लोक और शास्त्र : संवाद की संस्कृति ( स्वाधीनता आन्दोलन के सन्दर्भ में ) सरस्वती मिश्र

लोक और शास्त्र : संवाद की संस्कृति

( स्वाधीनता आन्दोलन के सन्दर्भ में )

सरस्वती मिश्र

शोध-छात्रा (हिंदी)

बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय, गया, बिहार

लोक ऐसा विलक्षण समंदर है, जो तमाम नदियों को आत्मसात करता है और फिर ऐसी ही तमाम धाराओं को जन्म भी देता है. व्यावहारिक रूप से देखें तो शास्त्र की उत्पत्ति लोक से ही मानी जाएगी. लोक में व्याप्त सुर और शब्द ही शास्त्र के मूलाधार बने हैं. विद्वानों ने अपनी बौद्धिक क्षमताओं से भले ही परिभाषाओं को अलग-अलग रूपों में प्रस्तुत किया है परन्तु आदिकाल से लोक से प्राप्त मान्यताओं को झुठलाया नहीं जा सकता. लोक और शास्त्र एक दुसरे के पूरक हैं और इनमें परस्पर लेन-देन चलता रहता है, और साथ ही इनमें परस्पर द्वंद्व भी देखा जाता रहा है. कभी शास्त्र लोक को नकार देता है और कभी लोक शास्त्र को.

डॉ. श्यामसुंदर दुबे ने इस विषय में भरतमुनि के विचारों से आधार ग्रहण करते हुए कहा है “भारत मुनि ने नाट्यशास्त्र में लोक और शास्त्र को कुछ मायनों में अंतर्ग्रंथित किया. एक उभयमुखी परम्परा निरंतर गतिशील रहती है- जिसमें लोक- शास्त्र में अपना स्थान तलाशने लगता है और शास्त्र लोक का उपजीव्य बनने लगता है, अनुशासन में बंधना और फिर अनुशासनमुक्त होना कला सन्दर्भ की विकास यात्रा है, निरंतर नए होते रहने की चेतनामयी प्रवाह परम्परा है. जब शास्त्र जड़ और स्थिर होने लगता है, तब लोक ही उसे अपनी प्राणप्रद वायु प्रदान करके उसे पुनः नयी रचना शक्ति प्रदान करता है”1

“प्रसिद्द मानवशास्त्री रॉबर्ट रेनफिल्ड संस्कृति के सम्बन्ध में जिसे ‘ग्रेट ट्रेडिशन’ तथा ‘लिटन ट्रेडिशन’ कहते हैं, नामवर सिंह ‘दूसरी परम्परा की खोज’ में उन्हीं प्रवृत्तियों की खोज के लिए ‘शास्त्र और लोक’ का प्रयोग करते हैं. शास्त्र और लोकसंस्कृति, साहित्य और राजनीति के क्षेत्र में हमेशा विद्यमान रहती है लेकिन कई बार शास्त्र के सामाजिक, राजनैतिक दबाव में लोक को नकार दिया जाता है. लोक और शास्त्र के इस द्वन्द्वात्मक रिश्ते में कभी संघर्ष होता है और कभी संपर्क.”2

सन 1857 की क्रांति के बाद स्वाधीनता प्राप्ति के लिए प्रारम्भ हुए विविध आन्दोलनों में लोक ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. शिष्ट साहित्य की अपेक्षा लोक साहित्य अपने विविध रूपों में अधिक सक्रिय रूप में इन आन्दोलनों से जन-जन को जोड़ रहा था. 1857 से लेकर भारतेंदु के काल तक की साहित्यिक रचनाओं में स्वाधीनता आन्दोलनों से सम्बंधित साहित्य का अभाव है. जबकि इसी समय लोक साहित्य इस दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा था. भारतेंदु का समय लोक और शास्त्र के तालमेल का समय था. स्वयं भारतेंदु की अनेक रचनाओं लोक शैली की झलक दिखाई देती है.

स्वाधीनता आन्दोलन के सन्दर्भ में लोक और शास्त्र का अध्ययन करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि जब हिंदी साहित्य में स्वाधीनता आन्दोलन के विषय में सोचना भी प्रारभ नहीं किया गया था उस समय सम्पूर्ण राष्ट्र के अलग अलग अंचलों में स्वाधीनता प्राप्ति की मांग को लेकर स्वर तेज़ होने लगे थे. डॉ. कमलानंद झा अपनी पुस्तक “पाठ्यपुस्तक की राजनीति” में इस बारे में विचार करते हुए कहते हैं “लोकमानस अपने तईं समय, समाज और राजनीति की व्याख्या करता रहता है. कठिनाई यह है कि लोकचित्त की यह व्याख्या साहित्य या इतिहास में दर्ज नहीं हो पाती है. साहित्य, इतिहास या सरकारी, गैर सरकारी दस्तावेजों में दर्ज न होने के कारण हम इसे मिथ्या या कोरी कल्पना नहीं कह सकते. एक पीढ़ी के कंठ से होते हुए दूसरी तीसरी पीढ़ी के कंठ तक आती हुई यह मौखिक परम्परा हमारे अभिजात्य इतिहास दृष्टि में सार्थक हस्तक्षेप की मांग करते हैं. 1857 की क्रांति के सन्दर्भ में हम सौ वर्षों से अधिक समय तक इस विमर्श और अकादमिक बहस में उलझे रहे कि वह स्वतन्त्रता की पहली लड़ाई थी या सिर्फ जमींदारों की अपनी लड़ाई. अगर हम इन बहसों के साथ-साथ देश के विभिन्न अंचलों में गाए जाने वाले 1857 से संबंधित गीतों, स्थानीय कवियों की कविताओं, लोकोक्तियों, मुहावरों और रूपकों आदि की छानबीन की होती तो हमारी समस्या बहुत हद तक हल हो सकती थी”3

हिंदी और उर्दू साहित्य में 1857 की अनुगूँज नाकाफी है. लेकिन विभिन्न आंचलिक भाषाओं की कविताओं और गीतों में अद्भुत रूप से स्वाधीनता संग्राम का आह्वान देखने को मिलता है. ये रचनाएँ इस बात की परिचायक और प्रमाण हैं कि 1857 महज कुछ जमींदारों की अपने हक की लड़ाई मात्र नहीं थी. लोक की जातीय स्मृतियों को समानांतर रूप से सामने रखकर नए सिरे से इतिहासकारों को इस पर विचार करने की आवश्यकता है.

अनेक ऐसे लोकगीत है जिनसे प्रेरणा प्राप्तकर हिंदी साहित्य के रचनाकारों ने प्रसिद्ध रचनाएँ लिखीं. “बुंदेलखंड में प्रचलित एक लोकगीत से प्रेरणा प्राप्त कर सुभद्रा कुमारी चौहान ने ‘खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी’ कविता लिखी थी-

खुबई लड़ी मरदानी

अरे भई झाँसी वारी रानी.

सिगरे सिपियन को पर जलेबी,अपन खाई गुरधानी.

गुरजन-गुरजन तोपे लगाई देई, गोला चलई असमानी.”4

इस स्वतन्त्रता संग्राम में रानी लक्ष्मीबाई जैसी कई नेत्रियाँ थीं जिनका नाम स्वतन्त्रता आन्दोलन के इतिहास में कहीं दर्ज नहीं है. उनकी शहादत लोक स्मृतियों में आज भी जीवित है.

. साहित्यकार अमृतलाल नागर ने इस क्रांति के ठीक सौ साल बाद यानी 1957 में ऐसे ही लोककंठ की आवाज सुनने की कोशिश की और “ग़दर के फूल” नामक ऐतिहासिक पुस्तक की रचना की. शोध अध्येता रमेश कुमार ने अपने एक लेख में विस्तार से इस पर विचार किया है. जिस रीतिकालीन ब्रजभाषा कविता को आलोचकों ने सामंती और दरबारी कहकर दो कौड़ी का सिद्ध कर दिया था, उसी ब्रजभाषा में देखें कि 1857 की क्रांति को किस उद्दीप्त भाव से रेखांकित किया गया है.

निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि आवश्यकता इस बात की है कि जो आधार भूत सामग्री हमें लिखित साहित्य से प्राप्त होती है उसे लोक-स्मृति की मौखिक परम्परा के इतिहास के साथ जोड़कर ठोस रूप में प्रस्तुत किया जाए. इससे लोक और शास्त्र दोनों में ही स्वाधीनता आन्दोलन के प्रति क्या दृष्टिकोण है यह पता चलेगा और अनेक नवीन तथ्य उभरकर सामने आयेंगे.

शोध – सन्दर्भ :

1. लोक : परंपरा, पहचान और प्रवाह – श्यामसुंदर दुबे, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या- 65

2. लोक संस्कृति और इतिहास – बद्रीनारायण, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, पृष्ठ संख्या – 43

3. पाठ्यपुस्तक की राजनीति – डॉ. कमलानंद झा, ग्रंथशिल्पी प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ संख्या – 103

4. भारतीय लोक साहित्य परंपरा और परिदृश्य – विद्या सिन्हा, प्रकाशन विभाग ,नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या – 61

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