लोक साहित्य एवं संस्कृति : नैरन्तर्य और विकास - प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा


लोक-साहित्य और संस्कृति जीवन की अक्षय निधि के स्रोत हैं। इनकी धारा कभी सूखती नहीं है। लोक-गीत, कथा, गाथा, नाट्य, संगीत सहित विविध लोकाभिव्यक्तियाँ जीवन की एकरसता को तोड़ती हैं। विकास के नए प्रतिमान एक जैसेपन को बढ़ाते हैं, इसके विपरीत लोक-साहित्य और संस्कृति एक जैसेपन और एकरसता के विरुद्ध हैं। मनुष्य की सजर्नात्मक सम्भावनाओं का प्रतिबिम्ब विविध कला-माध्यमों में मूर्त होता रहा है। इनमें शब्दमयी अभिव्यक्ति का माध्यम ‘साहित्य’ सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि ‘शब्द’ ही मनुष्य की वह पहचान है जो उसे अन्य प्राणियों से अलग करती है। शब्दार्थ केन्द्रित अभिव्यक्ति के अनेक माध्यमों में से लोक द्वारा रचा गया साहित्य अपनी संवेदना और शिल्प में विशुद्धता और मौलिकता की आंच से युक्त होने के कारण अपना अलग ही प्रभाव रचता है, जो कथित आभिजात्य साहित्य द्वारा सम्भव नहीं हैं। लोक-साहित्य मानव समुदाय की विविधता और बहुलता को गहरी रागात्मकता के साथ प्रकट करता है, वहीं देश-काल की दूरी के परे समस्त मनुष्यों में अंतर्निहित समरसता और ऐक्य को प्रत्यक्ष करता है। वस्तुतः लोक से परे कुछ भी अस्तित्वमान नहीं है। समस्त लोग ‘लोक’ हैं और इस तरह लोक-संस्कृति से मुक्त कोई भी नहीं है। कोई स्वीकार करे या न करे, सभी की अपनी कोई न कोई लोक-संस्कृति होती है। उसका प्रभाव कई बार इतना सूक्ष्म-तरल होता है कि उसे पहचान पाना मुश्किल होता है, किन्तु असंभव नहीं। नैरंतर्य और विकास, परंपरा और परिवर्तन न सिर्फ साथ-साथ अस्तित्वमान रहते हैं, वरन् एक दूसरे पर निर्भर करते हैं। लोक-साहित्य एवं संस्कृति इनकी अन्योन्यक्रिया का जैविक साक्ष्य देता है।

लोक-साहित्य सहित लोक की विविधमुखी अभिव्यक्तियों को आधार देती हुई लोक-संस्कृति का स्वरूप अत्यंत व्यापक है। इसके अंतर्गत लोक समुदाय की कहानियों, घटनाओं, मान्यताओं, रीति-रिवाजों, किंवदंतियों, कथा-गाथा, गीत, संगीत, नृत्य, चिकित्सा आदि सबका समावेश है। साथ ही यह पूर्व-बसाहट के दिनों, उदाहरण के लिए आरंभिक आखेट, पशुपालन, कृषिकर्म आदि की कहानियों, मूलस्थान के देशों या अन्य क्षेत्रों से प्रत्यारोपित सांस्कृतिक जड़ों की कहानियों को भी समाहित करती है। लोक-संस्कृति से प्राप्त कई तथ्य प्रारंभिक पशुपालन, कृषिकर्म से लेकर घरों की बसाहट, ग्रामों, कस्बों और शहरों तक के विकास का लेखा प्रकट करते हैं। साथ ही सामाजिक संरचना और विविध समुदायों की अंतरक्रियाओं का संकेत भी इनसे प्राप्त होता है। काल के प्रवाह सब कुछ बदलता है तो लोक-साहित्य और संस्कृति में बदलाव अवश्यंभावी है। मानव सभ्यता के साथ प्रवहमान विविध परम्पराओं और विकास की जुगलबंदी लोक-साहित्य में निरंतर मुखरित होती है। संकट तब खड़ा होता है जब विकास के कथित प्रतिमान लोक-संस्कृति की आधार-भूमि पर ही चोट पहुँचाने लगते हैं।

भारत सहित दक्षिण-मध्य एशिया अपने ढंग का विलक्षण भूभाग है, जहां ज्ञान की वाचिक और लिखित- दोनों परम्पराओं का अद्वितीय समन्वय मिलता है। ‘लोके वेदे च’ सूत्र को चरितार्थ करते हुए ये दोनों एक-दूसरे के पूरक बने हुए हैं। लोक-साहित्य और संस्कृति की दृष्टि से भारत की पहचान का उपक्रम उतना ही महत्त्वपूर्ण हो सकता है, जितना लिखित साहित्य की दृष्टि से। लोक-साहित्य और संस्कृति के वैज्ञानिक दृष्टिकोण का समावेश करते हुए हम भारत सहित समूचे एशियाई इतिहास और जातीय स्मृतियो का लेखा-जोखा तैयार कर सकते हैं। इसी तरह नृतत्त्वशास्त्रीय इतिहास की निर्मिति में भी लोक-संस्कृति का समावेश महत्त्वपूर्ण सिद्ध होता है। लोक-साहित्य सहित लोक-संस्कृति के विविध उपादानों के प्रकाश में विभिन्न प्रजातियों के प्रारम्भिक से लेकर परवर्ती दौर तक की भाषा, पुरातत्त्व और भौतिक जीवन के अनुसन्धान की दिशा अत्यंत रोचक निष्कर्षों तक पहुँचा सकती है। इनके माध्यम से लोक की विकासशील प्रक्रिया का प्रामाणिक और जीवन्त वृत्तांत प्राप्त किया जा सकता है। भारतीय दृष्टि मानती है कि परिवर्तनशील अतीत में से अपरिवर्तनीय तत्वों का अन्वेषण है- इतिहास। कोई भी अतीत मृत भूतकाल नहीं होता, वह एक सीमा तक वर्तमान में जीवित रहता है। इसी तरह का निरन्तर प्रवहमान अतीत है- लोक-संस्कृति। लोक-साहित्य और संस्कृति तमाम प्रकार के परिवर्तन और विकास के बावजूद अपने अंदर की कई चीजों को बचाये रखते हैं, कभी रूपांतरित करके तो कभी अंतर्लीन करके। वस्तुतः हमारा सामूहिक मन ऐतिहासिक स्मृतियों, व्यक्तियों और घटनाओं के साथ मानव समूह का तादात्म्य है। यही वह बिंदु है जो लोक-साहित्य, संस्कृति और इतिहास का अन्तः सम्बन्ध बनाता है।

लोक-संस्कृति और साहित्य आम जन के संवेदनात्मक इतिहास तक हमें ले जाते हैं, जहां आम जन की आशा-हताशा, सुख दुःख, जय-पराजय का रमणीय वृत्तांत होता है। यह आम आदमी की संवेदना का वास्तविक लेखा है। वस्तुतः लोक संवेदना के इतिहास की निर्मिति बिना लोक-साहित्य के सम्भव नहीं है। ‘बंगालेर इतिहासेर’ (1966) में प्रो निहार रंजन रे लिखते हैं, जनता का इतिहास लोकविधाओं एवम् लोककर्म आदि से ही निर्मित किया जा सकता है। यदि अतीत का लेखा-जोखा इतिहास है तो समकाल का लेखा-जोखा पत्रकारिता। इनसे हटकर साहित्य शाश्वत का इतिहास है। वह इनसे आगे ले जाता है। इसीलिए लोक-साहित्य एवम् संस्कृति की परंपरा और विकास के समुचित अध्ययन से इतिहास के महत्त्वपूर्ण तथ्य प्राप्त हो सकते हैं, जो अन्य माध्यमों से संभव नहीं है। यह अवश्य है कि उसमें कितना यथार्थ और कितना कल्पना है, इसकी छानबीन बेहद जरूरी हो जाती है। लोक-साहित्य इतिहास की टूटी कड़ियों को जोड़ने के साथ ही भिन्न दृष्टि से अतीत को देखने का नजरिया भी दे सकता है। वह इतिहास से प्राप्त चरित्रों और घटनाओं के मृत ढाँचे में अस्थि-मांस-मज्जा भरने में सहायक सिद्ध हो सकता है।

हमारे प्राचीन साहित्य, यथा- जातक कथा, दीघ निकाय, मज्झिम निकाय, खुद्दक निकाय आदि में लोक-संस्कृति और परम्परा के कई सूत्र बिखरे हुए हैं, वहीं इतिहास के कई सन्दर्भ उपलब्ध हैं।विक्रमादित्य की ऐतिहासिकता को लेकर भले ही इतिहास जगत् में विवाद रहा है किन्तु उनसे जुड़े कई तथ्य हमारी समृद्ध लोक परम्परा का अंग बने हुए हैं। यही स्थिति गोरखनाथ, भर्तृहरि, वररुचि, भोज आदि की है। अनुश्रुतियों और लोक-साहित्य में उपलब्ध इस प्रकार के चरित नायकों से जुड़े कई पक्षों की पड़ताल और इतिहास की कड़ियों से उनका समीकरण जरूरी है। ब्लादिमीर प्रोप ने थ्योरी एंड हिस्ट्री ऑफ़ फोकलोर (1984) में ठीक लिखा है, लोक-संस्कृति एक ऐतिहासिक परिघटना है और लोक-संस्कृति का विज्ञान एक ऐतिहासिक अनुशासन है। इस रूप में लोक सांस्कृतिक तत्वों पर गहन और वैज्ञानिक मन्थन आवश्यक हो जाता है।

भारत की सही पहचान लोक-साहित्य और संस्कृति के बिना संभव नहीं है। भारतीय संस्कृति को यदि हम अलग-अलग लोक अंचलों की संस्कृतियों का जैविक समुच्चय कहें तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। सारे भारत की भाषा और बोलियाँ तथा उनसे जुड़ी संस्कृति एक-दूसरे के हाथों में हाथ डाले इस तरह से खड़ी हैं कि उन्हें एक-दूसरे से अलग किया जाना संभव नहीं है। इनके बीच मेल-मिलाप का सिलसिला पुरातन काल से चला आ रहा है। भारत के हृदय अंचल ‘मालवा’ ने तो एक तरह से समूची भारतीय संस्कृति को ‘गागर में सागर’ की तरह समाया हुआ है। मालवा की परम्पराएँ समूचे भारत से प्रभावित हुई हैं और पूरे भारत को मालवा की संस्कृति ने किसी न किसी रूप में प्रभावित किया है। ‘मालवा’ लोक-साहित्य और संस्कृति की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है। यहाँ का लोकमानस शताब्दी-दर-शताब्दी कथा-वार्ता, गाथा, गीत, नाट्य, पहेली, लोकोक्ति आदि के माध्यम से अभिव्यक्ति पाता आ रहा है। जीवन का ऐसा कोई प्रसंग नहीं है, जब मालवजन अपने हर्ष-उल्लास, सुख-दुःख को दर्ज करने के लिये लोक-साहित्य का सहारा न लेता हो।

‘मालवा’ शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत के ‘माल’ शब्द से हुई है, जिसका अर्थ है ऊँची भूमि या उन्नत भू-भाग ‘मालमुन्नतभूतलम्’। मेघदूत में महाकवि कालिदास ने कहा था-‘क्षेत्रमारूह्य मालम्’ अर्थात् माल क्षेत्र पर चढ़कर। टीकाकार मल्लिनाथ ने इसे पर्वत जैसी उन्नत भूमि बताया। अनेक शताब्दियों से मालव क्षेत्र और उसकी विशेषताओं का वर्णन होता आ रहा है। यहाँ की धरती अत्यंत उपजाऊ और धन-धान्य से परिपूर्ण रही है। इसलिए एक जनश्रुति के अनुसार कबीर ने इसे देख कहा था-‘देश मालवा गहन गंभीर, डग-डग रोटी पग-पग नीर।’ इसका बाहरी रूप जितना मनोरम है, उतना ही सुन्दर, कोमल और आत्मीय है इसका अंतरंग। ह्वेनसांग सातवीं शती में मालवा में आया था तो वह भी यहाँ के पर्यावरण और लोकजीवन से गहरे प्रभावित हुआ था। तब उसने लिखा भी था कि इसकी भाषा मनोहर और सुस्पष्ट है। मालवा क्षेत्र के जल, पर्यावरण और सदैव सुकाल की अवस्था पर संत कवि सुन्दरदास लिखते हैं-

वृच्छ अनंत सुनीर वहंत सु सुन्दर संत विराजै तहीं तें।

नित्य सुकाल पड़ै न दुकाल सु मालव देस भलो सबहीं ते।।

आज का मालवा सम्पूर्ण पश्चिमी मध्यप्रदेश और उसके साथ सीमावर्ती पूर्वी राजस्थान के कुछ जिलों तक विस्तार लिए हुए है। इसकी सीमा रेखा के संबंध में एक पारम्परिक दोहा प्रचलित है, जिसके अनुसार चम्बल, बेतवा और नर्मदा नदियों से घिरे भू-भाग को मालवा की सीमा मानना चाहिए-

इत चम्बल उत बेतवा मालव सीम सुजान।

दक्षिण दिसि है नर्मदा यह पूरी पहचान।।

मालवा के निकटवर्ती अंचलों में मेवाड़, हाड़ौती, भीलांचल, गुजरात, महाराष्ट्र, निमाड़ और बुन्देलखण्ड इन्द्रधनुष की तरह अपने-अपने रंग मालवा में बिखेरते आ रहे हैं। इन सभी की मिठास और ऐश्वर्य को मालवा ने अपने अंदर समाया है, वहीं इन सभी को अपने जीवन रस से सींचा भी है। ‘वसुधैवकुटुम्बकम्’ की अवधारणा को मालवा और मालवी ने अपने ढंग से सिद्ध किया है। आज मालवा क्षेत्र मध्यप्रदेश और राजस्थान के लगभग बाईस से अधिक जिलों में विस्तार लिए हुए है। इन क्षेत्रों के दो करोड़ से अधिक निवासी मालवी और उसकी विविध उपबोलियों का व्यवहार करते हैं। वर्तमान में मालवी भाषा का प्रयोग मध्यप्रदेश के उज्जैन, इंदौर, भोपाल संभाग के अधिकांश जिलों, ग्वालियर संभाग के गुना जिले, राजस्थान के झालावाड़, प्रतापगढ़, बाँसवाड़ा एवं चित्तौड़गढ़ आदि जिलों के सीमावर्ती क्षेत्रों में होता है। मालवी की सहोदरा निमाड़ी भाषा का प्रयोग बड़वानी, खरगोन, खंडवा, हरदा और बुरहानपुर जिलों में होता है। मध्यप्रदेश के कुछ जिलों में मालवी तथा अन्य निकटवर्ती बोलियों जैसे निमाड़ी, बुंदेली आदि के मिश्रित रूप प्रचलित हैं। इन जिलों में हरदा, होशंगाबाद, बैतूल, छिन्दवाड़ा आदि उल्लेखनीय हैं। मालवी के कई उपभेद या उपबोलियाँ अपनी विशिष्ट पहचान रखती हैं - केन्द्रीय या आदर्श मालवी, सोंधवाड़ी, रजवाड़ी, दशोरी या दशपुरी, उमठवाड़ी और भीली। एक समय था जब मालवी को राजस्थानी की महज एक बोली माना जाता था। लगभग एक शताब्दी पहले ग्रियर्सन ने अपने भाषा सर्वेक्षण में इसे राजस्थानी की उपबोली कहा था, लेकिन हाल के दशकों में गम्भीर भाषिक अनुसंधान से यह बात साफ हो गई है कि मालवी अपने आप में एक स्वतंत्र भाषा है। इसकी अनेक उपबोलियाँ हैं । मालवी के निजी व्याकरण और कोश की निर्मिति में डा. चिंतामणि उपाध्याय और डा. प्रहलादचन्द्र जोशी की खास भूमिका रही है। समृद्ध लोक-साहित्य के रहते मालवी और निमाड़ी ने हिन्दी प्रदेश की लगभग दो दर्जन प्रमुख जनपदीय भाषाओं में अपनी खास जगह बना ली है।

गहन गम्भीर मालव माटी की देशज संस्कृति उसके अपने घर-आँगन और चौपाल पर आज भी जीवंत है। विकास की अंधी दौड़ के बावजूद मालवांचल के लगभग दो करोड़ बाशिंदे इसकी संस्कृति और परम्परा को अपने सुख-दुख, संस्कार, व्रत-पूर्वोत्सव और अनुष्ठान के मौकों पर गीत, कथा, गाथा से लेकर विविध लोकाभिव्यक्तियों के जरिये जिंदा रखे हुए हैं। महज मालवी भाषा और साहित्य की दृष्टि से ही नहीं, वेशभूषा, शृंगार-प्रसाधन, लोकाचार, खान-पान, चित्र, मूर्ति, संगीत आदि सभी क्षेत्रों में मालवा की खास पहचान शताब्दियों से बनी हुई है। फिर संस्कृति के विविध आयामों में मौजूद इस ठेठ मालवीपन की चर्चा उनसे जुड़े अलग-अलग शास्त्रों में कई शताब्दियों से होती चली आ रही है।

भारत में लोक साहित्य और संस्कृति कथित विकसित सभ्यताओं की तरह भूली हुई विरासत, आदिम या पुरातन नहीं है। वह सतत वर्तमान है, जीवन का हिस्सा है। मालवा का लोक-साहित्य और विविध परम्पराएँ भी इन्हीं अर्थों में अपने भूगोल और पर्यावरण का अनिवार्य अंग हैं। मालवी लोक-संस्कृति की विलक्षणता के ऐतिहासिक कारण रहे हैं। यह अंचल सहस्राब्दियों से शास्त्र, इतिहास और संस्कृति की अनूठी रंगस्थली रहा है। इनके साथ यहाँ की लोक-संस्कृति की अन्तःक्रिया निरंतर चलती चली आ रही है। यहाँ कभी शास्त्रों ने लोक परम्परा को आधार दिया है तो कभी लोकाचार ने शास्त्र का नियमन किया है, उसको व्यवहार्य बनाया है। लोक में व्याप्त व्रत-पर्व-उत्सव महज धार्मिक अनुष्ठान नहीं हैं, इतिहास और जातीय स्मृतियों से जुड़ने और उन्हें दोहराते हुए निरन्तर वर्तमान करने की चेष्टा हैं। मालवा सहित पश्चिम-मध्य भारत में मनाया जाने वाला संजा पर्व और उससे जुड़ा लोक-साहित्य सही अर्थों में भारतीय इतिहास, जातीय स्मृति, परम्परा और लोक-संस्कृति की आपसदारी का अनुपम उदाहरण है। इसमें विकास की पदचाप भी देखी-सुनी जा सकती है। संजा पर्व में हम देखते हैं कि उसमें चित्रित आकृतियों में शास्त्रोक्त स्वस्तिक (सात्या) और सप्तऋषि तो आते ही हैं, छाबड़ी (डलिया), घेवर, घट्टी जैसे लोक प्रतीकों का भी अंकन होता है। काल के प्रवाह में इससे सम्बद्ध लोक-साहित्य और भित्ति-चित्रों में नए-नए बिम्ब भी इससे संपृक्त होते जा रहे हैं। इसी तरह अनेकानेक लोक देवताओं से सम्बद्ध लोक-साहित्य और संस्कृति भी इसी तथ्य की ओर संकेत करते हैं। जरूरत इस बात की है कि मालवा सहित किसी भी क्षेत्र की लोक-संस्कृति को नितांत बौद्धिक विमर्श से हटकर यहाँ के लोकजीवन के साथ सहज और जैविक अन्तःक्रिया के रूप में देखा-समझा जाए। तभी उसके निहितार्थ उजागर होंगे और फिर उसका पर्यावरण-बोध हमारे आज और कल के लिए भी कारगर सिद्ध होगा।

मालवा सहित किसी भी लोकांचल की लोक-परम्पराएँ महज संग्रहालयी वस्तु नहीं हैं। उनका इस क्षेत्र की जातीय स्मृतियों, इतिहास, पुरातत्त्व और जीवन-दृष्टि से गहरा नाता है। इधर मालवा के इतिहास की टूटी कडि़यों और मौन को भरने की दिशा में लोक-गीत, कथा और गाथाओं में संचित मौखिक इतिहास उल्लेखनीय सिद्ध हो रहा है। 1857 ई. की महान् क्रांति में कलस्या-आलोट (रतलाम) के अमरजी-अबजी से लेकर नरसिंहगढ़ के राजकुमार चैनसिंह तक की भूमिका मालवी लोकगाथा और गीतों में आज भी संरक्षित है, जबकि लिखित इतिहास में ये चरित नायक प्रायः उपेक्षित ही रहे हैं। लोकमानस अतीत ही नहीं, अपने वर्तमान से भी सीधे संवाद करता है। एक मालवी लोकगीत में वोट मांगने वालों को भिक्षा माँगने वाले के रूप में दर्ज किया गया है और वोट को दान के रूप में दर्शाया गया है, ‘‘बीरा थारा कारणे वोट का भिखारी ऊबा रे द्वार। एक बोट को माँगे दान, बेनड़ी रख जे म्हारो मान।’’ इस दृष्टि से जातीय इतिहास और सभ्यता के विकास की आधार-सामग्री के रूप में मालवी लोक-साहित्य का महत्त्व सुस्पष्ट है।

एक दौर में लोक-नाट्य, विशेष तौर पर लीला-नाटक रासलीला और रामलीला की मंडलियाँ या तो प्रायः हर शहर, कस्बे और गांवों में हुआ करती थी या अन्य स्थानों से आया करती थीं। उनका मंचन प्रायः मन्दिरों, बड़े चबूतरों और चौग़ानों में होता था। आने वाली मण्डलियों की सूचना बग़ैर किसी विज्ञापन के घर-घर पहुँच जाती थी। लोग नियत समय से पहले मंचन स्थल पर पहुँच कर अपनी जगह सुरक्षित कर लेते थे। दर्शक रामलीला के मंचन का कोई दिन नहीं छोड़ते थे। स्वयं मेरा रंगमंच से सम्बन्ध बाल और किशोरावस्था में देखे गए लोक-नाट्यों से बनना शुरू हुआ था। उज्जैन में माच के प्रदर्शन, तेजाजी की कथा आदि भी देखने के अवसर मिलते थे। धीरे-धीरे उनकी जगह नित नए उभरते माध्यमों ने ले ली। फलतः उनके विकास की स्वाभाविक गति अवरुद्ध हुई है। देश-दुनिया के आधुनिक रंग प्रदर्शनों में लोक रंगमंच की विविध युक्तियों और रंग-व्यवहारों का समावेश देखने को मिलता है, किन्तु उनमें कुछ अपवादों को छोड़कर लोक की नैसर्गिक भूमि से प्रायः विलगाव ही दिखाई देता है।

भारतीय लोक-नाट्य परम्परा में मालवा के ‘माच’ का विशिष्ट स्थान है। ‘माच’ मालवा-राजस्थान के व्यापक जनसमुदाय को आन्दोलित करता आ रहा है। ‘माच’ शब्द संस्कृत के ‘मंच’ शब्द का ही परिवर्तित रूप है। माच के नाटकों को खेल कहा जाता है, जो मुक्ताकाशी रंगमंच पर प्रस्तुत किए जाते हैं। पिछले दो सौ वर्षों से परिष्कार और परिवर्धन से गुजरता हुआ लोकनाट्य माच आज की शब्दावली में टोटल थियेटर की अवधारणा का अद्वितीय उदाहरण है, जिसमें पाठ, अभिनय, संगीत, नृत्य, आशु अभिनय, काव्य-गायन तथा त्वरित हास-परिहास सब मिलकर लोक शैली की अनौपचारिकता सहज ही दे देते हैं। माच की निर्मिति में अनेकानेक लोक-परम्पराओं और प्रयोगपरक विकास की विशिष्ट भूमिका रही है। माच के खेलों में सामाजिक सद्भाव, परस्पर प्रेम और सहज लोक जीवन के दर्शन होते हैं।

माच के दर्शकों में भी एक खास ढंग की रसिकता देखी जा सकती है। इसके दर्शक महज दर्शक नहीं होते, मंच व्यापार में उनकी आपसदारी भी दिखाई देती है। माच के क्षेत्र में अनेक घराने बने, जिन्होंने अपने-अपने ढंग से माच को नई ऊर्जा, नई गति दी। गुरु गोपाल जी, गुरु बालमुकुन्दजी, भागीरथ पटेल, गुरु रामकिशन जी, गुरु राधाकिशनजी, उस्ताद कालूराम जी, पं. ओमप्रकाश शर्मा, सिद्धेश्वर सेन, फकीरचंद जी, चुन्नीलाल जी, अनिल पांचाल आदि का माच के खेलों के सृजन और मंचन की परम्परा को आगे बढ़ाने में अविस्मरणीय योगदान रहा है। मालवा का माच पुराण, इतिहास और लोकाख्यानों में निहित उच्च आदर्श, प्रणय और लोक मंगल की भावभूमि को समाहित करता आ रहा है। समय और समाज के परिवर्तन की प्रतिध्वनि माच सहित विविध लोकाभिव्यक्तियों में स्पष्ट सुनाई देती है। यही कारण है कि समय-समय पर समाज में व्याप्त विसंगतियों और विद्रूपताओं के विरुद्ध माच के खेलों ने लोक के अंदाज में तीखा प्रतिकार भी किया है। माच सहित देश भर के सभी लोक-नाट्य रूपों में रचे गये नाटक सामाजिक विषमताओं के विरूद्ध प्रभावी भूमिका रचते आ रहे हैं। इनमें समाज विरोधी शक्तियों के खिलाफ संघषर्रत चरित्र लोक विश्वास के अनुरूप कहीं अत्यन्त शक्ति से सम्पन्न हैं तो कहीं कष्टप्रियता से लोकादर्श की स्थापना में सक्रिय नज़र आते हैं । इन अतिरंजित स्थितियों के बावजूद ये नायक सामान्य जन की भूमि पर ही खड़े दिखाई देते हैं। माच के चरितनायक सामान्य जनता के सुख दु:ख में सम्मिलित तो दिखाई देते ही है, लोक मंगल के लिए लगातार सक्रिय भी नजर आते हैं । परंपरा की सुदृढ़ भूमि पर विकासमान माच के खेलों में निहित धार्मिक सहिष्णुता, लोक मंगल की सिद्धि और आर्थिक विषमता से मुक्ति की इच्छा, जाति प्रथा, नशा, जनसंख्या वृद्धि आदि जैसी अनेक सामयिक समस्याओं के विरूद्ध प्रतिक्रिया की प्रवृत्ति यही सिद्ध करती है कि सामाजिक परिवर्तन में माच की भूमिका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। समकालीन स्थितियों से टकराने की प्रवृत्ति इसे सहज ही प्रासंगिकता दे रही है। आधुनिक रंगमंच पर माच शैली के कई प्रयोग सामने आ रहे हैं।

मालवांचल अनेक लोकाख्यान, गाथा और गीतों को अपनी वाचिक परम्परा में संजोए हुए है, जिनमें यहाँ की संस्कृति का सुंदर प्रतिफलन हुआ है। लोक-साहित्य में राजा नल, चंदणा कुँवर, सती गोरा माता, ग्यारसमाता, ढोला मरवण, धोला की हीड़, नागजी दूलजी आदि की गीत कथाएँ, कलस्या के वीर अमरजी-अबजी से जुड़ी कथाएँ और गीत तथा विविधरंगी कथा, गीत,भजन, पारसियाँ आदि उल्लेखनीय हैं। मालवा के बहुलोकप्रिय गीतों में बधावा, जापा (जन्म), मान, बना-बनी भेरू महाराज एवं देवी-देवता, तेजाजी, फसल बुबाई-जुताई, पुत्र की कामना, पर्वोत्सव, (होली, फाग,दिवाली, राखी) आदि तथा वार्ताओं में अमावस माता, ग्यारस माता, जमीन माता, राजा विक्रम, खापरया चोर, गाय माता, राजा रानी की वार्ता आदि प्रमुख हैं। प्रायः इन सभी में परंपरा और विकास की अंतर्क्रिया परिलक्षित होती है।

लोक-साहित्य के बहुत बड़े अंश की आधार-भूमि में लोक की जीवन-पद्धति, लोकाचारों, व्रत-पर्व-उत्सवों आदि की जैविक भूमिका होती है। वे सीधे उनसे प्रेरित-प्रभावित होते हैं। जब उन आधार-भूमियों के सामने ही संकट उपस्थित हो, तब उनसे रस लेते लोक-साहित्य का संकट समझा जा सकता है। उदाहरण के लिए मालवा सहित पश्चिम भारत के विस्तृत भूभाग के प्रतिनिधि लोकपर्व संजा को लें, जो प्रकृति के प्रति हमारे पूजा-भाव के साथ गौ-पालन की विशिष्ट जीवन-पद्धति से संपृक्त है। जब कथित आधुनिकता के प्रवाह में हम उन्हीं से दूर होते जा रहे हैं, तब संजा सहित विविध लोक-पर्वों से संपृक्त लोक-साहित्य के सामने मौजूद चुनौतियों को समझा जा सकता है।

मालवा में प्रचलित अनेक लोक और पारंपरिक गीतों से यह स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है कि मालवजन अत्यंत आस्थावादी हैं। उनमें देव जगत् के प्रति गहरा विश्वास देखा जा सकता है। इनमें विकास के नए प्रतिमानों का हस्तक्षेप अवश्य हुआ है, किन्तु वे आज भी परम्परा से गहरा तादात्म्य बनाये हुए हैं। मालवा के देव जगत् को प्रमुखतः इन वर्गों में रखा जा सकता है -

1. पारम्परिक एवं रूपांतरित देवी-देवता - यथा इन्दर राजा (वैदिक इन्द्र), शिव-पार्वती, चौथमाता (गणेश चतुर्थी से सम्बद्ध), दशा माता (दशमी पूजन या दशा पूजन से संबद्ध), भैरव, गणेश, राम- कृष्ण, हनुमान, आदि।

2. लोक देवियाँ ।

3. पूर्वज देव ।

4. लोकनायक देव वर्ग - यथा - तेजाजी, देवनारायण जी, रामदेव जी आदि।

5. अन्य - नरमदा माता, शिपरा माता (नदी मातृक) आदि।

प्रायः संग्रहों में संकलित मालवी गीतों में केन्द्रीय या आदर्श मालवी के अभिलक्षण मिलते हैं। किन्तु उन्हीं गीतों को मालवा के अलग-अलग उपांचलों और निकटवर्ती अंचलों में कुछ अलग छटा लिए हुए देखा जा सकता है। आदर्श मालवी में गणेश जी का एक लोकप्रिय गीत देखिये, जो सोंधवाड़ एवं अन्य लोकांचलों में भी कतिपय भाषिक अंतर के साथ मिलता है।

चालो गजानंद जोशी क्यां जावां।

कई आछा आछा लना लिखावां गजानंद।

कोठारी गादी पे नोबत बाजे।

चालो गजानंद सोनी क्यां चालाँ।

चालो गजानंद माली क्या चालां।

तो आछा आछा गेणा मोलवा गजानंद।

तो आछा आछा सेवरा मालावा गजानंद।।

मालवा में कई प्रमुख देव यथा- गणेश, शिव, सरस्वती, कृष्ण, हनुमान, तुलसी आदि लोक-आस्था के केंद्र बने हुए हैं । पुराख्यानों से लोक तक इन सभी की महिमामयी उपस्थिति रही है, किन्तु लोक-गीतों में उनका लोक-बिम्ब ही अधिक मुखरित हुआ है। मालवा के लोक-पर्व गणगौर पर केन्द्रित गीत, कृष्ण की विविध लीला-छबियों के गीत, मालवा की नाथपंथी और निर्गुणी धारा को सँजोये गीत, यथा गुरु महिमा के गीत, काया और मृत्यु गीत आदि, कबीर, मीरा, नरसी भगत आदि प्रसिद्ध रचनाकारों की छाप से युक्त गीत, जो मालवजन पर उनके गहरे प्रभाव के द्योतक हैं, मालवा के लोक एवं पारंपरिक गीतों का व्यापक प्रतिनिधित्व करते हैं। लोक की भक्ति और भक्ति का लोक यहाँ अनायास उतरा है। एक उदाहरण देखिये

म्हारा खेत पधारो सावरा रूठी बंसरी बाजे।

ऊंचो घड़ई दूँ डागलो रे गोफतीय वालो।

छोटा मोटा मक्या झड़ईदूँ सेकी ने खाजो।।

जुवार की रोटी बणई दूँ हरा मूंग की दाल।

सूरिया गाय को घी मंगई दूँ डालू सबड़ी ने खाजो।।

मालवी लोकगीत की ये पंक्तियाँ सरल-तरल अभिव्यक्ति लिए हमारी समूची लोक-परंपरा की ओर सार्थक संकेत करती हैं। लोक-सत्ता किसी भी सत्ता के साथ, चाहे वह परम सत्ता ही क्यों न हो, आपसदारी का रिश्ता मानती-प्रस्तावित करती है। मालवा के लोकगीतों में यह बात स्थान-स्थान पर महसूस की जा सकती है।

विकास के कथित प्रतिमान सहित तमाम चुनौतियों के बावजूद मालवी बोली और उसके साहित्य का यहाँ के लोक-जीवन, लोकमन और पर्यावरण के साथ गहरा संबंध बना हुआ है। उसे और फलने-फूलने का अवसर मिलना चाहिए। वस्तुतः मालवी लोक भाषा, साहित्य और संस्कृति का संरक्षण-संवर्द्धन समग्र प्रयासों से ही होगा। भाषा और साहित्य के साथ-साथ अन्य अभिव्यक्ति रूपों और लोकविधाओं के आपसी रिश्तों को रेखांकित करने से ही मालवांचल अपनी पहचान को बरकरार रखता हुआ अपने समय के साथ हमकदम हो सकता है। यहाँ अलास्का की मौखिक परम्परा के इतिहासकार डोएन्होएर बन्धुओं से सहमत हुआ जा सकता है, जिनका कहना है, ‘‘पुस्तकें और अभिलेखन भाषाओं का संरक्षण कर सकते हैं, किन्तु केवल लोक तथा समुदाय ही उन्हें जीवित रख सकते हैं।’’ मालवी सहित विविध लोक भाषाओं के प्रयोक्ताओं से यह अपेक्षा तो की ही जा सकती है। परंपरा की सुदृढ़ भूमि पर ही लोक-साहित्य एवं संस्कृति का विकास संभव है। नैरन्तर्य और विकास, परम्परा और परिवर्तन की आपसदारी लोक-साहित्य एवं संस्कृति को गति और लय देते आ रहे हैं। जरूरत इस बात की है कि यह रिश्ता और आपसदारी अबाधित रहे।

प्रो. शैलेन्द्रकुमार शर्मा

आचार्य एवं कुलानुशासक

विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन (म.प्र.) 456010

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संदर्भ:

1. डॉ शैलेंद्रकुमार शर्मा (सम्पा.): मालवा का लोकनाट्‌य माच और अन्य विधाएं, अंकुर मंच, उज्जैन 2008 ई.

2. डॉ राममूर्ति त्रिपाठी, डॉ शैलेंद्रकुमार शर्मा एवं अन्य (सम्पा.): अवन्ती क्षेत्र और सिंहस्थ महापर्व, क्लैसिकी शोध संस्थान, उज्जैन 2004 ई.

3. डॉ शैलेंद्रकुमार शर्मा (सम्पा.): मालवी भाषा और साहित्य, मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, भोपाल, 2010 ई

4. डॉ शैलेंद्रकुमार शर्मा (सम्पा.): सोंधवाड़ी साहित्य, संस्कृति और व्याकरण, डॉ. प्र.च. जोशी लोक संस्कृति केन्द्र, उज्जैन 2001 ई.

5. डॉ शैलेंद्रकुमार शर्मा (सम्पा.): हिन्दी नाटक, निबंध तथा स्फुट गद्य विधाएँ एवं मालवी भाषा साहित्य, मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, भोपाल, 2014 ई

6. डॉ शैलेंद्रकुमार शर्मा (सम्पा.): मालवसुत पं. सूर्यनारायण व्यास, लोक मानस अकादमी, उज्जैन 2002 ई.

7. डॉ शैलेंद्रकुमार शर्मा (सम्पा.): झालावाड़: इतिहास, संस्कृति और पर्यटन, मालव लोक संस्कृति प्रतिष्ठान, उज्जैन, 2007

8. अक्षर वार्ता, वर्ष 11, अंक 9, जून 2015, संपादकीय: डॉ शैलेंद्रकुमार शर्मा

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