वर्ष 4, अंक 38, जून 2018 [21वीं सदी विशेषांक]


प्रत्येक सदी के आगमन के साथ ही आवश्यकताएं, अपेक्षाएं, मान्यताएं एवं सामाजिक स्तर पर बदलाव होता है और यही बात 21वीं सदी पर लागू होती है. 20वीं सदी का अंतिम दौर और 21वीं सदी का समय बाज़ार का समय है. ग्लोबल विलेज के इस समय में वैश्विक स्तर पर तकनीकि जगत से लेकर सभी दिशा में व्यापक बदलाव हुआ है. एक तरफ निरंतर हो रहे वैज्ञानिक अविष्कारों ने जहाँ मनुष्य के जीवन को गति प्रदान की है तो वहीँ समाज का प्रत्येक तबका अपने स्तर से उठने को प्रयासरत है और इन प्रयासों ने कई अस्मितावादी विमर्शों को मुख्यधारा में लाकर खड़ा किया है.

21वीं सदी ने व्यक्ति के जीवन में काफी बदलाव किया और व्यक्ति के जीवन में आने वाले बदलाव से समाज में व्यापक परिवर्तन हुआ और समाज में हुए इस व्यापक परिवर्तन का प्रभाव साहित्य, कला, संस्कृति इतिहास इत्यादि सभी पर पड़ा है. प्रस्तुत जनकृति का नवीन विशेषांक ’21वीं सदी विशेषांक’ इन्हीं सभी पक्षों पर प्रकाश डालने का एक प्रयास है. समय, समाज एवं साहित्य के आईने में 21वीं सदी को देखने का एक प्रयास इस विशेषांक के माध्यम से किया गया है. यह विशेषांक दो भागों में प्रकाशित किये जाने की योजना है, जिसके तहत पहला भाग आप सभी के समक्ष प्रस्तुत है.

विगत कुछ समय से कुछ कारणों से जनकृति के प्रकाशन में दिक्कत हुई परंतु हम अपने पाठकों को विश्वास दिलाते हैं कि आगामी अंक समय पर प्रकाशित किये जाएँगे। जनकृति आगामी विशेषांकों में साक्षात्कार विशेषांक, पूर्वोत्तर भारत विशेषांक एवं कला विशेषांक है, जो इस वर्ष प्रकाशित किए जायेंगे। इनके अतिरिक्त प्रत्येक माह नियमित रूप से सामान्य अंक प्रकाशित हो रहे हैं, जिनमें आप लेखन कर सकते हैं.

पाठकों को सूचित करते हुए यह हमें प्रसन्नता हो रही है कि जनकृति विश्व के दस से अधिक रिसर्च इंडेक्स में शामिल है। पत्रिका में गुणवत्ता को ध्यान में रखते हुए निरंतर बदलाव किए जा रहे हैं अतः आप भी हमें अपने सुझाव दे सकते हैं। इसके अतिरिक्त जनकृति की इकाई विश्वहिंदीजन से विगत दो वर्षों से हिन्दी भाषा सामग्री का संकलन किया जा रहा है साथ ही प्रतिदिन पत्रिकाओं, लेख, रचनाओं का प्रचार-प्रसार किया जाता है। जनकृति की है एक अन्य इकाई कलासंवाद से कलाजगत की गतिविधियों को आपके समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है साथ ही कलासंवाद पत्रिका का प्रकाशन भी किया जा रहा है। जनकृति के अंतर्गत भविष्य देश की विभिन्न भाषाओं एवं बोलियों में उपक्रम प्रारंभ करने की योजना है इस कड़ी में जनकृति पंजाबी पर कार्य जारी है।

धन्यवाद

-कुमार गौरव मिश्रा

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विषय पृष्ठ संख्या

इक्कीसवीं सदी में आदिवासी अस्मिता के प्रश्न: डॉ.विजय कुमार प्रधान 5-8

इक्कीसवीं सदी की हिन्दी ग़ज़ल और स्त्री विमर्श: पूनम देवी 9-15

इक्कीसवीं सदी की पहले दशक की कहानियाँ और मुस्लिम जीवन: ज्योतिष कुमार यादव 16-19

21वी सदी और सुशीला टाकभौरे की कविताएं: प्रो. डॉ. सौ. रमा प्र. नवले 20-27

21वीं सदी की कहानियों में किन्नर विमर्श: डॉ. सचिन गपाट 28-31

21वीं सदी में अनुवाद की सामाजिक सन्दर्भ: रक्षा कुमारी झा 32-36

21 वीं सदी में बाल साहित्य का योगदान: डॉ. कुमारी उर्वशी 37- 41

21 वीं सदी में बहुसंख्यक समाज का सामाजिक यथार्थ: डॉ. बलवीर सिंह ‘राना’ 42- 47

21वीं सदी और स्त्री केन्द्रित हिंदी सिनेमा: डॉ. रेखा कुर्रे 48- 54

21वीं सदी का साहित्य: वाद-विवाद : भोला नाथ सिंह 55- 56

इक्कीसवीं सदी में सतगुरु रविदास की प्रासंगिकता: सोनिया 57- 60

21वीं सदी और स्त्री: डॉ. रेणुका व्यास ‘नीलम’ 61- 63

21वीं सदी की कवयित्रियों के काव्य में स्त्री विमर्श: हरकीरत हीर 64- 73

हिंदी दलित आत्मकथाओं में अभिव्यक्त समकालीन प्रश्न: बृज किशोर वशिष्ट 74- 81

21 वी शताब्दी में हिंदी साहित्य शिक्षण: मनीष खारी 82- 87

21वीं सदी के कहानी साहित्य में चित्रित नारी विमर्श: प्रो. डॉ. सौ. सुरैया इसुफ़अल्ली शेख 88- 90

21वीं सदी की हिंदी कविता: डॉ. दीना नाथ मौर्या 91- 95

21वीं सदी की बड़ी और विकराल समस्या: अनीता देवी 96- 99

इक्कीसवीं सदी में आदिवासी अस्मिता के प्रश्न

डॉ.विजय कुमार प्रधान,

एसोसिएट प्रोफेसर,

हिंदी विभाग,


वनस्थली विद्यापीठ (राजस्थान)

जंगल के साथ-साथ कम पड़ते जा रहे हैं जंगल के लोग/ बढती जा रही है संख्या दिनोदिन बाहरी लोगों की/ पसरते जा रहे हैं कंक्रीट के जंगल/ उग रहे हैं कूड़े-करकट और पथरीली धूल से बने/ नित नए दुखों के कृत्रिम पहाड़। (संताल परगना का दुःख कविता में से —अशोक सिंह) इक्कीसवीं सदी में आदिवासी अस्मिता के संकट को यह कविता जीवन्तता के साथ अभिव्यक्त करती है। कविता भले ही संताल परगना के आदिवासियों पर केन्द्रित है परन्तु यह भारत के समस्त आदिवासियों के दुःख हैं क्योंकि विकास के दुष्परिणाम सभी को एक समान रूप से भुगतने होते हैं। विकास और विनाश साथ-साथ कदम मिलाकर चलते हैं। विकसित राष्ट्र दोमुहें अजगर की तरह समस्त सृष्टि को निगलते जा रहे हैं। एक तरफ अपने देश में प्रकृति का सम्पूर्ण दोहन कर लेने के बाद प्राकृतिक सम्पदा से भरपूर विकासशील और अविकसित देशों को व्यापार की आड़ में बर्बाद करने के लिए निकल पड़े। दूसरी तरफ प्रकृति एवं पर्यावरण की चिंता प्रकट करने के लिए अन्तराष्ट्रीय सम्मेलनों का आयोजन कर अपने मानवीय उत्तरदायित्वों का रोना रोते हैं। यह मनुष्य जाति के लिए अत्यंत दुर्भाग्य का विषय है कि एक शक्तिशाली समुदाय दूसरे समुदाय को छल, बल और कौशल के द्वारा आदिम जनजातियों का शोषण कर विकास का पाठ पढ़ा रहा है।

१९९१ के बाद भारत वैश्विक अर्थनीति के साथ जुड़ गया जिसने भारत के सांस्कृतिक एवं सामाजिक जीवन को पूर्णतः परिवर्तित कर दिया है। विकास के नाम पर हमने प्रकृति का सम्पूर्ण दोहन किया --जंगलों को नष्ट किया, पहाड़ों को खोद दिया, नदियों को गंदे नालों में बदल दिया, यहाँ तक कि वायु प्रदूषण के द्वारा समूर्ण वायुमंडल को भी दूषित कर दिया। इसके बाद जब हमने सब कुछ नष्ट कर दिया तब कृत्रिम चिंता करने बैठे हैं कि इसे ठीक कैसे किया जाए। हम कहाँ जा रहे हैं यह तय नहीं है। विकास और विनाश में से एक को चुनने की बजाय दोनों को साथ लेकर चल रहे हैं और यह शोध कर रहे हैं कि तेजाबी बर्षा क्यों हो रही है, ग्लेशियर क्यों पिघल रहे हैं, हवा को प्रदूषण से कैसे रोका जाए, तापमान क्यों बढ़ रहे हैं, समुद्र का जलस्तर क्यों बढ रहा है, अतिवृष्टि--अनावृष्टि क्यों हो रही है आदि। इन प्राकृतिक समस्याओं के अलावा यहाँ पर सदियों से निवास कर रहे आदिवासियों के साथ भी हमने खिलवाड़ किया है जिसके वजह से भारत वर्ष के प्रायः समस्त प्रान्तों के आदिवासी, अस्मिता के संकट से जूझ रहे हैं।

आर्थिक उदारीकरण की नीति ने भारत में निजीकरण, बाजारवाद, उपभोक्तावाद की संस्कृति को जन्म दिया, फलतः एक विशेष वर्ग में सम्पन्नता आई और साथ-साथ बेरोज़गारी, अपराध, मुनाफाखोरी, भ्रष्टाचार, जैव-सम्पदा की चोरी, प्रकृति का शोषण, देहवाद, अप-संस्कृति आदि समस्याएँ लेकर आयीं। इनके कारण यहाँ के मूल निवासियों को जल, जमीन और जंगल के लिए संघर्ष करने पर मजबूर कर दिया। जंगल के मूल निवासियों (आदिवासी) को अपने ही जगह या तो गुलाम बना दिया या फिर विस्थापित जीवन जीने के लिए विवश किया गया। विकास के नाम पर भारत सरकार जमीन अधिग्रहित कर लेती है और आदिवासियों को मूल स्थान से विस्थापित होना पड़ता है। बाजारवाद के युग में प्राकृतिक संसाधनों पर ही सबकी नज़र है किसी को भी आदिवासियों की फ़िक्र नहीं है। आदिवासी विविध जंगलों, पर्वतों, पठारों आदि निर्जन क्षेत्रों में निवास करने के कारण अन्य उन्नत समाजों से भिन्न होते हैं। उनका रहन-सहन, जीवन-शैली, पर्व-त्यौहार साथ ही उनकी समस्याएँ भी अन्य आदिवासी समूह से भिन्न होते हैं। ''लगभग ९० प्रतिशत आदिवासी अपनी जीविका के लिए कृषि पर निर्भर हैं। इसके अलावा शिकार और बनोपज जमा करना भी उनके जीवन का आधार है लेकिन जैसे-जैसे आदिवासियों को उनकी जीविका के साधन के स्रोतों से दूर किया जा रहा है, वैसे-वैसे उनके आधारभूत कार्यकलापों में कमी आती जा रही है। आदिवासियों से उनके वनों और आवास भूमि छिनी जा रही है।''१

आदिवासी आजीविका के संकट से जूझ रहे हैं। भौतिक विकास के दौड़ में प्राकृतिक स्रोतों का दोहन हो रहा है जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव आदिवासियों पर पड़ता है। उदाहरण के लिए ओडिशा के आदिवासियों को देखा जा सकता है, यहाँ के बिंझाल, सउरा, कंध आदि आदिवासी आजीविका के तलाश में विस्थापित होने के लिए मजबूर हैं। अपने गाँव को छोड़कर जो बाहर राज्यों में मजदूर के रूप में काम करने जाते हैं। उन्हें ओडिशा में दादन श्रमिक कहा जाता है। वे अपनी अस्मिता को लेकर संघर्षरत हैं। २०११ के जनगणना के अनुसार ओडिशा की जनसंख्या ४, १९, ७४, २१८ है। उनमें ९५, ९०, ७५६ आदिवासी हैं। जिनमे पुरुषों की संख्या ४७, २७, ७३२ एवं महिलाओं की संख्या ४८, ६३, ०२४ है। यहाँ के ३० जिलों में शबर, बोंडा, परजा, गोंड, बिंझाल, डंगरिया कंध, मुंडा, भूयान, कोल, किशान, खड़िया, एवं ओराम आदि आदिवासी निवास करते हैं। इन आदिवासियों के लिए आजीविका की समस्या प्रमुख है। जंगलों के आदिवासी पहले अपनी आजीविका जंगलात द्रव्यों में तलाश लेते थे परन्तु डेम निर्माण, औद्योगिक विकास, शहरीकरण आदि के कारण जंगल समाप्त प्रायः हैं। खेत हैं परन्तु जलाभाव के कारण खेती संभव नहीं है। आजीविका की समस्या बढ़ी और ये पलायन करने के लिए विवश हुए एवं भारत के विभिन्न प्रान्त में मजदूरी के लिए जाना पड़ा। यहाँ के आदिवासियों के पास स्थानीय काम-धंधे न होने के कारण दक्षिण भारत में बंधुआ मजदूरी के लिए जाना पड़ता है। वहाँ पर इन भोले-भाले आदिवासियों का शारीरिक, मानसिक एवं आर्थिक शोषण दलाल एवं मालिकों द्वारा होता है। इनकी सुरक्षा के लिए कानून तो है परन्तु उनका अनुपालन नहीं होता। ''संविधान में अनुसूचित जनजातियों से सम्बधित कई प्रावधान है। मुख्यतः इन्हें दो भागों में बाँटा जाता है— (१)सुरक्षा (२) विकास। अनुच्छेद २३ मानव शरीर की सौदेबाजी , बेगार, बंधक मजदूर तथा अन्य प्रकार के जबरन श्रम का निषेध करता है। जहाँ तक अनुसूचित जनजातियों का प्रश्न है,यह प्रावधान बहुत ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि इनमे से अधिकांश लोग बंधक मजदूर के रूप में नियोजित है।'' २ परन्तु चिंता का विषय यह है कि आदिवासियों के लिए बनाये गए क़ानून की जानकारी उन्हें नहीं है, इसलिए उनका शोषण होता है। वस्तुतः सारी लड़ाई जल, जंगल और जमीन की है। एक तरफ आदिवासियों से विकास के नाम पर सबकुछ छीना जा रहा है तो दूसरी तरफ वहाँ के आदिम आदिवासी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। हम महाशक्तिशाली राष्ट्रों में अपना नाम दर्ज करा रहे हैं परन्तु प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर ओडिशा के जाजपुर और केउँझर जिले के बच्चे कुपोषण के कारण मारे जा रहे हैं। किसान लगातार आत्महत्या कर रहे हैं। टाइम्स ऑफ़ इंडिया में छपे जुलाई १०, २०१६ के समाचार के अनुसार जाजपुर एवं केउँझर जिले के जंगल के पहाड़ों में रहने वाले १०,००० जूआंग आदिवासी पलायन कर चुके हैं। न तो जंगल और न ही प्राकृतिक सम्पदा के ऊपर उनका कोई अधिकार रह गया है इसीलिए आजीविका के तलाश में वे बाहर जा चुके हैं । यही कारण है कि बाह्य शहरी समाज के द्वारा वे शारीरिक, मानसिक रूप से शोषित हैं।

सरकारी योजनायें केवल कागज पर या सत्ताकेंद्रित राजनेताओं की सम्पत्ति में ही दिखाई देते हैं। ओडिशा के तीन जिलों-- कालाहांडी, बलांगीर और कोरापुट को उदहारण के लिए देखा जा सकता है। इन पिछड़े जिलों के लिए स्वर्गीय पी.वी.नरसिंह राव की सरकार ने अत्यंत संवेदनशील मान कर केबीके परियोजना की शुरुआत की थी और यहाँ के उत्थान के लिए करोड़ों रुपयों की सहायता राशि दी गई थी। समय-समय पर अन्य सरकारें भी सहायता करती आई हैं परन्तु इन क्षेत्रों के लोगों का विकास आज तक नहीं हो सका है। आज भी मनरेगा, पीडीएस आदि सरकारी योजनायें होने के वावजूद पलायन जारी है। केबीके इलाकों में आदिवासी दादन, दिन मजदूर और बंधुआ मजदूर बनने के लिए विवश हैं। ओडिशा टाइम्स के अनुसार "दादन समस्या एक व्याधि का रूप धारण कर चुकी है, सरकारी योजनायें केवल कागजों तक सीमित है, जमीनी हकीकत कुछ और ही बयान कर रही है। गरीब आदिवासियों की मानव तस्करी, दलाल एवं दलाल एवं मिल मालिक सरकार की आँखों में धूल झोंक रहे हैं। इन क्षेत्रों के बुद्धिजीवियों का यह कहना है कि जब तक आँध्रप्रदेश के मिल मालिकों एवं दलालों को रोकने के लिए कड़े कदम नहीं उठाये जायेंगे तब तक इन समस्याओं से मुक्ति नहीं मिलेगी।"३

इक्कीसवीं सदी में भी अगर आदिवासी बंधुआ मजदूर बनते रहें तो यह राष्ट्रीय शर्म का विषय है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष जस्टिस एच.एल.दत्तू का कहना है कि ''किसी भी सभ्य समाज में बंधुआ मजदूरी एक कलंक है । भारत में लम्बे समय से यह बुराई कायम रही है और इसे खत्म करने के सरकारों के तमाम दावों के बावजूद कई जगह पर यह अब भी बदस्तूर जारी है।"४ अक्तूबर ५,२०१६ के ओडिया दैनिक समाचार पत्र 'संवाद' के अनुसार आदिवासी बहुल जिलों की स्थिति दयनीय है। आदिवासी श्रमिक गाँव छोड़कर जाने के लिए विवश हैं। अल्पवृष्टि के कारण खेती नहीं हो पाती, किसान चिंतामग्न है। मनरेगा योजना असफल है, राज्य में रोजगार के अवसर नहीं है। इसलिए दादन के रूप में, बंधुआ मजदूर के रूप में राज्य के बाहर जाने के लिए मजबूर हैं। अक्तूबर २८, २०१६ में प्रकाशित 'समाज' के अनुसार मुख्यमंत्री का यह कहना है कि २०१८ तक दादन समस्या को संपूर्णतः दूर कर दिया जाएगा परन्तु वस्तुस्थिति यह है कि बलांगीर, कालाहांडी, कोरापुट के आदिवासी राज्य के बाहर जा रहे हैं। ''अध्ययन के दौरान यह भी पाया गया कि पलायित होने वाले बंधुआ मजदूर अधिकांशतः अनुसूचित जाति या जनजाति के हैं, जिनमे बहुतों के पास न तो घर के जमीन का पट्टा है, न ही खेत का, जंगल की जमीन पर रहते हैं।''५

आदिवासियों का सतत विकास कैसे हो किसी भी सरकार के पास कई योजनायें हैं परन्तु नाकाफी हैं। जंगल की सुरक्षा के नाम पर वन विभाग द्वारा वृक्षारोपण का कार्य किया जाता है परन्तु प्राकृतिक दूरदर्शिता के अभाव में आदिवासियों के आजीविका का ख़याल नहीं किया जाता। ओडिशा के कंधमाल जिले में अत्यंत संवेदनशील आदिम कुटिया कंध जनजाति बुनियादी अनाज और फल एवं अन्य खाद्य पदार्थ से वंचित हो गए हैं क्योंकि वहां के जंगलों में टीक क पेड लगा दिए गए, जो उनके किसी काम के नहीं हैं। उन आदिवासियों का मानना है कि वे जंगल को भगवान मानते हैं एवं जंगल उनके लिए खाद्य, औषधि एवं जल के स्रोत हैं, इन आवश्यकताओं की पूर्ति टीक के पेड़ नहीं कर सकते । (टाइम्स ऑफ़ इंडिया, २ अगस्त, २०१६)

इक्कीसवीं सदी में विदेशी निवेश से ही देश आगे बढ़ सकता है यह धारणा बना दी गयी है। वैश्वीकरण के दौर में भारत का आर्थिक विकास के साथ-साथ आदिवासियों का सतत विकास कैसे हो इसकी चिंता सरकारों को नहीं है। आदिवासी विस्थापन की समस्या, नक्सलवाद की समस्या, शिक्षा, भाषा एवं संस्कृति की समस्या के साथ-साथ महत्वपूर्ण है प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित उपयोग, जिससे समग्र मानवीय विकास हो सके तथाकथित विकास के भस्मासुर से अगर दुनिया को बचाना है तो सर्वोदय या सर्वनाश में से किसी एक को चुनना पड़ेगा।

आधुनिक समाज में विकास का अर्थ केवल भौतिक विकास तक ही सीमित है। जल, जमीन और जंगल की सुरक्षा कैसे हो उसके लिए केवल कागज़ी क़ानून और उनके क्रियान्वयन का दिखावा ही है। विदेशी पूँजी निवेश ही भारत को आगे ले जाने का एकमात्र रास्ता है, यह धारणा विगत दो तीन दशकों से सरकारों द्वारा निर्मित है। प्रकृति पर उसका क्या प्रभाव पड़ रहा है इसको लेकर अनंत वैठकें आयोजित किये जाते हैं जो किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुँचते। वैश्विक व्यापार नीति का खूब का ढिंढोरा खूब पीटा जाता है परन्तु सारी दुनिया में बेरोज़गारी बढती जा रही है और महंगाई किसी के काबू में नहीं आ रही है। इसके वावजूद आदिवासियों के सतत विकास संभव है जब सरकारी योजनाओं को ऐसे तैयार किया जाए कि जिससे उन्हें प्रत्यक्ष लाभ हो। इसका रास्ता भी कालाहांडी के आदिवासियों ने दिखाया है-- जिसमे जल संरक्षण, जमीन को समतल करना, शस्य की विविधता, जैविक खेती, जैविक सार उत्पादन तैयार करना आदि कुछ कार्य इसके उदहारण है। झरने के पानी को खेती के जमीन तक पहुँचाया गया है, ताकि यहाँ के आदिवासियों को काम करने के लिए बाहर न जाना पड़े। वस्तुतः आदिवासी संकट सरकारी उदासीनता एवं संवेदनहीनता के कारण ही है। विकास और विनाश में से एक को चुन कर सतत विकास के लिए ठोस कार्य करने होंगे अन्यथा आजादी के ७० वर्ष बीत जाने के बाद भी यहाँ के मूल आदिवासी बुनियादी सुविधा, मौलिक अधिकार से वंचित होंगे और गुलामी की जिंदगी जीने के विवश होंगे।


सन्दर्भ :

१. रत्नाकर भेंगरा, सी.आर.बिजोय और शिमरी चौन लुइथुई, 'माय नौरिटी राइट्स ग्रुप इंटरनेशनल, पृष्ठ-२६

२. हरिश्चंद्र शाक्य, आदिवासी और उनका इतिहास, अनुराग प्रकाशन, नई दिल्ली, २०११, पृष्ठ-१०७

३. ओडिशा टाइम्स, नवम्बर २,२०१६

४. आउटलुक, फ़रवरी १५, २०१७

५. चन्द्रिका, जनादेश, फ़रवरी ७, २०१७

इक्कीसवीं सदी की हिन्दी ग़ज़ल और स्त्री विमर्श

पूनम देवी

शोधार्थी, पी-एच.डी. हिंदी

हिमाचल प्रदेश केन्द्रीय विश्वविद्यालय, धर्मशाला – 176215

ई-मेल – sharma9poonam@gmail.com


बीसवीं सदी का उतरार्द्ध साहित्य में नए विमर्शों के उभरने का समय रहा है जिसमें स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श आदि का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है | भूमंडलीकरण एवं ‘विश्वग्राम’ की अवधारणा के साथ ही वैचारिक परिवर्तन का दौर आज की इस इक्कीसवीं सदी के प्रमुख लक्षण माने जा सकते हैं | आज मनुष्य सामाजिक, सांस्कृतिक, भौगोलिक, आर्थिक, राजनैतिक आदि विविध समस्याओं के विरुद्ध एक स्वर में प्रतिरोध कर रहा है | यह विरोध एवं प्रतिरोध साहित्यिक क्षेत्र में भी देखा जा सकता है | साहित्य को सदा से ही ‘समाज का दर्पण’ कहा जाता रहा है | प्रत्येक युग का साहित्य अपने समय के सच को स्वर प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है | समय में परिवर्तन के साथ साहित्य के विविध रूपों ने अनेक समसामयिक विमर्शों को स्वयं में सम्मिलित किया है | स्त्री मुक्ति एवं स्त्री विमर्श इन्हीं में से एक है जिसे इक्कीसवीं सदी की विभिन्न साहित्यिक विधाओं में प्रमुखता से अंकित किया जा रहा है | विश्व की आधी आबादी स्त्री जिसे वर्षो से उपेक्षित, तरिस्कृत एवं हीन दृष्टि से देखा जाता रहा है, उसे समाज की मुख्यधारा के साथ जोड़ने एवं समान महत्त्व दिए जाने के प्रयास आज भी जारी हैं | नारी मुक्ति, नारी सशक्तिकरण, स्त्री विमर्श आदि विभिन्न आन्दोलन स्त्री अस्मिता को पहचानने एवं उसे सम्मान देने के ही प्रयास हैं |

सांकेतिकता, अनुभूति की तीव्रता एवं प्रभावोत्पादकता के कारण ग़ज़ल हमेशा से ही जनजीवन में अत्यंत लोकप्रिय रही है |

साहित्य की अन्य विधाओं की अपेक्षा ग़ज़ल अपने आरम्भ काल से ही स्त्रियोचित-सौन्दर्य, अनुभूतियों एवं भाव-भंगिमाओं को व्यक्त करती रही है | अपने आरम्भिक दौर में ग़ज़ल मुख्यतः लौकिक प्रेम पर आधारित थी किन्तु समय में परिवर्तन के साथ एवं विभिन्न संस्कृतियों के साथ सम्पर्क में आने पर ग़ज़ल में इस लौकिक प्रेम ने आलौकिक प्रेम तक के सफ़र की मंज़िलें तय कीं | फ़ारसी ग़ज़ल से लेकर, उर्दू ग़ज़ल और वर्तमान हिंदी ग़ज़ल तक पहुँचते-पहुँचते इस विधा ने कई मंज़िलों का लम्बा सफ़र तय किया है | उर्दू साहित्य के प्रगतिशील दौर ने ग़ज़ल का सम्बन्ध देश-प्रेम के साथ जोड़कर इसकी सम्भावनाओं को ओर अधिक विस्तृत कर दिया | उर्दू साहित्य से ग़ज़ल जब हिंदी में आई तो इसने न केवल उस प्रगतिशील चिंतन को अपनाया बल्कि उसमें ओर अधिक वृद्धि की | अमीर ख़ुसरो से लेकर भारतेंदु हरिश्चन्द्र, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’, त्रिलोचन, शमशेर बहादुर सिंह, दुष्यंत कुमार, अदम गोंडवी, कुँअर ‘बेचैन’, जैसे कई ग़ज़लकारों के अथक प्रयासों से आज इक्कीसवीं सदी की हिन्दी ग़ज़ल साहित्य के विविध विमर्शों को व्यक्त करने में सक्षम हुई है |

हिन्दी ग़ज़ल के आधार स्तम्भ दुष्यन्त कुमार ने ग़ज़ल के माध्यम से समसामयिक जीवन की विविध समस्याओं को उजागर करने एवं अन्याय के खिलाफ़ प्रतिरोध की आवाज़ बनाकर इसे विशेष पहचान दिलवाई | दुष्यन्त कुमार के परवर्ती ग़ज़लकारों ने दुष्यन्त की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए उसे जनसामान्य के जीवन से सम्बद्ध रखने का प्रयास जारी रखा | यह प्रयास इतना सार्थक बन पड़ा कि आज प्रत्येक सामाजिक विमर्श को हिंदी ग़ज़ल ने अपने दामन में समेट लिया है | देश की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक परिस्थितियों से भयाक्रांत हुई अकर्मण्य जनता के आत्मसमान एवं देश-प्रेम को जागृत करने का कार्य हिंदी ग़ज़ल आरम्भ से ही करती रही है | हिन्दी ग़ज़लकारों ने ग़ज़ल के माध्यम से सामाजिक विसंगतियों पर प्रहार करने का कार्य बख़ूबी किया है | सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक स्थिति को इक्कीसवीं सदी के ग़ज़लकारों ने बेजोड़ ढंग से सम्प्रेषित किया है | इस सदी के ग़ज़लकारों में ज्ञानप्रकाश विवेक, विज्ञान व्रत, ज़हीर कुरेशी, सुल्तान अहमद, अशोक अंजुम, नचिकेता, देवेन्द्र आर्य, विनय कुमार, मुकुंद कौशल, आलोक श्रीवास्तव, इंदु श्रीवास्तव, कमल किशोर श्रमिक, श्याम कश्यप बेचैन, दरवेश भारती, हनुमंत नायडू, महेश अनघ, महाश्वेता चतुर्वेदी, महेश अश्क, दीक्षित दनकौरी, द्विजेन्द्र द्विज, हस्तीमल हस्ती, रोहिताश्व अस्थाना, कुमार विनोद, डॉ. मधुर नज़्मी, विनय मिश्र, दीप्ति मिश्र, रमा सिंह इत्यादि ग़ज़लकारों के नाम सम्मिलित हैं |

इक्कीसवीं सदी के सभी ग़ज़लकारों ने नारी जीवन से जुड़े पारिवारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, धार्मिक एवं आर्थिक यथार्थ का वर्णन अपनी ग़ज़लों के माध्यम से किया है | इस सदी के अधिकतर ग़ज़लकारों की ग़ज़लों में स्त्री जीवन के विविध पहलू दिखाई देते हैं | भारतीय समाज में पितृसत्तात्मक सत्ता के प्रभुत्व के कारण स्त्री सदैव मुख्यधारा से अलग उपेक्षित, उत्पीड़ित एवं असहाय जीवन जीने को बाध्य रही है किन्तु समय के साथ स्त्री जीवन में परिवर्तन दिखाई देता है | स्त्री जीवन में आए इस परिवर्तन को हिन्दी ग़ज़ल ने भी अपनाया है और स्त्री के कर्मशील एवं विद्रोही रूप को उजागर करने का प्रयास ग़ज़लकारों ने किया है |

इक्कीसवीं सदी की हिन्दी ग़ज़ल जीवन के विभिन्न पक्षों को आत्मसात करती हुई उसे आम जनजीवन के साथ जोड़कर आम लोगों के विचार, भावना, व्यवहार तथा वेदना को उजागर कर रही है | इस सदी की हिन्दी ग़ज़ल समय के स्वर से स्वर मिला रही है | हिन्दी ग़ज़ल में हर प्रकार के अस्तित्ववादी और अस्मितावादी पहलू पर बात की गई है | अतः यह स्वाभाविक है कि वर्तमान में साहित्य-चिंतन का मुख्य विषय स्त्री-अस्मिता और नारीवादी चिंतन से उसका दामन खाली नहीं हो सकता | हिन्दी ग़ज़ल ने समय के अनुरूप स्त्री के प्रति अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन किया है | ग़ज़ल आज सिर्फ रुमानियत में सिमटी हुई नहीं रही है बल्कि स्त्री अस्मिता की सशक्त आवाज़ बन चुकी है | अब नारी के केवल ईश्वरीय तथा सौन्दर्यात्मक रूप का ही वर्णन नहीं किया जाता बल्कि उसके जीवन में आने वाली विभिन्न कठिनाईयों एवं परिवर्तनों को भी ग़ज़ल में स्थान दिया जाने लगा है |

इक्कीसवीं सदी में कदम रखने के बावजूद भी आज दहेज़ प्रथा, बहुविवाह, ओनर कीलिंग, घरेलू हिंसा, बाल-विवाह, दुराचार, बलात्कार जैसे अमानवीय कृत्य बार-बार स्त्री के प्रति समाज के भेदभावपूर्ण रवैये का सच बयान करते हैं | नारी की समानता, स्वतन्त्रता, सुरक्षा और उसके अस्तित्व को लेकर कई सवालों को हिंदी ग़ज़लकारों ने अपनी ग़ज़लों के माध्यम से अभिव्यक्त किया है –

“बाज़ारों में आते-जाते

होती पानी पानी बिटिया

किस घर को अपना घर समझे

जीवन में कब जानी बिटिया

चौका, चूल्हा, झाड़ू, बर्तन

भूल गई शैतानी बिटिया”[1]

आज समय ने इतना भयावह रूप धारण कर लिया है कि स्त्री को अपमानित करने वाले असामाजिक तत्त्वों में कई बार उसके पारिवारिक सम्बन्धी भी संलिप्त होते हैं | ऐसी अवस्था में नारी मन स्वयं को असहाय पाता है | नारी जीवन की इसी दशा को ग़ज़लकार इंदु श्रीवास्तव व्यक्त करते हुए लिखती हैं-

“कचहरी में न बोलेगी वो कुछ अपनी सफ़ाई पे

लगाए भी तो क्या इल्ज़ाम इस रिश्ते के भाई पे”[2]

आज स्त्री घर की चारदीवारी से बाहर निकल कर लगभग प्रत्येक व्यवसाय में पुरूष के समान ही सहभागी बनकर समाज के समक्ष उपस्थित हुई है | घर एवं बाहर दोनों क्षेत्रों में एक स्त्री पुरुष सहकर्मी की अपेक्षा दूसरी स्त्री सहकर्मी से सहयोग की अधिक अपेक्षा रखती है | स्त्री सहकर्मी द्वारा पुरुष वर्चस्ववादी मानसिकता के वशीभूत होकर किया गया व्यवहार इस अपेक्षित सहयोग की भावना को ठेस पहुँचाता है | वास्तव में समस्या पुरुष नहीं बल्कि वह पुरुष वर्चस्ववादी मानसिकता है जो किसी भी स्थिति में एक स्त्री को अपने समकक्ष स्वीकार नहीं कर सकता | स्त्री को अपने से कम केवल एक पुरुष ही समझता हो ऐसा नहीं है बल्कि सम्पूर्ण पुरुष वर्चस्ववादी मानसिकता वाला समाज उसे पीछे धकेलना चाहता है | समाज में केवल पुरुष ही नहीं है, स्त्री भी है | नारी का शोषण केवल पुरुष समाज ही करता हो ऐसा नहीं है बल्कि इस शोषण में पुरुष वर्चस्ववादी मानसिकता वाली स्त्री भी सम्मिलित है :

“कैसी विडंबना है कि औरत के राज में

औरत की आबरू के तार-तार हो गए |”[3]

स्त्री के परम्परागत आदर्शवादी एवं निस्वार्थ रूप का चित्रण भी हिन्दी ग़ज़लों में किया गया है | आज के भयानक एवं विसंगतिपूर्ण जीवन में भी स्त्री की समझ, उसके विवेक और सहनशीलता की प्रशंसा करते हुए महेश अनघ कहते हैं :

“टूटे छप्पर में कितनी तलवारें झांक रहीं

कैसे गिनती कर लेती हो शीश झुकाए तुम

मांग बहुत विस्तृत है लेकिन कोई मांग नहीं

बनी रहो सौभाग्यवती सिंदूर सजाए तुम |”[4]

निसंदेह स्त्री पर हर वर्ग और हर समाज ने जुल्म किये हैं लेकिन अभावों से ग्रस्त एवं जूझती स्त्री का जीवन अधिक दुखद हो सकता है | इस तथ्य को यदि स्वयं स्त्री जाहिर करे तो इसकी वेदना और अधिक बढ़ जाती है -

“सब अमीरों के आँगन से डोली उठी

हम ग़रीबों के घर बेटियां रह गईं |”[5]

आज की सदी बेशक वैचारिक परिवर्तन से गुजर रही है परन्तु समाज का एक वर्ग ऐसा भी है जो कन्या-भ्रूण हत्या, बाल-विवाह जैसी अनेक कुरीतियों में जकड़ा हुआ है | समाज में आज भी अनमेल विवाह जैसी कुप्रथाएँ प्रचलित हैं | स्त्री को नदी की उपमा देते हुए ग़ज़लकार यह कामना करता है कि स्त्री गुलामी के इस बंधन के विरुद्ध आवाज बुलंद करे-

“छुड़ा के जान, अधिक उम्र के समंदर से

मैं सोचता हूँ-नदी काश अपने घर लौटे !”[6]

ग़ज़ल के माध्यम से कई ग़ज़लकारों द्वारा नारी की स्वतन्त्रता तथा उसके जीवन के यथार्थ को उद्घाटित करने का प्रयास समय-समय पर किया गया है | सदियों से पद-दलित नारी के जीवन में क्रान्ति का बीज बोने का कार्य भी हिन्दी ग़ज़ल कर रही है | स्त्री को अगर सही मार्गदर्शन मिले तो वह अपने विरुद्ध होने वाले अन्याय के खिलाफ़ आवाज़ उठाकर अपने जीवन में परिवर्तन ला सकती है और समाज की दिशा और दशा में भी परिवर्तन एवं सुधार ला सकती है | स्त्रियों के प्रति हो रहे अत्याचार तभी समाप्त होंगे जब वह स्वयं अपनी शक्ति को पहचानेगी -

कई घरों में चूल्हा, चौका, बर्तन वासन करती है

फिर भी भूखे ही सो जाती है पेट दबाकर छोटी लड़की

जिस दिन दुर्गा, काली, चण्डी के मिथकों को समझेगी यह

रख देगी उस दिन सत्ता की जड़ें हिलाकर छोटी लड़की |”[7]

इक्कीसवीं सदी की नारी के अनुरूप वर्तमान हिंदी ग़ज़ल का मिज़ाज और तेवर बदला है | आज के साहित्यिक, सांस्कृतिक तथा अस्मितामूलक विमर्शों में स्त्री अस्मिता एवं स्त्रीविमर्श का विशिष्ट स्थान है | “महापंडित राहुल सांकृत्यायन का कहना है कि केवल लिखने मात्र से स्त्रियाँ दिव्यलोक की प्राणी नहीं हो सकतीं वे भी पुरुषों की तरह इसी लोक की जीव हैं | वे पुरुषों के भोग-विलास की सामग्री मात्र नहीं बल्कि उन्हीं की तरह वे अपना स्वतंत्र अस्तित्व भी रखती हैं और इसी दृष्टि से साहित्य में उनका चित्रण भी होना चाहिए |”[8] आज स्त्री न केवल अपने प्रति हो रहे दुर्व्यवहार के खिलाफ़ आवाज़ उठाने में सजग है बल्कि वह समाज में दूसरी स्त्री के प्रति हो रहे अन्याय के विरुद्ध भी प्रश्न करना जानती है तभी तो ग़ज़लकार देवेन्द्र आर्य लिखते हैं –

“ख़ता क्या जानकी की थी सिवा इसके कि औरत थी

भरी संसद में महिलाओं ने यह मुद्दा उठाया है |”[9]

पिछले लगभग ढाई दशक के समय में सूचना क्रांति के क्षेत्र में अभूतपूर्व एवं द्रुतगामी बदलाव आने तथा विश्वग्राम की अवधारणा के कारण समाज में आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन में अनेक परिवर्तन आये हैं | परिवर्तन की यह प्रक्रिया आज भी जारी है | इन सब परिवर्तनों के फलस्वरूप स्त्रियों के लिए आगे बढ़ने के अवसर उत्पन्न हुए हैं | पढ़ाई-लिखाई के साथ कामकाजी दुनिया में भी कई उपलब्धियाँ एवं नए आयाम इक्कीसवीं सदी की स्त्री ने प्राप्त किये हैं | समाज में पद-प्रतिष्ठा प्राप्त करने में इस सदी की स्त्री निरंतर प्रयत्नशील है | इस प्रयत्न में उसने खुद को इतना मग्न कर लिया है कि पारिवारिक मूल्यों के महत्त्व अनदेखे होते जा रहे हैं | परिवार में माँ की भूमिका सबसे अहम होती है परन्तु आज की स्थिति ऐसी है कि माता-पिता दोनों को जीविकोपार्जन हेतु कार्य करना पड़ता है | ऐसी स्थिति में माँ के वात्सल्य से आज के बच्चे का बचपन कहीं महरूम न रह जाए, इस चिंता को ग़ज़लकार ज्ञानप्रकाश विवेक अपने इस शेर में कुछ इस प्रकार व्यक्त करते हैं –

“मशीनें लोरियाँ देंगी तमाम बच्चों को

ये होगा हादसा इक्कीसवीं सदी के लिए |”[10]

इक्कीसवीं सदी का ग़ज़लकार स्त्री विमर्श के पीछे छिपी पुरुषवादी मानसिकता से स्वयं का बचाव करने की बात भी करता है ताकि स्त्री विमर्श केवल नारा बन कर न रहे जाये –

“पुरुष के सोच में ढलने लगी हैं

खुलापन लेके महिलाएँ इधर कुछ |”[11]

इक्कीसवीं सदी की हिन्दी ग़ज़ल में स्त्री के परम्परागत सौन्दर्यात्मक रूप का वर्णन करने की अपेक्षा उसके जीवन के कटु सत्यों और अन्य अनेक पहलूओं को लेकर भी ग़ज़लकारों ने बात की है | कुछ एक ग़ज़लकार इसका अपवाद हो सकते हैं जो आज भी स्त्री के केवल दैवीय एवं भोग्य रूप को ही अपनी ग़ज़लों में अपनाते हैं | स्त्री अपनी अस्मिता की तलाश में पुरुषवादी मानसिकता के समक्ष चुनौती के रूप में खड़ी है | आज के दौर में नारी के प्रति लोगों के दृष्टिकोण के साथ-साथ परिस्थितियों में भी परिवर्तन आ रहा है | नारी की स्वतंत्रता, सुरक्षा और उसके अस्तित्व के लिए आज लेखन के माध्यम से लोगों को जागरूक किया जा रहा है | सुप्रसिद्ध लेखिका महादेवी वर्मा के अनुसार -‘‘हमें न किसी पर जय चाहिए, न किसी से पराजय, न किसी पर प्रभुता चाहिए, न किसी पर प्रभुत्व, केवल अपना वह स्थान व स्वत्व चाहिये जिनका पुरुषों के निकट कोई उपयोग नहीं है, परन्तु जिनके बिना हम समाज का उपयोगी अंग नहीं बन सकेगी |’’[12] वास्तव में समाज के किसी भी वर्ग विशेष के साथ नारी विमर्श का कोई बैर नहीं है बल्कि वह समाज के अनिवार्य अंग के रूप में अपनी पहचान एवं अस्मिता को प्राप्त करने के लिए ही प्रतिबद्ध है |

हिन्दी ग़ज़ल में स्त्रीविमर्श एवं स्त्री अस्मिता के अस्तित्ववादी चिंतन पर विचार करने के बाद यह तथ्य सामने आते हैं कि हिन्दी ग़ज़ल ने नारी के प्रति अपना दृष्टिकोण तो बदला है परन्तु अभी भी स्त्री जीवन के कई ऐसे पक्ष हैं जिन्हें ग़ज़ल को अपनी संवेदना के माध्यम से आमजन से साक्षात्कार करवाना है | ग़ज़लकार कई बार नारी जीवन के कटु सत्यों को उजागर करते समय यह भूल जाते हैं कि कोरी स्पष्टवादिता ग़ज़ल में स्वीकार्य नहीं है | कहीं ऐसा न हो कि हिन्दी ग़ज़ल स्त्री-विमर्श के नाम पर केवल नारीदेह का विमर्श बनकर रह जाए | स्त्री जीवन की घुटन, जकड़न, गुलामी की दास्तान, उसके दुखी मन की व्याकुलता या टीस के साथ उसके सपनों, उम्मीदों और ख्वाहिशों इत्यादि को ग़ज़ल की भाषा में ढालना होगा या फिर ग़ज़ल को स्त्री मन की भाषा को समझना होगा | साथ ही यह भी ध्यान रखना होगा कि ग़ज़ल के शेर मात्र नारे बनकर ही न रह जाए बल्कि वास्तव में ही समाज के मध्य नारी विमर्श की आवाज़ को बुलंद करने में अपना योगदान दे सकें | आज की हिन्दी ग़ज़ल की सार्थकता तभी सिद्ध होगी जब नारी जीवन की समस्याओं से सम्बन्धित विभिन्न पक्षों को ग़ज़लकार ग़ज़ल की विशेषता के अनुरूप ही इस प्रकार चित्रित करे कि ग़ज़ल और स्त्री दोनों की अस्मिता कायम रह सके |

इक्कीसवीं सदी की पहले दशक की कहानियाँ और मुस्लिम जीवन

ज्योतिष कुमार यादव

एम.फिल. पीएच.डी. (शोध छात्र)

हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय, हैदराबाद


ई-मेल -jyotishyadav1990@gmai।.com

हिन्दी साहित्य में बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध का समय विमर्शों के उभरने का समय रहा है, जिसमें क्रमशः स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श आदि प्रमुख हैं । इक्कीसवीं सदी के प्रारम्भ होते ही एक नए विमर्श के रूप में अल्पसंख्यक विमर्श भी सामने आता है । अल्पसंख्यक विमर्श में विशेष रूप से मुस्लिम-समुदाय की बात की जाती है ।

आज जबकि मुस्लिम समुदाय का एक तबका अच्छी स्थिति में है तो वहीं दूसरा तबका जिसे ‘पसमांदा समाज’ के नाम से जाना जाता है, वह हाशिये पर है । ‘पसमांदा’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है-‘पस’ और ‘मांदा’, ‘पस’ का अर्थ -पीछे और ‘मांदा’ का अर्थ है-जो छूट गया, अर्थात वह समाज जो पीछे छूट गया है । मुस्लिम समुदाय में उच्च वर्ग (अशरफ) और निम्न वर्ग (अरजाल) के बीच बहुत बड़ी दीवार है । उच्च वर्ग अपने लाभ के लिए निम्न वर्ग की समस्याओं को सामने न रखकर ऐसी समस्या रखते हैं, जिनसे निम्न वर्ग का कोई लेना-देना नहीं रहता है, जैसे-बाबरी कांड, हिन्दी, उर्दू की समस्या, धर्म आदि ।

मुस्लिम समुदाय की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्थिति को इक्कीसवीं सदी की पहले दशक के कहानीकारों ने बेजोड़ ढंग से सम्प्रेषित किया है, जिनमें अब्दुल बिस्मिल्लाह, असगर वजाहत, अनवर सुहैल, शमोएल अहमद, नासिरा शर्मा, मंजूर एहतेशाम, नीलाक्षी सिंह, गीतांजलि श्री, नसरीन बानो, रशीद जहाँ, हसन जमाल, अलिफा रियात, हबीब कैफ़ी, जेबा रशीद, नीला प्रसाद, शकील, रंजन जैदी, विजय, रणेंद्र, अनुज आदि चर्चित हैं । इन कहानीकारों की कहानियों में मुस्लिम जनजीवन की पूरी झलक परिलक्षित होती है । अब्दुल बिस्मिल्लाह की कहानी ‘जीना तो पड़ेगा’ प्रमुख रूप से मुस्लिम समाज में मनुष्य की पीड़ा को उकेरती है । कहानी का एक प्रसंग है -“ अक्किल मामा उर्फ़ आकिल साहब उर्फ़ अब्दुल गफ्फार एक झिलगी-सी खटिया पर पड़े थे । पूरे जिस्म में सूजन थी और आवाज़ बैठी हुई । गुड्डन मियाँ को देखते ही उन्होंने उठने की कोशिश की मगर गुड्डन मियाँ ने उन्हें दोनों हाथों का सहारा देकर लिटा दिया ! “तबियत कैसी है मामू ?” गुड्डन मियाँ ने बातचीत शुरू की ! “देख ही रहे हो गुड्डन ! अब आखिरी है ।”1 ‘अरजाल’ जिसे ‘पसमांदा समाज’ के नाम से भी जाना जाता है, उनकी समाज में अच्छी स्थिति न होने के बावजूद भी उनके अंदर जिजीविषा देखने को मिलती है । हिन्दू समाज में जहाँ निचले तबके के लोगों को ‘अस्पृश्य’ कहा जाता है, वहीं मुस्लिम समाज में ‘अरजाल’ के नाम से शुमार किए जाते हैं । फ़र्क है तो सिर्फ़ धर्म का, लेकिन इन दोनों में कोई भेद नहीं है, अली अनवर के शब्दों में -“मैला वो भी फेका करते, मैला हम भी साफ़ करते । अंतर सिर्फ़ इतना था कि उन्हें डोम और भंगी कहा जाता और हमें मेस्तर और खाकरोब या हलालखोर नाम से जाना जाता । इस तरह लालबेगी, हलालखोर, मोची, पासी, भांट, भटियारा, पमरिया, नट, बक्खो, डफाली, नालबन्द, धोबी, साईं वगैरह दर्जनों जातियाँ ऐसी हैं, जिसका धर्म भले अलग-अलग (हिन्दू-मुस्लिम) हो लेकिन पेशा तथा सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति एक जैसी है ।”2

असगर वजाहत की कहानियों में राजनीतिक व्यंग्य ज्यादा मिलता है । वे एक अलग शैली के माध्यम से कहानियों को गढ़ते हैं । ‘मैं हिन्दू हूँ’ कहानी-संग्रह की सारी कहानियाँ व्यंग्य प्रधान कहानियाँ हैं । इस संग्रह की कुछ कहानियाँ मुस्लिम जीवन पर भी आधारित हैं l इनकी ‘वस्ताद जमूरा बदकही’ शीर्षक कहानी में व्यंग्य के माध्यम से मुस्लिम-समाज की सच्चाईयों को सम्प्रेषित किया गया है । अनवर सुहैल की कहानियों में कथावस्तु के तौर पर अल्पसंख्यक मनोग्रंथि से ग्रस्त मुस्लिम परिदृश्य, समाज में स्त्री और वृद्धों के प्रति अमानवीय व्यवहार, मनुष्य का लोभी होना, उपभोक्तावादी संस्कृति का आम-आदमी पर पड़ता प्रभाव, निर्मम संवेदनाएँ आदि को देखा जा सकता है । इनकी ‘दहशतगर्द’ शीर्षक कहानी में साम्प्रदायिकता की समस्या को उकेरा गया है । गुजरात के गोधरा कांड से जोड़कर इस कहानी को देखा जा सकता है । इस कहानी में मुस्लिम समाज में व्याप्त अंधविश्वास की प्रवृत्ति को भी उद्घाटित किया गया है । कहानी का एक प्रसंग है -“लड़कियाँ कम उम्र में ब्याह दिए जाने के कारण रक्ताल्पता, टीवी और अन्य असाध्य रोगों से पीड़ित हो जाती हैं । हारी-बीमारी की दशा में मेडिकल जाँच न कराकर मियां भाई झाड़-फूंक, गंडा-तावीज़, मन्नत-मनौतियों के चक्कर में बर्बाद हो जाता है ।”3

शमोएल अहमद की कहानियों के विषय में बहुत ही वैविध्य नहीं है । इनकी कहानियों का विषय प्रमुख रूप से नारी-शोषण, साम्प्रदायिकता और मज़हबी आड़ में हो रहे गलत कार्य के इर्द-गिर्द रहता है । मुस्लिम समुदाय में व्याप्त नारी शोषण पर आधारित कहानियों में ‘बदलते रंग’, ‘ऊँट’, ‘मृगतृष्णा’, ‘मिश्री की डली’, ‘बहराम का घर’ आदि महत्वपूर्ण हैं । ‘बदलते रंग’ शीर्षक कहानी वेश्या स्त्री पर आधारित है । ‘ऊँट’ कहानी में एक ऐसी स्त्री का चित्रण है, जो आर्थिक तंगी के कारण इमाम के हवस का शिकार बन जाती है । ‘मृगतृष्णा’ कहानी दम्पत्ति के बीच के टकराव को सम्प्रेषित करती है । ‘मिश्री की डली’ कहानी में मुस्लिम समाज में स्त्री शोषण को उकेरा गया है । नासिरा शर्मा का रचना-संसार बहुत ही विस्तृत है । इन्होंने उपन्यास, कहानी, आलोचना, रिपोर्ताज, नाटक, अनुवाद, सीरियल-टेली फ़िल्म आदि क्षेत्रों में लेखनी की है । नासिरा शर्मा बहुमुखी प्रतिभा की धनी हैं । सृजनात्मक लेखन के साथ ही साथ उन्होंने स्वतंत्र पत्रकारिता के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है । हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी व पश्तो भाषा का ज्ञान इनके पास है । इनकी 2001 में प्रकाशित कहानी-संग्रह ‘इंसानी नस्ल’ की सारी कहानियाँ स्त्री विमर्श से संबंधित हैं । इन कहानियों में बहु-विवाह की समस्या, मेहर की समस्या, बाँझ स्त्री की समस्या, प्रेम-विवाह, दम्पत्ति के बीच टूटन आदि समस्याओं को देखा जा सकता है । इनकी कहानियों के बारे में प्रो. वीरेंद्र मोहन ने इस प्रकार टिप्पणी की है -“दिक्-काल के परिवर्तित होते रूपों और बदलते मूल्यों से बनने वाले समाज को भीतर से पहचानने का प्रयत्न यदि नासिरा शर्मा की कहानियों की एक विशेषता है तो नारी मन और जीवन की अनेक-अनेक पर्तों को खोजने का उपक्रम भी इन कहानियों की एक विशेषता कही जाएगी ।”4

मंजूर एहतेशाम की 2001 में प्रकाशित कहानी-संग्रह ‘तमाशा तथा अन्य कहानियों’ का विषय मुस्लिम परिवेश की सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक समस्या है । इस संग्रह में संकलित ‘घेरा’ कहानी एक वृद्ध पुरुष और उसकी नव युवती पत्नी के बीच संबंधों को लेकर लिखी गई है । आज मनुष्य के पास धन है लेकिन वह ख़ुश नहीं है, वह धन से सब कुछ हासिल कर ले रहा है, परन्तु सुखी नहीं है । मंजूर एहतेशाम ने इस कहानी के माध्यम से मुस्लिम समाज में व्याप्त अवैध-सम्बन्धों की पोल को खोला है, जो कि एक यथार्थ है । ‘पुल पुख्ता’ कहानी सरकार की दोहरी नीति की पोल खोलती है । ‘तमाशा’ कहानी मुस्लिम समाज में व्याप्त बेरोजगारी की समस्या पर केन्द्रित है । कहानी का एक प्रसंग है -“आलम ने अपनी दुल्हन के लिए सात कोठरियों से एक कोठरी किसी किरायेदार को उसकी मुंहमांगी रकम देकर, खाली करा ली थी, उसके कहे अनुसार, आरा मशीन के मालिक से एडवांस लेकर ।”5 इस कहानी में मुस्लिम समाज में छोटी उम्र की लड़कियों पर किस तरह धर्म को उड़ेल दिया जाता है, उसकी ओर भी संकेत किया गया है -“दरअसल जमीला के फ़ौरन बाद शादी के लायक तो घर में शकीला थी, लेकिन उस ज़माने में उस पर अल्लाह मियाँ की गाय बनने और कहलाने का भूत सवार था । एक छोटी-सी कोठरी में भी उससे जितना बन सकता, वह पर्दा भी करती और इबादत भी । उसके सिर से दुपट्टा, सोते-जागते, इस तरह बंधा रहता जैसे आमतौर पर औरतें नमाज़ पढ़ने वक्त कसकर बांधती हैं ।”6

गीतांजलि श्री की कहानियों में एक ख़ास सिग्नेचर ट्यून मिलता है । इनकी कहानियों में एक अलग तरह का फक्कड़पन, एक अजीब तरह की दार्शनिकता और एक अजीब तरह की भाषा मिलती है । उन्होंने मुस्लिम जीवन को केन्द्र बनाकर कई कहानियाँ गढ़ी हैं । इनकी ‘आजकल’ शीर्षक कहानी साम्प्रदायिकता को केन्द्र बनाकर लिखी गई है । इस कहानी में साम्प्रदायिकता के चलते मुस्लिम समाज कितना भयभीत हो जाता है, उसका सजीव चित्रण किया गया है । इस कहानी को गुजरात दंगे से जोड़कर देखा जा सकता है । इनकी एक और कहानी है -‘बेलपत्र’ । इस कहानी में दम्पत्ति के ऊपर धर्म के प्रभाव को रेखांकित किया गया है । पत्नी मुस्लिम और पति हिन्दू है, दोनों प्रेम विवाह करते हैं । लेकिन कुछ ही समय बीतने के बाद दोनों में दरार पड़ जाती है, कारण मज़हब । “यह हमारी हार है फ़ातिमा ! कोई वजह नहीं कि हम हारें ...तुम...तू...त...तुम...”ओम घोर निराशा में हकलाने लगा । “मैं अब कुछ नहीं जानती । बंद करो ।” फ़ातिमा त्रस्त हो चुकी थी । ओम का ह्रदय कराह उठा, फ़ातिमा, डूब जाओगी । हम दोनों मिट जाएँगे ।”7

भारत में साम्प्रदायिकता के चलते मुस्लिम समाज को बहुत ही परेशानियों का सामना करना पड़ता है । हालाँकि हिन्दू और मुस्लिम दोनों कौमों को हानि पहुँचती है । भारत में इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में प्रमुख रूप से सन् 2002, सन् 2006, सन् 2007, सन् 2008, सन् 2009 में बड़े पैमाने पर दंगे हुए । उदाहरण के तौर सन् 2007 पर में निम्नलिखित जगहों पर दंगे हुए -18 जनवरी, जयपुर, 21 जनवरी, इंदौर, 27 जनवरी, गोरखपुर, 12 फरवरी, इंदौर, 16 फरवरी, जयपुर, 24 मार्च, जम्मू कश्मीर, 28 मार्च, गुजरात (जामनगर), 1 अप्रैल, मध्यप्रदेश, 12 अप्रैल, नांदेड़, 13 मई, शाहजहांपुर, 14 जून, अहमदाबाद, 1 सितम्बर, इलाहाबाद, 17 सितम्बर, महाराष्ट्र , 19 सितम्बर, सूरत, 27 सितम्बर, बड़ौदा आदि । साम्प्रदायिकता पर असग़र अली इंजीनियर ने इस प्रकार टिप्पणी की है -अगर धर्मनिरपेक्ष पार्टियाँ हिम्मत और धैर्य से काम लें तो कोई कारण नहीं कि हमारे देश से साम्प्रदायिक हिंसा का दानव हमेशा के लिए विदा हो जाए ।”8

नसरीन बानो की कहानियों का विषय अधिकांश हिन्दू समाज ही रहा है, लेकिन कुछ कहानियाँ मुस्लिम स्त्री समाज पर भी आधारित हैं -‘बाबुल का द्वार’ कहानी मुस्लिम स्त्री पीड़ा को व्यंजित करती है । कहानी में एक माँ अपनी चार लड़कियों का किसी तरह पालन पोषण करती है । एक दिन एक लड़की आर्थिक तंगी के चलते गैर लड़के के साथ भाग जाती है । इस कहानी की भाषा-शैली बहुत ही मार्मिक है ।

इधर बीच एक बहस चली है- ‘अल्पसंख्यकवाद के खतरे की’ । दुनिया की हर सरकार अल्पसंख्यक को अपनी क्षमता अनुसार सुविधाएँ प्रदान करती हैं । यदि अल्पसंख्यक, अल्पसंख्यक बनकर रहें तो किसी भी देश की सरकार को कोई आपत्ति नहीं होगी, लेकिन अल्पसंख्यक अपनी विचारधारा को सरकार पर जबरदस्ती थोपने लगते हैं तब मामला गड़बड़ा जाता है । अल्पसंख्यक की विचारधार जब एक राजनीतिक रूप पकड़ लेती है, तब वह देश की एकता को खतरा पैदा करती है, यही वह जड़ है जहाँ से अल्पसंख्यकवाद के खतरे सामने आने लगते हैं । मुजफ्फर हुसैन ने अल्पसंख्यकवाद के खतरे पर इस प्रकार टिप्पणी की है -“अल्पसंख्यकों का एक चरित्र यह भी देखा जाता है कि वे राजनीतिक रूप से बड़े सतर्क और जागरूक होते हैं । इसलिए हर देश में उनके अपने समाचार-पत्र और मीडिया के अन्य साधन हैं । किसी भी देश को किसी समाज की भाषा, वेशभूषा और त्योहार से भला क्या आपत्ति हो सकती है; लेकिन जब आपकी यह पहचान राजनीतिक स्वरूप लेने लगती है तब अल्पसंख्यकवाद के खतरे खड़े हो जाते हैं ।”9 हबीब कैफ़ी की कहानी ‘मार-मारकर’ धर्मान्तरण के प्रश्न को उजागर करती है । जेबा रशीद की कहानी ‘तपती रेत’ स्त्री विमर्श को उकेरती है, कहानी का एक प्रसंग है -“हालात ने अन्नो को तन्हा ज़िन्दगी जीने को मजबूर कर दिया । अगर किसी औरत को पति से दबते देखती तो उसे शेरनी बनने को उकसाती, लेकिन खुद बशीरा के आगे दब्बू बन जाती ।”10

नीला प्रसाद की कहानी ‘एक दुनिया समानांतर’ गोधरा कांड को कथ्य बनाकर लिखी गई है । कहानी में गोधरा कांड से भयभीत मुस्लिमों की पीड़ा का चित्रण किया गया है । शकील की ‘तहारत’ कहानी में मज़हब की आड़ में हो रहे खून खराबे, दंगे का सजीव चित्रण है । अनुज की कहानी ‘अनवर भाई नहीं रहे’ में मुस्लिम समुदाय में युवाओं में भटकाव, पीड़ा, कुंठा और रोष आदि को सम्प्रेषित किया गया है । कहानी में पीड़ा से दम तोड़ते मनुष्य का बहुत ही सूक्ष्म चित्रण है -“ऐसे में हम सब ये तो जानते थे की किसी भी दिन अनवर भाई की मौत की ख़बर आ सकती है, लेकिन यह ख़बर इतनी जल्दी आ जाएगी इसकी उम्मीद नहीं थी ।”11

विवेचन के बाद कहा जा सकता है कि इक्कीसवीं सदी की पहले दशक की कहानियों में मुस्लिम जीवन का यथार्थ अंकन किया गया है । इस दशक के कहानीकारों ने अलग-अलग शिल्प के माध्यम से कहानियाँ गढ़ी हैं । मुस्लिम समुदाय का एक तबका तो अच्छी स्थिति में है, लेकिन इस समुदाय का निचला तबका जिसे ‘पसमांदा मुसलमान’ के नाम से जाना जाता है उसकी हालत दयनीय है । जिसके कारण ‘पसमांदा समाज’ हाशिये का जीवन यापन कर रहा है । इस दशक की कहानियों की भाषा बेजोड़ रही है ।

सन्दर्भ

1. अब्दुल बिस्मिल्लाह-रफ़-रफ़ मेल, पृ.20

2. अली अनवर-मसावात की जंग पसेमंजर: बिहार के पसमांदा मुसलमान, पृ.24

3. अनवर सुहैल-चहल्लुम, पृ.124

4. एम.फिरोज अहमद (सं.)-नासिरा शर्मा: एक मूल्यांकन, पृ.251

5. मंजूर एहतेशाम-तमाशा तथा अन्य कहानियाँ, पृ.140

6. वही, पृ.139

7. गीतांजलि श्री-प्रतिनिधि कहानियाँ, पृ.38

8. असगर अली इंजीनियर-धर्म और साम्प्रदायिकता, पृ.146

9. मुजफ्फर हुसैन-खतरे अल्पसंख्यकवादके, पृ.114

10. हरिनारायण(सं.)-कथादेश, वर्ष-14,अंक-5, जुलाई, 2004, पृ.79

11. रवीन्द्र कालिया(सं.)- वागर्थ, जून,2006, पृ.73

21वी सदी और सुशीला टाकभौरे की कविताएं

प्रो. डॉ. सौ. रमा प्र. नवले

पूर्व प्र.प्राचार्य एवं विभागप्रमुख

स्नातकोत्तर हिंदी विभाग एवं अनुसन्धान केंद्र


पीपल्स कॉलेज, नांदेड

सुशीला टाकभौरे की कविताओं के आस्वाद से यह महसूस किया जा सकता है कि २१वी सदी में अब स्त्री विमर्श युवा होकर अपने सौंदर्य के जलवे बिखेर रहा है| अब इस विमर्श ने अपने व्यक्तित्व को पहचान लिया है| इसलिए अपनी अस्मिता से यह कविता दीपदीपाने लगी है| एक साहस, एक आत्मविश्वास, आत्ममुग्धता, निर्भीड़ता, उचित-अनुचित के निर्णय की क्षमता क्या होती है इसकी पहचान इस साहित्य ने कर ली है| लग रहा इस साहित्य का लक्ष्य अब निश्चित है| एक साहसी पथिक की तरह कैसे निरंतर चलते रहना है – जीवन के इस मर्म को, अब इस कविता ने पहचान लिया है| सुशीलाजी की कविताएँ स्त्री विमर्श के केवल युवा होने का ही परिचय नहीं देती बल्कि प्रौढत्व का भी परिचय देती है| हमारे महामहीम राष्ट्रपति अबुलकलाम आज़ाद ने कहा था – ‘ छोटा सपना देखना पाप होता है’| २१वी सदी की सुशीला भी छोटा सपना नहीं देखती उसे तो चाहिए ‘अनंत असीम दिगंत .... ’ इसलिए यह कहना अत्युक्ति न होगा कि हिंदी महिला लेखन अब सुशीला जैसी कई कवयित्रियों के माध्यमसे ‘आकाश’ में विचरण कर रहा है, पैर उसके ‘धरती’ पर ही है और मन में उसके ‘सागर’ है|

मेहतर समाज की एक छोटी सी लड़की ‘सुशीला’ का अदम्य साहस अचंभित करता है| अत्यंत दरिद्र और सात भाई-बहनों के साथ एक बड़े परिवार में जीनेवाली यह लड़की, पिता के पढ़ाई बंद करने के निर्णय के विरुद्ध उपोषण करती है| एक ओर दरिद्रता और दूसरी ओर निम्न जाति में भी निम्न समझी जानेवाली मेहतर जाति के दंश की पीड़ा लगातार वह भुगतती रही है | ना वह अपनी सहेलियों के साथ बैठ पाई न खेल पाई और ना ही पीएच. डी. जैसी उच्चतम उपाधि पाने के बाद भी ‘झाडूवाली’ शब्द से छुटकारा पा सकी; पर ताज्जुब यह है कि जाति और लिंग भेद के अंधे कुँए के अँधेरे को चीरकर सतरंगी सपने बराबर वह देखती रही है| उनमें साहस इतना है कि पत्थर पर भी लकीर बनाना आसन है पर उनके निर्णयों को डिगाना या तोड़ पाना मुश्किल| ‘सुरक्षा’ से अधिक ‘स्व रक्षा’ में अधिक विश्वास करनेवाली यह स्त्री है| हर चीज की तरह व्यक्ति का भी इस्तेमाल किए जानेवाली इस सदी में ना वह अपना उपयोग किसी को भी करने देंगी और ना ही नमूने की तरह अपने को शोभा की वस्तु बनाकर रखने देंगी| वह तो खुद एक ‘आइकॉन’ बनी हुई है – “मगर यह नहीं की बरबस / मुझे किसी छोटे गमले में / लगाया जाए / या किसी नर्सरी में / मात्र अर्थोपार्जन के लिए / एक नमूने के रूप में रखा जाए | मेरा उपयोग / मेरा उपभोग / नहीं सह सकती मैं, / सदियों से / शोषित – पीड़ित / अब नहीं रह सकती मैं / मेरा इतिहास है, स्वाभिमान है, गौरव है / अपने अस्तित्व के लिए / लड़ सकती हूँ मैं, / जल - थल नभ की / हर लड़ाई चुनौती के साथ |” १

सुशीलाजी डॉ. बाबासाहब आंबेडकर के विचारों की मशाल हाथ में लेकर चलती है| उन्हें बापू के तीन बंदर भोले-भाले लोगों को भर्मानेवाले दिखाई देते हैं - ‘आज हमें लगता है / यही था आपका दूरदर्शी अभिमान /भोलेभाले लोगों को / भरमाने के लिए / देते रहे ऐसा ज्ञान / सत्य मत देखो / सत्य मत कहो / सत्य मत सुनो २ और स्त्री-पुरुष की प्राकृतिक समानता की दावेदारी पर वह अटल हैं| वह यह मानती है कि इन दो ध्रुवों को बाँधकर रखनेवाला प्रेम और आकर्षण है| प्रेम और आकर्षण का चुम्बक स्त्री और पुरुष की बराबरी में, समानता में है – “प्रेम आकर्षण स्नेह प्यार / रहेगा जबतक / स्त्री-पुरुष समानता का भाव / बराबरी के दावेदार / दोनों रहेंगे महत्वपूर्ण / चुम्बक रहेगा ३

एक आत्मकथा – ‘शिकंजे का दर्द’ (२०११), उपन्यास – ‘नीला आकाश’ (२०१३), ‘तुम्हें बदलना ही होगा’ (२०१५), ‘वह लड़की’ (२०१८), कहानी संग्रह – ‘संघर्ष’ (२००६), ‘जरा समझो’ (२०१४) लिखकर अभी तक चार कविता संग्रह ‘स्वाति बूँद और खरे मोती’ (१९९३), ’यह तुम भी जानो’ (१९९४), ‘तुमने उसे कब पहचाना’ (१९९७), ‘हमारे हिस्से का सूरज’ (२००५) - उन्होंने दिए हैं| ‘संवादों का सफ़र’ (दलित मुक्ति आन्दोलन, महिला मुक्ति तथा सामाजिक परिवर्तन से संबंधित पत्रों का संग्रह), ‘सुधीर शर्मा के पत्र’ (२०१८, पत्र संग्रह) हैं| इसके अलावा ‘हिंदी साहित्य के इतिहास में नारी’ १९९४), ‘भारतीय नारी, समाज और साहित्य के परिप्रक्ष्य में’ (१९९६), ‘हाशिए का विमर्श’ (१९९६), ‘अनुभूति के घेरे’ (१९९७), ‘टूटता वहम’ (१९९७), ‘दलित साहित्य एक आलोचना दृष्टि’ (२०१५) – आदि रचनाओं के माध्यमसे उनके विचारों को जाना जा सकता है| ‘रंग और व्यंग्य’ (२००६, स्त्री-पुरुष समानता का संदेश देनेवाले नाटक), ‘नंगा सत्य’ (२००७) नाटक हैं| उनके साक्षात्कारों का संग्रह ‘मेरे साक्षात्कार’ (२०१५) है| सुशीलाजी को कई पुरस्कारों से नवाज़ा गया है – ‘यह तुम भी जानो’ इस कविता संग्रह के लिए मध्य प्रदेश दलित साहित्य अकादमी पुरस्कार, पद्मश्री गुलाबभाई अवार्ड, ‘ज्ञान ज्योती अवार्ड’ तथा महारष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी द्वारा भी उन्हें पुरस्कृत किया गया है | आज वह पूरे देश्भार में एक जानीमानी साहित्यकार के रूप में पहचानी जाती है | उन्होंने जो सपना देखा था – ‘और मैं सबकी नज़र बनना चाहती हूँ’ के मुताबिक़ आज वह सबकी ‘नज़र’ में हैं|

वर्तमान साहित्य के केंद्र में मनुष्य की अनुभूतियाँ प्रमुख हो गयी हैं| सुशीलाजी एक दलित स्त्री होने के कारण एक ओर दलित होने की और दूसरी ओर स्त्री होने की पीड़ा से वह गुज़री हैं| भोगी हुई पीड़ा होने के कारण कविता की अनुभूतियाँ बहुत तीव्र रूप में पाठकों को भी कचोटती हैं| यह लेख उनकी कविता में अभिव्यक्त स्त्री मन पर केन्द्रित है, यह इस लेख की सीमा है| सुशीलाजी की कविताएँ स्त्रियों के अंतर्मन की सूक्ष्म पतों को खोलकर रखती है| उस पर छाये अमूर्त दबाव तंत्र को विश्लेषित करती हैं| और सबसे बड़ी बात उनकी कविताएँ स्त्री के ‘व्यक्तित्व’ को व्याख्यायित करते हुए उसके स्वरूप पर बहुत स्पष्ट शब्दों में प्रकाश डालती है| यह कार्य करते समय उनकी भाषा इन अमूर्त भावों को मूर्त करने में ज़रा भी हिचकिचाती नहीं है| शब्द बहुत विश्वास के साथ एक-एक परतों को खोलते जाते हैं |

मनुष्य जितना-जितना सुसंस्कृत एवं सभ्य होता जा रहा है ; शोषण के तरीके भी उतने ही प्रौढ़ और शिष्ट रूप में आ रहें हैं| व्यवस्था का शिकंजा स्त्री को अपने ही कब्जे में रखना चाहता है| एक दबाव तंत्र जो स्त्रियों के जीने के साथ-साथ ही चलते रहता है| जो दिखाई नहीं देता ; पर दिलोंदिमाग पर नाग के फन की तरह बैठे रहता है| ज़रा हिले नहीं कि फूफकारते रहता है| ज़रा सी नज़र हिलने पर फूसफूस करते रहता है| यह आतंक की तरह हमेशा साथ रहता है| इसका स्वरूप इतना सूक्ष्म होता है कि इस दबाव तंत्र को समझना सामान्य से परे की बात होती है| सुशीलाजी इस दबाव तंत्र को ज़रा खोलती है| इसके निराकार नुकीले दांत वह दिखाती है| इसकी कुरूपता और भयावहता से वह परिचित कराती है - एक स्त्री / जब भी कोई कोशिश करती है - / लिखने की, बोलने की, समझाने की, / सदा भयभीत - सी रहती है / मानो / पहरेदारी करता हुआ / कोई / सर पर सवार हो / पहरेदार / जैसे एक मजदूर औरत के लिए / ठेकेदार / या खरीदी संपत्ति के लिए / चौकीदार ४ एक सामान्य स्त्री पर यह दबाव तंत्र अपना वर्चस्व बनाए रखने में कामयाब होता है| इसके भी माया की तरह अनेक रूप होते है| कभी स्त्री को महिमा मंडित कर, कभी प्रशंसा कर, कभी प्रेम के जाल में उलझाकर, कभी आश्वस्त कर, कभी भ्रम - जाल निर्माण कर ... नाना रूपों से यह दबाव तंत्र स्त्री को ठगते रहता है, वह स्त्री को अपने कब्जे में घेर लेता है| पर २१ वी शती की स्त्री को अपने कब्जे में घेरना दबाव तंत्र के लिए भी मुश्किल हो गया है ; क्यों कि ‘जानकी जान गयी है’- “आज जानकी सब जान गयी है / अब वह धरती में नहीं आकाश में जाना चाहती है / बिजली - सी चमक कर / सन्देश देना चाहती है / ‘पुरुष प्रधान समाज में / स्त्री भी / समानता की अधिकारी है’ / उसकी अस्मिता के प्रति / तुमने जो भेदभाव किया / तुम्हारे देशवासी भी करते हैं / इसलिए देवभूमि के इस देश में / ‘भूकंप’ आते रहते हैं| ५ यह दबाव तंत्र सुशीला जैसी सुशिक्षित और प्रबुद्ध साहित्यकार महिला पर भी अपना असर दिखाने लगता है| इस दबाव तंत्र की तकलीफ सामान्य महिला को उतनी चुभती नहीं है ; पर जो सब जानती है उसे यह पीड़ा बहुत कचोटती है| जो प्रबुद्ध साहित्यकार महिला अपनी कलम से समाज का दिशा निर्देश करती है उसी कलम को अन्य दिशाओं का पालन करने के लिए दबाव बढ़ने लगता है तब सुशीला की कलम जुझारू हो जाती है| स्त्री कैसे रहे? कैसे जिए? कैसे सोचे? कैसे लिखे? कैसे अभिव्यक्त हो? इस पर परिवार और समाज की नज़रे रहती ही है| यह नज़र चाहे पुरुष की हो या स्त्री की वह पितृसत्ताक व्यवस्था से उत्पन्न हुई नज़र है| इन नज़रों के अमूर्त नुकीलेपन को कवयित्री ने अपनी ‘स्त्री’ कविता के माध्यमसे अत्यंत स्पष्ट और मूर्त रूप में उजागर कर दिया है | यह दबाव तंत्र कलम को भी झुकाने के निर्देश देने लगता है तब वह बहुत बेचैन हो जाती है – “वह सोचती है / लिखते समय कलम को झुका ले / बोलते समय बात को सँभाल ले / और समझने के लिए / सबके दृष्टिकोण से देखे, / क्योंकि वह एक स्त्री है / लेकिन कब तक?” ६ कविता की इन पंक्तियों में कवयित्री की अपनी अनुभूतियों को उनके मूल रूप के साथ अभिव्यक्त न कर पाने की पीड़ा की अभिव्यक्ति हुई है| एक सृजनशील स्त्री (कवयित्री का दर्द) इन पंक्तियों में उभरा है| अपनी और समस्त स्त्री जाति की अस्मिता के प्रति सचेत स्त्री को अपनी ‘कलम को झुकाना’ कितना मुश्किल होता है? कलम को झुकाना अर्थात अपनी अस्मिता को गिरवी रखना है| अस्मिता के प्रति सजग व्यक्ति को मृत्यु भी इतनी यातना नहीं देता जितनी उसे अपनी अस्मिता को गिरवी रखने से होती है| अपनी ताकतवर नज़र को भुलाकर सबके दृष्टिकोण से देखना यह और भी कठिन है| प्लेटो ने कहा था ‘गुलामी मृत्यु से भी भयंकर होती है’ – सुशीला की इन पंक्तियों को पढ़ते समय इन शब्दों को सहज ही बड़ी तीव्रता से हम महसूस किया जा सकता है| सुशीलाजी ‘कलम को झुकाने की पीड़ा, टीस की तरह पाठकों के लिए छोड़ती हैं| यह टीस तब तक शाश्वत रहेगी जब तक स्त्री की कलम इस दबाव तंत्र के आगे झुकने के लिए बाध्य रहेगी| स्त्रियों की अभिव्यक्ति पर रही पाबंदियों का इतना वास्तव चित्रण अन्यत्र दुर्लभ है|

सुशीलाजी की कविताएँ स्त्री के ‘व्यक्तित्व’ को बहुत प्रखर रूप में उभारती है एवं स्त्री के व्यक्तित्व का एक पूरा स्केच अपनी कविताओं के माध्यमसे प्रस्तुत करती है| इनकी कविताओं में आई स्त्री २१वी सदी की शिक्षित एवं प्रबुद्ध स्त्री है; जो अपनी अस्मिता के प्रति सजग है| यह स्त्री ‘स्त्री’ होने का हक़ नहीं जताती और ना ही अपने लिए केवल स्त्री होने के नाते कुछ विशेष सुविधाएँ चाहती है| यह स्त्री समाज के अन्य ‘मनुष्य सदस्यों’ की तरह (स्त्री और पुरुष) अपने को भी मनुष्य सदस्य मानती है| केवल स्त्री होने के कारण अपनी अलग विशेषता यह रेखांकित नहीं करती ; और ना ही अपने लिए कोई विशेष सुविधा चाहती है| वह पुरुष के प्रति देखने के श्रेष्ठता भाव (ग्रंथी) से और स्त्री को हीन माननेवाले हीनता भाव (हीनता ग्रंथी) से मुक्त है| यह स्त्री ‘अपनी सुरक्षा’ के लिए किसी दूसरे का इंतजार नहीं करती बल्कि ‘स्वरक्षा’ में विश्वास करती है| इसकी सबसे बड़ी विशेषता तो यह है कि ऊपर उल्लिखित दबावतंत्र के प्रति वह पूरी तरह से सजग है| उसके विकास के बाधक तत्वों को वह पहचानती है| यह बात ही सुशीला को २१ वी सदी की प्रबुद्ध स्त्री के रूप में सिद्ध करती है| उसे पता है कि उसके व्यक्तित्व के खुलने या उसके व्यक्तित्व के विकास में ये तत्व उसके सामने महा ठगिनी माया की तरह उसे ठगने के लिए आये हैं| ये बाधक तत्व कभी-मीठी छूरी की तरह स्नेह का रूप भी धारण कर आते हैं| इनको पहचानना आसान नहीं है| यह तंत्र इतना सूक्ष्म है कि कब स्त्री को अपने भुलावे में लेकर अपनी धूर्तता से उसके आत्मविश्वास को ख़त्म कर देगा उसे पता ही नही चलेगा| किसी के व्यक्तित्व को मिटाने की पहली सीढ़ी उसके आत्मविश्वास को, उसके मनोबल को तोड़ना है| दुनिया की नज़रों से गिरा हुआ व्यक्ति आसानी से ऊपर उठ सकता है ; पर अपनी ही नज़र से गिरे व्यक्ति का ऊपर उठना बहुत-बहुत मुश्किल होता है| कवयित्री इस चाल को समझती है| इसलिए सबसे पहले अपने विश्वास को ; जिसके कारण उसका व्यक्तित्व खुल नहीं पाया, पहले उसे लौटा देने की बात करती है| इसी कारण अब उसे किसी भी पुरुष के व्यवहार पर विश्वास नहीं है| वह उसकी हर बात को संदेह की नज़र से देखती है| ‘लौटा दो मेरा विश्वास’ कविता की पंक्तियाँ दृष्टव्य है – “मैं करने लगी हूँ अविश्वास / तुम्हारे हर व्यवहार पर / ........... . . . जब भी मैंने पंख फैलाये / तुमने उनको क़तर दिया है / स्नेह संरक्षण के भ्रम से / मुझे पनपने नहीं दिया है| ७ बावजूद कवयित्री अपने व्यक्तित्व को फैलाने और पनपाने से बाज नहीं आती| यह साहस एवं आत्मविश्वास काबिले तारीफ़ है| वह खुरच-खुरच कर दबाव तंत्र की सारी परतों को उतार फेंकती है| वह किसी भी प्रकार के भुलावे में नही फँसती| अपनी कविता ‘आज की खुद्दार औरत’ में कवयित्री ने इन सारे पुराने जेवरों को त्यागने की बात की है – “पहचानों उसके नए तेवर / श्रद्धा, शर्म, दया, धरम / किसमें खोजते हो? / सँभालो अपने / पुराने जेवर / थान के थान / परिधान” ८

सुशीलाजी की कविताओं में न स्त्री-पुरुष के प्रेम संबंध है और ना ही विवाह बाह्य संबंध| इनकी कविताएँ केवल और केवल ‘स्त्री के व्यक्तित्व’ पर ध्यान केन्द्रीत करती है| अपने व्यक्तित्व के अलावा कवयित्री को कुछ भी प्रिय नहीं है| यह व्यक्तित्व ‘असीम अनंत दिगंत’ की चाहत रखता है| उड़ान की क्षमता तो देखिए..... अब इस स्त्री को छत का खुला आसमान नहीं, आसमान की खुली छत चाहिए – “मुझे अनंत असीम दिगंत चाहिए, / छत का खुला आसमान नहीं, / आसमान की खुली छत चाहिए / मुझे अनंत आसमान चाहिए”९ २१वी सदी की स्त्री की सोच में इस प्रकार का परिवर्तन आना ही इस सदी की स्त्री की विशेष विशेषता है| स्त्री के जिस ‘व्यक्तित्व’ की बात की जा रही है वह आखिर है क्या? वह असीम अनंत दिगंत क्या है? कवयित्री अपनी कविताओं में इसका विश्लेषण करती है| स्त्री के व्यक्तित्व को सुशीलाजी बहुत स्पष्ट शब्दों में रेखांकित कर रही है| व्यक्तित्व की पहचान अपनी अस्मिता के प्रति सजग होने में है| अपने व्यक्तित्व के विकास में रोड़े डालने के लिए फैलाए गए जाल को पहचानकर उसे तोड़ने में है| कहाँ – कहाँ पर अपनी प्रगति के पंखों को, किन – किन भ्रमों को फैलाकर काटा जा रहा है – उसकी पहचान में है (लौटा दो मेरा विश्वास) इन पंक्तियों में ‘मुझे पनपने नहीं दिया है’ – यह पंक्ति स्त्री के भीतर की उन सारी क्षमताओं की ओर इशारा करती है जिसके कारन उसका व्यक्तित्व बनता है| पितृ व्यवस्था या परिवार व्यवस्था ने उसकी इन क्षमताओं को कभी उभरने नहीं दिया| एक ‘स्त्री’ को कभी ‘व्यक्तित्व’ में परिणित नहीं होने दिया| उसे भ्रमजाल में उलझाकर रखा| वह यह भी जानती है कि स्त्री को अक्सर उपेक्षा की ठंडक से और आक्रोश के तेज़ाब से रौंदा जाता है (तुमने उसे कब पहचाना) यह बात वही स्त्री पह्चान सकती है जो शिक्षित एवं प्रबुद्ध है| यह वही स्त्री हो सकती है जो अपने को समानता की अधिकारिणी मानती है और केवल स्त्री होने के कारण अपने लिए किसी विशेष स्थान की अपेक्षा नहीं करती| यह वही स्त्री हो सकती है जिसके ह्रदय में सागर होगा और मन में आकाश पर पैर उसके अपनी धरती पर ही होंगे ; क्षितीज वह खुद ही ढूंढ लेंगी (सागर और आकाश)| यह वही स्त्री होगी जो यह सोचती है कि कोई दूसरा आकर उसकी सुरक्षा नहीं करेगा, बल्कि उसे स्व की सुरक्षा स्वयं ही करनी है| सुशीलाजी व्यक्तित्वधारिणी है| इसलिए इनकी कविताएँ धरती से उपजी है ; पर विचरण आकाश में करती है| रस धरती से लेती है और आकाश में सपनों के रंग बिखेरती है| इनके सपनों पर लाख पाबंदियां हो पर इनके सपने उन पाबंदियों को काटकर मुक्त हो ही जाते हैं और आकाश में इंद्रधनुषी रंग बिखेर देते है|

व्यक्तित्व की पहचान संघर्ष के साहस से बनती है| यह संघर्ष स्वयं के लिए भी हो सकता है और समग्र स्त्री जाति के लिए भी एवं दलितों – शोषितों के लिए भी | ऊपर बताया जा चुका है कि सुशीलाजी स्वयं पर विश्वास कर जीनेवाली महिला है| हम उनके लेखन के माध्यमसे नयी दृष्टि का परिचय पाते हैं| जहां दलित विमर्श का एक महत्वपूर्ण हिस्सा अपनी स्थिती से रूबरू कराना है वही सुशीलाजी दलितों की स्थिति से परिचित कराने के बजाए उन्हें ही उनकी स्थिति का जिम्मेदार मानती है| उनके मन में यह प्रश्न उठता है, उनके पूर्वजों ने क्यों नहीं इस घिनौनी और लाचार जिंदगी का विरोध किया? खतरे किसी भी युग में कम नहीं होते| स्थितियां समान रूप से हर युग में उतनी ही चुनौतीपूर्ण होती है| फिर अपनी स्थिति बदलने का प्रयास क्यों नहीं हुआ? सुशीलाजी की यह दृष्टि उनके व्यक्तित्व की पहचान है| खुद को तराशना और निरंतर अपने आपको निखारते जाना किसी भी सामर्थ्यशाली व्यक्ति के व्यक्तित्व का हिस्सा होता है| अपने संकुचित वृत्तों से परे जाकर सोचनेवाला आदमी ही बुरे को बुरा और अच्छे को अच्छा कहने का सामर्थ्य रखता है| इसलिए वह अपने पूर्वजों की नपूंसकता को ललकारती हैं| वह प्रश्न पूछती है – “हाथ नहीं उठाया/ किसी ने भी, / गुरु-भक्ति के नाम पर / आवाज नहीं उठाई? / विषमता और स्वार्थ की बात को / तुम सबने / मौन रूप से स्वीकार किया| / .............. किसकी प्रशंसा करे इतिहास? अंधी गुरु भक्ति की / या नपुंसक वीरता की? / महाभारत का विजेता / पार्थ / प्रशंसनीय है, / तुम / क्यों दया के पात्र हो ? १० सुशीलाजी पूर्वजों से मिली विचारों की जमीन पर स्थिर खड़े रहने से निजात पाती है| वह आ तो गयी है अँधेरे कुँए से पर साहस इतना है कि केवल कुँए से बाहर निकलना उसका लक्ष्य नहीं है; यह कोई भी कर सकता है| कवयित्री इससे इतना आगे बढ़ना चाहती है कि ; इन परंपराओं के निशान वह पूरी तरह से मिटा देना चाहती है| व्यक्तित्व का परिचय तो तब मिलता है जहाँ वह केवल पुराने निशान मिटाकर भी रुकना नहीं चाहती ; बल्कि प्रकाश के पूंजों की वह खुद भी पूर्वज बनना चाहती है और समग्र जाति को भी पूर्वज बनाना चाहती है| बंधक गुलाम पीढी के / वंशज कहलाना / शर्म की बात है / तुम पूर्वज बनो प्रकाश पुंजों के/ प्रकाश तुम में निहित है| ११ इसी तरह वह स्त्रियों की भी प्रकाश पुंज बनना चाहती है और अन्य स्त्रियों को भी प्रकाश पुंज बनाने के लिए प्रेरित करती है| जिन स्त्रियों के आँख, कान और विचार स्वतंत्र हैं पर अभी भी पांवों में बंधन हैं, इसलिए वह चौखट के बाहर आना नहीं चाहती उन स्त्रियों को आनेवाली पीढ़ियों के लिए रास्ता बनाने के लिए प्रेरित करती है – “आँख, कान, विचार स्वतंत्र है / बंधन है सिर्फ पांवों में| / कुल की लाज / सीमाओं का दायरा / घर की चौखट तक / मायका हो या ससुराल / दरवाजे के पीछे /परदे की ओट से /वह देखती रहती है संसार / आनेवाली पीढ़ियों / नहीं रह सकती उसके पीछे / उन्हें रास्ता देना होगा आगे बढ़कर, / घर की चौखट से बाहर निकलकर| १२ यह रास्ता उनके लिए बनाना है जिनके जन्म की ज़मीन (बेटियों के) ही नदारद है उनके लिए पैर जमाकर खड़े होने के लिए ज़मीन बनाने के लिए इन औरतों को चौखट के बहार लाना चाहती है|

सुशीलाजी की कविताओं को पढ़ते समय यह जिज्ञासा थी कि इनकी कविताओं में दलित स्त्री की अलग अनुभूतियों से परिचय होगा| हिंदी में अभी भी इन अनुभवों का इंतजार है| सुशीलाजी के साहित्य के केंद्र में सामान्य स्त्री ही है| दलित स्त्री की अनुभूतियाँ न के बराबर हैं| ‘मेरा अस्तित्व’ नामक कविता में दलित स्त्री चेतना की हल्की सी झलक मिलती है| एक ब्राह्मणवाद ( अपने को श्रेष्ठ और अन्यों को कनिष्ठ मानने की वृत्ति के अर्थ में) समूची व्यवस्था पर छाया हुआ है| अपने अहं के प्रतिपादन के मौके आदमी छोड़ नहीं पाता| यह मनुष्य की असाध्य बीमारी है| यह बीमारी छूत की तरह दलितों को भी लगी है| सुशीलाजी इमानदार कवयित्री है| एक पल के लिए उनके भी मन में यह अहंकार जगता है; पर तुरंत वह अपने आप को सँभाल लेती है| आज वह भले ही ‘सवर्ण’ बन गयी है ; पर इस वृत्ति को तुरंत वह ताड़ लेती है| इस कविता में यह संघर्ष अभिव्यक्त हुआ है| परन्तु कविता के अंत तक पहुंचते-पहुँचते वह अपना अस्तित्व बिरादरी के अस्तित्व में ही ढूंढ लेती है|

दलित साहित्य अनुभूति का साहित्य है| इस साहित्य की परख अनुभूति के आधारपर ही होनी चाहिए ; न कि कलात्मकता के आधारपर| सुशीलाजी की रचनाएँ एक कदम आगे चलती है| स्त्रियों के अमूर्त भाव, उसकी पीडाओं – यातनाओं के साथ उसके सपनों को बुनने में इनकी काव्य - भाषा समर्थ है| स्त्री के व्यक्तित्व को रौंदने के लिए ‘उपेक्षा की ठंडक’ और ‘आक्रोश का तेज़ाब’ जैसे शब्दों का प्रयोग बड़ा सार्थक है| स्त्री मस्तिष्क पर छाये समूचे दबाव तंत्र को साधारण एवं बोलचाल की भाषा में अभिव्यक्त करने में कवयित्री को कमाल की सफलता मिली है| दबाव तंत्र के कारन अभिव्यक्ति में निर्माण बाधक तत्वों को, स्त्री की ‘तथाकथित समझदारी’ को तथा उसकी सृजनात्मकता पर कार्यरत पहरेदारी को बहुत साधारण और बोलचाल के दो-तीन शब्दों में ही अभिव्यक्त करने में कवयित्री सफल हो पायी है| जैसे सहज अभिव्यक्ति के लिए – ‘बोलते समय बात को सँभाल ले’, उसकी ‘समझदारी’ अपने दृष्टिकोण से देखने में नहीं बल्कि औरों की दृष्टि से देखने में हैं - इस बात को - ‘और समझने के लिए / सबके दृष्टिकोण से देखे / क्योंकि वह एक स्त्री है’ तथा एक प्रबुद्ध स्त्री की सृजनात्मक पहरेदारी को – ‘लिखते समय कलम को झुका ले’ – जैसे छोटे-छोटे वाक्य अमूर्त दबावतंत्र को मूर्त रूप देते है| बेटी के ‘जन्म की जमीन नदारद है’ (आस की पीड़ा) कहकर कवयित्री इस बेटी के ‘जन्म की जमीन पाने के सपने को, आस को’ - ‘बेटी झील सी आँखों से / राह तकती रहेगी’ कहकर इस पीड़ा को झील जितना गहारा बना देती है और पाठकों को बेचैन कर वास्तविकता की जमीन पर ला पटकती है| उसे ‘असीम अनंत दिगंत चाहिए’ में ऐसे महीन दबाव तंत्र को भी दबाकर बहुत ऊपर उठने के सपनों को बुनती है ; जो इक्कीसवी सदी की शिक्षित एवं प्रबुद्ध स्त्री की पहचान कराने में समर्थ है| इन अनुभूतियों की अभिव्यक्ति में भाषा उनके सामने झुक जाती है|

संदर्भ सूची

१. स्वाती बूद और खारे मोती – सुशीला टाकभौरे, पृ. २४

२. बलि के बकरे - यातना के स्वर – सुशीला टाकभौरे, पृ. १६

३. चुम्बक - स्वाती बूँद और खरे मोती - सुशीला टाकभौरे, – पृ. ४३

४. स्त्री – यह तुम भी जानो - सुशीला टाकभौरे, पृ. ३०

५. जानकी जान गयी है – तुमने उसे कब पहचाना – सुशीला टाकभौरे, पृ ६६

६. स्त्री – यह तुम भी जानो - सुशीला टाकभौरे, पृ. ३०

७. लौटा दो मेरा विश्वास – तुमने उसे कब पहचाना – सुशीला टाकभौरे, पृ. ९३

८. आज की खुद्दार औरत – तुमने उसे कब पहचाना - सुशीला टाकभौरे, पृ. ७९

९. विद्रोहिणी – तुमने उसे कब पहचाना – सुशीला टाकभौरे, पृ. ८४

१०. भील एकलव्य – यह तुम भी जानो - सुशीला टाकभौरे, पृ. ३४

११. प्रकाश पुंज - यह तुम भी जानो - सुशीला टाकभौरे, पृ. २४


१२. घर की चौखट से बाहर - तुमने उसे कब पहचाना - सुशीला टाकभौरे, पृ.७७

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21वीं सदी की कहानियों में किन्नर विमर्श

डॉ. सचिन गपाट,

सहायक प्राध्यापक, हिंदी विभाग,

मुंबई विश्वविद्यालय ।

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बात पेटी- 9423641663.

आज विश्‍व धरातल पर मानव अधिकारों की चर्चा ने आंदोलन का रुप लिया है। हाशिए के समाज को मुख्य धारा में लाने की अनेक कोशिशें हो रही हैं। दलित, आदिवासी, स्त्री आदि के अधिकारों के लिए जो प्रयास हुए हैं उसके परिणाम आज दिखाई दे रहे हैं। नाम लेने के लिए भी लज्जित होने वाले समाज में आज किन्नर या थर्ड जेंडर पर चर्चाएं हो रही हैं। किन्नरों के मानवाधिकारों के लिए वैश्विक धरातल पर प्रयास हो रहे हैं। भारत वर्ष में यह बात स्पष्ट रूप से लक्षित हो रही है। किन्नर या हिजड़ों के लिए तीसरे लिंग के रूप में इनके अधिकारों को मान्यता दी गई है। इनके अस्तित्व को पहली बार सशक्त पहचान मिली है। सुप्रिम कोर्ट ने केंद्र और सभी राज्य सरकारों को सभी ट्रांस पीपल को कानूनी पहचान देने का आदेश दिया है। देश में लगभग किन्नरों की पचास लाख संख्या है। इतनी संख्या होने के बावजूद उन्हें सभ्य कहने वाले समाज ने हाशिए पर रखा है। लेकिन अब इस हाशिए को मुख्य धारा में लाने के प्रयास तेज हुए हैं। चिकित्सा के माध्यम से पुरुष या स्त्री बनने का और बच्चे को गोद लेने का अधिकार भी उन्हें दिया है। किंतु सभ्य कहलाने वाला समाज आज भी उनके अधिकारों और अस्तित्व को अनदेखा कर रहा है। थर्ड जेंडर के साथ मानव होते हुए भी जानवरों सा व्यवहार हो रहा है। माँ-बाप के साथ ही साथ समाज भी उन्हें नकार रहा है। सरकार द्वारा सुविधाएँ दी हैं परंतु अज्ञानतावश वे अपने अधिकारों का उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। नौकरी का न मिलना, बेरोजगारी, शिक्षा का अभाव, समाज का नकार जैसी अनेक समस्याएँ थर्ड जेंडर समाज के सामने हैं। सामाजिक व्यवस्था के कारण वे अंदर से टूट रहे हैं। ऐसे में उन्हें समाज की मुख्य धारा में लाना और उनके प्रति समाज में सद्भावना लाना एक चुनौती है।

भारत के विभिन्न राज्यों में थर्ड जेंडर या किन्नरों की स्थिति, संस्कृति और उनसे जुड़ी परंपराएं अलग-अलग हैं। स्त्री और पुरुषों के हमेशा के समाज से बाहर रहने वाले इस समुदाय के लिए हमारे प्राचीन ग्रंथों में 'किन्नर' शब्द का प्रयोग किया जाता है। उर्दू और हिंदी में इनके लिए 'हिजड़ा' शब्द भी प्रयुक्त होता है। मराठी में 'हिजड़ा' और 'छक्का' शब्दों का प्रयोग उनके लिए होता है। गुजराती में उन्हें 'पावैया' और पंजाबी में 'खुस्रा' या 'जनखा' तथा तेलुगु में 'कोज्जा', 'मादा' और 'नपुंसकुडु' शब्दों का प्रयोग मिलता है। भारतीय भाषाओं में शब्द कोई भी हो लेकिन संकल्पना वही है।

साहित्य के क्षेत्र में वर्तमान समय में लिंग निरपेक्ष समाज, बहिष्कृत किन्नर या थर्ड जेंडर समुदाय पर चिंतन और चर्चा तेज हुई है। हिंदी में नई सदी के आरंभ से यह विमर्श प्रभावी रुप से दिखाई दे रहा है। इसके परिणाम स्वरूप नीरजा माधव का उपन्यास 'यमदीप', निर्मला भुराड़िया का 'गुलाम मंडी' प्रदीप सौरभ का 'तीसरी ताली' और महेंद्र भीष्म का 'किन्नर कथा' और चित्रा मुद्गल का 'पोस्ट बाक्स नं. 203 नालासोपारा' आदि उपन्यासों के साथ-साथ कहानियों में- ‘बिन्दा महाराज’, 'किन्नर', 'इज्जत के रहबर', 'नेग', ‘बीच के लोग’, ‘त्रासदी’, ‘ई मुर्दन का गाँव’, 'हिजड़ा' आदि में किन्नर व्यथा का यथार्थ परिलक्षित होता है। किन्नरों पर लिखी गई कहानियां उनकी व्यथा-कथा को कहती नजर आती हैं| हिंदी कथा साहित्य में अभी उतनी मात्रा में किन्नर कहानियां नहीं लिखी गयी हैं जितनी और विषयों पर लिखी जा रही हैं| लेकिन हिंदी कथा साहित्य में किन्नर विमर्श पर चर्चाएं हो रही हैं उसी के परिणाम स्वरुप हिंदी कथा साहित्य में किन्नर विमर्श की कहनियाँ लिखी और पढ़ी जा रही हैं|

किन्नर विमर्श की कहनियों की बात करें तो शिवप्रसाद सिंह की कहानी ‘बिन्दा महराज’ एक महत्वपूर्ण कहानी है| इस कहानी में तृतीय लिंग की समस्याएं और उनका यथार्थ चित्रित हुआ है| शिवप्रसाद जी ने किन्नरों के दुःख, दर्द, संताप, मोह अंधविश्वास, उनकी विडंबना आदि को उजागर किया है| कहानी के मुख्य पात्र बिन्दा के माध्यम से पिता द्वारा तिरस्कार, पति का सुख, पत्नी की प्रतीक्षा, बेटा-बेटी का मोह आदि से वंचित होने की मानसिक पीड़ा को कहानी में उकेरने का प्रयास किया है| बिन्दा कहानी में इन सभी समस्याओं से लड़ता, भिड़ता और संघर्ष करता हुआ अपने अस्तित्व को स्थापित करने का प्रयास करता है कि मैं भी इस समाज का अंग हूँ, एक इनसान हूं|

गरिमा संजय दुबे की कहानी ‘पन्ना बा’ किन्नर विमर्श की एक मजबूत कहानी है| इसमें किन्नर की दारुण स्थिति का चित्रण किया गया है| किन्नरों को समाज से जीते हुए नकार, अपमान का सामना करना पड़ता है| लेकिन मरने के बाद भी उसे दर्द के सिवाय और कुछ भी नहीं मिलता| उसकी लाश को जूतों से पीटा जाता है | “किन्नर की मौत पर उसकी लाश की जूतों से पिटाई की खबर पढ़ ही रही थी कि पता चला पन्ना बा मर गया|”1 इस प्रकार कहानी में किन्नर की उस स्थिति का भी जिक्र किया गया है जिसमें वह समाज से वंचित रहा है| इसे व्यक्त करते हुए गरिमा जी कहानी में लिखती हैं, “कोई काम पर रखे नहीं, कोई माता पिता इस अभिशाप को साथ रखने को राजी नहीं, कोई नौकरी नहीं, कोई पढ़ाई नहीं, बेचारा मनुष्य जिए भी तो कैसे? कैसे देह से परे हो, फिर भी जीता है एक किन्नर|”2 ‘पन्ना बा’ कहानी केवल किन्नर व्यथा को गढ़ती ही नहीं बल्कि वह मानव के मन-मस्तिष्क पर प्रभाव भी डालती है| संसार में किन्नर को लेकर मान्यताएँ हैं कि उसकी दुआओं में असर होता हैं| “किन्नर की दुआ की कोई होड़ नहीं और उसकी बद्दुआ का कोई तोड़ नहीं|”3 लेकिन विडंबना यह है की समाज केवल उन्हें दुआओं के लिए याद करता है| उन्हें इनसान के रूप में आज भी बहुत कम लोग देखते हैं|

‘नेग’ कहानी किन्नर विमर्श की उल्लेखनीय कहानी है | जो उनके परम्परागत रहन-सहन और विवाहों में उनकी नेग मांगने की कथा पर आधारित है | किन्नरों का किसी के विवाह में या किसी के घर बेटा होने पर नाचना गाना और नेग मांगना आदि का यथार्थ इस कहानी में चित्रित हुआ है| इस कहानी में लड़की होने की विडम्बना को भी दर्शाया गया है | बेटा होने पर किन्नरों को गवाना और नेग देना आदि मान्यताएं भी इसमें प्रकट हुई हैं| लेकिन बेटी होने पर उन्ही किन्नरों को प्रताड़ित किया जाता है| इस प्रकार यह कहानी बेटा-बेटी के भेदभाव के साथ ही साथ किन्नरों की समस्याओं को व्यक्त करती है| “अगर इसके जन्म का नेग नही दे सकते तो इसी को ले जाओ... इसने यह अपराध किया है कि यह लड़की बनकर पैदा हुई है| इसके साथ ऐसा व्यवहार किया जा रहा है जैसे यह खुद मेरी कोख में आ गई |”4 इस तरह समाज में मानव-मानव के साथ भेदभाव कर रहा है | किन्नर समाज इस भेदभाव को मिटाने का प्रयास कर रहा है | वंचित होते हुए भी खुद माँ की ममता से अछुता रह कर, पिता के प्रेम से वंचित, भाई के दुलार से दूर रह कर भी इस तरह के भेदभाव को भूल कर सब को आपस में मिलकर रहने की बात भी किन्नर कहता है| ‘नेग’ कहानी में भी बताया गया है कि किन्नर बेटी के जन्म पर भी ख़ुशी से नाचना चाहता है-“लो चाची.... हमारी तरफ से नेग.... तुम्हारे घर में लक्ष्मी आई है... यह बताने में शर्म कैसी?”5 इस तरह तृतीय लिंग समाज अछूत रह कर भी समाज में उस अछूतेपन को दूर करने का प्रयास कर रहा है| समाज में अपने प्रति हो रहे अत्याचारों, शोषण, हिन-भावनाओं से ग्रसित समाज के प्रति अपने व्यथाओं को वह प्रदर्शित करने की कोशिश कर रहा है|

पूनम पाठक की ‘किन्नर’ कहानी लघु कहानी होते हुए भी महत्वपूर्ण है| यह कहानी एक और किन्नरों के प्रति सभ्य कहलाने वाले समाज की मानसिकता-सोच को उजागर करती है तो दूसरी और किन्नरों की मानवीयता को भी व्यक्त करती है| बस में बैठे किन्नर के बगल वाले सीट पर मानसी बैठना नहीं चाहती| अपनी सीट के बगल में बैठे हुए किन्नर को देखकर कुछ झिझकते हुए वह कंडक्टर को दूसरा सीट मांगती है| सीट न मिलने पर वह खड़ी हो जाती है| लेकिन बस में जब उसे लड़के छेड़ने लगते हैं तब किन्नर ही उसकी रक्षा करता है| बस के बाकी लोग केवल तमाशा देखते हैं| किन्नर मानसी की रक्षा करता है किन्तु तमाशा देखनेवाले उसे अपमानित करते हुए ‘हिजड़ा’ कहते हैं| इसपर मानसी व्यंग्य से कहती है, “हिजड़ा ये नहीं बल्कि आप सभी हो, जो आभी तक सारा तमाशा देख रहे थे, किसी हिंदी फिल्म की तरह| कुछ देर और चलता तो शायद एम.एम.एस. भी बनने लगते, पर मद्द को एक हाथ भी आगे नहीं आता|”6 मानसी को किन्नर देवदूत लगता है| वह नम आंखों से किन्नर को धन्यवाद कहती है| इस प्रकार किन्नरों के प्रति सामाजिक धारणा और किन्नरों की मानवीयता का यथार्थ इस कहानी में चित्रित हुआ है|

किन्नर विमर्श की दृष्टि से श्रीकृष्ण सैनी की ‘हिजड़ा’ एक मार्मिक कहानी है| इसमें किन्नरों की दया, ममता और मानवीयता की अभिव्यक्ति हुई है| किन्नरों की मानसिक पीडाओं को भी इस कहानी में चित्रित किया गया है| कहानी में बस दुर्घटना में राघव और उसकी पत्नी निर्मला की मृत्यु हो जाती है| परिवार में तीन-चार साल का बेटा सुनील एकमात्र सदस्य रह जाता है| राघव के दूर के रिश्ते का भाई सुमेर उनके माकन का दावेदार बन जाता है लेकिन वह सुनील की बात को हमेशा टाल देता है| ऐसे में रजिया जो की एक हिजड़ा है यह जिम्मेदारी खुद लेती है| निर्मला से अपनापन होने के कारण रजिया सुनील का सारा भार अपने ऊपर लेती है| सुनील पढ़-लिखकर बढ़ा अधिकारी बन जाता है| सभ्य कहलाने वाले समाज की आलोचना से सुनील को बचाने की लिए रजिया अपनी पहचान छिपाकर रखने के लिए हेडमास्टर को कहती है| अपना खून देकर वह सुनील की जान भी बचाती है| लेकिन विडम्बना यह होती है कि वह अपनी पहचान उजागर नहीं कर सकती| “आखिर इस मानसिक रूप से हिजड़ा हो चुकी दुनिया में वह किस-किस को जवाब देती|”7

इस प्रकार कह सकते हैं कि किन्नर विमर्श अभी अपरिपक्व अवस्था में है| समाज की वैचारिकी अभी इसे स्वीकार करने में हिचक रही है| सुप्रिम कोर्ट की दखल के बाद इस स्थिति में परिवर्तन नजर आ रहा है। किन्नरों को स्वतन्त्र पहचान मिलने के कारण उनमें चेतना निर्माण हो रही है । भारतीय साहित्य की जब बात करते हैं तो हिंदी कथा साहित्य में किन्नर विमर्श की पहल अब तेज हुई है । किन्नरों को लेकर कहानियों का सिलसिला शुरू हो चूका है । इन कहानियों में तमाम कहानियां उनकी मजबूरियों, व्यथाओं, शोषण, पीड़ा और उनसे हो रहे भेदभावों को दर्शाती हैं | किन्नर भी इन्सान ही हैं प्रकृति और समाज द्वारा सताने पर भी मानवीयता उनमें अब भी शेष है| इस मानवीयता के रक्षा की बात ये कहानियां उठती हैं| एक ओर ये कहानियां किन्नर यथार्थ को व्यक्त करती हैं तो दूसरी ओर उनमें आ रही चेतना को। आज हिंदी कहानियों में तृतीय लिंग चिंतन ने एक आंदोलन का रूप लिया है । किन्नरों को प्रमुख धारा में लाने की दृष्टि से इस आंदोलन की निश्चित ही उल्लेखनीय भूमिका रहेगी।

संदर्भ संकेत :

1 ‘पन्ना बा’ – गरिमा संजय दुबे, वांग्मय (त्रैमासिक हिंदी पत्रिका), - संपा. एम. फ़िरोज अहमद, जनवरी-मार्च 2017, पृ. 120

2 वही, पृ. 121

3 वही,

4 नेग- डॉ. लवलेश दत्त, वांग्मय (त्रैमासिक हिंदी पत्रिका), - संपा. एम. फ़िरोज अहमद, जनवरी-मार्च २०१७, पृ. 117

5 वही,

6 किन्नर – पूनम पाठक, वांग्मय (त्रैमासिक हिंदी पत्रिका), - संपा. एम. फ़िरोज अहमद, जनवरी-मार्च 2017, पृ. 149

7 हिजड़ा - श्रीकृष्ण सैनी, (त्रैमासिक हिंदी पत्रिका), - संपा. एम. फ़िरोज अहमद, जनवरी-मार्च 2017, पृ. 124

सहायक ग्रंथ :

1 जनकृति अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका- थर्ड जेंडर विशेषांक –अगस्त २०१६

2 विमर्श का तीसरा पक्ष – विजेंद्र प्रताप / रविकुमार गोंड़

21वीं सदी में अनुवाद की सामाजिक सन्दर्भ

रक्षा कुमारी झा

पी-एच. डी. ( हिन्दी अनुवाद )

मो. नं. – 08130589082

भारतीय भाषा केन्द्र

भाषा, साहित्य और संस्कृति अध्ययन संस्थान

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय


नई दिल्ली-110067

मानव सभ्‍यता के प्रारम्‍भ से ही वि‍चार के आदान-प्रादान के लिए अनुवाद का प्रयोग होने लगा था। वास्तविक अर्थो में 21 वीं सदी में आकर अनुवाद का अर्थ सिर्फ एक भाषा के पाठ को दूसरी भाषा में अनुवाद करना भर नहीं है। विद्वानों द्वारा भले ही अनुवाद का अर्थ सामान्यतया एक भाषा के पाठ को दूसरी भाषा में कहने अथवा लिखने के कार्य को अनुवाद कहा जा रहा है। परन्तु जब हम 21 वीं सदी में अनुवाद के क्षेत्र विस्तार को देखते हैं तो अनुवाद का अर्थ बदल जाता है। भूमण्डलीकरण के इस दौर में अनुवाद का एक विराट रूप हमारे सामने है। आधुनिक युग में जैसे-जैसे स्थान और समय की दूरियाँ कम होती गर्इं वैसे-वैसे द्विभाषिकता में वृद्धि हुर्इ और इसके साथ-साथ अनुवाद में भी। अन्य भाषा-शिक्षण में अनुवाद विधि का प्रयोग न केवल पश्चिमी देशों में वरन् पूर्वी देशों में भी निरन्तर किया जाता रहा है। हम यहाँ जीवन और समाज के कुछ प्रमुख क्षेत्रों में अनुवाद की आवश्यकता, प्रासंगिकता एवं भूमिका की चर्चा करेंगे। इसीलिए हमें अनुवाद के भाषिक और सामाजिक दोनों पक्षों पर बात करने की आवश्यकता है। अनुवाद से जुड़े जीवन के इन पक्षों पर विचार करना बहुत महत्त्वपूर्ण होगा। बहुभाषिक समाज में अनुवाद की आवश्यकता क्या है? राष्ट्रीय सामाजिक विकास में अनुवाद की महत्त्व क्या है? 21 वीं सदी में अनुवाद सांस्कृतिक संवाद आदान-प्रदान में किस तरह अपनी भूमिका निभाता है और कितना हद तक हमारी जीवन में बसा है इसका विश्लेषण करना बहुत महत्त्वपूर्ण है।

विश्व के जिन देशों में विभिन्न जातियों एवं संस्कृतियों का मिलन हुआ है वहाँ सामासिक संस्कृति के निर्माण में अनुवाद की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। अनुवाद की परम्परा के अध्ययन से पता चलता है कि र्इसा के तीन सौ वर्ष पूर्व रोमन लोगों का ग्रीक के लोगों से सम्पर्क हुआ जिसके फलस्वरूप ग्रीक से लैटिन में अनुवाद हुए। इसी प्रकार ग्यारहवीं, बारहवीं शताब्दी में स्पेन के लोग इस्लाम के सम्पर्क में आए और बड़े पैमाने पर यूरपीय भाषाओं में अरबी का अनुवाद हुआ। भारत में भी विभिन्न जातियों एवं मतों के लोग आए। आज की भारतीय संस्कृति जिसे हम सामासिक संस्कृति कहते हैं उसके निर्माण में हजारों वर्षों के विभिन्न धर्मों, मतों एवं विश्वासों की साधना छिपी हुर्इ है। इन सभी मतों एवं विश्वासों को आत्मसात कर जिस भारतीय संस्कृति का निर्माण हुआ है उसके पीछे अनुवाद की महत्त्वपूर्ण भूमिका असंदिग्ध है।

विश्व में द्रुतगति से हो रहे विज्ञान और तकनीकी तथा साहित्य, धर्म-दर्शन, अर्थशास्त्र आदि ज्ञान-विज्ञानों में विकास ने अनुवाद की आश्वयकता को बहुत अधिक बढ़ावा दिया है। यह सत्य है कि प्राचीनकाल से लेकर अब तक अनुवाद ने कई मंजिलें तय की हैं । मगर, यह भी उतना ही सत्य है कि 21वीं सदी में जो अनुवाद को गति मिली है, वह अभूतपूर्व है। परन्तु अनुवाद की आवश्यकता हर युग में, हर काल में तथा हर स्थान पर अनुभव की जाती रही है।

उत्तर-आधुनिक युग में अनुवाद की महत्ता व उपादेयता को विश्वभर में स्वीकारा जा चुका है। वैदिक युग के ‘पुन: कथन’ से लेकर आज के ‘ट्रांसलेशन’ तक आते-आते अनुवाद अपने स्वरूप और अर्थ में बदलाव लाने के साथ-साथ अपने बहुमुखी व बहुआयामी प्रयोजन को सिद्ध कर चुका है। प्राचीन काल में ‘स्वांत: सुखाय’ माना जाने वाला अनुवाद कर्म आज संगठित व्यवसाय का मुख्य आधार बन गया है। दूसरे शब्दों में कहें तो अनुवाद प्राचीन काल की व्यक्ति परिधि से निकलकर आधुनिक युग की समष्टि परिधि में समा गया है। आज विश्वभर में अनुवाद की आवश्यकता जीवन के हर क्षेत्र में किसी-न-किसी रूप में अवश्य महसूस की जा रही है। और इस तरह अनुवाद आज के जीवन की अनिवार्य आवश्यकता बन गया है।

21वीं शताब्दी के मौजूदा दौर में अनुवाद एक अनिवार्य आवश्यकता बन गया है। आज जब सारा विश्व सामाजिक पुनव्र्यवस्था पर एक नये सिरे से विचार कर रहा है और व्यक्ति तथा समाज को एक नव्य स्वतंत्र दृष्टि मिली है वहीं हम भी व्यक्ति और देश को विश्व के परिप्रेक्ष्य में देखने-समझने का प्रयत्न कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में अनुवाद का महत्त्व और भी बढ़ जाता है। मौजूदा शताब्दी में अनुवाद ने साहित्यिक परिधि को लाँघकर संस्कृति, कला, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, तकनीकी, चिकित्सा, प्रशासन, अनुसंधान, पत्रकारिता, जनसंचार, दूरस्थ शिक्षा, प्रतिरक्षा, विधि, व्यवसाय आदि हर क्षेत्र में प्रवेश कर यह साबित कर दिया है कि अनुवाद 21 वीं सदी की अनिवार्यता है। विश्व के विभिन्न प्रदेशों की जनता के बीच अंत:संप्रेषण की प्रक्रिया के रूप में, उनके बीच भावात्मक एकता को कायम रखने में, देश-विदेश के नवीन ज्ञान-विज्ञान, शोध-चिंतन को दुनिया के हर कोने तक ही नहीं, आम जनता तक भी पहुँचाने में तथा दो भिन्न संस्कृतियों को नजदीक लाकर एक सूत्र में पिरोने में अनुवाद की महती भूमिका को नकारा नहीं जा सकता।

अनुवाद आज के व्यावसायिक युग की अपेक्षा ही नहीं अनिवार्यता भी बन गया है। यह एक सेतु है। सांस्कृतिक एकता, परस्पर आदान-प्रदान तथा ‘विश्वकुटुम्बकम्’ के स्वप्न को साकार करने की दृष्टि से अनुवाद की भूमिका उल्लेखनीय रही है। किसी समाज और देश की अभिव्यक्ति भाषा की सीमा के कारण एक क्षेत्र विशेष तक ही सीमित रह जाए और दूसरों तक न पहुँच पाए तो विश्व स्तर पर एक नव्य सामाजिक पुनव्र्यवस्था की बात सार्थक कैसे हो सकती है। अत: इस प्रकार वर्तमान युग में अनुवाद की महत्ता और उपयोगिता केवल भाषा और साहित्य तक ही सीमित नहीं है, वह हमारी सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और राष्ट्रीय एकता का माध्यम है। भाषायी सीमाओं को पार करके भारतीय चिन्तन और साहित्य की सर्जनात्मक चेतना की समरूपता के साथ-साथ, वर्तमान तकनीकी और वैज्ञानिक युग की अपेक्षाओं की पूर्ति करता है। हमारे ज्ञान-विज्ञान के आयामों को देश-विदेश के कोने-कोने तक पहुँचाता है। दूसरे शब्दों में, अनुवाद विश्व-संस्कृति, विश्व-बंधुत्व, एकता और समरसता स्थापित करने का एक ऐसा सेतु है, जिसके माध्यम से विश्व ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में क्षेत्रीयतावाद के संकुचित एवं सीमित दायरे से बाहर निकल कर मानवीय एवं भावात्मक एकता के केन्द्र बिन्दु तक पहुँच सकता है और यही अनुवाद की आवश्यकता और उपयोगिता का सशस्त एवं प्रत्यक्ष प्रमाण है।

वि‍ज्ञान एवं प्रौद्योगि‍की के अवदान, अन्‍तर्राष्‍ट्रीय कूटनीति‍क सम्‍बन्‍धों के प्रयोजन, वि‍श्‍वग्राम की अवधारणा, भूमण्‍डलीकरण की धारणा के वि‍स्‍तार‍, ज्ञान एवं वि‍चार के वैश्‍वि‍क संचार...आदि‍ कारणों से अनुवाद-कर्म का महत्त्‍व प्रबल हुआ है। सरकारी-गैरसरकारी कार्यालयों, संचार माध्‍यमों, पर्यटन, व्‍यापार, शि‍क्षण, प्रकाशन-उद्योग...सभी क्षेत्रों में अनुवादकों की माँग बढ़ी। फलस्‍वरूप वि‍गत वर्षों में अनुवाद की पहचान एक साधन के रूप में हुई। इसके कई कारण हैं--शि‍क्षण, संचार-तन्‍त्र और व्‍यापार के क्षेत्र में बीते तीन दशकों में आए बेशुमार वि‍स्‍तार से अनुवाद का सहयोग अनि‍वार्य हो गया। वि‍ज्ञान के अवदान से इन क्षेत्रों में सम्‍भावनाएँ इतनी बढ़ीं कि‍ ज्ञान, संचार और व्‍यापार के छोटे-छोटे अंशों में वि‍शेषज्ञता की आवश्‍यकता होने लगी। मनुष्‍य की यही आवश्‍यकता कभी अनुवाद के आवि‍ष्‍कार 21 वीं सदी में जननी बन गई है। अनुवाद की उपयोगि‍ता आज इतनी बढ़ गई है कि अनुवाद के सहारे ही पूरा बाजार खूब चमकता नजर आ रहा है। इस दौर में जीवन-व्‍यवस्‍था और समाज-व्‍यवस्‍था की कोई भी शाखा अनुवाद के अवदान से मुक्‍त नहीं है। अनुवाद के बि‍ना शोध, शि‍क्षण, ज्ञानार्जन का सम्‍पूर्ण क्षेत्र वि‍कल होता दि‍खता; नवसंचार-तन्‍त्र की साँसें उखड़ी हुई दि‍खती हैं; व्‍यापार एवं प्रकाशन-उद्योग अपाहीज नजर आते हैं, सारे व्‍यापारी पि‍छड़े हुए मिलते हैं; अन्‍तर्राष्‍ट्रीय राजनीति‍क-व्‍यापारि‍क सम्‍बन्‍धों का कोई अस्‍ति‍त्‍व नहीं होता है; पर्यटन-व्‍यपार विफल हो जाता है ।...पर वि‍डम्‍बना यह है कि‍ अनुवाद कार्य के लिए अधि‍कांश लोगों की नजर में अनुवाद की इस महती गरि‍मा का कोई मूल्‍य नहीं है। ये लोग अनुवाद को रौंदते नजर आते हैं। ऐसे लोगों के लिए अनुवाद से उनका, प्राथमि‍क और एक मात्र लक्ष्‍य पैसा कमाना होता है। अनुवाद-कर्म के लिए उनकी नजर में अलग से कोई मूल्‍य नहीं होता बल्कि बाजार के एक वस्तु के सामान होता है।

आज इस दौर में हर अनुवादक को सचेत रहने की जरूरत है कि‍ वे अनुवाद करते क्‍यों हैं? उनका उद्देश्‍य केवल पैसा कमाना है, या इस कर्म का कोई उपलब्द्धी भी है? मानव-सभ्‍यता के प्रचीन दौर से अब तक के व्‍यवस्‍था-संचालन में अनुवाद की भूमि‍का क्या रही है उसपर नजर दौराने की जरूरत है। कभी हमें खुद ही सोचना चाहिए कि कार्यालयी अनुवाद हो, तकनीकी अनुवाद हो, साहि‍त्‍यि‍क अनुवाद हो, ज्ञानात्‍मक साहि‍त्‍य का अनुवाद हो ऐसे अनुवादों का प्रयोजन क्‍या है। इस पूरी प्रक्रि‍या में कि‍सी भी रूप में बस पैसा कमाना मूल उद्देश्‍य नहीं होना चाहिए।

21 वीं सदी में राष्‍ट्र के गरि‍मा संरक्षण में अनुवाद की भूमि‍का पर गम्‍भीरतापूर्वक वि‍चार करना हर व्यक्ति का कर्तव्‍य होना चाहि‍ए। वैश्‍वि‍क स्‍पर्द्धा के मद्देनजर इसकी बड़ी जरूरत है। इसे राष्‍ट्रप्रेम की प्राथमि‍‍क पहचान के रूप में देखा जाना चाहि‍ए। आज के समय में राष्‍ट्रोत्‍थान हेतु पुस्तकालय, ई-गवर्नेन्‍स, वि‍भि‍न्‍न भाषाओं में अनुवाद , एवं भारत के राष्ट्रीय पोर्टल को प्रोन्‍नत करने के लिए अनुवाद कि आवश्यकता प्रमुख है। जि‍म्‍मेदार अनुवादकीय दक्षता के बि‍ना आज कोई भी राष्‍ट्र ज्ञानात्‍मक उत्‍थान की ओर कदम नहीं रख सकता, अपने चि‍न्‍तन-स्रोतों को समृद्ध नहीं कर सकता, शैक्षि‍क संस्‍थानों का उदग्र वि‍कास नहीं कर सकता। लि‍हाजा वैश्‍वि‍क स्‍पर्द्धा में डटकर खड़े होने के लि‍ए अनुवाद अपरि‍हार्य है। इस समय अनुवाद-उद्यम राष्‍ट्रीय गरि‍मा का सबल स्‍तम्‍भ है। भारत जैसे बहुसांस्‍कृति‍क और बहुभाषि‍क राष्‍ट्र में 'अनेकता में एकता' का सूत्र अनुवाद ही स्‍थापि‍त कर सकता है। धर्म के प्रचार, वि‍चारों की यात्रा, राज-सत्ता के सफल संचालन, ज्ञान के वि‍कास, सांस्‍कृति‍क आदान-प्रदान, अन्‍तर्राष्‍ट्रीय सम्‍बन्‍ध...मानव जीवन के हर प्रसंग की आधारभूमि‍ के रूप में आज अनुवाद की ओर नजर जाती है।

सभ्‍यता के वि‍कास काल से ही वि‍चार एवं वस्‍तु के वि‍नि‍मय हेतु अनुवाद वि‍भि‍न्‍न रूपों में मानव-जीवन का सहचर बना हुआ है। आगे चलकर यह वि‍नि‍मय अनुवाद व्‍यापार का अंग बना; धर्म एवं मत के प्रचार, राज-सत्ता संचालन, ज्ञान के वि‍कास-प्रचार, अन्‍तर्राष्‍ट्रीय कूटनीति‍क सम्‍बन्‍ध...कई दि‍शाओं में इसकी अनि‍वार्य भागीदारी हुई। 21 वीं सदी के आते-आते तो यह मानव-जीवन के साँस-साँस आधार बन गया। आज के समय में अनुवाद के बि‍ना तो इस वि‍श्‍व-साहि‍त्‍य की अवधारणा ही असम्‍भव है। स्‍पष्‍टत: इसकी वैश्‍वि‍क महत्ता सर्वमान्‍य है।

भारत जैसे विशाल राष्ट्र की एकता के प्रसंग मे अनुवाद की आवश्यकता असंदिग्ध है। भारत में विभिन्न विश्वासों एवं सम्प्रदायों के लोग रहते हैं जिनकी भाषाएँ एंव बोलियाँ एक दूसरे से भिन्न हैं। भारत की अनेकता में एकता इन्हीं अर्थों में है कि विभिन्न भाषाओं, विभिन्न जातियों, विभिन्न सम्प्रदायों एवं विभिन्न विश्वासों के देश में भावात्मक एवं राष्ट्रीय एकता कहीं भी बाधित नहीं होती। भारतीय भाषाओं के बीच अनुवाद की आवश्यकता है या नहीं? यह प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण है। भारत बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक राष्ट्र है। भारत कई दृष्टियों से विचित्रताओं का एक अजायबघर समझा जाता है। इस विचित्रता का एक धोतक तत्त्व भाषा भी है। भारत जैसे बहुभाषी देश में अनुवाद की उपादेयता स्वयं सिद्ध है। भारत के विभिन्न प्रदेशों के साहित्य में निहित मूलभूत एकता के स्वरूप को निखारने के लिए अनुवाद ही एक मात्र अचूक साधन है। इस तरह अनुवाद द्वारा मानव की एकता को रोकनेवाली भौगोलिक और भाषायी दीवारों को ढहाकर विश्वमैत्री को और सुदृढ़ बना सकते हैं।

यहाँ प्राचीन काल से ही बहुत सारी भाषाओं का उपयोग होता रहा है। परंतु भाषा की विविधता होने के बावजूद देश को तनिक भी सांस्कृतिक नुकसान नहीं हुआ है। भारत की यह बहुभाषिकता एक शक्ति के रूप में अपनी पहचान सदियों से बनाए हुए है। भारतीय भाषाओं और साहित्य में परस्पर अनुवाद से भारत की वास्तविक तस्वीर मिल जाती है। इतना ही नहीं विभिन्न भारतीय भाषाओं में चिकित्सा, वाणिज्य-व्यपार, विज्ञान, औधोगिकी आदि विभिन्न विषयों और क्षेत्रों में अनुसंधान और शोध कार्य हो रहे हैं, उसमें अनुवाद की अत्यंत आवश्यकता है। भारत में जनसंचार के क्षेत्र अर्थात पत्रकारिकता, रेडियों, दूरदर्शन आदि से उपलब्धि हो रही है, उसमें अनुवाद की विशेष भूमिका रही है और आज भी उसकी आवश्यकता भारतीय सभी भाषाओं में है। भाषिक दृष्टि से बहुभाषिक समाज की जरूरतों को समझते हुए केंद्रिय भाषा के विकास के साथ-साथ बहुभाषिकता को महत्त्व देते हुए हमारी सांस्कृतिक तथा जातीय अभिव्यक्ति का प्रसार जरूरी है। हिंदी और अन्य भाषाओं के बीच का संबंध राजनीतिक नहीं सांस्कृतिक होने पर भाषा से जुड़ी समस्याओं की गुत्थियाँ सुलझ सकेंगी।

अन्तर्राष्ट्रीय साहित्य के अनुवाद से ही यह तथ्य प्रकाश में आया कि दुनिया के विभिन्न भाषाओं में लिखे गए साहित्य में ज्ञान का विपुल भण्डार छिपा हुआ है। भारत में अन्तर्राष्ट्रीय साहित्य का अनुवाद तो भारत में सूफियों के दार्शनिक सिद्धान्तों के प्रचलन के साथ ही शुरू हो गया था; किन्तु इसे व्यवस्थित स्वरूप आधुनिक युग में ही प्राप्त हुआ। शेक्सपियर, डी.एच. लॉरेंस, मोपासाँ तथा सार्त्र जैसे चिन्तकों की रचनाओं के अनुवाद से भारतीय जनमानस का साक्षात्कार हुआ। दुनिया के विभिन्न भाषाओं के अनुवाद द्वारा ही तुलनात्मक साहित्य के अध्ययन में सहायता मिलती है। तुलनात्मक साहित्य द्वारा इस बात का पता लगाया जाता है कि देश, काल और समय की भिन्नता के बावजूद विभिन्न भाषाओं के रचनाकारों के साहित्य में साम्य और वैषम्य क्यों है ? अनुवाद के द्वारा ही जो तुलनीय है वह तुलनात्मक अध्ययन का विषय बनता है। किसी भी देश के साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन अनुवाद के फलस्वरूप ही सम्भव हो सका।

वर्तमान युग में अनुवाद ज्ञान की ऐसी शाखा के रूप में विकसित हुआ है जहाँ इज्जत, शोहरत एवं पैसा तीनों हैं। आज अनुवादक दूसरे दर्जे का साहित्यकार नहीं बल्कि उसकी अपनी मौलिक पहचान है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में तेजी से हुए विकास के साथ भारतीय परिदृश्य में कृषि, उद्योग, चिकित्सा, अभियान्त्रिकी और व्यापार के क्षेत्र में क्रान्तिकारी परिवर्तन हुआ है। इन क्षेत्रों में प्रयुक्त तकनीकी शब्दावली का भारतीयकरण कर इन्हें लोकोन्मुख करने में अनुवाद की महत्त्वपूर्ण भूमिका है।

21वीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध रोजगार के क्षेत्र में अनुवाद को महत्त्वपूर्ण पद पर आसीन करता है। संविधान में हिन्दी को राजभाषा का दर्जा दिए जाने के पश्चात् केन्द्र सरकार के कार्यालयों, सार्वजनिक उपक्रमों, संस्थानों और प्रतिष्ठानों में राजभाषा प्रभाग की स्थापना हुर्इ जहाँ अनुवाद कार्य में प्रशिक्षित हिन्दी अनुवादक एवं हिन्दी अधिकारी कार्य करते हैं। आज रोजगार के क्षेत्र में अनुवाद सबसे आगे है। प्रति सप्ताह अनुवाद से सम्बन्धित जितने पद यहाँ विज्ञापित होते हैं अन्य किसी भी क्षेत्र में नहीं।

औद्योगीकरण एवं जनसंचार के माध्यमों में हुए अत्याधुनिक विकास ने विश्व की दिशा ही बदल दी है। औद्योगिक उत्पादन, वितरण तथा आर्थिक नियन्त्रण की विभिन्न प्रणालियों पर पूरे विश्व में अनुसंधान हो रहा है। नर्इ खोज और नर्इ तकनीक का विकास कर पूरे विश्व में औद्योगिक क्रान्ति मची हुर्इ है। इस क्षेत्र में होने वाले अद्यतन विकास को विभिन्न भाषा-भाषी राष्ट्रों तक पहुँचाने में भाषा एवं अनुवाद की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। वैज्ञानिक अनुसंधानों को तीव्र गति से पूरे विश्व में पहुँचा देने का श्रेय नव्यतम विकसित जनसंचार के माध्यमों को है। आज विज्ञान, प्रौद्योगिकी, चिकित्सा, कृषि तथा व्यवसाय आदि सभी क्षेत्रों में जो कुछ भी नया होता है वह कुछ ही पलों में टेलीफोन, टेलेक्स तथा फैक्स जैसी तकनीकों के माध्यम से पूरे विश्व में प्रचारित एवं प्रसारित हो जाता है। आज जनसंचार के माध्यमों में होने वाले विकास ने हिन्दी भाषा के प्रयुक्ति-क्षेत्रों को विस्तृत कर दिया है। विज्ञान, व्यवसाय, खेलकूद एवं विज्ञापनों की अपनी अलग शब्दावली हैं। संचार माध्यमों में गतिशीलता बढ़ाने का कार्य अनुवाद द्वारा ही सम्भव हो सका है तथा गाँव से लेकर महानगरों तक जो भी अद्यतन सूचनाएँ हैं वे अनुवाद के माध्यम से एक साथ सबों तक पहुँच रही हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि अनुवाद ने आज पूरे विश्व को एक सूत्र में पिरो दिया है।

बीसवीं शताब्दी के अवसान और इक्कीसवीं सदी के स्वागत के बीच आज जीवन का कोर्इ भी ऐसा क्षेत्र नहीं है जहाँ पर हम चिन्तन और व्यवहार के स्तर पर अनुवाद के आग्रही न हों। विश्व के अन्य देशों के साथ भारत के आर्थिक एवं राजनीतिक समीकरण बदले। राजनैतिक और आर्थिक कारणों के साथ विज्ञान एवं प्रोद्यौगिकी का विकास भी इस युग की प्रमुख घटना है जिसके फलस्वरूप विभिन्न भाषा-भाषी समुदायों में सम्पर्क की स्थिति उभर कर सामने आयी। आज विश्व के अधिकांश बड़े देशों में एक प्रमुख भाषा के साथ-साथ अन्य कर्इ भाषाएँ भी गौण भाषा के रूप में समान्तर चल रही हैं। अतएव एक ही भौगोलिक सीमा की राजनैतिक, प्रशासनिक इकार्इ के अन्तर्गत भाषायी बहुसंख्यक भी रहते हैं और भाषायी अल्पसंख्यक भी।

अत: विभिन्न भाषाभाषियों के बीच उन्हीं की अपनी भाषा में सम्पर्क स्थापित कर लोकतंत्र में सबकी हिस्सेदारी सुनिश्चित की जा सकती है। वस्तुत: अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न देशों के बीच राजनैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में बढ़ती हुर्इ आदान-प्रदान की अनिवार्यता ने अनुवाद एवं अनुवाद कार्य के महत्त्व को बढ़ा दिया है।

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21 वीं सदी में बहुसंख्यक समाज का सामाजिक यथार्थ

डॉ. बलवीर सिंह ‘राना’

विजिटिंग प्रोफेसर,

हिंदी विभाग,

स्कूल ऑफ़ एशियन एंड अफ्रीकन स्टडीज़,

बीजिंग फॉरेन स्टडीज़ विश्वविद्यालय,

बीजिंग (चीन) 100089,

ईमेल –bsingh.2015@yahoo.in


balveersingh@bfsu.edu.cn

भारतीय इतिहास में सामाजिक एवं सांस्कृतिक संगम का उदय भक्ति आन्दोलन ही है। इस भक्ति आन्दोलन ने मानवीय धर्म और संस्कृति प्रदान की थी तथा इसमें लोक-धर्म जनमानस की आशाओं, आकांक्षाओं एवं संघर्ष को दर्शाता है तथा वह जनमानस की आस्था में मानवीय गुण पैदा करता है। बल्कि भक्ति आन्दोलन ने सदियों से बहुसंख्यक पीड़ित आमजन को जाति-पाँति, ऊंच-नीच का भेदभाव, धार्मिक रूढ़ियों और अत्याचारों से मुक्ति दिलायी थी तथा इस युग के संत कवियों में नामदेव, संत कबीर, रविदास, दादू, शेख फरीद, गुरु नानक देव और जायसी आदि ने अपनी वाणी से सर्वहारा वर्ग को आत्मसात कर लिया था इसलिए इन संत कवियों की वाणी में धार्मिक और सामाजिक परिवर्तन के स्वर भी दिखाई पड़ते हैं। लेकिन संत कबीर अनपढ़ होते हुए भी वे सामंती और मुस्लिम समाज दोनों पर तीखे प्रहार करते हैं। बल्कि इस वैज्ञानिक युग में सदियों से हाशिये पर रहे बहुसंख्यक समाज को नए विकास और परिवर्तनों की प्ररेणा मिली है।

अबलि अलह नूर उपाईआ, कुदरति के सभ बंदे ।।

ईक नूर ते सभु जगु उपजिआ, कउन भले को मंदे ।।1

संत कबीर ने बताया कि सारा संसार ही एक परमात्मा के नूर से पैदा हुआ है। सभी उस कुदरत के बंदे हैं, जो सारी सृष्टि में व्यापत है। ईश्वर की दृष्टि में न कोई अछूत है, उस परमपिता ने सबको समान आसन पर बैठाया है। यह धरती ही सबका आसन है तथा यह सभी को पाल-पोसकर बड़ा करती है। तब हिन्दू और मुसलमान में ऊंच–नीच कहाँ से पैदा हो गये। इसलिए सभी को सत्य पर विश्वास करना चाहिए तभी उस जीव का मन निर्मल हो सकता है।

इस देश की सुंदर प्राकृतिक पर हिंसा, अत्याचार और अत्यधिक जुल्म नहीं होते तो इस देश के मानव समाज ने जितनी प्रगति की है उससे भी अधिक प्रगति हुई होती। बल्कि आज के सामाजिक परिवर्तन में संतों, सूफियों एवं कवियों की प्रासंगिकता भी बहुत आवश्यक है। इस आधुनिक युग के साथ उदारवादी परम्पराओं का विकास हुआ है, जिससे एक नई संस्कृति का विकास हुआ है यह विरासत और संस्कृति हमें अत्यंत प्रासंगिक है। लेकिन इस समय समाज में मूलभूत परिवर्तन राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक एवं समानता आदि भी प्रमुख हैं।

भक्ति कवियों की मूल चिंतन धारा में मनुष्य की श्रेष्ठता कर्म प्रधान है, उस समय व्यापारी और दस्तकारी की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। इन संत कवियों ने बहुसंख्यक पीड़ित समाज को भक्ति और सामाजिक समानता के अधिकार दिलाने में भरसक प्रयास किए हैं इसलिए इन संतों ने लोक भाषा को ही साहित्यक भाषा का स्वरूप दिया है। इस देश में मुगल शासन हो जाने पर हिन्दू जनमानस के ह्रदय में गौरव और उत्साह सभी नष्ट हो गए थे इसलिए उन्होंने धर्म और साहित्य का दृष्टिकोण ही बदल दिया था, क्योंकि उनके मूल में धन लूटना, धार्मिक स्थानों को ध्वस्त करना, नारियों के सतीत्व को भ्रष्ट करना और इस्लाम धर्म को स्वीकार करना मुख्य स्वरूप था। 2

भक्ति आंदोलन के आरंभ में सामंती एवं मुगल शासकों के अत्याचारों से बहुसंख्यक समाज अत्यधिक पीड़ित था उनके सामने ही देव मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई जा रही थी। अंत में मुस्लिम साम्राज्य दूर तक फैल गया परंतु हिन्दू शासक परास्त होने से उन पर बहुत दिनों तक उदासी छायी रही, इसके बाद संत कवियों ने बहुसंख्यक समाज में भक्ति भाव एवं सामाजिक एकता पर बल दिया था तथा उस समय भारत के भिन्न-भिन्न प्रदेशों के भक्त कवियों ने अपनी मधुर वाणी से बहुसंख्यक समाज के ह्रदय को सींचते रहें, जिससे एक नया वातावरण विकसित हुआ तब उन्होंने समाज में निर्गुण आस्था को पुर्नजीवित किया है। बल्कि भक्ति आंदोलन के दुवारा ही निर्गुण भक्ति का विकास हुआ है। संत कबीर भी निर्गुण ब्रह्मा के उपासक थे क्योंकि उनकी वाणी में कठोरता एवं कर्कशता दिखाई पड़ती है। इसलिए उन्होंने अपने निर्गुण ब्रह्मा स्वरूप परमात्मा का वास प्रत्येक जीव में समाया माना है जबकि प्रत्येक जीव की निर्मम हत्या को सबसे बड़ा अपराध बताया कि -

हर जीव में एक खुदाय रे, तो मुर्गी क्यों मारे रे ।।3

संत कबीर ने अपने निर्गुण ब्रह्मा के स्वरूप को सारी सृष्टि में व्यापत मानते हैं इसलिए उनके परमेश्वर राम अदृश्य होकर भी कण-कण में समाया हुआ मानते थे -

एक राम था दशरथ का बेटा ।

एक राम ने जगत पसारा ।।

एक राम जो जग से न्यारा ।

एक राम घट-घट में बैठा ।।4

संत कबीर के राम राजा दशरथ के घर में अवतरित नहीं हुए हैं। उनके परमेश्वर रूपी राम सम्पूर्ण जगत में व्यापत होने वाले इनसे अधिक अगम, अगोचर हैं। इसलिए वे उस परमात्मा को सृष्टि के घट-घट में समाया हुआ मानते थे |

सूफी कवियों ने सृष्टि और मनुष्य के उदात्त जीवन के लिए प्रेम अत्यंत आवश्यक मान लिया है। सूफी कवि जायसी की नागमती में अवध की लोक संस्कृति बोलती प्रतीत होती है। जबकि माना कि नागमती अवध प्रांत के किसी गाँव की ही है, यह उनकी लोक वेदना ही है। बल्कि जायसी जन आंदोलन बनाने के लिए अपने मानवीय प्रेम से हिन्दू-मुसलमानों को समीप लाना चाहते थे।5 इसलिए इन सभी संतों की वाणी में मानव जीवन के सुख, समृद्धि और समरसत्ता के स्वर दिखाई देते हैं। ये संत कवि किसी धर्म संप्रदाय के विरुद्ध नहीं थे, बल्कि ये बहुसंख्यक पीड़ित, वंचित समाज की समानता का सम्मान दिलाना चाहते थे।

इस देश में राष्ट्रवाद की प्रखर ज्योति कभी तीव्रता से तो कभी धीमी गति से सदैव जलती रहती है तथा इस देश की भूमि प्रखर राष्ट्रवादियों की जननी भी रही है। जिसमें छत्रपति शिवाजी, गुरु गोविन्द सिंह, महाराणा प्रताप, स्वामी विवेकानंद, महर्षि अरबिंद, राजगुरु, सुखदेव, भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, सरदार उधम सिंह और न जाने कितने ऐसे महापुरुषों की जननी रही है। जिन्होंने भारत को राष्ट्रवाद की नवीन चेतना प्रदान की है। लेकिन आज मानवतावादी विचार मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने वाली महान परम्पराओं को राजनीति की सत्ता उसे बहुल्य समाज को फिर से अंधेरे में ले जाने में प्रयत्नशील है तथा वे आज मनुष्य के जीवन को सांप्रदायिकता एवं संवेदनशील क्षेत्रों में प्रवेश करा रही हैं। जबकि जनमानस में धर्म निरपेक्षता का सिद्धान्त आज भी प्रासंगिक रूप से मौजूद है।

भारत में स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान हिन्दू-मुसलमान दोनों एक साथ मिलकर आगे बढ़ रहे थे क्योंकि इस देश में वीर एवं तपस्वी पुरुषों के बलिदान एवं त्याग की कथाएँ प्रचलित हैं और इससे समाज को देश के लिए बलिदान एवं त्याग की प्ररेणा मिलती है। लेकिन समकालीन समाज का मुख्य उद्देश्य स्वतन्त्रता प्राप्त करना था। परंतु ब्रिट्रिश शासन ने फारसी और ऊर्दू भाषा को हिन्दी भाषा से अधिक महत्व दिया था तथा उन्होंने काम-काज की भाषा को फारसी मिश्रित ऊर्दू रखी थी। इसलिए उस समय बहुसंख्यक हिन्दू जनमानस फारसी सीखने को विवश था। जब कोई भाषा अनेक समुदायों की भाषा के रूप में विकसित होती है तब वह किसी एक की भाषा न होकर जनभाषा होती है। बल्कि ब्रिट्रिश सरकार ने इन भाषाओं के आधार पर दोनों समुदाय के लोगों को तोड़ने का काम किया, जिससे दोनों समुदाय के लोगों में सदभावना का अभाव होता चला गया जिससे दोनों समुदाय के लोगों में परम्परागत दूरियाँ बढ़ती चली गयी।6

इस देश को स्वतन्त्र होने पर एक धर्म-निरपेक्षता की अवधारणा जागृति हुई है लेकिन आज भी भारतीय समाज में अनेक प्रकार की विकृतियाँ दिखाई पड़ती हैं तथा धर्म-निरपेक्षता हमारी संस्कृति की मूल धारा है। जबकि भक्ति आन्दोलन की इस विरासत ने राजाराम मोहन राय, स्वामी विवेकानंद, बाल गंगाधर तिलक, मोलाना अब्दुल कलाम आजाद, डॉ. भीमराव अम्बेडकर, जवाहर लाल नेहरू और महात्मा गांधी आदि सभी को प्रभावित किया है, क्योंकि इन्होंने भी इन संत कवियों के विचारों को ही आत्मसात कर लिया होगा। जिससे डॉ. भीमराव अंबेडकर ने भारतीय संविधान में धर्म-निरपेक्षता एवं एकता को दर्शाया है लेकिन उसके अनुरूप आज भी भारतीय समाज में मानव जाति एक दूसरे के परस्पर विरोधी हैं। इसे दूर करने के लिए सबसे पहले प्रत्येक मनुष्य से मानवीय प्रेम, भाई-चारा और एकता के भाव पैदा नहीं होगें तथा हर भारतीय समाज में आर्थिक अर्थ-व्यवस्था, राजनीतिक और सांस्कृतिक समानता के विचार पैदा करने चाहिए। परन्तु इस आधुनिक युग में भारत की सभी राजनीतिक पार्टियाँ अपने वोट बैंक के लिए सभी को समानता दर्शाती है, लेकिन आज भारत की सबसे भयानक शिक्षा प्रणाली ही है जिसमें आमजन को अभी तक एक जैसी शिक्षा व्यवस्था और रोजगारपरख शिक्षा उपलब्ध नहीं हो पाई है क्योंकि देश को आजाद हुए 71 साल से अधिक समय होने पर अभी तक भारतीय संविधान के अनुरूप कार्य नहीं किया जा रहा है, बल्कि भारतीय राजनीति में सबसे भयंकर रचना जातीय द्वेष फैला हुआ है जो अपने लाभ के लिए समानता और आरक्षण को सुलभ करने में असमर्थ हो जाती है| जब तक भारत के संविधान के अनुरूप सभी वर्ग को एक जैसी शिक्षा प्रणाली, सभी को आर्थिक समानता और जातीय द्वेष में ऊँच-नीच का भेदभाव को मिटाना बहुत जरुरी है| लेकिन सभी राजनीतिक दल सत्ता की खातिर आमजन को लुभाने का प्रयत्न करते रहते हैं क्योंकि आज भी बहुसंख्यक समाज उनके पिछलगू लगा रहता है जो बहुसंख्यक समाज की समानता, जातीय द्वेष के कारण पदोंउन्नति या बराबरी का हक़ आज ऐसे शिक्षित समाज में मिलना दुश्वार हो रहा है, बल्कि आज भी सामंती विचारधारों वाले मनुष्य उन रुढ़िवादी परम्पराओं की खातिर सभी को भूलकर अपने लाभ के लिए जातीय द्वेष और मतभेद फैलाते जा रहे हैं।

आज भारत इक्कीसवीं सदी में प्रवेश कर चुका है लेकिन भारत के राजनेता अपने स्वार्थी लाभ से वैश्विकरण के अनुरूप ध्यान से भटक रहे हैं| क्योंकि इस देश की बढ़ती जनसँख्या के साथ भ्रष्ट्राचार और भाई-भतीजावाद तेजी से बढ़ जा रहा है लेकिन उसके अनुरूप अर्थ-व्यवस्था तेजी से घट रही है| जबकि भारतीय राजनीति में महात्मा गाँधी, डॉ. भीमराव अम्बेडकर और सरदार पटेल जैसे नेताओं ने भूखे-गरीबों व् दीन-दुखियों के उद्दार करने के लिए प्रेरित किया था उन्होंने आत्म संयम से ग्राम-राज्य सत्ता के विकेंद्रीकरण पर बल दिया था तथा भारत के जनमानस को सर्व-कल्याण का समर्थन किया था| बल्कि आज भारतीय राजनीति में समाज-व्यवस्था का विकास करना तो बहुत दूर हो गया है| परन्तु आज भारतीय जनमानस आदमी-आदमी के बीच समानता की आवश्यकता महसूस कर रहा है इसलिए भारतीय समाज में असमानताओं के लिए आज जन संघर्ष हो रहे हैं |

डॉ. भीमराव अम्बेडकर भारतीय राजनीति में मानवतावादी, सामाजिक न्याय के संघर्षशील मसीहा थे| उन्होंने बहुसंख्यक समाज के लिए सामाजिक और राजनीतिक न्याय के संघर्ष किया था| परन्तु इस आधुनिक युग में संवैधानिक व्यवस्था के बाद भी दलितों के उत्पीड़न का दौर जारी है तथा हमारे इस बहुसंख्यक समाज में एक-दूसरे से द्वेष की भावना ज्यादा ताकतवर होती जा रही है| इसलिए संवैधानिक व्यवस्था से तीखी टकराहट दिखाई देती है जो दलित प्रतिरोध को दमित करने का मनुवादी तरीका अपनाते हैं जो प्रत्येक समाज की अभिव्यक्ति के अधिकारों का हनन माना जाता है |

इस आधुनिक युग में डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने सामंती समाज के शोषण, अत्याचारों एवं घृणा के विरुद्ध संघर्ष किया तथा वे सदियों से उपेक्षित, पीड़ित,अन्याय और गरीब समाज को समानता दिलाना चाहते थे। क्योंकि उन्होंने भी बचपन में जातीय दंश और ऊंच-नीच के भेदभाव को झेला था|7 आज बहुसंख्यक समाज प्रतिरोध के रूप में खड़ा दिखाई देता है जबकि सामंती समाज की आज भी वैसी ही मानसिकता मौजूद है जो बहुसंख्यक समाज को समानता के अवसर प्राप्ति के विरोध में दिखाई देती है| बल्कि संविधान के अनुसार सभी धर्म और सर्व समाज में एकता दर्शाया है बल्कि इस राजनीतिक एकता से ज्यादा जरुरी सामाजिक एकता है| फिर भी इस देश में दलित उत्पीड़न आमबात हो गई है इसलिए अब जन-आन्दोलन ही बहुसंख्यक समाज का अचूक हथियार हो गया है क्योंकि बहुसंख्यक समाज को आरक्षण मिलने से सामंती समाज का नियंत्रण खिसक जाने का खतरा सता रहा है| इसलिए भारतीय राजनीति में आज प्रतिरोध के स्वर भी आमबात हो गई है, यह भारतीय संविधान हमें आत्मविश्वास के साथ संघर्ष के पथ पर अग्रसर होने के लिए उर्जा प्रदान करता है, बल्कि सदियों से पीड़ित समाज, अशिक्षित एवं दरिद्रता के अधेरें में भटकते हुए बहुसंख्यक समाज को रास्ता दर्शाता है|8 परन्तु आज बहुसंख्यक समाज शोषित, वंचित, निरीह और दवे-कुचले लोगों के साथ अपनी आवाज बुलंद करते हैं जबकि यह जन आन्दोलन अपने अधिकारों की निष्पक्ष जाँच करता रहता है |

आज इस देश में अम्बेडकरवादी मानव ने मार्क्सवादी विचारों की तरह से खुलकर बोलना शुरू कर दिया है| लेकिन आज राजनीतिक विकास में धर्म हावी होता जा रहा है बल्कि यह लोकतंत्र के लिए एक भयानक खतरा है क्योंकि ऐसे दल धर्म को ही राजनीतिक हथियार का इस्तेमाल करते रहते हैं जो भारतीय संविधान के अनुरूप नहीं है| बल्कि उन्हें बहुसंख्यक समाज को सर्व-कल्याण की दृष्टि को अपनाना चाहिए जिससे जाति-पांति, धर्म-संप्रदाय, स्त्री-पुरुष, ऊँच-नीच आदि के भेदभाव को मिटाकर समतामूलक कल्याण को बढ़ावा देना चाहिए, जिससे भारतीय जनमानस में परस्पर सहयोग व् सदभावना विकसित होती रहेगी |

संदर्भ ग्रंथ सूची –

1. श्री गुरुग्रंथ साहिब (स.) – पृ. – 1349

2. डॉ. उमेश कुमार सिंह – गुरु नानक देव और संत रविदास का एक तुलनात्मक अध्ययन, पृ. – 35

3. श्री गुरुग्रंथ साहिब (स.) – पृ. – 1230

4. डॉ. महीप सिंह – गुरु नानक से गुरुग्रंथ साहिब तक, पृ. – 131

5. डॉ. कुवरपाल सिंह – भक्ति आन्दोलन और लोक संस्कृति, पृ. – 102

6. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल – हिंदी साहित्य का इतिहास, पृ. – 86

7. डॉ. श्यौराज सिंह बैचेन – दलित दखल, पृ. – 75


8. डॉ. एन. सिंह – दलित साहित्य का प्रतिमान, पृ. – 85

मोबाइल न. +86 –15501071826 (चीन)

+91–7253862559 (भारत)

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^enkZuh* fQYe esa efgykvksa vkSj fo”ks’kdj NksVh mez dh yM+fd;kas ds voS/k O;kikj dh lPpkbZ;ksa ls voxr djkrh gSA enkZuh fQYEk ukjh vfLerk ls tqM+s dbZ iz”uksa dks tUe nsrh gSA D;k ge okLro esa lH; lekt ds vax gSa\ ,slk lekt ftlesa iq#’k oxZ nksgjh ekufldrk dks viuk, gq, vkSjrksa dh [kjhn&Qjks[r ds fo:) dHkh ,dtwV ugha gksrkA enkZuh esa balisDVj dh Hkwfedk esa ,d vkSjr dks j[kk tkuk Hkh de egRoiw.kZ ugha gSA tkackt efgyk balisDVj dh Hkwfedk esa jkuh eq[kthZ us ,dne enkZusHkko ls] lkgl iw.kZ <ax ls vius dRrZO; dk ikyu djrh gS vkSj vius y{; dks ikus esa dke;kc Hkh gksrh gSA ^enkZuh* fQYEk dh vxyh dM+h ds :i esa ^y{eh* fQYEk dks ns[kk tk ldrk gS ftlesa g~;weu Vz~SfQfdaax vkSj ckY; os”oko`fRr dks dsUnz esa j[kk x;k gSA blesa vkSjrksa dh vksj ls ,d csgn laosnu”khy vkSj ekfeZd iz”u mBk;k x;k gS] *D;k ge euq’; gSa\* vFkkZr~ fL=;ka vekuoh; O;ogkj vkSj vkSjr gksus dh =klnh Hkksxrs Hkksxrs os viuk vkRefo”okl [kks pqdh gSa] mudh igpku lekIRk gks xbZ gSA rkRi;Z ;g fd euq’; ds :i esa os vius vfLrRo rd dks lansg dh n`f’V ls ns[kus yxh gSaA ^Yk{eh^ 2014 esa ukxs”k dqdwuqj dh fQYe gSA dukZVd ds ifjn`”; dks izLrqr djrh ;g fQYEk gSA eksukyh 14 o’kZ dh y{eh dh Hkwfedk esa gSA ftls mlds gh firk ds }kjk csp fn;k x;k gS vkSj mls yM+fd;ksa dh rLdjh djus okys O;fDr us /ka/kk djus okyh ds dksBs ij csp fn;kA ftlesa yM+fd;ksa dh rLdjh] yM+fd;ksa dks tcjnLrh os”;ko`fRr dh nyny esa <dsyuk vkSj vusd rjg ls “kks’k.k ds f”kdkj yM+fd;ksa dh dFkk gSA os”;ko`fRr ls eqfDr dh pkg j[kus okyh 14 o’khZ; yM+dh dk fojks/k vkSj izfr”kks/k dh TokykA v”kksd uank dh ^fjokt^+ uked fQYEk lu~ 2011 esas nsonklh izFkk ij vk/kkfjr fQYe gSA jktLFkkuh vkSj xqtjkrh ifjos”k esa gks jgs nsonklh izFkk dks izLrqr djrk ;g fQYEkA bl fQYEk esa nsonklh izFkk dk fojks/k djus ds fy, fL=;ka iwjs xkao rFkk vius ifr;ksa dks Hkh vkx esa >ksad nsrh gS vkSj nsonklh izFkk dk var djrh gSaA

lu~ 2014 esa nks egRoiw.kZ vk;h ,d *Dohu* vkSj nwljh ^gkbZos^ ;s nksuksa gh fQYEksa ,d ubZ dFkk dks izLrqr djrh gSA ,d e/;e oxhZ; yM+dh dks thus dk rjhdk lh[krh gSa vkSj vkRefo”okl] Lora=rk dk vglkl] vfLrRo vkSj vfLerk dh jkg Hkh fn[kkrh gSA ^Dohu* fQYEk esa ,d 24 o’khZ; yM+dh jkuh dh dgkuh gS ftldk fookg gksus okyk gS fdUrq vius nksLrksa ds dgus ij mldk eaxsrj bl fookg ls badkj dj nsrk gSA rr~i”pkr~ og vdsys guhewu ;k=k ij fudyus dk fu.kZ; djrh gSA vkSj ;wjksi ?kwers gq, og vkuafnr gksrh gS] u, nksLr cukrh gSA lkgl] vfLrRo vkSj ubZ Lora=rk gkfly djrh gSA bl fQYEk dh ukf;dk us e/;e oxhZ; yM+fd;ksa dks izsj.kk iznku dh gSA ^jkuh* tSlh vfHkusf=;ka gekjh ukf;dk rHkh curh gS tc og vius liuksa] egRodka{kkvksa vkSj y{;ksa dh ftEesnkjh viuk ysrh gSA jkuh uk dsoy u, ekxZ viukrh gS] cfYd mu ekxksaZ ij vkus okyh dfBukb;ksa ls HkyhHkkafr ifjfpr gksus ds ckotwn ml ij vnE; mRlkg ds lkFk pyrh gSA mlds bl rjg ds mRlkgiw.kZ dk;ksZa esa gh mldk uk;dRo fNik gSA ^Dohu* ukjh vfLEkrk dh ubZ ifjHkk’kk x<+us okyh ,d ,slh fQYe gS tks ;g lans”k nsrh gS fd Bqdjkus dk vf/kdkj flQZ iq#’k dks gh ugha L=h dks Hkh gSA

bErh;kt vyh ds funsZ”ku esa cuh fQYEk ^gkbZos* vigj.kdrkZ vkSj vigj.k gqbZ yM+dh dh dFkk gSA tks ikfjokfjd “kks’k.k dh f”kdkj gS vkSj vius gh ifjokj ls vf/kd og ckgjh O;fDr ds ikl Lo;a dks Lora= vkSj vf/kd lqjf{kr eglwl djrh gSA lkSfed lsu dh fQYe ^xqykc xSax* 2014 esa vk;h ukjh l”kfDrdj.k ij vk/kkfjr fQYe gSA Ckkfydkvksa dh f”k{kk O;oLFkk dks c<+kok nsus rFkk mudh lqfo/kkvkssa ds fy, ekax vkSj vf/kdkj lRrk ls fnyokukA vfHk’ksd pkScs dh 2014 esa ^<sM+ bf”d;k* fQYe esa nks fL=;ksa ek/kqjh nhf{kr vkSj gqek dqjS”kh ds lkgl vkSj prqjkbZ dks fn[kk;k x;k gS tks fd vius prqjkbZ ds cy ij yksxksa dks Nyrh gSaA

2014 esa e/kwj HkaMkjdj dh fQYe ^dys.Mj xyZ* gSA bl fQYe esa Ikakp yM+fd;ka tks vyx vyx izkar ls vkbZ gS ,d okf’kZd dys.Mj ds fy, QksVks”kwV djus ds fy, muds thou ds la?k’kZ vkSj “kks’k.k dh dFkkA Bhd blh rtZ ij cuh 2016 esa cuh fQYe ^n ,xzh bafM;u xksMsl* gSA bl fQYe esa N%&lkr fL=;ksa dh dgkuh gSA tks dbZ o’kksZa ckn ,d nwljs ls feyus ds fy, xksvk ds ikl ,d ?kj esa ,d= gksrh gSaaA lHkh fL=;ksa dh viuh viuh thou “kSyh gS] lHkh vius thou ls cgqr vf/kd [kq”k ugha gSA ;gka ij nks yM+fd;ksa ds yslfc;u fjys”ku”khi dks fn[kk;k x;k gS] tks fd ,d nqljs ls fookg dj jgh gSa vkSj blh fookg esa lHkh L=h nksLr ,d= gq, gSaA ;g yslfc;u fjys”ku”khi ds Åij cus dkuwu vkSj bl fj”rs dks ns[kus ds lkekftd utfj;s dks fn[kk;k x;k gSA Lora=] vktkn] vkfFkZd :i ls laiUu L=h] vk/kqfud fopkjksa okyh vkSj vk/kqfud ifj/kkuksa dks xzg.k djus okyh L=h dks Hkh ;s lekt Lora= :i ls thou thus ugha nsrk gSA iq#’k ekufldrk okys bl lekt esa fL=;ksa ds fy, dgha dksbZ txg ugha gS] uk gh mUgsa LoNan gksdj thus dh vktknh gSA ;g fQYe fL=;ksa ds fofHkUu Nfo;ksa dks izLrqr djrh gS] tks fookfgr gS] tks vfookfgr gS] ukSdjhis”kk L=h vkSj ekWMfyaax djrh L=h vkfn ds ekufld la?k’kZ dks fn[kkrh gqbZ ;g fQYEk gSA

lu~ 2015 esa lwthr ljdkj dh fQYEk ^ihdw* firk vkSj iq=h ds fj”rs dks vfHkO;fDRk djrh vk/kqfud ukSdjhis”kk Lora=rk efgyk dh dFkk tks Ikkfjokfjd ftEesokjh dks fuHkkrs gq, vfookfgr thou th jgh gSA firk us viuh iq=h dks iwjh vktknh ns j[kh gSA dydRrs ds ifjos”k vkSj firk ds isV dh leL;k dks ysdj cuh ;g fQYe dsoy vkt ds gh ifjos”k esa gh laHko gks ldh blhfy, ;g fQYEk vkt ds ifjos”k ls ,sls ifjokjksa vkSj yM+fd;ksa dks tksM+rh gS tks ,slk thou th jgha gSaA

vfu:) jk; pkS/kjh dh ^fiad* fQYe esa rhu ;qok yM+fd;kas dh leL;k vkSj vutku yM+dksa ds nksLrh ds ifj.kke dks orZeku fLFkfr ds vuqlkj izLrqr djrh gSA ;s rhuksa yM+fd;ka Lora= gaSA fnYyh tSls egkuxj esa ,d lkFk jgrh gSaA vutku yM+dksa ls nksLrh dj cSBrh gSa vkSj yM+dksa ds nqO;Zogkj ls ihfM+r gksdj iqfyl dsl dj nsrh gSaaA budh leL;k ;gh ls izkjaHk gksrh gSA fQYEk esa odhy dh Hkwfedk esa vferkHk cPpu gSa tks fd vkSjr dk i{k ysrss gq, lekt esa lekurk vkSj vlekurk ds iz”u dks mBkrs gSaA ^uk^ dk eryc uk gksrk gS bl ckr ij tksj nsrs gSaA vkSj lekt }kjk yM+fd;ksa dks ysdj cuk;s x, reke iz”uksa dks vnkyr esa j[krs gSaA ifj.kke Lo:i yM+fd;ka dsl thr tkrh gSaA ;g fQYe lekt esa tkx:drk ykus dk iz;kl gS rFkk yM+dksa vkSj yM+fd;ksa ds fy, lh[k Hkh gS fdlh Hkh vifjfpr O;fDr ;k yM+dksa ds lkFk vdsys dgha uk tk;s] yM+ds yM+fd;ksa ds lkFk tksj tcjnLrh uk djsaA vnkyr esa ftu iz”uksa dks odhy lkgc us mBk;k gS mu ij Hkh fopkj djrs gq, yksxksa dks viuh ekufldrk esa cnyko ykuk pkfg,A orZeku le; esa ;g ,d egRoiw.kZ fQYEk jgh gSA

lu~ 2016 esa jke ek/kokuh dh ^uhjtk^ fQYEk tks fd uhjtk uked ,;j gksLVst ds thou ij vk/kkfjr vkRedFkkRed fQYEk gSA lu~ 1986 esa ,d foeku ifjpkfjdk ¼,;j gksLVst½ uhjtk iSu ,e- Q~ykbZ 73 esa lokj gksrh gS vkSj vkradokfn;ksa }kjk foeku dk vigj.k dj fy;k tkrk gSA uhjtk vkradokfn;ksa dks ;kf=;ksa ij geyk djus ls jksdus dh iwjh dksf”k”k djrh gSA uhjtk vius dRrZO; ds izfr bZekunkj] lkglh vkSj vfLrRo cuk;s j[krs gq, gkbZtsd gq, foeku ds ;kf=;ksa dh tku cpkrs gq, Lo;a “kghn gks tkrh gSA ;g fQYe ,d L=h dks vius dk;Z {ks= esa dRrZO; fuHkkus] bZekunkj cus jgus vkSj vius iSjksa ij [kM+s gksus dh lh[k nsrh gSA uhjtk dk thou fookgksijkar vPNk ugha gS mldk ifr mls izrkfM+r djrk gS blhfy, og vius ek;ds vkdj vius iSjksa ij [kM+h gksrh gSA Lo;a dks nq[k vkSj r[kyhQ ls fudkyrs gq, vkSjkssa ds thou esa [kqf”k;ka ykus dk iz;kl djrh gSA

^vdhjk* lu~ 2016 esa ,- vkj- e#xknkl ds funsZ”ku esa cuh fQYeh gSA ftlesa yM+fd;ksa ij gks jgs ,flM vVSd dkss vfHkDr djrh ;g fQYEk gSA fQYEk esa vdhjk dh Hkwfedk esa lksuk{kh flUgk gSA ,d firk }kjk iq=h dks ckY;koLFkk ls djkVs lh[kkdj lkglh] yM+dh cuus dh izsj.kk nsukA lkglh gksus ds ckotwn vdhjk dks fdu&fdu leL;kvksa ls xqtjuk iM+rk gS bl lc dks Hkh fn[kk;k x;k gSA vdhjk ckfydk tsy ls gksdj vkrh gSA mlds Hkhrj ,d lkgl gS] vkxs c<+us dh yyd gS vkSj ns”k ds fy, dqN djus dk tLck Hkh gSA og vius Åij gks jgs tqeZ dk cnyk Hkh ysrh gSA vkSj ekSr dks Hkh xys yxkrh gSA ifjokj okyksa ls mis{kk dh ik= gksrs gq, Hkh vius dRrZO;ksa dk ikyu djrh gSA Bhd blh izdkj dh ,d vkSj fQYe vkbZ ftlesa ,d yM+dh ds lkgl dks fn[kk;k x;k gSA lu~ 2017 esa f”koe uk;j dh ^uke “kckuk^ fQYe vkbZ gSA bl fQYe esa ukjh l”kfDrdj.k dks fn[kk;k x;k gSA ,d yM+dh ukf;dk¼rkilh iUuw½ tks vius izseh ds ekSr dk cnyk ysus ds fy, ljdkjh xqIr ,stsalh esa lkfey dh tkrh gS vkSj ns”k ds fy, og ,d fe”ku dh rjg dke djrh gS vkSj bl dk;Z ds fy, og fnu jkr esgur djrh gSA mls bruk etcwr vkSj lkglh cuk;k tkrk gS rkfd og nq”euksa dk eqdkcyk dj ldsA fQYEk ds ek/;e ls ;g fn[kkbZ nsrk gS fd dksbZ Hkh alkglh yM+dh tks vius lkgl] rkdr vkSj vkRefo”okl ds cy ij cM+s ls cM+k dke Hkh dj ldrh gSA

2016 esa yhyk ;kno dh ^ikZpMZ^ fQYe esa Rkhu vyx&vyx xzkeh.k fL=;ksa dh Lora=rk] eqfDr vkSj pkgr dh dgkuh dks izLrqr djrk gSA jkf/kdk vkIVs] lqjfou ckyk] rfu’Bk pVthZ rhuksa xzkeh.k fL=;ksa dh Hkwfedk esa gSA ;g fQYEk vius vki esa cksYM fQYEk gSA bl fQYEk esa Hkh ,d ukpus xkus okyh L=h dh Hkwfedk esa lqjohu ckyk gSA tks dh lkglh] Lora= vkSj le>nkj gSA og vius lkFk gks jgs “kks’k.k dk lkeuk Hkh djrh gS lkFk gh lkFk viuh nks vU; lgsfy;ksa dks Hkh Lora=rk vkSj eqfDr dk ikB i<+krh gSA 2017 esa ^vukjdyh vkWQ vkjk* fQYe fcgkj tSls jkT; esa ukpus xkus okyh ds thou ij vk/kkfjr fQYe gSA vukjdyh dh Hkwfedk esa Lokjk HkkLdj gSA ftlus viuh csgrjhu vnkdkjh ls vdsys gh fQYEk dks lkFkZd cukus esa egRoiw.kZ Hkwfedk vnk dh gSA ,d L=h fdl izdkj vkfFkZd fLFkfr ds Bhd uk gksus ij vukjdyh dks viuh eka dk ;g dk;Z djuk iM+rk gS vkSj bl ukpus xkus okyh ftanxh esa iq#’kksa dh ykyph utjksa] oSg”kh n`f’V vkSj “kkjhfjd vkSj ekufld la?k’kZ ls Hkjh ftanxh dks fn[kk;k x;k gSA ,sls yM+fd;ksa dks cM+s in izfr’Bk okys O;fDr Hkh vius gol dk f”kdkj cukuk pkgrs gSa vkSj tc dksbZ L=h badkj djrh gS rks mldk D;k ifj.kke gksrk gS] mldh >yd bl fQYe esa fn[kkbZ nsrh gSA Hkjh lHkk esa ukpus ds nkSjku “kkjhfjd NsM+dkuh djus ds dkj.k tks vieku vukjdyh dks lgu djuk iM+rk gS mldk cnyk Hkh og ysrh gSA ,d L=h ds lkgl] LokfHkeku] vfLerk vkSj mldh lgu”kfDr dks fn[kk;k x;k gSA ;g fQYEk mu lHkh ukpus xkus dk is”kk djus okyh fL=;ksa ds fy, izsj.kk vkSj lkgl iznku djrh gSA *uhy cVs lUukVk* uked Lokjk HkkLdj dh ,d vkSj fQYEk gSA bl fQYEk esa dke okyh ckbZ dh Hkwfedk esa Lojk HkkLdj gSA viuh 13 o’khZ; csVh dks i<+k fy[kkdj ukSdjh djkuk pkgrh gSA ;g fQYEk f”k{kk O;oLFkk vkSj egRodka{kkvksa dks txkrh gqbZ fQYEk gSA lius ns[kus vkSj iwjk djus dks cy iznku djrh ;g fQYEk egRoiw.kZ gSA

2017 esa Jhthr eq[kthZ dh ^Cksxe tku* fQYEk gSA Hkkjr vkSj ikfdLrku dh lhek ij ,d xkao esa Cksxe tku ,d os”;ky; pykrh gSA vkSj foHkktu ds nkSjku cnyrs jktuhfrd ifjn`”; ds chp mlds iru gks jgs dkjksckj dks cpkus ds fy, iwjh dksf”k”k djrh gSA Lo;a dh vfLerk vkSj vius LokfHkeku dh j{kk ds fy, os lHkh dksBs esa dke djus okyh la?k’kZ djrh gSa vkSj var esa nq”euksa ls gkj ekuus vkSj Lo;a dks mudks lkSius ds ctk;] Lo;a vfXu esa lefiZr gks tkrh gSA fQYEk esa bZyk v:.k }kjk Hkkjr ns”k esa ftruh Hkh fojaxuk,a jgha gS mldh dFkk Hkh lqukbZ x;h gSA fQYe ds var esa jkuh in~ekorh dh dFkk pyrh gS vkSj dksBs esa cph gqbZ lHkh fL=;ka Lo;a dks vfXu esa lefiZr dj nsrh gSaA

2016 esa lqtkW; ?kks’k dh ^dgkuh 2^ fQYe cuh ] ;g fQYEk ^dgkuh* dk flDoy gS tks fd 2012 esa vk;h FkhA *dgkuh* esa ,d ukjh l”kfDrdj.k dks fn[kk;k x;k Fkk tks fd eqacbZ ds Vzsu ce CykLV esa gq, vius ifr ds ekSr dk cnyk ysus ds fy, ,d xHkZorh L=h dk >wBk fn[kkok djds cnyk ysrh gSA fdUrq ^dgkuh 2* esa cky “kks’k.k dks tks fd ifjokj ds Hkhrj gh gksrk gS mls fn[kk;k x;k gSA vius gh ifjokj okys pkpk] ekek] vady vkfn gksrs gS rks cgqr dh de mez dh cPph ds lkFk ;kSu “kks’k.k djrs gSa vkSj cPps mls le>us vkSj crkus esa vleFkZ gksrs gSA bl cky mRihM+u dh leL;k dks mBkus okyh egRoiw.kZ fQYe gSA

2017 esa galy esgrk dh fQYe ^fleju* ,d Rkykd”kqnk 30o’khZ; efgyk dh dgkuh gS tks fd vius ekrk firk ds lkFk fons”k esa jg jgh gSA firk vkSj csVh nksuksasa esa }a} dh fLFkfr gS blfy, fleju iSls tksM+ tksM+dj viuk ?kj [kjhnuk pkgrh gSA tYn gh ?kj ilan dj og ysuk pkgrh gS vkSj blds fy, vf/kd iSlksa dh t:jr gS og ,d LokfHkekuh yM+dh gS firk ls iSls ugha ysuk pkgrh vkSj uk gh firk ds O;kikj dks viukuk pkgrh gSA og Lora= thou thuk pkgrh gS ijUrq /ku ds ykyp esa cqjh vknrsa tSls tqvk [ksyuk vkSj leL;k vkus ij cSad yqVus tSls dk;ksZa esa Qal tkrh gSA ;g dgkuh ,d lR; ?kVuk ij vk/kkfjr gSA var esa cSad yqVus ds vkjksi esa mls tsy gks tkrk gSA

viwokZ ykf[k;k ds funsZ”ku esa 2017 esa *glhuk ikjdj* fQYe vk;h ftlesa J)k diwj us glhuk ikjdj dh Hkwfedk vnk dhA ;g dgkuh ,d vui<+ L=h dk ysMh MkWu cuuk vkSj lkgl dk izek.k izLrqr djukA eqEcbZ vkSj vaMjoMZ dh MkWu dh ck;ksfid ij vk/kkfjr gSA tks dh nkmn bczkfge dh cgu glhuk ikjdj ij vk/kkfjr fQYe gSA

2017 esa vyad`rk JhokLro ^fyifLVd vMaj cq[kkZ^ esa pkj fL=;ksa dksad.kk lsu] jRuk ikBd] iykfcrk] vgkuk dh dgkuh gSA tks dh Hkksiky “kgj esa jgrh gSa vkSj viuk thou vius rjhds ls thuk pkgrh gSa fdUrq lkekftd vkSj ikfjokfjd ifjos”k esa tdM+h gqbZ gSaaaA pkjksa fL=;ka vyx vyx mez dh gSa pkjksa dh [okfg”ksa vkSj thou thus dk rjhdk vyx gS fdUrq pkjksa esa ,d lekurk gS pkjksa eqDr gksdj vktkn thou thuk pkgrh gSaA fL=;ksa dh vktknh ij jksd vkSj lkekftd&ikfjokfjd fLFkfr dk ncko] viuh vkdka{kkvksa dh iwfRkZ djus dh lkeFkZ j[kus okyh pkj vkSjrksa dh dgkuhA

2017 esa ^Ekkr`^ fQYe vLrj l;Sn~n ds funsZ”ku esa vkbZ ,d ,slh fQYe gS tks viuh csVh ds fy, balkQ dh yM+kbZ yM+Rkh gqbZ ,d eka dh dgkuh gSA eka dh Hkwfedk esa johuk VaMu gSA ¼Ekak ds lkeus gh csVh ds lkFk cykRdkj vkSj fQj eka ds lkFk cykRdkjA csVh dh rqjar e`R;q gks tkus ij eka mu cykRdkfj;ksa ls cnyk ysrh gSA½ Bhd blh rtZ ij cuh joh m};j dh ^ekaWe^ fQYe 2017 esa gh cuh Jhnsoh dh vafre fQYe gSA ;g fQYEk ,d jgL;kRed Mªkek fQYEk gSA Tkho foKku ds f”kf{kdk] nsodh ,d futh tklwl dh en~n ysrh gS vkSj viuh lkSrsyh csVh vk;kZ ds cykRdkfj;ksa ls cnyk ysrh gS vkSj lHkh dks vyx&vyx rjg ls vatke nsrh gqbZ] ekj nsrh gSA

fL=;ksa dks dsUnz esa j[kdj tks Hkh fQYEksa cuh gS vkSj cu jgh gSa mlesa eq[; :i ls fL=;ksa ds futh thou vkSj lkekftd fLFkfr;ksa ls tq>rh gqbZ fL=;ksa dh ekufldrk] lkekftd] ikfjokfjd my>usa vkSj fofHkUu leL;kvksa ls eqfDr dh vkdka{kkvksa dks ysdj cu jgh bu fQYeksa us lekt esa tkx`fr] dqN dj fn[kkus dk lkgl] iq#’k }kjk izrkfM+r thou ls la?k’kZ djus vkSj viuk vf/kdkj izkIr djus dh fn”kk esa igy djuk izkjaHk dj fn;kA izR;sd oxZ dks ysdj fQYesa cuh vkSj cu jgh gSa fdUrq bu fQYeksa esa tks Hkh vfHkusf=;ka dk;Z djrh gSa os mu fQYeksa dh dFkkoLrq vkSj ik= ls ifjfpr ugha gksrh gSa fdURkq ml L=h ds ifjos”k vkSj dFkk] ifjfLFkfr ds vuqlkj Lo;a dks <kyus ds fy, cgqr iz;kl djrh gSa vkSj Lo;a dks ml Nfo esa iwjh rjg mrkjus dh dksf”k”k djrh gS vkSj os lQy Hkh gksrh gSaA ;gh dkj.k gS fd fQYeksa esa dk;Z djus okyh vfHkusf=;ka gesa vkSj lekt dks vius ls tksMs+ j[krh gSA

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laf{kIRk esa ckr djsa rks mijksDr lHkh fQYeksa dks ge ikap rjg ls foHkDr dj ldrs gSA igyk cykRdkj vkSj os”;ko`fRr ls lacaf/kr fQYEkksa ftuesa y{eh] coaMj] ekWe] ekr`] pesyh] csxe tku] pkanuh ckj vkfn] nwljk ;qok ih<+h esa tkx`fr ykus ds fy, cuh fQYesa ftuesa fiad] flDlVhu] uke “kckuk] vdhjk] vkfn] rhljk vdsyh L=h dh vfLerk vkSj Lora=rk ij vk/kkfjr fQYesa ftuesa&D;k dguk] vfLRkRo] gkbZos] Dohu] bafXyl ohafXy”k] VfuZax 30] ihdw] Mksj] dys.Mj xyZ] dgkuh 2] ghjksbu] uhjtk vkfn] pkSFkk Xkzkeh.k vkSj “kgjh ifjos”k esa jgrs gq, vius vktknh ds fy, lkspus okyh fL=;ksa ls lacaf/kr fQYesa ftuesa &fyifLVd v.Mj cq[kkZ] vukjdyh vkWQ vkjk] Mksj] ikpZMZ] ekr`Hkwfe vkfn vkSj ikapoka vkVksck;ksxzkfQdy fQYesa vkSj lR; ?kVukvksa ij vk/kkfjr fQYesa ftuesa& eSjh dkWe] uhjtk] fleju] glhuk ikjdj] csxe tku vkfnA

bDdhloha lnh esa tks fQYEksa cuh mu fQYeksa esaa L=h Nfc vkSj mlds eu dks iwjh rjg ls [kksy dj izLrqr fd;k x;kA bu fQYEkksa esa vk/kqfudrk ds lkFk uXurk dk lekos”k Hkh gksrk pyk x;kA fQYeksa esa ,d u ,d n`”; v”yhy Hkh fn[kk;k tkus yxk D;ksafd bDdhloha lnh dk n”kZd gj pht [kqyk gqvk ns[kuk pkgrk gSA bu fQYeksa esa iq#’kksa dh ekufldrk dks Hkh xgjkbZ ls mtkxj fd;k x;k gSA bu fQYEkksa ds ewy esa lekt esa gks jgs] vR;kpkjksa dks de djrs gq, ukfj;ksa esa psruk txkus] vkRefo”okl] vfLrRo] lkgl vkSj vkfFkZd :i ls l{ke cuus dh izsj.kk dks fn[kk;k x;k gSA “kks’k.k dks u lgrs gq, mlds fy, vkokt mBkus] viuh ckr dgus vkSj Mj dks lekIRk djus dk eukscy iznku djus okyh ;s lHkh fQYesa vius vki esa egRoiw.kZ gSA

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21वीं सदी का साहित्य: वाद-विवाद


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lcls igys dFkk lkfgR; dk :[k djrs gSaA uke ysdj fookn c<+kus dh t+:jr esjs [;ky ls mfpr ugha gSA vkt nks eqn~ns lcls T;knk pfpZr gSa& igyk nfyr ys[ku vkSj nwljk L=h ys[kuA bu fo’k;ksa ij foiqy ys[ku gks jgk gS ijarq budk mn~ns”; vius eu dh HkM+kl dks O;Dr djuk gh ek= jg x;k gSA nfyrokn esa dsoy t+qYeksa ,oa mRihM+uksa dh dgkfu;k¡ fy[kh tk jgh gSaA ,d oxZ fo”ks’k Lo;a dks ihfM+r ,oa “kksf’kr n”kkZrs gq, nwljs oxZ ds f[kykQ+ fo’koeu dj jgk gSA ,slk lkfgR; lekt esa oSeuL;rk QSykus ds flok; vkSj dqN ugha djrk ] ;g lekt dks fn”kk ugha ns ldrkA ;g ckr ugha fd lkfgR; dk izHkko ugha iM+ jgk gSA ,sls lkfgR; dk gh izfrQy gS fd lekt esa oSeuL;rk QSyrh tk jgh gSA

jktuhfr dk lkfgR; ij izHkko lnSo iM+rk jgk gS vkSj iM+rk Hkh jgsxkA orZeku jktuhfr esa /keZ vkSj tkfr dk cksyckyk gSA ,sls esa lkfgR; blls vNwrk dSls jg ldrk gS\ Nk;kokn ds ckn Lokra=;ksRrj lkfgR; esa ekDZlokn dk izHkko Li’V n`f’Vxkspj gksrk gS ijarq mldk vk/kkj ,oa mn~ns”; lekt esa lekurk ykuk Fkk ] oSeuL;rk QSykuk ughaA orZeku jktuhfrd i`’BHkwfe esa Hk; ] Hkw[k vkSj Hkz’Vkpkj dk opZLo gS ysfdu ge buds izfr mnklhu gSaA lekt dh ifjdYiuk gh cny xbZ gSA vkt laiw.kZ ekuo ,d lekt ugha cfYd tkfr fo”ks’k ,d lekt cu x;k gSA fo”o ca/kqRo dh rks lkspuk Hkh csodwQh gSA

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jfonkl dks viuh vkfFkZd fLFkfr ij larks’k FkkA os HkkSfrd lq[kksa ds vkdka{kh ugha FksA jfonkl dh mnkjrk gh Fkh fd lk/kq-fu/kZuksa dks twrs igukrs Fks] Hkxoku ls feys ikjl iRFkj dks ugha fy;k] jkst+ flagklu ds uhps feyus okyh ik¡p eksgjks dks ekuork dh HkykbZ esa yxk;k] xaxk eS;k }kjk Lo;a daxu nsus ij Hkh jktk ds fy, ,d daxu gh fy;kA txr dks u”ojrk ls ifjfpr jfonkl us vius vuq;kf;;ksa dks Hkh bl {kf.kd txr dh u”ojrk ls ifjfpr djok;kA eafnj esa izos”k djuk vkSj xaxk Luku djuk tSls /kkfeZd fØ;kdyki muds fy, oftZr FksA ysfdu mudh rks dBkSrh esa gh xaxk FkhA xksj djus dh ckr gS ftl lalkj dk O;kikj gh >wB ij Vhdk gks ml lalkj ds fØ;kdyki dSls lp gks ldrs gSA

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21वीं सदी और स्त्री

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21वीं सदी की कवयित्रियों के काव्य में स्त्री विमर्श

📷शोधार्थी: हरकीरत 'हीर' एम.ए. (हिंदी ), डी सी एच सुंदरपुर , हाउस न -५ गुवाहाटी -५ (असम ) मोब - ९८६४१७१३०० ई मेल - harkirathaqeer@gmail.com

‘२१ वीं सदी में सबसे ज्यादा चर्चित विषय रहा है स्त्री विमर्श। समाजशास्त्रियों के लिए, राजनीतिज्ञों के लिए और साहित्य के लिए पिछले ५०-६० वर्षों से यह स्त्री विमर्श, ‘नारी मुक्ति आन्दोलन’ के नाम पर एक नए रूप में सार्वजानिक रूप से एक ज्वलंत मुद्दा बना हुआ है. सामान्य रूप से ' विमर्श ' अंग्रेजी के ' डिस्कोर्स ' शब्द के पर्याय के रूप में प्रचलित है , जिसका अर्थ उक्त विषय पर दीर्घ एवं गंभीर चिंतन करना है। नारी विमर्श पश्चिमी देशों से आयातित एक संकल्पना (सामान्य विचार) है. इंग्लॅण्ड और अमेरिका में उन्नीसवीं शताब्दी में फेमिनिस्ट मूवमेंट से इसकी शुरुआत हुई. यह आन्दोलन लैंगिक समानता के साथ-साथ समाज में बराबरी के हक के लिए एक संघर्ष था, जो राजनीति से होते हुए साहित्य, कला, एवं संस्कृति तक आ पहुँचा ,देखा जाये तो २१ वीं सदी की कविताओं में क्रिया-प्रतिक्रिया के रूप में इस विमर्श के पक्ष और विपक्ष में रह-रह कर उच्च स्वर उठते रहे हैं और लगभग एक दशक से यह विमर्श ‘नारी सशक्तिकरण’ के नाम से लगातार चर्चा और लेखन का प्रमुख विन्दु रहा है जिसमें कविताओं ने आग में घी का कार्य किया। खासकर महिलाओं की लेखनी ने।जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से महिलाओं की शोषित सामाजिक और पारिवारिक छवि को सार्वजनिक किया. स्त्रियों पर होते अत्याचार और उनकी मार्मिक दशा पर लोगों का ध्यान आकर्षित करने का एक महत्वपूर्ण अवसर प्रदान किया. निश्चित तौर पर इस दौरान महिलाओं की दमित और शोषित परिस्थितियां उल्लेखनीय ढंग से परिमार्जित हुईं. जहां एक ओर महिलाओं को पुरुषों के ही समान कुछ आवश्यक और मूलभूत अधिकार मिलने लगे, वहीं शिक्षा के प्रचार-प्रसार के कारण महिलाएं भी स्वयं अपनी महत्ता को समझने लगीं.लेकिन अभी भी स्त्री शोषित होती है ,इसलिए इसमें विमर्श की अति आवश्यकता है। औरत की आजादी को लेकर हमेशा ही वाद विवाद और संवाद होते रहे हैं. एक ओर पुरुष वर्चस्व है और दूसरी ओर स्त्री-मुक्ति की चुनौतियाँ और स्त्री के आधआरभूत सम्मान का प्रश्न भी। इस शोध का मंतव्य है कि स्त्री-संघर्ष के विविध पहलुओं को सामने रखते हुए भूमंडलीकृत समय में स्त्री-मुक्ति की दिशा की सही तस्वीर सामने रखला है। आज की औरत कितनी आजाद है, इस पर विधिवत विमर्श कम ही हुआ है। समाज को एक नारी के प्रति नये दृष्टि कोण को अपनाना होगा। इस सच्चाई से भी इनकार नही किया जा सकता कि नारी आज भी प्रताड़ित है। इसके लिए हम देखेंगे २१ वीं सदी की कवयित्रियों की कविताओं में उठ रहे विद्रोह के स्वर को। क्योंकि साहित्य में स्त्री विमर्श के अन्तर्गत स्त्री द्वारा लिखा गया और स्त्री के विषय में लिखा गया साहित्य ‘साहित्यिक स्त्री विमर्श’ माना जाता है। स्त्री होने के नाते स्त्री ही स्वानुभूति पर आधारित प्रामाणिक व विश्वसनीय साहित्य की रचना कर सकती है। पुरुष लेखक संवेदना के स्तर पर, समानानुभूति के आधार पर स्त्री पीडा को व्यक्त करने में सक्षम रहे हों, लेकिन स्त्री-पीडा का यथार्थ चित्र्ण उतनी ईमानदारी से नहीं कर सके हैं।

स्त्री विमर्श अब अपने परंपरागत स्वरुप तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि संसद तक को भी गुंजायमान कर चुका है और दिल्ली की ‘दामिनी प्रकरण’ से तो न्यायपालिका भी परोक्ष रूप से इस विमर्श में सम्मिलित हो गयी थी। 'दामिनी प्रकरण'' पर हजारों कविताएं लिखी गयीं जिसमें से वरिष्ठ कथाकार और कवयित्री सुधा आरोड़ा के लहू खौलाते शब्द मैं यहां पेश करना चाहूंगी -

दामिनी ! / जीना चाहती थी तुम / कहा भी था तुमने बार बार / दरिंदों से चींथी हुई देह से जूझते हुए / मौत से लडती रही बारह दिन / कोमा में बार बार जाती / लौट लौट आती / कि शायद / साँसे संभल जाएँ ....... / आखिर हत्यारे जीते / तुम्हारा जीवट थम गया / और तुम चली गयी दामिनी ! / लेकिन तुम कहीं नहीं गयी दामिनी / अब तुम हमेशा रहोगी / सत्ता के लिए चुनौती बनकर , / कानून के लिए नई इबारत बनकर , / स्त्री के लिए बहादुरी की मिसाल बनकर , / कलंकित हुई इंसानियत पर सवाल बनकर , /सदियों से कुचली जा रही स्त्रियों का सम्मान बनकर !

महादेवी वर्मा के अनुसार --- "..नारी के स्वभाव में कोमलता के आवरण में जो दुर्बलता छिप गयी है वही उसके शरीर की सुकुमारता बन गयी जिसका लाभ पुरुष वर्ग ने उठाया है । छेड़ छाड़ एवम बलात्कार उन कुत्सित मनोवृत्तियों का परिणाम है जो कुंठित हो चुकी हैं ।और याद दिलाता है कि वह एक स्तर पर जानवरों से भिन्न नहीं है..।" इस कविता ने सचमुच स्त्री उत्पीडन का इतिहास ज़िंदा कर दिया ,यह कविता वर्तमान समय में बहुत ही प्रासंगिक है ! यह कविता एक उत्पीड़ित स्त्री के दर्द को जिस ढंग से सामने लाती है, वह नि:संदेह इस कविता को अन्य कविताओं से अलग करता है और स्त्री विमर्श को नई चुनौती देता है।

पाश्चात्य देशों की तरह, भारत भी नारी-अपमान, अत्याचार एवं शोषण के अनेकानेक निन्दनीय कृत्यों से ग्रस्त है। उनमें सबसे दुखद ‘कन्या भ्रूण-हत्या’ से संबंधित अमानवीयता, अनैतिकता और क्रूरता की वर्तमान स्थिति हमारे देश की ही ‘विशेषता’ है...उस देश की, जिसे एक धर्म प्रधान देश, अहिंसा व आध्यात्मिकता का प्रेमी देश और नारी-गौरव-गरिमा का देश होने पर गर्व है। वैसे तो प्राचीन इतिहास में नारी पारिवारिक व सामाजिक जीवन में बहुत निचली श्रेणी पर भी रखी गई नज़र आती है, लेकिन ज्ञान-विज्ञान की उन्नति तथा सभ्यता-संस्कृति की प्रगति से परिस्थिति में कुछ सुधर अवश्य आया है, फिर भी अपमान, दुर्व्यवहार, अत्याचार और शोषण की कुछ नई व आधुनिक दुष्परंपराओं और कुप्रथाओं का प्रचलन हमारी संवेदनशीलता को खुलेआम चुनौती देने लगा है। साइंस व टेक्नॉलोजी ने कन्या-वध की सीमित समस्या को, अल्ट्रासाउंड तकनीक द्वारा भ्रूण-लिंग की जानकारी देकर, समाज में कन्या भ्रूण-हत्या को व्यापक बना दिया है। दुख की बात है कि शिक्षित तथा आर्थिक स्तर पर सुखी-सम्पन्न वर्ग में यह अतिनिन्दनीय काम अपनी जड़ें तेज़ी से फैलाता जा रहा है। इस व्यापक समस्या को रोकने के लिए गत कुछ वर्षों से साहित्य में चिंता व्यक्त की जाने लगी है। जब हम हिंदी साहित्य में काव्य के माध्यम से ‘भविष्य की नारी’ पर विचार-विमर्श करते हैं तो दृष्टि पटल पर सहसा हमारा ध्यान आकृष्ट करता है, पिछले वर्ष २०१४ में प्रकाशित सम्वेदनशील कवयित्री हरकीरत हीर का काव्य संग्रह 'दीवारों के पीछे की औरत ' जिसमे कवयित्री ने नारी-अस्मिता, नारी चेतना के विषय में समाज के विभिन्न वर्गों से तो वार्तालाप किया ही है, कन्या भ्रुण हत्या जैसे मसले पर भी खुल कर कलम चलाई है , कवयित्री ने गर्भ में ही बेटियों को मारे जाने पर सवाल उठाये हैं . यह सवाल भावी स्त्री विमर्श, स्त्री की दशा और दिशा को नए रूप, नए अंदाज, नए तेवर और नयी योजना-परिकल्पना के रूप में एक शोधित, संशोधित, परिवर्तित समाज की रूपरेखा प्रस्तुत करता है जो ‘भविष्यत की नारी’ के रूप में ‘स्त्री विमर्श’ की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण है.उनकी 'अजन्मी चीख के सवाल ' शीर्षक कविता के कुछ अंश उल्लेखनीय हैं , जिसमें कोख की बेटी अपनी माँ से सवाल करती है और अपना कसूर जानना चाहती है - मुझे आज भी याद है / वह भयानक दिन / उस दिन खूब जोरों से बिजली कड़की थी / कोई बादल फट पड़ा था आसमां में / इक भयानक सी आकृति का चेहरा / बढ़ आया था मेरी ओर .... / उस दिन मान मैं खूब चीखी थी / जोर -जोर चिल्लाई थी / तुझे न जाने कितनी बार पुकारा माँ / पर तुम नहीं आई .... / धीरे -धीरे कोई तेज धार से / मेरे अंगों को काटने लगा था / मैं पीड़ा से कराहती तुझे पुकारती रही माँ / पर तू नहीं आई … / मेरे नन्हें -नन्हें हाथ पैरों को / टुकड़ों टुकड़ों में काट दिया गया / फिर आँख , कान , गला भी रेत दिया गया / मुझे अजन्मी को ही / मार दिया गया माँ ……

हमारे शास्त्रों-पुराणों में ऐसे हजारों संदर्भ भरे पडे है जिनमें स्त्री को एक वस्तु या सम्पत्ति की तरह पुकारा गया है। धर्म के ठेकेदारों ने भी ईश्वर के पश्चात पूरा ध्यान स्त्री पर ही केन्द्रित किया तथा सारे नियम कायदों से स्त्रियों को लाद दिया गया । मेरा मानना है कि असंयमित वासना प्राप्ति संघर्ष से बचने के लिए पूरूष प्रधान समाज ने ही विवाह जैसी संस्था का निर्माण किया और उसके यौन मामलों को लज्जा की संज्ञा देकर एक बेहद कीमती और नाजुक कांच की दीवार बना दिया। इससे स्त्री जाति को एक बड़ी हानि हुई, वह है- विवाह पश्चात ही स्त्री का सामाजिक मूल्य खत्म हो गया । वह सिर्फ भोग्या बन गई। वह दिनभर घर का काम करती , बच्चों की देखभाल करती और पति की सेवा में तत्पर रहती , किसी ने कभी जरुरत नहीं समझी कि उसकी जरूरतों को , उसकी तकलीफों को भी समझा जाये, उसके मनोभावों को भी समझा जाये । वह सिर्फ एक मशीनी वस्तु बन कर रह गई जो सबकी जरूरतें तो पूरी करती है पर अपने लिए जीना भूल जाती है। पति भी उसे सिर्फ अपनी थकान मिटाने का साधन समझता है। यहां हरकीरत 'हीर ' के ही अन्य एक काव्य संग्रह 'खामोश चीखें ' का उदहारण देना चाहूंगी जिसमें 'औरत …' शीर्षक कविता में वे लिखती हैं -

वह मेरे जिस्म से खेला / होंठों को निचोड़ा / और छाती पर सर रख कर सो गया / किसी को खबर भी न हुई / कब मेरी पलकों पर ठहरी हुई बून्द / बर्फ में तब्दील हो गई … / उस ने उतार ली / मेरे जिस्म की खूंटी से / अपनी दिन भर की थकान / पर मैं कैसे झाड़ू हुई / कैसे बर्तन बनी / और कैसे फ्रिज बन उसका बिस्तर बनी / किसी को खबर भी न हुई …

हांलाकि वैवाहिक संबंध प्राकृतिक नियमों के अनुरूप है लेकिन उसके पीछे की रूढ़ियॉ एवं कायदे इस नियम को अप्राकृतिक बनाते है । जो स्त्री की स्वतंत्रता का हनन करते है उसे सिर्फ भोग्या बना देते हैं। हमें सोचना होगा कि समाज में यह विकृति कैसे आई ? सृष्टि का आधार नारी जो समाज और घर का आधार शृंगार है वो अचानक भोग की वस्तु क्यों बन गई ? विश्व की इस अद्वितीय भारतीय संस्कृति में ही हम स्त्री को पूजनीय कहते आये हैं तभी तो पुरुष उनकी ही बदौलत आज भी महिमा मंडित है ! भारतीय दर्शन में सृष्टि का मूल कारण अखंड मातृसत्ता अदिति भी नारी है और वेद माता गायत्री है ! नारी की महानता का वर्णन करते हुये ”महर्षि गर्ग” कहते हैं कि :- यद् गृहे रमते नारी लक्ष्‍मीस्‍तद् गृहवासिनी।

देवता: कोटिशो वत्‍स! न त्‍यजन्ति गृहं हितत्।।

( जिस घर में सद्गुण सम्पन्न नारी सुख पूर्वक निवास करती है उस घर में लक्ष्मी जी निवास करती हैं। हे वत्स! करोड़ों देवता भी उस घर को नहीं छोड़ते। )

भारत में हमेशा से ही नारी को उच्च स्थान दिया गया । भारतीय संस्कृति में नारी का उल्लेख ‘श्री’, ‘ज्ञान’ तथा ‘शौर्य’ की अधिष्ठात्री नारी रूप में किया गया है !आदिकाल से ही हमारे देश में नारी की पूजा होती आ रही है। आज भी आदर्श-रूप में भारतीय नारी में तीनों देवियाँ सरस्वती,लक्ष्मी और दुर्गा की पूजा होती है ! भला ‘अर्द्धनारीश्वर’ का आदर्श को कौन नहीं जानता ? किसी भी मंगलकार्य में नारी की उपस्थिति को अनिवार्य माना गया है ! नारी की अनुपस्थिति में किये गए कोई भी मांगलिक कार्य को अपूर्ण माना गया। उदहारण के लिए हम सत्यनारायण भगवान् की कथा को ही ले लेते है ! वेदों के अनुसार सृष्टि के विधि-विधान में नारी सृष्टिकर्ता ‘श्रीनारायण’ की ओर से मूल्यवान व दुर्लभ उपहार है। नारी ‘माँ’ के रूप में ही हमें इस संसार का साक्षात दिग्दर्शन कराती है, जिसके शुभ आशीर्वाद से जीवन की सफलता फलीभूत होती है। फिर वह पुरुष की नज़र में सिर्फ भोग्या कैसे बन गई ?

डॉ रमा द्विवेदी जी ने २०१३ में प्रकाशित अपने हाइकु संग्रह ''साँसों की सरगम’' में नारी-चेतना, नारी-अस्मिता और नारी-जीवन के दुःख-दर्द को युक्ति और तर्क के साथ निर्भीक और निडर होकर रेखांकित किया है. बढ़ती हुयी कन्या भ्रूण हत्या के प्रति उनकी घृणित मानसिकता के लिए समाज को ही नहीं, अपने परिवार और पति को भी कठघरे में खड़ा किया है. सोच और कथ्य की दृष्टि से यह एक अनूठा कार्य है. वे लिखती हैं – “जीवनदाता/ बन गया राक्षस/ सुरक्षा कहाँ?” क्योकि बाहर तेरा सबसे बड़ा शत्रु तो वही है, जिसका तू अंश है. वे सभी को ललकारते हुए आगे कहती है- “जन्मदात्री हूँ/ बेटी भी मैं जनूंगी/ रोकेगा कौन?”. कवयित्री एक सामान्य नारी को उसकी वास्तविक शक्ति से परिचित करना चाहती है, इसी को लक्षित कर वे लिखती हैं –“आग का गुण/ केवल जलना नहीं/ जलाना भी है”,भ्रूण हत्या पर वे स्त्री भ्रूण हत्या/ बिगाड़ा संतुलन/ सृष्टि का नाश”,फिर तर्क करती हैं – “बिगड़ेगा जो/ सृष्टि का संतुलन/ ब्याहोगे किसे?” आहत होकर असहाय सी अपनी वेदना प्रकट करती है – “गर्भ सुरक्षा/ दे सकती हूँ बेटी/ बाहर नहीं”

विवाह संबंध विच्छेद या विधवापन की सूरत में तो एक स्त्री का जीवन और भी कष्टप्रद है , क्योंकि टूटी कांच की दीवार को कोई घर में नही सजाता , न वह ससुराल की रह पाती है न मायके की . एक तलाकशुदा औरत के लिए समाज में अकेले जीवन यापन इतना कठिन हो जाता कि कई बार ऐसी स्थिति में वह आत्महत्या तक कर बैठती है। इसी विषय पर दीपिका रानी की झकझोरती हुई कविता मुझे मिली रश्मि प्रभा द्वारा सम्पादित पुस्तक ''शब्दों के अरण्य में '' में। कवयित्री लिखती हैं -

पति बिछुड़ी औरत / एक घायल सिपाही है / उसके हथियार छीन लिए गए हैं / सिंदूर चूड़ियाँ बिछुवे / इनके बगैर वह लड़ नहीं सकती / उसे दिखाया नहीं गया / कोई और रास्ता / उसके घर में / बाहर की ओर खुलने वाला दरवाजा / बंद हो गया है / धक गए हैं रोशनदान खिड़कियाँ / परम्परा के मोटे पर्दों से / पति से बिछुड़ी औरत / एक जिन्दा सती है / उसके सपनों का दाह - / संस्कार नहीं हुआ / अपने अरमानों की राख़ / किसी गंगा में प्रवाहित नहीं की उसने / अब उसे कामनाओं की अग्नि -परीक्षा में तप कर कुंदन बनना है ....

हमारे समाज में आज भी विधवा विवाह, पुर्नविवाह जैसे कोई अपराध हो । इस पर समाज में पाबंदी जैसी स्थिति है । हम स्वयं अपनी संस्कृति पर गर्व करते हुए फूले नही समाते है किन्तु जब स्त्री पुनर्विवाह या विधवा विवाह जैसी बात आती है तो हमारे संस्कार आड़े आने लगते हैं।

भारतीय नारियों में त्याग, सेवाभाव, सहिष्णुता एवं निष्ठा के गुण विद्यमान हैं। नारी प्राचीन काल से ही अपनी अद्भुत शक्ति प्रतिभा, चातुर्य, स्नेहशीलता, धैर्य, समझ, सौन्दर्य के कारण हर मोर्चे पर पुरुष से आगे नहीं तो पीछे भी नहीं रही है। जहाँ वह पति को पूज्य व देवता के समतुल्य मानती है, वहाँ पति को भी उसे गृहलक्ष्मी या किसी देवी से कम नहीं समझना चाहिए .

यद् गृहे रमते नारी लक्ष्मीस्तद गृहवासिनी।

देवता कोटिशो वत्स न त्यज्यंति ग्रहहितत्।।

अर्थात् जिस घर में सद्गुण सम्पन्न नारी सुखपूर्वक निवास करती है उस घर में लक्ष्मी जी निवास करती हैं। हे वत्स ! करोड़ों देवता भी उस घर को नहीं छोड़ते।

नर-नारी दोनों गृहस्थी रूपी गाड़ी के दो पहिए हैं। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। स्त्री के बिना तो किसी घर की कल्पना ही नहीं की जा सकती। इसीलिए कहा गया है—‘बिन घरनी घर भूत समाना।’ इसी सिलसिले में हम देखेंगे पूनम मटिया की एक कविता ' फिर क्यों सहूँ अत्याचार ' जो प्रकाशित हुई है बोधि प्रकाशन से डॉ लक्ष्मी शर्मा के संपादन में आये काव्य संग्रह ''स्त्री होकर सवाल करती है .... !'' में , यह संग्रह एक मुक्त स्त्री का सशक्त स्वर है। जिसकी कवितायेँ पारिवारिक ,आर्थिक , दाम्पत्य , सामाजिक जैसी पारम्परिक शृंखलाओं के साथ ही नवीन स्त्री की चुनौतियों पर भी प्रश्न उठती हैं , उनसे मुक्ति की मांग करती हैं-- नारी में नर समाया / जानकर भी तनिक उसका मन न भरमाया / माँ , बहन और पत्नी हर रूप में सिर्फ उसका ही भला चाहा / फिर क्यों उसने इक पल भी सोचा नहीं / सिर्फ हाथ उठाया और आक्षेप ही लगाया / कोमल , भावुक हूँ यह जान उसने हर अवसर पर मुझे दबाया / अबला हूँ पर कमजोर नहीं , चुप हूँ पर शब्दों की कमी नहीं / प्रणय सूत्र में बंधी चली आई , तात्पर्य इसका यही / कि गयी है कोई गाय -भैंस ब्याही …

अपने एक लेख 'स्त्री विमर्श ऒर हिन्दी स्त्री लेखन' में श्रीमती धर्मा यादव ने कुछ ऐसा मत व्यक्त किया है कि -"कहानी में जितनी स्त्रियां गतिशील हॆं उतनी कविता में नहीं हॆं ।" अर्थात कविता में व्यक्त संवेदना की अपेक्षा स्त्री चेतना की कथा साहित्य में व्यापकता मिलती हॆ. मेरा ऐसा मानना है कि ऐसा नहीं है। आज बहुत सी युवा कवयित्रियों के स्त्री चेतना के स्वर अंतर्जाल पर धड़ल्ले से उभरते देखे जा सकते हैं। जब -जब भी स्त्री पर कोई अनाचार ,अत्याचार हुआ विरोध में फेसबुक पर कविताओं की बाढ़ सी आ गई चाहे वह निर्भया कांड हो या कोई अन्य स्त्री विषयक घटना , अंतर्जाल पर तुरंत विरोध के स्वर उठने लगते हैं। खासकर फेसबुक पर। जब २०१२ में धनबाद की सोनाली नामक महिला पर तेजाब फेंका गया और उसका खूबसूरत चेहरा बुरी तरह से तेजाब से जला दिया गया तब फेसबुक की चर्चित कवयित्री वंदना गुप्ता की ये दहकते शोलों सी कविता ने दिल हिला कर रख दिया -

मुझमें उबल रहा है एक तेज़ाब / झुलसाना चाह रही हूँ खुद को / खंड- खंड करना चाहा खुद को / मगर नहीं हो पायी / नहीं ....नहीं छू पायी / एक कण भी तेजाबी जलन की / क्योंकि / आत्मा / को उद्वेलित करती तस्वीर / शायद बयां हो भी जाए / मगर जब आत्मा भी झुलस जाए / तब कोई कैसे बयां कर पाए / देखा था कल तुम्हें / नज़र भर भी नहीं देख पायी तुम्हें / नहीं देख पायी हकीकत / नहीं मिला पायी आँख उससे / और तुमने झेला है वो सब कुछ / हैवानियत की चरम सीमा /शायद और नहीं होती / ये कल जाना / जब तुम्हें देखा / महसूसने की कोशिश में हूँ / नहीं महसूस पा रही / जानती हो क्यों / क्योंकि गुजरी नहीं हूँ उस भयावहता से / नहीं जान सकती उस टीस को / उस दर्द की चरम सीमा को / जब जीवन बोझ बन गया होगा / और दर्द भी / शर्मसार हुआ होगा

स्त्री चाहे पॊराणिक काल की हो या आधुनिक युग की, वह सदॆव ऎसे प्रश्नों से जूझती रही हॆ, जिनका उत्तर मांगने तक का उपक्रम, दुस्साहस कहलाता हॆ। नारी में त्याग एवं उदारता है, इसलिए वह देवी है। परिवार के लिए तपस्या करती है इसलिए उसमें तापसी है। उसमें ममता है इसलिए माँ है। क्षमता है, इसलिए शक्ति है। किसी को किसी प्रकार की कमी नहीं होने देती इसलिए अन्नपूर्णा है।नारी की कोमलता, सुन्दरता और मोहकता ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। नारी का प्रेम सृजनात्मक है। नारी सृष्टि सर्जक है। वह संकट-काल में भी साक्षात् काली बनकर संहार करने में समर्थ है। किन्तु समाज में जब इसी नारी का निरादर होता है , अनाचार होता है तो उसे एक शिक्षित व सभ्य समाज के हितकर नहीं मन जायेगा। किसी समाज या परिवार के विकास के लिए नारी का हर तरह से योगदान होता है , यदि वही दबी कुचली जाएगी तो फिर किसी प्रगतिशील समाज की संकल्पना भी नहीं की जा सकती। ऐसे समय में अपनी एक बिलकुल अलग तरह की कविताओं के माध्यम से पूर्वोत्तर की कवयित्री डॉ तोंब्रम रीता रानी देवी अपने काव्य संग्रह ' अँधेरे कमरे में बंद औरत ' में 'मुक्त कर दो उसे ' शीर्षक कविता में कहती हैं--

अय पुरुष …!/ स्त्री का तुमने / आज तक किया है शोषण / कभी माँ के नाम पर / कभी पत्नी के नाम पर / कभी बेटी के नाम पर / तो कभी बहू के नाम पर / और तुम कहाते रहे / पुरुषार्थी .... ! / स्त्री का शोषण / क्या पुरुषार्थ का काम है ? / क्या वास्तव में तुम पुरुषार्थ हो ?/जिसके मन में लहराता है पुरुषार्थ / जो होता है स्वामी सहस का / दूसरों को ऊपर उठाता है वो / रखकर प्राण हथेली पर / देकर अपना सर्वस्व / ओ पुरुषार्थी !/ तुमने तो जलाया है मुझे / बार -बार ....

भारतीय वैदिक साहित्य में नारी को देवी का स्वरुप माना गया है | वह जन्मदात्री है | उसकी अस्मिता की रक्षा करना समाज का नैतिक दायित्व बनता है। वह मायके में अपनी उड़ान , भाई बहन सब छोड़ कर ससुराल आती है , आते ही उस पर अंकुश लगा दिए जाते हैं , उसकी स्वतंत्रता छीन ली जाती है , उसे एक बोनसाई बनाकर रख दिया जाता है , जो खिलता तो है पर उसमें कभी परिपक्वता नहीं आती। हरकीरत हीर के संपादन में बोधि प्रकाशन से आई पुस्तक ' अवगुंठन की ओट से सात बहने ' ने स्त्री विमर्श के उस अनछुए पहलू को हमारे सामने रखा है | नारी शक्ति को समर्पित इस कृति की कविताओं का आस्वाद बिलकुल भिन्न है | इसी काव्य संग्रह में असमिया की एक कवयित्री कुंतला दत्त की ''बोन्साई '' शीर्षक कविता की इसी संदर्भ में कुछ पंक्तियाँ हैं -

बोन्साई की तरह रोपा गया हमें / एक 'शो पीस ' की तरह / सजाया गया हमें / बस एक निश्चित परिधि तक / पलने और बढ़ने दिया गया हमें / हाथ और पाँव / फ़ैलाने की स्वतंत्रता /होती हमें / बढ़ने लगें तो / निश्चित अवधि पर काट -छाँट दिया जाता है हमें / और निश्चित अन्विति पर फल प्राप्ति की / की जाती है आशा हमसे / पर उन फलों में / वह खासियत / वह परिपक्वता नहीं होती / जो आम फलों में होती है / जिनसे इक बलवान पौधा / फिर दोबारा जन्म ले सके / बोन्साई उम्र भर के लिए / होकर रह जाते हैं बौने ....

२१ वीं सदी की कवयित्रियों की रचनाओं में यह साफ प्रदर्शित होता है कि भारतीय समाज ने हमेशा से ही महिलाओं को पुरुषों की अपेक्षा दूसरे दर्जे का स्थान दिया है. उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति शोषित और असहाय से अधिक नहीं देखी गई. महिलाओं को हमेशा और हर क्षेत्र में कमतर ही आंका गया जिसके परिणामस्वरूप उनके पृथक अस्तित्व को कभी भी पहचान नहीं मिल पाई. उसे बचपन से ही उसके स्त्री होने आभास दिला दिया जाता है , उसकी संपूर्णता के विषय में गंभीरता से चिंतन करना किसी ने जरूरी नहीं समझा। डॉ मालिनी गौतम अपने काव्य संग्रह ''बूँद -बूँद का अहसास '' में 'काव्य कोकिला ' शीर्षक कविता में लिखती हैं -

मैं हूँ औरत / सर से पाँव तक औरत / पालने में ही घिस -घिस कर / पिला दी जाती है मुझे घुट्टी / मेरे औरत होने की / उसी पल से मुझे / कर दिया जाता है विभक्त / अलग -अलग भूमिकाओं में / बना दिया जाता है मुझे / नाज़ुक , कोमल , लचीली / ताकि मैं ज़िन्दगी भर / उगती रहूँ उधार के आँगन में / पनपती रहूँ अमर बेल बनकर / किसी न किसी तने का सहारा लिए / कुछ भी तो नहीं होता मेरा अपना / न जड़ें .... न आँगन / और न आसमान ……

इस पुरुष प्रधान समाज ने हमेशा ही स्त्री को घर की चारदीवारी में कैद रखा है । पुराने समय से ही देवदासी प्रथा , सती प्रथा , दहेज प्रथा , पर्दा प्रथा ने स्त्रियों की स्थिति को दयनीय बना दिया है। इस पुरुष प्रधान समाज में स्त्री बचपन में पिता , जवानी में पति और बुढ़ापे में पुत्रों की अवहेलना का शिकार होती आई है। कभी धोखे से जायदाद लेकर बेटा माँ को एयरपोर्ट पर अकेला छोड़ विदेश चला जाता है , तो कभी जायदाद के लिए उसकी हत्या तक कर देता है , उसे घर से निकाल देता है , या उसके मरने का इंतजार करता है ताकि जल्द से जल्द उसकी जायदाद पर कब्जा कर सके। जो माँ बेटे के जन्म पर खुशियाँ मानाती नहीं थकती वही माँ अपने अंतिम दिनों में उसी बेटे की आँखों में खटकने लगती है। इसी दृष्ट्व्य को हरकीरत हीर के सम्पादन में बोधि प्रकाशन से आई पुस्तक 'माँ की पुकार ' में आशमा कौल ने अपनी 'विडंबना ' शीर्षक कविता में बखूबी दिखाया है -

कितनी खुश हुई थी तुम / पुत्र के जन्म पर / थाल पिटवाए थे / लड्डू बंटवाए थे / गली के हर घर में / छिपाए रखती थी तुम / उसे सीने में / एक चीख पर उसकी / दौड़ी चली आती थी / काला टिका लगाकर /नज़र से उसे बचाती थी / बाँहों से उतरता न था / वह दिन रात / और तुम उसकी ख़ुशी / जाती थी भूल / थकी बाहों का दर्द / उसकी खातिर लड़ा करती थी सबसे / उसके हक के लिए / भीड़ जाती थी तुम .... / पर समय की चल ने बदला है आज / सबका ही हाल / अब जवान नहीं रही तुम / वह भी अब बच्चा नहीं है / आज वह बहुत स्याना हो गया है / छिपा कर रखता है तुम्हें / तुम्हारे के पिछले कोने में / कराहती हो दर्द में जब तुम / दरवाजा अपने कमरे का बंद करके / कहता है बीवी से / और कितने जियेगी बुढ़िया / यह सुनकर / कान बंद कर लेती हो तुम / कि कहीं बेटे के लिए कोई / बददुआ न निकल जाये …

भारत में विधवाओं की स्थिति भी बदतर है। विधवाओं को अशुभ माना जाता है. तमाम कानूनों के बाद आज भी उन्हें पति की संपत्ति से बेदखल कर दिया जाता है और वे दर-दर भटकने के लिए मजबूर हो जाती हैं। भारत में हर साल हजारों विधवाएं उत्तर प्रदेश के वृंदावन का रुख़ करती हैं. परिवारवालों ने उन्हें छोड़ दिया है और अब इस दुनिया में वे अकेली हैं। लोग स्त्री के विधवा होते ही लांछन और प्रताड़ना कर शिकार बना देते हैं। उसे घर से धक्के मार कर निकाल देते हैं। भले ही उसके पास जीने, रहने का कोर्इ आसरा न हो। इस 21वीं सदी में भारतीय स्त्री की प्रगति का दंभ करने से पहले एक बार गंभीरतापूर्वक खंगालना होगा उन कारणों को जो विधवाओं को आश्रमों में शोषित होने के लिए विवश कर रहे हैं। विधवा की स्थिति का कमलेश शर्मा ने अपने काव्य -संग्रह 'कल्पना ' के अंतर्गत 'विधवा ' शीर्षक कविता में बखूबी वर्णन किया है ---

'' विधवा बेचारी का जीवन क्या रह जाता है / उसके पति के मरते ही सभी खत्म हो जाता है / उसके सभी रंग फीके पड़ जाते हैं / जीने के सभी अधिकार छीन लिए जाते हैं / दे दिए जाते हैं सफेद कपड़े पहनने को / कोई नहीं मौका दिया जाता उसे हँसने चहकने को …''

देखा जाये तो विश्व में आधी आबादी स्त्रियों की है। लेकिन उसकी पहचान माँ , पत्नी , बहन , बेटी , प्रेमिका आदि से ही की जाती है , एक स्वतंत्र और स्वावलंबी स्त्री की हैसियत से नहीं। नारी की इस दुखद स्थिति एवं विडंबनापूर्ण नियति के लिए सांस्कृतिक मान्यताएं एवं धारणाएं जिम्मेदार हैं वरना नारी तो अकेले ही समय के तूफानों से मुकाबला करने का साहस रखती है . आज नारी अपनी पहचान स्वयं बनाने को तत्पर है। हवाओं में चिराग़ जलाने वाली , तूफानों में किश्ती बहाने वाली नारी आज पुरुष से किसी भी मायने में कम नहीं। लंदन की कवयित्री 'कमलेश शर्मा ' अपने काव्य संग्रह 'वंदना ' में 'नारी ' शीर्षक कविता में लिखती हैं --

इतना कमजोर न समझो नारी वह चट्टान है / हिला न सकोगे , माथा पटकोगे , दो टूक हो जाओगे / बिखर जाओगे छोटे कंकड़ों की तरह / नारी तो चट्टान है उसे हिला न पाओगे / ममता की मूर्त है , तन मन धन लुटा देती है / अपने पराये , सभी आँचल में छिपा लेती है / वह साक्षात है प्यार की देवी /अपनी पराये सब पर प्यार न्योछावर कर देती है . …

सच है स्त्री अपने हर रूप को कर्तव्यता से जीती है , चाहे वह माँ रूप में हो , बहन रूप में या बेटी रूप में , वह अपनी पीड़ा भूलकर भी सबके सुख के लिए तत्पर रहती है। अपने इसी काव्य संग्रह में कवयित्री 'बेटी ' शीर्षक कविता में कहती हैं --- '' बेटी वह , जो हमेशा हर समय साथ देती है / लेने की इच्छा है उसे , सदैव मायके के लिए जान देती है / सदा दुआएं मांगती रहती माँ के घर की /मायके से जाकर भी , क़ुरबानी कर देती है अपने तन की। ''

आज नारी ने स्वयं को 'वस्तु' मानने से इंकार कर दिया है , अपने शरीर के ख़िलाफ़ शोषण का वैचारिक मोर्चा उठा लिया है और इस पुरुष प्रधान समाज की ज्यादतियों , पारंपरिक रीति -रिवाज़ों एवं विवाह प्रणाली के विरुद्ध विद्रोही रुख़ अख्तियार कर लिया है। वह इस पुरुष प्रधान समाज से जानना चाहती है कि शरीर की पवित्रता के सारे प्रमाण पत्र उसी से ही क्यों ? कभी पुरुष से उसकी पवित्रता के लिए क्यों प्रश्न नहीं उठाये जाते ? क्यों उस पर कोई रोक -टोक लक्ष्मण रेखाएं नहीं खींची जाती। कंचन शर्मा अपने काव्य संग्रह ' तालाब में कंकड़ ' की 'नारी ' शीर्षक कविता में कुछ इसी तरह के प्रश्न उठाती हैं , देखिये --

कौन हो ? कहाँ से आई ?/ क्या नाम है ?/कौन पिता , कौन पति तुम्हारा ?/ सुहागन , पतिता या कुमारी ?/प्रश्न ये सभी / क्यों पुरुष से नहीं ? / पिता , पति , पुत्र /सर्वत्र पुरुष ही /नारी का परिचय ?/पवित्रता का प्रमाण पत्र ? भाग्यविधाता ?/और -/ पुरुष के लिए - / ऐसा कुछ भी नहीं ; / क्यों ?

इस 'क्यों' में स्त्री के भीतर की समस्त आक्रोश छिपा है। स्त्री होने के गुनाह स्वरूप जो उस पर पाबंदियां लगाई गयी हैं उनके विरुद्ध उठी उसकी ये आवाज़ समाज से जवाब चाहती है। अब वह इस झूठे संस्कार रीति -रिवाज़ों, लज्जा के तमाम आवरण तोड़ पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलना चाहती है। इसी काव्य- संग्रह में कंचन शर्मा ने अपनी भूमिका काव्य रूप में लिखते हुए कहती हैं -ढहा दे झूठे संस्कारों / रीति -रिवाज़ों / लज्जा और पवित्रता की दीवारें ! / जो चारों ओर खड़ी हैं / और तुम - / घूँघट ताने , छाती झाँपे / कब तक बकरी बन मिमयाओगी ?

औरत ,औरत पैदा नहीं होती उसे औरत बना दिया। बचपन से ही उसके अंदर लड़के और लड़की का भेद -भाव भर दिया जाता है और बड़ी होते -होते वह अपना भाग्य पुरुष के हाथों सौंप देती है। कौमार्य में पिता , यौवन में पति और बुढ़ापे में पुत्र के आगे लाचार बनकर रह जाती है। उसका स्वयं का कोई वजूद नहीं कोई अस्तित्व नहीं , कोई पहचान नहीं। इसी बात को कवयित्री शशि प्रभा अत्रि अपने काव्य -संग्रह ' आस्था , एहसास और स्वीकृति ' में 'पहचान ' शीर्षक कविता में बखूबी कहती हैं --

मैं / आंसुओं की लौ में / मोमबत्ती से / लगातार / पिघलती चली गई / और / अपना आकर खो दिया / आश्चर्य / मेरे अस्तित्व की लाश पर / तुमने अपनी पहचान कायम की

जैसे-जैसे समाज में नारी की निरीह स्थिति में बदलाव आया है और वह अबला से सबला बनने की तरफ अग्रसर हुई है, वैसे-वैसे वह अपने अधिकारों के प्रति सजग और सचेत भी हुई है। परिणामस्वरूप पुरूष प्रधान समाज के बंधनों के खिलाफ उसने विद्रोह किया है। स्त्री के क्रांतिवीर तेवरों से परिवार की बुनियादें हिल गयी हैं और पारिवारिक विघटन भिन्न-भिन रूपों में समाज में पसरता जा रहा है। इसका मुख्य कारण यह है कि पुरूष का परम्परागत मध्ययुगीन मानस स्त्री के मौलिक अधिकारों को स्वीकार नहीं कर पाता। वह उसे दबाना चाहता है और स्त्री अपनी गुलाम मानसिकता वाली सती-साध्वी, प्रेयसी या पति-परमेश्वरी छवि को तोड़कर अपना स्वतंत्र वजूद बनाना चाहती है। सामंती समाज में स्त्री माँ, बहन, पत्नी, प्रेमिका, दासी आदि के रूप में थी-उसका अपना अलग वजूद नहीं था। आधुनिकता और बौद्धिकता के कारण वह अपने निजी स्वरूप और अपनी भावनों एवं इच्छाओं के प्रति सचेत हुई है।वह भी खुले आकाश उड़ान भरना चाहती है , अपनी पहचान बनाना चाहती है। ऐसे में मुझे पूर्वोत्तर की कवयित्री कुसुम लता जैन की 'खुले आकाश में ' शीर्षक कविता याद आती है -

रोको मत मुझे भी उड़ने की मोहलत दो / उन्मुक्त हो खुले आकाश में ताकि / पहुंच सकूँ गगन के उस छोर पर / जहां खुशियों के उगते इन्द्रधनुष पर झूम सकूँ / सपनों के हकीकत के मुस्कुराते चाँद पर नाच सकूँ /उमंगों के झिलमिलाते सितारों पर कूक सकूँ / जहाँ न हो