लोकगीत की वर्तमान में प्रासंगिकता राजेश कुमारी


पी-एच.डी., शोध छात्रा

हिंदी साहित्य विभाग,

म. गां. अं. हिं. वि., वर्धा-442001 (महाराष्ट्र)

Email: rkmgahv@gmail।com

प्राचीन काल से लेकर वर्तमान समय तक अथवा मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु तक के सफ़र में लोकगीतों की अपनी एक अलग पहचान रही है। क्योंकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और सामाजिक प्राणी होने के नाते वह लोक गीत के दायरे से बाहर रह ही नहीं सकता। इन लोकगीतों की हमारे समक्ष एक लम्बी परम्परा हमारे समाज में देखने को मिलती है। यह लोक गीत ख़ुशी से लेकर गम तक के समय में गाए जाते रहे है। लेकिन इनका हमें लिखित रूप बहुत कम संख्या दिखलाई पड़ता है लिखित रूप में ना होने के कारण बहुत से गीत हमारे समक्ष से खत्म से होते जा रहे है। इन गीतों को पीढ़ी दर पीढ़ी बचाए रखने में स्त्रियों की अपनी एक अगल पहचान है क्योंकि अनेक त्योहारों एवं पर्वों पर गाए जाने वाले गीत स्त्रियों के द्वारा ही गाए जाते है। जिससे की इनकी पीढ़ी दर पीढ़ी परम्परा हमारे समाज में बनी हुई है। आज के संदर्भ में जब हम देखते है तो आज की पीढ़ी लोकगीतों से कट रही है वह इन गीतों को गाने सुनने एवं बजाने के बजाए फिल्मी गानों को अधिक पसंद करती है। इन गीतों की संख्या कम होने का कारण भूमंडलीकरण एवं बाजारवाद का प्रभाव है। लेकिन कुछ गीतों का रूप हमें आज भी त्यौहारों पर गाए जाने वाले गीतों के रूप में भी दिखलायी पड़ता है।

जैसाकि हमारे समाज में व्रत रहने से लेकर लोकगीत गाने तक में स्त्रियों को ही रखा गया है। यहां हम यह भी कह सकते हैं कि यह सब ब्राह्मणवादी समाज व्यवस्था की देन हैं। खास बात तो यह है कुछ व्रत एवं त्यौहार तो उन्हीं के सिर्फ उनके लिए बनाए गए है वहीं उनके त्यौहारों में से सावन महीने का भी रूप देखने को मिलता है यह महीना स्त्रियों के लिए बहुत ही ह्रास उल्लास एवं मनोरंजन का महीना होता है क्योंकि इस महीने में माता-पिता अपनी शादी सुधा लड़कियों को ससुराल से मायके बुलाकर लाते है। इस महीने का इंतजार शादी सुधा लड़कियां एवं कुवारी लड़कियां साल भर करती है।

क्योंकि वह इस पूरे महीने उन्हें मायके में रहने का अवसर जो मिल जाता है तथा अपनी सखी-सहेलियों से मिलने का मौका भी मिल जाता है। जिससे कि वह अपनी शादी सुधा जिंदगी के बारे में एक दूसरे से सारी बातें करती है। लेकिन आज के संदर्भ में जब हम देखते हैं तो यह बहुत कम होता जा रहा है। आज लड़कियां अपनी ससुराल से तो इस महीने आती है लेकिन उन्हें सिर्फ दो-चार दिन ही रहने का मिलता है और इसी समय में से समय निकालकर वह अपनी सखी-सहेलियों से बातचीत करने है के पश्चात शाम को झूला डालकर झूलती है। झूलते समय वह `अनेकों गीतों को गाती है।

जैसे- चंदा की चदनी रे मौरा झूकी अधियारी

राजा की रानी पनिया चली जी

हट जारे हट जारे मौरा भरने दे नीर

हम घर सास दुसावती जी

भर गगरी वान सर जो धर ली

सूरत तो लगाई वाने महल की जी

उतारों री उतारों री सासुल सर पे से गगरी

नाएं तोरी पटकू तियारे चौक में जी

क तोरी बऊअल तोसे बोल री बोले

क तोरी दिनों तुम्हें गालिया जी

नाएं तोरी सासुल हमसे बोल री बोले

नाए तोरी दिनी हमें गलियां जी

बागों को मौरा री सासुल मेरे मन भायों

बाकी तो कौकन मेरे मन वसी जी

कहो तो बऊअल मेरी मौरा की सौ

सोने को मुरल गढ़ावती जी

सोने को मौरा री सासुल चोर जो ल जाए

बाकी तो कौकन मेरे मनवसी जी

कहो तोरी बऊअल मेरी मोरा की सौ लकड़ी को मुरल बनावटी जी

लड़की को मौरा री सासुल टूट फटक जाए

बागों को मौरा मेरे मन वसो जी

कहो तोरी बऊअल मेरी मौरा की सौ चुदरी पे मुरल कढ़ावती जी

चुदरी को मौरा री सासुल धूव फट जाए

बाकी तो कौकन मेरे मनवसी जी

चंदा की चदनी रे मौरा झूकी अधियारी

राजा की रानी पनिया चली जी

इस गीत में यह भाव निकलता है कि बहू अपनी सास से बाग में रहने वाले मोर की सुंदरता का वर्णन करती है। उसकी सास उससे यह कहते हुए समझाती है कि बहू मैं तुमको बाग के मोर के सिवाए तुम्हें सोने का मोर एवं लड़की यहां तक की तुम्हारी चुदरी पर भी मोर कढवा दूंगी लेकिन तुम उस बाग के मोर को लेन की हट मत करो। आगे फिर हम इन गीतों को कुछ और रूप में देखते हैं।

जैसे- सुन बऊअल री क सावन के दिन-चार वीरन तियारे अभी ना आए जी

सुन सासुल री क नाय मेरे मईया जिआएं वीर मौसी के जिआएं जी

सुन सासुल री क कौन बटावें रेशम डोर कौन हमारी पटली बनावें जी

सुन बऊअल री क सुसर वटावें रेशम डोर दिवर तियारे पटली वनामें जी

सुन सासुल री क कौन झूलगों हमारे साथ

कौन हमें झोंटा दवें जी

सुन बऊअल री क नंद झूलगी तियारें साथ दिवर तियारें झोंटा दवें जी

सुन बऊअल री क सावन के दिन चार वीरन तियारे अभी ना आए जी

सुन सासुल री क नाएं मेरे मईया जिआएं वीर वीर मौसी के जिआएं जी

इस गीत में सास अपनी बहू से कहती है सावन के सिर्फ चार दिन बचे है और अभी तक तुम्हारे मायके से तुम्हें कोई लेने के लिए नहीं आया। इस पर बहू अपनी सास से कहती है कि मेरे खुद के भाई नहीं है बल्कि मेरी मौसी के बेटे है और यह भी कहती है कि अगर मैं नहीं जा रही हूँ अपने मायके तो यहां पर झूला झूलती हूँ तो मेरे लिए रस्सी कौन बनाएगा और कौन पटली बनाएगा, कौन हमारे साथ झूलेगा और कौन हमें झोंटा देगा इस बात पर फिर सास अपनी बहू से कहती कि ससुर तुम्हारे लिए रस्सी बनायेगें देवर तुम्हारे पटली और नंद तुम्हारी साथ झूला झूलेगी।

जैसे- सुन मईया री क कौन रंगावें हमारी चुदरी,

कौन गढ़ावें गले का हार,

कौन मिलावें सात सहेलरी जी

किन्न रंगादई अम्मा मेरी चुदरी जी

हेजी कोई किन्न गढ़ादों गले हार,

किन्न मिलादई सों सात सहेलरी जी

हमने रंगादई बेटी तियारी चुदरी जी

हेजी कोई बबुल हम्बें कोई

बबुल गड़ादों गले हार जी

विरन मिलादई सों सात सहेलरी जी

ढिंग-ढिंग फट गई अम्मा मेरी चुदरी जी

हेजी कोई लर लर टूटो गले हार भादों में बिछड़ी सात सहेलरी जी

दर्जी सिलादऊ बेटी तियारी चुदरी जी

हेजी कोई सुनरा हम्बें को सुनरो गठा दउ गले हार जी

सावन में मिलादऊ सात सहेलरी जी

इस गीत में लड़की अपनी मां से अपने लिए चुदरी, गले का हार तथा अपनी सहेलियों को मिलने के बारें में बोलती है। जिस पर उसकी मां बताती है कि हम तुम्हारी चुदरी रंगाएगें और बबुल तुम्हारे गले का हार बनवाएगें तथा भाई तुम्हारा सावन के महीने में तुम्हारी सहेलियां से तुम्हें मिलवायेंगा। अगर चुदर फट जाती है हार टूट जाता है और सहेलियां भादों के महीने में बिछड़ जाती है तो फिर हम दुवारा से सब करेगें तुम चिंता मत करो।

जैसे- ऊँचों सों गुरदों देवर झूला मत डारों जी

हेजी डोरी मत डारों जी कोई टूट पड़गी रेशम डोर

एक झोंटा दिनों बान दूजों झोटा दिनों जी

कोई तीजें पे टूटी रेशम डोर जी

बारह बरस पीछे पिया नौकरी से आए जी

कोई चकरी से आए जी

कोई आगंना पलग बिछाए जी

मां मेरी दिखें, बहन मेरी दिखें

कोई एक ना दिखें बिजनार जी

इतनी रे सुनके मां उढ़ बोली जी

कोई आए विरन वाके लने हार जी

इनती रे सुनक वो तो चल दओं जी हेजी चल दओं जी

कोई पहुंचों जाए ससुराल जी

एक वन नाकों वां दूजों वन नाकों जी

कोई तीजें पे पहुँचों ससुराल जी

सास लाई रोटी सारी लाई पनिया

कोई सरज लाई लाल विजनियाँ जी

साँस मेरी दिख सारी, मेरी दिख कोई एक ना दिख विजनार जी

छोटी सारी बाकी नो उठ बोली जीजा बहनायें चोना लायें जी

इतनी रे सुन के वो तो चल दओं जी

हेजी चल दओं जी कोई पहुंचा जाए हरियल बाग जी

मेरी तो भईया तने बनी रे विगाड़ी जी

कोई तियारी बिगाड़े भगवान जी

यह गीत उस समय की व्यथा को व्यक्त करता है। जब लोग अपने गांव से शहर मजदूरी अथवा नौकरी करने के लिए जाते थे। लेकिन वह अपनी स्त्रियों को साथ नहीं ले जाते थे, बल्कि उन्हें अपने घर छोड़कर जाते थे। एक समस्या यह भी थी कि उस समय आज की तरह फोन या लैपटॉप आदि की सुविधा नहीं थी, बल्कि बात करने का जरिया सिर्फ चिट्टी-पत्री या किसी के द्वारा घर-परिवार एवं गांव की राजी-खुशी का संदेश भेजवाया जाता था। चार-छ: साल बाद जब पुरूष घर वापस आते तो उनकी पत्नियों के साथ कैसा व्यवहार होता उसका पता लगता है। जैसा कि इस गीत के माध्यम से हम देख सकते है।

इसी तरह कुंआरी लड़कियों के एक महीना और होता है और आज भी इसकी परम्परा हमारे समाज में आज भी इस महीने का नाम कार्तिक है। जिसे गांव की भाषा में कातिक कहा जाता है। यह महीना बहुत ही मनोरंजन एवं हास्य उल्लास एवं व्यंगपरक होता है। इस पूरे महीने कुंआरी लड़कियां सुबह पांच बजे अथवा सूर्य निकलने से पहले नहा-धोकर तुलसी के पोधें पर जल चढ़ाती है। इस जल चढ़ाने के पीछे एक मिथक है कि अगर कुंआरी लड़कियां पूरे एक महीने तक नियम से सुबह उठकर तुलसी के पेड़ को जल चढ़ाएगी तो उनकी शादी जल्दी हो जाएगी साथ ही उनके लिए अच्छा घर परिवार मिलेंगा। वह अपनी ससुराल में हमेशा खुश रहेगी किंतु ऐसा कुछ नहीं होता, बल्कि मिथक की बातें मिथक के रूप में ही सिमट कर रह जाती है। अगर इस परम्परा के बारे में बात की जाए तो पहले बहुत बड़ी संख्या में लड़कियां इस पूरे महीने को नियम एवं कायदे से मनाती थी। लेकिन आज इसकी संख्या चार-पांच प्रतिशत ही बची है। तुलसी पर जल चढ़ाने के बाद लड़कियां उसके पास बैठ कर गीतों का गाती है, जिसमें एक गीत यह भी है।

जैसे- तुलसा तेरी ओढ़ हमने राम नहीं देखें

देखें-देखें बाग बीच देखें

मालिन उनके साथ हमने राम नहीं देखें

तुलसा तेरी ओढ़ हमने राम नहीं देखें

देखें-देखें ताल बीच देखें, धोबिन उनके साथ हमने राम नहीं देखें

तुलसा तेरी ओढ़ हमने राम नहीं देखें

देखें–देखें कुबट बीच देखें

धिमरिन उनके साथ हमने राम नहीं देखें

तुलसा तेरी ओढ़ हमने राम नहीं देखें

देखें-देखें महल बीच देखें

रानी उनके साथ हमने राम नहीं देखें

तुलसा तेरी ओढ़ हमने राम नहीं देखें

इस तरह के गीतों के माध्यम से वह अपनी वेदना एवं संवेदना को जाहिर करती है। और अपने लिए भगवान से अच्छे पति की कामना करती है।

इसी तरह चेत के महीने में आने वाली नवरात्रि के खत्म होने के दूसरे दिन से कुंआरी लड़कियां मिट्टी से झांझी नामक वस्तु बनाती है। इस झांझी का आकर गोल रूप में होता है तथा उंचा भी होता है। सबसे खास बात यह भी है कि प्रकाश बाहर निकालने के लिए इसके अंदर से चारों ओर छेदकर दिए जाते है।

जिससे मिट्टी के बने दिवला अथवा (दीपक) को अंदर बाती एवं तेल के साथ रखती है। और उस उठाकर घर-घर जाकर मांगती है। मांगते समय बड़ा मजा आता है, क्योंकि रास्ते में एक-दूसरे की झांझियों के दीपक को आपस में बुझा देते है कुछ लड़कियां तो ऐसा करती है कि रास्ते भर बुझाकर ले जाती है और जैसे ही किसी के घर के अंदर घुसती है तो जला लेती हैं। ऐसा वो इसलिए करती है ताकि तेल कम लगे घर में प्रवेश करने के बाद वह गीत गाती है।

जैसे- झांझी री झझोरिया रायेंपुर के चेली चेला

भिच्छा मांगन आए री,

भर चुटकी मैंने भिच्छा डालों चुदरियां रंग लायी री

टूटे ना फटके सासुल जाए दिखाएं री

सास विचारी घर पत्थर पे फोरे री

इसी तरह एक और अन्य गीत गाती है।

जैसे-चाकी तर मैंने धनियों बोयों

हां सहेली धनियों बोयों

बा धनियें के किल्ला फूटे

हा सकेल सहेली किल्ला फूटे

बा किल्ला की मैंने गाय चराई

हां सहेली गाय चराई

गाय ने मुझे दुद्धा दिनों

हां सहेली दुद्धा दिनों

बा दुद्धा की मैंने खीर बनायी

हां सहेली खीर बनायी

खीर मैंने भईया कू चटाई

भईया ने मुझे पैसा दिना

हां सहेली पैसा दिना वा पैसा की मैंने चूड़ियाँ पहनी

हां सहेली चूड़ियाँ पहनी

चूड़ियाँ मेरी चमके सास बहू मटके

इस तरह के गीत गाने के पश्चात लड़कियों को उस घर से कुछ अनाज या पैसे दिए जाते थे। यह प्रक्रिया एक दिन नहीं चलती थी, बल्कि पूरे सात दिन चलती थी। सात दिन के बाद उसे झांझी को किसी नदी या नाले अथवा नहर में सिरा (विसर्जन) दिया था। और उस अनाज आदि को बेचकर लड़कियां कुछ-कुछ बनाती खाती थी। और खुद मौजमस्ती करती।

इस तरह देखा जाए तो आज इन लोकगीतों की संख्या बहुत कम मात्रा में दिखलाई पड़ती है। किंतु लोकगीत ऐसे गीत होते हैं। जो स्त्रियों की अभिव्यक्ति के साथ, हृदय की वेदनाओं को सबके सम्मुख लाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। साथ ही वो अपने समाज की परम्पराओं रीति-रिवाजों आदि का ना जाने कितनी रीतियों को प्रखर रूप में प्रस्तुत भी करती रही है। लेकिन वहीं ब्राह्मणवादी समाज-व्यवस्था ने स्त्रियों को इन परम्पराओं में जकड़ रखा है। जिससे स्त्रियां आज भी इससे निकल पाने में अभी भी असमर्थ हैं। लेकिन मेरा मानना है जैसे-जैसे महिलाओं में शिक्षा का स्तर बढ़ेगा। वैसे-वैसे समय और परिस्थिति के कारण सामाजिक-संरचना में बदलाव देखने को मिलेगा। जिससे ऐसे लोकगीतों का निर्माण स्त्रियां खुद करेगी, जिससे उन्हें आगे बढ़ने में प्रेरणा मिलती रहेगी। इसलिए लोकगीतों की वर्तमान समय में भी प्रासंगिकता बनी हुई है।

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