वर्तमान हिंदी सिनेमा में अभिव्यक्त आदिवासी जीवनमनोज कुमार


शोधार्थी, पीएच.डी. (हिंदी)

हरियाणा केंद्रीय विश्विद्यालय

संपर्क :-09728424929,08287726768

मेल:- manojkumaraarya@gmail.com

सिनेमा आधुनिक सभ्यता का अनिवार्य अंग बन चुका है l कला के विभिन्न रूपों को आत्मसात करके जीवन की सजीव और मार्मिक चित्राभिव्यक्ति करने वाली विधा का नाम ही चलचित्र या सिनेमा है l सिनेमा का सफ़ेद पर्दा केवल पर्दा नहीं होता अपितु उस पर दौड़ती, नाचती, भागती, गति संतरंगी तस्वीरों में ऐसा जादू छिपा होता है, जिसमें सिनेमाघर के अँधेरे में तीन घंटे बैठा व्यक्ति एक सजीव-सी सम्मोहन शक्ति से खिंचा चला जाता है और परदें की ओर खो जाता है सपनों की दुनिया में l

आज सामाजिक जिंदगी में सिनेमा की उपस्थिति अनिवार्य बन गई है l जनमानस को कला के इस रूप ने जितनी गहराई के साथ स्पर्श किया है, उतना शायद किसी और माध्यम ने नहीं l सिनेमा का प्रभाव क्षेत्र आज-कल कला की किसी भी विधा से अधिक मनोरंजन का, निर्माताओं के लिए शुद्ध व्यवसाय का, फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े हजारों लोगों के लिए रोज़गार का और सरकार के लिए राजस्व प्राप्ति का साधन हैं l नब्बे का दशक उदारीकरण और वैश्वीकरण का समय है l इस समय हिंदी सिनेमा न केवल बॉलीवुड के नाम से जाना जाने लगा, अपितु उसके आख्यात्मक चरित्र में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन दिखे l बॉलीवुड संस्करण के रूप में हिंदी सिनेमा का पूर्ण शहरीकरण हो गया l दो-एक उदाहरणों को छोड़कर वह महानगरीय जीवन और उसकी पांच सितारा संस्कृति की गाथायें बन गया l

बॉलीवुड के संदर्भ में कहा जा सकता है कि बॉलीवुड, हिंदी सिनेमा का वह परिवर्द्धित रूप है जिसकी जड़े भारतीय अर्थव्यवस्था के उदारीकरण और वैश्वीकरण से जुड़ी हुई हैं l उदारीकरण और वैश्वीकरण का आगमन हम साफ़ तौर पर बॉलीवुड की पठकथा, आख्यानात्मक चरित्र, पात्र-चयन, संगीत और विश्वव्यापी बाज़ारों में उपस्थिति आदि कई स्तरों पर देख सकते हैं l1 यहाँ यह कहना शायद अतिश्योक्ति नहीं होगा कि भले ही संकीर्ण अर्थों में ही सही किन्तु बॉलीवुड भारतीय सिनेमा ही नहीं अपितु भारतीयता और भारतीय राष्ट्र की पहचान बन चुका है l किंतु एक महत्वपूर्ण बात यह विचारणीय है कि इतने बड़े हिंदी सिनेमा में या कहा जाए भारतीय सिनेमा में आदिवासियों एवं उनकी समस्याओं को आधार बनाकर कितनी फ़िल्में बनी हैं? इसका उत्तर हम सब को पता है कि संतोषजनक नहीं है क्योंकि हिंदी सिनेमा में आदिवासी कहानियों और आदिवासियों के जीवन संघर्ष के लिए मानों कोई जगह ही नहीं है और तो और जिस तरह से आदिवासियों को इन गिनी-चुनी फिल्मों में दर्शाया जाता है, वह भी किसी से छुपा नहीं है l जिसका सबसे ज्वलित उदाहरण अभी हाल ही में आयी फिल्म बाबा राम रहीम की ‘एमएसजी-2’ है, जिसके अंतर्गत आदिवासियों को ‘शैतान’ कह कर संबोधित किया गया और हद तो तब हो गई जब सेंसर बोर्ड ने इस विषय को लेकर किसी प्रकार की आपत्ति दर्ज नहीं की l मूल समस्या तो यही है कि आरंभ से लेकर आज तक बॉलीवुड में आदिवासियों की यही छवि रही है l देश का आम जन भी आदिवासियों के बारे इससे अधिक नहीं जानता और ‘जब हम बीते सिनेमा की ओर देखते हैं तो हमें 3-4 फ़िल्में जरुर मिल जाती हैं जिनमें आदिवासी दिखते हैं l ऋत्विक घटक की फिल्मों में हमें आदिवासी पात्र दिखते हैं पर कहानियाँ आदिवासियों की नहीं बल्कि मुख्यधारा के समाज की हैं l जिनमें इक्का-दुक्का जगह पर आदिवासी आ जाते हैं l मृणाल सेन की ‘मृगया’(1976), सत्यजित रे की ‘अरण्येर दिन रात्रि’(1970), गोविंद निहलानी की ‘आक्रोश’(19800 जैसी फिल्मों ने आदिवासी कहानी कहने की कोशिश की है पर ये फ़िल्में आदिवासी नहीं लगतीl’2 सन् 1939 में आई निर्देशक ज्ञान मुखर्जी की फिल्म ‘रोटी’ में एक औद्योगिक सभ्यता और आदिवासी संस्कृति की तुलना अत्यंत प्रभावशाली तरीके से करते हुए यह निष्कर्ष निकलता है कि न तो आदिवासी संस्कृति शहर में आकर सुखी हो सकती है और न ही तबाह उद्योगपति आदिवासी सभ्यता में खुशियाँ हाशिल कर सकता है l दोनों की मुक्ति अपने-अपने स्थानों पर है, बस जरूरत है एक दूसरे को समझने की l इनके अतिरिक्त अभी हल ही के वर्षों में बनी फिल्मों में प्रकाश झा की ‘चक्रव्यूह’(2012), अनंत महादेवन की ‘रेड अलर्ट’(2010), आशू तिरिखा की ‘कोयलांचल’ (2014) आदि प्रमुख फ़िल्में हैं, जिसमें नक्सलवाद की समस्या को प्रमुखता से दर्शाया गया है l किन्तु कहीं न कहीं इन फिल्मों के निर्देशन में तटस्थता की कमी साफ झलकती है l

इन सभी फिल्मों से इतर छतीसगढ़, झारखंड, म.प्र., उड़ीसा, महाराष्ट्र आदि आदिवासी ग्रामीण इलाकों को आधार बनाकर छोटी-छोटी एनीमेशन फिल्मों का निर्माण स्कॉटलैंड की निवासी ‘तारा डगलस’ ने किया है l तारा डगलस ने विदेशी होने के बाबजूद आदिवासियों के जीवन-दर्शन को इन एनिमेशन फिल्मों के माध्यम से सरलतापूर्वक समझाने का प्रयास किया l ताराडगलस द्वारा हाल ही में बनाई गई पांच फिल्मों में हिंदी, अंग्रेजी सहित आठ बोली और भाषाओं का प्रयोग किया गया है l पांच-पांच मिनट की यह शोर्ट फ़िल्में भारतवासियों के लिए आकर्षण का केंद्र हो सकती है l डगलस की पहली फिल्म ‘हाउ द एलिफैंट लोस्ट विंग्स’ बस्तर की कहानी पर आधारित है, जिसमें बताया गया है कि आदिकाल में हाथियों के पंख हुआ करते थे l लेकिन इससे आदिवासियों को काफी नुक्सान होता था l फिर आदिवासियों ने अपने राजा की सलाह से योजना बनाकर हाथी के पंख गायब कर दिए और जंगल जाने को मजबूर कर दिया l3 इसी तरह तारा डगलस की दूसरी फिल्म ‘द बेंगा’ एक संथाल लड़के की कहानी है l तीसरी फिल्म ‘द पॉट ऑफ़ गोल्ड’ महाराष्ट्र के आदिवासियों की कहानी है, जिसमें एक आलसी आदमी मुख्य किरदार में है l चौथी फिल्म ‘द बेस्ट ऑफ़ द बेस्ट’ एक गोंड कहानी है, जो एक घमंडी चूहे पर केन्द्रित है l पांचवी फिल्म ‘सॅान्गबर्ड’ अपराध जगत को दर्शाती उड़ीसा के सावस आदिवासियों की कहानी है l4

तारा डगलस की इन फिल्मों को नेशनल जियोग्राफिक फिल्म फेस्टिबल, नेहरु सेंटर स्कूल ऑफ़ ओरिएंटल एंड स्टडीज, द रेडिकल बुक फेयर एडिनबरा और स्कॉटलैंड में स्कूल में दिखाया गया जहाँ इन फिल्मों को काफी सराहन मिली l इसी संदर्भ में एक विशेष नाम रंजीत उरांद का है, जो मूलतः झारखंड के रहने वाले हैं l बी.टेक कर चुके रंजीत ने दो वर्ष इंजीनियर की नौकरी करने के पश्चात् सिनेमा में रूचि के कारण नौकरी छोड़कर एफ.टी.आई.आई. पुणे में प्रवेश लिया और वहां से स्नातक करने के बाद अपनी मातृभाषा में डिप्लोमा फिल्म ‘पेनल्टी कॉर्नर’ बनाई और अभी फिलहाल झारखंड के उत्साही आदिवासियों के साथ चंदे के धान से ‘सोनाचाँद’ नामक फिल्म का निर्माण कर रहे हैं l उनके मुताविक “हमें अभिव्यक्ति के सबसे सशक्त इस माध्यम में अपनी जगह बनानी है l इस फिल्म के सभी कलाकार आदिवासी हैं डायरेक्टर और प्रोड्यूसर भी l5 रंजीत उरांव बताते है कि ‘पिछले कुछ सालों में दुनिया भर में आदिवासी लोगों ने अपने-अपने देशों में कई फिल्में बनायीं हैं जिन्होंने अंतराष्ट्रीय फिल्म महोत्सवों में काफी नाम कमाया l इन फिल्मों में उनकी अपनी कहानी थी, उनकी अपनी भाषा में और उनके अपने अंदाज में l अपनी डिप्लोमा फिल्म बनाते बनाते वक्त मेरे दिलोदिमाग में यही बात थी कि जब दुनिया भर के आदिवासी अपनी भाषा में फिल्म बना रहें है तो भारत के हम आदिवासी क्यों पीछे रहें l6

समग्रत कहा जा सकता है कि भारतीय हिंदी सिनेमा भले ही अपने 100 वर्ष पूरे कर चुका हो किन्तु इस सिनेमा में आदिवासी कहीं भी नहीं हैं l लेकिन शायद अब ये परिस्थितियाँ लंबे समय तक न रहे क्योंकि अब आदिवासी समाज हाशिये पर रहने वाला नहीं है l पेनाल्टी कॉर्नर और आगामी फिल्म ‘सोनाचाँद’ इसके ज्वलंत उदहारण हैं l हिंदी फिल्मों में अधिकांशतः आदिवासियों को हमेश पीढित,लाचार या फिर मामूली किरदार में ही दिखाया जाता रहा है लेकिन यहाँ प्रश्नउठता है कि ‘पीढित आदिवासी’ से इतर उसका कोई दूसरा रूप है कि नहीं? उसकी अपनी कोई पहचान है नहीं?7 लेकिन अब आशा की जा सकती है कि आगे आने वाली हिंदी फिल्मों में आदिवासी कलाकारों एवं आदिवासी जन-समुदायों को उनकी विशिष्ट पहचान और स्थान मिल सकेगी l

संदर्भ सूची :-

1. बॉलीवुडपाठ विमर्श के संदर्भ, ललित जोशी, वाणी प्रकाशन, दरियागंजदिल्ली, पृष्ठ संख्या-9.

2. आदिवासी साहित्य(पत्रिका), सं. गंगा सहाय मीणा, वर्ष-1, अंक-2, अप्रैल-जून 2015.

3. Khabar.ibnlive.com/showstory.php12/15/2015

4. वही

5. www.bbc.com/hindi/india/2015/150915

6. आदिवासी साहित्य(पत्रिका), सं. गंगा सहाय मीणा, वर्ष-1, अंक-2, अप्रैल-जून 2015, पृष्ठ संख्या-64.

7. वही, पृष्ठ संख्या-64.

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