वर्ष 4, अंक 40. अगस्त 2018



जनकृति का 40वां अंक आप सभी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है। मार्च 2015 से अब तक के सफर में हमें जिस तरह वैश्विक स्तर पर पाठकों, लेखकों, संस्थानों का सहयोग मिला उसके कारण ही जनकृति को अत्यंत कम समय में एक विशिष्ट पहचान मिली। इस बीच सफर में कई ऐसे अवसर आए जब पत्रिका के प्रकाशन में दिक्कत हुई परंतु हम शुक्रगुजार हैं अपने शुभचिंतका का, जिन्होने पत्रिका पर अपना भरोसा बनाए रखा और पत्रिका को हर संभव सहायता की। हमारा मानना है कि किसी पत्रिका की रीढ़ उसके पाठक, उसके लेखक होते हैं और इसी पर पत्रिका के भविष्य की सम्पूर्ण इमारत टिकी होती है।

जनकृति के अब तक के सफर में हमने प्रयास किया कि पत्रिका के माध्यम से आप विभिन्न क्षेत्रों के विविध विषयों से रूबरू हो। इसके लिए पत्रिका में समय-समय पर नवीन स्तंभों को शामिल किया गया। प्रत्येक अंक के साथ जो सुझाव हमें पाठकों की ओर से प्राप्त हुए उसपर भी गंभीरता से विचार किया गया।

पाठकों को सूचित करते हुए यह हमें प्रसन्नता हो रही है कि जनकृति वर्तमान में विश्व के दस से अधिक रिसर्च इंडेक्स में शामिल है। इसके अतिरिक्त जनकृति की इकाई विश्वहिंदीजन से विगत दो वर्षों से हिन्दी भाषा सामग्री का संकलन किया जा रहा है साथ ही प्रतिदिन पत्रिकाओं, लेख, रचनाओं का प्रचार-प्रसार किया जाता है। जनकृति की ही एक अन्य इकाई कलासंवाद से कलाजगत की गतिविधियों को आपके समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है साथ ही कलासंवाद पत्रिका का प्रकाशन भी किया जा रहा है। जनकृति के अंतर्गत भविष्य में देश की विभिन्न भाषाओं एवं बोलियों में उपक्रम प्रारंभ करने की योजना है इस कड़ी में जनकृति पंजाबी एवं अन्य भाषाओं पर कार्य जारी है।

जनकृति के द्वारा लेखकों को एक मंच पर लाने के उद्देश्य से विभिन्न देशों की संस्थाओं के साथ मिलकर ‘विश्व लेखक मंच’ के निर्माण का कार्य जारी है। इस मंच में विश्व की विभिन्न भाषाओं के लेखकों, छात्रों को शामिल किया जा रहा। इस मंच के माध्यम से वैश्विक स्तर पर सृजनात्मक कार्य किये जाएँगे।

अंत में हम जनकृति के दो सम्मानित सम्पादन मण्डल सदस्यों प्रो. ओमकार कौल एवं तेजिंदर गगन जी के प्रति श्रद्धांजलि प्रकट करते हैं।

धन्यवाद

-कुमार गौरव मिश्रा

साहित्यिक विमर्श/ Literature Discourse

कविता [7-14]

कारुलाल जामड़ा, नीरज द्विवेदी, सुविधा पंडित, सुशांत सुप्रिय, हरदीप सबरवाल

नवगीत [14-15]

· अंजना वर्मा

ग़ज़ल [16]

· डी.एम.मिश्र

कहानी [17-19]

· तृप्ति : चेतना भाटी

लघुकथा [20]

· युग-विडम्बना: अशोक दर्द

· इज्जत: निशा मिश्रा

पुस्तक समीक्षा [21-28]

· ‘आवाजें’ (कहानी-संग्रह) : एक समीक्षात्मक अध्ययन- समीक्षक: रितु अहलावत

· समीक्षा/ जिंदगी की जद्दोजहद और दुश्वारियों का आईना है उपन्यास ‘’मैं शबाना’’ समीक्षक- फारूक आफरीदी

व्यंग्य [29-30]

· मार्किट ददाति मोटिवेशन: अमित शर्मा

यात्रा वृत्तांत [30-32]

· तिरुवनंतपुरम (केरल): गुलाबचंद एन पटेल

संस्मरण [33-34]

· जनरल डिब्बे का सफर: मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

साहित्यिक लेख [35-51]

· ‘आपका बंटी’: बंटी के अपराधी - मगन परमार

· नये काव्यशास्त्र/ सौंदर्यशास्त्र की आवश्यकता और नये कवि: दिविक रमेश

मीडिया- विमर्श/ Media Discourse

· एनडीटीवी न्‍यूज चैनल का प्रबंधन और उसके द्वारा किए गए सामाजिक उत्‍तरदायित्‍व- कुमारी कंचन रानी [शोध आलेख] [52-56]

कला- विमर्श/ Art Discourse

· Rasa Siddhānta (Theory of Aesthetic Pleasure): The Soul of Literary Composition: Dr. Dilip K. Madhesiya [Research Article] [57-65]

· बदलते सिनेमा में बदलती स्त्री: प्रज्योत पांडुरंग गावकर [आलेख] [66-68]

दलित एवं आदिवासी- विमर्श/ Dalit and Tribal Discourse

· ‘दलित कहानियों’ का समाजशास्त्रीय अध्ययन: सतवंत सिंह [शोध आलेख] [69-73]

· आदिवासियों के विकास में सामुदायिक रेडियो का योगदान: उमा यादव [शोध आलेख] [74-77]

· आदिवासी जीवन संघर्ष और समकालीन अभिव्यक्ति: - डॉ. धीरेन्द्र सिंह [शोध आलेख] [78-83]

· असम के बर्मन कछारी और राभा समुदाय की जीवन शैली व धार्मिक विश्वास- वीरेन्द्र परमार [शोध आलेख] [84-87]

स्त्री- विमर्श/ Feminist Discourse

· हिंदी स्त्री आत्मकथाओं में स्त्री जीवन का आर्थिक पहलू: चन्दा कुमारी[शोध आलेख] [88-97]

· फुकुशिमा की आपदा एवं महिलाएँ: प्रतिमा यादव [शोध आलेख] [98-102]

बाल- विमर्श/ Child Discourse

· हिंदी बाल पहेलियों की विकास यात्रा: डॉ. कुमारी उर्वशी [शोध आलेख] [103-108]

भाषिक- विमर्श/ Language Discourse

· हिंदी की यात्रा- संस्कृति की विकास यात्रा: डॉ० ममता खांडल [शोध आलेख] [109-115]

शिक्षा- विमर्श/ Education Discourse

· बालिका शिक्षा: कहाँ हैं हम ?: अखिलेश यादव [शोध आलेख] [116-125]

समसामयिक विषय/ Current Affairs

· नक्सलवाद: समस्या एवं समाधान (सुरक्षा, कुशल प्रशासन और विकास) के संदर्भ में: डॉ. अजय कुमार सिंह [लेख] [126-136]

· ट्रैफ़िकिंग बनाम यौन-उद्योग: उर्मिला कुमारी [शोध आलेख] [137-146]

· Abe doctrine and its impact on US-Japan Alliance: Vikash Yadav [Research Article][147-152]

शोध आलेख/ Research Article

· सहरिया समाज की विभिन्न परम्पराओं का सामाजिक मूल्यांकन: दीपा कनौजिया [153-155]

· हिंदी नवजागरण में वर्ण एवं जाति की प्रगतिशीलता का प्रश्न : विनय कुमार गुप्ता [156-162]

· ग्राम स्वराज और महात्मा गांधी: डॉ.संजीव कुमार तिवारी [163-169]

· जैन साहित्य में वर्णित योग: डॉ0 रजनी जैन [170-174]

· कामायनीः प्रतीकों का जटिल संयोजन: आशुतोष तिवारी [175-181]

· भीष्म साहनी के कबीर: कल आज और कल: शिल्पा शर्मा [182-192]

· रघुवीर सहाय की काव्य-संवदेना: उमा सैनी [193-197]

अनुवाद/ Translation

· जर्मन कवि रोज़ा आउसलेण्डर की दस कविताओं का हिंदी अनुवाद: अनुवादक- प्रतिभा उपाध्याय [198-200]

· तेलुगु लघुकथा ‘हस्ताक्षर’ (लेखिका- जाजुला गौरी) का हिंदी : अनुवादक- के कांचन [201-209]

साक्षात्कार/ Interview

· नवोदित फिल्म अभिनेता राजशेखर साहनी से मुकेश कुमार ऋषि वर्मा [210-211]

प्रवासी साहित्य

· नवोदित फिल्म अभिनेता राजशेखर साहनी से मुकेश कुमार ऋषि वर्मा [212-217]

धर्मपाल महेंद्र जैन की कविताएँ

दो साल की वह

एक अक्षर से बनता है शब्द उसका

एक अक्षर से बनता है वाक्य उसका

एक अक्षर से बनती है भाषा उसकी

वह सब कह जाती है एक अक्षर में, जो चाहती है कहना।

वह बोलती है - माँ

तो पा लेती है समूची धरती।

वह बोलती है - पा

तो छू लेती है सारा आकाश

वह सिखला जाती है मुझे

अभिव्यक्ति के लिए


एक अक्षर ही बहुत है।

वे अक्षर जो रोपे

कल जो बीत गया

उससे कुछ क्षण चुरा लिए मैंने

उनको रोप दिया

वे अक्षत क्षण

वे अक्षय क्षण

लगे मुझे वे बीजमंत्र, प्रणवाक्षर

अ-क्षर।

वे अक्षर अपरिमित धरती से

अभिसिंचित हो, अभिमंत्रित हो

खिलें उसकी गोदी में कोंपल से

धूल हटाते, माटी से ऊपर आ पाएं

इसलिए -

ओ सूरज तुमको आना होगा

वायु तुमको गाना होगा

धरा तुम्हारी परिक्रमा से समय चलेगा

नदी बहेगी

सागर रह-रह वाष्प बनेगा

इन्द्रधनुष की प्रत्यंचा पर होंगे बादल

धरती बोलेगी, गाएगी

लहराएगी नन्हें पौधों में।

वे अक्षर जो कल रोपे मैंने


पनपेंगे कविता के वृक्षों-से।

बार-बार लिख रहा हूँ

बार-बार लिख रहा हूँ

वही एक कविता जो

मैं कभी लिख नहीं पाया।

क्यों ऐसा होता है हर दिन

कि सुबह उठने पर

खड़े हो जाते है बहुत-से शब्द

जो रात से घेराव कर रहे थे

नहीं सोने दे रही थी उनकी नारे-बाज़ी

क्या मालूम क्या कहना चाहते थे वे

मैं उनींदा बेख़बर रहा उनकी बातों से

वे रेतीला तूफ़ान बन घुस गए आँखों में

उड़ा गए नींद।

मैंने बहुत समझाया उन्हें

कि मैं तुम्हें ही तो लिख रहा हूँ

कि बार-बार लिख रहा हूँ

वे नहीं माने

चिन्दी-चिन्दी कर गए कागज़

कभी जला गए होली और

चिल्लाते खड़े हो गए –

तुम वह क्यों नहीं लिखते जो हम हैं

जो हम कह रहे हैं

तुम क्यों हममें खोजने लगते हो

उपमान, सौन्दर्य, प्रतीक, राग

ये तो हम नहीं हैं

हम नहीं हैं भाषा का मकड़जाल।

मैं फिर से लिख रहा हूँ

बार-बार लिख रहा हूँ


नई कविता।

ईमेल : dharmtoronto@gmail.com

फ़ोन : + 416 225 2415


सम्पर्क : 1512-17 Anndale Drive, Toronto M2N2W7, Canada

राकेश सुमन की कविता

अस्तित्व

तपते हुए पंखो पर,

ढोकर झुलसी उड़ान,

वह नीड़ पर लौट आयी।

चौखट पर उतार दी उसने,

दिन के अनुभवों की,

काटती चप्पल।

थके हुए वस्त्रो को,

अलमारी में टाँग,

ओढ़ ली उसने,

एक सुघड़ ग्रहणी,

एक प्यारी माँ,

और एक अच्छी पत्नी।

ऐसा वह रोज करती है,

रोज फैलाती है अपने पंखो को,

रोज नापती है तपिश,

तपते आकाश की,

जो घर से बाहर है,

और रिश्तो की,

जो घर के भीतर है।

रोज भरती है वह उड़ान,

झुलसती, तपती,

बाहर घर के,

और घर के भीतर भी,

रोज।

लेकिन क्यों ?

यही प्रश्न पूछती है,

वह स्वयं से,

समेटती हुयी स्वयं को,

स्वयं के पंखो में,

खोजती स्वयं में,

उत्तर स्वयं से।

और तब उन्ही,

किन्ही क्षणो में,

उदित होता है,

अंतरभाव,

कि यह तपते पंख नहीं,

यह है उसका अस्तित्व,

जिससे,

भरती है वह उड़ान रोज,

घर के बाहर,

और घर के भीतर भी।

और इसलिए वह,

रोज फैलाती है अपने पंख,

नापती है तपिश,

जो बाहर है घर के,

और भीतर है घर में।

रोज।

राकेश सुमन


बोईसर (महाराष्ट्र)

व्यग्र पाण्डे की कविता

एक बार फिर...

वो

चला तो ठीक था

लोग कहते थे

इसमें

शक्ति है/बुद्धि है

और चातुर्य भी

ये जीत जायेगा

दौड़ अपनी,

पर क्या हुआ ?

गंतव्य से पहले ही

शायद

वो भटक गया

उसकी सब विशेषताएं

उड़ गई

सूखे पत्तों की तरह

या फिर

भूल गया वो

कि वह एक

विशेष कार्य को निकला था

वो अटक गया

राह की चकाचौंध में

और चटक गया

उसका लक्ष्य

शीशे की तरह...

दौड़ का समय

पूर्ण होने को है

अबकी बार

खरगोश सोया तो नहीं

अति आत्मविश्वास में

यहां वहां घूमता रहा

लगता है

एक बार फिर


कचुआ

जीत जायेगा

दौड़ अपनी ...

व्यग्र पाण्डे, कर्मचारी कालोनी,

गंगापुर सिटी, स.मा. (राज.) 322201

मोबा:- 9549165579

ई-मेल :-vishwambharvyagra@gmail.com

संगीता सहाय की कविता

काम पर जाने वाली औरत

अलसुबह उठती है वो

अपने उनिंदे नयनों को

ठंढे पानी के छींटो से

तरोताजा करती ....

जुट जाती है

‘काम’ पर जाने के

पहले वाले कामो पर.

सधे हाथो से निपटाती है-

झाडू-पोंछा,

आटा-मसाला,

रोटी-दाल-सब्जी,

और भी ढेरो काम.

निपटकर चुल्हा-चौके से

थमती है पलभर

लेकर एक गहरी सांस

देखती है

बेफ्रिक सोये घरवालों को.

उसकी आँखों में नाराजगी की

अश्फूट रेखा झलकती है.

और वो फिर से लग जाती है

शेष कामो के निपटारे में.

ईश्वर के सामने

धूप-दीप करते उसके हाथ,

प्रार्थना के चंद कतरे

उच्चारते उसके होंठ,

घड़ी की सूइयों की ओर

तकती उसकी आँखे,

और सुबह से शाम तक के कामों के

फेरहिस्त बनाते उसके दिमाग

सब चलते हैं एक साथ.

उसे याद आती है

अपनी बीमार माँ की

जिनसे मिले हो गए है महिनो.

मन की आकुलता

आँखों से पानी बनकर बरसते हैं.

चाय का कप लेकर आती

नन्हीं सी बेटी

उसके ख्यालों के दुर्ग को भेदकर

चेहरे पर एक स्मित सी

मुस्कान बिखेरती है.

प्यालों से उठते भाप के धूंध में

अपने वजूद को तलाशती वह

जानना चाहती है

अपने लिए अपने होने के मायने.

संगीता सहाय.

पुलिस कालोनी, B – 175

अनीसाबाद, पटना बिहार

मोबाईल नंबर – 9905400867.


ईमेल; sangitasahay111@gmail.com


शिव कुशवाहा की रचनाएं --------------- 1 कुएं की मुंडेर पर -------------- अब नहीं दीखते हैं कुएं जिनमें डूबते-उतराते निहारा करते थे लोग अपना प्रतिबिम्ब.

कुएं के मुहाने पर खडे़ होकर लोग लगाते थे आवाज़ औऱ उन आवाजों की लौटती प्रतिध्वनियां सुनकर ठहर जाते थे राही.

रस्सी के सहारे बंधी बाल्टी उतर जाती जब कुएं के अंतस्तल में तब फूट पड़ता कुएं का राग - आलाप जिसे सुनकर राही बिना पानी पिए ही तृप्त हो जाते थे.

आज कुएं की मुंडेर पर बैठा सोच रहा हूं निर्बाध समय की गति ने पीछे धकेल दिया है कुएं के अस्तित्व को.

विस्मृत पन्नों के भूले हुए इतिहास की तरह रह गए हैं कुएं जहां प्यास ही प्यास है मानव तृषा अभिशप्त - सी खडी़ है कुएं के इर्द-गिर्द...

2 तेज चलती हुई सड़कें ----------- धूल भरी सड़क के किनारे देखना चुपचाप आते जाते हुए लोगों को असंख्य उम्मीदों का एक ऊंचा पहाड़ ढो रहे कंधों पर..

आगे निकलने की होड़ में दिखाई देते हैं वो लोग मुझे सबसे पीछे जो समय को बांध लेते हैं जीवन के साथ एकपल के लिए भी सांस लेने की फुर्सत नहीं सिर्फ चलना ही है जिनका मकसद..

तेज चलती हुई सड़कें दौड़ते हुए लोगों के लिए बन जाती हैं जिंदगी की रफ्तार जहां कोई भी नहीं देखता ठहरकर संवेदना के दरख़्त सूखते हुए दिखाई देते हैं चारो ओर..

जहर उगलते आबो-हवा से जूझते हुए निकल जाना चाहता है मन बहुत दूर जैसे पंक्ति का आखिरी आदमी बोझिल हो चुके जीवन के एकांत से निकलना चाहता है चुपचाप उसी तरह सड़कें भी छोड़ देना चाहती हैं सबका साथ...

3 मां: पयस्विनी नदी है -------------- संवेदना का उत्स जहां से निकलकर परिणत हो जाता है पयस्विनी नदी में वह स्रोत ममत्व की धारा के साथ निसृत होता है मां के अंक में..

वह अनकही पीड़ा को सहेजकर रखती है हृदय- सागर की अथाह गहराईयों में..

वह जीवन की एक पूरी यात्रा की साक्षी बनकर सींचती रहती है अपनी वंश डालियां..

युगों की परिभाषा से मुक्त स्नेह और ममत्व से अविचल हिमालय की ऊंचाई से कहीं ऊपर वह प्रवाहित रहती है हमारी धमनियों में..

मां पयस्विनी नदी है जीवन-धारा बनकर बह रही है हमारे साथ- साथ...

पता - द्वारा श्री विष्णु अग्रवाल लोहिया नगर, गली नं- 2, जलेसर रोड़, फिरोजाबाद ( उ प्र), पिन- 283203 सम्पर्क सूत्र- 07500219405 E mail- shivkushwaha.16@gmail.com

नवीन मणि त्रिपाठी की गज़लें

1-

इस चमन में गुबार मत करना।

अम्न को तार तार मत करना।।

हो रही हर तरफ़ नई साज़िश।

बेसबब जां निसार मत करना।।

कर्ज कुछ तो वतन का है तुम पर।

खून को दागदार मत करना।।

ख़्वाहिशें गर हैं आज़माने की।

हौसलों से फ़रार मत करना।।

लूट लेता है मुस्कुरा कर वो।

दिल का सौदा उधार मत करना।।

कैसे कह दें बहक नहीं सकते।

तुम अभी ऐतबार मत करना।।

उम्र गुजरी इसे बनाने में।

दोस्ती में दरार मत करना।।

माँग कर फिर मेरी मुहब्बत को।

प्यार को शर्म सार मत करना।।

क़ामयाबी अगर ज़रूरी है।

ख़ाब को इश्तिहार मत करना।।

मैं तुम्हारी नियत से वाक़िफ़ हूँ।

कोई ताज़ा शिकार मत करना।।

फासले बेहिसाब बढ़ते हैं।

दौलतें बेशुमार मत करना।।

2

कफ़स में ख़्वाब उसको आसमाँ का जब दिखा होगा।

परिंदा रात भर बेशक़ बहुत रोता रहा होगा।

कई आहों को लेकर तब हजारों दिल जले होंगे।

तुम्हारा ये दुपट्टा जब हवाओं में उड़ा होगा।।

यकीं गर हो न तुमको तो मेरे घर देखना आके।

तुम्हारी इल्तिज़ा पे घर का दरवाजा खुला होगा।।

रकीबों से मिलन की बात मैंने पूछ ली उससे।

कहा उसने तुम्हारी आँख का धोका रहा होगा।।

बड़े ख़ामोश लहज़े में किया इनकार था जिसने।

यकीनन वह हमारा हाल तुमसे पूछता होगा।।

उठाओ रुख़ से मत पर्दा यहां आशिक मचलते हैं।

तुम्हारे हुस्न का कोई निशाना बारहा होगा।।

तबस्सुम आपका साहब हमारी जान लेता है।

अदालत में कभी तो जुल्म पर कुछ फैसला होगा।।

चले आओ हमारी बज़्म में यादें बुलाती हैं।

तुम्हारा मुन्तज़िर भी आज शायद मैक़दा होगा।।

अगर है इश्क़ ये सच्चा तो फिर वो मान जायेगी।

मुहब्बत में भला कैसे कोई शिक़वा गिला होगा।।

बड़ी आवारगी की हद से गुज़री है मेरी ख्वाहिश।

तुझे कैसे बताऊं इश्क़ में क्या क्या हुआ होगा।।

वो पीता छाछ को अब फूंककर कुछ दिन से है देखा।

मुझे लगता है शायद दूध से वह भी जला होगा।।


किया था फ़ैसला उसने जो बिककर ज़ुल्म के हक़ में।

ख़ुदा की मार से यारों वही रोता मिला होगा।।

नवीन मणि त्रिपाठी

जी वन 28, अर्मापुर इस्टेट कानपुर

दूरभाष 9839626686

भूकम्प


सुशांत सुप्रिय

(समय के विराट् वितान में मनुष्य एक क्षुद्र इकाई है"-अज्ञात।)

ध्वस्त मकानों के मलबे में हमें एक छेद में से वह दबी हुई लड़की दिखी। जब खोजी कुत्तों ने उसे ढूँढ़ निकाला तब भुवन और मैं अपना माइक और कैमरा लिए खोजी दल के साथ ही थे। धूल-मिट्टी से सने उस लड़की के चेहरे को उसकी विस्फारित आँखें दारुण बना रही थीं। मलबे में चारों ओर लाशें दबी हुई थीं। ऊपर हवा में गिद्ध मँडरा रहे थे। मलबे में दबे-कुचले लोगों की कराहों और चीत्कारों से पूरा माहौल ग़मगीन हो गया था। इस सब के बीच दस-ग्यारह साल की वह लड़की जैसे जीवन की डोर पकड़े मृत्यु से संघर्ष कर रही थी। उसके दोनों पैर शायद कंक्रीट के भारी मलबे के नीचे दबे हुए थे। वह दर्द से बेहाल थी। एक बड़े-से छेद में से टी. वी. कैमरे उसकी त्रासद छवि पूरे देश में प्रसारित कर रहे थे। और ठीक उस बड़े-से छेद के ऊपर भुवन मुस्तैदी से मौजूद था -- उस लड़की से बातें करता हुआ, उसे हौसला देता हुआ।

दिसम्बर की उस बीच रात में अचानक एक भीषण गड़गड़ाहट हुई थी। भूकम्प के झटके इतने तेज़ थे कि राज्य के दूर-दराज़ के उस पहाड़ी शहर की सभी इमारतें भड़भड़ा कर गिर गई थीं। सोए हुए लोगों को बचने का कोई मौक़ा ही नहीं मिला। सैकड़ों लोग कंक्रीट के टनों मलबे के नीचे दब गए थे। राज्य की राजधानी में रिक्टर स्केल पर भूकम्प के भयावह झटके को 6.4 के पैमाने पर मापा गया था। यह एक विनाशकारी भूकम्प था जिसने पूरे इलाक़े को तबाह कर दिया था।

इस भयानक घटना की सूचना मिलते ही अगली सुबह भुवन को बॉस का फ़ोन आया था कि वह हादसे वाले क्षेत्र के लिए फ़ौरन निकल जाए। टेलिविज़न चैनल वालों ने तुरत-फुरत एक हेलिकॉप्टर का बंदोबस्त कर दिया था। भुवन ने मुझे फ़ोन लगाया और साथ चलने के लिए कहा। मैं उसका सहयोगी हूँ। हमने कई आपात स्थितियों को साथ-साथ कवर किया है। भुवन का फ़ोन आते ही मैंने फटाफट काम का ज़रूरी सामान एक बैग में डाला और हेलीपैड पर पहुँच गया। हम दोनों तत्काल हेलिकॉप्टर में बैठ कर घटना-स्थल के लिए रवाना हो गए।

हम वहाँ पहुँचने वाले पहले पत्रकार थे। बाक़ी पत्रकार साइकिलों, जीपों और बसों के सहारे वहाँ पहुँचने का प्रयास कर रहे थे, जबकि हमारे हेलिकॉप्टर ने हमें ठीक घटना-स्थल पर ही उतार दिया था। दोपहर तक वहाँ एक ओ.बी. वैन का बंदोबस्त कर लिया गया था और हम भूकम्प से होने वाली उस त्रासदी की भयावह छवियाँ उपग्रह के माध्यम से वापस टी. वी. स्टेशन में बीम करने लगे थे। बिलखते हुए अनाथ बच्चे, चीख़ते-कराहते घायल, मलबे में दबी लाशें -- इन सभी छवियों के साथ भुवन की संयत आवाज़ राज्य और देश भर में प्रसारित हो रही थी।

हम दोनों ने साथ-साथ कई युद्धों और दुर्घटनाओं को कवर किया था, चाहे वह कारगिल का युद्ध था या केदारनाथ, उत्तराखंड में आई भीषण तबाही थी। बड़े-से-बड़े हादसे के बीच भी मैंने कभी भुवन को विचलित होते हुए नहीं देखा था। रिपोर्टिंग करते हुए वह हर ख़तरे, हर त्रासदी का सामना सधे हाथों से माइक पकड़े हुए सधी आवाज़ में करता था। मुझे लगता था कि कोई भी भयावहता उसे हिला नहीं सकती। शायद माइक और कैमरे के लेंस का उस पर गहरा प्रभाव पड़ता था -- तब वह ख़ुद को हादसे से अलग रखते हुए सारी घटना को तटस्थ भाव से देख पाता था। अलगाव की यह दूरी ही उसे भावनाओं की बाढ़ में बहने से बचाए रखती थी।

भुवन शुरू से ही मलबे के नीचे दबी उस लड़की को बचाने के प्रयास में जुट गया। उसने उस ध्वस्त इमारत के आस-पास की फ़िल्म बनवाई और फिर स्लो-मोशन में कैमरे को उस बड़े से छेद में डाल कर उस सहमी हुई लड़की पर ज़ूम करवा दिया। उसका धूल-मिट्टी से सना चेहरा, उसकी क़तार आँखें, उसके उलझे हुए बाल -- सब कुछ भुवन की सधी हुई आवाज़ में हो रही कमेंट्री के साथ टी. वी. पर प्रसारित हो रहा था। भुवन ने उसे ' बहादुर लड़की ' की संज्ञा दी जो अपनी जिजीविषा के सहारे विकट परिस्थितियों से जूझ रही थी। बचावकर्मियों ने उस छेद में से नीचे उस लड़की के पास एक मज़बूत रस्सी फेंकी। पर तब लड़की ने सबकी शंका को पुष्ट करते हुए बताया कि उसके दोनों पैर कंक्रीट के भारी मलबे के नीचे दबे हुए थे, और वह ख़ुद से बाहर नहीं निकल सकती थी। अब भारी क्रेन के आने की लम्बी प्रतीक्षा शुरू हुई -- वह क्रेन जो मलबा हटा कर उस लड़की को सुरक्षित निकाल पाती।

यह वहाँ हमारा पहला दिन था, और शाम घिरने लगी थी। साथ ही ठंड बढ़ने लगी थी। भुवन ने अपना जैकेट उतार कर नीचे फँसी ठंड से ठिठुरती लड़की को पहनने के लिए दे दिया था।

" बेटी, तुम्हारा नाम क्या है ? " भुवन ने कोमल स्वर में पूछा था। जवाब में उस लड़की ने कमज़ोर-सी आवाज़ में कहा था, " मीता। " भुवन लगातार उससे बातें कर रहा था, उसे दिलासा दे रहा था। " हम तुम्हें बचा लेंगे, मीता। कल बड़ी क्रेन आ जाएगी जो सारा मलबा हटा कर तुम्हें बाहर निकाल लेगी। " एक डॉक्टर आ कर लड़की के लिए दर्द की दवाई दे गया था। मीता के खाने के लिए थोड़ा दूध और ब्रेड ऊपर छेद में से नीचे भेजा गया था। उसका ध्यान बँटाने के लिए भुवन उसे असली कहानियाँ सुनाता रहा। बातों-ही-बातों में मीता ने उसे बताया कि इसी मलबे में आस-पास कहीं उसके माता-पिता और भाई-बहन भी दबे हुए हैं। पता नहीं वे सब अब जीवित होंगे या नहीं। भुवन लगातार उसका हौसला बढ़ा रहा था। लेकिन पहली बार मैंने उसकी आवाज़ को भर्राया हुआ पाया। जैसे इस बार इस त्रासदी के सामने वह तटस्थ नहीं रह पा रहा था। जैसे इस भूकम्प की वजह से उसके भीतर भी कहीं कुछ दरक गया था, ढह गया था। फिर भी वह बड़ी शिद्दत से मीता का जीवन बचाने का भरपूर प्रयास कर रहा था।

अचानक मुझे दस साल पहले घटी वह त्रासद घटना याद आ गई जब इसी उम्र की भुवन की अपनी बेटी नेहा एक सड़क-दुर्घटना का शिकार हो गई थी। बुरी तरह घायल नेहा को गोद में उठाए भुवन पास के अस्पताल की ओर भागा था। पर डॉक्टर नेहा को नहीं बचा पाए थे। इस सदमे से उबरने में भुवन को कई महीने लगे थे। मुझे लगा जैसे मलबे में फँसी इस लड़की मीता में भुवन अपनी बेटी नेहा की छवि देख रहा था ...

अगली सुबह और पूरा दिन भुवन राज्य की राजधानी में अलग-अलग अधिकारियों को फ़ोन करके भारी मलबा हटाने वाली बड़ी क्रेन को घटना-स्थल पर तुरंत भेजे जाने की माँग करता रहा। दूसरे दिन की शाम तक उसकी आवाज़ टूटने लगी थी और उसके हाथ काँपने लगे थे। अब मैंने माइक और कैमरा -- दोनों का दायित्व सँभाल लिया था, जबकि भुवन लगातार इधर-उधर फ़ोन कर रहा था और मीता का ध्यान रख रहा था।

उसी शाम केंद्र के गृह-मंत्री ने अपने व्यस्त कार्यक्रमों में से समय निकाल कर प्रदेश के गृह-मंत्री के साथ घटना-स्थल का दौरा किया। उनके साथ सरकारी अमले का पूरा ताम-झाम मौजूद था। टेलिविज़न कैमरों की रोशनी की चकाचौंध में दोनों मंत्रियों ने उस बड़े से छेद में से मीता से बात की और उसे आश्वस्त किया कि उसे बचा लिया जाएगा। उन्होंने राहत और बचाव-कर्मियों की भूरि-भूरि प्रशंसा की जो जी-जान से लोगों को बचाने के काम में लगे हुए थे। भुवन ने दोनों मंत्रियों से भी भारी मलबा हटाने वाली बड़ी क्रेन को यहाँ तुरंत भेजने की गुहार लगाई। दोनों मंत्रियों ने अधिकारियों से कहा कि यह काम कल तक हो जाए। फिर रात होने से पहले दोनों मंत्रीऔर सारा सरकारी अमला वहाँ से लौट गया। बाक़ी टी.वी. कैमरे भी अन्य जगहों की स्थिति की रिपोर्टिंग करने के लिए इधर-उधर चले गए। उस लड़की के पास अब केवल भुवन और मैं बचे। भुवन ने उसे खाने के लिए बिस्कुट दिए, लेकिन उसकी हालत अब बिगड़ रही थी। शायद उसकी दबी-कुचली टाँगों में इन्फ़ेक्शन की वजह से उसे तेज़ बुखार हो गया था। वह जो कुछ भी खा रही थी उसकी उल्टी कर दे रही थी।

भुवन ने एक डॉक्टर से लेकर मीता को बुखार उतारने और उल्टी रोकने वाली दवाइयाँ नीचे भेजीं। वह अब भी किसी तरह उम्मीद का उजला दामन थामे हुए था। सोच रहा था कि कल तक बड़ी क्रेन ज़रूर आ जाएगी और किसी तरह भारी मलबा हटा कर मीता को बचा लिया जाएगा।

वह एक बहुत लम्बी और भारी रात थी जो बड़ी मुश्किल से कटी।

सुबह होते ही भुवन एक बार फिर हर रसूख़ वाले जानकार को फ़ोन करके उससे एक अदद बड़ी क्रेन घटना-स्थल पर भेजने का आग्रह करता रहा। किंतु अब उसके स्वर में एक याचक का भाव आ गयाथा। जैसे वह क्रेन भेजे जाने के लिए गिड़गिड़ा रहा हो। टी. वी. कैमरे वाले अब भी मलबे में इधर-उधर फँसे हुए दूसरे लोगों की रिपोर्टिंग करने में व्यस्त थे। डॉक्टरों की टोली स्ट्रेचर पर लगातार लाए जा रहे घायलों का उपचार करने में लगी हुई थी। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्था के कर्मचारी और अधिकारी खोजी कुत्तों के साथ चारों ओर घूम रहे थे। महामारी से बचने के लिए निकाली गई लाशों का कुछ ही दूरी पर सामूहिक दाह-संस्कार किया जा रहा था।

उस बड़े-से छेद के नीचे मलबे में फँसी उस दस-ग्यारह साल की बच्ची मीता को जैसे राम-भरोसे छोड़ दिया गया था। वह अब तेज़ बुखार में काँप रही थी। वह इतनी क्षीण लग रही थी कि पहली बार मुझे लगा कि शायद उसके लिए अब देर हो चुकी थी। लेकिन भुवन अब भी उम्मीद का सिरा थामे यहाँ-वहाँ फ़ोन कर रहा था। बीच-बीच में वह मीता को आश्वस्त भी कर रहा था कि आज उसे ज़रूर बचा लिया जाएगा। हालाँकि मैं देख सकता था कि इस आश्वासन पर से मीता का भरोसा भी अब उठता जा रहा था। इस बीच इलाक़े का एक पुजारी भी वहाँ आया, जिसने मलबे में फँसी उस लड़की की जान बचाने के लिए वहीं ईश्वर से प्रार्थना भी की।

दोपहर बाद वहाँ बारिश शुरू हो गई। बारिश की वजह से ठंड और बढ़ गई थी। वह इक्कीसवें सदी के दूसरे दशक के किसी दिसम्बर का उदास, धूसर दिन था। मलबे की क़ब्रगाह में हमारे सामने एक लड़की का जीवन धीरे-धीरे ख़त्म हो रहा था, और हम कुछ नहीं कर पा रहे थे। लोग अपने-अपने ड्राइंग और बेड-रूम में गप्पें मारते या खाना खाते हुए टी. वी. पर इस हादसे के ' लाइव ' दृश्य देख रहे थे। मीता का दारुण चेहरा ज़ूम हो कर राज्य और देश के कोने-कोने के घरों में पहुँच रहा था। हर टी. वी. चैनल इस 'बहादुर लड़की' की जिजीविषा को प्रेरणादायी बता रहा था। पर मीता का जीवन बचाने के लिए एक अदद बड़ी क्रेन का बंदोबस्त कोई नहीं कर पा रहा था। सरकार अपनी लाचारी जता रही थी। उम्मीद जताई जा रही थी कि समय रहते क्रेन वहाँ पहुँच जाएगी और मीता को बचा लिया जाएगा।

देखते-ही-देखते तीसरे दिन की शाम भी आ गई। और बड़ी क्रेन का कोई अता-पता नहीं था। भुवन के लिए ख़ुद से भाग सकना अब असम्भव हो गया था। क्या पुरानी स्मृतियों की धुँध उसे बदहवास कर रही थी ? क्या उसका अतीत उसके वर्तमान का द्वार खटखटा रहा था ? इस बीच ख़बर आई कि राज्य में एक हफ़्ते के सरकारी शोक की घोषणा कर दी गई थी। सभी सरकारी भवनों पर राष्ट्रीय ध्वज झुका दिया गया था। एक अनुमान के अनुसार इस भूकम्प की वजह से पूरे इलाक़े में लगभग दस हज़ार लोग मारे गए

थे। जगह-जगह मृतकों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना-सभाएँ आयोजित की जा रही थीं।

मुझे लगा जैसे भुवन के लिए मीता और नेहा के चेहरे आपस में गड्ड-मड्ड हो गए थे। उसके ज़हन में मौजूद अपनी बेटी की अकाल-मृत्यु का भर रहा पुराना घाव जैसे फिर से हरा हो गया था।। उस लड़की ने भुवन के अंतस के बरसों से शुष्क पड़े कोनों को फिर से आर्द्र कर दिया था। वे सूख चुके कोने जिन्हें वह ख़ुद भी भूल गया था। एक ओर इलाक़े का भयावह भूकम्प था। दूसरी ओर जैसे भुवन के भीतर भी एक भयावह भूकम्प आ गया था जिसने उसके अंतस में तबाही मचा दी थी। मुझे लगा जैसे जीवन के दूसरी ओर से मैं असहाय-सा भुवन और मीता पर नज़र रखे हुआ था।

चौथे दिन बड़ी क्रेन आ गई। पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। पिछली रात ही जीवन मीता का साथ छोड़ गया था। जब उसका शव मलबे में से निकाला गया तब सबकी आँखें नम हो गई थीं। भुवन बहुत देर तक मीता के शव को गोद में लिए हतप्रभ बैठा रहा। इस भूकम्प में उसके भीतर भी बहुत कुछ भयावह रूप से नष्ट हो गया था। उसके मन का बाँध टूट चुका था। मीता की अंत्येष्टि के समय वह बच्चों की तरह फूट-फूट कर रोया। उसके लिए मीता कीचड़ में धँसा वह अधखिला नीला कमल थी जो असमय मुरझा गया ...


(भुवन वापस राज्य की राजधानी लौट आया है। पर वह पहले जैसा नहीं रहा। अब वह उदास, गुमसुम और खोया हुआ लगता है। अक्सर हम साथ बैठ कर मीता के वे वीडियो देखते हैं जो हमने शूट किए थे। जैसे हम आइने में ख़ुद को नंगा देख रहे हों। क्या हमसे कहीं कोई ग़लती हो गई थी ? क्या हम किसी तरह मीता को बचा सकते थे ? भुवन मेरा सहयोगी ही नहीं, मेरा अच्छा मित्र भी है। अब वह न ज़्यादा बातें करता है, न कोई गीत गुनगुनाता है। अक्सर अकेला बैठा शून्य में ताकता रहता है, जैसे दूर कहीं खो गया हो। भूकम्प वाले इलाक़े में पुनर्निर्माण का काम ज़ोर-शोर से चल रहा है। लोग भूकम्प की त्रासदी से उबरने के प्रयास में लगे हुए हैं। लेकिन भुवन के अंतस को जो भूकम्प तहस-नहस कर गया, पता नहीं वह उससे कभी उबर पाएगा या नहीं ..)

प्रेषक : सुशांत सुप्रिय, A-5001, गौड़ ग्रीन सिटी, वैभव खंड, इंदिरापुरम्, ग़ाज़ियाबाद – 201014, ( उ. प्र. ), मो : 8512070086, ई-मेल : sushant1968@gmail.com

r`f"kr dkeuk,¡


bf'r;kd+ lbZn

og fu%LrC/k gkFk esa,d i= Fkkes pkjikbZ ij ysVk 'kqU; esa,sls rkd jgk Fkk ekuks dksbZ vn`'; oLrq ns[k jgk gksA tcfd mldh vk¡[kksa dh e#LFky esa ejhfpdk ds vfrfjDr,d Bksi Hkh e#LoxZ ugh FkkA mldk vkt dk ;s joS;k esjs fy, vk'kk ds foifjr Fkk] eSa gSjku Fkk fd vkf[k+j bls gqvk D;k gS] vkt bldh dSaph dh Hkk¡fr pyus okyh t+cku pqi D;ksa gSA gkyk¡fd og LoHkko ls g¡leq[k] rFkk ft+Unk fny gS] ckr cs ckr d+gd+gs yxkuk mldh fQrjr esa 'kkfey gSA

esjh gSjkuh /khjs&/khjs lksp ds lk¡ps esa <yrh vrhr dh Å¡pkb;ksa is mM+us yxhA gekjh nl of"kZ; nksLrh ds nkSjku chrs,d&,d iy vk¡[kksa ds vkxs ukpus yxsA fo"ks'k #i ls vkn'kZ uxj] v¡/ksjh-------,d fQYe fuekZrk dk n¶rj] tgk¡ gekjh igyh eqykd+kr gqbZ FkhA ogk¡ eSa iV&dFkk rFkk laokn ys[ku gsrq igq¡pk Fkk] 'kk;n og Hkh--------c<+h gqbZ nk<+h] my>s&fc[kjs ds'k vkSj fpark eqDr psgjk! mlus,d mpVrh lh n`f"V eq> ij Mkyh] fQj rks tSls mldh n`f"V esjs eq[kM+s ds bUnztky esa my> dj jg xbZ Fkh vkSj esjk t+sgu lkspus yxk Fkk fd vkf[k+j ;s O;fDr brus yksxksa dh mifLFkfr esa dsoy esjh vksj gh D;ksa ns[kk \ dgha esjk dksbZ ifjfpr rks ugha tks esjs pgjs ij teh le; dh xnZ dks viuh n`f"V ls [kqjp dj eq>s igpkuus dk iz;kl dj jgk gS \ lEHko gS ! eu us leFkZu fd;kA ijUrq Le`fr ds insZ ij rks bl dk dksbZ fpUg rd ugh feyrkA t+sgu us >V vkSfpR; izLrqr fd;kA eu vkSj foosd vHkh blh my>sM+s esa Fks fd lglk mlds v/kjksa esa dEiu gqbZA

^^vki------vki unhe vkt+eh-----\^^

^^th-------th gk¡ ! vkSj vki \^^ mlds ;dckjxh iz'u ls esa ckS[kyk x;k FkkA

^^esjk uke cSjkxh gS-------myQr vyh cSjkxh^^ mlus esjh vksj viuk nkfguk gkFk c<+krs gq, dgk FkkA eSa us Hkh vpsrkoLFkk mldh vksj gkFk c<+k fn;kA og cM+h xeZtks'kh ls esjk gkFk Fkke fy;kA

^^unhe lkgc------[k+kdlkj Hkh vkt+eh gS^^

^^vkt+eh !^^ esjs pgjs ij foLe; dk tky ru x;kA

^^;kuh fd [k+kdlkj Hkh vkt+ex<+ gh dk ckf'kUnk gS^^

^^vksg] rc rks ge nksuksa gh,d nwljs ds georu gq,^^

^^th--------;s esjh [k+q'kulhch gS tks vkt vki ls eqykd+kr gks xbZ] ugh rks eSa vc rd vkidks vkidh jpukvksaa ds gh ek/;e ls tkurk Fkk^^

^^eryc] vkius esjh jpuk,¡ i<+h gSa \^^

^^th-----flQZ i<+k gh ugh cfYd vius Hkhrj clk fy;k gS-------unhe lkgc] ;dhu tkfu,] vkidh gj dgkuh eq>s ;w¡ ekywe gksrh gS tSls esjh viuh dgkuh gksA dHkh&dHkh rks ;s [+;ky vkrk gS fd dgha vkius esjs vUrKkZu esa dksbZ ekbØks dsejk rks ugh fQV dj j[kk gS vkSj ?kj cSBs esjs fnu&jkr] nq[k&nnZ] t+sguh d'ked'k] fQØh jkS] 'kÅjh vkSj xSj 'kÅjh dSfQ;r dh vDl cUnh djds mUgsa viuh lksp ds daI;wVj ij egQwt+ dj ysrs gksa] fQj 'kCnksa ds lk¡ps esa <ky dj dkx+t+ ij-------^^ ml dk okD; [k+Re gksus ls igys gh eSa cksy iM+kA

^^cSjkxh lkgc vki dh bl t+jkZ uokt+h dk 'kqfØ;k^^

^^t+jkZ uokt+h ! dSlh t+jkZ uokt+h \ vkSj fdl ckr dk 'kqfØ;k \^^ mlds Loj esa >qa>qykgV FkhA

^^vHkh&vHkh esjh jpukvksa ls lacaf/kr vkius tks dqN dgk mlls esjk th [k+q'k gqvk gS] D;ksafd vkt rd esjh dgkfu;ksa ij bl ls csgrj foÜys"k.k fdlh us ugh fd;k^^

^^Iyht+] vki esjs Tt+ckr dks foÜys"k.k ds [k+kus esa u j[ksa^^ mldh vkokt+ HkjkZ xbZ Fkh] eSaus yid ds mls lhus ls yxk fy;k rFkk mldh ihB FkiFkikrs gq, dgkA

^^eSa vkids Tt+ckr dh dnz djrk gw¡ lkFk gh viuh fd+Ler ij eq>s xoZ Hkh gS fd vki tSlk d+yeh nksLr esjs fgLls esa vk;k gS^^ oks esjs lhus ls vyx gks dj rikd ls esjk gkFk Fkke fy;k vkSj izkFkZukRed Loj esa cksykA ^^unhe lkgc vxj btkt+r nsa rks eSa viuh fnyh dSfQ;r c;ku d#¡ \^^

^^fcydqy djsa lkgc] bl esa btkt+r dSlh^^

^^unhe lkgc-------vkidks ns[k] tkus D;ksa eq>s,slk eglwl gks jgk gS tSls ft+Unxh dh dM+h /kwi esa eq>s dksbZ Nk;knkj isM+ fey x;k gks] ftldh BaMd rirs 'kjhj gh dks ugh #g dks Hkh vkufUnr dj jgh gSa----fny dks,d vUtkuh lh rLdhu vkSj vUrjeu ds osx esa,dne Bgjko vkx;k gks] ;dhu tkfu, vki ls eqykd+kr esjs fy, fdlh c'kkjr ls de ugh^^ cksyrs gq, mldh vkokt+ #a/k xbZ Fkh vkSj vk¡[kksa ds dksus Hkhx x, Fks] ijUrq oks esjs gkFk mlh xeZtks'kh ls Fkkes gq, Fkk vkSj mldh Hkhxh vk¡[ksa esjs pgjs ij dqN bl rjg teh Fkha ekuks esjs otwn dks vius Hkhrj lek ysuk pkgrh gksaA pan N.kksa rd eSa oSls gh fLFkj jgk fQj esjs Hkhrj u tkus fdu Hkkoukvksa dh ck<+ meM+ vkbZ rFkk eu ds e#LFy dks tyFky dj xbZA

fQj ?khjs&/khjs lk¡> dk lwjt gekjh fuxkgksa ls vks>y gksx;k-----jkr us dk;ukr ij vius ds'k [kksy fn,A blds ckn eqykd+krks dk flyflyk py fudyk------fe=rk ijoku p<+rh jgh] ;gk¡ rd fd ge,d gh Nr rys jgus yxsA dke Hkh lkFk gh djrs] dke D;k gksrk cl ;s tku ysa fd dke ds uke ij gesa ?kksLV jkbZfVax djuh iM+rh] ftldk esgurkuk uke Hkj dks gh feyrk] ØsfMV fdlh vkSj ds fgLls esa vkrhA ;s vkSj ckr fd dHkh dHkkj rhljs ntsZ dh de ykxr okyh fQYesa fy[kus ds fy, fey tkrhaA vkt rd bl izdkj dh fQYesa ;k rks jkbZfVax Vscy rd gh lhfer jgha ;k fQj eqgwrZ ds ckn can gks x;haA bl izdkj dh fQYesa fy[kus ls gesa dsoy ;gh ykHk gksrk fd tc rd jkbZfVax dk dke pyrk [kkus&ihus dh fpark ugh jgrhA

blh chp esjs eksckbZy dh ?kUVh ctus yxh vkSj esjh lksp dh mM+ku ysafMax ls igys gh Øs'k gksxbZA eSaus >V eksckbZy mBkdj LØhu dk tk;t+k fy;k] dkWy,d LVªxyj dykdkj dk Fkk] eSaus fjlho ugh fd;k vkSj ?kUVh ctrs&ctrs,sls [k+keks'k gqbZ tSls dksbZ nq?kZVukxzLr euq"; enr dh xksgkj yxkrs&yxkrs izk.k R;kx nsrk gSA eSa eksckbZy Qksu dks tsc esa BwaLrs gq, mldh vksj ns[kk] oks mlh rjg ysVk gqvk Fkk] mls ns[k eq>s,slk eglwl gqvk ekuks dfy;ksa dh Hkkafr eLyh] dqpyh vkjtw,¡] ijokuksa dh Hkkafr ty ds rM+irh [k+kfglsa fdlh Hkwds vtxj dh Hkkafr mlds otwn dks fuxy tkuk pkgrh gksaaA

^^unhe] fdl dk Qksu Fkk \^^ mlus {kh.k Loj esa iwNkA

^^dksbZ LVªxyj Fkk^^

^^LVªxyj rks ge Hkh gSa^^

^^gk¡] bl nqfu;k esa LVªxy ls NqVdkjk fdls gS \^^

^^dgha LVªxy dk nwljk uke Quk rks ugha \^^

^^ugha] Quk rks LVªxy dh e¡ft+y gSA [k+Sj NksM+ks bu ckrksa dks vkSj crkvks rqEgkjs gkFk esa [k+r dSlk gS\^^ eSaus mÙkj ds lkFk&lkFk ml ij loky nkx+ fn;kA

^^HkS;k us fy[kk gS^^

^^D;k fy[kk gS HkS;k us \^^

dqN dgs fcuk mlus i= esjh vksj mNky fn;kA i= mBkrs gq, eq>s,slk vkHkkl gqvk ekuks ml esa th lqyxus dk /kqok¡ lek;k gksA 'kk;n blh fy, rg [kksyus dh eq> esa fgEer u gqbZA

^^nksLr ! rqEgsa,slk ugha yxrk fd nqfu;k [k+qnx+t+hZ dk dQu igus,d eqnkZ 'kjhj dh ekfuan gS \^^ blls igys fd eSa bl laca/k esa dqN dgrk oks nksckjk cksykA

^^lc ds lc [k+qnx+t+Z gksx, gSsaA HkkbZ] cgu] ek¡] cki lc! dqN nsrs jgks rks cM+h vkoHkxr------vxj u ns ldks rks-----\^^

eSa pqi Fkk] vFkok esjh t+cku fLFkj gks pqdh Fkh] irk ugha ! vYcÙkk esjh pqIih us FkksM+h nsj dks gh lgh mls Hkh pqi djk fn;k FkkA fQj,d yach pqIih ds ckn mlus [k+qn gh ekSu rksM+kA

^^unhe^^

^^gk¡ !^^

^^;kj crkvks u] dc gekjk LVªxy [k+Re gksxk \ gekjh esgur dc jax yk,xh \ dc gekjs lius iwjs gksaxs \ dke;kch dc gekjh fejkl gksxh \ dc 'kksgjr dh jkgksa ij ge Hkh xoZ ls lj mBkds py ldsaxs \^^

oks,d gh lk¡l esa lkjs iz'uksa ds rhj esjs lhus esa iSoLr djds 'kkUr gksx;k------mldh 'kkUrrk vekur dh Hkk¡fr esjs fny ij cks> cu xbZ rFkk eSa bl cks> dh f'kÌr ls djkgus yxkA

^^uk nksLr-----uk] fny NksVk u djks] cl le; dk bUrst+kj djks------le; ls igys fdlh dks dqN feyk gS u gh feysxk] pkgs yk[k ge fdlh ulhcoku ds ekFks ls viuk ekFkk jxM+ ysa] fd+Ler dk flrkjk ugh pedsxk^^ esjk ;s QylQk lqu mlds v/kjksa ij O;axkRed g¡lh fdlh i{k?kkr xzLr dhM+s dh rjg jsaxus yxhA fQj mlus,d BaMh vkg Hkjh vkSj vius mij pknj f[kaprs gq, ?k`.kRed Loj esa cksykA ^^gq¡ ! tc oks le; gh le; ij u vk, rks fQj oks le; fdl dke dk \^^ vkSj Loa; dks pknj esa yqIr djus dk iz;kl djus yxk] vQlksl fd pknj NksVh Fkh] bl dkj.k oks lj <k¡drk rks iSj [kqy tkrs] iSj <k¡drk rks lj-------! 'kk;n oks ^ftruh yEch pknj mruk gh iSj QSykuk pkfg,^ okyh dgkor Hkwy x;k Fkk vFkok tkucw> dj bl dgkor ij vey djuk ugha pkg jgk Fkk] irk ugha!! blh chp eq>s vius gkFk esa ncs i= dk [+;ky vk;k] eSa >V i= dh rg [kksy mls i<+us yxk] fy[kk FkkA

^^cSjkxh------eq>s ;d+hu gS fd rqe,d u,d fnu t+#j ftÌkstgn dh ifo= xaxk ls nkSyr] bTt+r vkSj 'kksgjr dh <sj lkjh xxfj;k¡ Hkj ykvksxs------ijUrq esjs HkkbZ gesa I;kl dh f'kÌr rks vc gS] vxj Bksi&Bksi ikuh ds fy, rM+i&rM+i ds ge ne rksM+ nsa vkSj ckn ejus ds rqe ve`r dh /kkjk gh D;ksa u gekjs gksaVksa ls yxk nks] rks oks fdl dke dk--------- \^^

bl okd; ds vkxs eSa,d 'kCn Hkh ugha i<+ ik;k] D;ksafd esjh vk¡[kksa ds le{k ;dk;d esjs cq<+s ekrk&firk dh Nfo mHkj vkbZ] ftu ds pgjs dqEgyk,] eq>kZ, rFkk vk¡[kksa esa bUrst+kj ds dk¡Vs Fks vkSj v/kjksa ij bPNk;sa o dkeuk,¡ r`f"kr gks iifM+;ksa dh Hkk¡fr teh gqbZ FkhaA

&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&

bf'r;kd+ lbZn

Ckh&1]U;w ehjk iSjkMkbZt] xhrk uxj] Qst+&2] ehjk jksM] eqEcbZ&401107

eksckbZy % 09224799971@09930211461


bZ esy % ishtiyaquesaeed@rediffmail.com

अवरुद्ध


- चित्रा राणा

मुझे शुरू से लगता था मैं एक पँछी हूँ। इस जमीन के ऊंचे नीचे गड्डे, टीलों में पड़ी ही नहीं कभी। मानती हूँ आसपास किसी को कभी उड़ते नहीं देखा, फिर भी उड़ना मेरी फितरत जैसा मेरे साथ था। अपनों ने भी खूब साथ दिया। छोटी सी छलाँग पर शानदार उड़ान सी तालियाँ बजाते।

फिर खुद को आजमाने को मुझे एक तरकीब बताई, सीढ़ियां लगा एक ऊँचे किनारे पर पँहुचा दिया।

वहाँ से कई पँछी दिखते थे। कुछ तो बहुत ऊँचे, बड़ी बड़ी उड़ाने भरते हुए। उनके पंखों का आकर बड़ा था पर रंग बिल्कुल मुझ जैसा। मुझे विश्वास हो गया कि जब वो भी पैदा हुए होंगे, तब उनके पंख भी मुझसे दिखते होंगे।

पूरा दिन सपनो को साथ लिए रही और जैसे ही कूदने को थी कि जगमग जुगनुओं से छोटे छोटे तारों वाली जगमगाती, नाचती, गाती, हुलड़ मचाती एक काली रात आयी। बहुत शोर था उस रात में, इतना कि मेरी चुप्पी भी किसी को सुनाई नहीं दी।

फिर..


फिर क्या, मुझे लोहे की जंजीरें पहना दी गईं और कह दिया गया जा इन्हें सुनहरा रंग ले।

मायका (सिर्फ मां बाप से ही नहीं बल्कि भाई से भी होता है।)

-सुशी सक्सेना

मम्मी पापा के गुजर जाने के बाद मायके जाने को दिल ही नहीं कर रहा था। एक कहावत जो सुन रखी थी कि " मां बाप से ही मायका होता है।" डरती थी कि कहीं ये कहावत मेरे साथ ही न सही साबित हो जाए। भाभी के विचार मेरे विचारों से बिल्कुल अलग थे इसलिए उनसे मेरी कभी नहीं बनी। भाई के अंदर अपनापन तो था मगर वो भी कभी कभी भाभी की बातों में उलझ कर परायेपन का अहसास दिला जाता था। एक दो बार तो मेरी उससे बहस भी हो गई थी, ये नहीं कहूंगी कि इसमें मेरी कोई गलती नहीं थी क्योंकि ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती।

खैर, जाना तो पड़ेगा ही क्योंकि मम्मी पापा के शांत हो जाने के बाद ये मेरा पहला रक्षाबंधन था। हमारे यहां का रिवाज है कि यदि मायके में कोई शांत हो जाए तो पहला त्यौहार मायके में ही करना पड़ता है, और फिर रक्षाबंधन का त्यौहार, जो भाई-बहन के रिश्ते का सबसे बड़ा आधार होता है। इसलिए ये सोच कर तैयारी लगा ली की उसी दिन जाऊंगी और राखी बांध कर उल्टे पांव वापस भी आ जाऊंगी। इसके बाद फिर कभी मायके जाने का मन नहीं किया तो खुद से गिला भी नहीं करूंगी।

मैं रक्षाबंधन के दिन सुबह सुबह पहुंच गई, भाई को स्टेशन में देख कर खुशी भी हुई और आश्चर्य भी हुआ कि वो मुझे लेने आया है। घर पहुंच कर कुछ देर बाद राखी बांधने के बाद तुरंत वापस आना चाहती थी पर न जाने क्यों इस बार भाई के आग्रह को टाल न सकी और एक दिन के लिए और रुक गई।

इन दोनों दिनों में उन्होंने मेरे स्वागत में कोई कमी न उठा रखी थी। पहली बार उनके व्यवहार से मुझे मम्मी पापा की कमी महसूस नहीं हुई, पर फिर भी न जाने क्यों घर में अजीब सा खालीपन था जो रह रह कर मम्मी पापा की ओर खींच लेता था।भाई ने मेरी विदाई में भी कोई कसर न छोड़ी। शायद भाभी को खर्चा थोड़ा ज्यादा लग रहा था, लेकिन वो भी न जाने क्या सोच कर इस बार खामोश थीं। लौटते वक्त वो मुझे स्टेशन तक छोड़ने भी आया, जिसकी मुझे कोई उम्मीद ही नहीं थी। आते समय उसने मुझसे कहा,

" ये मत समझना की मम्मी पापा नहीं है तो यहां तुम्हें कोई नहीं पूछेंगा। ये तुम्हारा अपना घर है। हमेशा आती रहना। मुझे भी सहारा मिलता रहेगा।"

हालांकि उसे मेरे किसी भी सहारे की कोई जरूरत नहीं थी, लेकिन कभी कभी भावनात्मक सहारे की जरूरत सबको पड़ जाती है। उसकी आंखों में पहली बार अपने लिए आंसू देखकर मेरी भी आंखें आंसुओं से लबालब हो गई। हम दोनों ने जी भर के रो लिया, और आंसुओं के साथ सारे गिले-शिकवे बहा दिए। फिर दुबारा आने का वादा भाई से करके वापस घर आ गई। मेरे मन का वो डर दूर हो गया जिसे साथ लेकर गयी थी। और सोचने लगी, " लोग भी न जाने कैसी-कैसी कहावतें बना देते हैं। मायका सिर्फ मां बाप से ही नहीं बल्कि भाई से भी होता है।"

और आज एक कहावत को मैंने अपनी आंखों के सामने झूठा साबित होते देखा।

सुशी सक्सेना


इंदौर


yksd vkSj ;qx cks/k dh thoar dfork,¡


पुनीता जैन

dfork&deZ }kjk izR;sd dfo lalkj] euq"; vkSj thou ds tfVy rgksa dks Li’kZ djus] mUgsa [kksyus dk iz;kl djrk gSA ifjos’k ls xgu lai`fDr dh viuh vkuqHkwfrd ;k=k dks og Hkk"kk vkSj lajpuk }kjk laHko cukrk gSA ujsUnz iqaMjhd dk jpuk&deZ vius ifjos’k ls tqM+dj fcuk fdlh tfVyrk ds vR;ar lgtrk ls :ikarfjr gksrk gSA lgtrk vkSj lknxh mudh ltZukRedrk dk vk/kkj gSA tkrh; cks/k dk ;g dfo 'kgjh folaxfr;ksa] fparkvksa vkSj reke ljksdkjksa ls Hkh vR;Ur LokHkkfod Lor%LQwrZ lgtrk ls Vdjkrk gSA miHkksDrkoknh laosnughu gksrs le; dk lkeuk djrh mudh dfork dgha Hkh ruko ;k volknxzLr ugha fn[krh A lknxh vkSj ljyrk dk ;g ckuk mudh jpuk&izfØ;k dk vfHkUu vax gSA oLrqr% ftl xzkeh.k eu] tehuh dfo ds :i esa mudh igpku LFkkfir gS] mlds }kjk 'kgjh ifjos’k] naxs] ewY;{kj.k dh fparkvksa ;k foMEcukvksa ls Vdjkrs gq, Hkh viuh tehu u NksM+us dh tks {kerk fn[kkbZ x;h gS mlds ihNs mudh le`) tkrh;&Le`fr gSA xk¡o] ?kj] unh] /kjrh] /kwi] gok] ek¡&firk] ukrs&fj’rksa ] tho&txr ds lkFk vius lewps ifjos’k ls vR;ar ltxrk ls lUu) ;s dfork,¡ vius le; ls lkFkZd fj’rk cukrh gSa A ;gh dkj.k gS fd ujsUnz iqaMjhd 2014 esa izdkf’kr vius nksuksa dkO; laxzg ^bUgsa ns[kus nks mruh gh nqfu;k* vkSj ^bl i`Foh dh fojkVrk esa* }kjk xk¡o] ?kj] ek¡&firk dh vR;ar laosnu’khy Le`fr;ksa ds lkFk vius orZeku lkekftd ;FkkFkZ ls Hkh etcwrh ls tqM+s gSaA oLrqr% xk¡o vkSj 'kgj dk foHkktu ifjos’k dk foHkktu rks gS] fdUrq ekuo eu dh vkfne izd`fr lkoZHkkSfed gS] blh eu ds dksus&varjs esa fNVdk izdk’k] cspSfu;k¡] fpark,¡ dfo dh Hkk"kk esa LFkku ikrh gSaA

fgUnh dfork esa xk¡o dk eu] xzkE;&Le`fr;k¡ yacs le; rd gkoh jgh gSaA izk;% 'kgj fuoklh dfo&eu vius xk¡o] dLcs] tuin dh vfeV Le`fr;ksa esa ifjØe.k djrk ns[kk x;k gSA fdUrq dfo rkdhn djrk gS fd bl tkrh; cks/k }kjk gh os ÅtkZ izkIr djrs gSaA ;g ekuoh; m"ek vius le; ds folaxr ;FkkFkZ esa O;fDr dks iquLFkkZfir gksus esa ennxkj fl) gksrh gSa & ^^bUgksaus gh eq>s @ gok&/kwi& ikuh ds @ Lokn ds lkFk@ ohjku jkLrksa ds Hk; ls @ laxr djuk fl[kk;kA** ¼bl i`Foh dh fojkVrk esa] i`"B 22½ njvly ujsUnz iqaMjhd ml ifjos’k ds dfo gSa tks gekjs vklikl n`’;eku gSA ;gk¡ ljksdkj] fpark,¡ vkSj lknxh Hkh yknh gqbZ ugha] LokHkkfod gSaA Hkk"kk ;k fcEc] izrhdksa ds lk;kl iz;ksx ;k vks<+h gqbZ nk’kZfudrk ds fcuk vke balku dk thou] ?kj ds n`’;] tuin] izd`fr vkSj reke NksVh&NksVh phtsa viuh LokHkkfodrk ds lkFk ;gk¡ :ikf;r gSaA dfo eu dh xgjkbZ esa rFkk mlds jkstejkZ esa fdruh vkSj dgk¡ rd dfork ekStwn gS] ;s dfork,¡ mldh ckuxh gSaA vius le; dh foMEcukvksa dks idM+us dh Hkjiwj ps"Vk djrs gq, ;s dfork,¡ O;fDr psruk dks lrr~ pqukSrh nsrh gSa& ^^gesa pkfg, ,slh @ rst rjkZj ih<+h@ tks gekjh xyfr;ksa ds fy, ekQ u djsA** ¼bUgsa ns[kus nks mruh gh nqfu;k] i``"B&14½ phtksa ls f?kjs vius le; dks thrs gq, dfo ds fy, dfork esa thou vkSj thou esa dfork og vifjgk;Zrk gS] ftlls os xgjs rd lEc) gSA dfork ls bl ukfHkuky tqM+ko ds pyrs gh os vius le; dh lpsr iM+rky djrs gq, vke tu ds ml lius dks Hkh iz’ukafdr djrs gSa tks vPNh ukSdjh] ?kj vkSj iRuh rks pkgrk gS fdUrq ml nqfu;k dks vPNk cukus dk liuk ugha ns[krk ftlesa og jgrk gSA bl cgkus ;s dfork,¡ ekuo eu ds Hkhrj iSB mldh vkRedsfUnzr izo`fRr ds izfr] ekuoh; ljksdkjksa ds izfr lpsr djrh gSaA ujsUnz iqaMjhd dk dfo&deZ euq";rk dks cpk, j[kus ds izfr ltx gSA blfy, vius ifjos’k] le; vkSj thou txr esa gks jgs ifjorZu ij iSuh n`f"V cuk, j[kus dks os viuk dkZO; fu:fir djrs gSaA mudh dfork fopkj dh fuf"Ø;rk vkSj vPNs] egku cus jgus dh vkReeqX/k /kkj.kk ij Hkh Li"V 'kCnksa esa izgkj djrh gSA fgald vksj vkØkark le; esa dfork ds fopkj vkSj izd`fr dh [kksg esa ?kqldj lqjf{kr jgus dh dk;jrk vkSj ijkt; cks/k mudh ^dgus dks ge dqN Hkh dgrs jgsa* tSlh vusd dforkvksa esa lgt :i ls vfHkO;aftr gSA vius pkjksa vksj ds ;FkkFkZ ls gh mudh dfork dk rkuk &ckuk fufeZr gksrk gSA thou vkSj 'kCn dk ;g vUrxqZEQu gh mudh dfork esa izfrQfyr gqvk gSA os Lo;a Lohdkj Hkh djrs gaS & ^^’kCnksa esa rkdr vkneh ds O;ogkj ls vkrh gSA** bl O;ogkj txr ds thoar n`’; mudh dfork dks dFkkRedrk dh vksj ys tkrh gS A mudh vusd dfork,a bl dFkk jl ls ycjst gSA dFkk x| dh izd`fr gS] tgk¡ f’kYi foLrkj ikrk gS ferdFku ugha] ;g izHkko bu dforkvksa esa yf{kr fd;k tk ldrk gS A fdUrq ;g dfo dh {kerk gS fd og x| ds Hkhrj ls vR;ar laosnu’khy dkO; dks fljtus esa lQy gks tkrs gSa A ?kj ;k ekrk&firk ij fy[kh dforkvksa dks bl n`f"V ls egÙoiw.kZ ekuk tk ldrk gSA dFkk jl ds dkj.k dfork esa vrhr dh Le`fr l?ku vuqHkwfrtU; gks mBrh gSA

;g cgqr gh vPNk ladsr gS fd L=h ij ,d dfo dh dye ckjEckj pyhA L=h i{k dh cgqvk;keh mifLFkfr bu dforkvksa ds ego dks c<+k nsrh gSaA L=h dk nq%[k] Je] 'kfDr] lkSUn;Z] lkgl vkSj vfeV ftthfo"kk vkfn vusd i{k ;gk¡ ns[ks tk ldrs gSa] ftUgsa ifjos’k ls mBkdj dfork esa mrkjrs gq, os lknxh ls Lohdkj djrs gSa fd ;s dfork mlh L=h leqnk; ds fy, gS& ^^pkyhl lky ckn Hkh ftls @ugha O;Dr dj ik, 'kCn @ fcEc ugha mBk ik,@ ftldk cks> @izrhd ugha Bgj ik,@ tjk Hkh ftlds lkeus @dqN Hkh dgsa eeZK @eSa mls dfork esa @ j[k jgk gw¡ tl dk rlA** ¼bl i`Foh dh----] i`"B&25½ oLrqr% L=h leqnk; ds izfr izxk<+ jkxkRedrk dk ;g :i vn~Hkqr gSA ;qok yM+fd;ksa ls ysdj o`) gksrh ^cqvk* rd dk pfj=kadu bu dforkvksa esa vkReh;rkiwoZd gqvk gSA ydfM+;ksa dk cks> mBkrh] lkSnk&lqyqQ djrh] lCth csprh] NksVs&eksVs jkstxkjksa ls tqM+h ;k 'kgj esa ukSdjh djrh fL=;ksa ls ysdj cl dh HkhM+ esa vlgt L=h rd reke fL=;k¡ bu dforkvksa dh izeq[k ik= dh Hkwfedk esa gSA ?kjsyw dke djrh bu fL=;ksa dks dfo ^iwjs ?kj esa /kwi dh rjg QSy tkrh* fL=;ksa ds :i esa fn[kkdj vR;ar lqanj fcEc mifLFkr dj nsrk gSA L=h dh fnup;kZ] mldh lk/kj.krk esa fufgr vlk/kkj.k ftthfo"kk ds vusd n`’; bu nksuksa laxzgksa dh dforkvksa esa thoar gq, gSA ,d dfo }kjk L=h i{k dks bruh laosnu’khyrk ls i<+us ds iz;kl vR;ar lq[kn yxrs gSaA njvly L=h ij jph viuh thoar dforkvksa }kjk os L=h dh u;h ifjHkk"kk x<+us] mls 'kCnksa esa idM+us esa lQy Hkh gq, gSA bl lanHkZ esa L=h dsfUnzr dbZ dfork,¡ dgha izseixh gSa rks dgha mlds eqfDr ioZ esa cny tkrh gSa& ^^ yx jgk Fkk dy tks Qwy f[kysaxs @ vc bl /kjrh esa tks dqN gksxk @ og izse esa Hkkxh yM+dh ds pkgus ls gksxk@ izse esa Hkkxh gqbZ yM+dh @ xk¡o ds lhyu Hkjs va/ksjksa esa @ danhy dh rjg ty mBh gS@ izse esa Hkkxh gqbZ yM+dh @bl /kjrh dh lkjh lqanjrk dks @ bdckjxh pknj lh vks<+ dj py iM+h gSA** ¼bUgsa ns[kus nks---] i`"B 63½ L=heqfDr ds i{k esa [kM+h bl dfork ds lkFk&lkFk lekt dh uh;r vkSj igjsnkjh dks Hkh ;s dfork,¡ fpfg~ur djrh gSa& ^^yM+dh tks cksys og u lqukbZ ns@ yM+dh dk gksuk fn[kkbZ u ns@ bls crkvks yM+dh dh tqcku@ yM+dh dh nq’eu gS@ bls vius eu dks ekjuk fl[kkvksA** ¼bl i`Foh dh---] i`"B 46½ njvly ujsUnz iqaMjhd L=h dks ^/kwi* ds :i esa fpf=r dj mldh nhIrrk vkSj ÅtkZ dks ,d lkFk iVy ij ys vkrs gSaA bl fygkt ls [kk¡ps esa <kyh x;h vkSj [kk¡ps dk vfrØe.k djrh L=h bu dforkvksa dh iSuh ut+j dh t+n esa gSaA L=h Lora=rk dh >aMkcjnkjh ls vyx vius ifjos’k esa py jgs izR;sd cnyko dks bu dforkvksa }kjk 'kCn esa fijksus dk iz;kl gqvk gSA egÙoiw.kZ ckr ;g Hkh gS fd L=h ds izfr ;g i{k/kjrk] Lusg vkSj l?ku vuqHkwfr d`f=e ;k vks<+h gqbZ ugha mudh dforkvksa ds oSf’k"V~; dh rjg LokHkkfod o ekSfyd gSA ;g :ekfu;r muds Le`frfp= esa Hkh vafdr gS& ^^esjs fy, rks og vc Hkh @unh Fkh! @ /kkj Fkh!@ diM+s iNksjrh iRFkj esa@ ,d yM+dh Fkh@ esjs isSjksa dks Vksrh eNyh Fkh@ xhys ckyksa dks lq[kkrh @/kwi Fkh@ ,d lkFk og lc Fkh @ flQZ le; ugha Fkk og @tgk¡ dHkh eSa Fkk@ tgk¡ dHkh og FkhA** ¼bl i`Foh ----] i`"B 40&41½

xzkeh.k Le`fr;ksa ds lkFk 'kgj ds lanHkZ dks Hkh dfork esa idM+us okys dfo ujsUnz iqaMjhd lq[k vkSj nq[k dh lw{e vuqHkwfr dks 'kgjh vkSj xzkeh.k L=h ds euksfoKku }kjk vR;ar lh/kh ljy Hkk"kk esa fpf=r dj nsrs gSa &^^xk¡o esa nq[kksa dh yEch fyLV Fkh@ blfy, nq[k dks ogk¡@de fxuk tkrk Fkk vkSj @ tks lq[k Fks ogk¡ ,dk/k @ thou dks muls gh ckj&ckj@QsaV &Hkk¡tdj ck¡/kk tkrk Fkk@ lq[k dks ckj&ckj Hkk¡tdj @mlls gh thou dks ck¡/ks j[kus dh @ dyk ls vufHkK bl @ rFkkdfFkr 'kgj esa nksuksa @ nq[k ds chp Mwch cSBh FkhaA** ¼bUgsa ns[kus nks---] i`"B & 79½ fp= ds ckgj vkSj Hkhrj L=h ds bu fofo/k :iksa esa ,d i{k ^cqvk* dfork esa Hkh ns[kk tk ldrk gSA xzke thou esa ,d csok L=h dk lrr~ la?k"kZ] mldk tw>uk] [kVuk] laHkyuk izLrqr djrh] mldh fu;fr mdsjrh ;g dfork L=h vfLerk ij Hkh izdk’k Mkyrh gS&^^ u lj esa rsy u nsg esa lkcqu @ [kkfyl dke ds cwrs @ cqvk ds xqtj x, HkkbZ ds ?kj@ viuh mej ds lÙkj lky@ vkSj ugha cu ik;k HkkbZ ds ?kj esa @ cqvk dk ?kjA** ¼bl i`Foh dh ----] i`"B& 95½ A vkSj ,d egÙoiw.kZ ckr] dfo ds bu nks laxzgksa esa ls ,d ^bUgsa ns[kus nks mruh gh nqfu;k* esa ^bUgsa* 'kCn L=h ds fy, gh gS vFkkZr~ ,d iwjs laxzg dk uke L=h dks lefiZr & ;g Hkh dfo dh psruk esa L=h ds egÙo dks fn[kkrk gS A

lelkef;d lanHkZ] ekuoh; dqizo`fRr;k¡] foMEcuk,¡ rFkk ewY; fpark ij ,d ltx dfo dh fpark LokHkkfod gSA ;s dfork,¡ vius le; dh ltx igjsnkjh djrh gSa& ^^vkSj ,d dfo gS ;gk¡@tks ;gk¡ ds ml yksgs ds fy, @fpafrr gS@ tks /kkj dh ctk; dckM+ esa cny jgk gSA** ¼bUgsa ns[kus ---] i`"B&32½ lalkj dh lqanjrk esa o`f) djrs izR;sd gLr{ksi ds izfr ;s dfork,¡ vuqx`ghr gSa fQj pkgs og cqudj gks ;k ydM+gkjk] yksgkj ;k fQj og ^ykyh* tSlk cSy gh D;ksa u gksA fdUrq budh vifjgk;Zrk ds ckotwn mudh lkekftd mis{kk] fo"kerk ij xgu fpark Hkh bu dforkvksa esa fo|eku gS& ^^lcls [kjkc ckr ;g gS fd @Hkw[ks uaxs vkSj nq[kh yksxksa dks@ xqLlk ugha vk jgk gSA** ¼bUgsa ns[kus nks---]i`"B&91½ ^yknsu* tSlh dfork,¡ oSf’od leL;k ij Hkh n`f"Vikr djrh gS& ^^yknsu ,d fopkj gS@ tks viuh ihB esa @ ykndj ys tkuk pkgrk gS@ bl lewph nqfu;k dks@,d gtkj lky ihNs dh va/ksjh xqQk esa A** ¼bUgsa ns[kus---]i`"B&109 ½ dfo dh bl fpark esa ftruk ^yknsu&fopkj* 'kkfey gS mruh gh 'kkfey gS cktkj vkSj phtsa+ ftlls iwjh nqfu;k gh ugha euq"; dk varl Hkh vVrk pyk tk jgk gSA ;gh ugha bu dforkvksa dh igq¡p mu rd Hkh tkrh gS tks ^fcxM+rh nqfu;k* dh txg ^vius fgr* fparu esa rYyhu jgrs gSaA jktuSfrd folaxfr;ksa] /keZ] naxs tSls eqn~nksa ij Hkh ;s dfork,¡ rVLFk eqnzk u viukdj rat dlrh gSa&**fQygky vHkh vYykg vkSj bZ’oj nksuksa dks @ [kcjnkj dj nks fd @ cpk ldks rks cpk yks [kqn dks @ tks gkFk rqEgkjh bcknr esa@ lcls vkxs jgrk Fkk@og fQj Qjkj gSA** ¼bUgsa ns[kus ---] i`"B&115½

njvly iqaMjhd th dh dfork lekt ls lh/ks laokn dh dfork gS blfy, ;gk¡ x| ds ls laokn vkSj i| dh lh y; nksuksa dks vklkuh ls lk/k fy;k tkrk gSA ^naxk*] ^v;ks/;k* tSlh dfork,¡ bldh ckuxh izLrqr djrh gSaA bl rjg ds x| dFku }kjk dkO; eeZ dk lgt laizs"k.k ,slk dkS’ky gS tks bu dforkvksa esa ckj&ckj >ydrk gSA bl f’kYi ds iz;ksx }kjk os vR;ar ljy Hkk"kk o lgt y; esa fgUnw&eqlyeku dh euksn’kk] Hk;] 'kfeZnaxh rd dks vklkuh ls vfHkO;aftr dj ysrs gSaA lekt] jktuhfr vkSj ukSdj’kkgh ls rY[k iz’u djrh ;s dfork,¡ mUgsa tkrh; cks/k ds dfo ls vkxs ys tkdj vius le; o ;qxhu ;FkkFkZ ds izfr vf/kd tokcnsg fl) djrh gSaA egÙoiw.kZ gS fd bu dforkvksa esa f’kYi ;k Hkk"kk ds lkFk dksbZ tfVy iz;ksx ugha gSA Hkokuh izlkn feJ dh lgtrk bu dforkvksa dk Hkh oSf’k"V~; gSA ;gk¡ fo"k; oSfo/; gS fdUrq dqN Hkh yknk gqvk ugha gSA thou ls mith] thou ds fudV] mlds lgt vkfne lkSUn;Z dks lgstrh] izd`fr ls laoknjr] jkstejkZ ds thou&txr ls mith ;s dfork,¡ thou esa jps&cls vfHkUu Loj lh gS] ftldh cqukoV dks d`f=erk Nw Hkh ugha tkrh] tks thou cks/k] ljlrk ds lekukarj iw.kZ ltx] psru jgrs gq, ifjos’k ds fonzwi dks Hkh idM+rh gSA reke rjg dh dyk ckft;ksa ls eqDr bu dforkvksa ds lgt izokg ds ihNs Hkk"kk dh lknxh vkSj thoar fcEc gSaA

dfork ds mYysf[kr mDr nksuksa laxzg dfo dks mudh LFkkfir Nfo ls vkxs ys tkrs gSaA viuh fnup;kZ] jkstejkZ esa dfork cquus okys dfo ujsUnz iqaMjhd ds fy, dfork ,d vifjgk;Z deZ gS rFkk Le`fr;k¡ mudk ÅtkZ dsUnzA dfork dh thou ls vfHkUurk gh dfo dh ys[kuh esa lalkj ds thoar :i fpf=r djrh gSA vius ifjos’k vkSj vke thou dks dfork esa mrkjus ds ihNs dfork o dfo dh ;g vfuok;Z vfHkUurk mls ;g dgus dks foo’k djrh gS& ^^u tkus ij Hkh esjs Hkhrj@cuk jgrk gS ?kj @tSls u fy[kus ij Hkh@ esjs Hkhrj cuh jgrh gS dforkA** ¼bl i`Foh---] i`"B&48½ 'kgj vkxeu i’pkr~ Hkh xk¡o dh Le`fr dfork dk og etcwr i{k gS] tks nksuksa laxzg esa leku egÙo j[krk gSA 'kgj vkSj xk¡o dk ;g vUr}ZU} fgUnh dfork esa eq[kj jgk gSA Le`fr;k¡ ujsUnz iqaMjhd dks Hkh ckjEckj vkyksfM+r djrh gSa& ^^ek¡ vkSj ckiw ?kj esa gh Fks@ ij gekjs u gksus dk lwukiu @ iwjs ?kj esa Hkkjh Fkk@ eSa ckjh&ckjh ls @ ?kj ds gj dejs esa x;k@ ogk¡ ge lc Hkkb;ksa dh @Nk;k,¡ Vgyrh fn[kh Fkha@ ;gk¡ lcdk Fkk dqN u dqN@ ftls og 'kgj ugha ys tk lds FksA** ¼bl i`Foh ----] i`"B&49½ dfo esa tkrh; Le`fr;k¡ 'kgj dk foykse gksdj ugha vkrh] blfy, ;gk¡ lc dqN vuqHkwfrtU; gSa] vkjksfir ughaA orZeku esa tM+ tekrh vkRedsfUnzr izo`fÙk vkSj laosnu’kwU;rk ij bu dforkvksa esa fufgr fpark tk;t+ Hkh gS&^^ le; us gesa pwgk cukdj @gkFkksa esa Fkek fn;k pqHkfj;k ftlesa vius vfrfjDr @fdlh vkSj ds fy, nks ?kwaV ty @vkSj ikuh dh xqatkb’k ugha gSA ¼bl i`Foh---] i`"B&51½ vius ekul esa yksdthou ds izd`fr fp= dh eqX/krk o vHkko esa fufgr Hkko ds vknh dfo ds fy, ,sls n`’; nq[kn gksuk LokHkkfod gSA ;gh ugha ekrk&firk vkSj thou rd dk egÙo phtksa ls Hkh derj jg tkus dh ihM+k ;gk¡ xgjkbZ ls vuqHkwr dh tk ldrh gSA lhesaVh ?kj vkSj oLrqvkas dk thfor fj’rksa ij gkoh gks tkuk bl le; dh fu"Bqjrk ds :i esa ;gk¡ fu:fir gSaA ik[kaM vkSj Nn~e jfgr lgt thou ds izfr laosnu’khy dfo orZeku dh izR;sd izfrdwyrkvksa dks dfork esa idM+us dh ps"Vk djrk fn[krk gSA ;gh dkj.k gS fd mnkl ?kj vkSj ekrk&firk dh Nfo bu dforkvksa easa nwj&nwj rd fn[kkbZ nsrh gSA laxzg dk ,d iwjk [kaM ^uhe rks dyxh Fkh ?kj dh* gh bls lefiZr gSA

,d dfo ds fy, dfork ds fujFkZd gks tkus ;k mlls ukmEehnh dk vglkl udkjkRed fLFkfr gSA dfork dks cpkus dh xqgkj njvly euq";rk dks cpkus ds lanHkZ esa mifLFkr gSA oS’ohdj.k] miHkksDrkokn vkSj ckt+kj ds pgq¡ vksj izlkj ds chp dfork ds fy, dksbZ txg u ikdj ;k dfork }kjk le; esa dksbZ lkFkZd ifjorZu u gksrk ns[k dfo dh fpark ;qfDrlaxr gSA oLrqr% ;g pje laosnughurk dk le; gSA xk¡o&?kj] usg&ukrksa dh Le`fr gks ;k dfork dks cpkus dh fpark bu nksuksa ds ewy esa euq"; dh laosnuk dks cpkus dh fpark gh vf/kd gSA vius le; dh fonzwirkvksa dks lgrs jgus dh vknr rFkk 'kCnksa dh fuf"Ø;rk ij Hkh dfo rY[k fVIi.kh djrs gSa & ^^lpeqp lnh ds bu vafre fnuksa esa @ dqN Hkh ugha cpk gS gekjs ikl@ viuh lgrs jgus okyh vknr ds flokA** ¼bl i`Foh---] i`"B &63½ dfo dh n`f"V ifjn`’; ds NksVs ls NksVs ifjorZuksa] izo`fÙk;ksa vkSj folaxfr;ksa dks dfork dk fo"k; cuk ysrh gSA bl mÙkj vk/kqfud le; esa pht+ksa dh Hkjekj] euq"; dh vr`Ir fyIlk vkSj lq[k&pkg dh va/kh nkSM+ ij Hkh ;g n`f"V tkrh gS & ^^vki dqN Hkh dgsa@ ysfdu thou dk ,slk @ dksbZ [kkdk ugha gS @ u [kq’kh dk ,slk dksbZ @ loZekU; fp= gS@ tks fcuk ?kV&c<+ dk gks@ ;kuh lkjh vkik/kkih nkSM+&/kwi @[khapk&rkuh@ml [kq’kh ds fy, gS@ ftldh dksbZ fuf’pr uki @vkneh ds ikl ugha gSA** ¼bl i`Foh ---] i`"B&65½ orZeku esa thou ds cnys <ax ij ckj&ckj dfo dh ys[kuh pyh gSA ewY;{kj.k ds ,sls le; esa dfork dh vifjgk;Zrk ij fpafrr dfo lkekftd lajpuk esa oafpr oxZ dh fLFkfr ij Hkh iSuh n`f"V j[krk gSA ^iUnzg vxLr* vkSj ^fjD’kkokyk uhan esa gS* bl n`f"V ls egÙoiw.kZ dfork gSA dfo dh laosnu’khyrk ?kj ds i’kq txr ds izfr Hkh fn[kkbZ nsrh gS A ^ykyh* 'kh"kZd ls cSy ij fy[kh dfork Ük`a[kyk vuqHkwfr dh l?kurk dk ljl mnkgj.k gSA orZeku esa tc lhfj;k] bjkd] rqdhZ ty jgs gS rFkk vkrad ds lk;s esa iwjk fo’o oSpkfjd }U} ls tw> jgk gS] tc vkrad dk Hk; o jk"Vªokn dk mHkkj ;wjksi dh vkfFkZd uhfr;k¡ r; dj jgk gS] ,sls le; esa Hk; ds euksfoKku] /keZ ds uke ls gksrh fgalk vkfn fo"k; ij dsfUnzr dfork,¡ avR;ar izklafxd gks mBrh gSaA ^^ftlus eq>s VDdj ekjh@ fu’p; gh og esjk gR;kjk ugha Fkk@ esjk gR;kjk fu’p; gh @nwj cSBk @ esjs ekjs tkus dh @ [kcj ds bartkj esa Fkk@ HkkX; ck¡pus okys us dgk @ esjk ekjds’k py jgk Fkk @ ;kuh ,d ukfLrd dks ekjus dh dksf’k’k esa@ gR;kjk] ekjds’k vkSj bZ’oj @rhukas vn`’; 'kkfey Fks@ fQj Hkh ukfLrd cp x;k@ pw¡fd bl nqfu;k esa mldh @ bu rhuksa ls @ vf/kd t:jr FkhA** ¼bl i`Foh---] i`"B 104&105½

cgjgky] tkrh; cks/k vkSj ;qxhu ;FkkFkZ ls laoknjr ;s dfork,¡ foxr] vkxr vkSj orZeku ds izfr ,d lkFk iwjh bZekunkjh cjrrh gSA l?ku vuqHkwfr vkSj ekuork ds izfr i{k/kjrk ls lapkfyr dfodeZ dyk dh vis{kk thou ls vf/kd fudVrk izdV djrk gSA laosnughurk ds ;qx esa dfork dk ;g ckuk mldh bZekunkj ea’kk dk iq"V mnkgj.k gSA

पुनीता जैन, प्राध्यापक

fgUnh

'kkl- LukrdksRrj egkfo|ky;]

Hksy] Hkksiky

eksck- 94250&10223

1- bUgsa ns[kus nks mruh gh nqfu;k ¼dfork laxzg½] vukfedk izdk’ku] 52] rqykckx bykgkckn-ewY;%300 :-


2- bl i`Foh dh fojkVrk esa ¼dfork laxzg½ usgk izdk’ku fnYyh dfo % ujsUnz iq.Mfjd ewY;% 225 :--

खुलती मुट्ठी की नयी लकीरों को देखते हुए

कामता प्रसाद

बंद मुट्ठी अर्थात भाग्य तथा उम्मीदों का मुट्ठी में कैद होना। मुट्ठी के हर बार खुलने से उसके मायने बदल जाते हैं। उपन्यास की कहानी आजकल के समय के ऐसे परिवारों की है जिसमें अभिभावक अपने को मॉडर्न समझते हैं लेकिन जब उनके बच्चे उनका अनुसरण करते हैं तो वे घूम फिर कर अपनी सोच उन पर थोपने की कोशिश करते हैं। कैनेडियन पृष्ठभूमि पर आधारित उपन्यास की नायिका के माध्यम से लेखिका डॉ. हंसा दीप ने विवाह के सही मायने पाठकों के सामने लाने का प्रयास किया है तथा भारतीय समाज में व्याप्त प्रेम विवाह जैसी समस्या का मार्मिक चित्रण प्रस्तुत किया है। यह एक उम्दा उपन्यास है।

उपन्यास में उन्होंने जो समस्याएँ उठाईं तथा स्त्री-पुरुषों के चरित्र खींचे उससे न केवल विवाह के स्वरूप के बारे में सोचने तथा समाज की इस समस्या में बदलाव लाने में मदद मिलेगी अपितु मानवीय सरोकारों को एक नई दृष्टि मिलेगी। जहाँ एक तरफ माता-पिता पूरी जिन्दगी अपनी बच्चियों को पराये लोगों/पुरुषों से बचने की सलाह देते हैं वहीं जिन्दगी के एक मोड़ पर किसी अनजान पुरुष की बाहें थमा देते हैं और कहते हैं यह सही जीवनसाथी है तुम्हारे लिए। फिर उन्हें इससे मतलब नहीं कि जिन्हें जीवनभर साथ रहना है उनकी क्या राय है... अगर किसी लड़की या लड़के ने समाज के इन नियमों को तोड़ने की गुस्ताखी की तो उसे नालायक घोषित कर दिया जाता है और उसे एक ऐसे दोराहे पर खड़ा कर दिया जाता है जहाँ पर उसे अपने परिवार और जीवनसाथी में से किसी एक को चुनना पड़े।

उपन्यास की कहानी तान्या और उसके पिता के इर्द-गिर्द घूमती है। डॉ. हंसा ने इनके माध्यम से तत्कालीन समाज की दशा को बखूबी दर्शाया है जो इतनी सत्य है जैसे रात के बाद सबेरा होना....

कहानी के मर्म, भाव के अलावा जो बात इस उपन्यास को बेहतरीन बनाती है वह है इसकी भाषा शैली। उपन्यास पढ़ते समय आपको ऐसा प्रतीत होगा जैसे कि यह आपके आस-पास की ही कहानी हो।

बंद मुट्ठी को जहाँ न सिर्फ एक उम्दा एवं संवेदनशील कहानी पढ़ने के शौक से पढ़ा जा सकता है वहीं दूसरी ओर इसमें विकसित की गई विचारधाराएँ, नीतियाँ एवं आदर्श भी स्वतः ही मन पर गहरी छाप छोड़ने में सक्षम हैं।

कहानी तान्या की है जिसे उसके पिताजी ने यह सोचकर सिंगापुर से टोरंटो विश्वविद्यालय में दाखिला दिलवाया कि जिन हालातों में लगभग सभी गृहिणियों को जूझना पड़ता है उनसे उनकी अपनी बेटी नहीं गुजरेगी। तान्या भी अपने पिताजी के सपनों को पूरा करने के लिए टोरंटों में पढ़ाई पूरा करने में जी जान से जुट जाती है। इसी दौरान उसे सैम नाम के युवक से प्रेम होता है जो कि उसकी बिरादरी का नहीं होता इस वजह से उसके माता-पिता उसे स्वीकार नहीं करते हैं। ऐसे में तान्या के सामने दो रास्ते थे एक जो उसके पिता की तरफ ले जाता है और दूसरा जो सैम की तरफ। पिता वाले रास्ते को चुनने के बाद वह समाज के नियमों में तो फिट थी लेकिन उसकी अपनी खुशी को ताक पर रखकर। तान्या ने सैम को चुना। समाज में बदलाव के लिए ऐसे निर्णायक फैसले जरूरी हैं।

उपन्यास की कुछ खूबसूरत पंक्तियां - “एक बार कुछ ऐसी ही मुश्किल घड़ियों में सैम ने उसके हाथ की लकीरों को पढ़ते हुए कहा था- पता है तान्या हमेशा कहा जाता है कि हाथों की लकीरों में जो लिखा होगा, वही हमारी किस्मत होगी। पर मेरी जिन्दगी में कई बार इसका उल्टा हुआ है।”

वहीं दूसरी तरफ उपन्यास में मानवीय सरोकारों को भी बेहद खूबसूरत ढंग से उकेरा है। तान्या और सैम द्वारा गोद ली गई छोटी बच्ची रिया के माध्यम से प्यार और भरोसे का जो मार्मिक चित्रण उपन्यास में किया गया है उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता।

“शायद इंसान के जीवन में परिवर्तन इसीलिए होता है कि नए रिश्ते बनें तो पुराने रिश्तों के विकल्प को लेकर। अन्यथा सारा जीवन बीती बातों की जुगाली करते व्यतीत हो जाता है। आज मम्मी-पापा-राजी दी सबको छोड़कर सैम को पाना, रिश्तों की भरपाई तो नहीं करता, पर बदलाव का नया रास्ता जरूर दिखा देता है।”

टोरंटो के ठंडे मौसमी प्रहार को आदमी और पशु-पक्षी सहज ही स्वीकार करते हैं – “जिद्दी मौसम अपनी हठ पर अड़े रहता और आदमी अपनी। आदमी ही क्यों वह छोटी-सी गिलहरी भी पीछे नहीं रहती, डट कर मुकाबला करती कड़ाके की ठंड का। ऐसे मौसम में भी बर्फ में दौड़ती गिलहरी जिन्दादिली का उदाहरण दे कर अपने पेट भरने का इन्तजाम करती। प्रकृति ने कितनी शक्ति दी है इस नन्हें प्राणी को।”

सच है जब तक मुश्किलों का सामना नहीं किया जाए रास्ते नहीं बनते। रास्ते तभी खुलते है जब कि उनपर चलने के लिए कदम आगे बढ़ाए जाएँ, सही समय पर फैसले लिए जाएँ। तान्या की सहेली बीनू के संदर्भ के माध्यम से लेखिका ने यहाँ यह बताना चाहा कि अगर फैसले सही समय पर नहीं लिए जाएँ तो हमेशा के लिए पछताना पड़ सकता है – “संवादों की कमी कहो या प्रतिबद्धताओं की। कुछ कमियाँ ऐसी रह गयीं जिन्हें शब्द नहीं मिल पाए और रिश्ते ख्वाब आधे-अधूरे रह गए।”

बंद मुट्ठी है तो लाख की, खुल गई तो ख़ाक की...., हम जिन्दगी में कई फैसले सिर्फ इस डर से नहीं ले पाते हैं कि कहीं परिणाम नकारात्मक नहीं हो। किन्तु जिन्दगी को डर के सहारे नहीं बिताया जा सकता। यही होता है जब सैम और तान्या रिया को बताते हैं - “रिया मेरे बच्चे, हमने तुम्हें जन्म तो नहीं दिया पर जीवन देने की कोशिश जरूर की है।”

और अंतिम लकीरों में उपन्यास का शीर्षक स्वत: ही जीवंत हो जाता है – “सैम और तान्या के पकड़े हुए हाथ हवा में लहराते हुए खुल जाते हैं। खुलती मुट्ठी की नयी लकीरों को देखते हुए।”


कामता प्रसाद

S-2/656 C-2

सिकरौल, भौजूवीर के पास

वाराणसी-221002

prasad.kamta@gmail.com

पुस्तक समीक्षा

पुस्तक - बंद मुट्ठी (उपन्यास)

लेखक - डॉ. हंसा दीप

प्रकाशक – शिवना पेपरबैक्स, भारत


व्यंग्य सेल्फ़ी धरिये, कुछ तो करिये

-ललित शौर्य

ये समय सेल्फ़ी खींचने से ज्यादा सेल्फ़ी दिखाने का है। आप सेल्फ़ी ले लीजिये कोई बड़ी बात नहीँ बड़ी बात तब होगी जब ये सोशल मीडिया में पोस्ट होगी। नई जनरेशन को सेल्फ़ी फोबिया है। वो सेल्फ़ी के प्रति आसक्त हैं। सेल्फ़ी नश्वर है। अनादि काल तक साथ चलने वाली नहीँ है। पर जब सेल्फ़ी पोस्ट हो जाती है तो उससे मिलने वाले कमेंट जीवन भर जेहन में रहते हैं। वो कारक होते हैं मुस्कुराने के, गुनगुनाने के, हँसाने और रुलाने के। बाबा फेसबुक दास ज्ञान पेलते हुए कहते हैं कि मूर्ख केवल सेल्फ़ी खींचने में विस्वास मत रख, सेल्फ़ी को दिखाने में विस्वास कर, सेल्फ़ी को वायरल करने में विस्वास कर, सेल्फ़ी को शोशल मीडिया में चेपने पर विस्वास कर। जिस दिन तेरे भीतर ये विस्वास पैदा हो जायेगा, तू सोशल मीडिया में अमर हो जायेगा। बाबा फेसबूकदास जी बताते हैं कि कलह में आनंद हैं। दिखावे में परमआनंद हैं। सेल्फ़ी कलह की जननी भी है। सेल्फ़ी से कइयों के पेट में मरोड़ उत्पन्न की जा सकती है। सेल्फ़ी से रौब बनाया जा सकता है। सेल्फ़ी से भौकाल काटा जा सकता है। इसलिए सेल्फ़ी खींचते ही उसे दिखाने का उपक्रम कर। अन्यथा तेरी सेल्फ़ी इस धरा पर धरी रह जायेगी, सेल्फ़ी को फेसबुक पर धर, व्हॉट्स एप्प पर धर, ट्विटर पर धर। कुछ कर।

सेल्फ़ी अब एक हथियार बन चुका है। जिसका उपयोग कोई भी कहीं भी कर सकता है। सेल्फ़ी से महिला समाज को अत्यंत लाभ हुवा है। अब पत्नियां पति की दबंगई के साथ जासूसी कर सकती हैं। उनसे सारा सच उगलवा सकती हैं। पति परमेश्वर अब पत्नी जी को उल्लू नहीँ बना सकता। पिछले हफ्ते की बात है पत्नी जी ने पति परमेश्वर को लताड़ लगाकर सब्जी लेने बाजार भेजा। पति बेचारा दौड़ते हुए बाजार पहुंच गया, पर रास्ते में एक पुराना दोस्त मिल गया। साथ में गपशप और चाय वाई चलने लगी। ठीक उसी समय पत्नी जी का फोन आ गया, परमेश्वर जी पसीना -पसीना हो गए। पत्नी जी ने कड़कती आवाज में पूछा कहाँ हो परमेश्वर जी लड़खड़ाती जुबान में वो मैं...मैं...मैँ सब्जी मंडी में हूँ। पत्नी जी बोली अच्छा तो मंडी में हो। अभी पता चल जायेगा। चलो जल्दी से एक लौकी कंधे में रख कर सेल्फ़ी सेंड करो। पति जी ने चाय का प्याला टेबल पर पटका और मण्डी की ओर दौड़ पड़े, और जल्दीबाजी में एक बड़ा सा कद्दू सर पर रखकर फोटो व्हाट्स एप्प कर दी। पत्नी जी फिर फोन पर चिल्लाई मैंने लौकी कंधे पर रखकर फोटो भेजने को कहा था कद्दू नहीँ। पति जी डरे सहमें लौकी की खोजकर उसे कंधे में रखकर सेल्फ़ी लेने लगे। आस पास के लोग ये दृश्य देख हँसने लगे। सेल्फ़ी व्हाट्स एप्प हुई। उधर से पत्नी जी का ओके आया। तब पति जी के जान में जान आई। ऐसे कई वाकिये हैं, जो सेल्फ़ी के महात्म्य और उसके महत्व पर प्रकाश डालते हैं।

सेल्फ़ी नेता नगरी में भी खूब चलन में है। छोटे नेता बड़े नेताओं के साथ खूब सेल्फ़ी-सेल्फ़ी खेलते हैं। उसके बाद सेल्फ़ी को अपनी फेसबुक पर चेपते हैं। कुछ कार्यकर्ता ऐसे भी देखे गए हैं, जो पांच मीटर दूर से ही नेताजी के साथ सेल्फ़ी लेते हैं, भले ही नेताजी का मुखमण्डल दूसरी दिशा में ही क्यो ना हो। उत्तेजित कार्यकर्ता ऐसी सेल्फ़ी भी फेसबुक में चेप देते हैं। और ऊपर से कैप्शन लिख डालते हैं,"आज नेताजी के साथ फुरसत के पल, नेताजी से लम्बी बात हुई"। अब ऐसी सेल्फ़ी देखकर भला कौन अपनी हँसी रोक पायेगा। आजकल की पीढ़ी सेल्फ़ी लेते हुए अनेक तरह की मुखाकृति बनाती है। होंठों को चौड़ा करना, आँखों को तिरछा करना, गर्दन टेढ़ी करना। ये सब एक श्रेष्ठ सेल्फ़ी लेने के तरीके हैं। अब जल्द वो समय भी आएगा जब अच्छी सेल्फ़ी लेने का कोर्स कराया जायेगा। और लोग सेल्फ़ी लेने का कोर्स करेंगे। आजकल चारों ओर बस सेल्फ़ी-सेल्फ़ी होरिया है। इसलिए आप भी सेल्फ़ी लीजिये और शोसल मीडिया में धरिये, अरे कुछ तो नया करिये....

ललित शौर्य

प्रदेश मंत्री अखिल भारतीय साहित्य परिषद

7351467702

समाज के जागरुक पहरुये के बयान: विवेक रंजन के व्यंग्य

डा. स्मृति शुक्ल

विवेक रंजन श्रीवस्तव व्यवसाय से इंजीनियर हैं, और हृदय से साहित्यकार। साहित्य में उनकी आत्मा बसती है, साहित्य के प्रति प्रेम उन्हें अपने परिवार से विरासत में मिला है। उनके पिता पिता श्री चित्रभूशण श्रीवास्तव जी हिन्दी के वरिष्ठ कवि, अनुवादक व चिंतक हैं . उनके पितामह स्.व सी एल श्रीवास्तव आजादी के आंदोलन के सहभागी तथा मण्डला के सुपरिचित हस्ताक्षर रहे थे .

हिन्दी व्यंग्य विधा में विवेक रंजन श्रीवास्तव ने अपना विशिष्ट स्थान बनाया है। वे एक अच्छेव्यंग्यकार इसलिये हैं क्योंकि वे एक अच्छे समाज दृष्टा हैं। परिवार, समाज, राजनीति, धर्म, अर्थव्यवस्था जैसे विषयों की छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी घटना पर वे सतत अपनी पैनी नजर रखते हैं। एक व्यंग्यकार के रूप में उन्होंने अपने संचित अनुभवों और समाज के प्रति प्रतिबद्धता तथा बहुत ही दोस्ताना शैली में समाज के प्रत्येक छद्म विषय पर अपनी लेखनी चलायी हैं। जब विवेक रंजन जी सामाजिक विसंगतियों पर,

राजनैतिक छद्म पर, धार्मिक पाखंड पर अपनी रचनात्मक कलम चलाते हैं तब उनके मन में समाज को बदलने की बलवती स्पृहा होती है। उनकी इसी सकारात्मक परिवर्तनकामी दृष्टि से उनके व्यंग्यों का जन्म होता है। दरअसल व्यंग्य रचना एक गंभीर कर्म है। विवेक रंजन श्रीवास्तव बीस-पच्चीस वर्षो से अनवरत् व्यंग्य लिख रहे हैं। चाहे कोई भी घटना हो उनका ध्यान उस घटना के मूल कारणों पर जाता है और वे एक मारक, मार्मिक तथा तीखे व्यंग्य लेख की रचना कर देते हैं, जिसके अंत में प्रायः वे समस्या का समुचित समाधान भी सुझाते हैं, इस दृष्टि से वे अन्य हास्य व्यंग्य के कई लेखको से भिन्न हैं। विवेकरंजन के तीन व्यंग्य संग्रह ‘राम भरोसे’, ‘कौआ कान ले गया’, और ‘मेरे प्रिय व्यंग्य लेख’ शीर्षक से प्रकाशित हो चुके हैं। चौथा व्यंग्य संग्रह धन्नो बसंती और बसंत ई बुक के रूप में मोबाईल पर सुलभ है

विवेक रंजन जी बहुत ही पारिवारिक अंदाज में अपने व्यंग्यों का प्रारंभ करते हैं बात पत्नी बच्चों से आरंभ होती है और देश की किसी बड़ी समस्या पर जाकर समाप्त होती है ‘भोजन-भजन’, फील गुड, आओ तहलका- तहलका खेलूँ, रामभरोसे की राजनैतिक सूझ-बूझ आदि ऐसे ही व्यंग्य लेख हैं। रामभरोसे जो इस देश का आम वोटर है, मिस्टर इंडिया जो गुमशुदा, सहज न दिखने वाला आम भारटिय नागरिक है तथा उनकी पत्नी उनके वे प्रतीक हैं जिनसे वे अपने व्यंग्य बुनते हैं . विवेक रंजन ने अपने व्यंग्य ‘आल इनडिसेंट इन ए डिसेंट वे’ में आज के युग में विवाह समारोहों में किये जा रहे वैभव प्रदर्शन, फूहड़ता, आत्मीयता का अभाव, अपव्ययता आदि पर विचार किया है। इस व्यंग्य के मूल में समाज-सुधार का भाव गहराई से निहित है।

‘नगदीकरण मृत्यु का’, ‘चले गये अंग्रेज’ आदि व्यंग्यों में व्यवस्था के तमाम अंतर्विरोध उजागर हुए हैं। आजादी के बाद भारत में जो स्थितियाँ बनी , सामाजिक राजनैतिक जीवन में जो विसंगत स्थितियाँ उपजीं, भ्रष्टाचार का बोलबाला बढ़ा, धर्म के क्षेत्र में पाखंडी बाबाओं का अतिचार बढ़ा अर्थात भारतीय समाज के सभी घटकों में इतनी असंगतियाँ बढ़ी कि तमाम साहित्यकारों का ध्यान इस ओर गया। हरिशँकर परसाई, शरद जोशी, बालेन्दु शेखर तिवारी, श्रीलाल शुक्ल, रवीन्द्र त्यागी, सुरेश आचार्य, के.पी.सक्सेना, लतीफ घोंघी, ज्ञान चतुर्वेदी के साथ विवेक रंजन श्रीवास्तव ने जीवन यथार्थ के जटिलतम रूपों का बड़ी गहराई से अध्ययन करके अत्यंत सूक्ष्म और कलात्मक व्यंग्य लिखे। विवेक रंजन के व्यंग्य एक बुद्धिजीवी, सच्चे समाज दृष्टा, ईमानदार और संवेदनशील व्यक्ति तथा समाज सचेतक की कलम से निकले व्यंग्य है। इन व्यंग्यों में सदाशयता है तो विसंगतियों के प्रति तीव्र दायित्व बोध और आक्रामकता भी है। ‘जरूरत एक कोप भवन की’ में भगवान राम के त्रेता युग से प्रारंभ करते हुए विवेक रंजन कोप भवन की ऐतिहासिकता को सिद्ध करते हुए वर्तमान युग में कोप भवन की प्रासंगिकता को सिद्ध करते हुए लिखते हैं कि - ‘आज कोप भवन पुनः प्रासंगिक हो चला है। अब खिचड़ी सरकारों का युग है। .......... अब जब हमें खिचड़ी संस्कृति को ही प्रश्रय देना है, तो मेरा सुझाव है, प्रत्येक राज्य की राजधानी में जैसे विधानसभा भवन और दिल्ली में संसद भवन है, उसी तरह का एक कोप भवन भी बनवा दिया जावे। इससे बड़ा लाभ मोर्चा के संयोजकों को होगा। विभाग के बँटवारे को लेकर किसी पैकेज के न मिलने पर, अपनी गलत सही माँग न माने जाने पर जैसे ही किसी का दिल टूटेगा वह कोप भवन में चला जायेगा। रेड अलर्ट का सायरन बजेगा संयोजक दौड़ेगा। सरकार प्रमुख अपना दौरा छोड़कर कोप भवन पहुँचे, रूठे को मना लेंगे, फुसला लेंगे। लोकतंत्र पर छाया खतरा कोप भवन की वजह से टल जायेगा।’’ इस उद्धरण में हास्य के पुट के साथ देश की राजनैतिक स्थिति पर बड़ा पैना व्यंग्य है। विवेक रंजन ने अपनी एक भाषा निर्मित की है। वे शब्द की स्वाभाविक अर्थवत्ता को आगे बढ़ाकर चुस्त बयानी तक ले जाते हैं। सही शब्दों का चयन उनका संयोजन, शब्दों के पारंपरिक अर्थों के साथ उनमें नये अर्थ भरने की सामथ्र्य ही उनकी व्यंग्य भाषा को विशिष्ट बनाती है। उदाहरण के लिये ‘पिछड़े होने का सुख व्यंग्य की ये पंक्तियाँ जो एक कहावत से प्रारंभ होती

है -

‘‘अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम,

दास मलूका कह गये सबके दाता राम।’’

‘‘इन खेलों से हमारी युवा पीढ़ी पिछड़ेपन का महत्व समझकर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रोशन कर सकेगी। दुनिया के विकसित देश हमसे प्रतिस्पर्धा करने की अपेक्षा अपने चेरिटी मिशन से हमें अनुदान देंगे। बिना उपजाये ही हमें विदेशी अन्न खाने को मिलेगा। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का हवाला देकर हम अन्य देशो के संसाधनों पर अपना अधिकार प्रदर्शित कर सकेंगे। दुनिया हमसे डरेगी। हम यू.एन.ओ.में सेन्टर आफ अट्रेक्शन होंगे।’’ वस्तुतः यह व्यंग्य हमारे देश में आज तक जारी आरक्षण व्यवस्था पर है। अपने व्यंग्यों के माध्यम से विवेक रंजन जी आज के बदलते परिवेश और उपभोक्तावादी युग में मनुष्य के स्वयं एक वस्तु या उत्पाद में तब्दील होते जाने को, इस हाइटेक जमाने की एक-एक रग की बखूबी पकड़ा है। उनके शब्दों में निहित व्यंजना और विसंगतियों के प्रति क्षोभ एक साथ जिस कलात्मक संयम से व्यंग्यों में ढलता है वही उनके व्यंग्य लेखों को विशिष्ट बनाता है। विवेक रंजन के पास विवेक है जिसका उपयोग वे किसी घटना, व्यक्ति या स्थिति को समझने में करते हैं, सच कहने का साहस है जिससे बिना डरे वे अपनी मुखर अभिव्यक्ति या असंगत के प्रति अपनी असहमति दर्ज कर सकते हैं, संत्रास बोध और तीव्र निरीक्षण शक्ति और संतुलित दृष्टि बोध है, परिहास और स्वयं को व्यंग्य के दायरे में लाकर स्वयं पर भी हँसने का माद्दा है। अनुभवों का ताप और संवेदना की तरलता के साथ सकारात्मक परिवर्तनकारी सोच तथा एक धारदार भाषा है जो सीधे पाठक को संबोधित और संप्रेषित है।

निष्कर्षत: विवेक रंजन जी के व्यंग्य पाठक को सोचने के लिये बाध्य करते है क्योंकि वे उपर से सहज दिखने वाली घटनाओं की तह में जाते हैं और भीतर छिपे हुए असली मकसद को पाठक के सामने लाने में सफल होते हैं। हाँ कु व्यंग्य लेखों में उतना पैनापन नहीं आ पाया है इस कारण वे हास्य लेख बन गये हैं। यद्यपि ऐसे व्यंग्य लेखों की संख्या कम ही है। उनके सफल व्यंग्यों में जीवन की जटिलता और परिवेशगत विसंगति अपनी संपूर्ण तीव्रता के साथ व्यक्त हुई। वे जितने कुशल सिविल इंजीनियर हैं उतने ही कुशल सोशियो इंजीनियर भी हैं। इसी सोशियो इंजीनियरी ने विवेक रंजन के व्यंग्यों को इतना सशक्त और धारदार बनाया है।वे अनवरत व्यंग्य लिख रहे हैं, अखबारो के संपादकीय पृष्ठो पर प्रायः उनकी उपस्थिति दर्ज हो रही है उनसे हिन्दी व्यंग्य को दीर्घकालिक आशायें हैं .

डा. स्मृति शुक्ल

प्रध्यापिका, हिन्दी विभाग, मानकुंवर बाई शासकीय महिला महाविद्यालय जबलपुर

ए-16, पंचशील नगर

नर्मदा रोड, जबलपुर-482001


मो.नं. 9993416937

पहाड़ों की रानी – डलहौजी


डॉ. कविता विकास

गज़ब की कशिश है पहाड़ों की नैसर्गिक सुंदरता में। पहाड़ सदा से मुझे अपनी ओर खींचते रहे हैं। जीवन की यात्रा में जब घुमावदार मोड़ पर आकर साँसें थमने लगती हैं तो अक्सर मन होता है कि किसी ऐसे एकांत स्थल पर चली जाऊं जहां से सीधे रास्तों की तलाश आसान हो जाए। शायद पहाड़ के तीखे मोड़ों पर पहाड़ियों की कर्मठता और विपरीत परिस्थितियों में भी सामंजस्य बनाये रखने की कला जीने की कला सिखा दे। पिछले कई सालों से पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण कहीं जाने का नहीं हो पाया था। इस बार अक्टूबर के महीने में हमने डलहौजी जाने का मन बना लिया और बुकिंग भी करवा ली। असली यात्रा माता वैष्णव देवी के दर्शन की थी। यात्रा का यह पहला पड़ाव काफी सुखद था। फिर कटरा से पठानकोट और पठानकोट से डलहौजी। पहाड़ों पर बहुत करीने से उगी देवदार की ऊँची - ऊँची डालियाँ जब आकाश से बातें करती प्रतीत होती हैं तो लगता है कि आपस में होड़ लगी है,कौन सूरज तक पहुँच पाता है। टेढ़े - मेढ़े दिल को दहला देने वाले रास्तों के साथ - साथ कभी बरसाती नदियाँ चलती हैं तो कभी टट्टुओं पर सामान लाद कर एक जगह से दूसरे जगह जाने वाले स्थानीय निवासी।

समुद्र तल से करीबन ६७२८ फ़ीट की ऊंचाई पर बसा डलहौजी धौलाधर पर्वत श्रृंखला पर बसा बेहद रमणीक स्थान है। अंग्रेजों के ज़माने में गर्मियों के समय यह उनका प्रिय हिल स्टेशन हुआ करता था। अभी भी पुराने चर्च और सड़कों के नाम उस समय की याद दिला देते हैं। हमने हेरिटेज होटल में बुकिंग करवा रखी थी। यह वही होटल है जो आज़ादी के पहले से बना हुआ है,यक़ीनन अब यह अपने नए रूप में ढेर सारी सुविधाओं के साथ पर्यटकों को आकर्षित कर रहा है। कहते हैं महान क्रन्तिकारी सुभाष चंद्र बोस ने अपने स्वास्थ्य लाभ के दौरान यहीं शरण ली थी। इसी के पास सुभाष बावली है जहां के प्राकृतिक झरने का पानी बोस की असाध्य बीमारी में बहुत फायदेमंद रही थी।यहीं से अन्य दर्शनीय स्थलों को देखने की शुरुआत हुई। हम पहुँचे पंचपुला जहाँ महान क्रन्तिकारी एस. अजीत सिंह की समाधी है। यह स्थान पहाड़ पर ट्रैकिंग और अन्य रोमांचक खेलों के लिए बच्चों को खूब भाता है। रोप वे पर निरे पैर चलना भी रोमांचक है। ठंड इतनी ज़ोरदार कि चाय की तलब जाती ही नहीं। इसलिए यहां चाय की ढेर सारी दुकानें खुली हुई हैं जो साथ में पारम्परिक वस्त्र - आभूषण भी रखते हैं।

कुछ देर यहां ठहरने के बाद डलहौजी का विशेष आकर्षण खज्जियार की ओर चल पड़े। मनोरम घाटियों के संकरे - संकरे रास्तों से होकर खज्जियार तक पहुँचने का अलग आनंद है। यात्रियों को जत्था रास्ते भर मिलता रहा। सभी घाटियों के मध्य फोटो खिंचवाने के लिए रुकते ,गुनगुनी धूप का मज़ा लेते और फिर चल पड़ते। अलग - अलग प्रान्तों से आये यात्रीगण बड़ी आत्मीयता से आपस में मिलते। तत्क्षण परिचय होता और कुछेक के साथ तो इतनी दोस्ती हो जाती कि तुरंत व्हाट्सअप पर नंबरों का आदान - प्रदान हो जाता। यात्राएं जीवन की आपा धापी में रिश्तों के मध्य ठंडी होती जा रहीं संवेदनाओं को सहेज कर पुनः गर्माहट लाने का सहज साधन होती हैं। इस बात की सार्थकता खज्जियार की बेहद सुन्दर व रोमांटिक फ़िज़ाओं में आप महसूस कर सकते हैं। प्लेट के आकार का लैंडस्केप जिसके चारों ओर करीने से सजी देवदार के वृक्ष आसमान से बातें कर रहे हों, बरबस ही उस कुदरत की याद दिला देता है जिसने बेशुमार सुंदरता से धरती का दामन भर रखा है।

इसे हम भारत का स्वीट्ज़रलैंड कह सकते हैं। खज्जियार के जिगजैग रास्तों के मध्य घने जंगलों की ऐसी कतारें मिलती हैं कि सूर्य का प्रकाश भी धरती तक नहीं पहुँच पाता है। कालाटोप की जंगलों के बीच से बर्फ से ढंकी पर्वतचोटियाँ दिखलाई पड़ती हैं मानो देवदारों ने सफ़ेद टोपी पहन रखी हों। थोड़ा आगे भलनी देवी का मंदिर है,जिसके लिए आपको करीबन डेढ़ किलोमीटर की चढ़ाई चढ़नी होती है। यह डलहौजी का सबसे ऊंचा प्वाइंट है। कहते हैं पुराने समय में कुश्ती करने के पहले पहलवान यहां पूजा करने आते थे। खड़ी ढाल की पहाड़ी पर चढ़ना यूँ भी आसान नहीं है। घाटी के तरफ फेंसिंग भी सम्भव नहीं है। इसलिए कमजोर दिल वाले लोगों को चढ़ान के समय नीचे देखने को मना की जाती है। पहाड़ी झरनों से सजी पर्वत शृंखलाएँ अपने कलकल निनाद से श्रान्त - क्लांत लोगों की थकान जाने कब हर लेतीं हैं,पता ही नहीं चलता। रावी नदी के ऊपर बसा चम्बा पुरानी मंदिरों के आस्था व विश्वास का केंद्र है। भरमौर के मंदिर और मणिमहेश झील की अपनी ही खासियत है।ईश्वर के अस्तित्व में क्यों न भरोसा हो,जब हर शै में उसकी अनुभूति होती है। किसी ने कहा है, " तुझमे डूब कर देखा है,गज़ब का नशा है। " मैंने सरस - स्निग्ध प्रकृति की गहराई में खुद को खो जाने दिया ताकि उस रोमांच को ताउम्र महसूस करती रहूँ।

पहाड़ों के विस्तृत अंचल में आड़ी - तिरछी रेखाओं वाले बुज़ुर्ग हों या नख से शिख तक सजी पहाड़ी युवतियां,सब में कुछ जीवित है। जीवित है,अपनी संस्कृति को बचाये रखने की जद्दोजहद और एक स्वच्छ - स्वस्थ पर्यावरण को बचाये रखने की पुरज़ोर कोशिश। खनिज तत्त्वों से भरपूर प्राकृतिक झरने का पानी अब भी लोग पीते हैं,इसलिए आर ओ वाटर की जानकारी केवल टी. वी. के प्रचार तक ही सिमटा हुआ है। बहुत संघर्ष है इनके जीवन में पर बहुत आनंद है। प्रकृति के पहलु में रहने वाला इंसान सहज - सरल और सौम्य होता है। गर्मी वांछित है,स्वास्थ्य के लिए भी और सौन्दर्य के लिए भी। चीड़ - देवदार की घाटियों को चीर कर जब सूर्य की किरणें घाटियों तक पहुँचती हैं तो लगता है,घंटों उन्हें निहारते रहें। और तब होता है एक अद्भुत अहसास। यह उष्णता अंतर्मन तक पहुँच कर सीधे कुदरत से रिश्ता जोड़ती है। प्रकृति माया है,शक्ति है और माँ है। आकाश को पिता मानते हैं। हमारा दृष्टिकोण है कि हम प्रकृति को समग्रीनभूत परिवार मानते हैं। ऊँची - ऊँची चीड़ और देवदार की डालियों को आकाश छूते हुए देख कर लगता है जैसे ये वृक्ष कह रहे हों," ऐ आसमां तेरी निगहबानी में,हमने मुद्दत से पलकें नहीं झपकाएँ हैं।"

स्वतंत्र लेखिका व शिक्षाविद

ई मेल- kavitavikas 28@gmail.com

संपर्क - डी. - 15,सेक्टर - 9,पी ओ - कोयलानगर,dist - धनबाद,पिन - 826005,झारखण्ड


Mobile – 09431320288

बुन्देली लोक से एक मुलाक़ात !


कीर्ति दीक्षित

मलय गिर की अत ऊंची पहरियाँ, विन्ध्य की पारियां देख लाजाऊतीं।।

चन्द्र टरै सूरज टरै, टरै जगत व्यवहार।

पै दृढ व्रत हरिश्चंद्र कौ टरै न सत्य विचार।।

पाश्चात्य धुनों के बीच एक दिन दरवाजे पर ढोलक की थापों पर लोकगीत गाते थिरकते लोगों को देखा तो अपनी मीठी-मीठी परम्पराओं के ऊपर अभिमान हो उठा, लेकिन साथ ही प्रश्न भी मचलने लगा की आखिर है क्या ये लोक साहित्य? मैं इस अंग्रेजी बयार से दूर में अपने वास्तविक लोक को जीने निकल पड़ी अपने गाँव, पर सालों बाद पाँव पड़ा तो जाना आखिर क्या है लोक साहित्य!

लोक साहित्य अपढ़ व्यक्तियों का अगढ़ साहित्य जो अनहद है, इसमें गालियों, गीतों, दोहों, छंदों का अल्हड़पन है तो दर्शन, अध्यात्म, की उत्कृष्टता, ये यौवन का अलहदा गीत है तो वीरों की शौर्य है, ये भोला है, शांत है, ये संघषों का उल्लास है जिस प्रकार वैदिक ऋषियों के सन्दर्भ में कहा जाता है 'ऋषयः मन्त्रद्रष्टारः न तु कर्तारः' उसी प्रकार लोक को महसूस कीजिये तो लोकसाहित्य भी है और संस्कृति भी, लोक प्रेमचंद की गोदान, गबन और कर्मभूमि है, लोक जयशंकर प्रसाद की तितली है, तो लोक गाँव में ढोलक की थाप पर थिरकने वाले ग्रामीणों की मस्ती भी है ! लोक ही जीवन है, और जीवन ही लोक !

ये लोक - भाषा, शास्त्र, वेद से परे अपने अलग संसार का स्वामी होता है। महर्षि पतंजलि भी महाभाष्य में कहते हैं - 'लोके शब्दाः अर्थपराः, शास्त्रे शब्दाः शब्दपराः' लोक में अर्थ का महत्व होता है सहज शब्दों में कहूँ तो भाषा के लिए राम शब्द मात्राओं और अक्षरों का सार्थक संयोजन है जबकि लोक में 'राम' भगवान राम हैं, राजा राम हैं, सियापति राम हैं

हम भाग्यशाली हैं कि यहाँ लोक की असंख्य वीणाएं झंकृत होती हैं जिनकी मधुर धुनों से शायद ही कोई वंचित हो, हमारी इस पुण्य सलिला भूमि पर लोकसाहित्य की अनेक विरासतें सांस लेती हैं। आज मैं इन विरासतों में से एक बुन्देली लोक साहित्य से आपकी मित्रता कराने जा रही हूँ लेकिन उससे पूर्व बुंदेलखंड का परिचय देती हूँ और यदि आपका यह मिलन बुन्देली लोक भाषा में हो तब ही न्यायोचित होगा - बुंदेलखंड कुछ इस प्रकार अपना परिचय देता है -

'इत जमुना,इत चम्बल उत टौंस।

छत्रसाल से लड़न की रही ना काहू हौंस।।

उत्तर समथल भूमि गंग जमुना सुबहती है।

प्राची दिसी कै मूरसौन कासी सुलसती है।।

दखिरेवा विन्ध्याचल तन शीतल करनी।

पच्छिम में चम्बल चंचल सोहत महारानी।।

तिन्मधिराजे गिरी वन सरिता सहित मनोहर।

कीर्तिस्थल बुन्देलन कौ बुंदेलखंड वर।।'

बुन्देलखण्ड का अस्तित्व प्रागैतिहासिक काल से है जिसका प्रमाण सागर जिले के आबचंद में स्थित गुफाओं में प्रागैतिहासिक कालीन शैलचित्रें के रूप में प्राप्त होता है। वैदिक साहित्य में भी बुन्देलखण्ड के भौगोलिक परिवेश का वर्णन छिटका पड़ा है वायुपुराण(23/192-204), विष्णु पुराण (2/2/30), मत्स्य पुराण (181/26,27), श्रीमद्भागवत (5/8/1-30) में प्राप्त होता है। रामायण मे यहां कि पुलिंद किरात और शबर जातियों का वर्णन मिलता है तो महाभारत से जुड़ी अनेक कथाएं आज भी यहां सांसें लेती हैं।

बुन्देली लोक साहित्य -

समाज के शोषित वर्ग का लोक साहित्य विशेष रूप से आलिंगन करता है, लोक कथाओं में साधारण जन की संघर्ष गाथा को अधिक चमकीला बनाकर प्रस्तुत किया है, लोक कथाओं में अबेर पड़ती है राजा रानी भी विपत्ति भोगते हैं सत्य एवं न्याय के प्रति झुकते हैं, लोक अहंकार के तिरोहन का स्थल है, उच्चतम भावों का प्रदर्शक है लोक, लोकगीतों में मानवीय मूल्यों का समावेश होता है, धार्मिक, अध्यात्मिक, कर्मकांड, दर्शन विचार लगभग एक ही धुरी पर केन्द्रित है बुन्देली लोक साहित्य पुस्तकों में भले समृद्ध ना हो लेकिन बुंदेलखंड की परम्पराओं, उत्सवों में यह गाता है, नाचता है, हंसी ठिठोली करता हुआ जीवंत है, बुन्देली अपनी धरती के प्रति कुछ इस प्रकार कृतज्ञता व्यक्त करते हैं -

'धरती माता तैनें काजर दये, सैन्दुरन भर लई मांग।

पहर हरिऊला ठाड़ी भई तैनें मोह लियो सब संसार।।

धरती माता तो मैं दो भये, इक आंधी, एक मेह।

मेह के बरसें शाखा भाई जा में लिपट गए संसार।।'

बुन्देली प्रथाओं में लोकदर्शन - हमारे क्षेत्रीय लोक साहित्य इतने सबल हैं कि यहाँ गंवार कहा जाने वाला गँवई भी किसी बड़े दार्शनिक से कम नहीं है, हमारा लोक साहित्य किसी शिलालेख से नहीं बल्कि परम्पराओं, उत्सवों और श्रुति संस्कार से सदियों का सफ़र तय करके आया है, बुंदेलखंड में अनेक अनोखी परंपरायें है जिनमें बुन्देली लोक सांसें लेता है, विभिन्न प्रकार के लोकगीतों से सारा वातावरण अनुपम सौंदर्य की प्रतिकृति सा प्रतीत होता है।

सुआटा - शक्ति पूजा के दिनों में अविवाहित कन्यायें सुआटा नामक राक्षस की पूजा करती हैं, उत्सव मनाती हैं, नाचती हैं। ऐसा माना जाता है प्राचीनकाल में एक सुआटा नामक राक्षस था जो अविवाहित बालिकाओं का उठा ले जाता, उस राक्षस से बचने के लिए बालिकाएं उसकी पूजा कर उसे प्रसन्न करती थीं। इस पूरी पूजा के दौरान बालिकाएं विभिन्न प्रकार के लोकगीतों और नृत्यों के साथ उस राक्षस का मान मनुव्वल करती थी। ये परंपरा आज भी बुंदेलखंड में जीवित है, यह उत्सव अश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से आरम्भ होकर नवमी तक चलता है इस अवसर पर बालिकाएं सुआटा की मिट्टी की प्रतिमा दीवार पर बनाती हैं, कांच की कौड़ियों से इस चित्र को सजाया संवारा जाता है, रंग बिरंगे चौक पूरे जाते हैं, अन्तिम दिन टेसू और झिंझिया का विवाह होता है और विवाह के बाद सुआटा का अंग प्रत्यंग तोड़कर फेक दिया जाता है, उसकी कौड़ियां लेकर लोग अपनी तिजोरी में रखते हैं, इससे धन धान बढ़ने का शगुन माना जाता है, सुआटा को मनाने के लिए गए जाने वाले ये लोकगीत सुआटा के नाम से जाने जाते हैं-

'उठो-उठो सूरजमल भइया, भोर भये नारे सुआटा।

मलिनी खड़ी है तेरे द्वारे, इन्दलगढ़ की मलिनी ना रे सुआटा।

हाटई हाट बिकाए।।'

झिंझिया - झिंझिया के सम्बन्ध में मान्यता है कि टेसू नामक एक वीर योद्धा ने सुआटा राक्षस को मार गिराया था और उसकी पुत्री झिंझिया से विवाह कर लिया, अतः तबसे झिंझिया गायन और नृत्य की परंपरा चली आ रही है, शारदीय नवरात्रि में अष्टमी से पूर्णिमा की रात्रि तक झिंझिया उत्सव मनाया जाता है, इस उत्सव में महिलाएं मटकी में कई छेद करके उसमें दीपक रखती हैं, इस झिलमिल प्रकाश से प्रकाशित मटकी नर्तकी अपने सिर पर रखकर नृत्य करती है, बालिकायें आशीर्वाद के अक्षत घरों में डालती हैं और झिंझिया गाती हैं -

'पौरन बैठे भइया पहिरिया नारे सुआटा, खिरकिन बैठे कोतवाल

हरौ दुपट्टा नील को नारे सुआटा कौन बड़ी री तोरी पीर।'

टेसू - इसी उत्सव में बालक वर्ग सुआटा राक्षस और वीर योद्धा टेसू के बीच के संवादों का मंचन करते हैं, नाचते हैं, गाते हैं गांव के घरों के द्वारों पर जाकर इस प्रकार टेसू का गायन करते हैं -

टेसू आए वीरन वीर, हाथ लिए सोने के तीर।

नौ मन पीसे दस मन खाएं घर-घर टेसू मांगन जाएं।।

बड़ो दुलारौ बड़ी अटरियां, बड़ो जान कें टेसू आए

मैड़न - मैड़न रासो फूले वन फूले कचनार,

सदा बखरियां ऐसें फूलें जी में हाथी झुके दुआर।।

दिवारी और मौनिया नृत्य - ये नृत्य गायन दिवाली के समय गोवर्धन पूजा से आरम्भ होता है, इसमें भक्तों का एक दल सारा दिन मौन धारण करता है बुन्देली परंपरा में इसे 'मौन चराना' कहा जाता है, इसके पीछे मान्यता है की मनुष्य पशुओं की पीड़ा समझ सके इसलिए मौन धारण कर पांच सात गाँव की सीमाओं को छू कर आता है, इस मौके पर पशुओं को रंगों से सजाया जाता है साथ ही इन मौनियों की भी विशेष प्रकार की पोशाक होती है, जिसमे ये लोग मोर पंख लाठी धारण करते हैं तथा सीपियों से गुथे विशेष प्रकार के वस्त्र भी पहनते हैं, संध्या काल में जब मौन पूर्ण होता है तब ये लोग नाचते गाते हैं, इस पारम्परिक गायन को ही दिवारी कहा जाता है, दिवारी नृत्य और गायन के पीछे की मान्यताओं में से एक ये भी है कि जब श्री कृष्ण ने गोवर्धन उठाया तो समस्त गाँव ने उन्हें अपनी लाठियों से सहारा दिया था, अतः ऐसी मान्यता भी है की यह द्वापर से चली आ रही परंपरा है, इस लोक उत्सव में दोहे, रावले, गीत आदि जवाबी होते हैं, जिन्हें दिवारिया गाते हैं -

'सप्तद्वीप नौखण्ड में सुन्दर जात अहीर।

बार बार ब्रह्मा पछतावें हम क्यों न भए अहीर।।' हूइया हो हो .....

'मीरा तैने नैना गंवाए रोय रोय।

बालापां की सुरंग चुनरिया फटे ना मैली होय।

विष के प्याले राणा जी ने भेजे, विष को इमरत होय।' हूइया हो हो .....

फाग - वैसे फाग गायन का चलन तो कई क्षेत्रों में मिलता है, लेकिन बुंदेलखंड में फाग में श्रृंगार और दर्शन दोनों का विशिष्ट स्थान है, रति क्रियाओं, छेड़छाड़ से भरे फाग गीतों को ही प्रायः फाग माना जाता है लेकिन यहाँ ईसुरी की फागों का दर्शन वेदांगों के दर्शन से कम नहीं, यथा -

'मन पंछी उड़ जाने एक दिन मन पंछी उड़ जाने लाल।

पारो पींजरा राहने एक दिन, मन पंछी उड़ जाने लाल।।'

आल्हा - बुन्देली साहित्य की चर्चा आल्हा के बिना अधूरी है, आज भी बुन्देली धरती की पहचान आल्हा ऊदल के नाम से ही होती है, सावन के महीने में वीर रस से ओतप्रोत आल्हा के छंद गाये जाते हैं, आल्हा गाने वालों को 'अल्हैत' कहा जाता है। बारहवीं शताब्दी में जगनिक द्वारा रचा गया आल्हाखंड श्रुति परंपरा के माध्यम से ही पन्नों तक पहुंचा है, फर्रुखाबाद के तत्कालीन अंग्रेज शासक इलियट ने अल्हैतों को बुलाकर आल्हा गायन करवाया और फिर उसे लिपिबद्ध करवाया, बुन्देली विद्वानों के अनुसार जगनिक द्वारा रचित आल्हाखंड की मूल प्रति अब प्राप्त नहीं होती किन्तु विभिन्न बुन्देली लेखकों ने इसे संकलित किया है -

'सुमिरन करकें अजैपाल कौ, लैकें रामचन्द्र कौ नांव।

खैंची सिरोही लाखन राणा, समुहें गोल गए समुदाय।।

जैसें भिडहा भिडाहन पकरै, जैसे सिंह बिदारे गाय।

तैसई लाखन दल में पैठे, रन में कठिन लड़े तलवार।।'

गारी, दादरा - संसार का हर समुदाय, समाज अपनी घृणा, कुंठा जैसे मनोविकारों की अभिव्यक्ति गालियों के माध्यम से करता है किन्तु भारतीय लोक का ये अद्भुत चमत्कार ही है जो गालियों को भी मस्तक पर स्थान देता है, जैसे बुंदेलखंड का लोक कई बार अपनी अनुभूतियों की अभिव्यक्तियों में निरावृत्त होकर आचरण करता है, बुंदेलखंड के ब्याह आदि उत्सवों में गालियों का सस्वर गायन किया जाता है, 'कहाँ डार आयीं नार नवल बिछिया ' इतना ही नहीं जिसके नाम पर ये गालियाँ दी जाती हैं वह स्वयं को खुशनसीब समझता है, और गालियाँ गाने वाली घूँघट की ओट में छुपी गव्नारियां जब गाती हैं- 'गारी की गवाई सारे पतरी में डारें जाओ' तो सारे मेहमान सहर्ष गवनारियों का सम्मान करके ही अपनी जेवनार पूरी कर उठते हैं। इसी प्रकार नववधु के आगमन पर दादरे गाने की परंपरा है ठिठोली से भरे इस बुन्देली दादरे का एक उदाहरण देखिये -

'कोऊ इत्ते आओ री, कोऊ उत्ते जाओ री।

नौनी दुल्लैया खें समझाओ री।।'

इसके अतिरिक्त मामुलिया, अचरी, लमटेरा, लांगुरिया कहरवा, गोट, अहरी, कजरी, हरदौल, सोहर, बधैया आदि अनेक प्रकार के लोकगायन ढोलक,पखावज, खंजरी, इकतारे, आदि वाद्य यंत्रें के साथ विभिन्न अवसरों पर गाये जाते हैं। ये लोककला, केवल मनोरंजन के लिए नहीं बल्कि समाज को मानवता, उत्साह और संवेदनाओं की परिपाटी की ओर अग्रसर करने के लिए हैं।

नृत्य- राई, पहुनाई, कछयाई, दलदल घोड़ी नृत्य आदि बुन्देलखण्ड क्षेत्र के प्रमुख लोकनृत्य है, राई नृत्य में नर्तकी उसी प्रकार झूमती है जिस प्रकार राई के बीज पेराई मशीन में घुमते हैं यह एक प्रतियोगिता के रूप में भी होता है जिसे जवाबी राई कहा जाता है पहुनाई मेहमानों के स्वागत हेतु किया जाता है विशेष तौर पर विवाह अवसरों पर यह कला दिखाई पड़ती है। इसी प्रकार दलदल घोड़ी नृत्य भी शुभअवसरों पर किया जाता है इसमें एक घोड़े के मुखौटे के साथ दो लोग एक बड़े से घोड़े के आकार के बनाये गये परदे के भीतर से नृत्य करते हैं। राई नृत्य के गीत का उदाहरण देखिये-

'हो रये जंगल में नाच, हो रये जंगल में नाच,

बज रई है ढोलक नगरियां में,

पीरी चुनरिया ऐसें दमकै, ज्यों जमुना जी रेनुका,

सज धज खैं आ गई मेनका।।'

बुन्देली लोक कहानियाँ, लोकोक्तियाँ - मनुष्य और प्रकृति अभेद्कता में अपनी कल्पना दृष्टि को विकसित करता रहा है, जैसा की लोक कहानियों, आख्यायिकाओं में देखने को मिलता है जहाँ पेड़ पौधे, पशु, पक्षी कोई भी राजा रानियों में बदल जाते हैं और मनुष्य पशु पक्षी पेड़ पौधे किसी का रूप धर लेते हैं, अर्थात लोक कल्पनाशीलता की पराकाष्ठा कहा जा सकता है, बुन्देली धरती की लोक कहानियों में भी राजाओं और योद्धाओं की वीर गाथाएं तो हैं ही साथ ही चमत्कारों और मिथकों पर आधारित कहानियों की भी अधिकता है जैसे - सबरंग की कहानी, ‘राजा का स्वप्न’, ‘साहस बदले भाग्य’, निठल्ला भुगंता, कुपरा के बुझक्कड़ नाना की कहानियां, बुढिया और बंदरिया

बुंदेलखंड में लोकोक्तियों का भी अकूत खजाना है, ये लोकोक्तियाँ बुजुर्ग अनुभवों के आधार पर कहा करते थे जैसे मौसम के विषय में प्रायः कहा जाता है - शुक्र केरी बादरी, रही सनीचर छाये, कह गए दास मलूका बिन बरसें ना जाए।'

इन्ही लोक कहानियों, गीतों, संगीतो आदि से लोकसाहित्य लोक को अर्थात मानवीय मूल्यों को पोषित करता रहता है, हम कितने ही अपने लोक से भागें लेकिन लोक आपको अपने लोक से मुक्त नहीं होने देता, लोक जीवन से पलायन नहीं वरन जीवन के संघर्षों के मध्य उल्लास की तलाश है।

बुन्देली भाषा साहित्य का एक छोटा सा पक्ष मैंने यहाँ रखा लेकिन इसका संस्कार अति बलिष्ठ एवं विस्तृत है क्योंकि ये लोक साहित्य लोकजन के मन और हृदय की अभिव्यक्ति हैहम अपने लोक से कितना भी भागें हमारा लोक हमें कभी नहीं छोड़ता, पश्चिम हमें कितना भी आकृष्ट करे, हमारा मनोरंजन करे किन्तु अंततः जीवन जड़ों से ही होता है, प्रसाद की वाणी में कहें तो - विरोध कभी कभी बड़े मनोरंजक रूप में मनुष्य के पास धीरे से आता है और अपनी काल्पनिक सृष्टि से मनुष्य को अपना समर्थन करने के लिए बाध्य करता है अवसर देता है, प्रमाण ढूंढ लाता है, और फिर आँखों में लाली, मन में घृणा लड़ने का उन्माद और उसका सुख सब अपने अपने कोनों से निकालकर उसकी हाँ में हाँ मिलाने लगते हैं,' लेकिन लोक फिर भी जी रहा है क्योंकि यह नियति का गुलाम नहीं प्रतिद्वंदी है, हम शहरी अस्तित्ववादी अकेलेपन और बेगानेपन के अनुभव से मुक्त नहीं हैं, यहाँ अस्तित्व तो अब निरी एक घटना लगने लगा, कभी कभी अनस्तित्व की यंत्रणा, निरे अस्तित्व की यंत्रणा बन जाता है, तब केवल अपना लोक ही इस बेगानेपन को उल्लास में परिवर्तित करने की शक्ति रखता है, फिर याद आती है अपनी धरती, अपना लोक और मन गा उठता है -

'मलय गिर की अत ऊंची पहरियाँ, विन्ध्य की पारियां देख लाजाऊतीं।

धरती पाई बुन्देल की जनमबे खों, देवन की तिरियाँ ललचाऊतीं।।

कत मिश्र जू तीनऊँ बेरें सुगंध के, बिजना लैकें डुलावे आऊतीं।

झुक, झूमतीं, लूमतीं, पावन चूमतीं, छैऊ रितें परकम्मा लगाऊतीं।।'

कीर्ति दीक्षित

लेखिका/पत्रकार

8750655603


lekhika.kirtidixit@gmail.com


जीवन को पुनः देखने का नजरिया है ‘आत्मकथा’

विकल सिंह (शोधार्थी)

आत्मकथा हिन्दी गद्य साहित्य की प्रमुख विधाओं- कहानी, उपन्यास, नाटक और निबंध इत्यादि में अपना विशेष स्थान रखती है। आत्मकथा लिखना समाज में अपने अनुभव से दूसरों को लाभान्वित करना है, क्योंकि अपने ‘स्वत्व’ की सहज अभिव्यक्ति ही आत्मकथा है। इसमें लेखक अपनी जीवन कथा को स्वयं वर्णित करता है। इस प्रकार आत्मकथा का लेखक स्वयं नायक के रूप में उपस्थित होता है। अपने जीवन के क्रमिक विकास, जीवनानुभूतियों एवं अपनी स्मृतियों से टकराते विभिन्न पक्षों को वह आत्मकथा में प्रस्तुत करता है। आत्मकथा को जीवन-यथार्थ के रूप में भी देखा जा सकता है, क्योंकि इसमें लेखक अपने जीवन के विभिन्न पक्षों, अपने परिवेश एवं अपने समय की परिस्थितियों से पाठक वर्ग को परिचित कराता है। कह सकते हैं कि आत्मकथा एक समय विशेष की परिस्थितियों से टकराती हुई किसी व्यक्ति विशेष का जीवन-ब्यौरा है। आत्मकथा शब्द के लिए अनेक शब्द कोशों में अलग-अलग अर्थ दिए गए हैं। बृहत् हिन्दी कोश’ में आत्मकथा का अर्थ ‘अपनी जीवन-कहानी’ या ‘स्वलिखित जीवन चरित’ माना गया है।1 डॉ. हरदेव बाहरी लिखित ‘हिन्दी शब्द कोश’ ने आत्मकथा को ‘आपबीती’ या ‘अपने जीवन की कथा’ माना है।2 जबकि भार्गव आदर्श हिन्दी शब्द कोश’ ने आत्मकथा को ‘स्वलिखित जीवनी’ माना है।3 यहाँ इन सब पक्षों के बरक्स आत्मकथा शब्द पर विचार करना आवश्यक हो जाता है। आत्मकथा शब्द ‘आत्म’ और ‘कथा’ से मिलकर बना है। आत्म को यदि हम ‘मैं’ (मेरा, अपना, मेरी, निजी) और कथा को ‘कहानी’ से संदर्भित करें तो हम इन दोनों शब्दों को विश्लेषित करने पर पाते हैं- ‘मेरी कहानी’ या ‘अपनी कहानी’ अर्थात् अपने जीवन के जिये हुए पहलुओं की कथा। ईमानदार अभिव्यक्ति और तटस्थता इसकी अनिवार्य शर्त होती है। अतः ‘आत्मकथा’ शब्द का सम्यक् मूल्यांकन करने पर जो अर्थ सबसे उपयुक्त जान पड़ता है, वह है- ‘आत्मसाक्ष्य’ या ‘आत्मसत्व’। इस आधार पर कहा जा सकता है कि अपने जीवन के साक्ष्यों को वास्तविकता एवं तटस्थता के साथ प्रस्तुत करना ही आत्मकथा है।

आत्मकथा की कथावस्तु आत्मकथाकार के जीवन के गुजरे हुए समय पर आधारित होती है। साहित्यिक क्षेत्र में इस विधा का सृजन करना रचनाकार के लिए साहित्य की अन्य विधाओं की अपेक्षा कठिन ही जान पड़ता है। बहुत ही कम लोग ऐसे हैं, जो सच्चाई के साथ अपनी जीवन-कथा लिखने का साहस रखते हैं। आत्मकथा को कठिन लेखन स्वीकारते हुए शिवपूजन सहाय अपने एक लेख ‘मतवाला कैसे निकला’ में लिखते हैं- “मेरी आत्मकथा, आरम्भ से आज तक, इतनी भयावनी है कि सचमुच यदि मैं ठीक-ठाक लिख दूँ, तो बहुत-से लोग विष खाकर सो रहें, या नहीं तो मेरे ऊपर इतने मान-हानि के दावे दायर हो जायँ कि मुझे देश छोड़कर भाग जाना पड़े। इसलिये मैं सब बातों को छिपाकर आत्मकथा नहीं लिखूँगा।”4 आत्मकथा लेखन में जिस सत्यता की आवश्यकता होती है, उसे प्रस्तुत करने के लिए लेखक को अपने प्रति निर्मम और निर्वैयक्तिक होना पड़ता है। यही कारण हो सकता है कि आत्मकथा जीवन के ऐसे मोड़ पर लिखी जाती है- “जब व्यक्ति अपनी भरपूर जिन्दगी जी चुकता है। जिया जा रहा समय उसे बोनस लगता है और उसे लगता है, अब उसके पास खोने के लिए कुछ नहीं बचा। उसकी कलम बेबाक हो जाती है और सच बोलने से उसे न खौफ होता है, न परहेज।”5 सुधा अरोड़ा के इस कथन के आधार पर कहा जा सकता है कि साहित्य की यह विधा किसी लेखक की सबसे परिपक्व अवस्था में लिखी जाने वाली विधा है।

साहित्यिक क्षेत्र में आत्मकथा एक ऐसी विधा है जिसे अन्त तक वास्तविकता के अधीन रहना पड़ता है। इसमें आत्मकथाकार अपने जीवन के सुख-दुःख, भोगे हुए क्षणों एवं जीवन के तमाम गूढ़ रहस्यों को प्रस्तुत करता है। इस प्रकार आत्मकथा अपने रचनाकार को उसके जीवन-अतीत से जोड़ती है। इस संदर्भ में डॉ. नगेन्द्र का यह कथन दृष्टव्य है- “आत्मकथाकार अपने सम्बन्ध में किसी मिथ की रचना नहीं करता, कोई स्वप्न दृष्टि नहीं रचता। वरन् अपने गत जीवन के खट्टे-मीठे, उजले-अंधेरे, प्रसन्न-विषण्ण, साधारण-असाधारण सरंचना पर मुड़कर एक दृष्टि डालता है, अतीत को पुनः कुछ क्षणों के लिए स्मृति में जी लेता है और अपने वर्तमान तथा अतीत के मध्य सम्बन्ध सूत्रों का अन्वेषण करता है।”6 यही कारण हो सकता है कि इसके अंतर्गत किसी के जीवन की कार्य-प्रणाली एवं भोगे हुए सुख-दुःख के अनुभवों का तटस्थ विश्लेषण देखने को मिलता है। आत्मकथाकार के जीवन की बुराइयाँ हमें आने वाले समय में उनके दुष्परिणामों से आगाह तो करती ही हैं, साथ ही उसके जीवन की अच्छाइयाँ हमें प्रेरित भी करती हैं। इस प्रकार आत्मकथा को हिन्दी साहित्य की एक उपदेशपरक विधा या जीवन की सच्चाइयों से रूबरू कराने वाली विधा के रूप में देखा जा सकता है। कहा जा सकता है कि आत्मकथा एक प्रेरणादायी विधा है। आत्मकथा में लेखक अपने जीवन का स्वयं निरीक्षण करता है। इसलिए उसे तटस्थ होकर ईमानदारी के साथ अपनी जीवन कथा लिखनी चाहिए। कई बार लेखक अपने जीवन के कमजोर पक्षों को छिपा लेता है और ऐसा भी हो सकता है कि आत्मप्रशंसा में लेखक कुछ प्रसंगों को बढ़ा-चढ़ाकर बताए। आत्मकथा लेखन के लिए यह सही नहीं हो सकता। इस संदर्भ में चन्द्रकिरण सौनरेक्सा का यह कथन “जीवन-यात्रा (आत्मकथा) तभी समाज के लिए उपयोगी होगी जब उस यात्रा कथा में पाठक को समाज, या युग या मनुष्य का वर्णन रसमय और वास्तविक रूप से प्रतिबिम्बित मिले। उसे पढ़कर पाठक उन बुराइयों के प्रति सचेत हो जो समाज को पिछड़ापन देती हैं।”7 अतः लेखक को तटस्थतापूर्वक ईमानदारी के साथ अपने जीवन-साक्ष्यों को प्रस्तुत करना चाहिए। यह तटस्थता और निरपेक्षता आत्मकथा लेखन की सबसे बड़ी चुनौती है। आत्मकथाकार को आत्मकथा लेखन में यह ध्यान रखना चाहिए कि उसकी आत्मकथा आत्म-प्रदर्शन तक सीमित न रहकर आत्मनिरीक्षण एवं आत्मविश्लेषण के रूप में सामने आए।

हिन्दी साहित्य में आत्मकथा एक महत्वपूर्ण विधा है। हिन्दी साहित्य में आत्मकथा के बीज वीरगाथा काल या आदिकाल से देखे जा सकते हैं। चंदबरदाई कृत महाकाव्य ‘पृथ्वीराज रासो’ में कवि ने मुख्य रूप से पृथ्वीराज के जीवन वृत्त का वर्णन किया है, किन्तु गौण रूप से वह पूरे महाकाव्य में स्वयं भी उपस्थित रहा है। कवि चंद के सन्दर्भ में रामचन्द्र शुक्ल के इस कथन को देखा जा सकता है- “इनका जीवन पृथ्वीराज के जीवन के साथ ऐसा मिला-जुला था कि अलग नहीं किया जा सकता। युद्ध में, आखेट में, सभा में, यात्रा में, सदा महाराज के साथ रहते थे और जहाँ जो बातें होती थीं, सब में सम्मिलित रहते थे।”8 कवि ने अपने जीवन के जो क्षण पृथ्वीराज के साथ बिताए, जो कुछ देखा-सुना वह सब इस महाकाव्य में उद्घाटित हुआ है। इस प्रकार आत्मवृत्त कहने का कुछ अंश या बीज हमें आदिकाल से दिखाई देता है। ब्रजभाषा में रचित बनारसीदास जैन की आत्मकथा ‘अर्द्ध कथानक’ (1641 ई.) जब हिन्दी की प्रथम आत्मकथा के रूप में सामने आई, तब आत्मकथा का स्वरूप इतना विकसित नहीं था। हिन्दी गद्य साहित्य की यह प्रथम आत्मकथा ब्रज भाषा में पद्यात्मक रूप में आई थी। धीरे-धीरे इसके स्वरूप में परिवर्तन होता गया और यह विधा गद्य में लिखी जाने लगी। प्रारम्भ में साहित्यिक क्षेत्र में इस विधा को संदेह की नज़र से देखा जाता था, क्योंकि आत्मकथा अपने जीवन की सच्ची अनुभूतियों, घटनाओं एवं सुख-दुःख इत्यादि का तटस्थ ब्यौरा होती है। इस आधार पर लेखक द्वारा अपने कमज़ोर पक्षों को छिपाना या अनेक पक्षों को अलंकृत कर बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करने की आशंका पाठक एवं आलोचक वर्ग में उत्पन्न होना स्वाभाविक ही था। परन्तु धीरे-धीरे इसका विकास होता गया और आत्मकथा हिन्दी गद्य साहित्य की एक स्वतंत्र एवं विश्वसनीय विधा के रूप में स्थापित हो गई।

आत्मकथा सिर्फ़ किसी के जीवन का ब्यौरा मात्र नहीं होती है, बल्कि वह उस व्यक्ति के परिवेश एवं उस समय की परिस्थितियों को भी जानने का एक माध्यम हो सकती है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, उसके सारे क्रिया-कलाप समाज में ही सम्पन्न होते हैं। इसलिए किसी भी व्यक्ति की आत्मकथा नितांत व्यक्तिगत होते हुए भी उस समय की सामाजिक परिस्थितियों एवं उसके परिवर्तनों से जुड़ती है। विमर्शों के सन्दर्भ में तो यह बात और भी स्पष्ट हो जाती है। पाठक इन आत्मकथाओं को पढ़ते हुए उसमें अभिव्यक्त पीड़ा की बेचैनी से गुजरता है और उसे यह आभास होता है कि ये पीड़ा व्यक्तिगत न होते हुए उस समय की सामाजिक परिस्थितियों की देन है। इस प्रकार आत्मकथा लेखक द्वारा पाठक वर्ग को अपने जीवनानुभव से जोड़ना भी आत्मकथा को महत्त्वप्रदान करता है। इसके माध्यम से किसी चर्चित व्यक्ति के जीवन के अत्यंत व्यक्तिगत पक्षों को भी पाठक जान लेता है। साथ ही उसके जीवन के अच्छे-बुरे तथा प्रेरणादाई कारणों और जीवन-संघर्षों से भी परिचित होता है। इस अनुभव से जुड़कर पाठक वर्ग लाभान्वित होता है, क्योंकि वह किसी चर्चित व्यक्ति की सफलता और असफलता के पीछे छिपे कारणों को आत्मकथा के माध्यम से जानकार प्रेरणा ले सकता है। अतः आत्मकथा नितांत व्यक्तिनिष्ठ होते हुए भी सर्वनिष्ठ-सर्वहित का भाव रखती है, जो इस विधा की एक प्रमुख विशेषता है।

वर्तमान समय में साहित्यिक क्षेत्र में विमर्शों का सबसे तटस्थ और सूक्ष्म विश्लेषण करने वाली विधा के रूप में भी ‘आत्मकथा’ को देखा जा सकता है, क्योंकि समाज में उपेक्षित, शोषित, सताए हुए दबे-कुचलों की पीड़ा एवं उनकी वेदना को सबसे सशक्त रूप में आत्मकथा ही प्रस्तुत करती है। इस संदर्भ में बलवंत कौर अपने एक लेख ‘खांटी घरेलू औरत की कहानी’ में लिखती हैं- “जितने भी पीड़ित समुदाय हैं चाहे वह दलित हों या स्त्री उनके लिए अपनी पीड़ाओं को, आत्मानुभूतियों को अभिव्यक्त करने का सबसे सरल व प्रथम माध्यम आत्मकथाएँ ही हैं।”9 इसका कारण यह भी है कि आत्मकथा को लिखने वाला स्वयं भुक्तभोगी होने के कारण अपनी पीड़ा को बहुत प्रमाणिकता के साथ प्रस्तुत कर सकता है, क्योंकि भूख की पीड़ा क्या है? यह वही बता सकता है, जो भूखा हो। किसी भूखे को देखकर उसकी पीड़ा का समुचित आकलन नहीं किया जा सकता है। अतः आत्मकथा सहानुभूति से परे स्वानुभूति का लेखा-जोखा है, जिसे आत्मकथा की एक प्रमुख विशेषता के रूप में देखा जा सकता है।

समकालीन परिवेश में आत्मकथा लिखने का बहुत ही सशक्त दौर प्रारम्भ हुआ है। आज सिर्फ़ साहित्यकार ही नहीं, समाजसेवी, खिलाड़ी, राजनेता एवं अनेक चर्चित व्यक्ति अपनी आत्मकथा लिख रहे हैं। पाठक वर्ग में किसी चर्चित व्यक्ति जो अपने जीवन के किसी विशेष मुकाम तक पहुँच गया हो, की आत्मकथा पढ़ने के लिए अधिक उत्सुकता होती है। जब व्यक्ति अपने जीवन के तमाम वर्षों की अनुभव साधना से अपनी आत्मकथा लिखता है तो लोगों को उसकी सफलता और उसके पीछे छिपे प्रेरणादाई कारणों को जानने का अवसर मिलता है। यही कारण हो सकता है कि लोगों में किसी चर्चित या प्रतिष्ठित साहित्यकार की आत्मकथा को पढ़ने की उत्सुकता अधिक होती है, क्योंकि वह उन पक्षों को भी जानना चाहता है जिनसे वह अब तक अनजान था। संभवतः तभी तो आत्मकथा अपने नाम से कम उसके लेखक के नाम से अधिक जानी जाती है। चाहे वह ‘सचिन की आत्मकथा’ हो या ‘नेहरू जी की आत्मकथा’ या फिर किसी और की, पाठक वर्ग उसके लेखक के नाम द्वारा ही उससे अधिक जुड़ता है।

आत्मकथा विधा इतिहास को जानने-समझने का भी एक माध्यम हो सकती है। किसी व्यक्ति विशेष की आत्मकथा पढ़कर उस समय विशेष की परिस्थितियों को भी जाना जा सकता है। इतिहास को पढ़ना-समझना भले ही बोझिल लगे, परन्तु आत्मकथा सहज रूप में ही इतिहास से हमारा साक्षात्कार करा देती है। इस सन्दर्भ में ज्योति चावला अपने एक लेख ‘पिंजरे से बाहर मैना’ में लिखती हैं- “इतिहास चाहे कितना ही ज्ञानवर्धक तथा तथ्यपरक क्यों न हो, उसे पढ़ना उतना ही बोझिल है। लेकिन आत्मकथा उसी इतिहास को किस्से-कहानी की तरह आपके सामने खोलकर रख देती है, और वह किसी उपन्यास या कहानी की तरह कल्पनाश्रित नहीं होती, इसलिए उसकी प्रामाणिकता भी बनी रहती है। जर्मनी का इतिहास चाहे जितना बोझिल हो, हिटलर की आत्मकथा ‘मेन कैम्फ’ पढ़ना तत्कालीन जर्मनी के इतिहास को जानना कहीं ज्यादा रोचक और सरल हो सकता है।”10 इस प्रकार आत्मकथा अपनी प्रामाणिकता के कारण इतिहास को जानने का एक माध्यम हो सकती है।

आत्मकथा लेखन कार्य में साहित्यिक दृष्टिकोण से उतना पारंगत होने की आवश्यकता नहीं होती है, जितना कि अन्य विधाओं- उपन्यास, कहानी और कविता इत्यादि में होती है। इसमें लेखक अपने जीवन की घटनाओं के क्रमिक विकास को प्रस्तुत करता है। इस प्रकार आत्मकथा लेखन के लिए जीवनानुभव अत्यंत आवश्यक होता है। एक नीरस एवं असफल जीवन की कथा एक सफल आत्मकथा बन सकती है तथा एक सफल जीवन की कथा भी एक असफल आत्मकथा बन सकती है। सफल जीवन से आशय उस व्यक्ति से है, जिसने अपने जीवन में बड़ा मुकाम या कोई विशेष उपलब्धि हासिल की हो। परन्तु कई बार ऐसा होता है कि उस व्यक्ति की आत्मकथा को उतना महत्त्व नहीं मिल पाता, जितना कि एक असफल जीवन जीने वाले व्यक्ति की आत्मकथा को मिलता है। यह पाठक एवं आलोचक वर्ग पर निर्भर करता है कि वह किसे कितना महत्त्व देते हैं।

आत्मकथाकार को आत्ममुग्धता और ईर्ष्या-प्रतिशोध इत्यादि भावों से बचना चाहिए। भोगा हुआ समय कभी-कभी मस्तिष्क पर ऐसी छाप छोड जाता है कि लेखक उसे अभिव्यक्त कर देने के लिए लालायित हो उठता है। रहस्योद्घाटन की लालसा जितना लेखक को आत्मकथा लिखने के लिए प्रेरित करती है उतनी ही पाठक वर्ग को पढ़ने के लिए उत्सुकता प्रदान करती है। यही सब कारण पाठक को आत्मकथा पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। पाठक जब किसी चर्चित या असाधारण व्यक्ति की आत्मकथा को पढ़कर उसके जीवन-संघर्षों को जानता है तो वह यह सोचकर रोमांचित हो जाता है कि वह व्यक्ति भी कभी उसकी ही तरह साधारण था, उसके भी जीवन-संघर्ष उसी के समान थे। यह रोमांच, उत्सुकता और जिज्ञासा ही आत्मकथा को महत्त्व प्रदान करते हैं। आत्मकथा लेखन में जो बात सबसे कमज़ोर कड़ी के रूप में सामने आत है वह यह है कि आत्मकथा को उसके लेखक द्वारा पूर्ण किए जाने के पश्चात् भी वह कई वर्षों तक जीवित रह सकता है। उसके पश्चात् उसके जीवन के क्रिया-कलापों से हमारा परिचय कम ही हो पाता है। जबकि पाठक वर्ग उस लेखक की आत्मकथा से उसके प्रति एक दृष्टिकोण या धारणा बना लेता है जो कहीं-न-कहीं उसके बाद के जिए हुए जीवन से परिवर्तित भी हो सकती है पर हम अक्सर उस आत्मकथा को उसके लेखक के संपूर्ण जीवन की कथा मान लेते हैं। इस प्रकार भले ही आत्मकथा में कल्पना जैसी अभिव्यक्ति न होकर वह यथार्थपरक होती हो, लेकिन आत्मकथाकार का मूल्यांकन हम जरूर कल्पना से ही करते हैं कि अमुक व्यक्ति की आत्मकथा में वह ऐसा है तो आगे भी वह वैसा ही रहा होगा। इस आधार पर आत्मकथा को जीवन का पूर्ण सत्य न मानकर अर्द्ध सत्य मानना ही अधिक उपयुक्त होगा। संभवतः तभी तो प्रथम आत्मकथाकार बनारसीदास जैन ने अपनी आत्मकथा को ‘अर्द्धकथानक’ नाम दिया था।

निष्कर्षतः कह सकते हैं कि आत्मकथा, उसके लेखक के गुजरे हुए समय और स्मृतियों पर आधारित होती है। उसकी कथावस्तु गुजरे हुए समय की कथावस्तु होती है। इसलिए इस विधा का सृजन लेखक अपने जीवन के अंतिम दिनों में करना पसन्द करता है, क्योंकि उस समय उसके समूचे जीवन की स्मृतियाँ कैद होती हैं। साहित्य की अन्य विधाएँ जीवन के किसी भी मोड़ पर लिखी जा सकती हैं, लेकिन आत्मकथा आमतौर पर अपने जीवन के अंतिम समय में ही लिखी जाती है। इस प्रकार साहित्य की यह विधा किसी भी लेखक की सबसे परिपक्व अवस्था में लिखी जाने वाली विधा है। कह सकते हैं कि आत्मकथा जीवन को पुनः देखने का एक नजरिया है।

हिन्दी अध्ययन केन्द्र

गुजरात केन्द्रीय विश्‍वविद्यालय

सेक्टर- 29, गाँधीनगर- 382030

ईमेल- vikalpatel786@gmail.com

मो: 07897551642

सन्दर्भ सूची

§ प्रसाद, कलिका (सं.), एवं अन्य, बृहत् हिन्दी कोश, ज्ञानमण्डल प्रकाशन, वाराणसी, संस्करण- 2012, पृष्ठ संख्या- 123

§ बाहरी, हरदेव, हिन्दी शब्द कोश, राजपाल एण्ड सन्ज़, दिल्ली, संस्करण- 2012, पृष्ठ संख्या- 81

§ पाठक, प्रो. रामचन्द्र (सं.), भार्गव आदर्श हिन्दी शब्द कोश, भार्गव बुक डिपो, वाराणसी, संस्करण- 2010, पृष्ठ संख्या- 73

§ सहाय, शिवपूजन, मतवाला कैसे निकला, हंस आत्मकथा अंक, जन-फर. 1932, (सं).- प्रेमचंद, विश्‍वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, द्वितीय आवृत्ति संस्करण- 2010, पृष्ठ संख्या- 11

§ पिंजरे की तीलियों से बाहर आती मैना की कुहुक- सुधा अरोड़ा, 06/27/2015 http://www.abhivyaktihindi.org/sansmaran/2013/chandrkiran_.htm

§ डॉ. नगेन्द्र, (सं.), हिन्दी साहित्य का इतिहास, मयूर प्रकाशन, नोएडा, संस्करण- 2011, पृ. सं.- 579

§ सौनरेक्सा, चन्द्रकिरण, पिंजरे की मैना, पूर्वोदय प्रकाशन, दिल्ली, संस्करण- 2010, पृष्ठ संख्या- 06

§ शुक्ल, आचार्य रामचन्द्र, हिन्दी साहित्य का इतिहास, अनुपम प्रकाशन, पटना, सं.- 2013, पृ. सं.- 24

§ कौर, बलवंत, खांटी घरेलू औरत की कहानी, हंस, मासिक, जुलाई- 2009, दिल्ली, (सं).- राजेन्द्र यादव, पृष्ठ संख्या- 84


§ चावला, ज्योति, पिंजरे से बाहर मैना, पुस्तक-वार्ता, द्वैमासिक पत्रिका, अंक- जनवरी-फरवरी, 2009, (सं).- भारद्वाज, भारत, वर्धा, पृष्ठ संख्या- 30

डॉ० प्रज्ञा व्यक्तित्व एवं कृतित्व


तेजस पूनिया

28 अप्रेल, 1971 में भारत देश की राजधानी दिल्ली के रामप्रताप बाग़ में साहित्य के अनन्य साधक, कथाकार एवं अनुवादक डॉ० रमेश उपाध्याय (सेवानिवृत्त,प्रोफ़ेसर- दिल्ली विश्वविद्यालय) तथा प्रतिष्ठित ‘कथन’ पत्रिका के प्रमुख सम्पादक एवं उनकी जमीनी हक़ीकत से जुड़ी घरेलू महिला तथा प्रगतिशील विचारों की सहधर्मिणी श्रीमती सुधा उपाध्याय के घर जन्मी तथा अपने तीन भाई-बहनों में सबसे बड़ी डॉ० प्रज्ञा ने अपनी शुरूआती शिक्षा बेहद साधारण तरीके से घर के पास ही के सरकारी स्कूल से आरम्भ की। जब वे कक्षा आठवीं में आई तो उसके बाद इनका परिवार पश्चिम विहार में स्थानांतरित हो गया। जहाँ इन्होंने अपने बाकी स्कूली जीवन को पूरा किया। स्कूली शिक्षा के पश्चात डॉ० प्रज्ञा ने उच्च शिक्षा के लिए देश के प्रतिष्ठित दिल्ली विश्वविद्यालय के अंतर्गत हिन्दू महाविद्यालय में प्रवेश प्राप्त किया।

शैक्षणिक माहौल में पली-बढ़ी डॉ० प्रज्ञा ने राजनीति विज्ञान में प्रवेश मिलने के बावजूद हिंदी साहित्य के क्षेत्र में जाना अधिक उचित समझा तथा भविष्य में साहित्य की सेवा करने के उद्देश्य से हिन्दू महाविद्यालय से हिंदी ऑनर्स में वर्ष 1989-1992 में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। स्नातक की उपाधि प्राप्त करने के पश्चात् अध्यापन को ही अपना जीवन समर्पित करने के उद्देश्य से दिल्ली विश्वविद्यालय से बी० एड० की परीक्षा उत्तीर्ण की। बी० एड० के पश्चात् एक बार पुन: हिन्दू महाविद्यालय में प्रवेश प्राप्त कर परास्नातक यानी स्नातकोत्तर की उपाधि वर्ष 1994-1996 में प्राप्त की तथा दिल्ली विश्वविद्यालय के अंतर्गत सम्पूर्ण महाविद्यालयों में द्वितीय स्थान प्राप्त किया।

स्नातकोत्तर करने के साथ-साथ इन्होंने ‘समय- सूत्रधार’ नामक पत्रिका में उप-संपादिका के पद को सुशोभित करते हुए अपनी सेवाएँ दी तथा स्वरोजगार एवं आत्मनिर्भरता का परिचय दिया। इसके पश्चात् इन्होंने यू० जी० सी० ( युनिवर्सिटी ग्रांट कमिशन ) की पात्रता हासिल करते हुए शोध की दिशा में सकारात्मक कदम बढ़ाए तथा एम्० फ़िल० (मास्टर ऑफ़ फिलोसफी) में डॉ० सूर्यनारायण अय्यर के निर्देशन में सन् 1996 में ‘मुक्तिबोध की कहानियों में फैंटेसी का उपयोग’ विषय को चुना।

एम्० फ़िल० के दौरान एक वर्ष दिल्ली विश्वविद्यालय के सत्यवती महाविद्यालय में अध्यापन का कार्य भी किया। वर्ष 1997 से स्थाई तौर पर इसी विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल महाविद्यालय में अध्यापन कार्य आरम्भ किया तथा साथ ही शोध कार्य भी किया। सन् 2004 में डॉ० हरीश नवल (हिन्दू महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय) के निर्देशन में ‘हिंदी के नुक्कड़ नाटकों में जनवादी चेतना’ शीर्षक से शोध कार्य सम्पन्न किया। शोध की दोनों उपाधियाँ डॉ० प्रज्ञा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से ही प्राप्त की।

लेखिका एवं अध्यापक के रूप में स्थापित डॉ० प्रज्ञा वर्ष 1997 से वर्तमान तक किरोड़ीमल महाविद्यालय में सह-आचार्य के रूप में सजग एवं सक्रिय तरीके से अपनी सेवाएँ दे रही हैं। 1 अक्तूबर 1997 को डॉ० राकेश के साथ कोर्ट मैरिज/ कानूनी तरीके से विवाह कर गृहस्थ जीवन में प्रवेश किया। 4 मई सन् 2000 में एक बिटिया ‘अक्षितारा’ को जन्म देने के साथ ही सुखी मातृत्व एवं दाम्पत्य जीवन का निर्वाह कर रही है। 10 साल की छोटी सी उम्र से ही नुक्कड़ नाटक तथा मंचीय नाटकों की दुनिया के प्रति समर्पित डॉ० प्रज्ञा बहुमुखी प्रतिभा की धनी हैं। विद्यालय जीवन से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक विविध सांस्कृतिक कार्यक्रमों यथा संगीत, नृत्य, वाद-विवाद, पेपर/ पत्र प्रस्तुतिकरण आदि में भी भाग लेती रही हैं। अपने स्कूली जीवन से लेकर वर्तमान में भी निरंतर आकाशवाणी के लिए सक्रिय है। आकाशवाणी के विविध कार्यक्रमों के तहत् ‘आधा आकाश हमारा’, ‘शब्द-संसार’ आदि में डॉ० प्रज्ञा अपनी अनेक कहानियों का प्रसारण कर चुकी हैं। इसके अलावा इनके द्वारा कई पुस्तकों की समीक्षाएँ ‘इंद्रप्रस्थ चैनल’ ‘दूरदर्शन’ एवं ‘पुस्तक चर्चा’ कार्यक्रम के तहत् भी एक समयांतराल में देखी तथा सुनी जाती रही हैं।

रचनाकार के रूप में एक चर्चित नाम है डॉ० प्रज्ञा। साहित्य की विभिन्न विधाओं के अंतर्गत आलोचना, नाटक, कहानी और हाल ही में उपन्यास के माध्यम से एक नई विधा में इन्होंने बहुत ही सम्भले हुए तथा सुरक्षित कदमों से साहित्य की इस विधा में अपना अमूल्य योगदान दिया है। डॉ० प्रज्ञा की कहानियों की यदि चर्चा करें तो प्रतिलिपि डॉट कॉम के ऑनलाइन माध्यम की वेबसाईट पर ‘तक्सीम’ कहानी सर्वाधिक चर्चित तथा पढ़ी गई कहानियों में अव्वल दर्ज़े पर रही तथा इस कहानी के लिए इन्हें प्रतिलिपि डॉट कॉम कथा सम्मान- 2015 (प्रथम स्थान) से सम्मानित किया गया।

इसके अलावा वर्ष 2017 में ‘स्टोरी मिरर’ द्वारा आयोजित कहानियों की प्रतियोगिता में डॉ० प्रज्ञा की कहानी ‘पाप,तर्क और प्रायश्चित’ को प्रथम पुरस्कार से सम्मानित किया गया। भारत के विभिन्न राज्यों जैसे- राजस्थान, उत्तरप्रदेश, हरियाणा, मध्यप्रदेश, हिमाचल, उत्तराखंड, केरल, तमिलनाडू, कन्याकुमारी, अंडमान निकोबार तथा असम जैसे प्राकृतिक वातावरण से भरपूर स्थानों की यात्राएँ करके इन्होंने कई यात्रा वृतांत्त तथा संस्मरण भी लिखे।

जिनमें से एक राजस्थान के अलवर जिले पर आधारित यात्रा वृतांत्त ‘तारा की अलवर यात्रा’ को वर्ष 2008 में सूचना और प्रकाशन विभाग, भारत सरकार की ओर से भारतेंदु हरिश्चन्द्र पुरस्कार से भी नवाज़ा गया। जिसके तहत् इन्हें 75000 रुपए की नकद ईनाम राशि के साथ-साथ स्मृति चिन्ह, शॉल एवं श्री फ़ल भी प्रदान किया गया। डॉ० प्रज्ञा के पहले कहानी संग्रह के अंतर्गत ग्यारह कहानियाँ हैं। जिनके नाम क्रमश: एहसास, फ्रेम, ‘बराबाद’... नहीं आबाद, इस जमाने में, अमरीखान के लमड़े, पाप,तर्क और प्रायश्चित, तक्सीम, रेत की दीवार, इमेज, तस्वीर के पीछे, मुखौटे हैं। डॉ० प्रज्ञा लिखित कहानी ‘मुखौटे’ ‘परिकथा’ पत्रिका के अंतर्गत जनवरी-2012 में प्रकाशित हुई प्रथम कहानी थी।

विश्व पुस्तक मेला दिल्ली में ‘नेशनल बुक ट्रस्ट’ जैसे प्रतिष्ठित मंचों से कहानी पाठ करने वाली रचनाकार तथा कथाकार प्रज्ञा ने हाल ही में 2017 में ‘गुदड़ बस्ती’ नाम से उपन्यास की भी सृजना की है। जिसकी पांडुलिपि को ‘मीरा स्मृति पुरस्कार-2017’ से भी सम्मानित किया जा चुका है। यह डॉ० प्रज्ञा की सकारात्मक सोच का ही परिणाम कहा जाएगा कि इन्हें इतने बड़े सम्मान से नवाजा गया।

शिक्षकों के लिए आयोजित होने वाली विभिन्न कार्य- शालाओं में बतौर मुख्य वक्ता भी डॉ० प्रज्ञा को समय-समय पर विभिन्न संस्थाओं से आमंत्रित किया जाता रहा है। इसके अलावा सरकारी स्कूलों के अध्यापकों के लिए ‘टेक महिंद्रा’ की ओर से आयोजित वर्कशॉप में भी निरंतर जाकर उन्हें कहानी कैसे पढ़ी जाए? जैसे विषयों पर व्याख्यान दिए हैं।

डॉ० प्रज्ञा यू० जी० सी० तथा लगभग 12 अन्य जगहों जिनमें विदेशी संस्थाएं भी शामिल हैं, से इम्पेक्ट फैक्टर प्राप्त देश की प्रतिष्ठित ‘जनकृति-मासिक पत्रिका’ की सलाहाकार सदस्य समिति में भी शामिल है। इसके अलावा वे ‘आरम्भ-त्रैमासिक पत्रिका’ की वरिष्ठ सलाहाकार सदस्य होने के अलावा ‘सृजन-समय’ द्वैमासिक पत्रिका की परामर्श मंडलीय समिति में भी शामिल है। डॉ० प्रज्ञा आकाशवाणी तथा युव वाणी के लिए प्रसारित होने वाले नाटकों का चयन करने वाले बोर्ड में शामिल होने के साथ-साथ विभिन्न एफ़-एम् चैनलों के लिए प्रसारित होने वाले नाटकों का भी ऑडीशन (स्वर परीक्षण) लेती रही हैं।

अध्यापन के साथ-साथ लेखन में विशेष रूप से सक्रिय डॉ० प्रज्ञा वर्तमान में हिंदी साहित्य की लगभग सभी लब्ध-प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में अपना स्थान बनाती रही हैं। मसलन- हंस, पहल, सामयिक सरस्वती, यथावत, कथादेश, वागर्थ, परिकथा, बनासजन, पक्षधर, अनुक्षण, निकट, ज्ञानोदय पाखी, इंद्रप्रस्थ भारती, वर्तमान- साहित्य, रचना समय, हिंदी समय, जनसत्ता साहित्य वार्षिकी, जनसत्ता अख़बार आदि।

डॉ० प्रज्ञा का अभी तक का सम्पूर्ण साहित्य सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ तथा शोषितों, पिछड़ों एवं महिलाओं के समर्थन में खड़ा दिखाई देता है तथा उनकी बुनियादी समस्याएँ उठाने वाली एवं देह मुक्ति अथवा देह विमर्श से पूर्व लैंगिक समानता के अधिकारों की आजाव पुख्ता करता है।

डॉ० प्रज्ञा को साहित्य सृजन की प्रेरणा अपने आस-पास घटित होती घटनाओं तथा बचपन से मिलती आ रही ट्रेनिंग एवं घर में हमेशा से रहे साहित्यिक माहौल से मिलती रही है। इसके अलावा कई अनेक कारण भी प्रच्छन रूप से काम करते रहे। जिनमें अच्छे, सामाजिक मुद्दों पर आधारित तथा भारतीय एवं पाश्चात्य सिनेमा जगत के समानांतर सिनेमा देखना भी शामिल है।

डॉ० प्रज्ञा इस मामले में बताती हैं कि- उनके पिता अध्यापन कार्य में तो थे ही साथ ही साहित्य सेवा भी कर रहे थे। जिस वजह से घर में प्रतिष्ठित तथा कालजयी लेखकों, कवियों, रंग-कर्मियों जैसे प्रसिद्ध कथाकार एवं ‘कितने पाकिस्तान’ जैसे कालजयी उपन्यासकार कमलेश्वर, ‘तमस’ उपन्यास के रचियता एवं पिता (डॉ० रमेश उपाध्याय) के सहयोगी एवं जाकिर हुसैन महाविद्यालय (दिल्ली विश्वविद्यालय) के प्रोफेसर भीष्म साहनी का उनके घर आना भी डॉ० प्रज्ञा को एक साहित्यिक माहौल प्रदान करता था। इसके अलावा अपने पिता के साथ विभिन्न आयोजनों, कार्यशालाओं, साहित्यिक संगोष्ठियों, जनवादी लेखक संघ आदि में जाना भी इन्हें अप्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से प्रभावित करता रहा है।

इसके अलावा डॉ० प्रज्ञा आगे कहती है कि- हरिशंकर परसाई, प्रेमचन्द आदि जैसे प्रगतिशील एवं यथार्थवादी लेखकों को पढ़ने से भी एक मानस निरंतर उनके मन-मस्तिष्क में स्थान बनाता रहा है। केवल भारतीय साहित्य ही नहीं अपितु विदेशी साहित्य के अंतर्गत प्रसिद्ध विदेशी रचनाकार जैसे- फेयोदोर देस्तोयव्सकी, मैस्किम गोर्की, चेखव तथा कई रुसी, चीनी, जापानी लोक कथाओं आदि को पढ़कर हमेशा आशावादी बने रहने तथा विपरीत परिस्थितियों में उनका डटकर सामना करने की प्रेरणा भी इन्हें यहीं से मिलती है। इसके अलावा विद्यार्थी जीवन से ही लगातार डायरी तथा कविताएँ लिखना भी इनके जीवन में जारी रहा। निजी सन्दर्भों से पात्रों को उठाकर उन्हें वृहत्तर एवं व्यापक संदर्भों तक ले जाना भी इनके लेखन में स्पष्टत: दिखाई देता है।

डॉ० प्रज्ञा का लेखन व्यावसायिक लेखन नहीं अपितु रूढ़ीवाद के विरुद्ध तथा विभिन्न सरोकारों को लेकर चलने वाला साहित्यिक लेखन है। वे साहित्य को अन्य व्यावसायिक लेखकों की भांति प्रोडक्ट नहीं मानती। इसके बनिस्पत वे सम्मानजनक साहित्य लिखना अहम उद्देश्य मानती हैं। साहित्य लिखने की प्रेरणा कहाँ से मिली? प्रश्न के उत्तर में डॉ० प्रज्ञा कहती है कि- प्रेमचन्द साहित्य की बड़ी पुख्ता परिभाषा देते हुए कहते हैं कि जो दूसरों के दुःख में दु:खी और सुख में सुखी है। उसी के एक पहलू से काव्य को देखती, समझती हूँ तथा कायांतरण (स्त्री होते हुए पुरुष आदि अन्य पात्रों के संवादों के माध्यम से कथाओं को पूर्णता प्रदान करना) की भूमि पर उतरकर लेखन करती हूँ। यूँ लेखिका के रूप में डॉ० प्रज्ञा के लेखन की विधिवत यात्रा वर्ष 2002 से आरम्भ हुई। आधुनिक कहानियाँ तथा इनकी कहानियों में एक समानता है कि आधुनिक कहानी यथार्थवाद की देन है और यथार्थ के आयाम भिन्न-भिन्न है। वे नई परिस्थितियाँ नए सन्दर्भों का निर्माण करती है।

हिंदी साहित्य के श्रेष्ठ रचनाकारों की पंक्ति में गिनी जाने योग्य डॉ० प्रज्ञा का लेखन वर्तमान दौर के रचनाकारों के लिए उदाहरण तो प्रस्तुत करता ही है। साथ ही उन्हें प्रेरणा भी प्रदान करता है। कहानी, लेख, शोधा-लेख, यात्रा-वृतांत् के अलावा डॉ० प्रज्ञा की प्रकाशित रचनाओं में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से प्रकाशित ‘नुक्कड़ नाटक:- रचना और प्रस्तुति’, वाणी प्रकाशन से ‘नुक्कड़ नाटक संग्रह’ ‘ जनता के बीच जनता की बात’ एन० सी० ई० आर० टी० द्वारा प्रकाशित तथा उसके पाठ्यक्रम में शामिल ‘तारा की अलवर यात्रा’ के अलावा सामाजिक सरोकारों पर आधारित स्वराज प्रकाशन से ‘आईने के सामने’ तथा कहानी संग्रह ‘तक्सीम’ साहित्य भंडार- इलाहाबाद से प्रकाशित हो चुके हैं। साहित्य के क्षेत्र में शोधार्थियों के अलावा विभिन्न विधाओं में इनके किए गए लेखन कार्य विद्यार्थियों के लिए भी लाभदायक साबित हुए हैं।

डॉ० प्रज्ञा के निर्देशन में अभी तक चार शोध कार्य अपनी पूर्णता प्राप्त कर चुके है। इनके निर्देशन में कई अन्य शोध-कार्य प्रगति पर है। इनके निर्देशन में सबसे पहला शोध-कार्य ‘प्रगतिवादी कविताओं में प्रेम’ विषय पर ‘साधना सैनी’ ने सम्पन्न किया। इसके बाद क्रमश: ‘सदी के आर-पार का यथार्थ और राजेश जोशी की कविता’ विषय पर ‘मंजू’, ‘बरखा सोनी’ - जेंडर और महिला रंग निर्देशक’, ‘लक्ष्मी बंसल’ - ‘जेंडर और स्त्री आत्मकथाएँ’ वर्तमान में शोधरत है तथा ये शोध शीघ्र ही प्रकाश्य हैं।

स्नातकोत्तर उतरार्द्ध

हिंदी विभाग

राजस्थान केन्द्रीय विश्वविद्यालय

सम्पर्क- 9166373652, 8802707162


ईमेल- tejaspoonia@gmail.com

स्व. गोपाल दास नीरज जी की स्मृति में

कारवां गुजर गया........


-कीर्ति प्रदीप वर्मा

फिराक साहब की पंक्तियां याद आती है

*आने वाली नस्लें*

*तुम पर फख्र करेंगी*

*जब जब तुम यह जिक्र करोगे*

*तुमने नीरज को देखा है*

हाँ मैं उन खुशनसीबों में से हूं जिन्होंने नीरज को रूबरू देखा। पापा जी कवि सम्मेलनों के बहुत शौकीन रहे हैं, भोपाल में जहां भी कवि सम्मेलन होते मुझे साथ लेकर जरूर जाते थे और ऐसे ही बी एच ई एल में हुए कवि सम्मेलन में सदी के महान गीतकार गोपालदास नीरज के दर्शन लाभ का अवसर मुझे लगभग बारह वर्ष की उम्र में प्राप्त हुआ।

अब लगता है कि शायद यह कविता प्रेम कीटाणु बचपन से ही था आरम्भ से लेकर अंत तक पूरा कवि सम्मेलन सुनती और साथ में डायरी ले जाती और जो पंक्तियां पसंद आती लिख लेती, तभी मैंने पहली बार नीरज जी की

*" कारवां गुजर गया*

*गुबार देखते रहे "*

कविता सुनी और मेरे दिल दिमाग में गहरी पैठ गई।

नीरज एक ऐसा शख्स जो दिखने में तो लगता था कि सदैव नशे में डूबे रहते हैं,परंतु जिन्हें चिंता थी देश के भविष्य की जो हरगिज नहीं चाहते थे कि देश में युद्ध मारकाट जैसी कोई घटना हो

तभी तो वे कहते हैं-

*मैं सोच रहा हूं अगर तीसरा युद्ध हुआ*

*इस नई सुबह की नई फसल का क्या होगा*

नीरज ने जिंदगी को भरपूर जिया,अत्यंत विषम परिस्थितियों में जब छः वर्ष की उम्र में पिता न रहे और मां के पास पढ़ाने के लिए पैसा न हो तब बुआ के घर एटा में पढ़े नीरज ने रिक्शा चलाया, टाइपिस्ट की नौकरी की जिसमें मात्र सड़सठ रूपये पगार थी,गुटखा बीड़ी बेचे और एक समय भोजन कर हिंदी साहित्य को अनमोल रत्न दिए।

जब उन्होंने पहली बार एक मुशायरे में अपनी रचना पढ़ी

तो चार बार वंस मोर वंस मोर की आवाज गूंज उठी तब

तो "जिगर साहब" ने उनके कंधे पर हाथ रखकर कहा- *उम्र दराज हो मेरे बच्चे की ऐसा पढ़ता है*

*जैसे नगमा गूँजता है।*

नीरज साहब सपनों के शहर मुंबई गए।

जब राज कपूर साहब "मेरा नाम जोकर" फिल्म बना रहे थे,आर के कैंप मे उन दिनों दो ही स्थाई गीतकार थे शैलेंद्र एवं हसरत जयपुरी इन्हीं दोनों ने राज कपूर की लगभग सभी फिल्मों के गीत लिखे इन दोनों के अतिरिक्त नीरज जी ने भी दो गीत लिखे थे "ए भाई जरा देख के चलो" एवं "कहता है जोकर सारा जमाना" राज साहब का पसंदीदा गीत था।

ए भाई की धुन बन रही थी उस वक्त म्यूजिक रूम में संगीतकार शंकर जयकिशन शैलेंद्र, हसरत जयपुरी एवं नीरज एवं राजकपूर बैठे हुए थे सुबह से शाम तक कोई भी धुन से संतुष्ट नहीं हुआ,शंकर जयकिशन ने कह दिया यह भी कोई चीज है नहीं बन सकती इसकी धुन।

क्योंकि यह उनका पसंदीदा गीत था वे उसको खोना नहीं चाहते थे।

नीरज पूरा घटनाक्रम सुन रहे थे अंत में बोले मैं बताता हूं ऐसे गाओ और अपने चिरपरिचित अंदाज में पूरा गीत गाकर सुनाया सभी उछल पड़े तुरंत उसी मीटर में धुन बनी मन्ना डे की आवाज में गाना रिकॉर्ड हुआ इस तरह यह कालजई गीत हमारे सामने आया।

उन्होंने सचिन देव बर्मन के लिए गीत लिखे तब बर्मन दा ने कहा-

" देखो नीरज मेरी फिल्म के गीत में शराब शबाब जैसी चीजें नहीं आना चाहिए "

तब नीरज जी ने लिखा *रंगीला रे तेरे रंग में यूं रंगा है मेरा मन*

*न बुझे है किसी जल ये यह जलन*

सन 1955 में मात्र तीस वर्ष की उम्र में *कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे*

जैसा गीत जिसमें जीवन का फ़लसफ़ा हो, जो गीतकार लिख सकता है उसे जीवन की कितनी समझ होगी यह आप इस गीत सुनकर अंदाजा लगा सकते हैं।

नीरज जी ने उत्कृष्ट कोटि का श्रंगार लिखा- *देखती ही रहो आज दर्पण न तुम*

*प्यार का यह मुहूर्त निकल जाएगा*

*मत महावर रचाओ अरे पांव में*

*फर्श का मरमरी दिल पिघल जाएगा*

तो जीवन दर्शन

*ए भाई जरा देख के चलो आगे भी नहीं पीछे भी*

से समझाया।

वे एक सकारात्मक सोच के कवि थे जिन्होंने यह कभी नहीं माना कि कुछ रुक जाने से जीवन रुक जाता है उन्होंने लिखा

*कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करते हैं*

देश के एकमात्र ऐसे कवि जिन्होंने कवि कुल को अमर पंक्तियां दीं-

*मानव होना भाग्य है*

*कवि होना सौभाग्य*

नीरज जी ऐसे कवि थे जिनकी जीते जी *रचनावली प्रकाशित हुई और लगभग बारह गीत संकलन प्रकाशित हुए। दो बार *फिल्म फेयर एवं *पद्मश्री एवं पद्म भूषण* पुरस्कारों से नवाजे गए।

ऐसे सकारात्मक गीत लिखने वाले गीतकार का साहित्य जगत से जाना यूँ लगता है मानो परिवार का मुखिया चला गया हो आज नीरज जी की आत्मा जहां कहीं भी हो उनको मेरी चंद पंक्तियों से श्रद्धा सुमन अर्पित करती हूं, जो मैंने तब लिखी थी जब वे होशंगाबाद एक कार्यक्रम में आने वाले थे और मैंने उनके सम्मान में यह लिखीं, लेकिन मेरी बदकिस्मती तब अस्वस्थता के चलते वे नहीं आ पाए और हमने भी कई बार सोचा कि हम उनके घर जाकर मिल आयें पर नहीं जा सके,शायद किस्मत को यह मंजूर ना था!

*इतना किया सृजन*

*आपने इस जमाने में*

*लग जाएंगी कई सदियाँ*

*आपको भुलाने में*

*फूलों के रंग से*

*दिल की कलम से*

*घुलते हैं शोखियों में शबाब*

*करते हैं जब आप काव्य पाठ*

*कारवां बहुत आए हैं*

*और गुजर जाएंगे*

*हे नीरज नैना*

*रंगीला रे*

*छलिया रे*

*हम तुमको न भूल पाएंगे*

*हम तुमको न भूल पाएंगे*

कविता


गुलाबचंद पटेल

कविता में संवेदना और प्रेम की नदियाँ बहती है। सच्चा कवि-रचनाकार वो है जो किसी भी स्थान या जगा की परवाह किये बिना कविता की रचना करने में ही रस होता है। कितने लोग कविता पढना टालते है। कितने लोगों को कभी कभी कविता सुनने में भी रस होता nahinahinनहीं है। लेकिन कितने किस्से ऐसे होते है जिसमे कविता आदमी को टालती है। ह्रदय और मन की सूक्ष्म भावनाओं से कविता की रचना होती है। इसमें अनहद का नाद होता है। इसी लिए कवि इश्वर के करीब होते है।

कविता स्थल और शुक्ष्म की ओर की यात्रा है। इसीलिए संतोने परम पिता इश्वर की प्राप्ति के लिए कविता द्वारा ही प्रयत्न किया है। कविता की किताब कम पढ़ी जाती है। कविता मनुष्य के जीवन से दूर जा रही है उसका एक ही कारण है कि, मनुष्य सवेंदन हिन हो गया है इसके कारण कविता ने अपनी नजाक़त और मार्मिक अभिव्यक्ति खो दी है।

साहित्य समाज का अरीसा है। साहित्य प्रतिबिम्ब (परछाई) भिन्न नहीं लेकिन समाज का प्रतिनिधि है। जीवन के साथ रचा हुआ साहित्य ही सुन्दर होता है।

हिंदी साहित्यकार प्रेमचंदजी कर सुर है, कि साहित्य केवल मन (दिल) बह्लानेकी चीज नहीं है मनोरंजन के सिवा उसका और भी उदेश्य है। जो दलित है, पीड़ित है, वंचित है, चाहे वो व्यक्ति को या समूह उसकी वकालत करना ही साहित्य का कर्म है।

साहित्य में समाज के निचले स्तर का दलित, पीड़ित शोषित वर्ग के मनुष्यों की अवहेलना करने के कारण दलित साहित्य का जन्म हुआ है। पांडित्य और प्रशिष्टता के युग में भाषा और साहित्य की मुखधारा से समाज का अंतिम मनुष्य वंचित रह जाने के कारण दलित साहित्य का उद्भव ही कारण है। साहित्य दलित नहीं होता। लेकिन जिस साहित्य में दलित, पीड़ित, शोषित समाज की परछाई उनका सामाजिक जीवन की कठिनाईयां और अच्छी बातों का प्रतिरूप दिखाई देता है, वो दलित साहित्य है।

कविता सामाजिक परिवर्तन का माध्यम है। रचनाकार आलोचक पैदा करता है। समय समय पर समाज में उत्तम मनुष्य पैदा होते रहे हैं ऐसे हर समय में श्रेष्ट कविता की सरिता निरंतर बहती रही है।

कविता भाषा का अलंकार है। कविता संस्कृति का विशेष महत्वपूर्ण अंग है। जिस कविता में मनुष्य की बात नहीं होती वह कविता लोगों के दिल को छुती नहीं। कितनी रचनाएं ऐसी होती है जो विवेचक को खुश कर के इनाम पा लेती है। मनुष्य की बात करने वाली कविता ही लोगों में संवेदना प्रगट करती है।

कवि जहोन किट्स ने अपने कवि मित्र जहोन टेलर को कहा था कि कविता वृक्ष के पन्नों की तरह खिलती नहीं है वो अच्छा है।

कविता सूक्ष्म भावों को अपने में समा लेने वाली पेन ड्राइव हैं। कविता मैं लघु कथा का रस होता है। ललित कला के निबंध का गद्य की छटा का आस्वाद होता है। अमेरिकन पत्रकार डॉन मार्कविस ने ये बात अच्छी तरह की है।

कविता लिखना वो गहरी खाई में गुलाब की पंखुड़ी डाल के उसकी आवाज का प्रतिध्वनी सुनने के लिए प्रतीक्षा करने के बराबर है।

मनुष्य जाति के लिए हिंसा, अज्ञानता, झगडे-फसाद और कोलाहल से भरी इस दुनिया में कविता एक आश्वासन है। कविता का आम मनुष्य के साथ संबंध रहता ही है।

कवीर अपनी कविता में कहते है कि,

“बहता पानी निर्मला, बांध गंधीला होय

साधूजन रमते भले, दाग न लगे कोई”

कबीरजी अपनी कविता के माध्यम से कहते हैं की जो पानी बहता रहता है वो बहुत निर्मल और शुध्ध होता है और बंधा हुआ पानी गंदा होता है। “रनिंग वोटर इज ओलवेझ क्लीन”। कुदरती गति से बहता पानी हंमेशा स्वच्छ और पारदर्शक होता है। पवित्र होता है। बहेते पानी में लयबध्ध संगीत का अनुभव होता है। बहता पानी जिवंत होता है।बंध पानी बेजान होता है।

उपनिषद ने कहा है की चरे वेति - चरे वेति। चलते रहो-चलते रहो। आप कहाँ से आते हो वो महत्वपूर्ण नहीं हैं। और आप कहाँ जाने वाले है उसका भी आपको मालूम नहीं है वो बात भी बराबर है लेकिन बस चलते रहो।

स्कोटीश नवलकथाकार (उपन्यास लिखने वाला) रॉबर्ट लुइ स्टीवन्स ने लिखा है कि, “I travel not to go anywhere but to go”। इसका मतलब है कि में कहीं जाने के लिए नहीं लेकिन चलने के लिए चलता हूँ। अच्छा प्रवासी वो होता है जो किसी भी प्रकार की सोच मन में नहीं लाता। चलने मतलब मात्र हाथ पैर हिलाके चलना वो नहीं हैं। चलने के साथ शरीर और मन दोनों चलना चाहिये। चलने की बात कुदरत के साथ जुड़ जाती है तब वो आध्यात्मिक बन जाती है। समाज के साथ संवाद करने से वो समाजीक बन जाती है।

संत कबीर ने कहा है कि साधू हंमेशा खेलता रहता है, लोगों के साथ निश्वार्थ भाव से वो लोगों के लिए चलता रहता है। उसको दाग कैसे लगे? कितने लोग यात्रा को निकलते है लेकिन सामान के साथ वो वापस लोटते हैं तब उनके सामान में बढ़ावा होता है लेकिन उन में कोई सुधार यानि कि बदलाव नहीं आता। कितने लोग ऐसे है कि एक ही जगा बैठे रहते हैं लेकिन वो भीतर से चलते हैं। सूक्ष्म रूपमें वो लोगों से संपर्क बनाए रखते हैं। उनका आध्यात्मिक विकास होता है। उनका मन-ह्रदय प्रसन्न रहता है। इसके सन्दर्भ में कबीर की ये साखी है;

“बंधा पानी निर्मला, जो एक गहिरा होय

साधुजन बैठा भला, जो कुछ साधन होय”।

बंधा पानी निर्मल हो सके, यदि वो गहरा हो तो। इसी तरह एक जगह बैठा हुआ साधू संत भी निर्मल और सात्विक हो सकता है। यदि वो जप-तप में डूबा हुआ है तो।

कभी कभी एक शब्द या पंक्ति से कविता निर्माण होती है। “सुनो भाई साधू” गीत उस का उदहारण है। कभी कभी कविता लिखने का अवसर लम्बे अरसे तक प्राप्त नहीं होता है। लेकिन कभी कभी ऐसा भी होता है कि कविता की लहर मन में अचानक दौड़ आती है।

संत रविदास की कविता-

“प्रभुजी तुम चन्दन हम पानी तुम दिया हम बाती”

कितनी अच्छी है ?

हिलाने से बच्चा सोता है, राजा जागता है“

वेनुगोपालजी की पंक्ति है।

तुलसीदास, पिंगलीदास, केशवदास – ये सब हिंदी कवि है।

“माली आवत देख के कलियाँ करे पुकार,

फूलों को तो चुन लिया, कब हमें चुन लेगा”?

साठोतरी हिंदी कविता : हिंदी कविता लेखन के क्षेत्र मैं सन १९६० के बाद एक परिवर्तन परिलक्षित होता है। जिसके अंतर्गत करीब तीन दर्जन से अधिक काव्यान्दोलन चलाये गए। जिस में से अकविता आन्दोलन को मह्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त हुआ। साठोतरी हिंदी कविता की दिशाएं काफी व्यापक रूप धारण किये हुए है। साठोतरी हिंदी कविता की सबसे प्रमुख विशेषता, आझादी से मोहभंग रही है। जिस के अंतर्गत साठोतरी कवियोंने राजनितिक, आर्थिक तथा सामाजिक क्षेत्रों की बुराइयों को उखाड फेंकने के लिए कविता को अपना माध्यम बनाया। अत: कहना न होगा कि साठोतरी हिंदी कविता की दिशायें व्यापक द्रष्टिकोण वाली है। सन १९६० के बाद हिंदी कविता में विशेष रूपसे राजनितिक की और झुकाव परिलक्षित होता है।

साठोतरी जनवादी कविता में प्रेम की एक नयी द्रष्टि दिखाई देती है। इन कवियों का प्रेम संबंध रूमानी न रहकर यथार्थ के कठोर धरातल पर पैदा होता एवं परिपक्व होता है। इस के साथ ही नारी की एक नयी पहेचान सामने आती है। जिस में नारी भोग्या या दासी न रहकर सहभागिनी है। अनेक जगहों पर नारी का क्रान्तिकारी रूप सामने आता है। स्त्रियाँ हाथ में बन्दुक ले कर शोषक और बलात्कारी व्यवस्था के खात्मे के लिए मैदान में आ जाती है।

कविता को वाणी की आँख कहते हैं। कविता में डिब्ब गुर्राता है। झुग्गी के छेद को टपकाता है। कविता सिर्फ शब्दों का बिसात नहीं है, वाणी की आँख है। हिंदी कविता की विषय वस्तु स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद लोगों के समक्ष उपस्थित समस्यायों को उजागर करती है।

कवि लेखक अनुवादक

नशा मुक्ति अभियान प्रणेता

गांधीनगर गुजरात


मो.०९९०४४८०७५३

ijkM+dj th dk fgUnh lkfgR; esa ;ksxnku


vk”kh’k dqekj

21ohsa “krkCnh esa fgUnh i=dkfjrk vius pje ij gSA fgUnh i=dkfjrk Hkkjr esa gh ugha iwjs fo”o esa Hkh viuk vyx LFkku cuk pqdk gSA lgh “kCnksa dk iz;ksx Hkk‘kk orZuh] NksVs&NksVs okD;ksa esa fy[kk tkuk ;g fgUnh i=dkfjrk dk cnyk Lo:i gh gSA ftls vke tu dks vklkuh ls le> esa vkrk gSA 'kk;n blfy, bldh yksdfiz;rk fnu izfr fnu c<+rh gh tk jgh gSA

fgUnh i=dkfjrk dks u;h fn'kk esa ykuk x। dks lqUnj] Lo:i vkSj izHkkoiw.kZ cukus dk Js; ckcwjko fo‘.kq ijkM+dj th dks tkrk gSA ftUgksusa lSdM+ks u, 'kCn fgUnh esa x<+s vkSj mldk izpyu fd;kA tSls ^us'ku^ ds fy, ^jk‘Vª^] ^abUQys'ku^ ds fy, ^eqnzkLQhfr^] ^feLVj^ ds fy, ^Jh^ dk iz;ksx fd;kA loZJh 'kCn loZizFke ijkM+dj th us gh pyk;k ftls Hkkjr ljdkj us Lohdkj fd;kA ijkM+dj th us ^dks^ rFkk ^u^ ds iz;ksx ds laca/k esa fl)kar fo'ks‘k :i ls fn;k tks mYys[kuh; gSA fiNys ipkl lkB o‘kksZa esa mUgksaus i=dkfjrk dk tks ekinaM mifLFkr fd;k mlls Hkkjrh; i=dkfjrk dk lEeku c<+k gSA ijkM+dj th fgUnh i=dkfjrkk ds Hkh‘e firkeg dgs tkrs gSaA fgUnh i=dkfjrk ds fofo/k vaxksa dk fodkl]la?kVu vkSj larqyu vlk/kkj.k {kerk dk fodkl fd;kA viuh fo'ks‘kr% vxzys[k vkSj fVIif.k;ksa ds ys[ku ls viuh,d fof'k‘V igpku cukbZ ftudh izfrHkk vf)rh; gSA lEiw.kkZuanth dk dFku bl laca/k esa mudh fof'k‘Vrk dk ifjp; djkrk gS&**ijkM+dj th us fgUnh i=dkfjrk dks tks vewY; fuf/k iznku dh mlls fgUnh txr tYnh m_.k ugha gks ldrkAml le; dk *vkt* vxzys[kksa ds {ks= esa fdlh Hkh vPNs vaxzjsth i= ls rqyuk dj ldrk FkkAmUgksaus tks ijEijk,a LFkkfir dh og vkt fgUnh i=dkj txr dh lkekU; laifRr gks x;h gSAmudh izcy ys[kuh ls ns'k ds u ekywe fdrus ;qodksa dks izsj.kk]LQwfrZ vkSj mRlkg feyk gSA Lora=rk ds ;q) esa ns'k ds lglzksa ;qodksa dks ijkM+dj th dh ys[kuh us izHkkfor vkUnksfyr vkSj mRlxZ ds fy, izLrqr fd;kA **okLro esa ijkM+dj th ds ys[kksa us ns'k ds vusd usrkvksa dks ns'klsok rFkk Lok/khurk vkanksyu esa la?k‘kZ ds fy, iazjs.kk iznku dk dke fd;kA

ns'k gh ugha fons'k esa Hkh ijkM+dj th ds lEikndh; ys[kksa dk egRo Lohdkj fd;k tkrk gSA ;gh dkj.k Fkk fd muds ys[kksa rFkk laikndh; fopkjksa dk mYys[k,oa mn~/kj.k ik'pkR; ns'kksa ds fofHkUu fopkj/kkjk ds lekpkj i=ksa esa leku :i ls gksrk FkkA ijkM+dj th ds ys[k ns'k ds yksder ds izrhd gksrs FksA muds ys[kksa esa ns'k dh turk dk Loj gksrk Fkk vkSj jk‘Vª dh turk ds uke vkgkuA mudk ys[k jk‘Vªh;] lkekftd]vkfFkZd rFkk ns”k ds lkaLd`frd uotkxj.k esa egRoiw.kZ ;ksxnku jgk gSA fdzIl fe'ku tc Hkkjr vk;k rc ns'k dh okLrfod Hkkouk vkSj fopkj /kkjk ds ifjp; ds fy, *vkt^ ds vxzys[kksa,oa fVIif.k;ksa dk vaxjsth vuqokn *LVsV~esu* ds ek/;e ls fd;k x;k FkkA lu 1929&30 dh vkxjk&vo/k la;qDr izkar ds iz'kklu dh fjiksVZ esa bl ckr dk Li‘V mYys[k gS fd *vkt^ us ns'k esa iw.kZ Lok/khurk izkfIr ds fy, lnk,dek= dzkafr ds lk/ku dk gh leFkZu fd;kA laikndkpk;Z xnsZ th us ijkM+dj th dh,d izeq[k fo'ks‘krk crk;h gSA vkidk dFku gS fd **vFkZ'kkL= vkSj vFkZO;oLFkk laca/kh ys[kksa esa ijkM+dj th dh fo'ks‘k ;ksX;rk ekuh tkrh gSAbl tfVy fo‘k; dh tfVyrj xzfUFk;ksa dk bruh iqdkjh gqbZ Hkk‘kk esa le>kus okyk nwljk dksbZ i=dkj gqvk gh ughaA**

ijkM+dj th ds vxzys[kksa dh iz'kalk vkpk;Z iafMr egkohjizlkn f}osnh us vusd i= fy[kdj dh gSA,d i= mUgksaus fnlacj 1929 esa ijkM+dj th dks fy[kk&**fou; ;k fourh ;g gS fd vkt eSaus,d jFk ds nks pdz uked ys[k i<+kdj lqukA

mlds igys ds Hkh bl rjg ds dbZ ys[k eSaus lqusAvkidh lân;rk]U;k;”khyrk vkSj dk;Zif)fr ij eSaa eqX/k gks x;kA vki /kU; gksA ftu ckrksa ls vkius dksbZ 30&35 o‘kksZa ls esjs ân; esa ?kj dj jD[kk Fkk mudks gh ekuks vkius ogka ls fudkydj lc ij izdV dj fn;k Avkius vuqHko fl) lh ckrsa fy[k nh gSaAvkids fopkj eq>s rks fcYdqy lp ekywe gq,A**

lu~ 1925 bZ esa o`ankou lkfgR; lEesyu ds volj ij ijkM+dj th us izFke fgUnh lEiknd lEesyu dh v/;{krk dhA mUgksaus vius v/;{kh; Hkk‘k.k esa fgUnh i=dkfjrk dh,sfrgkfld Hkwfedk dk egRo crkus ds lkFk gh blds Hkfo‘; ds fo‘k; esa Hkh ?kks‘k.kk dh FkhAmUgksaus Li‘V 'kCnksa esa dgk Fkk&**Hkkoh fgUnh lekpkji=ksa dh uhfr ns”kHkDr]/keZHkDr vFkok ekuork ds mikld egkizk.k laikndksa dh uhfr u gksxhA bu xq.kksa ls laiUu ys[kd fod`r efLr‘d le>s tk;saxsA laiknd dh dqlhZ rd mudh igqaap u gksxhA** vkt mudh Hkfo‘;okk.kh lR; gks x;h gSA lu 1938 esa ijkM+dj th dks vf[ky Hkkjrh; fgUnh lkfgR; lEesyu ds f'keyk vf/kos'ku ds lHkkifr cuk;s x,A fgUnh Hkk‘kk rFkk lkfgR; ds laca/k esa mUgksaus vius Hkk‘k.k esa vR;Ur egRoiw.kZ ckrsa dgha ftl vk/kkj ij jk‘VªHkk‘kk fgUnh dk fodkl gqvkA ijkM+dj th us iwjs ipkl o‘kksZa rd i=dkfjrk ds ek/;e ls vkius jk‘VªHkk‘kk vkSj lkfgR; dk lao)Zu]laj{k.k vkSj fn'kk&funsZ'k fd;k og fpjLej.kh; gSA

cpiu ds fnu

ijkM+dj th esa cpiu ls gh gksugkj O;fDrRo dh >yd ns[kus dks fey tkrh gSA cpiu esa ijkM+dj th dks lnkf”ko ds uke ls tkuk tkrk FkkA ijkM+dj th dk tUe dk”kh ds paojxfy;k eqgYys ds vkokl esa 16 uoEcj 1883 bZ- esa gqvk FkkA

mudh iwjh f'k{kk&fn{kk lukruh okrkoj.k esa gqbZA ijkM+dj th ij eka ljLorh dh d`ik cpiu ls jgk gSA 'kk;n blfy, og lKksiohr ds iwoZ gh osnkax daBLFk dj x, FksA og ges'kk vius f'k[kk ij :nzk{k vkSj eLrd ij HkLe yxk;k djrs FksA ftl dkj.k mUgsa /kkfeZd dV~Vjrk ds :i esa ns[kk tkus yxk FkkA

ijkM+dj th vius cpiu ds fnuksa ds ckjs esa dgk gS&esjk tUe dk'kh esa gqvk vkSj cpiu Hkh dk'kh esa gh chrkA ckjg o"kZ dh vk;q esa eSaus vaxzjsth i<+uk vkjEHk fd;kA cpiu esa gh vBkjg iqjk.k i<+ Mkys FksA tc eSa ianzg o"kZ dk Fkk rc esjs firk py clsAml le; esa,UVªsUl esa FkkA ifjokj esa lcls cM+k FkkAdk'kh esa jguk vkSj fcuk ekrk&firk ds lcdks lEgkyuk dfBu FkkA bl dkj.k ukSdjh djus dh lksphA cpiu esa ekrk&firk I;kj ls ijkM+dj th dks ckcwjko dg dj cqykrs FksA

fgUnh i=dkfjrk ds {ks=

ijkM+dj th dks fgUnh i=dkfjrk dk tud dgk tkrk gSA mUgksaus viuh i=dkfjrk ls yksaxks esa fo'okl iSnk fd;kAmudk ys[k yksaxks dk izsfjr djus okyk gksrk FkkaAog vius ys[k vklku vkSj NksVs&NksVs okD;ksa esa fy[kk djrs FksA og viuh lEikndh; fVIif.k;ksa }kjk vius fu"i{k eu ds Hkko O;Dr djrs FksaA i=dkfjrk ds {ks= esa tkus ds laca/k esa mUgksaus dgk gS& ^^i=dkj {ks= esa ns'k&lsok dh n`f"V ls vk;k FkkA /ku vkSj ;'k dh bPNk u ml le; Fkh vkSj u vkt gSA^^

ijkM+dj th vkjEHk esa Mkd foHkkx esa dke fd;k djrs FksA ij pwafd og 'kq: ls gh Lora=rk ds i{k esa Fksa]blfy, mUgksaus bl ukSdjh dks djuk mfpr u le>kA dksydkrk ls fudyus okyk fgUnh i= ^^caxoklh^^ ls mUgksaus i=dkfjrk {ks= esa izos'k fd;kA dgk tkrk gS fd muds vkosnui= dh ys[ku&'kSyh ij ea=&eqX/k gksdj caxoklh ds laiknd Jh gfjd`".k tkSgj us mUgsa LFkku fn;k FkkA

blds ckn mUgksasus ^^fgrokrkZ^^ rFkk ^^Hkkjr fe=^^ dk Hkh laiknu fd;kA lu 1920 esa nSfud ^^vkt^^ ds izdk'ku ds lkFk viuh fgUnh i=dkfjrk dk u;k ekunaM fLFkj fd;kA Lora=rk vkanksyu ds fnuksa esa ^^j.kHksjh^^uked dkzafrdkjh i=dkfjrk ds Hkh ijkM+dj th tud FksA laikndkpk;Z cukjlhnkl prqosZnh dk dFku gS] ^^ijkM+dj th fgUnh i=dkj&txr ds LraHk FksAos mu FkksM+s ls O;fDr;ksa esa Fks tks vius lapkyd eaMy ds er ds foijhr er izdV djus dk lkgl dj ldrs FksA fgUnh i=dkfjrk dh mUgksaus ijEijk MkyhA ^^laikndkpk;Z ijkM+dj th us vkt ds ek/;e ls fgUnh i=dkfjrk esa tks ;ksxnku fn;k og Lo.kkZ{kjksa esa vafdr djus ;ksX; gSA

ijkM+dj th dk ;ksxnku

fgUnh lkfgR; vkSj i=dkfjrk ds fuekZ.k esa ijkM+dj th dk egRoiw.kZ ;ksxnku gSA lkFk gh fgUnh vkSj nsoukxjh ds laca/k esa Hkh egRoiw.kZ ;ksxnku jgk gSA mUgksaus viuh mPpdksfV vxzys[kksa ls fgUnh i=dkfjrk dks ekxZn'kZu fd;kA vFkZ'kkL= laca/kh tfVy fo"k;ksa ij mUgksaus le;&le; ij tks ys[k izLrqr fd, os mPpdksfV ds vaxzjsth i=ksa ls Hkh Js"V FkkA ijkM+dj th ds xEHkhj vxzys[k us jktuhfr lw>&cw> dk ifjp; fn;k]ftlls ns'k ds izeq[k fopkj'khy usrk Hkh izHkkfor gksrs jgs gSaA fgUnh Hkk"kk ds fodkl esa ijkM+dj th dk lE;d ewY;kadu ugha fd;k tk ldrk gSA fgUnh lkfgR; esa ijkM+dj th us lSdM+ksa u, 'kCn fn, ftudk iz;ksx vkt lkjs ns'k esa pyk, tk jgs gSaA ijkM+dj th fgrokrkZ vkSj Hkkjr fe= ds la;qDr laiknd jgsA vkt ds ek/;e ls mUgksaus fgUnh Hkk"kk ds mUu;u vkSj jk"Vª tkxj.k dk tks dk;Z fd;k og lnk vfoLej.kh; jgsxkA

lu 1938 bZ- esa ckcwjko fo".kq ijkM+dj th us fgUnh lkfgR; lEesyu ds 27 osa vf/kos'ku ds v/;{k ds ukrs&ukxjh fyfi rFkk mldk lq/kkj ij iz'u djrs gq, mUgksaus dgk Fkk&^^ukxjh o.kZekyk ds leku lokZxiw.kZ vkSj oSKkfud fdlh nwljh o.kZekyk dk vkfo"dkj vHkh rd ugha gqvk gS ;g loZekU; ckr gSAloZekU; ls esjk eryc mu fyfi;ksa ls gS]fufoZdkj fpRr ls bl fo"k; ij fopkj dj ldrs gSaAoSls rks viuh viuh oLrq lHkh dks vPNh yxrh gS ij ;fn o.kksZa dk mn~ns'; /ofu dk 'kq+) mPpkj.k gks rks lalkj dh dksbZ o.kZekyk ukxjh dk gkFk ugha idM+ ldrhA bl o.kZekyk esa izR;sd /ofu ds fy, vyx o.kZ gS vkSj izR;sd o.kZ dh,d gh /ofu gSA tks fy[kk tkrk gS]ogh i<+k tkrk gS ogh fy[kk gqvk gksrk gSA^^

ijkM+dj th dk dguk Fkk fd ukxjh fyfi ds xq.kksa ds vk/kkj ij gh ukxjh dks lHkh Hkk"kkvksa ds fy, mi;ksxh ekurs FksA lkFk gh mUgksaus dgk fd ^^fyfi lH;rk dh mi;ksfxrk ge vLohdkj ugha dj ldrs vkSj blhfy, ge pkgrs gSa fd Hkkjr dh lc Hkk"kk,a ukxjh fyfi esa fy[kh vkSj i<+h tk,a ij bl lkH; ds fy, ukxjh tSlh lokZxiw.kZ vkSj iw.kZ oSKkfud fyfi dks R;kx djds,d viw.kZ vkSj voSKkfud fyfi dks xzg.k dju loZFkk vuqfpr gSA bl lkE; ls gksus okyh FkksM+h lqfo/kk ds fy, ;fn ge bl fyfi dks foLe`fr ds xHkZ esa Mky nsa rks dsoy Hkkjr gh ugha oju leLr ekuo tkfr,slh o.kZekyk ls oafpr gksxh tSlh vc rd Hkkjr ds ckgj u dgha vkfo"d`r gqbZ gS u gks ldrh gS vkSj Hkkoh ihf<+;ka gekjh bl ew[kZrk ij galsxh vkSj f/kDdkj nsaxhA^^

jkseu fyfi ds laca/k esa ijkM+dj th dk ekuuk Fkk fd&blesa fy[kk,d gksrk gS vkSj i<+k nwljk tkrk gSA tSls jke dks jkseu esa vkj&,&,e fy[kk tk,xkAij ukxjh esa jke gha i<+k tk,xkAijkM+dj th dgrs Fks fd gekjh,slh lqUnj fyfi ds gksrs gq, Hkh dqN lTtu gesa jkseu fyfi xzg.k djus dk mins'k nsrs gSaAblls c<+dj vk'p;Z vkSj [ksn dk fo"k; D;k gks ldrk gS\ os vjch vkSj Qkjlh fyfi dks Hkh viw.kZ fyfi ekurs FksA bl laca/k esa mUgksaus dgk Fkk vjch Qkjlh fyfi dh viw.kZrk vkSj lanks"krk ia- ineflag 'kekZ us viuh fgUnh mnwZ vkSj fgUnqLrkuh 'kh"kZd O;k[;ku ekyk esa cM+h [kwch ds lkFk fn[kk;h gSA,d gh 'kCn tsj]tcj is'k vkSj uqdrksa ds Hksn ls fdrus :i xzg.k djrk gS]bldk vkius ;g mnkgj.k fn;k gS&

eyd lkFkZd&ekSuekfyd&ckn'kkg]eqyd&ns'k]feyd&/ku]eyqd&fujFkZd] feyd&nw/kA fy[kus ;k Nkius ds le; lk/kkj.kr;k tsj]tcj]is'k dh mis{ks dh tkrh gSAifj.kke ;g gksrk gS fd bl fyfi esa fy[kk etewu ogh i<+ ldrk gS tks 'kCn ds vFkZ dh dYiuk djds mudk Bhd mPpkj.k dj ldsAtks 'kCnksa dk vFkZ ugha tkurs muds fy, mudk mPpkj.k djuk laHko ughaA

ijkM+dj th Hkkjr dh lHkh Hkk"kkvksa ds fy, ukxjh esa fy[kus ds i{k/kj FksAog pkgrs Fkss fd Hkkjr dh lc Hkk"kk,a ukxjh esa fy[kh vkSj Nkih tk,aA bl dk;Z ds fy, ukxjh esa v{kj vkSj fpg~u x<+us pkfg,Amudk dguk Fkk& ^^vk;Z Hkk"kkvksa dh lc /ofu;ka ukxjh esa gSaA ejkBh rks ukxjh esa gh fy[kh tkrh gSAxqtjkrh vkSj ckaXyk dh o.kZekyk Hkh dqN ifjofrZr ukxjh o.kZeky gS ftuds fy, 'kk;n gh dksbZ u, fpg~u cukus iM+sA vo'; gh nzfoM+ Hkk"kkvksa esa,slh /ofu;ka vkSj,sls Loj gS ftuds fpg~u ukxjh esa cukus iM+saxsA fons'kh Hkk"kkvksa ukxjh esa fy[kus ds fy, vusd u;s v{kjksa vkSj fpg~uksa dh vko';drk gksxhA^^

ijkM+dj th fgUnh Hkk"kk dks lqUnj]ljy vkSj lgt cukuk pkgrs FksAblfy, og ukxjh fyfi ds lq/kkj ds i{k es FksA mUgksaus fgUnh lkfgR; lEesyu iz;kx ds f'keyk vf/kos'ku ds v/;{kh; in ls ukxjh Hkk"kk esa dbZ lq/kkj ds lq>ko fn;s A tks vkt Hkh fopkj esa gSA ijkM+dj th us fgUnh vkSj nsoukxjh ds izpkj&izlkj]nsoukxjh lq/kkj ij xgu fparu fd;k vkSj vius vxzys[kksa ds ek/;e ls fofHkUu i=&if=dkvksa esa izdkf'kr dj uxkjh izpkj ds vkanksyu dks cy nsdj ukxjh dh egRoiw.kZ lsok dh rFkk Hkkjr dh fofHkUu Hkk"kkvksa esa ik;h tkus okyh lekurkvksa vkSj vkReh;rk dks loZekU; Hkkf"kd ek/;e ds rkSj ij,d fyfi ds rRo dks igpkuk FkkA

fiNys ipkl lkyksa esa ijkM+dj th us fgUnh lalkj esa tks dqN fn;k mldk iafDr;ksa esa mYys[k djuk lEHko ughaA,d bZekunkj lkfgR;dkj ds :i esa mUgksaus Lok/khurk vkSj Lora=rk ds lkfgfR;d yM+kbZ yM+h vkSj mlesa ijkM+dj th dks lQyrk Hkh feyhA blds vfrfjDr vkt us fgUnh i=dkfjrk dk tks u;k ekun.M LFkkfirss fd;k] mldk Lrj ftruk mUur fd;k]og fdlh ls fNik ugha gSA

blh yksdfiz;rk,ao fo'ks"krkvksa ds dkj.k gh ijkM+dj th dks vf[ky Hkkjrh; fgUnh lkfgR; lEesyu ds f'keyk vf/kos'ku ds v/;{k cuk, x,AlEesyu ls mUgsa lkfgR;okpLifr dh mikf/k Hkh izkIr gqbZA uoEcj 1953 esa oj/kk dh ^jk"VªHkk"kk izpkj lfefr^ }kjk vk;ksftr vfHkuanu lekjksg ds volj ij vfgUnh Hkk"kh egku lkfgR;&lsfo;ksa dks fn;k tkus okyk #i, 1501 dk egkRek xka/kh iqjLdkj ijkM+dj th dks HksaV fd;k x;k FkkA,sls gh vusd volj ij iM+kdj th dks lEekfur fd;k x;k gSA tks vfoLej.kh; gSA buds fgUnh lkfgR; esa fn, ;ksxnku dks ges”kk ue vka[kksa ls ;kn fd;k fd;k tk,xkA


eksckbZy %& 7991153753


जिम कार्बेट - एक अदभुत व्यक्तित्व


डा. राहिला रईस

कई दशकों से प्रकृति संरक्षण में जुटे लोगों और संस्थाओं के लिये आदर्श रहे जिम कार्बेट का जन्म 25 जुलाई 1875 को नैनीताल में हुआ था। उनका वास्तविक नाम एडवर्ड जेम्स कार्बेट था। वह क्रिस्टोफर विलियम कार्बेट और मेरी जेन कार्बेट की आँठवीं संतान थे। जिम का बचपन नैनीताल में बीता और यहीं उनकी प्राथमिक शिक्षा दीक्षा हुई। गर्मियों में उनका परिवार नैनीताल में रहता और अधिक सर्दियों में नैनीताल से कालाढ़ूँगी आ जाता जो अपेक्षाकृत थोड़ा गर्म क्षेत्र है। नैनीताल और कालाढ़ूँगी दोनों ही प्रकृति के अनुपम सौंदर्य से युक्त क्षेत्र थे अत: बचपन से ही जिम को प्रकृति, वन और वन्य जीवन से गहरा लगाव हो गया था।

अपनी उच्च माध्यमिक शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात जिम इंजिनियर बनना चाहते थे किंतु, पिता के निधन के पश्चात अपने भाई-बहनों के पालन-पोषण की ज़िम्मेदारी उन पर आ गयी अत: शिक्षा से विमुख होकर उन्होंने नौकरी करने का निश्चय किया। जिम ने रेलवे में नौकरी कर ली और 1892 में बंगाल उत्तरी पश्चिमी रेलवे में ईधन निरीक्षक के पद पर कार्यभार ग्रहण किया। तत्पश्चात वह सहायक स्टेशन अधीक्षक व स्टोरकीपर के पद पर भी आसीन हुये। इसके पश्चात उन्होंने श्रम प्रबंधक के रूप में कार्य किया। जिम ने 1917 तक लगभग 25 वर्षों तक रेलवे विभाग में कार्य किया। रेलवे में भिन्न पदों पर आसीन होने के साथ-साथ वह अलग-अलग जगहों पर नियुक्त रहें किन्तु इस बीच भी वह नैनीताल और कालाढ़ूँगी आते रहते थे और इसी दौरान उन्होंने तीन आदमखोरों बाघों का शिकार कर जनता को उनके आतंक से मुक्ति दिलाई थी।

1914 से 1918 तक चलने वाले प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान 1917 में रेलवे की नौकरी छोड़कर जिम ने सेना में कैप्टन का पद-भार ग्रहण किया। उन्होंने 500 कुमाऊँनी जवानों के एक श्रमिक दल का गठन किया और फ्राँस में लड़ाई अभियान में भाग लिया। अपने सफल अभियान के फलस्वरूप उनकी मेजर के पद पर पदोन्नति हुयी। अगले वर्ष जिम को अफगानिस्तान व वजीरिस्तान में सेना के मिशन पर भेजा गया। प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात जिम सीधे तौर पर तो सेना से जुड़े नहीं रहे किंतु उनका संबंध सेना से अवश्य बना रहा। सन् 1944 में ब्रिटिश सरकार ने उन्हें सैनिकों को प्रशिक्षण देने के लिये विशेष नियुक्ति प्रदान की। सेना में प्रशंसनीय कार्य करने के एवज़ में सरकार द्वारा जिम को कर्नल का पद प्रदान किया गया।