन्होंने पद्मावत के दोनों अंशों को एक दूसरे से जोड़कर देखा। ‘ईश्वर तुल्य पद्मिनी किस प्रकार कथा के अंत तक पहुँचते- पहुँचते घरनारी हो जाती है’ । साही के अनुसार पद्मावत इसका ही आख्यान है । इतना होने के बावजूद अलाउद्दीन बेचारा कहीं छूट जाता है । इसी कारण उन्होंने शुक्ल की धर्मनिरपेक्षता वाली शब्दावली को स्वीकार करते हुए कहा कि“पद्मावती जायसी का व्यक्तिगत स्वप्न नहीं है, पूरी संस्कृति का स्वप्न है । इस संस्कृति के स्वप्न को जब जायसी उठाकर दिल्ली और चित्तौड़ के इतिहास गुल्म में लाकर खड़ा कर देते हैं । तब वह स्वप्न जो ‘ड्रीम वर्ल्ड’ से शुरू हुआ था, धीरे-धीरे यथार्थ में वहीं पहुँचता है जहाँ नागमती है। नागमती और पद्मावती दोनों में कोई समकक्षता है ही नहीं- यहाँ से कथा आरम्भ होती है और नागमती और पद्मावती दोनों ही एक बराबर हैं यहाँ पर कथा का अंत होता है ।”[18]इसी बिंदु पर साही यह स्थापित करते हैं कि ‘पद्मावत प्रेमाख्यान काव्य नहीं बल्कि प्रेम और युद्ध का मिलाजुला आख्यान है’ । तब यहाँ यह सवाल उठता है कि शुक्ल ने पद्मावत को एक विशिष्ट प्रेमकाव्य घोषित करते हुए मुख्यतः अभारतीय प्रेम पद्धति से क्यों जोड़ा? इसके उत्तर में कहा जा सकता है कि शुक्ल के लिए भारतीयता एक प्रतिमान के रूप में काम करती है । किसी चीज को महत्त्वपूर्ण तथा विशिष्ट सिद्ध करने के लिए वे उसे भारतीयता-भारतीय परंपरा से जोड़कर देखते थे । कहने का आशय है कि भारतीयता उनके यहाँ एक प्रमाण-स्रोत है । सवाल यह भी है कि भारतीयता का आखिर निर्धारण किस प्रकार से हो? अव्वल तो भारतीयता अपने आप में कोई प्रतिमान नहीं होना चाहिए, जिसके आधार पर किसी कवि या रचनाकार के किसी तत्त्व जैसे रहस्यवाद, प्रेमवर्णन आदि को विशिष्ट बताया जाए।चूँकि शुक्ल जायसी की रचनाशीलता को सूफ़ी दर्शन के परिप्रेक्ष्य में विश्लेषित करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने ‘मसनवी’ का प्रभाव आरोपित किया ।यहाँ यह पूछा जा सकता है कि मसनवी का प्रभाव क्या किसी कविता मात्र के लिए दुर्गुण हो सकता है, यदि उसका प्रभाव के रूप में नहीं रचनाशीलता और पुनर्सृष्टि के स्तर तक उपयोग किया जाए ।

वहीं साही के लिए भारतीयता और अभारतीयता का कोई सवाल ही पैदा नहीं हुआ । उन्होंने तो पद्मावत को केवल प्रेमकाव्य मानने से ही इंकार कर दियाजैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कि उन्होंने पद्मावत को प्रेम और युद्ध का मिलाजुला काव्य माना तथा उन्होंने इसमें एक विषाद-दृष्टि को भी देखा जो अपने युग सत्य से निर्मित हुई थी ।

“वास्तविकता यह है कि अलोक और लोक, सिंहल द्वीप और इतिहास का जो संधिस्थल जायसी ने देखा, वह फिर किसी कवि ने हिंदी में नहीं देखा । इसलिए जायसी अपने ट्रैजिक विज़न अथवा विषाद-दृष्टि में अकेले हैं, उनका न कोई पूर्ववर्ती है,न परवर्ती है ।”[19]इसके आगे बढ़कर वे पद्मावत को एशिया की भूमि पर लिखी गई यूनानी ढंग की एकमात्र ट्रैजडी घोषित करते हुए लिखते हैं कि “अपनी मूल प्रकृति में पद्मावत एक त्रासदी है.....शायद हिन्दुस्तान या संभवतः एशिया की धरती पर लिखा हुआ एकमात्र ग्रंथ है जो यूनानियों की ट्रेजडी के काफी निकट है ।”[20]

साही ने अपनी जायसी संबंधी उधेड़बुन में पाया कि अलाउद्दीन और रत्नसेन दोनों का प्रेम रूप लोभ के कारण नहीं उत्पन्न होता जैसा कि आचार्य शुक्ल ने मानाहै । साही कहते हैं कि जायसी रत्नसेन के प्रेम में पूर्वनिर्धारित वैधता पैदा करके उसमें प्रामाणिकता लाने के लिए ज्योतिषियों का प्रसंग लाते हैं । यहाँ पद्मावती एक व्यक्ति के रूप में उपस्थित है, वे रत्नसेन और अलाउद्दीन के प्रेम में अंतर करते हुए बताते हैं कि रत्नसेन का प्रेम वास्तविक अनुभूति से जुड़ा है ।“अलाउद्दीन औरत नहीं चाहता है प्रदर्शनी लगाना चाहता है । वह उपभोग के लिए भी नहीं चाहता। केवल नुमाइश लगाना चाहता है....अलाउद्दीन को टाइप चाहिए रत्नसेन को व्यक्ति ।अलाउद्दीन के लिए पद्मिनी एक चीज है एक मॉडल है ।रत्नसेन के लिए वह एक व्यक्ति है ।उसका एक व्यक्तित्व है ।”[21]

साही ने अपने इस पूरे विश्लेषण में पाया कि जायसी के यहाँ व्यक्त प्रेम का आध्यात्मिक अभिप्राय नहीं है। अपितु वह आध्यात्मिक शब्दावली में व्यक्त लौकिक प्रेम है । उन्होंने प्रेम पद्धति के विश्लेषण में यह अंतर दिखाने का प्रयास किया है कि अलाउद्दीन और रत्नसेन की प्रेम भावना एवं प्रक्रिया केवल औचित्य की ही दृष्टि से अलग नहीं है बल्कि उसके बोध के स्तर पर भी उसमें साफ अंतर देखा जा सकता है । इस प्रकार स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि साही ने शुक्ल से भिन्न जायसी के प्रेम-पद्धति और प्रेम के स्वरूप का विश्लेषण किया जो अपनी नवीनता और विशिष्टता के कारण तथा पर्याप्त विश्लेषणात्मक तर्कशीलता के कारण विश्वसनीय बन गया है ।

आचार्य शुक्ल ने पद्मावत की सर्वाधिक प्रशंसा उसके लोक-संस्कृति पक्ष के कारण की है । यह पहलू उनकी आलोचना के आदर्श तुलसीदास के कृतित्व के सर्वाधिक मेल में है । उनके अनुसार जायसी कबीर की तुलना में जनता के बीच अधिक कारगर सिद्ध हुए तो इसका एकमात्र कारण यही है कि उन्होंने राम-रहीम की एकता को पहचाना ।उनके अनुसार जनता भी राम-रहीम की एकता पर विश्वास करने लगी थी तथा जायसी हिंदुओं के धार्मिक एवं सांस्कृतिक प्रतीकों का चित्रण करने लगे थे । “हिन्दू हृदय और मुसलमान हृदय आमने सामने करके अजनबीपन मिटाने वालों में इन्हीं का नाम लेना पड़ेगा । इन्होंने मुसलमान होकर हिंदुओं की कहानियाँ हिंदुओं की ही बोली में पूरी सहृदयता से कहकर उनके जीवन की मर्मस्पर्शिनीअवस्थाओं के साथ अपने उदार हृदय का पूर्ण सामंजस्य दिखा दिया ।कबीर ने केवल भिन्न प्रतीत होती हुई परोक्ष सत्ता की एकता का आभास दिया था । प्रत्यक्ष जीवन की एकता का दृश्य सामने रखने की आवश्यकता बनी थी । वह जायसी द्वारा पूरी हुई ।”[22]इसके साथ आचार्य शुक्ल ने यह भी कहा कि अलाउद्दीन जैसे सुल्तान को माया रूप बताकर जायसी ने न केवल अपनी धर्मनिरपेक्षता को प्रमाणित किया बल्कि जनता के बीच उनकी गहरी पैठ भी बनती गई ।

आचार्य शुक्ल ने सम्पूर्ण पद्मावत में सर्वाधिक प्रशंसा नागमती वियोग खण्डकि की है । उनके अनुसार नागमती का विरह आदर्श हिन्दू गृहणी का विरह है । यह कहा जा सकता है कि शुक्ल का यह ‘आदर्शवाद’ तुलसीदास के ‘मर्यादावाद’ के बिल्कुल मेल में है । जिस प्रकार ‘रामचरितमानस’ में राम के विरह में सीता व्याकुल है उसी प्रकार रत्नसेन के वियोग में नागमती व्याकुल हो रही है । लेकिनयहाँ ध्यान देना होगा कि तुलसीदास ने बारहमासा नहीं लिखापरंतु जायसी ने बारहमासा का वर्णन किया है ।कारण स्पष्ट है तुलसी के लिए सीता का विरह उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है जितना कि जायसी के लिए नागमती का विरह महत्त्वपूर्ण है । सीता और राम पारलौकिक हैंजबकि रत्नसेन और नागमती विशुद्ध लौकिक । कहना न होगा कि विरह का आधिक्य या विरह की लौकिकता यदि नागमती को आदर्श गृहणी बनाते हैं तो इस मायने में सीता नागमती की तुलना में कम आदर्श ठहरेंगी । अगर आचार्य शुक्ल हिन्दू आदर्श गृहणी वाली इस बात को अधिक स्पष्टत:और तुलनात्मकता के साथ कहते तो बेहतर होता। आश्चर्य की बात यह है कि इस संदर्भ में साही ने शुक्ल के ‘हाँ’ में ही सर हिलाते नजर आते हैं । क्या इससे यह निष्कर्ष निकालना ठीक होगा कि शुक्ल और साही की आदर्श हिन्दू गृहणी संबंधीमान्यताएँ एक हैं? शायद हाँ क्योंकि साही ने शुक्ल जी के आदर्श हिन्दू गृहणी वाले कथन को उद्धृत किया है, यथा-“जायसी द्वारा प्रस्तुत नागमती का विरह-वर्णन हिंदी साहित्य की अद्वितीय रचना है, इसमें कोई संदेह नहींहै । उस विरह-वर्णन के आंतरिक संवेगों की तरलता और तीव्रता का विश्लेषण आचार्य रामचंद्र शुक्ल की भावग्राही आलोचक बुद्धि ने जिस प्रकार किया है, उसमेंकुछ जोड़ने का प्रयास करना व्यर्थ है । यह नागमती का विरह-वर्णन ही था जिसके कारण शुक्ल जी ने जायसी को गुमनामी से उठाकर हिंदी की त्रिवेणी में बिठा दिया । मैं बहुत विनम्रतापूर्वक शुक्ल जी के इस मूल्यांकन में अपनी आवाज भी मिलाना चाहता हूँ ।”[23]इस अंश में साही ने आदर्श हिन्दू गृहणी वाले वक्तव्य को छोड़ दियातथा विरह के लोकपक्ष को पकड़ कर जायसी के लोकपक्ष की अनेक उपलब्धियाँ गिना डालीहै । जिस तरह से शुक्ल ने नागमती का विरह-वर्णन किया था उसमें कुछ जोड़ते हुए साही लिखते हैं कि “पूरा विरह-वर्णन, बारहमासे की शक्ल में, नागमती की वाणी के द्वारा रूप ग्रहण करता है । नागमती का पार्थिव शरीर और महल की सखियाँ शुरू की कुछ पंक्तियों में झीनी-सी दिखायी पड़ती हैं । अचानक कल्पना एक झटके से मुक्त हो जाती है और हमारा साक्षात्कार आवाज़, सिर्फ़ आवाज़ से होने लगता है ।...इस आवाज़ में एक पारदर्शी निर्वैयक्तिकता है जो नागमती को भी पीछे छोड़ जाती है।शनैः शनैः यह अन्तर्वर्ती आवाज़ पूरे चित्तौड़ की,और उससे भी आगे बढ़कर उस पूरे इतिहास-लोक की आवाज़ हो जाती है जिसे छोड़कर रत्नसेन चला गया है ।”[24] अत: यह कहना ठीक होगा कि गृहस्थिकता व सामाजिक व्यवस्था के व्यावहारिक धरातल पर शुक्ल एवं साही की मान्यताएँ बहुत हद तक मिलती-जुलती हैं । काश कि पद्मावत की स्त्री दृष्टि पर साही ने विस्तार के साथ लिखा होता।

साही ‘पद्मावत’ को एक क्लासिक काव्य मानते हैं। जो प्रेम और युद्ध का एक मिलाजुला काव्य है । अभी तक के विवेचन से हम इतना तो जान चुके हैं कि इस क्लासिक काव्य की व्याख्या के लिए उन्होंने सबसे पहले जायसी को विशुद्ध कवि घोषित किया । तदुपरांत वे पद्मावत के रहस्यवाद को खारिज करने के साथ उसके कथा संगठन की चर्चा किए । उनका मानना है कि पद्मावत में वक्रता की अनेक गूँज-अनुगूँज सुनी जा सकती हैं।

साही ने पद्मावत को एक क्लासिक काव्य मानते हुए यह भी लिखा है कि जायसी मिथकों को नकारते नहीं “वे केवल यह चाहते थे कि मिथकशास्त्र के जो धर्म और विश्वास से समर्पित रूप हैं, जिनके कारण ‘कन्फ्रंटेशन’ होते हैं, इनको थोड़ा ढीला करें और मिथकों को थोड़ा विनिमेय (Interchangeable) बना दें, थोड़ा द्रव्य (Fluid), थोड़ा तरल (Liquid) बना दें ।”[25]आश्चर्य की बात यह है कि मिथकों की यही तरलता पद्मावत को लोक संपृक्तिसे तो जोड़ती हैपर उसे भक्ति या रहस्यवाद की रचना नहीं बनाती, ऐसा साही का मानना है । उनके ही शब्दों में कि “मिथकीय भूमि है जो धर्म और विश्वास की भाँति उग्रताएँ पैदा नहीं करती । वह एक प्रकार से विलासी (Half-fluidstate) दशा में रहती हैं और मनुष्य को अपनी भावनाओं को वस्तुपरक बनाने में सहायता देती हैं, मगर उनकी भावनात्मक कोटि को ही बनाये रखती हैं, धर्म और विश्वास की कोटि तक अनम्यता (rigidity) के कोटि तक नहीं ले जाती है ।”[26]

एक बार फिर इस तथ्य की चर्चा आवश्यक हो जाती है कि साही किसी भी विचारधारा से इस प्रकार आतंकित क्यों हैं? यदि सन् 1950 के बाद की दुनिया (जो कि साहित्यिक भी हो सकती है) पर ध्यान दिया जाएतो मुक्तिबोध की यह बात सही लगती है कि ‘तत्कालीन हिंदी आलोचना का विकास शीतयुद्ध की छाया में हुआ’ है ।शीतयुद्ध हथियारों का नहीं हथियारों की होड़ का युद्ध था। यों तो यह शीतयुद्ध दो विचारधाराओं का युद्ध था पूंजीवाद और साम्यवाद का । साही पूंजीवादी हैं,यह कहना कठिन है । पर कम से कम अपने आरंभिक रचनात्मक प्रयत्नों के बाद (सन् 1950 के बाद) वे मार्क्सवादी नहीं हैं, इतना तय है ।हिंदी आलोचना में गुटनिरपेक्ष आलोचना मण्डल की स्थापना नहीं हुई फलत:जो भी आलोचक यह कहते रहे कि वे मार्क्सवादी नहीं हैं उन्हें पूंजीवादी मान लिया गया । जिस प्रकार कार्लमार्क्स के अनुसार दुनिया में दो ही वर्ग हैं- शोषक और शोषित ‘सर्वहारा और बुर्जुवा’ उसी प्रकार हिंदी आलोचना के बीच मार्क्सवादी लेखकों एवं तथाकथित पूंजीवादी लेखकों के मण्डल बन गये ।तथाकथित इसलिए क्योंकि मार्क्सवादी लेखकों ने कहा कि वे मार्क्सवादी हैं । जिन लेखकों और आलोचकों ने यह नहीं कहा उन्हें स्पष्टत: ही पूंजीवादी मान लिया गया । ‘शोधकर्ता के अब तक की जानकारी के अनुसार हिंदी के किसी भी लेखक ने अब तक खुद को पूंजीवादी घोषित नहीं किया है ।’

अपने राजनीतिक चिंतन में साही राममनोहर लोहिया के सर्वाधिक निकट हैं । साही द्वारा लिखित विचारात्मक पुस्तक ‘लोकतंत्र की कसौटियाँ’ के लेखों में देखी जा सकती है । लोहिया के मार्क्सवादी होने में लोगों को संदेह हो सकता है परंतु कोई भी उन्हें पूंजीवादी नहीं मानना चाहेगा । उनके सम्पूर्ण चिंतन में ‘राममनोहर लोहिया ग्रंथावली ग्यारह खण्ड’ तथा ‘समता और सम्पन्नता’ जैसी पुस्तकों में उनके समाजवाद के स्वप्न को अच्छी तरह देखा जा सकता है । साही लोहिया के इसी समाजवाद के स्वप्न की व्याख्या करने की कोशिश करते हुए लिखते हैं, “लोहिया के सिद्धांतों को जैसा साही ने समाजवादी दृष्टि से आत्मसात करके विकसित किया था, वैसा कुछ ही लोग कर पाए ।”[27]

साहित्य में विचारधारा से साही की आपत्ति स्पष्ट ही मार्क्सवादी विचारधारा से है । वे साहित्य में विचारधारा मात्र के विरोधी नही हैं, क्योंकि उनके सम्पूर्ण चिंतन में इलियट, कालरिज, रिचर्ड्स, मालार्मे आदि जैसे आलोचकों, कवियों और चिंतकों के उद्धरणों की पहचान बड़ी आसानी से की जा सकती है । मार्क्सवाद से उन्हें खास आपत्ति है । वे मानते हैं कि ‘मार्क्सवाद’ वह विचारधारा है जो अपने सामने किसी दूसरे सच की गुंजाइश को खत्म कर देती है । अत: यह विचारधारा लोकतंत्र के मेल में नहीं है ।यही कारण है कि वे जायसी, शमशेर या प्रेमचंद आदि किसी भी रचनाकार के प्रसंग में उसकी रचना पर किसी भी विचारधारा के प्रभाव को स्पष्ट रूप से नकारते हैं । इस कार्य के लिए कभी वे जबरदस्त तर्क देते हैं तो कभी सिर्फ विचारधारा को नकारने की कोशिश करते हैं । ऐसी जगहों पर उन पर लगाया गया आरोप ठीक ही जान पड़ता है कि “साही मुद्दे से भागते हैं और बहस का पूरा वितान अपने बचाव के लिए खड़ा करते हैं ।”[28]इस कथन के संदर्भ में हमें उनकी पुस्तक ‘जायसी’ की समीक्षा करनी चाहिए । एक हद तक उनका जायसी को कवि मानना ठीक है पर पद्मावत में रहस्यवाद को बिल्कुल नकार देनाऔर यह मानना कि बड़े से बड़े सूफ़ी साधकों से चिंतन के मायने में जायसी बड़ेहैं ।

“मुझको लगता है कि अपने समय के सभी सूफ़ियों से और अपने समय के कुछ पहले निजामुद्दीन औलिया जैसे संत तक से दिमाग और भावना में जायसी बड़े हैं छोटे नहीं । यह मैं बहुत जोर देकर कहना चाहता हूँ ।”[29]

साही का मानना है कि,इसलिए परवर्ती सूफ़ी साधकों ने जायसी को सूफ़ी कवियों में शामिल करने का भरसक प्रयत्न किया है । यह बात बहुत अधिक तार्किक नहीं लगती है ।

आचार्य शुक्ल के सामने जायसी की विचारधारा को मानने या नमानने का कोई संकट नहीं था । इससे यह मान लेना ठीक नहीं होगा कि उन्होंने जायसी के ‘रहस्यवाद’ या ‘रूपक तत्व’ के लिए जो भी कुछ कहा वह तार्किक हैपर इतना तो कहा ही जा सकता है कि वे जायसी को अनेक सीमाओं के बावजूद स्वीकार करते हैं । परवर्ती शोधों ने यह सिद्ध किया है कि शुक्ल ने जायसी की जो सीमाएँ मानी हैं उनमें कुछ सीमाएँ जायसी की तथा कुछ कृति के संपादन एवं तत्कालीन आलोचना पद्धतियों की सीमाएँ हैं ।

जायसी की आलोचना के प्रसंग में शुक्ल की आलोचना-दृष्टि अधिक शास्त्रीय हो गई है । कारण स्पष्ट है वे किसी भी कृति से प्रभावित होते हैं, कृति के चरित्रों से । कहना न होगा कि गोरा और बादल को छोड़कर पद्मावत का कोई भी चरित्र ऐसा नहीं है जो हमें स्मरण रह सके । इन दोनों चरित्रों को हम युद्ध कौशल और बलिदान के लिए याद करते हैं । इनके अतिरिक्त पद्मावती का सौंदर्य, नागमती का विरह, रत्नसेन के थोड़े-थोड़े कई गुण (पर समग्रता में कोई भी नहीं) हमें स्मरण रहते हैं । पद्मावत में हमारे मन पर सबसे गहरी छाप छोड़ती है, ‘पद्मावत’ की कथा । डॉ. नगेन्द्र ने अपने संपादित इतिहास ग्रंथ ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ में इस तरह के काव्य को ‘कथा काव्य’ ठीक ही कहाहै ।आचार्य शुक्ल के सामने कथा की व्याख्या का कोई विधिवत ढांचा नहीं था । अत: शास्त्रीय आधारों पर वे जिस भी ढंग से पद्मावत का विवेचन कर सकें उन्होंने किया । शास्त्रीयता के कारण ही न केवल उन्हें पद्मावत के कथा संगठन को समझने में परेशानी हुई बल्कि वे पद्मावत के पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्ध को जोड़ने वाले किसी एक तार्किक सूत्र की खोज भी न कर सकें ।

आचार्य शुक्ल और साही द्वारा किया गया ‘जायसी’संबंधी विवेचन हिंदी की व्यावहारिक समीक्षा को एक दिशा देता है । दिशा इस रूप में नहीं कि ये आलोचक जायसी को सम्पूर्णता में व्याख्यायित कर सकें, बल्कि इस रूप में कि ये दोनों समीक्षाएँ दो तरह के अतिवादों के बीच जायसी के विवेचन के लिए नये रास्ते बनाने का मौका देती हैं ।

[1]वर्धमान और पतनशील-विजयदेवनारायण साही, पृष्ठ-89


[2]वर्धमान और पतनशील-विजयदेवनारायण साही, पृष्ठ-89


[3]रामचरित मानस-तुलसीदास,टीकाकार-हनुमानप्रसाद पोद्दार, पृष्ठ-411


[4]वही,पृष्ठ-411


[5]वर्धमान और पतनशील-विजयदेवनारायण साही, पृष्ठ-96


[6]हिंदी साहित्य का इतिहास-आचार्य रामचंद्र शुक्ल, पृष्ठ-59


[7]वर्धमान और पतनशील-विजयदेव नारायण साही, पृष्ठ-94


[8]पद्मावत-सं. वासुदेवशरण अग्रवाल, पृष्ठ-61


[9]पद्मावत-सं. वासुदेवशरण अग्रवाल, पृष्ठ-61


[10]कसौटी-8,सं.नंदकिशोर नवल,’पद्मावत’ नारी श्रेष्ठता का प्रथम काव्य-भगवान सिंह, पृष्ठ-129


[11]वर्धमान और पतनशील-विजयदेवनारायण साही,पृष्ठ-107


[12]जायसी-विजयदेवनारायण साही, पृष्ठ-105


[13]छठवाँ दशक-विजयदेवनारायण साही, पृष्ठ-200


[14]वर्धमान और पतनशील-विजयदेवनारायण साही, पृष्ठ-61


[15]जायसी-विजयदेवनारायण साही, पृष्ठ-10


[16]पूर्वग्रह-65, अतिथि सं.रमेशचंद शाह, लेख-एक मध्यकालीन कवि का आधुनिक कवि के रूप में आविष्कार, परमानंद श्रीवास्तव, पृष्ठ-110


[17]जायसी ग्रंथावली-सं.आचार्य रामचंद्र शुक्ल, पृष्ठ-68


[18]वर्धमान और पतनशील-विजयदेवनारायण साही,पृष्ठ-100/101


[19]जायसी-विजयदेवनारायण साही, पृष्ठ-921


[20]वही, पृष्ठ-62


[21]वर्धमान और पतनशील-विजयदेवनारायण साही, पृष्ठ-106


[22]जायसी ग्रंथावली-सं.आचार्य रामचंद्र शुक्ल, पृष्ठ-28


[23]जायसी-विजयदेवनारायण साही, पृष्ठ-111


[24]जायसी-विजयदेवनारायण साही, पृष्ठ-111


[25]वर्धमान और पतनशील-विजयदेव नारायण साही, पृष्ठ-102


[26]वर्धमान और पतनशील-विजयदेव नारायण साही, पृष्ठ-103


[27]विजयदेव नारायण साही-सं.सत्यप्रकाश मिश्र/विनोद तिवारी, पृष्ठ-17


[28]अभिप्राय 9/10-सं.राजेन्द्र कुमार, लेख-साही को जद्दोजहद से गुजरते हुए, हिमांशु रंजन, पृष्ठ-73


[29]वर्धमान और पतनशील- विजयदेवनारायण साही, पृष्ठ-96

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