लोकनाट्य की वर्तमान स्थिति (विशेष संदर्भ:- छत्तीसगढ़-नाचा)


लोक शब्द अत्यंत प्राचीन हैं। प्राचीन काल से लेकर आधुनिक साहित्य की नवीन प्रवृतियों तक ‘लोक’ शब्द का प्रयोग हो रहा है लोक ‘विशद, विराट, विस्तृत, सार्वव्यापक, सार्वकालिक, सार्वदेशिक हैं और परंपरानुमोदित हैं। इसे किसी एक अर्थ या परिभाषा की लक्ष्मण रेखा में बांध लेना संभव नहीं हैं। ‘लोक’ शब्द संस्कृत के लोक दर्शने’ धातु में ‘धज’ प्रत्यय लगाने से निष्पन्न हुआ हैं इस धातु का अर्थ ‘देखने’ वाला होता हैं । डॉ.हजारी प्रसाद ने ‘लोक शब्द की व्यख्या करते हुए लिखा हैं। की लोक का अर्थ ‘जनपद’ या ग्राम्य नहीं हैं बल्कि नगरों और गावों में फ़ैली हुई वह समूची जनता है जिनके व्यावहारिक ज्ञान का आधार पोथियाँ नहीं, ये लोग नगर में परिष्कृत, रुचि वाले लोगों की समूची विलासिता और सुकुमारता को जीवित रखने के लिए बस्तुएँ आवश्यक होती हैं”। ‘लोक’ एक समूह हैं, हमारी संस्कृति ही लोक की रूपरेखा का विवरण प्रस्तुत करती हैं प्राचीन काल में ही मनुष्यों ने लोक को जन्म दिया हैं। मनुष्यों ने ही अपनी कहानी कहने या दिनचर्या को ब्यान करने की प्रस्तुतीकरण और जैसा वहाँ, जंगलों में होता उसकी प्रस्तुति किया करते थे।

लोक नाटकों का प्राचीन काल से ही लोक जीवन से घनिष्ठ संबंध रहा है। “गेय, नर्तेय एवं अभिनय गुणों से युक्त लोकनाटक सामाजिक एवं सांस्कृतिक प्रतिभा की उपज माने जाते हैं। लोक मानस की धार्मिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक उप्लब्धियां ही लोक नाटकों का स्त्रोत रही हैं। सरल तथा सीधी भाषा में अभिव्यक्त लोक नाटकों का सीधा संबंध उत्सवों, मांगलिक अवसरों, धार्मिक-पर्वों एवं लोक मनोरंजन से होता हैं। ऐतिहासिक पौराणिक एवं सामाजिक-सांस्कृतिक कथानकों के ऊपर आधारित लोक नाटकों में गध्य के साथ ही बीच-बीच में नृत्य, गीत एवं संगीत भी रखा जाता हैं लोकनाटक सदैव लोक भाषा में ही अभिनीत किए जाते हैं ।

लोकनाट्य के कई प्रकार पाये जाते हैं नृत्य प्रधान, नाट्य-हास्य प्रधान, संगीत-प्रधान क्रमबद्ध, नाट्य-वार्ता प्रधान आदि का उल्लेख मिलता हैं। आईने अकबरी’ में जिन कीर्तनियां का उल्लेख हुआ हैं, वे आजकल ‘रास’ के रूप में मिलते हैं। रास में रास-नाट्य की प्रधानता है, पात्र या अभिनेता गाते नहीं, गाने का कार्य प्रायः साथ की संयोजक संगीत मंडली करती है। संगीत का समस्त स्वरूप प्रायः शास्त्रीय होता है।

भारतीय लोक नाट्य परंपरा में अनेक लोकनाट्यो ने जन्म लिया हैं जिसमें लोक कलाएँ, लोकनाट्यों के रूप, विभिन्न प्रान्तों में बिखरे पड़े हैं। आश्चर्यजनक रूप से इतनी विविधता के बावजूद भारतीय लोकनाटकों में एक जबरदस्त एकता दिखाई पड़ती हैं। यह एक शिल्प के स्तर पर पूर्वरंग, संगीत की प्रधानता, कथावस्तु अथवा सूत्रधार या विदूषक के रूप में दिखाई देती है “लोकक़ला रुपों की जातीय संस्कृति से गहरी निकटता रही है | ये कला रूप अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी विशिष्टता के अनुरूप परस्पर भिन्न शैल्पिक निजता रखने के बावजूद अंतर्वस्तु के स्तर पर गहरे एकात्म होते हैं। लोकगीतों, कलाओं और लोकनाट्य रूपों के सन्दर्भ में इसे देखा जा सकता है । इसके अनेक प्रारूप हमें देखने को मिलते हैं जैसे- असम का अंकिया नाट्य, भावना-खुलिया, कामरूपिया, त्रिपुरा का ढबजात्रा, मणिपुर का गौढ़लीला, शुमाडलीला, बंगाल का जात्रा, गंभीरा, अलकाप, विहार का बिदापत, किरतनिज्जा, नटुवा नाच, जट-जटिन, हुड़ुकनाच, उड़ीसा का प्रहलादनाटक, भारतलीला, झारखंड का छऊ (नृत्य-नाटक), छत्तीसगढ़ का नाचा, तारे-नारे, मध्यप्रदेश का माच, उत्तर प्रदेश का नौटंकी, स्वांग, भगत, हिमाचल का करयाला, बुछैन, बांठड़ा, हिरणात्तर, हरियाणा का सांग, पंजाब का नकल, जम्मूकशमीर का भांडपाथर, राजस्थान का गवरी, ख्याल, गुजरात का भवाई, महाराष्ट्र का तमाशा, गोधल, गोवा का तियाटर, कर्नाटक का यक्षगान, कृष्ण पारिजात, तमिलनाडू का तेरूकूतु, केरल का कूडियट्टम, वेलकलि, टेय्यम आदि ऐसे लोकनाट्य हैं जिनकी भूमिका आज भी बहुत महत्वपूर्ण हैं। कुछ ऐसे भी लोकनाट्य हैं जिन पर अभी रिसर्च बाकी और शायद कोई काम नहीं हुआ हैं। मेरे संगयान में उत्तराखंड का नरदपात्तर, पांडवलीला आदि ऐसे लोकनाट्य हैं जिन पर अभी काम करना आवश्यक है, इसके अलवा आंध्र प्रदेश का वीथिनाटकम, ओग्गूकथा, सिक्किम का बालन, इंद्रजात्रा आदि लोक नाट्य है। हिंदुस्तान के किसी भी राज्य में होने बाले लोकनाट्य हो मनुष्य के मूल मस्तिष्क में उसका जीवन, उसकी कर्मठता, उसकी जिजीविषा है। भारत के राजनीनिक जिंदगी के साथ लोक शिक्षण की भावना उसके अंदर बसती है।

समय के साथ अभिव्‍यक्ति के तौर तरीके और रंग रूप बदलते रहते हैं। उसकी प्रस्‍तुति भी धीरे-धीरे परिवर्तित होती है। यही बात लोक नाट्य ‘नाचा’ के साथ भी हो रही है। छत्तीसगढ़ी में 50-60 वर्ष पूर्व या अधिकतम 100 वर्ष पूर्व जब भी माजी राव भोसले और मराठों ने छत्तीसगढ़ पर अपना अधिपत्‍य स्‍थापित कर लिया था तब ‘नाचा’ का उद्भव और विकास प्रारंभ हुआ। रामचंद्र देशमुख और अन्‍य कला मर्मज्ञों ने छत्तीसगढ़ी लोक नाट्य ‘नाचा’ का जो प्रारंभिक रूप बताया है। छत्तीसगढ़ी लोकनाट्य ‘नाचा’ लोक जीवन की विशद और सशक्‍त अभिव्‍यक्ति है। जनजीवन की हर अनुभूति और कल्‍पना, उसके संघर्षों की गाथा, उसके उल्‍लास की मिठास और विजय की मुस्‍कान है। उसकी वेदना के साथ ही उसका आक्रोश भी व्‍यंग्‍य में लिपटकर मुखर होता है। छत्तीसगढ़ी लोक नाट्य की कोई लिपिबद्ध पांडुलिपि खोज करने पर भी नहीं मिलती है क्‍योंकि ‘नाचा’ छत्तीसगढ़ी अलग करके नहीं देखा जा सकता। लोकरंजन की एक स्‍वच्‍छन्‍द प्रस्‍तुति में भी नाटक के तत्‍व हमें मिल जाते हैं। यही कारण है कि बहुत से विद्वान छत्तीसगढ़ी लोकनाट्य ‘नाचा’ का प्रादुर्भाव मानवीय सभ्‍यता और संस्‍कृति के साथ-साथ मानते हैं।

लोकनाट्य नाचा का उद्भव स्वतंत्र रूप से हुआ हैं वहाँ के लोकगीत एवं नृत्य की अपनी एक परंपरा हैं समाज में इसका विकास अधिक महत्वपूर्ण माना जाता हैं। जिससे नाचा के अभिनेताओं में उसकी छाया दर्शकों को दिखाई देती हैं। जब नाचा का प्रदर्शन होता हैं तो गाँव-गाँव जाकर गा-गा कर प्रचार- प्रसार किया जाता है। उससे दर्शकों की भीड़ देखने लायक होती, जहां नाचा का मंच होता हैं वही दर्शक अपनी चटाई या विछाने के अन्य समान लाकर बैठ जाते हैं नाचा के कलाकार बहुत ज्यादा नहीं होते थे, एक चिकारा और एक भजन से शुरू किया जाता है जिसमें गीत गाते और नाचते है, लोक के कलाकार गीत बनाते और तुकबंदी करते, क्योंकि गाने के साथ-साथ उनकी आवाज इतनी सटीक और पैनी होती हैं कि पीछे बैठा व्यक्ति भी सुन सके, इसकी पहले तो लाइट के लिए दिये और लेंप का प्रयोग किया जाता था, रात भर ‘चिकारे’ के स्वर और तबले की थप-थप सुनाई देती थी। जैसे-जैसे समय बदलता गया वैसे-वैसे नाचा की जगह और मंच की साज़ सज्जा में बदलाव होने लग गए जिससे अनेक प्रकार के माइक, हारमोनियम, ढोलक, जनरेटर, लाइट्स आदि का प्रयोग नाचा लोक नाट्य में बदलते गए। जिससे वह अपना मंच अपने दर्शक आदि को जमा कर पाया और अपना अस्तित्व बचा के रखा हैं। मगर आज की स्थिति में तो हर वह कला की तरह छत्तीसगढ़ व्यावसायिकता की मार से लोकनाट्य अपनी मौलिकता को खो रहा हैं। भूमंडलीकरण के दौर में सिनेमा ने अपना स्थान इतना गहरा और प्रभावी बना लिया हैं। कि लोक नाट्य क्या हैं यहीं दर्शक भूलते जा रहे हैं। आज के दर्शक को सिर्फ फिल्मी गीत और अमिताभ बच्चन के डायलोग याद हैं बस यही याद उनको और कुछ नहीं सब भूल गए क्योकि हमारा एक समाज दर्शक हैं। इस दर्शक को मनोरंजन के सिवा और कुछ नहीं चाहिए क्योंकि समाज को हर दिन एक नई सुबह के साथ नया मनोरंजन होना चाहिए नाटक, लोकनाट्य को न देखने कि क्या वजह हैं मुझे लगता हैं कि एक नई मानसिकता की उपज हुई है इस हिंदुस्तान में क्या मानसिक उपज के ऊपर क्या कारण हैं जो हमको नई मानसिकता को अपनाना पड़ा।

हमारा समूचा समाज और विराट जनसमुदाय उपभोक्ता संस्कृति की काली छाया से प्रभावित होकर उसके शिकंजे में जकड़ा हुआ है। दूरदर्शन ने घर कि रसोई से विचार तक हमारी सभ्यता और संस्कृति को लगातार प्रभावित किया है परस्पर विरोधी प्रवृतियों और लोभ-लालच की स्थितियाँ के बीच छत्तीसगढ़ का लोक नाट्य ‘नाचा’ का बदलता स्वरूप अपनी मौलिकता और मूल शक्ति खोता जा रहा है। जनता की संवेदना में खोट पैदा करने और उसकी लोक चेतना को कुंठित करने की दिशा में ये प्रयत्न हमारे सामने ज्वलंत प्रश्न हैं।

नागर मंच के रूप भी ‘नाचा’ का परिवर्तित रूप है। गाँवों में नाचा में एक पार्टी में कलाकारों की संख्‍या 5 से 7 तक रहती है जबकि नागर मंच में कलाकारों की संख्‍या 50 से 70 तक रहती है। गाँव मैदान पर एक घेरा, एक तालपत्री, एक माइक और दो-तीन ट्यूबलाइट के प्रकाश में आज भी ‘नाचा’ प्रस्‍तुति किया जाता है जबकि नागर मंच में 25 से 50 तख्‍त से बनाया गया ऊँचा और भव्‍य मंच, लाइट की चकाचौंध और दृश्‍य-श्रृव्‍य सामग्री का भरपूर उपयोग किया जाता है। जिसके कारण इसकी साम‍ग्री और समान का भरपूर उपयोग नागर मंच की व्‍यवस्‍था से जोड़ा या तुलना की जा सकती है। लोक नाट्य नाचा के अभिनेता परिश्रम से रात भर में लगभग 500 रूप ही कमा पाते हैं और नागर मंच के अभिनेता 100000 या 150000 तक हर दिन कमाते हैं। नाचा लोक कला में कोई स्क्रिप्‍ट नहीं होती है। अभिनेता खुद ही कल्‍पना से इसकी भी नयी ऊपर करते हैं और हास्‍य व्‍यंग्‍य से भरपूर नए शब्‍द की खोज करते हैं और अभिनेताओं में इतनी शक्ति या स्‍टेमिना होता है कि वह रात भर इसका प्रदर्शन करता रहता है। छत्तीसगढ़ के अंचल में होने वाली भड़ई (मेला का एक बहुत छोटा रूप) जो अधिकांश गाँवों में प्रत्‍येक वर्ष आयोजित की जाती है। रात में जब नाचा प्रस्‍तुत किया जाता है ग्रामीण हजारों की संख्‍या में उमड़ पड़ते हैं। नाचा की समूहगत भावना लोगों के मन की छूने, उन्‍हें हंसाने, रुलाने और अपने साथ भाव धारा में बहाकर ले जाते हैं। इसका अभिनेता बड़ा व्‍याकुल और सहृदयीय होता है अपने मन और दिमाग का उपयोग कर अपनी सार्वभौमिका का प्रमाण प्रस्‍तुत करता है। हमने अभिनेता का वर्णन उसकी काबिलियत तारीफ है जो अपने श्रम से दर्शकों का मन मोह लेता है।

संदर्भ ग्रंथ सूची

1. प्रो.ए.अच्युतन- लोक नाट्य एवं संस्कृति, शब्द संसार प्रकाशन, करावल नगर दिल्ली, 2004, पृष्ठ स.20

2. डॉ.कुन्दन लाल उप्रेती- लोक साहित्य के प्रतिमान, भारत प्रकाशन मंदिर, सुभाष रोड,अलीगढ़, 2000, प्रष्ठ न. 4

3. डॉ.परमानंद बंसल-हिमाचली लोकनाट्य धाज्जा(सांस्कृतिक तथा सांगीतिक अध्ययन),संजय प्रकाशन दिल्ली, पृष्ठ न.47

4. डॉ.वशिष्ठनारायण त्रिपाठी-भारतीय लोकनाट्य, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ न.9

5. महावीर अग्रवाल – छत्तीसगढ़ी लोक नाट्य नाचा, श्री प्रकाशन,

धीरेंद्र कुमार, शोधार्थी

नाट्यकला एवं फिल्म अध्ययन विभाग

महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विधवाविद्यालय

वर्धा, महाराष्ट्र।

मोबाइल- 9373788013

dhirendra.drama@gmail.com

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