वर्ष 4, अंक 42-43. अक्टूबर-नवंबर 2018



परामर्श मंडल

डॉ. सुधा ओम ढींगरा (अमेरिका),प्रो. सरन घई (कनाडा), प्रो. अनिल जनविजय (रूस), प्रो. राज हीरामन (मॉरीशस), प्रो. उदयनारायण सिंह (कोलकाता), स्व. प्रो. ओमकार कौल (दिल्ली), प्रो. चौथीराम यादव (उत्तर प्रदेश), डॉ. हरीश नवल (दिल्ली), डॉ. हरीश अरोड़ा (दिल्ली), डॉ. रमा (दिल्ली), डॉ. प्रेम जन्मेजय (दिल्ली), प्रो.जवरीमल पारख (दिल्ली), पंकज चतुर्वेदी (मध्य प्रदेश), प्रो. रामशरण जोशी (दिल्ली),डॉ. दुर्गा प्रसाद अग्रवाल (राजस्थान), पलाश बिस्वास (कोलकाता), डॉ. कैलाश कुमार मिश्रा (दिल्ली), प्रो. शैलेन्द्र कुमार शर्मा (उज्जैन), ओम पारिक (कोलकाता), प्रो. विजय कौल (जम्मू ), प्रो. महेश आनंद (दिल्ली), निसार अली (छत्तीसगढ़),

संपादक

कुमार गौरव मिश्रा

सह-संपादक

जैनेन्द्र (दिल्ली), कविता सिंह चौहान (मध्य प्रदेश)

कला संपादक

विभा परमार

संपादन मंडल

प्रो. कपिल कुमार (दिल्ली), डॉ. नामदेव (दिल्ली), डॉ. पुनीत बिसारिया (उत्तर प्रदेश), डॉ. जितेंद्र श्रीवास्तव (दिल्ली), डॉ. प्रज्ञा (दिल्ली), डॉ. रूपा सिंह (राजस्थान), स्व. तेजिंदर गगन (रायपुर), विमलेश त्रिपाठी (कोलकाता), शंकर नाथ तिवारी (त्रिपुरा), बी.एस. मिरगे (महाराष्ट्र), वीणा भाटिया (दिल्ली), वैभव सिंह (दिल्ली), रचना सिंह (दिल्ली), शैलेन्द्र कुमार शुक्ला (उत्तर प्रदेश), संजय शेफर्ड (दिल्ली), दानी कर्माकार (कोलकाता), राकेश कुमार (दिल्ली), ज्ञान प्रकाश (दिल्ली), प्रदीप त्रिपाठी (महाराष्ट्र), उमेश चंद्र सिरवारी (उत्तर प्रदेश), चन्दन कुमार (गोवा)

सहयोगी

गीता पंडित (दिल्ली)

निलय उपाध्याय (मुंबई, महाराष्ट्र)

मुन्ना कुमार पाण्डेय (दिल्ली)

अविचल गौतम (वर्धा, महाराष्ट्र)

महेंद्र प्रजापति (उत्तर प्रदेश)

विदेश प्रतिनिधि

डॉ. अनीता कपूर (कैलिफोर्निया)

डॉ. शिप्रा शिल्पी (जर्मनी)

राकेश माथुर (लन्दन)

मीना चौपड़ा (टोरंटो, कैनेडा)

पूजा अनिल (स्पेन)

अरुण प्रकाश मिश्र (स्लोवेनिया)

ओल्या गपोनवा (रशिया)

सोहन राही (यूनाइटेड किंगडम)

पूर्णिमा वर्मन (यूएई)

डॉ. गंगा प्रसाद 'गुणशेखर' (चीन)

संपादन मण्डल

जनकृति

(बहुभाषी अंतरराष्ट्रीय मासिक पत्रिका)

संपर्क

डॉ. कुमार गौरव मिश्रा, 4-a, बागेश्वरी अपार्टमेट, आर्यापुरी,

रातू रोड़, रांची, झारखंड, भारत

8805408656

वेबसाई-www.jankriti.org

ईमेल- jankritipatrika@gmail.com

संपादक की कलम से....


आप सभी पाठकों के समक्ष जनकृति का अक्टूबर-नवंबर सयुंक्त अंक प्रस्तुत है। प्रस्तुत अंक में साहित्य, कला, मीडिया, पत्रकारिता, अनुवाद इत्यादि क्षेत्र के विभिन्न विषयों को प्रकाशित किया गया है। जनकृति में साहित्यिक रचनाओं के साथ-साथ विभिन्न क्षेत्रों के नवीन विषयों पर आधारित लेख, शोध आलेख प्रकाशित किए जाते है। वर्तमान में आंशिक बदलाव करते हुए सम्पूर्ण अंक में केवल लेख एवं शोध आलेखों को स्थान दिया गया है। यह जनकृति का समान्य अंक है। इससे पूर्व बुजुर्गों पर केन्द्रित विशेषांक, विदेशी भाषा कविता विशेषांक, जल विशेषांक, थर्ड जेंडर विशेषांक, हिंदी पत्रिका विशेषांक, लोकभाषा विशेषांक एवं 21वीं सदी विशेषांक कुल 8 विशेषांक प्रकाशित किए गए हैं। इनके अतिरिक्त पत्रिका के आगामी विशेषांक पूर्वोत्तर भारत विशेषांक, काव्य आलोचना विशेषांक, संपादक एवं संपादकीय विशेषांक, बाल शोषण इत्यादि प्रस्तावित है जिनपर कार्य किया जा रहा है। इन विशेषांकों में लेखन हेतु आपका स्वागत है।

जनकृति वर्तमान में विश्व के दस से अधिक रिसर्च इंडेक्स में शामिल है। इसके अतिरिक्त जनकृति की इकाई विश्वहिंदीजन से विगत दो वर्षों से हिन्दी भाषा सामग्री का संकलन किया जा रहा है साथ ही प्रतिदिन पत्रिकाओं, लेख, रचनाओं का प्रचार-प्रसार किया जाता है। जनकृति की ही एक अन्य इकाई कलासंवाद से कलाजगत की गतिविधियों को आपके समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है साथ ही कलासंवाद पत्रिका का प्रकाशन भी किया जा रहा है। जनकृति के अंतर्गत भविष्य में देश की विभिन्न भाषाओं एवं बोलियों में उपक्रम प्रारंभ करने की योजना है इस कड़ी में जनकृति पंजाबी एवं अन्य भाषाओं पर कार्य जारी है।

जनकृति के द्वारा लेखकों को एक मंच पर लाने के उद्देश्य से विभिन्न देशों की संस्थाओं के साथ मिलकर ‘विश्व लेखक मंच’ के निर्माण का कार्य जारी है। इस मंच में विश्व की विभिन्न भाषाओं के लेखकों, छात्रों को शामिल किया जा रहा। इस मंच के माध्यम से वैश्विक स्तर पर सृजनात्मक कार्य किये जाएँगे।

धन्यवाद

-कुमार गौरव मिश्रा

इस अंक में ....

कला-विमर्श/

Art Discourse


शोध आलेख एवं लेख


पृष्ठ संख्या


समकालीन सिनेमा में समाज, संस्कृति और भाषा: ज्ञान चन्द्र पाल [आलेख]


7-16

दलित एवं आदिवासी- विमर्श/ Dalit and Tribal Discourse


शोध आलेख एवं लेख


पृष्ठ संख्या


हिंदी दलित आत्मकथाओं में अभिव्यक्त समकालीन प्रश्न: बृज किशोर वशिष्ट [शोध आलेख]


17-24


हिन्दी दलित आत्मकथाओं में अभिव्यक्त स्त्री जीवन और संघर्ष: अजीत कुमार [शोध आलेख]


25-31


रणेंद्र की कहानियों में दर्ज़ आदिवासियों का दर्द: धीरेन्द्र प्रताप सिंह [शोध आलेख]


32-35


डॉ आम्बेडकर की दृष्टि और दलित साहित्य का अभ्युदय: मूलचन्द्र गौतम [आलेख]


36-39


दलित महिलाओं के अभावग्रस्त जीवन में पोषक तत्वों का महत्व: ममता श्रीवास्तव [शोध आलेख]


40-43


दलित स्त्री लेखन की उपलब्धियां और सम्भावनाएँ: तुपसाखरे श्यामराव पुंडलिक


44-52

स्त्री- विमर्श/ Feminist Discourse


शोध आलेख एवं लेख


पृष्ठ संख्या


नरेन्द्र कोहली के उपन्यासों में स्त्री-विमर्श: डॉ. कान्ता ढ़िल्लन [शोध आलेख]


53-56


स्त्री की दुनिया बरास्ते ‘मुझे चाँद चाहिए’: दीप्ती मिश्रा [शोध आलेख]


भाषिक- विमर्श/ Language Discourse


शोध आलेख एवं लेख


पृष्ठ संख्या


हिंदी भाषा: अस्मिता और संभावनाएँ : डॉ० मजीद शेख [शोध आलेख]


57-60


भाषिक कौशल स्वरूप एवं संकल्पना: प्रा. डॉ. योगेश व्ही दाणे [शोध आलेख]


61-65



शिक्षा- विमर्श/ Education Discourse


शोध आलेख एवं लेख


पृष्ठ संख्या


सर्व शिक्षा अभियान के अन्तर्गत ग्रामीण बालिका शिक्षा की वर्तमान स्थिति-एक अध्ययन: सत्येन्द्र कुमार पाल [शोध आलेख]


66-69



समसामयिक विषय/ Current Affairs


शोध आलेख एवं लेख


पृष्ठ संख्या


भारतीय लोकतंत्र में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने की प्रासंगिकता: अरविन्द प्रसाद गोंड [शोध आलेख]


70-73


मॉब लिंचिंग - कौन है ज़िम्मेदार, क्या है समाधान:

अवधेश कुमार 'अवध' [आलेख]


74-75


वैश्विक तापमान कारण और निवारण: मनीषा जोबन देसाई [आलेख]


76


साइबर हैकिंग: जुनैद मलिक अत्तारी


77-79

शोध आलेख/ Research Article


शोध आलेख


पृष्ठ संख्या


कवींद्र-रवींद्र और उनके विमर्श: कृष्ण कुमार यादव


80-86


मुक्तिबोध : काव्य भाषा के शिल्पकार: डॉ. संजय प्रसाद श्रीवास्तव


87-91


नागार्जुन: जन को समर्पित कवि


92-93


साम्प्रदायिकता और तमस: डॉ. नवाब सिंह


94-103

शोध आलेख/ Research Article


शोध आलेख


पृष्ठ संख्या


मनीषा कुलश्रेष्ठ के कहानी-संग्रह ‘कठपुतलियाँ’ में चित्रित यथार्थ: प्रियंका चाहर


104-107


कल, आज और कल को गुनते-बुनते कवि केदारनाथ सिंह: प्रोमिला


108-115


कहानी का बदलता परिदृश्य और लम्बी कहानी: विवेक कुमार चौरसिया


116-120


विष्णु प्रभाकर के कथा साहित्य के सांस्कृतिक आयाम

(संस्कार, निशिकांत (उपन्यास) और आश्रिता (कहानी) के विशेष सन्दर्भ में ): केवल कुमार


121-128



अनुवाद/ Translation


शोध आलेख


पृष्ठ संख्या


नोबेल पुरस्कार विजेता जर्मन लेखक व कवि ग्युंटर ग्रास की कुछ कवितायें: रूपांतर – उज्ज्वल भट्टाचार्य


129-131


दयानंद कनकदंडे जी की अनुदित कविताएँ

अनुवाद – प्रेरणा उबाळे


132-133



समकालीन सिनेमा में समाज, संस्कृति और भाषा ज्ञान चन्द्र पाल

भारत एक बहुभाषी, बहुभौगोलिक स्थिति और बहुसंस्कृतियों वाला देश है। इसकी खूबसूरती इसके विविधता में ही निहित है। जिस प्रकार एक बगीचा विभिन्न रंग के पुष्पों से सुशोभित होता है; उसी प्रकार भारत की शोभा विभिन्न भाषा और संस्कृतियाँ हैं। इसी कारण हमारे पूर्वजों ने इसकी विविधता में एकता की कल्पना की थी। भिन्न भौगोलिक स्थिति के कारण यहाँ के लोगों की भाषा भी भिन्न है। आजादी के समय भाषागत दूरी को दूर करने तथा आपस में मेल मिलाप के लिए संपर्क भाषा के रूप में हिंदी का विकल्प सामने आया था। तब से अभी तक यह विभिन्न संस्थाओं के माध्यम से सम्पूर्ण भारत को आपस में एक दूसरे को समझने के लिए प्रयास में लगी हुई है। इसके इस प्रयास को पूर्ण करने में हिंदी सिनेमा का महत्वपूर्ण योगदान है। यह निस्संदेह रूप से कहा जा सकता है कि हिंदी भाषा को भारत ही नहीं अपितु विश्व तक पहुँचाने में सिनेमा का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। जहाँ एक ओर भारत सरकार हिंदी को आजादी के समय से आज तक राष्ट्रभाषा का दर्जा तक नहीं दिला पाई है, वहीं हिंदी सिनेमा उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक सभी लोगों को हिंदी बोलना और समझना सिखा रहा है। यह हिंदी सिनेमा की ही देन है जो अहिंदी प्रदेशों में भी लोग इसे बोल और समझ लेते हैं। मैंने अपने तमिल भाषी मित्र से जब यह पूछा कि आप हिंदी कैसे सीखते हो तो उसने इसका श्रेय हिंदी सिनेमा को ही दिया था। हिंदी भाषा के साथ-साथ सिनेमा भारतीय समाज और संस्कृति को देखने और समझने का बेहतर विकल्प है। जिस प्रकार प्रेमचंद के साहित्य को पढ़कर हिंदी पट्टी को बहुत ही आसानी से समझा जा सकता है, उसी प्रकार भारतीय सिनेमा के माध्यम से भारतीय समाज को आसानी से समझा जा सकता है। इस प्रकार भारतीय सिनेमा आज भारतीय समाज का आईना बनता जा रहा है।

कला-विमर्श/Art Discourse

सिनेमा भारतीय संस्कृति को विदेशों में पहुंचाने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। आज विदेशी लोग भारत के होली, दीपावली, रक्षाबंधन आदि त्योहारों को सिनेमा के माध्यम से ही जान पाए हैं। इस प्रकार आज का सिनेमा भाषा के लोक पक्ष को छूते हुए समाज की नई परिभाषा गढ़ने में सक्षम हो रहा है। सिनेमा की इसी सेवा को उद्घाटित करते हुए राज्य सभा सदस्य आर. के. सिन्हा कहते हैं- “क्या यह भी किसी को बताने की जरूरत है कि राज कपूर ने अपनी फिल्मों के माध्यम से हिंदी की कितनी सेवा की है। एक दौर में सोवियत संघ की जनता राज कपूर की आवारा से लेकर श्री 420, मेरा नाम जोकर समेत तमाम फिल्मों को इसलिए पसंद करती थी, क्योंकि उनमें भविष्य को लेकर एक संभावना का संदेश मिलता था।”[i]

एक समय था जब दर्शकों को गोविंदा के ठुमके, अमिताभ बच्चन का करिश्माई शहंशाह रूप और सनी देओल का ढाई किलो का हाथ पसंद था। भारतीय दर्शकों को उस समय अपनी समस्त समस्याओं को दूर करने वाले किसी चमत्कारी नायक की अपेक्षा रहती थी। वे अपनी समस्त समस्याओं को ‘शोले’ के वीरू और जय पर छोड़कर सिर्फ तमाशा देखने के पक्ष में रहते थे। उन्हें अपनी शक्ति और सामर्थ्य पर भरोसा नहीं रह गया था। कालांतर में दर्शकों का यह मोह टूटा और वे अपनी समस्याओं को सामूहिक रूप से हल करने का प्रयास किया। समस्याओं को सामूहिक रूप से हल करने का तजुर्बा लेकर आशुतोष गोवारीकर की सन् 2001 में प्रदर्शित फिल्म ‘लगान’ आई। इस फिल्म ने अपनी सफलता से सभी निर्माताओं और निर्देशकों को नए विषय पर सोचने के लिए बाध्य किया। फिल्म में परतंत्र भारत में अंग्रेजों से लगान की छूट लेने के लिए किसानों को सामूहिक संघर्ष करते हुए दिखाया गया है। अनुषा रिजवी के निर्देशन में सन् 2010 में बनी ‘पीपली लाइव’ ने तो सभी दर्शकों के फिल्म देखने के स्वाद को ही बदल दिया। अब वे समझने लगे कि सिर्फ प्यार-मुहब्बत और लटके-झटके देखना ही फिल्म देखना नहीं है। फिल्म वह भी है जो आपको अपने समाज की सच्चाई को दिखाकर उसे बदलने के लिए विवश करे। इस फिल्म में गरीबी और भुखमरी से विवश होकर आत्महत्या करने वाले किसान को दिखाया गया है। इस फिल्म में भारतीय समाज के दो ऐसे पक्ष को दिखाया गया है जिसमें एक पक्ष आत्महत्या करने को विवश है तो दूसरा उसकी आत्महत्या पर राजनीति की रोटियाँ सेकने को तत्पर है।

वैसे तो लगभग सभी फिल्मों में कम या अधिक भारतीय भाषा, समाज और संस्कृति मुखरित होती है पर कुछ ऐसी फिल्में हैं जो समाज के कुछ अनछूए पहलू को दिखाकर उसे सोचने के लिए मजबूर करती हैं। वे फिल्में निम्न हैं-

हिंदी मीडियम (19-5-2017)

कहने को तो यह फिल्म भारत की शिक्षा व्यवस्था की असमानता और उसमें उच्च वर्ग द्वारा निम्न वर्ग के अधिकार को हड़पने के षड्यंत्र पर आधारित है, पर इसमें दो ऐसे वर्ग को दिखाया गया है जो शिक्षा के लिए संघर्षरत हैं। एक वर्ग जो सभी प्रकार से सम्पन्न है वह शिक्षा को पाने के लिए निम्न वर्ग का व्यक्ति बनने का नाटक करता है और दूसरा वह वर्ग जो निम्न वर्ग का होते हुए शिक्षा के द्वारा उच्च वर्ग में सम्मिलित होने का आकांक्षी है। भारतीय समाज स्वतंत्रता के पूर्व वर्ण आधारित था। समाज ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र नामक वर्णों में बांटा गया था। स्वतंत्रता के पश्चात संविधान में सभी के साथ एक जैसा व्यवहार करने के लिए कानून का निर्माण किया गया। सभी के लिए समान रूप से शिक्षा, स्वास्थ्य और क्षमता अनुसार रोजगार उपलब्ध करवाने का सरकार द्वारा वादा किया गया। पर देखते ही देखते सरकार का यह वादा सिर्फ छलावा साबित हुआ। शिक्षा के क्षेत्र ने दो प्रकार के समाज का निर्माण किया। एक शिक्षा समाज के उन लोगों को सभी प्रकार की आधुनिक सुविधाओं से संपन्न और सुसज्जित इमारतों में दी जाती है जिनकी संख्या समाज में सिर्फ पाँच प्रतिशत है। दूसरी शिक्षा किसी टूटी, बरसात में पानी की बूँद टपकती सरकारी इमारत या फिर किसी पेड़ के नीचे समाज के पंचानबे प्रतिशत लोगों को दी जाती है। शिक्षा का यह विभेद आगे चलकर विद्यार्थियों में हीन भावना के जन्म का कारण बनता है। इस फिल्म की नायिका अपनी बेटी का हिंदी मीडियम की किसी स्कूल में पड़ने के कारण आए इसी हीन भावना की चिंता अपने पति से बार-बार करती है। सम्पूर्ण फिल्म समाज के दो ऐसे वर्ग का चित्रण करती है जो आधुनिक अंगेजी शिक्षा को पाने के लिए संघर्षरत हैं। फिल्म का प्रथम दृश्य ही पंजाबी भाषा के टंकारयुक्त संवादों से शुरू होता है-

“की बहेन जी! सारे नवे डिजाइन पुराने हो गए त्वड्डी वेट कर-करके। तू सि हू न आयो। ऐ कोई गल हैगी?

अरे रहन देव। हमारी कोई उमर है नई डिजाइन पहनने की? अब तो ये नई जनरेशन स्टाइल मारेगी।”

उपरोक्त संवाद में पंजाबी और अंग्रेजी का मिश्रण बहुत आसानी से देखा जा सकता है। भारत में पंजाबी ही नहीं बल्कि सभी भाषाओं में अंग्रेजी बड़ी ही आसानी से अपनी जगह बनाने में सफल होती जा रही है। चिंता तो इस बात की है कि आने वाली पीढ़ी को किसी भी हिंदी शब्द का अर्थ अंग्रेजी में न समझाना पड़े। खैर! भाषा सदैव परिवर्तनशील रही है। इसका परिवर्तन किसी के भी रोके से नहीं रुक सका है। वैदिक संस्कृत से हिंदी तक का क्रम इसी प्रकार चलता आया है और आगे भी इसी प्रकार चलता रहेगा।

यह फिल्म भारतीय समाज के दो वर्गों का चित्रण बहुत ही बारीकी से करती है- एक वह वर्ग जिसके लिए प्रत्येक गाँव में सरकार द्वारा प्राथमिक पाठशाला का निर्माण करवाया गया है। उसके बच्चे इन्हीं पाठशालाओं से पढ़कर आगे चलकर उच्च वर्ग के बच्चों के साथ प्रतियोगिता में बैठने की हिमाकत करते हैं। दूसरा वर्ग वह जिनके लिए आधुनिक सुविधाओं से परिपूर्ण आधुनिक शिक्षा और उसकी माँग को ध्यान में रखते हुए कानवेंट स्कूलों का निर्माण करवाया गया है। जो लोग अपने पैसे और पहुँच के बल पर अंग्रेजी माध्यम पर आधारित भारत की इन स्कूलों में अपने बच्चों का दाखिला करवा लेते हैं, वे अन्यों को अपने से छोटा समझने लगते हैं। सूरज वैली हाई स्कूल, क्रॉसरोड स्कूल, दिल्ली ग्राम स्कूल और प्रकृति स्कूल ऐसे ही विद्यालय हैं जिनमें बच्चों का एडमिशन करवाने के लिए फॉर्म हेतु न सिर्फ आधी रात से लाइन में खड़ा होना पड़ता है बल्कि ऊँची पहुँच वाले मंत्री की सिफ़ारिश की भी जरूरत होती है। इसके बरक्स सरकारी स्कूल के गंदे और टूटे शौचालय तथा फर्श पर ही बैठे बच्चे उसकी दयनीय स्थिति की कहानी स्वतः बयां कराते हैं। यह सिर्फ सरकारी विद्यालयों की ही स्थिति नहीं है बल्कि देश के विश्वविद्यालय की स्थिति इससे कहीं अधिक खराब है। हाल ही में एन. डी. टी. वी. द्वारा दिखाए गए विश्वविद्यालय एपिसोड से यहाँ के विश्वविद्यालयों की वास्तविक स्थिति को हम अच्छी तरह समझ सकते हैं। सम्पूर्ण फिल्म समाज में अपने को श्रेष्ठ समझने के लिए इन स्कूलों में बच्चे का दाखिला करवाने के जोड़-तोड़ और संघर्ष पर आधारित है। फिल्म की नायिका मीता बत्रा की सम्पूर्ण चिंता का विषय यही है- “सरकारी स्कूल में जाएगी तो कुछ नहीं सीख पाएगी। बेचारी बड़ी होके हर जगह बात करने में डरेगी। कोई अंग्रेजी में बात करेगा तो उसकी रूह काँप जाएगी। फिट नहीं हो पाएगी न सुसाइटी में; तो डिप्रेस हो जाएगी। और उसने ड्रग्स लेना शुरू कर दिया तो?... इस देश में अंग्रेजी जबान नहीं है, क्लास है राज क्लास। और इस क्लास में घुसने के लिए एक अच्छे स्कूल में पढ़ने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है”

उपरोक्त संवाद भारतीय समाज को समझने के लिए काफी है। भारत का एक समाज अंग्रेज़ीदां समाज है जो अपने सारे कार्य अंग्रेजी में ही करता है। जहाँ भारत का आम समाज दिन के तीनों वक्त भोजन लेता है वहीं इस वर्ग के लोग ब्रेकफ़ास्ट, लंच और डिनर लेते हुए देखे-सुने जा सकते हैं। इतना ही नहीं कभी-कभी दूसरे वर्ग पर अपनी धौंस जमाने के लिए भी यह वर्ग अपने अंग्रेज़ीदां शब्दों से उसे फटकारने की कोशिश करता है। फिल्म में दिल्ली का असली चेहरा तब आता है जब राज बत्रा अपनी बेटी को स्कूल में आरक्षित सीट से दाखिला दिलाने के लिए भारत नगर के गंदी बस्ती में आता है। पूरी फिल्म में तीन प्रकार के समाज का चित्रण किया गया है। एक चाँदनी चौक का वह कस्बा जहां से राज बत्रा के बसंत बिहार जाते समय सारे पड़ोसी नम आँखों से राज बत्रा और उसके परिवार की बिदाइ करते हैं। दूसरा बसंत बिहार का मोहल्ला जहाँ बड़े तो क्या बच्चे को भी हिंदी में बात करने की पाबंदी है। तीसरा भारत नगर की गंदी बस्ती है जहाँ की सड़कें कीचड़ से सनी हुई हैं और चिकनगुनिया, टीबी, हैजा और पीलिया जैसे रोगों का स्थायी निवास है। यही वह जगह है जहाँ भारत की अधिकतर जनसंख्या निवास करती है। राशन और पानी के लिए लंबी लाइन में खड़ा होना भारतीयता की पहचान-सी बनती जा रही है। इसमें आम आदमी की कोई पहचान नहीं है। जब राज बत्रा श्याम प्रकाश से उसका नाम पूछता है तो फिल्म का एक संवाद सारे निम्न वर्ग की पहचान को व्यक्त कर देता है- “अरे भाई नाम तो बड़े काम वालों का होता है। हमारा कौन-सा नाम? ढाबे पे लग गया छोटू, पेट निकल गया मोटू, कद बढ़ गया लंबू, समान उठा लिया कुली, पेड़ लगाया तो माली, नहीं तो माँ-बहन की गाली...”

वैसे भारतीय समाज झूठे दिखावे का बहुत शौकीन है। अपने दिखावेपन के इसी भुलावे में हम अपनी संस्कृति और भाषा को खोते जा रहे हैं। हमारा शासक भी यहाँ के शहरों को टोक्यो जैसा दिखाने पर आमदा है। इस दिखावेपन में चाहे उसे देश ही बेचना पड़े इसकी कोई चिंता नहीं है। दिखवापन का नशा लोगों पर इस कदर चढ़ा है कि यदि उनसे कोई हिंदी में बात करता है तो वे इसे अपनी शान के खिलाफ समझते हैं। राज बत्रा और उसका परिवार जब भारत नगर की बस्ती में जाते हैं तो वे इसी दिखावेपन का शिकार होकर फेसबुक पर विदेशों के फोटो पोस्ट करते हैं। यह वह समाज है जो अपने नौकरों की खुशी में ईर्ष्या जनित दुख प्रकट करता है। उन्हें यह बात हमेशा सालती रहती है कि हमारा नौकर कहीं हमसे आगे न बढ़ जाए। यही कारण है कि जब राज बत्रा के नौकर छोटू की लड़की का एडमिशन प्रकृति स्कूल में हो जाता है तो वे दोनों आश्चर्य मिश्रित ईर्ष्या प्रकट करते हैं। जिस खुशी से छोटू अपने बेटी के एडमिशन की खुशी में राज बत्रा के परिवार को मिठाई खिलाने जाता है उसे उतने ही असंवेदनशीलता से दुकान के लिए भेज दिया जाता है। इस फिल्म में जिन दो वर्गों का चित्रण किया गया है उसके प्रतिनिधि राज बत्रा और श्याम प्रकाश हैं। श्याम प्रकाश जिस निम्न वर्ग से आता है वहाँ वह राज बत्रा की बेटी के एडमिशन के लिए कार के आगे कूद जाता है। वहीं राज बत्रा जैसे लोग सरकार द्वारा गरीब बच्चों को शिक्षा का अधिकार के तहत दिये गए अधिकार को भी खा जाते हैं। सम्पूर्ण फिल्म में राज बत्रा जैसे माध्यम वर्ग और श्याम प्रकाश जैसे निम्न वर्ग का बच्चों की शिक्षा के लिए संघर्ष को दिखाया गया है। ‘नया गरीब’ और ‘खानदानी गरीब’ जैसे शब्द फिल्म की संवेदना में हास्य का पुट डालते हुए गंभीर चिंतन को बाध्य करते हैं। फिल्म के पात्र श्याम प्रकाश के द्वारा व्यक्ति की आर्थिक स्थिति और उसका नामकरण पर बहुत ही करारा चोट किया गया है। फिल्म के अंत में राज बत्रा द्वारा यद्यपि सरकारी स्कूल के सुधार का प्रयास किया गया है पर यह प्रयास यथार्थ धरातल पर समाज में कहीं दिखाई नहीं देता है। राज बत्रा का अपनी लड़की को श्याम प्रकाश के लड़के के साथ सरकारी स्कूल में भेजने का कार्य भी प्रशंसनीय है। अब देखना यह है की फिल्म से प्रेरणा लेकर कितने राज बत्रा सरकारी स्कूलों की दशा सुधारकर अपने बच्चों को उसमें पढने हेतु भेजते हैं।

टॉइलेट एक प्रेम कथा (11-8-2017)

भारत सहित अनेक देश में लोग आज भी खुले में शौच का प्रयोग करते हैं। जैसे-जैसे सभ्यता का विकास होता है लोग सुविधानुसार पुराने विचार छोड़कर नए विचार को अपनाते लगते हैं। यही समाज के विकास का क्रम है। इस प्रक्रिया में कभी-कभी नए विचार या संस्कृति को अपनाने में हम शर्म या गर्व का अनुभव कर सकते हैं। भारत में अंग्रेजी शासन के आने पर यहाँ के कुछ लोग उनकी संस्कृति को अपनाकर एक तरफ गौरवान्वित हो रहे थे वहीं कुछ के लिए यह शर्म की बात थी। पर एक समय ऐसा आया कि हम लगभग सभी लोग अपने धोती-कुर्ता को त्यागकर उनके पैंट-शर्ट को अपना लिए हैं। भारतीय समाज एक सहिष्णु समाज है। इतिहास के विकास क्रम में अनेक संस्कृतियों से इसका मिलाप हुआ है। आर्य, शक, कुषाण हूण, इस्लाम, क्रिश्चयन आदि आकर यहाँ पर अपनी संस्कृति का प्रचार-प्रसार किए हैं। इतनी संस्कृतियों से मिलते-मिलते इसकी अपनी संस्कृति खो-सी गई है।

टॉइलेट एक प्रेम कथा सन् 2017 की सामाजिक मुद्दे पर बनी एक श्रेष्ठ फिल्म है। फिल्म की श्रेष्ठता इस बात से भी साबित हो जाती है कि यह माननीय प्रधानमंत्री द्वारा संचालित स्वच्छ भारत अभियान का एक हिस्सा हो सकती है। इस फिल्म के माध्यम से भारतीय समाज के उस रूप का दर्शन करवाया गया है जो आज भी मध्यकाल में जीवन जीने को अपनी शान समझता है। किसी भी समाज का विकास नए मूल्यों की धारणा और पुराने मूल्यों के त्याग पर निर्भर करता है। जो समाज जितना शीघ्र नए मूल्यों को धारण करता है वह उतना शीघ्र विकास के कदम को चूमता है। जो समाज अपनी पुरातन खाल को छोड़ने का जितना ही मोह करता है उसका विकास उतना ही देर से होता है। भारत सहित विश्व में आज भी लोग प्राचीन काल, मध्यकाल और आधुनिक काल में जी रहे हैं। इसमें से बहुत थोड़े लोग हैं जो उत्तर आधुनिक काल में प्रवेश कर गए हैं। यह विचार चर्चित मराठी फिल्म ‘सैराट’ के निर्देशक नागराज मंजुले ने कपिल शर्मा के एक शो में दिया था। टॉइलेट एक प्रेम कथा में जहाँ केशव कुमार और उसकी पत्नी आधुनिक मूल्यों से प्रभावित है वहीं केशव का पिता पुरातन सोच से प्रभावित होकर घर में शौचालय बनवाये जाने का पुरजोर विरोध करता है। उनके लिए जिस घर में हम रहते हैं वहाँ शौच करना संस्कृति को नष्ट करने के समान है। वहीं खुले में शौच करना उन्हें अपनी संस्कृति का संरक्षण प्रतीत होता है। हद तो तब हो जाती है जब अपनी ही बहू को शौच करते हुए वे देख लेते हैं और घबड़ाहट में उसके सामने ही बाइक पर से गिर जाते हैं। जब बहू इस प्रसंग को लेकर शौच के लिए बाहर जाने का विरोध करती है तो वे बड़ी ही निर्लज्जता से यह कहते हैं कि, “बहू ने मुँह तो ढक लिया था न।” इसका यही अर्थ हुआ की शौचालय खुले में मुंह ढककर करने में कोई शर्म की बात नहीं है। शर्म की बात तो शौचालय घर में बनवाने पर है। घर में शौचालय बनवाने से उन्हें अपनी संस्कृति और सभ्यता के नष्ट होने की चिंता है। वे कहते भी हैं- “अब हमारी टॉपर बहू को घर में संडास चाहिए? न संस्कृति की समझ न रीति-रिवाजों का ज्ञान ज्यादा पढ़ाई-लिखाई न फेल कर देती है। फेल।”

टॉइलेट एक प्रेम कथा की शुरुआत ऐसे गाँव से होती है जहाँ की महिलाएँ धुंधलके ही शौच के लिए हाथ में लालटेन लेकर निकल पड़ती हैं। इसमें आगरा के मंदगाँव के एक ऐसे परिवार का चित्रण किया गया है जो न केवल पुरानी मान्यताओं पर जीवन गुजर करता है बल्कि नई का विरोध भी करता है। केशव कुमार का विवाह इसलिए नहीं हो रहा है क्योंकि वह मांगलिक है। इसके लिए उसका विवाह भैंस से करवाया जाता है। इसके बाद भी उसके जीवन में विवाह का योग बनता नज़र नहीं आ रहा है। इसका कारण उसकी कुंडली में दोष होना बताया गया है। ये सब कोई और नहीं बल्कि उसके पंडित पिता ही बता रहे हैं। इसके लिए अब उसे किसी ऐसी लड़की से विवाह करना पड़ेगा जिसके बाएँ हाथ में दो अंगूठा हो। भारत में आज भी मंदगाँव जैसे गाँव अनगिनत संख्या में हैं। ये वो गाँव हैं जहाँ असली भारत बसता है। यदि आपको नए और पुराने सोच के संघर्ष का ताना-बाना देखना हो तो आप भारत के किसी भी गाँव में पधार सकते हैं। फिल्म में केशव के पिता जहाँ आज भी वेद-पुराण के अनुसार जीवन जीने के हिमायती हैं वहीं केशव और जया इसमें बदलाव की मांग करते हुए दिखाई देते हैं। केशव के पिता की राधे सायकिल नाम से दुकान है। वहीं वह भी काम करता है। एक बार रेलगाड़ी में उसे जया जोशी नामक लड़की मिलती है जिसके सायकिल की होम डिलिवरी का आर्डर उसके पिता लिए होते हैं। जब वह सायकिल पहुंचाने घर जाता है तो वहाँ उसे फिर जया से मुलाक़ात होती है। केशव गलती से लड़कों वाली सायकिल ले आता है जबकि जया के पिता जया को सरप्राइज़ देने के लिए लड़की वाली सायकिल का आर्डर दिए रहते हैं। जब केशव अपनी भूल सुधार करने के लिए लेडीज सायकिल लाने की बात करता है तो जया कहती है- “कोई बात नहीं जेन्ट्स वाली आ गई मुझे कोई प्राबलम नहीं मै रख लूँगी।” जब केशव जेन्ट्स सायकिल में बीच में डंडा रहने की बात करता है, जिससे उसे परेशानी हो सकती है तो वह उसको मुँह तोड़ जवाब देती है- “1860 में जब सायकिल बनी थी तब औरतें क्या पहनती थीं- ड्रेस। और उनकी सेफ़्टी के लिए बीच का डंडा हटा दिया गया। और अब क्या पहनती हैं... जीन पैंट। तो डंडे से क्या डर?” जया और केशव के बीच का यह संवाद ही भारतीय सोच के बदलाव का प्रतीक है। लंबे समय तक भारतीय स्त्रियाँ साड़ी पहनती आई हैं। वे आज भी विशेष तौर पर गाँवों में साड़ी ही पहनती हैं। अब फैशन की जरूरत और कार्य करने की सुविधा के अनुसार वे पैंट या जीन पैंट पहनने लगी हैं। हमारे समाज में अभी भी जीन पैंट पहनने वाली लड़कियों को सभ्य नहीं माना जाता है। कुछ खाप पंचायतें और मुल्ले-मौलवी द्वारा अभी भी लड़कियों के जीन पैंट और मोबाइल पर प्रतिबंध लगाने के विचार सुने जा सकते हैं। जया का सायकिल के लिए जीन पैंट पहनने की सुविधा का दिया गया तर्क अकाट्य है। साड़ी में लड़कियां दौड़ भी नहीं सकती हैं जबकि पैंट में वे आसानी से दौड़ सकती हैं। यह हमारे समाज का बदलाव है। आज शायद ही ऐसा कोई शहर होगा जहाँ लड़किया जीन पैंट पहने न दिखाई देती हों। अब यहाँ पर फिल्म में दो सोच वाला परिवार दिखाई देता है। एक केशव के पिता जो उसके मांगलिक दोष को खत्म करने के लिए उसकी शादी भैंस से करवाते हैं, उसके कुंडली दोष के कारण बाएँ हाथ में दो अंगूठे वाली लड़की से ही शादी करने की बात करते हैं। दूसरी जया है जो जीन पैंट पहनकर स्कूल जाती है और घर में शौचालय होना आवश्यक समझती है।

इसी संवाद के बीच दोनों एक दूसरे से प्रभावित होते हैं। इसी बीच होली का त्योहार आ जाता है। यहाँ पर फिल्म में ब्रज की लट्ठमार होली का बड़ा ही मनभावन दृश्य प्रस्तुत किया गया है। बरसाने की लट्ठमार होली आज भी भारत की विशेष परंपरा को सजोए हुए है। फिल्म का यह दृश्य देखकर बरसाने की लट्ठमार होली के गाने के साथ दर्शकों का भी मन झूमने लगता है। यहाँ पर एकबार फिर दोनों की मुलाक़ात होती है। जब वे दोनों एक दूसरे से शादी करने को राजी होते हैं तो बीच में पंडित जी द्वारा कुंडली के दोष निवारण हेतु सुझाया गया दो अंगूठे वाली लड़की की अनिवार्यता बाधा बनती है। इसके लिए वे दोनों एक कृत्रिम अँगूठे का सहारा लेते हैं। यहाँ पर फिल्म में भारतीय समाज के एक और रूप का दर्शन होता है। जब केशव को अपने पिता जी को दिखाने के लिए दो अंगूठे वाली लड़की के कृत्रिम अंगूठा का प्लान सफल होता दिखाई देता है तो वह इस प्लान की सफलता के लिए किसी मंदिर की लेटकर परिक्रमा करता हुआ दिखाई देता है। यही सच्चा भारतीय समाज है जहाँ लोग घर में वैज्ञानिक उत्पाद लाने पर उसकी पूजा धार्मिक विधि से करते हैं। धार्मिक आस्था भारतीय समाज की रगों में बहती है जहाँ वे अपनी प्रत्येक सफलता का श्रेय किसी देवी-देवता को देते हैं। यही कारण है कि वैज्ञानिक विधि से बने किसी पुल का उद्घाटन नारियल फोड़ कर किया जाता है।

जब दोनों का विवाह हो जाता है तो शादी के पहले दिन ही अलसुबह के समय महिलाएँ जया को ‘लोटा पार्टी’ (शौच के लिए लोटा लेकर बाहर जाना) में आमंत्रित करती हैं। घर में शौचालय का न होना जया पर बुरा प्रभाव छोड़ता है। वह खुले में शौच का विरोध करती है। केशव अपने पिता से घर में शौचालय बनवाने की बात करता है तो वे सिरे से नकार देते हैं। जया का गुस्सा उस दिन सातवें आसमान पर चढ़ जाता है जब एक दिन खुले में शौच करते समय उसके ससुर उसे देख लेते हैं। उस दिन से वह खेत में शौच जाना बंद कर देती है। केशव ने समस्या के निदान के रूप में रेलवे स्टेशन पर 7 मिनट रुकने वाली गाड़ी के शौचालय को उपयोग के रूप में निकाला। एक दिन जब जया रेलगाड़ी के शौचालय का उपयोग कर रही थी तो गाड़ी चल देती है। वह उतर नहीं पाती और अपने घर चली जाती है। इसके बाद शौचालय बनवाने के लिए केशव अनेक प्रयत्न करता है पर वह असफल होता है। जब वह शौचालय के लिए पंचायत में आवेदन करता है तो सभी ग्रामीण लोग उसके शौचालय की मांग का विरोध करते हैं। वह जिलाधिकारी के पास शौचालय की मांग को लेकर जाता है तो उन्तीस हजार करोड़ के शौचालय का घोटाला उसके सामने आता है। साथ ही उसे यह भी पता चलता है कि जिनके घर में शौचालय बने भी हैं उसमें वे लोग पान, सिलाई या बाल काटने की दुकान खोल लिए हैं। वह अनेक प्रयत्न करता है पर हर जगह उसे सिर्फ आश्वासन ही मिलता है। उसे शौचालय की इस लड़ाई में असली खलनायक का पता तब चलता है जब जिलाधिकारी उसे बताता है- “विलेन कौन है याद रखना केशव। तुम्हारी लड़ाई सभ्यता से है। समझे और सभ्यता पर विजय पाना आसान नहीं है। कठिन परीक्षा है। इस देश में सभ्यता से लड़ना एक कठिन काम है।” वास्तव में आज भी कुछ लोग अपनी पुरानी सभ्यता को इतना मजबूती से पकड़े हुए हैं कि वे चाहते हुए भी इसे नहीं छोड़ पाते हैं। वे अपनी पुरानी सभ्यता के मोह में इस प्रकार चिपके हैं जैसे लिसलिसे गुड़ से चिपकी हुई मक्खी हो। जिलाधिकारी की इस बात ने उसके मस्तिष्क के द्वार खोल देती है। वह घर में शौचालय बनवा लेता है जिसका उसके पिता पंडित जी घोर विरोध करते हैं। एक दिन जब केशव सो रहा होता है तो उसके पिता कुछ आदमी को साथ लेकर शौचालय तोड़ देते हैं। अंततः जया सभी महिलाओं को साथ लेकर शौचालय के लिए एक बड़ा अभियान छेड़ती है। इसी बीच केशव की दादी फिसलकर गिर जाती है और उसके कमर की हड्डी टूट जाती है। अब वह उस टूटे शौचालय में ही शौच करने को बाध्य हो जाती है। धीरे-धीरे शौचालय के लिए महिलाओं का व्यापक प्रदर्शन और दादी की हड्डी टूटने से पंडित जी का भी हृदय परिवर्तन हो जाता है। अंततः वे घर में बहू के लिए शौचालय की अनुमति दे देते हैं।

कहने के लिए यह फिल्म गाँव में शौचालय न होने की समस्या पर आधारित है पर इसके आड़ में यह उन सभ्यताओं और रूढ़ियों की पोल खोलती है जिसकी वजह से आज भी हमारा समाज आगे बढ़ने से रुक जाता है। फिल्म में एक छोटी कहानी और जोड़ी गई है जिसका जिक्र करना अति आवश्यक है- वह है केशव का अपनी मुँह बोली बहन को उसके प्रेमी के साथ भाग जाने का सलाह देना। भारतीय साहित्य में ऐसा प्रसंग कृष्ण के साथ आता है जब वे अपनी बहन सुभद्रा को अपने सखा अर्जुन के साथ भाग जाने की सलाह देते हैं। वैसे हमारे समाज में अनेक लड़कियाँ अपने प्रेमी के साथ आए दिन भाग जाती हैं जो पकड़े जाने पर ऑनर किलिंग का शिकार होती हैं। 2016 में आई मराठी फिल्म सैराट के प्रेमी युगल को भी लड़की के परिवार वालों द्वारा मार दिया जाता है और दर्शक हाथ मलते हुए सिनेमा हॉल से बाहर निकलते हैं। इस रूप में यह फिल्म समाज के बदलते स्वरूप को स्वीकार करती हुई दिखाई देती है। हिन्दी फिल्मों में अधिकतर भाई को प्रेमी जोड़े के बीच खलनायक के रूप में दिखाया गया है। पर इस फिल्म में मुंह बोला भाई बहन का सहयोगी होता है। फिल्म का कथानक भले ही मथुरा जिला है पर यह सम्पूर्ण भारत की समस्या है। शौचालय की समस्या के बहाने से फिल्म में दो समाज का चित्रण किया है- एक समाज वह जो आधुनिक जरूरत को समझकर अपने पुराने मूल्यों में परिवर्तन करते हुए नए को स्वीकार कर रहा है। इस समाज का प्रतिनिधित्व जया जोशी का परिवार करता दिखाई देता है। दूसरे समाज का प्रतिनिधित्व केशव के पिता पंडित जी करते हुए दिखाई देते हैं जो आज भी ‘मांगलिक’ और ‘कुंडली-दोष’ को स्वीकारते हैं। फिल्म में आगरा के आस-पास की जचेगो, गयो आएगो, होगों आदि ओकारांत वाली बोली के शब्दों का प्रयोग किया गया है। फिल्म में मुख्यतः भारतीय समाज के गाँव का दृश्यांकन बहुत ही सूक्ष्मता से किया गया है। मथुरा के बरसाने की होली, धान का पुआल, गोबर के उपले, फसल से लहलहाते खेत, लोटे में पानी लेकर शौच को जाती हुई स्त्रियाँ, बारात में गाने की धुन पर नाचती हुई भीड़, फूटते पटाखे, दुल्हन का खुशी से अगवानी करती हुई महिलाएं भारतीय समाज के गाँव का बारीकी से चित्रण करती हैं।

न्यूटन (22-9-2017)

भारत में विभिन्न जाति, समुदाय, धर्म और मान्यताओं के लोग रहते हैं। फिल्मों में उनकी इन मान्यताओं या व्यवहारों को किसी-न-किसी रूप में अभिव्यक्ति मिलती रही है। ऐसा कहा जाता है कि भारतीय फिल्मों में भारतीय समाज का दर्शन होता है। एक हद तक यह सही भी हो सकता है। पर भारतीय समाज में जितनी विविधता और विस्तार है ये फिल्में उसके सम्पूर्ण अंश का भी चित्रण करने में सफल नहीं हुई हैं। अधिकतर भारतीय फिल्मों में समाज के कुछ प्रतिशत लोगों का ही चित्रण हो पाया है। समाज का अधिकांश हिस्सा अभी भी इसकी पहुँच से छूटा हुआ है। हाशिये के समाज पर बनने वाली फिल्मों को आज भी उँगलियों पर गिना जा सकता है। यही कारण है कि यह समाज आज भी फिल्मों से अपनी दूरी बनाए हुए है। अधिकतर भारतीय निर्देशक गीत-संगीत से युक्त सौन्दर्य और प्रेम युक्त फिल्में बनाते हैं। वे भारतीय जनता को भी ‘लव इन पेरिस’ या ‘नमस्ते लंदन’ दिखाने में ही अपना इति श्री समझते हैं। यही कारण है कि देश के अन्य समाज और मुद्दों पर फिल्म बनाने में वे पीछे रह जाते हैं। भारत एक ग्रामीण प्रधान देश है। यहाँ की अधिकतर जनता गाँवों में निवास करती है। पर ये निर्देशक गाँव या उसकी समस्याओं पर आधारित फिल्में बनाने से कतराते हैं। भारत में गाँव समुदायों में विभाजित है। फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास मैला आँचल से इसको बेहतर तरीके से समझा जा सकता है। यहाँ एक समुदाय ऐसा है जिस पर बहुत कम फिल्में बनी हैं। वह समुदाय आदिवासी समुदाय है। यह समाज शहरों से दूर प्रकृति की गोद में अपनी संस्कृतियों को सजोए भाग-दौड़ से रहित जीवन जीता है।

न्यूटन फिल्म का आरंभ ही आदिवासी इलाके में चुनाव प्रचार के दौरान नेता की हत्या से होती है। नेता की हत्या करने वाले कौन लोग हैं? वे इस प्रकार नेता की हत्या क्यों करते है? इस हत्या के पीछे किसकी चाल है? फिल्म इन सभी प्रश्नों को दर्शकों को सोचने के लिए छोड़कर आगे बढ़ जाती है। हमारी सरकार इस प्रकार की हत्या करने वालों को नक्सली कहती है और अपने इस अभियान में वह आए दिन नक्सलियों को पुलिस मुठभेड़ में मारती रहती है। इस फिल्म में इस समाज की शांति को भंग करने वाले कारक तत्वों को बहुत ही सूक्ष्मता से फिल्माया गया है। न्यूटन एक ऐसी फिल्म है जो भारत के ऐसे समाज के मताधिकार की वकालत करती है जो सभ्य लोगों द्वारा सदियों से ओझल हैं। इसी भारत में एक ऐसा समाज भी रहता है जो अपने अधिकारों से वंचित प्रकृति की गोद में सारी सुविधाओं से वंचित जीवन गुजर-बसर करता है। इस समाज की गलती यह है कि ये सीधे-सादे लोग सभ्य समाज की भाषा और मक्कारी को न सीखकर अपनी ही बोली और सरलता से पूर्ण जीवन जीते हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं से कोसों दूर ये अपने इलाज की विधि खुद ही तलाशते हैं। इसी उपचार की विधि में मच्छर से बचने के लिए अपने आपको चींटियों से कटवाने की विधि भी सम्मिलित है। इसके साथ ही इस समाज के लोग पेड़ों पर पाई जाने वाली लाल चींटियों की चटनी भी बनाते हैं। नंग-धड़ंग मासूम बच्चे जो ठीक से हिंदी बोल और समझ भी नहीं पाते कुछ लोगों द्वारा नक्सलियों के एजेंट करार दिए जाते हैं। जंगल में घास-फूस के मकानों में रहकर पूर्णतः प्रकृति पर निर्भर रहने वाला यह समाज आज कुछ लोगों की आँखों में गड़ रहा है। इसका कारण उनके क्षेत्रों में पाए जाने वाले अकूत खनिज पदार्थों पर पूँजीपतियों की टेढ़ी नजर है। इसी कारण इनके घरों को जलाकर तथा अन्य कई तरह से डरा-धमकाकर इन्हें उस क्षेत्र से खदेड़ा जा रहा है। फिल्म में इस समाज के लोग कम समय आए हैं पर कम समय में ही आप उनकी स्थिति देखकर सब कुछ समझ सकते हैं। इसमें में इनके फटे कपडों से दिखती खुली पीठ, पोपला मुँह, सूखे चेहरे पर स्पष्ट निर्दोषता देखकर आपको इनके बारे में सोचने को विवश कर देती है। भारत का कानून बने 69 वर्ष हो गए पर इनके अपने कानून 1000 वर्ष पुराने हैं। इनका मुखिया पटेल कहलाता है जो इनके सभी झगड़े का निपटारा करवाता है। उनके साथ सदियों से इन सभ्य जन द्वारा भेदभाव होता आ रहा है। उनके क्षेत्र में वोटिंग कराने गया अधिकारी न्यूटन सैनिक अधिकारियों द्वारा उनके साथ किए गए व्यवहार को देखकर दंग रह जाता है। इस पर वहीं की आदिवासी मलको उन्हें बताती है, “आपने जो आज देखा है वो देखते-देखते हम बड़े हुए हैं।” इस संवाद से आप उनके शोषण और यथास्थिति का अंदाजा लगा सकते हैं। फिल्म के अंत में जंगलों में बड़ी-बड़ी मशीनें लगाकर खुदाई करते हुए दिखाया गया है। इसी खुदाई के कारण ही आदिवासियों को नक्सली सिद्ध कर उनके घरों को जलाया जाता है और यहाँ के खनिजों को लूटकर अफसर लोग शॉपिंग मॉल में खरीददारी करने जाते हैं। यह आदिवासी क्षेत्रों को नक्सली क्षेत्र घोषित करने की सच्चाई है।

एक विमर्श जिसका इस फिल्म में दृश्यांकन किया गया है और जो अभी तक इस लेख में नहीं आया है वह है स्त्री शिक्षा। हमारे देश में स्त्रियों की संख्या आधी आबादी के रूप में चित्रित की जाती है। यह आधी आबादी आज भी शिक्षा, स्वस्थ्य और रोजगार जैसे मूलभूत जरूरतों से वंचित है। जब न्यूटन की सगाई के लिए वे लोग लड़की के घर जाते हैं तो लड़की का पिता न्यूटन से कुछ पूछने के लिए कहता है। न्यूटन जब लड़की से उसके कॉलेज के बारे में पूछता है तो लड़की के बाप द्वारा दिया गया उत्तर हमारे समाज के लोगों का कॉलेजों के बारे में उनकी सोच का पर्दाफास करती है। लड़की का बाप कहता है- “हम न भेजें अपने बच्चों को बदमाशी के अड्डे पे। नाम पढ़ाई का और काम दो नंबर का।” यह हमारे समाज का कॉलेजों के प्रति सोच है। यही कारण है कि समाज में लड़के तो कुछ हद तक पढ़-लिख भी लेते हैं पर लड़कियां अभी भी चूल्हे-चौके के लिए ही उपयुक्त समझी जाती रही हैं। यह सामंती मूल्य ऐसा नहीं है कि पूरी तरह से बदल गया है। अभी भी सिर्फ गिनती की लड़कियाँ ही उच्च शिक्षा में प्रवेश कर पाई हैं। यदि उच्च शिक्षा तक पहुँचने के उनके संघर्ष का जिक्र किया जाए तो अनेकों किताब बन सकती हैं। जब न्यूटन लड़की की उम्र साढ़े सोलह साल सुनकर सगाई करने से मना करता है तो लड़की के पिता का उत्तर होता है- “बेटा नूतन बच्ची ससुराल में बड़ी हो ज्यादा बेहतर है।” इसी सोच के कारण आज भी गाँवों में कम उम्र की लड़कियों की शादी हो जाती है। वे कम उम्र में ही माँ बनने के कारण अपने स्वस्थ्य से सदा के लिए दूर हो जाती है। जब न्यूटन शादी करने से इंकार करता है तो उसके पिता- “ससुर कनट्रैक्टर दामाद अफसर जिंदगीभर घी में डूबा रहेगा बेटा” और उसकी माँ- “मान जा बाबू दस लाख रुपए नगद, एक मोटर साइकिल दे रहे हैं साथ में” का प्रलोभन देते हैं। यह दहेज रूपी दानव भारत से कब खत्म होगा पता नहीं। समाज में लोग जितना ही शिक्षित होते जा रहे हैं उनके दहेज की मांग उतना ही बढ़ती जा रही है। यह हमारे समाज की कटु सच्चाई है। बात यहीं नहीं रुकती। जब न्यूटन लड़की का ग्रेजुएशन होने की मांग करता है तो उसके बाप का जवाब होता है- “क्यों तेरी डिग्री कम है क्या चाटने के लिए; जो उसकी भी चाहिए। ग्रेजुएट लड़की तेरे माँ के पैर दबाएगी?” न्यूटन के पिता की यह सोच कम-ज्यादा हमारे समाज के प्रत्येक सास-ससुर की सोच है। उनके लिए घर में बहू का आना सेविका का आने जैसा है। बेटे-बहू मिलकर माता-पिता की सेवा करें इससे किसी को कोई हर्ज नहीं होनी चाहिए। पर जिस ससुर के सोच के आरंभ में ही सास का पैर दबाने वाली बहू हो ऐसे सास और ससुर के विचारों में व्यापक परिवर्तन की जरूरत है।

भारत एक विविधता से परिपूर्ण देश है। उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक अनेक भाषा-भाषी तथा संस्कृति को मानने वाले लोग रहते हैं। सभी भाषाओं की अपनी क्षेत्रीय फिल्में बनती हैं जो उस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करती हैं। हिन्दी फिल्मों का संसार व्यापक है। यह सम्पूर्ण भारत का प्रतिनिधित्व करती है। इसीलिए इसमें कश्मीर की समस्या से लेकर कन्याकुमारी तक के समाज को दिखाया जाता है। वैसे तो अभी तक भारतीय समाज पर आधारित अनेक फिल्में बन चुकी हैं पर उपरोक्त तीनों फिल्में एक ऐसे भारतीय समाज और संस्कृति का दर्शन कराती हैं जिसका चित्रण बहुत कम हुआ है। इन फिल्मों के अतिरिक्त अनेक ऐसी फिल्में बनी हैं जिसमें भारतीय भाषा, संस्कृति के उज्ज्वल पक्ष को दर्शाया गया है। ‘दिल वाले दुलहनियाँ ले जाएंगे’, ‘कभी खुशी कभी गम’, ‘विवाह’, ‘बागबान’ आदि फिल्मों में भारतीय समाज को वृहद रूप में दिखाया गया है।

हिंदी दलित आत्मकथाओं में अभिव्यक्त समकालीन प्रश्न

बृज किशोर वशिष्ट


एसोशिएट प्रोफेसर, मोतीलाल नेहरू कॉलेज (सांध्य), दिल्ली विश्वविद्यालय

दलित एवं आदिवासी -विमर्श/Dalit and Tribal Discourse

सार : 21वीं सदी के भारत के सामने आर्थिक विषमता, सामाजिक भेदभाव, लिंग भेद, अशिक्षा, बढ़ती जनसंख्या आदि अनेक चुनौतियाँ हैं। अपने विकास के क्रम में आगे बढ़ते हुए कोई भी समाज अपने समय की चुनौतियों से बिना टकराए आगे नहीं बढ़ सकता। साहित्य मानवीय जीवन की समस्याओं से अपनी तरह से जूझता है। साहित्येतिहास में बहुत कम ऐसे अवसर आए हैं जब साहित्य ने अपने समय की चुनौतियों से बचने का प्रयास किया हो। समकालीन हिंदी साहित्य में दलित और स्त्री साहित्य की दो ऐसी धाराएँ प्रवाहित हो रही हैं जो हमारे समाज के मूलभूत और पुरातन प्रश्नों के उत्तर देने का प्रयत्न कर रही हैं। बहुत हद तक दलितों के सामने वही चुनौतियाँ हैं जिनका ग्रामीण और शहरी भारत के निर्धन सामना करते हैं। जीवनयापन की समस्या का सामना प्रत्येक जाति और वर्ग के निर्धन को करना पड़ता है लेकिन साथ ही साथ यह भी तथ्य हमारे सामने है कि अन्य जातियों के मुकाबले दलित जातियों में निर्धनता ज्यादा गहराई से पैठी हुई है। गरीबी के अलावा छुआछूत, आंतरिक सोपानीकरण, नव-ब्राह्मणवाद, रूढि़वादी मानसिकता, भाग्यवाद इत्यादि कुछ ऐसे केंद्रीय समस्याएँ हैं जिन्हें दलित समाज के समग्र विकास में प्रमुख अवरोधक माना जा सकता है। दलित साहित्य उपर्युक्त सभी प्रश्नों को अपनी रचनाओं में स्थान देता है। आत्मकथा दलित साहित्य के प्रमुख विधा है। ओमप्रकाश वाल्मीकि (जूठन), मोहनदास नैमिशराय (अपने-अपने पिंजरे), सूरजपाल चौहान (तिरस्कृत), कौसल्या बैसंत्री (दोहरा अभिशाप) आदि दलित साहित्य के प्रमुख आत्मकथा लेखक हैं। इन सभी रचनाओं में दलित समाज की समस्याओं को भरपूर स्वर मिला है। अभिव्यक्ति के स्तर पर जो तीक्ष्णता और तिक्तता इन रचनाओं में दिखाई देता है वह अन्यत्र दुलर्भ है। समता स्थापना, नए समाज का निर्माण और जाति आधारित भेदभाव का समूल नाश जैसे लक्ष्य को संबोधित करने की दृष्टि से ये आत्मकथाएँ सफल दिखाई देती हैं। इनमें मनुष्य की अवमानना के अनेक रूपों को देख जा सकता है। दलित आत्मकथाओं में अभिव्यक्त मनुष्य का दर्द व्यक्तिगत पीड़ा, एहसास से आरंभ होकर अन्ततः एकताबद्ध इकाई के रूप में परिणत हो जाता है। लेखक के निजी अनुभव अभिव्यक्ति के स्तर से ऊपर उठकर दलित आंदोलन के अस्त्र बनते दिखाई देते हैं।

‘‘कमाल का मुल्क है। हमें तो बात-बात पर यहाँ अचंभा होता है। दूसरी ही दुनिया है। जंगल-पहाड़, नदी-नाले, रेगिस्तान, शहर, खेत, जानवर, पेड-पौधे, लोग, बोलियाँ, बरसातें, हवाएँ सब और ही और हैं।’’ (बाबरनामा, 1525-26)

21वीं सदी के भारत के सामने आर्थिक विषमता, सामाजिक भेदभाव, लिंग भेद, अशिक्षा, बढ़ती जनसंख्या आदि अनेक चुनौतियाँ हैं। अपने विकास के क्रम में आगे बढ़ते हुए कोई भी समाज अपने समय की चुनौतियों से बिना टकराए आगे नहीं बढ़ सकता। साहित्य मानवीय जीवन की समस्याओं से अपनी तरह से जूझता है। साहित्येतिहास में बहुत कम ऐसे अवसर आए हैं जब साहित्य ने अपने समय की चुनौतियों से बचने का प्रयास किया हो। समकालीन हिंदी साहित्य में दलित और स्त्री साहित्य की दो ऐसी धाराएँ प्रवाहित हो रही हैं जो हमारे समाज के मूलभूत और पुरातन प्रश्नों के उत्तर देने का प्रयत्न कर रही हैं।

मराठी दलित साहित्य हिंदी समेत लगभग सभी भारतीय भाषाओं में रचे जा रहे दलित साहित्य का प्रेरणा स्रोत है। मराठी में दलित साहित्य सन् 1960 के आसपास उभरना आरम्भ होता है। लगभग तीस साल बाद 1990 के बाद हिंदी साहित्य में इसका प्रादुर्भाव होता है।

दलित साहित्य उपर्युक्त सभी प्रश्नों को अपनी रचनाओं में स्थान देता है। आत्मकथा दलित साहित्य की प्रमुख विधा है। मोहनदास नैमिशराय (अपने-अपने पिंजरे), ओमप्रकाश वाल्मीकि (जूठन), कौसल्या बैसंत्री (दोहरा अभिशाप), सूरजपाल चौहान (तिरस्कृत), श्योराज सिंह बेचैन (मेरा बचपन मेरे कंधों पर) आदि दलित साहित्य के प्रमुख आत्मकथा लेखक हैं। इन सभी रचनाओं में दलित समाज के समक्ष उपस्थित चुनौतियों को भरपूर स्वर मिला है। अभिव्यक्ति के स्तर पर जो तीक्ष्णता और तिक्तता इन रचनाओं में दिखाई देती है वह अन्यत्र दुलर्भ है। समता स्थापना, नए समाज का निर्माण और जाति आधारित भेदभाव का समूल नाश जैसे लक्ष्य को संबोधित करने की दृष्टि से ये आत्मकथाएँ सफल दिखाई देती हैं। इनमें मनुष्य की अवमानना के अनेक रूपों को देख जा सकता है। दलित आत्मकथाओं में अभिव्यक्त मनुष्य का दर्द व्यक्तिगत पीड़ा के एहसास से आरंभ होकर अन्ततः एकताबद्ध इकाई के रूप में परिणत हो जाता है। लेखक के निजी अनुभव अभिव्यक्ति के स्तर से ऊपर उठकर दलित आंदोलन के अस्त्र बनते दिखाई देते हैं।

बहुत हद तक दलितों के सामने वही चुनौतियाँ हैं जिनका ग्रामीण और शहरी भारत के निर्धन सामना करते हैं। जीवन यापन की समस्या का सामना प्रत्येक जाति और वर्ग के निर्धन को करना पड़ता है लेकिन साथ ही साथ यह भी तथ्य हमारे सामने है कि अन्य जातियों के मुकाबले दलित जातियों में निर्धनता ज्यादा गहराई से पैठी हुई है। गरीबी के अलावा अस्पृश्यता, जाति प्रथा, आंतरिक सोपानीकरण, नव-ब्राह्मणवाद, रूढि़वादी मानसिकता, भाग्यवाद इत्यादि कुछ ऐसे केंद्रीय समस्याएँ हैं जिन्हें दलित समाज के समग्र विकास में प्रमुख अवरोधक माना जा सकता है। हम इनमें से कुछ पर यहाँ विचार कर रहे हैं-

जाति प्रथा

जाति के लिए अंग्रेजी में कास्ट शब्द का प्रचलन है जो पूर्तगाली भाषा के कैस्टाशब्द से बना है। कैस्टा का अर्थ नस्ल या वर्ग होता है। लेकिन भारतीय संदर्भ में जातिशब्द जिस अर्थ में प्रयुक्त होता है उसका पर्याय संसार की अन्य किसी भाषा में नहीं ढूँढ़ा जा सकता। जाति विशुद्ध भारतीय संकल्पना है। भारत में जाति व्यवस्था जितनी जटिल, सुव्यवस्थित और रूढ़ है उसकी तुलना शेष विश्व की किसी भी सामाजिक व्यवस्था से नहीं की जा सकती। भारत में लगभग 3000 जातियाँ हैं। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने जाति प्रथा पर विचार करते हुए लिखा है कि, ‘‘जाति प्रथा ने हिंदुओं को एक समाज बनने से रोका है। इस धर्म में अनेक अंतर्विरोध हैं और हरेक जाति पहले अपना स्वार्थ साधती है। हिंदुओं का साहित्य जातिवाद से भरा पड़ा है। हर प्रकार के सुधारों को रोकने का काम जाति करती है। जाति रूढि़वादियों के हाथ में एक ऐसा शक्तिशाली अस्त्र है जिसका प्रयोग करके वे आवश्यक परिवर्तनों को रोकते हैं।’’1 वर्ण और जाति में भिन्नता होते हुए भी ये एक-दूसरे से गहरे रूप में जुड़े हैं। अक्सर दोनों का समान अर्थ में प्रयोग होता है लेकिन तात्विक रूप से इन दोनों अवधारणाओं में पर्याप्त अंतर है। पांडुरंग वामन काणे के अनुसार, ‘‘वर्ण की धारणा वंश, संस्कृति, चरित्र(स्वभाव) एवं व्यवसाय पर मूलतः आधारित है। इसमें व्यक्ति की नैतिक और बौद्धिक योग्यता का समावेश होता है और यह स्वाभाविक वर्गों की व्यवस्था का द्योतक है। स्मृतियों में भी वर्णों का आदर्श है कर्तव्यों पर, समाज या वर्ग के उच्च मापदंड पर बल देना - न कि जन्म से प्राप्त अधिकारों एवं विशेषाधिकारों पर बल देना। किंतु इसके विपरीत जाति-व्यवस्था जन्म एवं आनुवांशिकता पर बल देती है और बिना कर्तव्यों के आचरण पर बल दिए केवल विशेषाधिकारों पर ही आधारित है।’’2 एम.एन.श्रीनिवास का मानना है कि,-----वर्तमान वास्तविक सोपान में जाति का स्थान बदलने की संभावना रहती है, जबकि वर्ण-व्यवस्था में प्रत्येक वर्ण का स्थान सदा के लिए निर्धारित है। यह सचमुच आश्चर्य की बात है कि वर्ण आदर्श में निहित यथार्थ की विकृति के बावजूद यह अभी तक जीवित रहा आया है।’’3 वर्ण और जाति में सोपानीकरण अपरिहार्य रूप में मौजूद रहता है और दोनों ही में ब्राह्मण सबसे ऊपरी पायदान पर रहता है।

जाति का संबंध पेशे से जुड़ा हुआ है। प्रत्येक जाति का अपना विशिष्ट पेशा है और हर जाति का व्यक्ति अपनी निश्चित सीमाओं के भीतर रहकर काम करता है। जाति की परिभाषा देते हुए रिजले का कथन है, ‘‘जाति ऐसे परिवारों या परिवार समूहों का संग्रह है जिनके समान नाम हों, जो एक ही पुश्तैनी व्यवसाय का प्रदर्शन करते हों और जिन्हें ऐसे सभी दूसरे व्यक्ति, जो इस संबंध में राय देने के अधिकारी हों, एक समांगी बिरादरी मानते हों।’’4 स्पष्ट है कि जाति की आंतरिक संरचना को सुदृढ़ बनाए रखने में उस जाति के पेशे का महत्वपूर्ण योगदान रहता है लेकिन आधुनिक समाज में कई जातियाँ अपने परंपरागत पेशों से बाहर निकलने के लिए संघर्ष कर रही हैं और कुछ काफी हद तक इसमें सफल भी हो गई हैं।

जाति का आधार जन्मना है। किसी का जिस जाति में जन्म होता है वह चाहकर भी उसका त्याग नहीं कर सकता। जन्म के अतिरिक्त किसी जाति में प्रवेश का कोई अन्य मार्ग नहीं है। आदमी अपना धर्म तो बदल सकता है लेकिन जाति नहीं। समकालीन समाज में पेशेगत शिथिलता के कारण कोई अपना आर्थिक स्तर तो सुधार सकता है लेकिन सामाजिक स्तर को सुधारना आज भी संभव नहीं है। इस संदर्भ में शेरिंग का कथन बहुत रोचक है जिसमें वह कहता है कि, ‘‘जाति व्यवस्था में समझौते की गुंजाइश नहीं। अनपढ़ से अनपढ़ हिंदू भी सबसे बुद्धिमान व्यक्ति से इसके नियम मनवा सकता है।’’5 जाति एक ऐसा दिशासूचक यंत्र है जो व्यक्ति के सामाजिक जीवन की दिशा को निर्धारित कर देता है। अगर कोई उस राह से अलग जीवन जीना चाहे तो इसकी छूट जाति-व्यवस्था में नहीं है। उसी राह पर उसे अपनी जीवन साथी, अपने मित्र, अपना काम और अपने धार्मिक रीति-रिवाज मिलते हैं। प्रत्येक जाति अपने सदस्यों की जीवन पद्धति को पूरी तरह नियंत्रित करती है।

हिंदी दलित आत्मकथाएँ डॉ. भीमराव अंबेडकर के जाति व्यवस्था विषयक विचारों से प्रेरणा ग्रहण करती हैं। अपने-अपने पिंजरेमें जाति व्यवस्था से घायल मन की व्यथा मुखर करते हुए मोहनदास नैमिशराय का कथन है कि, ‘‘हम लम्बे समय से अपमान सहते आए थे, पर गुनहगार न थे हम। हम हारे हुए लोग थे जिन्हें आर्यों ने जीतकर हाशिए पर डाल दिया था। हमारे पास अंग्रेजों के द्वारा दिए गए तमगे, मेडल, पुरस्कार न थे। हमारे पास था सिर्फ कड़वा अतीत और जख्मी अनुभव।’’6 एक दूसरा उदाहरण देखिए, ‘‘हमारी जात के योद्धा कितनी बार हारे होंगे, कितनी बार टूट-टूटकर बिखरे होंगे। जब इस देश में आर्य आए होंगे। कितनी यातनाएँ सहनी नहीं पड़ी इस देश के मूल निवासियों को। वही यातनाएँ हज़ारों सालों से आज भी झेल रहे हैं।’’7 इन आत्मकथाओं में लेखकों ने स्थान-स्थान पर जाति प्रथा के दंश को अभिव्यक्त किया है। जूठनमें ओमप्रकाश वाल्मीकि युवावस्था में अपनी प्रेमिका के साथ हुए संवाद का वर्णन करते हुए लिखते हैं कि, ‘‘मैंने साफ शब्दों में कह दिया था कि मैंने उत्तरप्रदेश के चूहड़ा परिवार में जन्म लिया है।

सविता गंभीर हो गई थी। उसकी आँखें छलछला आईं। उसने रुआँसी होकर कहा , ‘‘झूठ बोल रहे हो न?’’ ‘‘नहीं सवि----यह सच है---जो तुम्हे जान लेना चाहिए----’’ मैंने उसे यकीन दिलाया था।

वह रोने लगी थी। मेरा एस.सी. होना जैसे कोई अपराध था। वह काफी देर सुबकती रही। हमारे बीच अचानक फासला बढ़ गया था। हज़ारों सालों की नफरत हमारे दिलों में भर गई थी। एक झूठ को हमने संस्कृति मान लिया था।’’8 हालाँकि इन लेखकों के मन में अपनी जाति को लेकर कोई हीनताबोध नहीं है। वे अपनी रचनाओं में अपनी जाति के भीतर फैली कुरीतियों का खुलकर वर्णन करते हैं।

अशिक्षा

विषमतामूलक समाज के चरित्र की सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि उसमें शिक्षा के स्तर पर भी पर्याप्त विषमता होती है। शिक्षा वर्चस्ववादी वर्ग का सबसे सूक्ष्म अस्त्र होती है। इस क्षेत्र में अपनी श्रेष्ठता कायम रखने का अर्थ जीवन के हर क्षेत्र में कब्जा होना है। यही कारण है कि समाज परिवर्तन के लक्ष्य को लेकर चलने वाले अधिकांश विचारकों ने निम्नवर्ग को इसका महत्त्व समझाने का प्रयास किया है। दलितों की शिक्षा के बारे में सवर्णों की मानसिकता को जूठनमें आए प्रसंग से देखा जा सकता है। झाडू न लगाने देने के पिता के फैसले के बाद लेखक को स्कूल से निकाल दिया जाता है। लेखक का पिता गाँव के बड़े लोगों के पास जब अपने बच्चे की सिफारिश के लिए पहुँचता है तो उनकी तरफ से होने वाली प्रतिक्रिया देखिए, ‘‘जिसका भी दरवाजा खटखटाया यही उत्तर मिला, ‘‘क्या करोगे स्कूल भेजके’’ या ‘‘कौवा बी कबी हंस बण सके’’, ‘‘तुम अनपढ़ गँवार लोग क्या जाणो, विद्या ऐसे हासिल ना होती।’’, ‘‘अरे! चूहड़े के जाकत कू झाडू लगाने कू कह दिया तो कोण-सा जुल्म हो गया’’, या फिर ‘‘झाडू ही तो लगवाई है, द्रोणाचार्य की तरियों गुरु-दक्षिणा में अँगूठा तो नहीं माँगा’’ आदि-आदि।9 एक अन्य प्रसंग में सूरजभान तगा के बेटे बृजेश द्वारा कीचड़ में धकेल दिए जाने पर भी लेखक शिक्षा के प्रति अपनी आस्था को डगमगाने नहीं देता। वह लिखता है कि ‘‘स्कूल के नल पर मैंने हाथ-पाँव धोए थे। किताबें कापियाँ धूप में सुखाई थीं। मेरा मन बहुत दुःखी हो गया था उस रोज। लग रहा था जैसे पढ़ना-लिखना अपने हिस्से में नहीं है। लेकिन पिताजी का चेहरा सामने आते ही उनकी बातें याद आने लगी थीं, ‘पढ़-लिखकर जाति सुधारनी है।’’10 शिक्षा विकास करने का एकमात्र रास्ता है इस तथ्य को एक बार समझ लेने के बाद रास्ते में आने वाली रुकावटों से निपटने में आसानी हो जाती है।

अस्पृश्यता

अस्पृश्यता का सामान्य अर्थ अस्पृश्य या अछूत होने की अवस्था या भाव, धार्मिक और सामाजिक दृष्टियों से किसी अस्पृश्य को न छूने का विचार या भाव’11 होता है। अंग्रेजी में अस्पृश्यता के लिए अनटचेबिलिटीशब्द का प्रयोग किया जाता है। सन् 1931 की जनगणना के अधीक्षक जे.एच. हटन ने जनगणना अधीक्षकों को हिदायत देते हुए लिखा कि, ‘‘ये वे जातियाँ हैं जिनके स्पर्श से स्वर्ण हिंदुओं को स्नानादि कर शुद्ध होने की आवश्यकता होती है। हमारा यह अभिप्राय नहीं है कि इस शब्द को व्यवसायों के संदर्भ में लें। किन्तु इसका संबंध उन जातियों से है जिनको हिंदू समाज में उनकी परंपरागत स्थिति के कारण कुछ अयोग्यताओं का सामना करना पड़ता है- उदाहरणार्थ उन्हें मंदिरों में प्रवेश नहीं दिया जाता या उन्हें पृथक कुओं का इस्तेमाल करना पड़ता है या जिन्हें स्कूलों में अन्य बच्चों के साथ बैठने नहीं दिया जाता और उन्हें भवन से बाहर रहना पड़ता है या जो इसी प्रकार की अयोग्यताओं का शिकार हैं।‘‘12 अस्पृश्यता के आरंभ और विकास के बारे में कोई निश्चित मत नहीं मिलता है। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने 400 ईसा पूर्व से अस्पृश्यता का आरंभ माना है। लेकिन यह तो तय है कि उससे पहले भी अस्पृश्यता किसी न किसी रूप में विद्यमान रही होगी।

अस्पृश्यता के आरंभ पर विचार करते हुए वामन पांडुरंग काणे ने पाँच कारण गिनाए हैं। उन्होंने माना है कि अस्पृश्यता केवल जन्म से ही उत्पन्न नहीं होती बल्कि इसके उद्गम के कई अन्य स्रोत भी हैं। मनुस्मृति को आधार बनाकर उन्होंने पहला कारण बताते हुए लिखा है कि, ‘‘ब्रह्म हत्या करने वाले, ब्राह्मणों के सोने की चोरी करने वाले या सुरापान करने वाले लोगों को जाति से बाहर कर देना चाहिए, न तो कोई उनके साथ खाए, न उन्हें स्पर्श करे, न उनकी पुरोहिती करे और न उनके साथ कोई विवाह संबध स्थापित करे, वे लोग वैदिक धर्म से विहीन होकर संसार में विचरण करें।’’13 दूसरा कारण उन्होंने धार्मिक विद्वेष और घृणा को माना है। ‘‘बौद्धों पाशुपतों, जैनों, लोकायतों, कापिलों(सांख्यों), धर्मच्युत ब्राह्मणों, शैवों एवं नास्तिकों को छूने पर वस्त्र के साथ स्नान कर लेना चाहिए।’’14 अस्पृश्यता का तीसरा कारण उन्होंने व्यवसाय को माना है। ‘‘कुछ लोगों को जो साधारणतः अस्पृश्य नहीं हो सकते थे, कुछ विशेष व्यवसायों का पालन करना, यथा देवलक (जो धन के लिए तीन वर्ष तक मूर्तिपूजा करता है।), ग्राम के पुरोहित, सोमलता विक्रयकर्ता को स्पर्श करने से वस्त्र परिधान सहित स्नान करना पड़ता था।’’15 कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में भी अस्पृश्यता के विधान को चौथा कारण माना जाता था। ‘‘रजस्वला स्त्री के स्पर्श, सूतक में स्पर्श, शव स्पर्श आदि में वस्त्र सहित स्नान करना पड़ता था।’’16 इसका विधान भी मनुस्मृति(5/85) में मिलता है। उपर्युक्त कारणों के अतिरिक्त पाँचवे कारण के रूप में दूसरे देशों के निवासियों मुख्यतः मुसलमान को भी अस्पृश्य माना जाता था। एक समाज को अलग-थलग करने में व्यवसाय सबसे बड़ा कारण बनकर उभरा। कुछ व्यवसायों को निकृष्टता के भाव से देखा जाने लगा। शास्त्रों में ही ऐसा विधान किया गया कि कुछ व्यवसायों को अपनाने पर व्यक्ति को अस्पृश्य मान लिया जाता था। ‘‘स्मृतियों के अनुसार कुछ ऐसे व्यक्ति जो गंदा व्यवसाय करते थे अस्पृश्य माने जाते थे, यथा कैवर्त(मछुआ), मगृयु(मृग मारने वाला), व्याघ(शिकारी), सौनिक(कसाई), शाकुनिक(बहेलिया), धोबी, जिन्हें छूने पर स्नान करके ही भोजन किया जा सकता था।’’17 इन व्यवसायों के अलावा सफाई, चर्मशोधन और श्मशान इत्यादि के कार्यों की गणना भी निकृष्ट व्यवसायों में की गई। उपर्युक्त कथनों से ऐसा प्रतीत होता है कि हिन्दू धर्मग्रंथों ने अस्पृश्यता की ऐसी मजबूत दीवार का निर्माण किया कि उसको पार करके कोई भी सवर्णों की श्रेष्ठता के अभेद्य किले में प्रवेश न कर सके। अस्पृश्यता के कड़े नियमों ने एक बहुत बड़ी जनसंख्या को आर्थिक दृष्टि से विकास करने से वंचित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

यह व्यवस्था मध्यकाल तक आते-आते इतनी रूढ़ हो गई कि ‘‘बहुत सी जातियों को मध्यकाल में कोढि़यों की भाँति बाहर निकलने पर घंटियाँ बजानी पड़ती थीं ताकि सवर्ण हिन्दू सावधान हो जाएँ और उन्हें भूल से स्पर्श न कर लें।’’18 अंग्रेजों के आगमन के बाद भी इस व्यवस्था में उल्लेखनीय सुधार नहीं हुआ। महात्मा गांधी का विश्वास था कि अस्पृश्यता जाति-प्रथा की आंतरिक ऊँच-नीच का परिणाम ही है। 10 फरवरी, 1946 को हरिजन पत्रिका में उन्होंने लिखा कि, ‘‘हिन्दू धर्म में अस्पृश्यता को कोई स्थान नहीं है। अस्पृश्यता हिन्दू धर्म पर लगा एक कलंक है। यदि यह अस्पृश्यता प्रथा न गई तो हिन्दू समाज और हिन्दू धर्म का अस्तित्व संकट में पड़ जाएगा।’’ अस्पृश्यता के धुर विरोधी होने पर भी उन्हें वर्ण-व्यवस्था में पूर्ण विश्वास था। ये इसे आदर्श व्यवस्था मानते थे। गांधी जी का प्रसिद्ध कथन है, 'मैं दुबारा जन्म लेना नहीं चाहता लेकिन अगर मुझे दुबारा जन्म लेना पड़े तो मैं एक अछूत के घर पैदा होना चाहूँगा ताकि मैं उनके दुःखों, तकलीफों और सरेआम बेइज्जती का भागीदार होकर स्वयं को और उन सबको इस दारुण स्थिति से मुक्ति दिला सकूँ। इसलिए मेरी कामना है कि मैं दुबारा जन्म लूँ। मैं ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र नहीं बल्कि अतिशूद्र के रूप में जन्म लूँ।' संविधान में प्रावधान किए जाने से हमारे समाज कुछ इस तरह का भ्रम फैला कि राजनीतिक प्रयासों से समाज में अस्पृश्यता की भावना समाप्त हो गई है। लेकिन यथार्थ के धरातल पर यह सच्चाई नहीं थी। सामाजिक समस्याओं के निवारण में राजनीति एक सीमा तक ही मददगार हो सकती थी। दलित साहित्यकारों की रचनाओं में अस्पृश्यता की घिनौनी तस्वीर को हमारे सामने प्रस्तुत किया गया है। जूठनमें ओमप्रकाश वाल्मीकि अपने अनुभवों को अभिव्यक्त करते हुए लिखते हैं कि, ‘‘अस्पृश्यता का ऐसा माहौल कि कुत्ते-बिल्ली, गाय-भैंस को छूना बुरा नहीं था लेकिन यदि चूहड़े का स्पर्श हो जाए तो पाप लग जाता था। सामाजिक स्तर पर इंसानी दर्जा नहीं था। वे सिर्फ जरूरत की वस्तु थे। काम पूरा होते ही उपभोग खत्म। इस्तेमाल करो दूर फेंको।’’19 ठीक इसी पीड़ा को स्वर देते हुए मोहनदास नैमिशराय लिखते हैं कि, ‘‘हमारी जात के हिस्से में थी तो कंगाली की ऐसी चादर जिसमें से एक के बाद एक संकट झांक रहे थे। संकटों के साथ-साथ हम अस्पृश्यता के भी शिकार थे। उन संकटों से बाहर आने का रास्ता भी न था। मुक्तिद्वार हमारे लिए बंद थे। हम केवल तड़प सकते थे, रो सकते थे, सिसक सकते थे। हमारे भीतर बाहर अजीबोगरीब हाहाकार थे। पर उन्हें सुनने के लिए वहां फुर्सत किसे थी?’’20

आंतरिक सोपानीकरण

दलित आंदोलन और साहित्य के लिए यह बड़े दुर्भाग्य की बात है कि उनके बीच में भी सवर्ण समाज की तरह एक श्रेणीबद्ध जाति व्यवस्था काम करती है। आंतरिक सोपानीकरण और जाति भेद दलितों में एक बहुत बड़ी चुनौती है। 1919 में डॉ. अम्बेडकर ने साउथ बरो आयोग के सामने माँग की था कि अछूतों के लिए अलग मतदाता मंडल बनाए जाने चाहिए। इस घटना को हम दलित आंदोलन का प्रस्थान बिन्दु मान सकते हैं। डॉ. अम्बेडकर के इस कदम के पीछे दलितोद्धार की भावना काम कर रही थी। लेकिन दलित समाज उनकी इस भावना को ठीक से नहीं समझ पाया और वह ब्राह्मणवाद के सोपानीकरण का शिकार हो गया। सन् 1931 की जनगणना के अधीक्षक जे.एच. हटन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक भारत में जाति प्रथामें भारतीय जाति प्रथा के बारे में लिखा था कि, ‘‘भारत में जाति व्यवस्था जितनी जटिल, सुव्यवस्थित और रूढ़ है उसकी मिसाल विश्व के किसी भी भाग में कहीं नहीं मिलेगी। वस्तुतः जब हम गहराई से सोचते हैं तो यही पाते हैं कि यह भारत में ही मिलती है अन्यत्र नहीं।’’21 दलित आंदोलन जिस जातिवाद के विरोध में खड़ा हुआ था वह स्वयं जातिगत अंतर्विरोधों से ग्रस्त हो गया। ये अन्तर्विरोध इस आंदोलन की सतह पर दिखाई भी देने लगे हैं। ऊँच-नीच के भेदभाव को यहाँ सहज ही देखा जा सकता है। वाल्मीकिऔर जाटवजातियाँ एक-दूसरे को हीन दृष्टि से देखती हैं। इसका संकेत कई साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं में दिया है। दलित समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव का मोहनदास नैमिशराय ने विस्तार से वर्णन किया है, ‘‘दलितों में ही जाटव और वाल्मीकि जातियों में संवाद का अभाव तो था ही साथ ही आपस में घृणा और तनाव का वातावरण भी रहता था। कभी-कभी तो मारपीट भी हो जाती थी। दोनों जातियों के व्यवसाय/रहन-सहन/खान-पान तथा धार्मिक परंपराओं में जमीन आसमान का अंतर था। एक जाति के लोग सुअर खाते थे, दूसरी जाति के लोग सुअर देखना भी नहीं चाहते। पर दोनों की आर्थिक स्थिति में भी फर्क था। वाल्मीकि समाज के लोग आर्थिक दृष्टि से कमजोर थे जबकि जाटवों की माली हालत लगभग ठीक-ठाक ही थी। हालाँकि देश को आजादी मिलने तक दोनों ही जातियों के अधिकांश लोग गुलाम जैसा जीवन जीने को बाध्य थे। आजादी के बाद भी पूर्वी उत्तरप्रदेश के कुछ गाँव/कस्बों में यह स्थिति बंधुआ मजदूरों की तरह भी थी। पर दुखद आश्चर्य की बात तो यह भी थी कि वहीं एक जाति दूसरी जाति के साथ गुलामों और जानवरों जैसा व्यवहार करती थी। इसका मुख्य कारण था कि जाटवों में से कुछ जो बौद्ध हो गए थे उन्होंने पूरी तरह से बाबा साहेब के दर्शन को आत्मसात नहीं किया था। और वे उसी वर्ण व्यवस्था-परंपरा तथा जातिभेद को आँख मींचकर मानते थे।’’22 स्पष्ट है कि दलित समाज में भी ब्राह्मणवादी ढाँचे का ज्यों का त्यों अनुसरण किया गया है। इस बात को और अधिक स्पष्ट करते हुए नैमिशराय जी ने लिखा है कि, ‘‘हमारी जात के घरों में भी सफाई करनेवाले/करनेवाली आती थी, जिन्हें अन्य की तरह हम भी अबे ओ भंगी के , अरी ओ भंगन------ आदि-आदि नामों से पुकारने में अपना बड़प्पन समझते थे। उन्हें बात-बात पर गालियाँ भी दे देते थे। हमारे घरों में जब किसी की मृत्यु हो जाती तो मृतक के अन्य कपड़े, सामान आदि उन्हें दिए जाते थे। शादी-विवाहों के अवसरों पर उनकी स्थिति दीनहीनता से भरपूर और भी विचित्र बन जाती थी। जब सभी लोगों का भोजन समाप्त हो जाता था तब तक टोकरा, सिलवर की परात, गिलास आदि लिए वे भिखमंगे की तरह इंतजार करते थे। बीच में उनकी औरतें चिरौरी करतीं और हमें सेठजी, चौधरी, माई-बाप, हजूर आदि-आदि नामों से अलंकृत करतीं। दूसरी तरफ मर्द उन्हें डांटे-फटकारे बिना न रहते। कभी-कभी गालियाँ भी दे देते। वे विवश, भूखे पेट लिए घर बैठे बच्चों को जल्द-से-जल्द जूठन खिलाने के लिए सब कुछ सहन करतीं। असल में इस जूठन में सब कुछ मिलकर गड़बड़ हो जाती थी। वैसे वे अपने टोकरों में वैसे ही समेटतीं कभी-कभी वे चील, गिद्ध और कऊवे बन जाते और जमीन पर पड़ी या बिखरी जूठन को अपनी अंगुलियों से कुरेदतीं। हमारी जात के लोग उन्हें कुत्ता/बिल्ली समझ कर डांटते/फटकारते/तथा भगाते। पर वे वहीं जमीं रहतीं। एक-एक मुट्ठी चावल के लिए घंटों-घंटों खुशामद कर पांवों को हाथ लगातीं। पर उसके अलावा थोड़े साफ स्वच्छ भोजन की भी चाह उन्हें होती। जब सारे लोग भोजन कर लेते, तब उनको थोड़ा-बहुत बांटने का समय आता था।’’23 एक ही समाज की दो जातियों के बीच के फासला इतना अधिक है कि उन दोनों जातियों के लोग एक साथ एक पंगत में बैठकर खाना भी नहीं खा सकते।

निष्कर्ष

भारत के समक्ष वर्तमान चुनौतियों को भली प्रकार से समझने के लिए छठे-सातवें दशक से आज तक विभिन्न भारतीय भाषाओं में लिखे गए दलित लेखकों के जीवन वृतांतों का अध्ययन आवश्यक है। मराठी से आरंभ हुए वृतांतों से प्रेरणा पाकर आज भारत की अधिकांश भाषाओं में आत्मकथा के रूप में समाज के दबे-कुचले वर्ग को अभिव्यक्ति मिल रही है। भारतीय समाज दलित लेखकों के लिए ऐसी विवशता पैदा कर देता है कि उसके सामने अपने यथार्थ की अभिव्यक्ति के अलावा कोई दूसरा रास्ता ही नहीं बचता। अपने भूतकाल को समस्त कारुणिकता के साथ दर्ज़ करवाने की चाह, सामाजिक इतिहास को वर्णित करने की इच्छा, अनुकरणीय जीवन का दस्तावेज़ तैयार करने की अभिलाषा, दर्दनाक मवाद को जड़ से बाहर निकालने की छटपटाहट, अपनी दृढ़ता की अभिव्यक्ति, मनुष्य की कोटि में रखे जाने के लिए संघर्ष, शिक्षा पर एक अस्त्र के रूप में अटल विश्वास, आगे की लड़ाई के लिए अतीत की पुनर्व्याख्या आदि दलित आत्मकथाओं को लिखने के कारण के प्रमुख कारण हैं। आत्मकथात्मक साहित्य के माध्यम से सदियों से दबाए गए दलित-समाज ने अपनी कराहको मुखर किया है। ओमप्रकाश वाल्मीकि के अनुसार, ‘‘दलित रचनाकार अपने परिवेश एवं समाज के गहरे सरोकारों से जुड़ा है। वह अपने निजी दुःख से ज्यादा समाज की पीड़ा को महत्ता देता है। जब वह मैंशब्द का प्रयोग कर रहा होता है तो उसका अर्थ हमही होता है। सामाजिक चेतना उसके लिए सर्वोपरि है।’’24

संदर्भ

1. जाति-पाति तोड़क मंडल के लिए लिखे गए अध्यक्षीय वक्तव्य (1932) का अंश

2. धर्मशास्त्र का इतिहास, भाग-2, वामन पांडुरंग काणे, पृष्ठ-119

3. आधुनिक भारत में सामाजिक परिवर्तन, एम- एन- श्रीनिवास, पृष्ठ-20

4. भारत में जाति-प्रथा, जे-एच- हटन, पृष्ठ-46

5. भारत में जाति-प्रथा, जे-एच- हटन, पृष्ठ-115

6. अपने-अपने पिंजरे, मोहनदास नैमिशराय, भाग 1, पृष्ठ 17

7. वही, पृष्ठ 19

8. जूठन, ओमप्रकाश वाल्मीकि, पृष्ठ 119

9. वही, पृष्ठ 17

10. वही, पृष्ठ 40

11. बृहत् प्रामाणिक हिन्दी कोश, सं.रामचन्द्र वर्मा, ग्यारहवाँ सं. 2004, लोकभारती प्रकाशन, पृष्ठ 78

12. भारत में जाति प्रथा, जे-एच- हटन, पृष्ठ 184

13. धर्मशास्त्र का इतिहास, भाग-1, पृष्ठ 168

14. वही, पृष्ठ 168

15. वही, पृष्ठ 168

16. वही, पृष्ठ 168

17. वही, पृष्ठ 168

18. भारत में जाति प्रथा, जे-एच- हटन, पृष्ठ 117

19. जूठन, ओमप्रकाश वाल्मीकि, पृष्ठ 12

20. अपने-अपने पिंजरे, भाग2, पृष्ठ 25

21. भारत में जाति प्रथा, जे-एच-हटन, पृष्ठ 45

22. अपने-अपने पिंजरे, भाग2, पृष्ठ 67

23. वही, पृष्ठ 67

24. दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र, ओमप्रकाश वाल्मीकि, पृष्ठ 40

संपर्क: 09873559924

हिन्दी दलित आत्मकथाओं में अभिव्यक्त स्त्री जीवन और संघर्ष

अजीत कुमार (शोधार्थी)

गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय, गांधीनगर


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भारतीय समाज पुरूष-प्रधान होने के कारण हमेशा से नारी को दोयम दर्जा देता आया है। इस अर्थ में कहा जा सकता है कि हरेक वर्ग की स्त्रियों के साथ अन्याय हुआ है। यह बात अलग है कि सब कुछ स्वाभाविक ढंग से आत्मसात करना उनके व्यवहार में शामिल हो गया है, फिर भी दलित वर्ग की स्त्रियों की दशा पर विचार किया जाए तो पता चलता है कि उनकी हालत ज्यादा खराब है। अन्यों की अपेक्षा दलित स्त्री अधिक पीड़ित और प्रताड़ित है। वह अस्पृश्यता का शिकार है, निर्धनता उसकी पीड़ा है, वहीं कामकाज के लिए घर से बाहर जाने पर उसकी अस्मत संकट के साये में रहती है। ऐसा नहीं है कि अन्य वर्ग की स्त्रियों के साथ दैहिक अनाचार नहीं होते किंतु दलित स्त्रियों की तरह आर्थिक अभाववश बाहर दूसरों के यहां काम करने जाने की उनकी विवशता नहीं होती, बल्कि वे घर पर रहकर बच्चों के लालन-पालन एवं चूल्हा चौका संबंधी अन्य घरेलू कार्यो में अपना समय व्यतीत करती हैं। इसलिए अनेक प्रकार के बाह्य खतरों से मुक्त रहती हैं। जबकि दलित स्त्रियों के साथ धनाढ्य एवं अन्य दृष्टियों से शक्तिशाली वर्ग के लोग उनकी कमजोरी और बेबसी का फायदा उठाना एवं उसका शोषण करना अपना अधिकार सा समझते हैं। इनके साथ ज्यादती करने में उन्हें भय भी नहीं होता। साथ ही अशिक्षा, निर्धनता और बौद्धिक स्तर पर कमजोर होने के कारण उन्हें घरेलू प्रताड़नाओं का भी सामना करना पड़ता है। बात-बात पर उसे मारा-पीटा जाता है। इन स्थितियों का आत्मकथाओं के अन्तर्गत विस्तृत चित्रण हुआ है। सूरजपाल चौहान की आत्मकथा में दलित वर्ग की स्त्रियों की इस समस्या से संबंधित अनेक मार्मिक उदाहरण आए हैं। इन घटनाओं को उन्होंने बहुत करीब से देखा और महसूस किया है। अपनी आंखों के सामने मां के साथ शारीरिक उत्पीड़न की घटना घटित होना, अस्मत रक्षा के निमित उसका चीख पुकार करना और बालक होने के नाते या किसी भी दृष्टि से अक्षम होने की बेबसी को बर्दाश्त करना कितना कठित होता है, इसे अभिव्यक्त कर पाने में भाषा लाचार सी हो जाती है। इसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है। इस तरह के एक प्रसंग का लेखक ने उल्लेख किया है। जब उनकी मां बीमार थीं और ठाकुरों के वर्चस्व के कारण उनकी ज़्यादती के आगे विवश होकर उन्हें सफाई का काम करने उनके घर पर जाना पड़ा। उस समय मां के बुखार से तपने के कारण सहयोग के लिए लेखक भी गए। घर साफ-सफाई का काम चल रहा था इसी बीच ठाकुर के द्वारा किए गए अप्रिय अपराध का उल्लेख करते हैं कि ‘‘मैं ठाकुर से पहले ही डरा हुआ था, उसकी झिड़की खाकर और सहम गया। मां मना करती रही फिर भी मैं घेर के पीछे कूड़ा उठाने गया। थोड़ी ही देर बाद मुझे मां की चीख सुनाई पड़ी। चीख सुनकर मैं उस ओर दौड़ा। ठाकुर जयसिंह अपने दोनों हाथों से मां को दबोचे हुए था। मां भेड़िये के पंजों में फंसी हाथ-पांव पटक रही थी। मां की हालत देखकर मैं दहल गया था। मां का आंचल खींचकर ठाकुर ने दूर फेंक दिया था। वह अपनी पकड़ और मजबूत करते हुए मां के मुंह से अपना मुंह अड़ाने की कोशिश कर रहा था। मैं था तो बालक ही, लेकिन उस समय मेरा खून खौल उठा।’’1 यहाँ बाद में इस बात की शिकायत करने के लिए पीड़िता बड़े ठाकुर के पास जाती है और खबर पूरी हवेली में फैल जाने से घर में मौजूद अन्य स्त्रीपुरूष भी निकल आते हैं। किंतु पीड़िता को न्याय मिलना संभव नहीं हो पाता बल्कि उल्टे उसीको चरित्रहीन, कुलटा और निम्नजाति की होने का हवाला देते हुए गाली गलौज कर भगा दिया जाता है। एक तरफ बाहर बड़ी दुनिया है जहां स्त्रियां उत्पीड़न का शिकार हैं वहीं घरेलू अत्याचार का भी उन्हें कम सामना नहीं करना पड़ता। इसके कारण एक नहीं अनेक हैं। एक तो वह स्त्री होने के कारण भारतीय समाज व्यवस्था में पुरूषों के बरक्स द्वितीय दर्जे में है, पुरूषों की तुलना में शारीरिक मेहनत की भी उनकी अपनी सीमाएं हैं। घर का मालिकाना हक पुरूषों के हाथों में हैं। वहीं दुनियाभर की ठोकरों से झल्लाया हुआ पुरूष अपना सारा आवेश और आक्रोश बात-बात पर स्त्रियों पर उतारता है। यही वह स्थान है जहां वह हमेशा स्वयं को बड़ा और विजयी महसूस करता है। ऐसे अनेक प्रसंग डॉ. श्यौराज सिंह बेचैन की आत्मकथा में आए हैं। उन्होंने घर पर लड़की और लड़के के बीच आरंभ से ही होने वाले भेदभाव पर प्रकाश डालते हुए लिखते है कि ‘‘हालांकि बहन बड़ी थी, परन्तु पूरे परिवार का लाड़ मेरे प्रति अधिक था। वंशबेल तो लड़के से ही चलती है, शायद इस विश्वास का अतिरिक्त लाभ मुझे अतिरिक्त स्नेह के रूप में मिल रहा था।’’2 हालांकि इस तरह का भेदभाव सभी वर्गों में होता है। लेकिन अपेक्षाकृत अन्य वर्गों के दलित स्त्री या लड़की अधिक प्रताड़ित होती है। लड़की को बचपन से ही उसे लड़की होने का एहसास दिलाया जाता है। यह शिक्षा उसको उसके घर, परिवार, मां, दादी, पिता, भाई, स्कूल, समाज एवं रिश्तेदार समय-समय पर देते रहते हैं। इन सब कारणों की वजह से वह अपने दायरे में सिमट कर रह जाती है। एक तरह से वहीं से उसका शोषण होना प्रारंभ हो जाता है और फिर तो वह उम्रभर इस शोषण की चक्की में पिस्ती रहती है। इसी तरह मां की कारूणिक दशा पर भी श्यौराज सिंह बेचैन ने व्यापक प्रकाश डाला है। पिता की महज तीस वर्ष की अवस्था में ही मृत्यु हो जाने पर उनकी मां की जिस पुरूष के साथ शादी हुई थी। उनके साथ उन्हें तरह-तरह की यातनाएं झेलनी पड़ती थी। इस सन्दर्भ में लेखक लिखता है कि ‘‘सबसे दुखद यह है कि भिकारी अम्मा को लाठी-डंडे, कलाबूत या फरहे (वह लकड़ी जिस पर रखकर चमड़ा काटा जाता था) से मारा-पीटा करता था। वह मेरे और मेरी बहन के बारे में क्यों सोचती है, इस बात को लेकर परेशान की जाती थी। दो-चार महीने पाली रहती तो दस-पांच दिन के लिए नदरौली लौट आती बहन से मिलने के लिए। वह हमें साथ लेकर पैदल ही चल पड़ती थी। मेरी बहन का गांव नदरौली से करीब तीस-चालीस किमी. की दूरी पर था।’’3 श्यौराज सिंह बेचैन ने एक बेबस स्त्री की दयनीय व कारूणिक दशा का मार्मिक चित्रण को सामने लाया है। जिसके साथ दो पुरूष पूरी रात बलात्कार करते रहे। यह घटना उनके लिए काफी पीड़ादायक रही। आत्मकथाओं में अनेक ऐसे प्रसंगों का उल्लेख हुआ है जिनमें दलित-स्त्री की पीड़ादायक जीवन दशा के विविध आयामों का चित्रण हुआ है। इस तरह के प्रसंग संकेत करते हैं कि दलित महिला का जीवन कष्टप्रद है। दलित स्त्री परिवार, समाज, कार्यक्षेत्र आदि विभिन्न स्थानों पर लिंगभेद, जाति आदि कारणों से प्रताड़ित व पीड़ित होती है। घर, परिवार, ससुराल तथा समाज में नारी की स्थिति क्या रही है तथा इन संस्थाओं ने नारी की स्थिति को निर्मित करने में क्या भूमिका अदा की है। इस संदर्भ में मुद्राराक्षस लिखते हैं कि ‘‘स्त्री की हैसियत को दूसरे दर्जे पर बनाए रखने में परिवार नाम की संस्था की भूमिका भी बहुत बड़ी होती है। परिवार जिस वैवाहिक रस्म को सामाजिक स्वीकृति देता है, उस रस्म को प्रमाणिकता धर्मतंत्र से मिलती है और दुनिया के सभी बडे़ धर्मों ने इस रस्म को पुरुषपक्षीय बनाकर रखा है। धर्मतंत्र स्त्री को पुरुष के बराबर का दर्जा कभी नहीं देता। विवाह और परिवार की जो परिकल्पनाएं कीं, उनमें स्त्री पीछे चलने वाली और पुरुष के आर्थिक सामाजिक नियंत्रण में रहने को मजबूर बनायी गयी। यह उत्तराधिकार का सवाल भी इसी परिवार व्यवस्था का एक जरूरी हिस्सा बन कर रह गया। यही वजह है कि जगत्सेठ का बेटा ही जगत्सेठ हुआ, बेटी नहीं।’’4 घर में जकड़कर स्त्री के हक और अधिकार तो छीन ही लिए साथ ही उसकी मनोवांछित इच्छाएं भी मार दी गईं। घर से बाहर के लोगों ने तो स्त्री का शोषण किया ही लेकिन घर के अंदर, उसके नाते रिश्तेदारों तक ने उसको एक मनुष्य की बजाय एक वस्तु या मशीन के रूप में ही अधिक जाना और उसे उत्पीड़ित किया। मध्यकाल ही नहीं आधुनिककाल तक नारी ने यह उत्पीड़न उसके जीवन का हिस्सा मानकर स्वीकार किया। इन पीड़ाओं से गुजरती नारी की पारिवारिक स्थिति का वर्णन करते हुए माताप्रसाद कहते हैं- ‘‘एक घटना मेरे दूसरे लड़के डॉक्टर एसी.पी. भास्कर के पैदा होने के दिन की है। श्रीमती जी ने बैलों के साथ रबी की फसल की दंवाई की। शाम को दंवाई बंद थी। उस दिन नाद में पानी डालने की बारी इन्हीं की थी। इन्होंने कुए से दो बार घड़े से पानी निकालकर नाद में डाला। फिर हिम्मत नहीं पड़ी, जाकर कमरे में लेट गई। शाम को दर्द से परेशान होने लगी तो इन्होंने लड़की शांति से कहा कि अपनी चाची से कह दो सोते समय लालटेन हमारे कमरे में रख दे, लेकिन उसने लालटेन अपने कमरे में रखकर किवाड़ बंद कर लिए। अंधेरे में वह पड़ी थी। उस दिन होलिका दहन था। पड़ोस की दो औरतें होलिका दहन देखने आई, फिर उन्होंने श्रीमती जी को देखना चाहा, वे आई तो देखा, कमरे में बड़ा अंधेरा है। उन्होंने श्रीमती जी को पुकारा, वह बोली, फिर वे दोनों औरतें बड़े जोर से बिगड़ी। तब मेरी मां ने बैठक में जाकर एक दूसरी लालटेन लाकर जलाई।’’5 घर के अंदर होने वाले अत्याचार एवं शोषण आदि को एक स्त्री किस तरह से वहन करती है तथा उसके साथ किस तरह से उसके परिवार में व्यवहार होता है, यह सब यहां स्पष्ट पता चलता है। स्त्री द्वारा किए गए किसी कार्य में चाहे दोष उसका न हो तो भी परिवारजन उसे ही दोषी बताते हैं। एक स्त्री भी दूसरी स्त्री का सहयोग करने की बजाय उसे नीचा दिखाने की सोचती है। यह हर घर में देवरानी-जेठानी का विवाद होता है। इसमें पुरुष मानसिकता की शिकार स्त्रियां इसी तरह की कार्य शैली की अभ्यस्त हो जाती हैं इसलिए ऐसा करती हैं। कहने का तात्पर्य हर स्थिति में स्त्री को दोषी ठहराने की परंपरागत जातिवादी, पुरुषवादी तथा धार्मिक मान्यताएं आज भी चली आ रही हैं।

दलित स्त्री, स्त्री के साथ साथ दलित होने के कारण भी शोषित होती है। तथाकथित उच्च जाति के लोग दलित स्त्री को अपने पैर की जूती समझते हैं। जब चाहे तब उसे रोंद देते हैं। दलित स्त्री ऐसी स्थिति में अपने आपको बहुत असहाय महसूस करती है। रूपनारायण सोनकर दलित महिला के साथ होने वाले शोषण का वर्णन करते हैं कि ‘‘एक बार मैं एक दलित के घर के सामने एक दोस्त से बात कर रहा था। गुंडा इंद्रजीत सिंह वहां से गुजरा। एक खूबसूरत दलित की लड़की घर के अंदर थी। उसकी मां बाहर बैठी थी। गुंडा उसकी मां से बोला-‘आज रात को ट्यूबवैल में अपनी लड़की को भेज देना।’ मैं समझ नहीं पाया। मैंने लड़की की मां से पूछा। उसने रोते हुए सारी बातें बताईं-‘यह इंदरजीत सिंह हफ्ते-पन्द्रह दिन में रोज बिटिया को ट्यूबवैल में रात भर रखता है। सुबह तड़के घर भेजता है। मना करने पर जान से मार डालने की धमकी देता है।’ मैं दंग रह गया कि हमारे गांव में ऐसा भी होता है। कुछ ब्राह्मण भी उसके इस कुकृत्य में शामिल होते हैं। दलित महिला ने मुझे बताया-‘अगर मैं नहीं भेजती हूं तो रात में घर में घुसकर सभी के सामने तमंचे की नोक पर बिटिया को घसीट कर ट्यूबवैल ले जाता है। हम सभी पर लात-घूसों से प्रहार करता है। कभी-कभी हम लोगों को बाहर करके मकान के अंदर ही उसके साथ बलात्कार करता है।’’6 दलित स्त्री के साथ इस तरह व्यभिचार करना सवर्ण वर्ग का पुराना सगल रहा है। इन सबके कारण दलित स्त्री लगभग हमेशा ही शोषित होती रही है। स्त्री की पीड़ा को एक स्त्री ही महसूस कर सकती है। इस संदर्भ में दलित लेखिका अनीता भारती सामाजिक बंधनों में जकड़ी दलित स्त्री के उत्पीड़न को इस तरह बयां करती हैं कि ‘‘दलित नारीवाद मानता है कि दलित स्त्री के प्रति भेदभाव या उनकी हीन स्थिति और उत्पीड़न का कारण उसका दलित व स्त्री होना है। जबकि अन्य स्त्रियों के साथ स्त्री होना ही काफी है। दलित स्त्री होने के कारण ब्राह्मणवादी पितृसत्ता द्वारा सामाजिक हिंसा का क्रूरतम रूप उसके खिलाफ निकलकर आता है। भारतीय नारीवाद में घरेलू हिंसा के खिलाफ जंग छेड़ने की बात हुई, लेकिन सामाजिक हिंसा पर अद्भुत तरीके से मौन साध लिया गया। हैरान करने वाली बात यह है कि भारत में महिला आंदोलन की शुरुआत एक आदिवासी लड़की मथुरा के सामूहिक बलात्कार की घटना के खिलाफ लड़ने से हुई थी। पर बाद में धीरे-धीरे पूरा महिला आंदोलन, महिला साहित्य और उसकी सोच सामाजिक पहलू से हटकर या तो स्त्री के घरेलू और यौन उत्पीड़न के एकांगी दृष्टिकोण में सिमट गई या फिर ‘मैं और मेरी मुक्ति’ में कैद हो गई।’’7 स्त्री को हर जगह ताने सहने पड़ते हैं। सामाजिक संरचना में यह इस तरह से घुलमिल गया है कि हर जगह, हर कोई उसे कुछ न कुछ नसीहत देता ही रहता है। अनेक प्रकार की प्रताड़नाएं एवं शोषण को झेलती हुई दलित स्त्री को उम्र के हर पड़ाव पर संघर्ष करना पड़ता है। वह पीहर से ससुराल जिस व्यक्ति के साथ आती है, गृहस्थी की गाड़ी में यदि वह भी उसका साथ देने की बजाय जब उसका उत्पीडन करने लगे तो उसे अन्य लोग सहारा देंगे यह कैसे उम्मीद की जा सकती है ? घर परिवार से लेकर समाज तक यह स्त्री हमेशा प्रताड़ित, पीड़ित, दमित और शोषित रही है। मानसिक प्रताड़ना के साथ-साथ शारीरिक एवं यौन शोषण से भी अनेक जगह पर अनेक बार दलित स्त्री को प्रताड़ित होना पड़ता है और अपने पवित्र होने की परीक्षाओं से भी उसे अनेक बार गुजरना पड़ा है और पड़ रही है। समाज व्यवस्था में लगे इस तरह के चरित्र हीन दागों को सहन करती हुई स्त्री जब सवाल उठाती है कि उसका शोषण करने वाला एक पुरुष है तो निःसंदेह चिंता जनक स्थिति है।

सामाजिक स्थितियों में दलित स्त्री शोषित होती है। जातिगत भेदभाव में दलितों के द्वारा अपने बर्तन तक न छूने देने वाले तथाकथित उच्च वर्ग के लोग जब दलित स्त्री के जिस्म को छूते हैं तो उनका धर्म या जाति क्यों नहीं भ्रष्ट होती है ? स्त्री के साथ शोषण करने पर इन सवर्ण समाज के लोगों का अपमान नहीं होता, आखिर क्यों ? दलित स्त्री के साथ होने वाले अत्याचार को देखते हुए इस तरह के अनेक प्रश्न खडे़ होते हैं। आत्मकथाओं में लेखकों ने दलित स्त्री के जीवन एवं उसके संघर्ष को प्रस्तुत करके इसी तरह के सवाल खडे़ किये हैं। इस संदर्भ में रूपनारायण सोनकर एक ऐसा ही उद्धरण प्रस्तुत करते हैं कि ‘‘लखना सिंह दरवाजे के अंदर प्रवेश कर गया और अंदर से दरवाजे की कुंडी लगा ली। दुलारी को पकड़कर उसको चूमने-चाटने लगा। दुलारी जोर-जोर से उसको झटका देकर चिल्लाने लगी-‘बचाओ! बचाओ! बचाओ!’ ‘तुझे कोई नहीं बचाएगा। मैं इस गांव का राजा हूं। मैं यहां का शहंशाह हूं। मेरा जिस औरत पर मन आ गया मैं उसको भोगकर छोड़ता हूं।’ दुलारी कांपने लगी और बोली-‘अभी हमारी सुहागरात नहीं हुई है, हमें छोड़ दीजिए।’ गुंडा बोला-‘सुहागरात हम तुम्हारे साथ मना लेते हैं।’ ‘ऐसा पाप मत करिए।’ ‘सुहागरात में पाप कहां होता है ?’ सुहागरात में पुण्य ही पुण्य होता है।’ ‘मुझे अपवित्र मत कीजिए।’ ‘सुहागरात में औरत पवित्र हो जाती है। इससे क्या फर्क पड़ता है कि सुहागरात मैं मनाऊं या जगदंबा तुम्हारे साथ मनाए। दुलारी की जोर-जोर से चिल्लाने की आवाज जोर-जोर से बज रहे नक्कारों की आवाज में दब रही थी। नक्कारों पर जितनी जोर-जोर से डंका पड़ता था नक्कारे से उतनी ही जोर से आवाज निकलती थी। डंडे के जोर के प्रहार से नक्कारा फट कर तख्त से लुढ़क कर जमीन पर गिर पड़ा।’’8 यहाँ सामने आता है कि अनेक स्थितियों में स्त्री की इस बेबसी का लाभ उठाने वाला पुरुष उसे अपनी शारीरिक हवस का शिकार बनाता है। उसे मानसिक एवं शारीरिक रूप से प्रताड़ित करता है। अनेक प्रकार से उसका शोषण करता है। अपनी ताकत और उसकी कमजोरी को दिखाने के लिए तथा अपने वर्चस्व को स्थापित करने के लिए वह उसके साथ अनेक तरह के अनैतिक कार्य करता है। घर से लेकर ससुराल तक दलित स्त्री किस तरह से शोषित और प्रताड़ित होती है, यहां स्पष्ट दिखाई दे रहा है। यह दलित स्त्री के ऊपर होने वाली वह पीड़ा है जिसकी चीत्कार तथाकथित सवर्ण समाज को सुनाई ही नहीं देती। दलित स्त्री अपने परिवार, रिश्तेदार आदि के साथ-साथ समाज में भी अनेक स्तरों पर प्रताडित होती है। चूंकि वह अन्य की अपेक्षा अधिक कमजोर मानी जाती है, इसलिए हर कोई उसे उसी दृष्टि से देखता है और उसकी कमजोरी का लाभ उठाता है। दलित स्त्री के ऊपर होने वाले अन्याय और अत्याचारों को एक बडे़ फलक पर उठाने का काम रूपनारायण सोनकर अपनी आत्मकथा के माध्यम से कर रहे हैं। दलित लेखिका अनीता भारती कहती हैं कि ‘‘पिछले कुछ सालों से देखने में आ रहा है कि दलित महिलाओं पर सामाजिक हिंसा बहुत तेजी से बढ़ रही है, साथ में घरेलू हिंसा की घटनाओं में भी काफी बढ़ोतरी होती जा रही है। जहां एक ओर सामाजिक हिंसा का दायरा उनके साथ बलात्कार करना, निर्वस्त्र घुमाना, उनको शौच खिलाना और धार्मिक व सामाजिक अंधविश्वास के नाम पर उन्हें डायन और चुडै़ल करार देकर सरेआम पत्थरों, लाठी-डंडों से पीट पीटकर मार रहे हैं वहीं दूसरी ओर उनकी इंसानी गरिमा के खिलाफ जातिगत पेशे के नाम पर मैला ढोने जैसी अमानीयता प्रथा से लेकर देवदासी और बेडनी जैसी देह उत्पीड़क परंपराएं चल रही हैं। घरेलू हिंसा के रूप में दलित महिलाओं पर घर में भी अत्याचारों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है।’’9 दलित स्त्री को समाज में अनेक प्रकार की यातनाएं सहनी पड़ती हैं। उसकी देह पर सबकी गिद्ध दृष्टि उसे नोंचने के लिए हर समय तैनात रहती हैं। किस प्रकार दलित स्त्री का शारीरिक शोषण होता है, उसे यहां व्यक्त किया गया है। शिक्षा एक ऐसा हथियार है जिसके माध्यम से वह अनेक तरह की लड़ाईयां लड़ी जा सकती है। लेकिन यह शिक्षा रूपी हथियार स्त्री को दिया ही नहीं जाता है। अशिक्षित होने के कारण दलित स्त्री समाज की परंपराओं, विद्रूपताओं, अनैतिकताओं एवं रूढ़िवादिताओं से लड़ नहीं पाती है। उल्टा उसे यह कहा जाता है कि स्त्री स्वभावगत सहज, दयावान और कोमल होती है। जबकि वास्तविकता यह है कि स्त्री को कमजोर और असहाय बनाया जाता है। जिससे की वह अपने आप को बाद में कमजोर और असहाय महसूस करने लगती है। इन दिनों समाज में समानता का एक नया तुर्रा चल पड़ा है। जिसके अनुसार बहुत से लोग अपनी बातों पर विशेष जोर देकर कह रहे होते हैं कि समय बदल चुका है, जात-पांत, ऊंच-नीच का अब भेदभाव मिट गया है। स्त्री-पुरूष में भी अब समानता है। शिक्षा, चिकित्सा, इंजीनियरिंग, प्रबंधन, प्रशासन, राजनीति और खेलकूद ऐसा कौन सा क्षेत्र है जहां आज नारी की पैठ नहीं है। किंतु इस बात में कितनी सच्चाई है यह किसी से छुपा नहीं है। आज भी जिन गांवों में देश की 70 प्रतिशत आबादी बसती है, वहां जाकर जमीनी स्तर पर देखें तो जातिभेद का पर्दाफाश होता है। वहीं विभिन्न कार्यक्षेत्रों में महिलाओं की प्रतिशत पर जाएं तो उनकी वास्तविक स्थिति का पता चलता है। समाज की वर्तमान विडम्बनापूर्ण स्थिति पर यह गंभीर सवाल है। डॉ. धर्मवीर लिखते हैं कि ‘‘अनीता का मुख्य विषय ‘औरत’ है। अनीता कहती है कि औरत को कभी आजाद नहीं छोड़ना चाहिए। इसे दी गई किसी भी ढील से पुरुष को नुकसान होगा। औरत इस काबिल नहीं है कि इसे इसके हाल पर अकेली छोड़ दिया जाए। यह किसी न किसी के चक्कर में जरूर रहेगी। यह हर मामले में गैर जिम्मेदार बनी रहती है। मैं अनीता के इस कथन की हिंदुओं के शास्त्रों से तुलना कर रहा था। उनमें औरत को पिता, पति या बेटे के नियंत्रण में रखने को कहा गया है।’’10 ये वो ताने हैं जो आम तौर पर लगभग स्त्री के जीवन में उसके बचपन से ही, जब से वो बोलना और चलना भी नहीं सीखती है, तब से ही प्रारंभ हो जाते हैं। चाहे वह पीहर पक्ष में हो या ससुराल पक्ष में हो। वह अपना पूरा जीवनचक्र इन्हीं तानों के इर्द गिर्द गुजारती है। स्त्री; किशोरी, युवती या वयोवृद्ध महिला हो, उसकी अपनी इच्छाओं का कोई महत्त्वव नहीं होता है।

एक बात और महत्त्पूर्ण है कि यह अंकुश पुरुषवादी मानसिकता के तहत स्त्री पर या दलित स्त्री पर लगाया जाता है लेकिन जैसे जैसे स्त्री उम्र के पडाव पर बढ़ती जाती है तो उसके अंदर भी पुरुषवादी मानसिकता घर करने लगती है। फिर वह स्त्री ही स्त्री को टोकती और रोकती है। यह एक बड़ी संघर्षमय लड़ाई है, जो कि एक स्वतंत्र और खुले विचार के लिए अति आवश्यक है। लेकिन दलित स्त्री दोहरे शोषण का शिकार होती है। दलित स्त्री के जीवन में संघर्ष ही संघर्ष नजर आता है। संदर्भित आत्मकथाओं में वर्णित प्रसंगों से आत्मकथाकारों ने समाज में दलित स्त्री के साथ होने वाले शोषण को बहुत ही बेबाके साथ बयां किया है। दलित स्त्री के साथ होने वाले इस तरह के अत्याचार को समाप्त करने के लिए दलित स्त्री को शैक्षणिक एवं आर्थिक दृष्टि से मजबूत होना पडे़गा। लेकिन शैक्षणिक एवं आर्थिक मजबूती की डोर दलित स्त्री के स्वयं के हाथ में नहीं है। इसलिए जो दलित स्त्रियां और दलित पुरुष इस दृष्टि में मजबूत हैं उन्हें पहल करनी पडे़गी। ताकि आगे की दलित स्त्री वाली पीढ़ी को इस तरह के संघर्ष से न गुजरना पडे़। यद्यपि यह सच है कि जीवन, परिवार व समाज को सुचारू रूप से चलाने के लिए स्त्री पुरूष दोनों महत्त्वपूर्ण हैं, सहयात्री हैं और अन्योन्याश्रित भी हैं। सामाजिक संरचना का व्यावहारिक स्तर इन बातों को महज वाग्जाल सिद्ध कर देता है और वास्तविकता यह नजर आती है कि स्त्री की दशा न केवल दोयम है बल्कि पुरूष से वह प्रताड़ित भी है। उसके प्रति मशीनतुल्य वस्तुवादी दृष्टिकोण प्रभावी है। पुरूष के मनोनुकूल निर्देशों का पालन करने में वह कहीं चूक जाती है तब उसके साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता है और वह जागृति के अभाव में अपनी कुंठाओं के साथ सब कुछ बर्दाश्त करने को बेबस रहती है। इन सारी स्थितियों का दलित आत्मकथाओं में बखूबी वर्णन हुआ है। श्यौराज सिंह बेचैन ने विवरण दिया है कि उनके पिता की लगभग तीस वर्ष की आयु में निधन हो जाने पर मां का दो बार पुनर्विवाह हुआ। भिकारी (जिनके साथ अंतिम विवाह हुआ) के भी बच्चे थे, पत्नी गुजर गई थी। दोनों की शादी हुई किंतु भिकारी उन्हें बहुत मारता। डॉ. श्यौराज सिंह बेचैन कहते हैं कि “भिकारी लाल और अम्मा में अक्सर झगड़ा होता था। वे पति-पत्नी एक दूसरे की जरूरत और मजबूरी थे, किन्तु उनके स्वाभाव और संस्कारों में कोई मेल नहीं था। न तो वे एक दूसरे को समझ पा रहे थे और न समायोजन कर पा रहे थे। सप्ताह में छः दिन उनमें झगड़ा ही होता था। भरणपोषणकर्ता होने, घर का मालिक और पुरूष होने के नाते भिकारी मां को तिहरे अधिकार से मारता था।’’11 यहाँ सामने आता है कि सदियों से दलित महिलाओं का जातीय शोषण सवर्णों द्वारा किया जाता रहा है और साथ में दलित समाज, उसके घर-ससूराल एवं उसकी ही जाति के पुरुषों द्वारा भी उसका शोषण किया जाता रहा है। उस शोषण, अन्याय के प्रति आज कुछ दलित महिलाओं ने विद्रोह करना शुरु कर दिया है। इस विद्रोह में, इस पहल में कुछ पिता या पति उसके साथ हैं, तो कुछ नहीं भी हैं। डॉ. मंजू सुमन दलित महिलाओं की पारिवारिक स्थिति को बयां करती हुई कहती हैं - ‘‘दलित स्त्रियों की अपनी पारिवारिक अनेक समस्याएं होती हैं जिन्हे वह अपने सहयोग से सुलझाती हैं। आर्थिक समस्या के लिए वह श्रम करती है, घर से बाहर काम करके वह स्वयं अपने परिवार को सहारा देती है और साथ ही अपनी जरूरत की चीजों की पूर्ति करती है। घरेलू समस्याओं को सुलझाने की अधिक जिम्मेदारी स्त्रियों पर ही होती है, जिसके कारण वह हमेशा घरेलू कार्यों में उलझी रहती है।’’12 श्यौराज सिंह बेचैन जानवरों से भी बुरी तरह मां की पिटाई करने की दशा का चित्रण किया। कारण यह था कि बालक ने पढ़ाई के प्रति ललक होने के कारण चाचा की जेब में से जुए में जीतकर लाए हुए रूपयों में से एक रूपया चुरा लिया था। चोरी का पता चाचा को चल गया और घर में हालत बिगड़ने लग गई। किसी को यह नहीं पता था कि रूपए श्यौराज ने चुराया है और आशंकावश उसकी अनुपस्थिति में मां की बेतहाशा पिटाई की गई। वे जिस दुकान पर किताब के लिए गए हुए थे वहीं थोड़ी दूरी पर चाचा दिखाई दिए तब उन्होंने डर के मारे पैसे को भी नाली में फेंक दिया और फिर उन्हीं के साथ जब घर आए तो पता चला कि मां की बुरी तरह पिटाई की गई है और उनकी हालत बहुत दर्दनाक हो चुकी है। इस संदर्भ में लेखक कहता है कि ‘‘मेरी मां कसाई द्वारा काटी जा रही गाय की तरह चीख रही थी। मां की चीख मुझे कुछ दूर से ही सुनाई पड़ गई थी। मैं दौड़कर उसके पास पहुंचा। उस समय मां गलियारे में पड़ी कराह रही थी। उसकी कमर पर भिकारी ने पहला वार फरहे (वह लकड़ी जिस पर रखकर चमड़ा काटा जाता था) से किया था। उसके बाद डालचंद (देवर) ने भी मां के शरीर पर लाठियां बरसाई थीं। उसने सिर बचाकर मां का सारा शरीर तोड़ दिया था। मां चीखते-कराहते बेहोश हो गई थी। बीरबल बाबा की घरवाली ने मुंह में पानी डाला था। पूरी बस्ती के स्त्री-पुरूष, बच्चे और रास्ते से गुजरने वाले जाट बनिये, बामन, धोबी, अहेरिया और बाल्मीकि सबके सब झुण्ड जमा हो गए थे।’’13 निश्चित रूप से यह अंदाज लगाया जा सकता है कि किसी स्त्री की यह स्थिति उसके किसी अपराध के दुष्परिणाम की नहीं बल्कि उसकी उपेक्षित एवं नगण्य समझी जाने वाली सामाजिक दशा का परिचायक है। किसी भी अपराध के लिए उनके साथ इस तरह का दर्दनाक रूख अपनाया जाना उचित नहीं माना जा सकता। ऐसे बर्ताव स्त्री-पुरूष के संबंधों में सहजता और परस्पर सद्भाव पर प्रश्नचिन्ह ही नहीं लगाते बल्कि यह साबित करते हैं नारी की दशा पुरूष के आगे नगण्य है और वह पुरूष के हाथों प्रताड़ित भी है।

विश्लेषणात्मक रूप से ये सभी प्रसंग नारी की निम्नतम सामाजिक स्थिति के उदाहरण हैं। नारी न केवल घर के बाहर असुरक्षित और भयभीत है बल्कि घर की चारदीवारी के भीतर भी उसे अनेक यातनाएं झेलनी पड़ती हैं किंतु उसकी चीख-पुकार अधिकांशतया घर के भीतर ही दबकर रह जाती है। वह सब कुछ अपनी सामाजिक असुरक्षा, बाल-बच्चों के भविष्य की खातिर और विशेष रूप से अशिक्षा एवं जागरूकता के अभाव में सब कुछ सहन करने पर विवश होती है। आत्मकथाओं के अंतर्गत स्त्री-पुरूष सम्बन्धों के मद्देनजर दलित स्त्री की दुर्दशा का अनेक स्थानों पर विस्तृत और बहुआयामी वर्णन हुआ है।

संदर्भ ग्रन्थ सूची :-

1. सूरजपाल चौहान, संपप्त, पृ. सं.-24

2. श्यौराज सिंह बेचैन, मेरा बचपन मेरे कंधों पर पृ. सं.-13

3. वहीं, पृ. सं.-13

4. मुद्राराक्षस, बीच बहस में-स्त्री, दलित और जातीय दंश, पृ. सं.-108

5. माता प्रसाद, झोपड़ी से राजभवन, पृ. सं.-44

6. रूपनारायण सोनकर, नागफनी, पृ. सं.-70

7. अनिता भारती, समकालीन नारीवाद और दलित स्त्री का प्रतिरोध, पृ. सं.-10

8. रूपनारायण सोनकर, नागफनी, पृ. सं.-75, 76

9. अनिता भारती, समकालीन नारीवाद और दलित स्त्री का प्रतिरोध, पृ. सं.-95

10. डॉ. धर्मवीर, मेरी पत्नी और भेड़िया, पृ. सं.-158

11. श्यौराज सिंह चौहान, मेरा बचपन मेरे कंधों पर, पृ. सं.-56

12. डॉ. मंजू सुमन, दलित महिलाएं, डॉ. मंजू सुमन, पृ. सं.-104

13. श्यौराज सिंह बेचैन, मेरा बचपन मेरे कंधों पर, पृ. सं.-62

रणेंद्र की कहानियों में दर्ज़ आदिवासियों का दर्द

धीरेन्द्र प्रताप सिंह


शोध-छात्र (हिंदी), इलाहाबाद विश्वविद्यालय पता- कक्ष सं. 28, अमरनाथ झा छात्रावास. 211002 संपर्क सूत्र : 09415772386 ई.मेल- dhirendrasingh250@gmail.com

अपने को सभ्य कहने वाले गैर- आदिवासी लोगों के बीच आदिवासी शब्द को लेकर एक ख़ास उत्सुकता हमेशा बनी रहती है. मसलन आदिवासी कैसे होते हैं? क्या खाते हैं? कैसे रहते हैं? क्या वो काले होते हैं? इतना ही नही इस सभ्य समाज के ज्यादातर लोगों का यह भी मानना है कि चूँकि आदिवासी ज्यादातर जंगल में रहते हैं, इसलिए ये लोग नक्सली होते हैं. यह बहुत पिछड़े होते हैं. इनको पहनने और रहने की तमीज़ नहीं होती. ये लोग अशिक्षित होते हैं. ऐसे ही कई सवाल, मनोवृत्तियां और जिज्ञासायें लोगों के जेहन में तैरती रहती है. सभ्य समाज के लोगों को यह नहीं पता की आदिवासी की समाज की नजर में यही सभ्य लोग ‘दिकू’ कहे जाते हैं. दिकू यानि की आदिवासियों का शोषक समाज.

हरिराम राम मीणा का कहना है- जिस तरह आज भारत के गैर- आदिवासी अपने को आदिवासी समाजों से सभ्य और आगे बढ़ा हुआ मानते हैं, ऐसा ही पश्चिम कभी सारे गैर- पश्चिमी समाजों के बारे में मानता था.’ फिर पश्चिम के देशों ने सभ्य और आधुनिक बनाने के नाम पर पूर्वी देशों को किस तरह गुलाम बना कर रखा यह इतिहास के पन्नों में दर्ज़ है.

आदिवासी समाज को परिभाषित करते हुए रमणिका गुप्ता लिखती हैं कि आदिवासी सदियों से ‘बराबरी, भाईचारा और आज़ादी’ को अपने जीवन में जीता आया है. यह सूत्र ही उसकी जीवनशैली का एक आवश्यक हिस्सा है वह सामूहिकता में जीता है, उसकी अपनी एक संस्कृति है- भाषाएँ हैं. वह प्राकृतिक संसाधनों- जल- जंगलों का मालिक रहा है जो आज उससे छीने जा रहे हैं. प्रकृति ही उसके जीवन यापन का साधन रही है.’

ध्यातव्य हो कि आदिवासी समाज के लोगों और उन इलाकों से ही देश को सर्वाधिक मूल्यवान वस्तुएं प्राप्त होती हैं. काष्ठ वस्तुओं के निर्माण में भी आदिवासी समाज का अग्रणी योगदान है. फिर भी तमाम आकड़ों और साहित्य से आदिवासी लोगों और इलाकों की दशा चिंताजनक दिखती है. केदार प्रसाद मीणा द्वारा एक संपादित पुस्तक है ‘आदिवासी कहानियां’. इस संग्रह की भूमिका में उल्लिखित है कि इस समय देश का सबसे अधिक संघर्षरत तबका यहाँ का आदिवासी है. देश की सरकारों और मुख्यधारा के समाज का उनके प्रति जो रवैया देखने को मिल रहा है, सचमुच अमानवीय और भयानक ढंग का क्रूर उदाहरण है.’

इस चिंता और पीड़ा को केंद्र में रखकर अनेक रचनाकारों ने अपनी लेखकीय प्रतिबध्दता जाहिर की है. जिसमें रणेंद्र का नाम उल्लेखनीय है. यह वही रणेंद्र हैं, जिनका उपन्यास ‘ग्लोबल गाँव के देवता’ और ‘गायब होता देश’ साहित्य जगत में खूब सराहा गया. वो इसलिए कि रणेंद्र आदिवासी समुदाय के संकट, संघर्ष और सवालों को निर्भीकता से अभिव्यक्त करते हैं. इनके अभिव्यक्ति का माध्यम न केवल उपन्यास, बल्कि कवितायें और कहानियां भी हैं.

इस लिहाज से इनका अभी तक का एकमात्र कहानी संग्रह ‘ रात बाकी एवं अन्य कहानियां’ पठनीयता, संप्रेषणीयता और सार्थकता की तीनों दृष्टि से बेजोड़ है. इस संग्रह में कुल सात लम्बी कहानियां संग्रहित हैं. जिनमें ‘रात बाकी’, ‘वह बस धूल थी’, ‘रफ़ीक भाई को समझाइये’, ‘चंपा गाछ, अजगर और तालियाँ’, ‘बारिश में भींगती गौरैया’, ‘जल रहे हैं हरसिंगार’ और ‘ठीक बा नू, सायराबानू’ नामक शीर्षक कहानियां हैं. उल्लेखनीय है कि इस संग्रह की लगभग सभी कहानियां ‘हंस’, ‘कथादेश’, ‘बयां’, ‘उत्तरा’, ‘नया ज्ञानोदय’, एवं ‘पल- प्रतिपल’ जैसी पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं. इसके अलावा इनकी कहानियां विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र- पत्रिकाओं में लगातार छप रही हैं.

खैर इनकी कहानियों को पढ़ते हुए लगता है कि कथा लिखने की जो विशेष शैली रणेंद्र ने विकसित की है, वह अन्य से अलहदा है. अन्य से अलहदा इस अर्थ में कि इनकी कई कहानियां टुकड़ों में बंटी हुई है. जो किसी खास अर्थवान पंक्ति के अंतर्गत अपने मुकाम तक पहुँचती है. जैसे ‘रात बाकी’ कहानी की कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार है - ‘नीली झील सी आँखे और जापानी द्वीप’, ‘सिर्फ एक उन्माद था जीवन अनुराग’, ‘गिरता नक्षत्र कालिमा की धार सा’. या ‘चंपा गाछ, अजगर और तालियाँ’ कहानी की पंक्ति- ‘राजधानी : रंगरंग के रिमझिम’, ‘कृष्णमृगी की आखिरी उड़ान’ पंक्तियों से कहानी आगे बढती है.

इनकी कहानियों की विषयवस्तु, भाषा और शैली; एक शोधार्थी के लिए चिंतन का विषय है. वहीं एक सामान्य पाठक के लिए संवेदना के स्तर पर झकझोरने वाली भी है. इन कहानियों के केंद्र में आदिवासी लोग हैं. उनके दुःख और पीड़ा के साथ उनकी जीवटता भी है. उनके हक़-हुकुम की लड़ाइयों के बीच प्रेम के कोमल अतरंग क्षण भी हैं. आदिवासी युवतियों के साहस की मिसाल है. जो जंगल में रहकर पढ़ना और न्याय लेना दोनों जानती हैं. साथ ही गलत का प्रतिकार करने की माद्दा भी रखती हैं. वहीं दूसरी ओर आदिवासी लोगों को और भी हाशिये भी धकेलने हेतु ब्यूरोक्रेसी, पोलिटिशियन, बिल्डर्स और कार्पोरेट्स का गहरा कुचक्र है. पुलिस अधिकारियों की अमानवीय अत्याचार की दास्तान है. कुछ खास लोगों को लाभ पहुँचाने के लिये नियमों की अवहेलना है. विस्थापन की पीड़ा है. समाज के वंचित तबके से ही निकले प्रशासक के द्वारा वंचितों को ही लूटने का किस्सा है. जो यह दिखाता है कि पूँजी और रसूख की हवस व्यक्ति को कितना भी नीचे गिरा सकती है. चाहे वह जिस भी समुदाय या वर्ग का व्यक्ति हो. चाहे वह दक्षिण या वाम के विचारों का पोषक ही क्यों न हो. भ्रष्ट आचार- विचार और सामाजिक व्यवस्था इस तरह का जाल बुनती है अंततः उसमे फंसना ही है.

इस संग्रह की पहली कहानी ‘रात बाक़ी’ (कथादेश : अखिल भारतीय हिंदी कहानी प्रतियोगिता- 2005) प्रथम स्थान प्राप्त कर चुकी है. कहानी के पन्नो से- ‘...अपनी मृत्यु के पूर्व...अपनी ही झोपड़ी की आग में झुलसती असह्य पीड़ा...करूँ चीत्कारों के बीच...चाला पच्चो-पुष्पा की आजी- माँ ने चीखकर शाप दिया था- ‘जो तोहनी के ई बाँध कहियो पूरा ना होई’...आज...वर्षों बीत जाने के बाद भी...कैमूर अंचल का यह दुर्गावती बाँध अधूरा पड़ा है...एकदम अधूरा...अब यह दुर्योग है...या शाप का असर...कौन जाने...’

इस कहानी में आदिवासी इलाकों में तैनात प्रशासकों का काइयांपन, और उनकी पत्नियों एवं उनके स्वयं के आधुनिक जीवन शैली के रोचक किस्से हैं. मुख्य धारा के राजनीतिज्ञों की जाति और वर्ग आधारित बेगैरत और असंवेदनशील निर्णय हैं. मजदूर वर्ग के जनगीत हैं. हिंसा की दिल दहलाने वाली घटनाएँ हैं. इन सबके बीच यह कहानी हाशिये के उन लोगों को प्रेरणा देती है, जो संघर्ष के बूते अपनी वजूद की जमीन तलाश रहे हैं.

हंस पत्रिका के मार्च, 2017 अंक ‘रहस्य- अपराध- वार्ता’ विशेषांक में रणेंद्र की एक कहानी छपी थी- ‘भूत बेचवा’. वैसे तो यह कहानी रहस्य से भरी है. लेकिन इस रहस्य में शामिल हैं- आदिवासी. जिनके भोलेपन का फायदा उठा कर टी.पी त्रिपाठी और उनका ‘त्रिपाठी एंड संस’ दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करता है. नक्सल के नाम पर पुलिस महकमा से सांठ- गांठ करके फ़र्जी इनकाउंटर और हत्या करवाना. यह हत्या शुरू में तो किसी जमींदार के खेत की रक्षा हेतु भूत ख़रीदने से होती है. जिसके फलस्वरूप मोटा पैसा मिलता था. जिसमें शामिल होता है पुलिस महकमा भी. आगे चलकर इसे और भी फायदे वाला धंधा समझकर खूब खेल होता है. इस भूत के खेल में बलि चढ़ते थे, निरीह आदिवासी. कहानी का एक पात्र पांचू जो टी.पी त्रिपाठी का सहयोगी था, कहता है कि पुलिस महकमा का इतना तो फ़ायदा तो था ही कि किसी कमिय जाइत आदमी के सामने गिड़गिड़ाने या रुपया फेंकने की ज़रूरत नहीं. ख़ाली नजर दौड़ते रहिये. सबसे कमजोर, ग़रीब कमियां परिवार पर नजर रखिये. जरुरत के मुताबिक़ उसके घर से जवान लड़के को उठा लीजिये. कभी डकैत- कभी नक्सली के नाम पर ठोंक दीजिये. उसके बाद मेरे जिम्मे छोड़ दीजिये. मजाल की भूत इधर- उधर हो जाए.’

पता नहीं क्यों आदिवासी, गरीब और मजदूर तबका ही पुलिस- प्रशासन के शोषण का शिकार होते हैं. इस व्यथा को रणेंद्र ‘भूत बेचवा’ कहानी में ही दर्ज़ किये हैं. वो कहते हैं की शहर के चौराहों पर गोरे- चिट्टे दिखने वाले, महँगी गाड़ियों से चलने वाले, महंगा कपड़ा पहनने वालों को पुलिस शायद ही कभी रोकती हो लेकिन काले दिखने वाले, मैला- कुचला पहने, गमछा लगाये कोई आदिवासी, मजदूर, गरीब दिख जाए तो उसके गाड़ी और कागज में ढेर सारी कमियां दिखा कर बिना कुछ लिए छोड़ते नहीं. दरअसल इस कहानी में भी यही होता है जब आदिवासी युवक अनिल दा अपने साथी की पत्नी के इलाज हेतु कुछ पैसे लिए शहर में प्रवेश करते हैं. कहानी के हवाले से कि ‘ आदतन आदिवासी अनिल अरुणाभ पन्ना और बहादुर बाखला की बाइक रोक ली गयी. एक सिपाही से अनिल दा उलझ ही रहा था कि दूसरे सिपाही ने कागज पत्तर तलाशने के बहाने डिक्की खोली तो रूपये की थैली पर नजर पड़ गयी. सिपाही जी की बाँछे खिल गई. साले. आदिवासी, कोल-बकलोल के पास एतना रुपया कहाँ से बे? ज़रूर नक्सली सभन का पैसा है. तू लोग कुरियर हो. कहीं पहुँचाने जा रहे हो. बहादुर दा नर्सिंग होम की दवा पुर्जा दिखाते रह गया. गिड़गिड़ाकर, हाथ जोड़कर आॉपरेशन की हड़बड़ी बताई. लेकिन कोई मानने को तैयार नहीं. बहादुर दा को लगा की अब उसकी गोमकाईन और बच्चा बचेंगे नहीं.’

पता नहीं यह कैसा न्याय और कैसी व्यवस्था है जो कमजोर को, आदिवासी को, गरीब पर बेइंतहा जुल्म ढा रही है.

इनकी एक कहानी है ‘वह बस धूल थी’ है. यह कहानी आदिवासी इलाकों के युवक- युवतियों के सामाजिक दायित्वों, उनके संघर्ष, साहस और सफलता की है. तो वहीँ दूसरी ओर आदिवासियों के बीच से ही निकले एक युवक के भ्रष्टता की दास्तान है. यह वर्तमान समय का प्रभाव या अत्यधिक भोग-विलास की लिप्सा का परिणाम कह सकते हैं कि एक युवक जो प्रशासक नियुक्त होकर अपने ही इलाके में आकर ब्यूरोक्रेसी की मोटी मलाई खाता है. अपने ही भाई- बंधुओं पर अत्याचार ढाता है. वह युवक कोई और नहीं उसी हाशिये के समाज का प्रतिनिधित्व करता है जो आज भी अपने वजूद और समता के लिए संघर्षरत हैं.

यह कहानी यह बताती है कि शिक्षा लेना और नौकरी पाना अलग बात है, और मानवीय मूल्यों की रक्षा करना अलग बात. वहीं एक गरीब, लाचार वो भी एक स्त्री के लिए न्याय पाना कितना कठिन है. यह इस कहानी की नायिका ‘सोमा कुजूर’ के माध्यम से जाना जा सकता है. कहानी के अंतिम हिस्से में दर्ज़ है कि- ‘ सोमा कुजूर...एक आदिवासी स्त्री...एक संस्कृति...एक आदिम सभ्यता...ख़त्म हो गई...जैसे...रेड इंडियंस...जैसे डोडो पछी...जैसे एक नदी.’

आज जब कुछ खास धनाढ्य लोग क्वालिटी लाइफ और रंगीन जीवन जी रहे हैं. जब शिक्षा, एनजीओ, पुलिस-प्रशासन, सरकारें, कानून और एक्टिविस्ट निज स्वार्थ में पथ-भ्रष्ट हुए जा रहे हैं. क्रांति एक कमरे के शोर–शराबे और एक खास लुक में ही दब जा रही है. आज जिस तरह फ़र्जी एनकाउन्टर करने और फ़र्जी नक्सली बनाने को लेकर कानूनों का दुरूपयोग हो रहा है. आदिवासी इलाकों में जिस तरह से स्त्रियों के शरीर को कुछ पुलिसिया समूह नरभक्षी भेड़ियों की भांति नोचते, खसोटते हैं. इन बिंदुओं को रणेंद्र अपनी कहानियों में बखूबी में उठाते हैं. रणेंद्र की एक कहानी है ‘चम्पा गाछ, अजगर और तालियाँ’. यह कहानी इन बिंदुओं को पर सिलसिलेवार चर्चा करती है. आदिवासी सन्दर्भ में रणेंद्र इस कहानी में लिखते हैं ‘बहरहाल, बात सेमिनारों- गोष्ठियों की चल रही थी, उनके विषय बहुत गंभीर हुआ करते, जैसे- विस्थापन, पलायन, जल, जंगल, जमीन, आदि-आदि. आयोजक-प्रायोजक थोड़ा ज्यादा गंभीर रहते, यह कहना मुश्किल.’

कुछ आदिवासी इलाकों के लोगों के आजीविका का एक बड़ा माध्यम है तेंदू पत्ता इकट्टठा करना और बीडी बनाना. रणेंद्र उन बीड़ी मजदूरों के अनंत दुःख और बीमारियों के बीच, उन आदिवासियों के हृदय में पलते प्रेम के कोमल भावों को भी अभिव्यंजित करते हैं. ‘ कहते हैं कि कस्बे का जय किसान कोल्ड स्टोरेज सड़े- गले, कच्चे-पक्के आलुओं से भरा रहता और जय जवान सिनेमा हॉल इन हड़ियल बीड़ी वर्करों से. लेकिन बैजंतीमाला, मधुबाला, शर्मिला टैगोर, वहीदा रहमान की अदाओं पर जब हॉल में सीटियाँ बजती, सिसकारी भरी जाती, सीट उछाले जाते तो टी.बी बैक्टीरिया भी घबड़ा जाता. एक पल के लिए ही सही, हार मान लेता. जिन्दगी लम्हों में जीत महसूसती.’

समग्रतः यह की इनकी कहानियां उन तत्वों का विश्लेषण करती है, जो किसी व्यक्ति को लाचार और बेबस करने में मददगार होती है. इनकी कहानियों से गुजरते हुए यह लगता है कि विषम हालातों से भयभीत हुए बिना आज आदिवासी समाज अपने हक़ के लिए लड़ रहा है. रणेंद्र की कहानियाँ व्यवस्थाजन्य खामियों और षड़यंत्रों को उजागर करती है. शोषण के औजारों और काले कारनामों की चिट्ठा खोलती है. विकास के पीछे दबे पाँव खड़े विनाश की सच्चाई को देखती है. यह भी कि आज आदिवासी समाज अपने न्याय के लिए चाहे जितना संघर्ष कर ले, लेकिन उजाला इनके हिस्से में मुनासिब नहीं. क्योंकि समकालीन दौर में राजनीति की बागडोर उन हाथों में है जो हर कीमत पर बस लाभ चाहते हैं. पुलिस और न्याय व्यवस्था उन हाथों से संचालित हो रही है जो अथाह पूँजी के मालिक हैं. रणेंद्र की कहानियां जहां एक ओर इस दौर में जी रहे आदिवासियों के संकट और समस्याओं को दर्ज करती है वहीं दूसरी ओर तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद उनके संघर्ष और साहस को भी प्रस्तुत करती है.

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संदर्भ

हाशिए के स्वर : भारतीय दलित साहित्य

डॉ आम्बेडकर की दृष्टि और दलित साहित्य का अभ्युदय


मूलचन्द्र गौतम

भारतीय समाज प्रारम्भ से ही बहुआयामी और बहुस्तरीय रहा है .उसका ऐतिहासिक विकास किसी भी दौर में एकरेखीय नहीं रहा .इसीलिए उस पर कोई एकमात्र इकहरा निर्णय देना मुश्किल भरा काम है .उसकी जटिल और अनेकान्तवादी संश्लिष्ट संरचना को समझे बिना कोई भारतीय संस्कृति को सम्पूर्ण रूप से समझने का दावा नहीं कर सकता . वाद विवाद और सम्वाद से निर्मित भारत के धर्म ,दर्शन ,इतिहास और साहित्य के मूल में समन्वय की अटूट शक्ति अंतर्निहित है .यही इस देश का राजनीतिक संस्कार और स्वभाव है जो तमाम तरह की असहमतियों ,विवादों के बावजूद इसे टूटने नहीं देता .कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी .

भारतीय समाज ने इतिहास की विकासमान प्रक्रिया में जितने पुनर्जागरण ,नवजागरण और बदलाव झेले हैं वे अंतिम और अनंतिम नहीं हैं .तमाम तरह के यूटोपिया की अवधारणाओं और संभावनाओं की असफलताओं ने भी मनुष्य जाति को अभी निराश नहीं किया है .भारतीय स्वतंत्रता के आन्दोलन में सक्रिय शक्तियों की विविधता ने भी यह प्रमाणित कर दिया है कि गांधीजी के नेतृत्व में भले देश को तथाकथित आजादी मिली हो अंतिम आदमी की सम्पूर्ण आजादी अभी तक बाकी है .बहुसंख्यक वोटतंत्र के लोकतंत्र में ढीले ढाले तरीके से ही क्यों न सही विकास होता ही है . क्रमशः विसंगतियों से समाज मुक्त होने की ओर अग्रसर है .

यह आधुनिक भारतीय राजनीति की अनिवार्य नियति है कि गाँधी जैसे वटवृक्ष के संदर्भों के बिना इस कालखंड में किसी विचारधारा ,दल या व्यक्ति पर बात की ही नहीं जा सकती ,.गाँधी विरोधी इसे विडम्बना कह सकते हैं .यही स्थिति डॉ आम्बेडकर की है . भले ही वर्तमान दलित राजनीति की जरूरतों ने गाँधी और आम्बेडकर को वैचारिक रूप से आमने सामने खड़ा कर दिया है .गाँधी का अछूतोद्धार और अस्पृश्यता विरोध क्या अब अप्रासंगिक हो गया है ?इस पर विचार की जरूरत है .

भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन की मुख्य कांग्रेसी धारा का नेतृत्व करते हुए गाँधी में विरुद्धों के सामंजस्य की अद्भुत क्षमता थी ,जो साम्राज्यवादी शह के चलते मुस्लिम लीग को अंत तक नहीं साध पाई और जिसका परिणाम देश विभाजन के रूप में सामने आया .क्या यह गाँधी की असफलता नहीं थी या गाँधी अपने तथाकथित उत्तराधिकारियों की सत्ता लिप्सा पर निर्णायक रोक लगाने में अक्षम हो गये थे ?

12 नवम्बर की 1930 की पहली गोलमेज कांफ्रेंस के बाद 24 सितम्बर 1933 को सम्पन्न पूना पैक्ट के अंतर्गत किये गये राजनीतिक समायोजन को गाँधी आम्बेडकर सम्बन्धों का प्रस्थानबिन्दु माना जाय तो कहा जा सकता है कि दोनों के बीच यह लव हेट रिलेशनशिप चलती रही अन्यथा देश को पाकिस्तान की तरह द्लितिस्तान का एक विभाजन और झेलना पड़ सकता था . यह गाँधी का वैचारिक रणनीति कौशल था जिसने देश को एक बड़े हादसे से बचा लिया अन्यथा उनके हिन्द स्वराज और रामराज्य को एक और जबरदस्त पराजय का सामना करना पड़ता .

ऋग्वेद के पुरुष सूक्त के ब्राह्मणवादी वर्चस्व के वर्ण व्यवस्थापरक रूपक से मनुस्मृति तक के जड़ और रुढ़िवादी हिन्दू समाज की भेदभावपूर्ण जाति व्यवस्था तक स्त्रियों और दलितों को उनके मानवीय अधिकारों से वंचित रखा गया . इस मायने में मनुस्मृति ने तमाम तरह की विकृतियों और भेदभाव को सांस्थानिक रूप प्रदान किया जिन्हें आज तक भारतीय समाज अनेक रूपों में भुगत रहा है .यज्ञों में विहित हिंसा और कर्मकांडों के अतिवाद के विरुद्ध बुद्ध ने नव धर्म प्रवर्तन करके क्रांतिमार्ग को प्रशस्त किया था लेकिन पुरानी व्यवस्था की जड़ों को उखाड़ना इतना आसान नहीं था . हिन्दू समाज में व्याप्त सती प्रथा ,विधवा विवाह ,बाल विवाह की कुरीतियों और धार्मिक अंधविश्वासों के विरुद्ध बंगाल से पुनर्जागरण शुरू हुआ जो देशभर में फैला लेकिन दलितों के उद्धार के बारे में कुछ नहीं हुआ इसी से दलितों में सवर्ण हिन्दू व्यवस्था के प्रति गहरी घृणा पनपी . मार्क्स ने हीगेल को जिस तरह शीर्षासन कराया उसी तरह की जरूरत भारतीय समाज को थी और है .महाराष्ट्र में ज्योतिबा फुले और डॉ आम्बेडकर ने इस शोषक व्यवस्था के विरुद्ध सैद्धांतिक और व्यावहारिक लड़ाई को आकार दिया जिसे देशव्यापी विस्तार मिला और दलित समाज को एक नई चेतना मिली .दलित लेखन समाज में दबे कुचलों को सम्मान और स्वाभिमान दिलाने का अभियान है .

डॉ आम्बेडकर की अंग्रेजी शिक्षा दीक्षा ने उनकी प्रतिभा को जो चमक दी थी उसका उपयोग उन्होंने बखूबी किया .1946 में हू वेयर द शूद्राज और .1948 में लिखी गयी उनकी किताब द अनटचेबल्स में उनके आधारभूत विचार मौजूद हैं .रिडिल्स ऑफ़ हिन्दुइज्म के बहाने उन्होंने हिन्दू समाज के पाखंडों को गहराई तक समझ लिया था . इससे स्पष्ट होता है कि डॉ आम्बेडकर भारतीय दलित आन्दोलन को गाँधी की तरह केवल सुधारों तक सीमित नहीं रखना चाहते थे बल्कि उसे सवर्ण हिन्दू विरोधी विचार ,राजनीति और धर्म से लैस करना उनका लक्ष्य था .संविधान में तमाम तरह के आरक्षणों की व्यवस्था से उन्होंने दलितों को आम शोषित लोगों से अलग विशेषाधिकारों से लैस किया जो सवर्णों को आज तक खटकता है जिसकी अभिव्यक्तियाँ गाहे बगाहे होती रहती हैं ‘.उनकी दृष्टि में भारतीय दलित मात्र वर्ग- शोषण का ही नहीं ,बल्कि वर्ण- जाति शोषण का भी शिकार रहा है .वर्गीय शोषण के चलते वह निर्धन था और वर्ण –जाति शोषण के चलते अछूत और अन्त्यज.आज भी दलित दूल्हे का घोड़ी पर चढना सामंतों को बर्दाश्त नहीं होता . ‘गाँधी और कांग्रेस के वर्ग और वर्ण चरित्र के चलते रेडिकल डेमोक्रेट डॉ साहब आशंकित थे .इसीलिए वे राजनीति में दलित केन्द्रीयता के पक्षधर थे .प्रतिनिधित्व की कांग्रेसी राजनीति से उनके मोहभंग का यही कारण था .इसीलिए उन्होंने बुद्धिमत्ता से अंग्रेजी राज ,कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच व्याप्त अंतर्विरोधों के मध्य मार्ग में दलितों की सुरक्षित जगह तलाश की .दलित मुक्ति उनका परम लक्ष्य था जिसके बिना उन्हें देश की राजनीतिक मुक्ति भी पसंद नहीं थी .इसीलिए वे कांग्रेसी राज्य की तुलना में अंग्रेजी राज्य की प्रगतिशील भूमिका के प्रति अधिक आश्वस्त थे .यह उनकी व्यावहारिक नीति थी जो आज तक दलित राजनीति को प्रभावित करती है .कोई इससे असहमत हो तो हो उनकी बला से .इसीलिए उन्होंने तमाम अंतर्विरोधों की पर वाह किये बिना हिन्दू धर्म को त्यागकर बौद्ध धर्म स्वीकार किया और इस तरह भी दलितों का मार्गदर्शन किया लेकिन दलित फिर भी जाति मुक्त नहीं हो पाया है भले जाति संघर्ष का रूप बदल गया हो .

वर्तमान दलित राजनीति और अस्मिता पर डॉ आम्बेडकर के व्यक्तित्व और विचारों की गहरी छाप है भले उनके द्वारा स्थापित राजनीतिक दल विखंडित हो चुका हो और सत्ता की मलाई में हिस्से के चलते अवसरवाद तक का शिकार हो लेकिन उनके बिना आज भी सत्ता का ध्रुवीकरण असम्भव है . संकट डॉ आम्बेडकर की मूर्तिपूजा की आड़ में उनके विचारों की उपेक्षा का है .किसी महापुरुष को मिथक में बदलते हुए देखना उसके अंतर्विरोधों की अवहेलना में बदल जाता है .तब उसकी विचारधारा उसी तरह अवरुद्ध हो जाती है जिसके विरुद्ध वह खड़ी हुई थी . बुद्ध के साथ भी यह दुर्घटना हुई थी जिसने उन्हें अवतारों में प्रतिष्ठित कर दिया . गाँधी और डॉ आम्बेडकर के नाम जप के पीछे भी यही मंशा है .राजनीति केवल दलित अल्पसंख्यक जनहित के बजाय प्रतीकों से काम चलाने लगती है .लम्बे समय तक कांग्रेस ने दो चार चेहरों से यही किया. उत्तर प्रदेश में बसपा इसका राजनीतिक नुकसान उठा चुकी है . वर्तमान में दलित राजनीति की बहुजन और सर्वजन तक की यात्रा का श्रेय डॉ आम्बेडकर की व्यावहारिक राजनीति को ही जायेगा . आज सभी राजनीतिक दलों को गाँधी की तरह राजनीतिक इस्तेमाल के लिए आम्बेडकर के नामोल्लेख की मजबूरी है, हे राम वाया रामजी उर्फ़ मूर्तिभंजन सहित .लेकिन इसे इतने भर तक सीमित न कर दिया जाय यह देखने की जरूरत है .यदा कदा दलितों के आरक्षण की समाप्ति और एस सी –एस टी एक्ट में संशोधन की आवाजें यों ही नहीं उठती रहतीं ?

भारतीय साहित्य में हिंदी में निर्गुणी काव्य परम्परा में दलित कवियों की सक्रिय भागीदारी रही है जिसने सगुणवादी समाज और वर्ण –जाति आधारित व्यवस्था के सामने बड़े बड़े प्रश्नचिन्ह खड़े कर दिए थे .कबीर और तुलसी के बीच की बहस किसी भी तरह आधुनिक दलित विमर्श से कम नहीं बल्कि उसकी सशक्त पृष्ठभूमि ही है .बाद में प्रेमचंद ,निराला ,नागार्जुन..... ने हिंदी को दलित जीवन के अनेक मानवीय और विस्तृत आयामों से जोड़ा .यह हीरा डोम की चेतना का ही विस्तार था .भले बाद में दलित संगठनों द्वारा विरोधस्वरूप 31 जुलाई 2004 को रंगभूमि की प्रतियों को जलाया गया .अरुण शौरी ने अति उत्साह में ‘वर्शिपिंग फाल्स गोड्स’ लिखकर डॉ आम्बेडकर की अवमानना की कोशिश की .दलित चेतना इस तरह के अतिवादों के बीच सुरक्षित है ,यही गनीमत है . डॉ आम्बेडकर से प्रभावित समकालीन दलित लेखक किसी तरह भी इन पारम्परिक दलित और दलित सहानुभूति से भरे लेखकों को अपनाना नहीं चाहता . उसे उपदेशों से घृणा है .स्वानुभूति और सहानुभूति के बीच वह स्वानुभूति को ही तरजीह देना पसंद करता है . यही जैसे उसका विशेषाधिकार है .इस संकीर्णता के पीछे कहीं न कहीं सदियों की अमानवीय गुलामी का असुरक्षा बोध और मनोग्रन्थि है जो उन्हें सहज नहीं होने देती . भीम सेना इसी मानसिकता का संगठित हिंसक प्रतिरोध है. इसे केवल साहित्य में आरक्षण की चाह कहकर अवमूल्यित नहीं किया जा सकता .

डॉ आम्बेडकर ने पत्रकारिता और आंदोलनों के माध्यम से महाराष्ट्र में दलित चेतना को धार दी थी लेकिन साहित्य ,संस्कृति के क्षेत्र में उसका प्रभाव काफी बाद में दिखा क्योंकि वहाँ भी दलित समाज में पढ़े लिखे चेतनासंपन्न जागरूक मध्यवर्ग का उदय बहुत बाद में हुआ .हालांकि मराठी में ही दलित साहित्य की सशक्त शुरुआत हुई और बाद में उसका प्रभाव हिंदी में दिखा .दया पवार की आत्मकथा अछूत ने देश भर में धूम मचा दी थी जिसकी तर्ज पर मराठी दलित लेखकों ने आत्मानुभवों का विविध बृहत् संसार खोल दिया था . नामदेव ढसाल ने सत्तर के शुरूआती दशक में डॉ आम्बेडकर द्वारा स्थापित रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया के नेतृत्व के वैचारिक विचलन और अवसरवाद से निराश होकर अमेरिका के ब्लैक पैंथर आन्दोलन से प्रभावित होकर मराठी में दलित पैंथर आन्दोलन शुरू किया था .उनकी कविताओं में में धर्म ,सवर्ण हिंदुत्व जैसे वर्चस्ववादी विचार और संस्थाओं का खुलकर विरोध और घृणा को अभिव्यक्ति मिली थी .मुंबई के रेड लाइट एरिया गोलपीठा में बीता उनका बचपन जिस घृणा और उपेक्षा का शिकार था उसी की अभिव्यक्ति उनकी रचनाओं में हुई . यह डॉ आम्बेडकर का नक्सलवादी विस्तार था जो यह प्रमाणित करता था कि वाम का वर्गवादी विचार उसका सहयोगी हो सकता है . हिंदी पत्रिका संचेतना के दलित विशेषांक से मराठी के दलित लेखन की एक मुकम्मल तस्वीर सामने आई थी .शरण कुमार लिम्बाले की अक्करमाशी की तरह हिंदी में ओमप्रकाश वाल्मीकि की जूठन ,तुलसीराम की मुर्दहिया, शयोराज सिंह बेचैन की मेरा बचपन मेरे कंधों पर और अनेक महत्वपूर्ण आत्मकथाओं ने दलित लेखन में डॉ आम्बेडकर को विमर्श के केंद्र में खड़ा कर दिया . शोषकों के चेहरों को खुलकर नाम दिया गया . दलित समाज के शोषित जीवन के अनदेखे अनछुए पहलू सामने आये .दलित लेखिकाओं ने भी अपनी अलग आवाज बुलंद की .डॉ धर्मवीर ने तो परम्परा और समकालीनता का एक ऐसा सम्पूर्ण दलित भाष्य ही खड़ा कर दिया जिससे राजेन्द्र यादव जैसे दलितों के गैर दलित पुरोधा और झंडाबरदार तक डर गये .दलितों को एक नये सौंदर्यशास्त्र की जरूरत महसूस हुई जो उनकी रचनाओं के साथ न्याय कर सके और उनके पाठ को सम्वेदनशीलता के साथ ग्रहण कर सके .क्योंकि अभी प्रेमचंद की तरह का दलित क्लासिक निर्माण की प्रक्रिया में है . सद्गति का दुखी और निराला का चतुरी चमार अभी तक रुढियों और अन्धविश्वास के कुंडे से जूझ रहा है . स्वयं के लिए दलित के बजाय देश के लिए दलित पर सोचने की उसे फुरसत ही नहीं है .क्या यही प्रतीकात्मक स्थिति विकास की कार्पोरेटी केन्द्रीयता से अलग थलग हाशिये पर फेंक दिए गये अल्पसंख्यकों ,आदिवासियों की भी नहीं है ?

मुझे आज भी 25 फरवरी 1996 का वह दिन याद है जब देहरादून में ओमप्रकाश वाल्मीकि को परिवेश सम्मान दिया गया था और मेरे सहपाठी मलखान सिंह के काव्यसंग्रह सुनो ब्राह्मण का लोकार्पण किया गया था .इस अवसर पर आयोजित हिंदी क्षेत्र में दलित लेखन व चिन्तन की चुनौतियाँ और सीमाएं पर केन्द्रित परिसंवाद में काशीनाथ सिंह , ओमप्रकाश वाल्मीकि ,डी प्रेमपति,अनिल चमडिया ,बेचैन इत्यादि लेखकों के बीच मूल बहस स्वानुभूति और सहानुभूति पर ही सिमट कर रह गयी थी .लगता था जैसे दो सेनाएं अपने अपने तर्कों और शस्त्रों से लैस होकर युद्धरत थीं .कोई किसी से हार मानने को तैयार नहीं .लगता है वह युद्ध आजतक जारी है . यों भी अभी तक गैर दलित लेखक खुले मन से दलित लेखन को नहीं अपना सके हैं और स्वयं दलित लेखकों की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और शिविरबद्धता ने उनका खुद का कम नुकसान नहीं किया है . क्या यह दलितों में नव ब्राह्मणवाद का खतरा है ? घृणा की जूते मार राजनीति से दलित सत्ता में नहीं आ सकते .दलित नेतृत्व को कोई न कोई गठ्बन्धन करना ही पड़ेगा . कांशीराम ने इस मायने में डॉ आम्बेडकर की विचार परम्परा को व्यवहार में लाकर हिंदी प्रदेशों की सवर्ण केन्द्रित राजनीति में चमत्कार पैदा कर दिया . उत्तर प्रदेश में बसपा की सत्तासीन राजनीति के भटकाव के दौर में भी मध्यवर्गीय दलित लेखकों और लेखन को कोई खास लाभ नहीं हुआ जबकि सांस्कृतिक रूप से उसकी बेहद जरूरत थी .जाहिर है कि स्वार्थपरक व्यक्तिवादी दलित राजनीति और लेखन एक दूसरे के पूरक होने के बजाय परस्पर उपेक्षित रहे हैं .इस मायने में दलित लेखन राजनीति के आगे चलने वाली सचाई के बजाय पीछे घिसटने को बाध्य क्यों है .?उन्हें भी सर्वजन के बीच स्थापित होने के लिए व्यापक ऐतिहासिक दलित लेखन की परम्परा को स्वीकार करना पड़ेगा अन्यथा तो उनका लेखन साहित्य में आरक्षणवाद का शिकार होकर नितांत एकांगी और तात्कालिक होने को अभिशप्त होगा ?अब साहित्य में दलित लेखकों को एक्टिविस्ट होकर दलित शुद्धतावाद के बजाय क्रांतिकारी दलित चेतना के विस्तार के लिए इसके अवांगार्द- अग्रिम दस्ते के रूप में मीडिया के तमाम रूपों को भी जोड़ना पड़ेगा .तभी समाज में व्यापक बदलाव संभव हो पायेगा .


भारतीय दलित साहित्य और संस्कृति की यह विडम्बना ही कही जायेगी कि मराठी और हिंदी को छोडकर उसकी सम्पूर्ण भारतीय छवि को लेकर अभी तक कोई उल्लेखनीय दस्तावेजी कार्य नहीं हुआ है .साहित्य अकादमी जैसी संस्थाओं को यह कार्य शीघ्रातिशीघ्र करना चाहिए .

(साहित्य अकादमी ,दिल्ली द्वारा 14 अप्रैल 2018 को आयोजित परिसंवाद में पठित आलेख )

@ शक्तिनगर,चन्दौसी ,संभल 244412 मोबाइल -9412322067

EMAIL –moolchand.gautam@gmail.com

दलित महिलाओं के अभावग्रस्त जीवन में पोषक तत्वों का महत्व

ममता श्रीवास्तव,

पी.एच.डी,

गृह विज्ञान विभाग,


ल।न।मि।वि।वि।, दरभंगा

मानव जीवन के उचित विकास हेतु पोषक तत्वों से भरपूर भोजन की आवश्यकता होती है। किन्तु भारत जैसे देश में जहाँ गरीबी, अशिक्षा तथा स्वस्थ्य की स्थिति इतनी ख़राब है उस स्थिति में समाज के उपेक्षित तथा हाशिए के लोगों की स्थिति का मूल्यांकन हम स्वयं कर सकते हैं। ऐसे लोग स्वास्थ्य सम्बन्धित शिक्षा, स्वच्छता की बातें तथा पोषण सम्बन्धित जानकारियों से अंजान रहते हैं। इसका कारण है दलित लोगों के पारिवारिक, आर्थिक तथा समाजिक स्थिति में विद्यमान गिरावट। इसे लगातार सरकारी तथा गैर सरकारी उपक्रम द्वारा समाप्त करने की कोशिश की जा रही है। लेकिन आज भी स्थिति बहुत अच्छी नहीं हुई है। कुछ लोग जो उसी समाज में थोड़े जागरूक हो गए हैं और आगे बढ़ गए हैं वे स्वस्थ्य और पोषण के क्षेत्र में धीरे-धीरे अपनी पहुँच बना रहे हैं। लेकिन समाज के वैसे लोग जो आज भी मलीन, गंदी तथा झोपड़ीनुमा स्थान में निवास करते हैं उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति उतनी अच्छी नहीं होती कि वे भर पेट भोजन ठीक से खा पाएं। ऐसी स्थिति में पोषण का संतुलन अपने खान-पान में बनाए रखना एक चुनौती भरा विषय है।

दैनिक जीवन में प्रयोग करनेवाले भोजन में भी पोषण के तत्वों को संतुलित रखने की कोशिश की जा सकती है। हमारे पर्यावरण में ऐसे बहुत सारे भोज्य पदार्थ मौजूद हैं जो हमारे स्वास्थ्य की स्थिति को ठीक रख सकते हैं। प्रश्न यह उठता है कि पोषण तत्व किसे कहते हैं तथा वैसे खाद्य पदार्थों की पहचान कैसे की जाए जिसमें निम्नलिखित पोषक तत्व शामिल है-प्रोटीन, कर्बोहाइड्रेड, वसा, विटामिन, खनिज तथा लवण आदि। इसके साथ यह भी ध्यान रखने की आवश्यकता है कि मानव शरीर में आवश्यक मात्रा के आधार पर पोषक तत्वों का संतुलन कैसे रखा जा सके! पोषक तत्वों को आवश्यक मात्रा के आधार पर दो भागों में बाँटा गया है। समाज के गरीब तथा दलित समाज के लोग उपलब्ध संसाधनों के आधार पर अपने जीवन में पोषक तत्वों की पूर्ती कर सकते हैं। इसका वर्णन नीचे किया जा रहा है।

I. अधिकता वाले पोषक तत्व-इसमें कर्बोहाइड्रेड, प्रोटीन तथा वसा आते हैं। शरीर के उचित विकास में इन पोषक तत्वों की अधिक आवश्यकता होती है।

II. न्यूनता वाले पोषक तत्व-इसमें खनिज, लवण और विटामिन आते हैं। ये भी शरीर के विकास हेतु बहुत महत्वपूर्ण हैं। किन्तु शरीर को इसकी कम मात्रा में आवश्यकता होती है।

अधिकता वाले पोषक तत्व:-

प्रोटीन-शरीर की बढोत्तरी तथा विकास के रख-रखाव के लिए प्रोटीन की बहुत आवश्यकता होती है। इसके प्रमुख स्रोत हैं विभिन्न किस्म की दालें, सोयाबीन, मटर, लोबिया, राजमा, बादाम, और दूध तथा इससे बनें पदार्थ, मांस, मछली तथा अंडे आदि भी इसमें शामिल हैं।

कर्बोहाइड्रेड-शरीर को शक्ति प्रदान करता है। यह सभी किस्मों के अनाजों में जैसे- गेंहू, मक्का, जौ, चावल, साबूदाना, ज्वार-बाजरा आदि में पाया जाता है। यह जमीन के भीतर पाए जानेवाली सब्जियों में भी पाया जाता है जैसे, आलू, शलजम, शकरकंद, चुकंदर आदि में प्रचुर मात्रा में मिलता है। इसके अतिरिक्त यह शहद, गन्ना, शक्कर, गुड़, खजूर, अंगूर तथा अन्य फल तथा दूध भी इसके प्रमुख स्रोत हैं।

वसा-शरीर को सबसे अधिक ऊर्जा प्रदान करता है। यह सरसों, नारियल, मूंगफली, टिल, बादाम, सूखे मेवे आदि में बहुतायत मात्रा में पाया जाता है। इसके अलावा मछली, चर्बी, अंडे, घी, मलाई, दूध, मख्खन आदि में यह प्रचुर मात्र में पाया जाता है।

न्यूनता वाले पोषक तत्व:-

कैल्शियम-यह दांतों और हड्डियों के विकास के लिए बहुत आवश्यक होता है। दूध एवं दूध से बने स्रोत इसका सर्वोत्तम स्रोत हैं। इसके अतिरिक्त सहजन, पालक, हरी पत्तीदार सब्जियां, मेथी का साग, पत्ता गोभी, शलजम, सूखा नारियल एवं रागी इसके मुख्य स्रोत हैं।

लौह तत्व-यह शरीर में खून बनाने के लिए अति आवश्यक है। यह अनीमिया से भी बचाव करता है। हरी पत्तेदार सब्जियां, चना, दालें, केला, चिवड़ा, गुड़, रागी, मांस,अंडे, सूखे मेवे इसके मुख्य स्रोत हैं।

विटामिन ए-आँखों की अच्छी रोशनी के लिए यह अतिआवश्यक है, यह गाजर, मटर, पालक, केला, पपीता, आम, सेब, नारंगी, टमाटर, गोभी तथा अन्य हरी पत्तेदार सब्जियों एवं पीले फलों में होता है। इसके अलावा दूध, मठ्ठा, घी, मक्खन, अंडे, मछली क तेल इसके स्रोत हैं।

विटामिन बी-सम्पूर्ण अनाज, हरी साग, सब्जियां, दाल दूध, अंडे, मांस, मछली, मोंगफली, अंकुरित चना, मटर आदि में यह अधिक मात्रा में पाया जाता है।

विटामिन सी-यह रसदार फल जैसे आंवला, अमरुद, नीम्बू, संतरा, टमाटर, अंगूर और हरी साग सब्जियों जैसे चौलाई साग, पत्ता गोभी, सहजन की पत्ती, धनियाँ पत्ती आदि में पाया जाता है। अंकुरित अनाज विटामिन सी के उत्तम स्रोत हैं।

विटामिन डी-हड्डियों और दांतों की मजबूती के लिए यह अति आवश्यक है। हमारे शरीर को प्राथमिक रूप विटामिन डी सूर्य की रोशनी से मिलती है। इसके अतिरिक्त यह दूध, दही, मक्खन, मछली और ताजे फल भी इसके महत्वपूर्ण स्रोत हैं।

उपरोक्त वर्णन तो पोषण के तत्वों और इसके स्रोत से सम्बंधित हैं किन्तु समाज के वैसे लोगों तक यह जानकारी कैसे पहुंचाई जाए जो जागरूक तथा शिक्षित नहीं हैं। हमारे देश में स्वास्थ्य और पोषण की स्थिति अभी भी चिंताजनक बनी हुई है पर इसमें भी विभिन्न कारणों से महिलाओं के पोषण व स्वास्थ्य का संकट आज भी विद्यमान है। घर- परिवार के बीच रहते हुए अन्य परिजनों का ध्यान रखने वाली महिला स्वयं के प्रति ही लापरवाह होती जाती है। घर वाले भी महिला की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को गंभीरता से नहीं लेते हैं। महिला स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही का नतीजा है कि भारत में मातृ-मृत्यु दर नेपाल, श्रीलंका जैसे कम विकसित देशों से भी अधिक है। महिलाओं की भूमिका को बच्चे को जन्म देने व उनका पालन-पोषण करने तक ही सीमित माना जाता है। श्रम के समाज-वैज्ञानिक विभाजन में बच्चों व घर के प्रति महिलाओं का उत्तरदायित्व अधिक होता है। शिक्षा, गतिशीलता व सूचना तक उनकी पहुंच कम होती है। विशेषरूप से दलित महिलाओं को परिवार तथा समाज के तीहरे शोषण से गुजरना पड़ता है। ऐसी स्थिति में स्वास्थ्य के क्षेत्र में उनकी पहुँच को कैसे बढाया जाए, यह एक चुनौती भरा प्रश्न है।

स्वास्थ्य देखभाल व सुविधाओं का उपयोग करने के लिए उनके पास वित्तीय संसाधनों का अभाव होता है। सरकार द्वारा स्वास्थ्य की सुविधाएं जन-जन व गांव-गांव तक सुचारू रूप से पहुंचाने के उपरांत ही महिलाओं के स्वास्थ्य में उत्तरोत्तर वृद्धि संभव है। गर्भ के दौरान, प्रसव के समय अथवा उसके कुछ दिन पश्चात दम तोड़ती नारी एक मानवीय त्रासदी है। यह वह समय होता है, जब महिलाओं को अतिरिक्त देखभाल और पोषण आहार की आवश्यकता होती है। परंतु ऐसे समय में भी महिलाओं को जरूरत अनुसार पोषण नहीं मिल पाता है, लिहाजा महिला के शरीर में पोषण तत्वों की कमी बढ़ती है। आंकड़ों के अनुसार हमारे देश में करीब 70 प्रतिशत सामान्य महिलाओं और 75 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं में खून की कमी देखी गई है। गर्भावस्था के दौरान केवल 37 प्रतिशत महिलाओं को उचित देखरेख मिल पाती है। पिछले कुछ समय से सरकार द्वारा स्वास्थ्य सुविधाओं के क्षेत्र में प्रयास किए जा रहे हैं। लेकिन आज भी अतिपिछड़े वर्ग के लोगों की स्वास्थ्य की स्थिति में अधिक सुधार नहीं हुआ है।

किशोर लड़कियों में अनीमिया (खून की कमी) के बढ़ते मामलों को देखते हुए स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने 10-19 वर्ष के बच्चों को सप्ताह में एक बार आयरन और फोलिक एसिड की खुराक देने की व्यवस्था की है। विद्यालयों के अंदर और बाहर 3 करोड़ से अधिक बच्चे इस कार्यक्रम का लाभ उठा चुके हैं। इसके साथ ही विभिन्न आयु वर्ग के बीच आयरन की कमी और अनीमिया की रोकथाम और उसके इलाज के लिए आयरन प्लस पहल शुरू की गई है। इसके अंतर्गत भयंकर अनीमिया से पीडि़त 6 महीने से लेकर 10 वर्ष तक के बच्चों, 10 से 19 वर्ष के किशोर-किशोरियों, गर्भवती और स्तनपान कराने वाली माताओं और प्रजनन के लिए तैयार 15 से 45 वर्ष की महिलाओं को आयरन और फोलिक एसिड की खुराक देने के साथ-साथ उनके लिए चिकित्सा संबंधी व्यवस्था भी की गई है।

यद्यपि हमारे समाज में लड़कियों के साथ पोषण और स्वास्थ्य में अभी भी कमोबेश भेदभाव किया जाता है, जो कि चिंता का विषय है। कुछ वर्ष पूर्व दिल्ली में एक लड़की की सड़क दुर्घटना में हुई मृत्यु पर ट्रिब्यूनल ने मुआवजा देने से यह कहते हुए इंकार कर दिया था कि लड़की की मौत पर कैसा मुआवजा? वह तो स्वयं माता-पिता पर बोझ थी। हालांकि बाद में इस घटना पर हुए विवाद में फैसला वापस ले लिया गया पर इस घटना ने नारी को लेकर समाज की सोच को फिर एक बार उजागर किया।

आज भारतीय समाज में महिलाओं का स्वास्थ्य धीरे-धीरे ही सही किंतु उसमें सुधार हो रहा है और सकारात्मक दिशा की ओर बढ़ रहा है। राष्ट्र की स्वास्थ्य प्रणाली में महिलाओं की सेहत संबंधी समस्याओं को मातृ स्वास्थ्य के अंतर्गत रखा गया हैं 15-40 आयुवर्ग की महिलाओं को जैविक रूप से कमजोर माना जाता है क्योंकि उन्हें गर्भावस्था का अतिरिक्त जोखिम भी बना रहता है। भारत में मातृ मृत्यु दर 167 प्रति लाख है यद्यपि महिला स्वास्थ्य की हालत कई वजह से कमजोर है। हमारे राष्ट्र में कुपोषण आज भी महिलाओं के कमजोर स्वास्थ्य की एक महत्त्वपूर्ण वजह है। विशेषरूप से ऐसे समाज की स्थिति तो और भी चिंताजनक है जिनके पास न तो शिक्षा है न जागरूकता और न ही भर पेट उन्हें भोजन मिल पता है। ऐसे में उनके जीवन में पोषण की स्थिति चिंताजनक है।

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार आज भी 48 प्रतिशत महिलाएं कुपोषित हैं। कमजोर मनो-सामाजिक स्थिति एवं अपेक्षाकृत कम स्वास्थ्य सुविधा भी इसका मुख्य कारण है। महिलाओं के साथ खान-पान का भेदभाव ही कुपोषण की एक बुनियादी वजह और चिंतनीय कारक है। उल्लेखनीय है कि कुपोषण कोई संक्रामक रोग नहीं है लेकिन इसके शिकार बच्चे जीवन भर के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर हो जाते हैं।

छोटे-छोटे शहरों, कस्बों और गांवों में भी जन सामान्य को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की सुविधाएं दी जा रही हैं बावजूद इसके आज भी अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों में घर में ही प्रसव कराने का चलन है। रूढि़वादी और पारंपरिक मानसिकता के चलते प्रसव के लिए अस्पताल जाने की जरूरत महसूस नहीं की जाती है। आज भी भारत में 16 प्रतिशत आबादी चिकित्सा सुविधाओं से वंचित है। तरक्की और विकास के बावजूद भी भारत में मातृ मृत्यु दर अन्य देशों की तुलना में कहीं अधिक है।

महिला स्वास्थ्य को अप्रत्यक्ष रूप से शिक्षा और जागरूकता भी प्रभावित करती है। कहा भी गया है कि यदि एक महिला शिक्षित होती है तो पूरे परिवार पर इसका अनुकूल प्रभाव पड़ता है। शिक्षित माता अपने बच्चे के स्वास्थ्य, उसके पालन-पोषण का विशेष ध्यान रखती है। आंकड़े भी बताते हैं कि साक्षरता में अव्वल केरल जैसे छोटे राज्य में पंजाब जैसे संपन्न राज्य की तुलना में टीकाकरण का प्रतिशत कहीं अधिक है। इस लिहाज से हम कह सकते हैं कि जिस समाज में शिक्षा तथा जागरूकता की स्थिति अच्छी है वहां महिलाओं के जीवन में पोषण तथा स्वास्थ्य की स्थिति भी अच्छी है। अत: हमें दलित समाज की महिलाओं में अगर स्वास्थ्य तथा पोषण की स्थिति को ठीक करना है तो सवर्प्रथम शिक्षा और जागरूकता को बढ़ाना होगा। इसके लिए स्वास्थ्य तथा स्वच्छता की दिशा में सरकारी तथा गैर सरकारी हस्तक्षेप की अति आवश्यकता है।

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“दलित स्त्री लेखन की उपलब्धियां और सम्भावनाएँ”

-तुपसाखरे श्यामराव पुंडलिक

हैदराबाद विश्वविद्यालय, हैदराबाद,


पीन- 500046

दलित स्त्री की लेखन प्रक्रिया में एक तरफ जहां आशावाद की किरणें नजर आती हैं तो दूसरी ओर दलित आदिवासी तथा स्त्री की गरीबी, निर्बलता और विवसता भी दिखाई देने लगती है, साथ ही दलित स्त्री के उपर होनेवाले प्रतिदिन की घटनाएं बढते अन्याय-अत्याचार साफ तरह से दिखाई देते हैं। इस आलेख में दलित स्त्री लेखन की उपलब्धियां क्या रही है और आगे क्या सम्भावनाएं हो सकती है इस पर प्रकाश डालने की कोशिश की जा रही है।

दलित स्त्री लेखने एक आंदोलन की भांति है उसमें आदोलन की अधिक दिशा नजर आने लगती है। दलित कवयित्रियां लेखन के साथ-साथ आंदोलन को भी महत्व देने में आगे आने लगी है। कहना होगा कि दलित स्त्री लेखन एक आंदोलन है, जिसमें उनके उपर हुए अन्याय-अत्याचार को उद्वेलित करने का कार्य हो रहा है। दलित स्त्री के हीत में अनेक संगठन कार्य में लगे हुए है और उसमें दलित लेखिकाओं की भागीदारी विशेष है। दलित महिलाओं के आंदोलन पर पीटर जे. स्मिथ का कहना है कि, “यह आंदोलन अब विश्व व्यापी बन चूका है।”[ii] उनका मानना है कि, आज दलित स्त्री संगठन में जो विश्वव्यापी प्रवृत्ति निर्माण हुई है उसके पीछे का कारण उनके द्वारा निर्मित मानव अधिकारों की मूल्यों को अपनाना है। दलित स्त्री लेखन के मूल्यों में समता, स्वतंत्रता का सबसे अधिक स्थान दिखाई देता है। दलित स्त्री लेखन आंदोलन का नया पाडाव है। केवल इसे नया कहना ही पर्याप्त नहीं है यह भारतीय सामाजिक कुव्यवस्था के विरोध में लेखन परम्परा का ऐतिहासिक दस्तावेज है। प्रो.बजरंग विहारी तिवारी दलित स्त्री लेखन और दलित नारीवाद को स्पष्ट करते हुए लिखते है, कि “दलित नारीवादी दलित स्त्रियों द्वारा अपनी स्थिति को अलग से रेखांकित किए जाने के बाद उभरा है। वैसे तो दलित स्त्रियां कमोबेश दलित लेखन के शुरुआत से ही सक्रिय रही हैं। लेकिन दलित नारीवाद बाद का विकास है। जाति और लिंग के सम्मिलित बोध ने दलित नारीवाद की वैचारिक जमिन तयार की है।”[iii] दलित नारीवाद को दलित लेखन से भिन्न एक अलग श्रेणी में रखना चाहिए या नहीं यह विवाद का विषय है परन्तु दलित साहित्य से दलित स्त्री लेखन को अलग कैटेगरी में रखना नहीं चाहिए, उसे दलित लेखन के भीतर में ही रखा गया ताकि दलित साहित्य में एकता टिकी रहे। दलित स्त्री लेखन को अलग से स्वीकृति मिलने के बाद व्यापक दलित एकता टूटेगी दलित साहित्य का मुख्य हेतू हासिल करने में बादा उत्पन्न होगी साथ ही दलित आंदोलन कमजोर होगा। दलित स्त्रियों की अनेक समस्याएं दलित साहित्य में नहीं आ रही है इसलिए दलित स्त्री को अलग से अपनी लेखनी चलाना पडा। इस लेखन को देखकर कुछ साहित्यकार है जिन्होंने दलित स्त्री लेखन पर अलग से विचार नहीं होना चाहिए इतना ही नहीं बल्कि उसे दलित आंदोलन और लेखन में विशेष अहमियत भी नहीं मिलनी चाहिए। ऐसी सोच को बजरंग बिहारी तिवारी जवाब के तौर पर लिखना चाहते है कि, “इस समझ के बरक्स दलित नारीवाद की पैरोकार लेखिकाएं पितृसत्ता के प्रश्नो को जाति समस्या के बराबर रखती है। वे जानते है कि, दलित साहित्य को साहित्य की एक भिन्न और स्वतंत्र कैटिगरी के रुप में स्वीकृति आसानी से नहीं मिली है दलित लेखकों ने तमाम अवरोंधो, निषेधकारी तर्को को पार करके ही वांछित स्वीकृति पाई है। तो तर्क दलित साहित्य को स्वीकृति दिलाने के लिए प्रस्तुत किए गए वही दलित नारीवादी साहित्य के संदर्भ में भी लागू होता है।”[iv] दलित महिलाओं का शोषण सर्वाधिक हुआ है लेकिन साहित्य की मुख्यधारा में उनका जीवन अनुपस्थित रहा है, मुख्यधारा की बात छोडिए दलित साहित्य में भी वह पर्याप्त प्रतिनिधित्व की भागीदार नहीं बन पाई है। जिस प्रकार दलित साहित्य को रचने के लिए दलितों की पीडा की स्वानुभूति की आवश्यकता लगी है ठिक वैसे ही दलित स्त्री लेखन की सर्जना को भी दलित स्त्री की पीडा, यातनाओं की स्वानुभूति की आवश्यकता अनिवार्य ही होगी। दलित स्त्रियां जाति और पितृसत्ता दोनों का सम्मिलित अत्याचार झेलती है। इसलिए उनका अनुभव दूसरों से भिन्न और विशिष्ट है। दलित स्त्री लेखन के द्वारा भारतीय समाज व्यवस्था के सामने ऐसे अनेक अप्रत्याशित, अनसुने और आधारभूत सवाल किए साथ ही उसने दलित लेखकों, विचारों व कार्यकर्ताओं के समक्ष ऐसे-ऐसे जटिल सवाल प्रस्तुत किए उस सवाल के जवाब देने में नाकाम हो जाते हैं। इतना सब कुछ होने के बावजूद बजरंग बिहारी तिवारी जैसे विचारक भी स्त्री लेखन को अभी भी प्रारंभिक अवस्था में रखते हुए दिखाई देते है, उन्होंने स्पष्ट लिखा है, “इस स्थिति में जाति विरोधी संघर्ष को सपाट होने से बचाया और विचार के नए आयाय तथा संघर्ष के नए मोर्चे खोले दलित नारीवाद बुनियादी सवालों को लेकर चला है और यह समाज की बुनियाद की बदलने की क्षमता रखता है। क्योंकि दलित नारीवाद अभी अपनी प्रारंभिक अवस्था में ही है। इसलिए उसकी क्षमताओं का ठीक-ठीक आकलन इस वक्त नहीं किया जा सकता।”[v]

इसका सीधा-सीधा अर्थ है कि, दलित स्त्री लेखन का प्रारंभिक दौर शुरु है, साथ ही दलित स्त्री संगठित होने, आंदोलनों को चलाने का सीधा मतलब स्त्री जीवन की स्थिति में परिवर्तन की शुरुआत हुई है।

दलित स्त्री लेखन की उपलब्धियां

हिंदी साहित्य में एक महत्वपूर्ण उपलब्धी है कि दलित स्त्री का लेखन प्रक्रिया में आना। उन्होंने अपने अनुभव स्वत: रचनाओं के माध्यम से समाज के सामने रखने की सफल कोशिश करने में तत्पर है। वैसे हिंदी दलित स्त्री लेखन में अनेक कमियां है परन्तु उन कमियों को दूर करने के प्रयत्न जारी है। केवल ऐसा नहीं बल्कि उनके लेखन की कुछ उपलब्धियां भी सामने आती है उसे चित्रित करना महत्वपूर्ण ही नहीं बल्कि अनिवार्य है। कारण ऐसा करने से दलित स्त्री लेखन की दिशा और दशा को भी तय किया जा सकता है।

दलित स्त्रियों का कारवां

दलित स्त्री लेखन की उपलब्धियां रही है कि वह लेखन के साथ-साथ स्वयं दलित आंदोलन को साथ लेकर चलने में अपनी सार्थक भूमिका अदा करती है। डॉ. अम्बेडकर भारतीय साहित्य के साथ-साथ विदेशी साहित्य के अच्छे जानकार थे उन्होंने अध्ययन में पाया कि विदेश में स्त्रियों को किस प्रकार स्वतंत्रता प्राप्त है और भारत में स्त्री जीवन की क्या हालत है। साहित्य अध्ययन के दौरान हमारे सामने कई उदाहरण है जिसमें बुद्ध की थेरियों से लेकर सावित्रीमाई फुले व अन्य उनकी कई महिला मित्र थी जिन्होंने स्वयं पढ-लिखकर बाद में समाज के विकास और परिवर्तन के लिए कार्य किया है। आगे जाकर डॉ. अम्बेडकर के समय का काल स्त्रियों के लिए सवर्ण काल समझा जाता है। कारण उनके साथ दलित स्त्रियों का कारवां बढकर आगे आने लगा और अपने हक एवं अधिकारों की मांग करने लगा। अनिता भारती लिखती है, “डॉ. अम्बेडकर के समय में चले दलित आंदोलन में लाखों-लाख शिक्षित-अशिक्षित, घरेलू, गरीब मजदूर, किसान व दलित शोषित महिलाएं जुडीं। जिन्होंने जिस निर्भीकता बेबाकी और उत्साह से दलित आंदोलन में भागीदारी निभाई वह अभूतपूर्व थी। दलित महिला आंदोलन और डॉ. अम्बेडकर के साथ महिला आंदोलन की सुसंगत शुरुआत 1920 से मान सकते हैं हालांकि सुगबुगाहट सन 1913 से ही हो गई थी।”[vi] 1920 में ‘भारतीय बहिष्कृत परिषद’ की सभा में शाहू महाराज की अध्यक्षता में हुई सभा में पहली बार दलित महिलाओं ने भाग लेकर अपनी उपस्थिति दर्ज की थी। उस सभा में तुलसीबाई बनसोडे और रुकमणिबाई लडकियों को उनकी भाषा में शिक्षा की ताकत का महत्व बताकर उनमें परिवर्तन की जोति जगाई। आगे चलकर देशभर में स्त्री कारवां दलित महिला आंदोलन के रुप में आकार ले रहा दिखाई देने लगा। तभी 20 जुलाई 1924 ई. में मुंबई में आयोजित ‘बहिष्कृत हितकारिणी सभा’ की स्थापना की गई। “बहिष्कृत हितकारिणी सभा की अधिसंख्य सभाएं जो जगह-जगह गांव देहातों में आयोजित की जाती थी। उनमें दलित महिलाओं की उपस्थिति लगातार रही है। इस समय दलित महिलाएं अपने समाज और परिवार जनित पीडा को सार्वजनिक रुप से अभिव्यक्त कर रही थीं। पर उनकी अभिव्यक्ति अधिकतर गानों व स्वागत गान रुप में ही होती थी।”[vii] इस प्रकार के गित गाने के लिए वेनुमाई भटकर और रंगमाई शुभरकर अपने मधुर कंठ से दलित पीडा की मार्मिक और संघर्षपूर्ण अभिव्यक्ति को गीतों में ढालकर समाज को संबोधित करती थी।

ज्योतिराव फुले, डॉ. अम्बेडकर के स्त्री उद्धार कार्य से दलित महिलाओं ने आंदोलन को स्वयं चलाने का निर्णय लेकर दलित स्त्रियों का कारवां निर्माण किया और उनको अधिकार दिलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उसमें जईमाई चौधरी का नाम आता है, “एक दलित महिला द्वारा दलित बच्चियों के लिए विद्यालय स्थापित करना। उच्च शिक्षित दलित महिला जाईमाई चौधरी जो बाद में सशक्त दलित महिला नेता के रुप में स्थापित हुई। उन्होंने 1924 में चोखा मेला कन्या पाठशाला आरंभ की। जाईमाई चौधरी स्वयं बहुत ही मुसीबतों से पढ लिख पायी थी। जाईमाई चौधरी शिक्षिका के साथ-साथ एक जागरुख लेखिका एवं अच्छी वक्ता भी थीं। जाईमाई चौधरी बाबासाहब के कार्य से और शिक्षा प्रणाली से प्रभावित होकर उनकी पक्की अनुयायी बनी थी।”[viii] इस प्रकार जाईमाई चौधरी ने डॉ. अम्बेडकर की स्त्री विषयक विकास की दृष्टि का प्रचार-प्रसार करके स्त्री शिक्षा को अत्याधिक महत्वपूर्ण मानते हुए स्त्री शिक्षा पर बल दिया। इस प्रकार दलित महिला आंदोलन की माला में संघर्ष का एक मोती और जुड गया। दलित कवयित्रियां लेखन कार्य के साथ-साथ अम्बेडकरवादी आंदोलन को आगे बढाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अम्बेडकरवादी विचारधारा का प्रचार-प्रसार करना ही उनके लेखन का महत्वपूर्ण इद्देश्य हैं।

विश्वव्यापी दलित स्त्री लेखन

हिंदी का दलित साहित्य जिस प्रकार से विश्व में अपना डंका बजाने लगा है। वैसे ही दलित स्त्री कवयित्रियां भी अपनी अभिव्यक्ति को न केवल सिमीत रखती है बल्कि उसे विश्वव्यापी बनाकर भारतीय समाज में दलित स्त्री की योग्यता को समझाने लगी है। यह अलग है कि ब्राह्मणवादियों के मन में उनके प्रति ऐसा करने से कोई सहभाव नहीं है परन्तु उन्हें सच्चाई के सामने कुछ करने का साहस ही नहीं होता। यही वजह है कि दलित स्त्री अपने साथ हुए अन्याय के खिलाफ आावाज उठाने से न ही परिवार के सदस्यों से डरती है और नहीं सवर्ण मानसिकता से डरती है। दलित कवित्रियों की हिंम्मत व संयुक्त राष्ट्र संघ के सहयोग से दलित स्त्री लेखन को विश्वव्यापी बनने में बडी सहायता प्राप्त हुई है। “दलित महिलाओं का आंदोलन बीजिंग के अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन से देश की परिधि बाहर भी विस्तृत होने लगता है। इसमें संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को भी नकारा नहीं जा सकता है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने अपने संम्मेलन में स्वयंसेवी संस्था एवं विश्वव्यापी नेटवर्क के लिए एक जगह प्रदान किया है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय मानव अधिकारों पर जोर दिए जाने से दलित महिलाओं के आंदोलन को बल मिला है।”[ix] इस प्रकार से संयुक्त राष्ट्र के दबाव के कारण सभी देशों को दबाव में बनाया जा सकता है। स्मित लिखते है, “स्वयं सेवा संस्था अपना देस की परिधि से बाहर दलितों एवं उपेक्षितों की स्थिति को सामने लाकर ‘शर्मनाक’ तथ्यों को दर्शाते हैं। इस अन्तर्राष्ट्रीय कार्य से उन देशों की सरकारों पर संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं का एक राजनीतिक और नैतिक दबाव पडता है तब ये देश उस दिशा में सक्रिय होते दिखते है।”[x] दलित कवयित्रियों ने विश्व के अनेक देशों में यात्राएं की है। रमणिका गुप्ता भी “विश्व के उन्नीस देशों की यात्रा कर चुकी हैं। भारत के प्रतिनिधि के रुप में उन्होंने मजदूर परिषद मैक्सिको, बर्लिन, रुस, युगोस्लव्हिया, फिलीपाईन्स, तथा क्यूबा में भाग लिया। उन्होंने कई राष्ट्र की साहित्यिक यात्राएँ की हैं। अमेरिका, कनाडा, हाँगकाँग, बँकॉक, इंग्लैण्ड, फ्रांस, इटली, नार्वे, स्विटजरलैण्ड का दौरा किया है।”[xi]

संयुक्त राष्ट्र संग के अलावा अनेक सामाजिक संस्थाएं दलित स्त्री के लिए कार्य करने में तत्पर है जैसे- विश्व सामाजिक मंच, हेग सम्मेलन, ऑल इंडिया दलित वूमेन फोरम, महिला दल, बहुजन महिला संघ, बहुजन महिला परिषद आदि कई संगठन है जो दलित स्त्री के हीत में कार्य करने में आगे है। विश्व सामाजिक मंच में जनवरी 2007 में अफ्रीका एवं दक्षिण एशिया की महिलाएं एकत्र आयीं। ये मंच जाति एवं रंगभेद की नीति के प्रतिरोद में था इसमें भी दलित महिलाओं के मुद्दे पर विचार किया गया। विश्व सामाजिक मंच वैश्वीकरण के नकारात्मक प्रभाव के खिलाफ एक अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिरोध है। दलित महिलाओं ने विश्व सामाजिक मंच में वैश्वीकरण को दलित समाज और उनके उपर हो रहे नकारात्मक प्रभाव को हमेशा से सामने रखने का सफल प्रयास किया है। नेशनल कैंपेन ऑन दलित ह्यूमन राइट्स (एनसीडीएचआर) ने 2003 में वैश्वीकरण के दलित महिलाओं पर हो रहे दुष्परिणाम को उजागर किया। विमल थोरात इस एनसीडीएचआर की सदस्या है जे कि दलित है। उन्होंने बताया है कि, “दलित महिलाओं को वैश्वीकरण का दुष्परिणाम सबसे ज्यादा झेलना पडता है। इसमें दलित महिलाओं में गरीबी, बेरोजगारी, श्रमिकों की दुर्दशा, अनौपचारिक क्षेत्रों में वृद्धि, निजीकरण में वृद्धि, कल्याणकारी योजनाओं में कटौती, सार्वजनिक क्षेत्रों में नौकरियों में कमी, स्वास्थ्य सुविधाों का महंगा होना शामिल है। इसके साथ ही कृषि का वाणिज्यीकरण, पाणी जैसे संसाधनों का निजीकरण आदि से ग्रामीण इलाकों में रहनेवाले दलित महिलाओं के परेशानी हो रही है। दलित महिलाएं जो सर पर मैला ढोने के कामों में लगी हुई हैं। उनके प्रश्न पर भी चिन्तन किया गया।”[xii]

विविध विधाओं में लेखन कार्य

दलित स्त्री को समाज के द्वारा गूँगा पैदा करना पहला अभिशाप है, लडकी को घर परिवार में न बोलने का या कम बोलने की शिक्षा मिलती है। घर के बाहर तो वह कोई बलता है तो वह चूपचाप सुनने के लिए तयार रहना और गुस्सा भी आए तो चूपचाप पी जाओं, ऐसा नही करेगी तो समजा उसे कुलटा और न जाने कितनी उपाधियां देगा यह सोचकर वह खुद को नाकाम समझकर चूप बैठने के अलावा कुछ नहीं करती है। ऐसे में अगर कोई दलित कवयित्री अपनी बेडियां तोडने रचनाओं का निर्माण करती है तो यह साहित्य के लिए बहुत बडी उपलब्धि है।

कोई दलित लडकी समाज की बुराईयों को सामने लाना चाहती है, यह अच्छी बात है। आज के समय में दलित लेखकों के साथ-साथ दलित कवयित्रियां भी साहित्य में अपने जीवन को अभिव्यक्त कर रही है। हिंदी की दलित कवयित्रियां अपने लेखनी में ऐसे विषयों को लेकर आने लगी है जिस पर ब्राह्मणवादी मानसिकता लडखडा रही है।

कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, आत्मकथा, आलोचनात्मक लेख आदि विधाओं में दलित स्त्री साहित्य लिखा जा रहा है। और उसकी सराहना भी बहुत होने लगी है। स्त्री आंदोलन के शुरुआती दिनों में महिलाओं के अनुभव की अभिव्यक्ति करने केवल एक ही मंच उपस्थित था लेकिन दलित लेखिकाओं ने शीघ्र ही यह अनुभव किया कि विभिन्न वर्ग की महिलाएं अनेक अपने मुद्दों पर अलग-अलग ढंग से प्रभावित रही है। और उसे महसूस हुआ कि अपनी अभिव्यक्ति का अलग से रास्ता निकाला जा सकता है। ठिक वैसे दलित नारी संगठित होकर उनके साथ हो रहे दाहरे शोषण को विविध विधाओं द्वारा साहित्य में प्रस्तुत करने लगी है। “दलित स्त्री साहित्यिक आंदोलन में दलित स्त्री अब सभी विधाओं में अपनी बाते कह रही है। वह है, आत्मकथा, कविता, नाटक, एकांकी, यात्रा वृतांत एवं लोकगीतों के माध्यम से आत्मकथा के माध्यम से दलित स्त्री घर के अंदर पितृसत्ता को रेखांकित कर रही है। जिसके निसाने पर आमतौर पर पति का व्यवहार घर के अंदर के अन्य लोगों का व्यवहार निसाने पर आता है। इस संदर्भ में पुस्तक का तिसरा खंड दलित स्त्री लेखन जिसमें केवल अनिता भारती ने अपने आलेख ‘दलित लेखन में स्त्री चेतना की दस्तक’ में संपूर्ण दलित स्त्री लेखन पर चर्चा की है।”[xiii] विवाह के बाद भी पढाई के साथ-साथ साहित्य से समाज को सही दिशा देती रहीं। रमणिका गुप्ता हर विधा में कई सारे विषयों को उजागर करती हैं। वह एक साहित्यकार के साथ-साथ सफल पत्रकार भी हैं। ‘युद्धरत आम आदमी’ पत्रिका की संपादिका हैं। उन्होंने साहित्य के माध्यम से न केवल भारत में चर्चित हैं बल्कि विदेशों में भी अपनी अलग छाप छोडी हैं। मानवतावाद रमणिका गुप्ता के साहित्य का केंद्र बिंदू है। इसी को आधार बनाकर विविध विधाओं में अपनी वैचारिक दृष्टि समाज में रुजाने के लिए तत्पर रहती हैं। कविता, कहनी, उपन्यास, नाटक, आलोचनात्मक लेख और आत्मकथा विधाओं पर हिंदी में लेखनी चलाई हैं और साथ ही बहुआयामी व्यक्तित्व होने के कारण उन्हें बहुभाषा का ज्ञान होने से उन्होंने हिंदी साहित्य तेलगु, गुजराती, पंजाबी, मराठी, मलयालम आदि भाषाओं में अनुवादित कर अनेक संस्कृतियों को मिलाने व समझाने का कार्य किया हैं।

दलित स्त्री लेखन पर शोध तथा शैक्षणिक हलचल

आज दलित स्त्री लेखन विविध प्रकार की साहित्य की विधाओं को स्थान देकर व्यापक रूप धारण किया हुआ है। विविध विश्वविद्यालयों में दलित स्त्री लेखन को पाठ्यक्रम में पढाया जा रहा है। और साथ ही दलित स्त्री लेखन पर केवल चर्चा न होकर विविध विषय के शोध कार्य हो रहे है। यह दलित स्त्री लेखन की बडी उपलब्धि मानी जायगी अब दलित मुद्दों पर एवं दलित स्त्रियों के मुद्दों पर लेखन और बोध में वृद्धि होती दिखती है। जिस आक्रोश के तेजाब से स्त्री आस्मिता को रौंदा जाता रहा है, उस आक्रोश का प्रतिउत्तर देना दलित स्त्रियां सीख लिया है। वे आज आत्मनिर्भर हो रहीं है तथा आत्मबल से लबालब हैं। वह साक्षर होना जान गई है इसलिए खुद की आत्मरक्षा करने में समर्थ बनी है, आज दलित स्त्री अपनी खुदारी को पहचाना है, अब वह बेबस, बेचारी, लाचार, अबला नहीं हैं बल्कि किसी भी परिस्थिति का सामना करने के लिए तयार है। यह हिंमत उन्हें डॉ. अम्बेडकर के कार्य से प्राप्त हुई है। संविधान ने सभी स्त्रियों को समानता का अधिकार देकर उनके जीवन में क्रांति का बीज बोया है। परिणाम स्वरुप आज दलित स्त्री भी अपनी लेखनी में स्त्री समाज के उपर हो रहे अन्याय- अत्याचार को वाणी दे रही है। पुष्पा विवेक ने बहुत अच्छी बात की है, “धर्मवीर जी, जब चीटी पर पैर पडता है तो वह भी काटती है। यहां तो दलित-शुद्र स्त्री का सवाल है जो एक इंसान है, फिर चाहे वह कायस्त हो, चमार हो या कोई भी जाति की स्त्री। जब उनके साथ अन्याय होगा तो वह भी पलटवार तो करेंगे ही, अब चाहे ब्राह्मण विरोधी कायस्थ हो या धर्मवीर विरोधी स्त्री। जब उनके साथ अभद्र व्यवहार, अश्लील भाषा का प्रयोग किया जायेगा तो क्या वह चूपचाप बर्दास्त कर लें। आज की स्त्री पढी-लिकी व समझदार है, उसे अपने अधिकारों व अच्छे बूरे का ज्ञान है। निर्लज्ज और समाज विरोधी व्यक्ति का विरोध कर आज की स्त्री ने यह सिद्ध कर दिया है कि वह धर्मवीर जैसे ओछी प्रवृत्ति के व्यक्ति को सबक सिखाने का हौसला रखती है।”[xiv]

दलित स्त्री लेखन का विस्तार आज की तारीख में पुरे देश में विश्वविद्यालय और महाविद्यलय में होते हुए नजर आ रहा है। विश्वविद्यलय में अनेकों दलित कवयित्रियों के रचनाओं पर शोध कार्य चल रहा है। यह उनके किए कार्य का ही फल कहना चाहिए। सुशीला टाकभौरे, रजनी तिलक, कौशल्या बैसंत्री, रजतरानी मीनू, अनिता भारती आदि कवयित्रियों के रचनाओं को लेकर विविध विषयों को सामने रखकर शोधकार्य हो रहे है।

दलित लेखिकाओं ने स्त्री हिंसा के खिलाफ अपना विरोध प्रकट किया है। दलित हिंसा के खिलाफ आवाज बुलंद करते समय अनोकों स्त्रियों को हिंसा व बलात्कार का शिकार होना पडा।

डॉ. अम्बेडकर ने स्त्री जीवन को सशक्त बनाने के लिए स्त्री-पुरुष की समानता अधिक महत्वपूर्ण तथा आवश्यक मानते थे। लडकों के साथ-साथ बिना भेदभाव किए लडकियों को भी समान रुप से शिक्षा दी जाए तो भारतीय समाज विश्वजगत में अतिशीघृ प्रगति कर सकेगा। डॉ. अम्बेडकर इस तरह इसलिए चाहते थे कि, स्त्री और दलित स्त्री को कई हजारों सालों से केवल शिक्षा में ही नही बल्कि सभी क्षेत्रों से दूर रखा गया और पुरुषसत्ता के वर्चस्व के अधिन रखकर उन्हें गुलाम, दास, बनाया गया। इसका जिम्मेदार डॉ.अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म ग्रंथों और मनु को माना है कारण मनु ने स्त्रियों को वेद पढने नही दिया, “स्त्रियों को पढने का कोई अधिकार नहीं है। इसलिए उनके संस्कार वेद मंत्रों के बिना किए जाते है। स्त्रियों को वेद जानने को अधिकार नहीं है इसलिए उन्हें धर्म का कोई ज्ञान नही होता।”[xv] मनु के समय के पूर्व स्त्रियों को गुरुकुलों में शिक्षा दी जाती थी, इसका उलेख डॉ.अम्बेडकर करते है, “श्रोत सूत्र से यह स्पष्ट है कि नारी वेद मंत्रों का अनुपाठ कर सकती थी और उसे वेदों का अध्ययन करने के लिए शिक्षा दी जाती थी पाणिनि की अष्टाध्यायी से इस बात के भी प्रमाण मिलते है कि, नारियाँ गुरुकुलों में जाती और वेदों की विभिन्न शाखाओं का अध्ययन करती थी। और वे मीमांसा में प्रविण होती थी। पतंजली के महाभाष्य का कहना है कि, नारियां शिक्षक होती थीं और बालिकाओं को वेदों का अध्ययन कराती थी।”[xvi]

बाबासाहेब डॉ.अम्बेडकर शिक्षा को अन्याय के खिलाफ लडने का शास्त्र माना है। ‘शिक्षा शेरनी का दूध है, यह दूध जो भी कोई पिएगा वह अन्याय के खिलाफ जंग छेडे बीना नही रहेगा’, ‘जब तक गुलामों को उसकी गुलामी का ज्ञान नही होगा तब तक वह गुलामी से मुक्त नही होगा।’ बिना शिक्षा से कोई भी व्यक्ति गुलामी को पहचान नहीं सकता। गुलामों को गुलामी की पहचान तब हो सकती है, जब वह शिक्षा आत्मसात करके सही गलत की पहचान करने में परिपूर्ण साबित हो, “डॉ.अम्बेडकर जब विदेश में पढने गए तो वहां के स्वतंत्र जीवन में उन्होंने स्त्रियों को चहुंमुखी विकास करते देखा तो उन्हें समझ में आया कि, बिना स्त्री शिक्षा के कोई भी प्रगति अधूरी है। विदेश में होते हुए वहां की स्त्रियों को स्वतंत्रतापूर्वक जीवन जीते हुए, चिंतन मनन करते हुए, उनकी प्रगति देख स्त्री चेतना को धार मिली।”[xvii] डॉ.अम्बेडकर का अपना मानना था कि, “यह गलत है कि माँ-बाप बच्चों के जीवन को उचित मोड दे सकते है, यह बात अपने मन पर अंकित कर यदि हम लोग अपने लडकों की शिक्षा के साथ ही लडकियों की शिक्षा के लिए भी प्रयास करे तो हमारे समाज की उन्नति तीवृ होगी। इसलिए आपको नजदीकी रिस्तेदारों में यह विचार तेजी से फैलाना चहिए।”[xviii] शिक्षा मनुष्य की आँखों के समान होती है, जिस प्रकार आँखों के बिना हम कुछ देख और समझ नही सकते उसी प्रकार शिक्षा के बिना भी समाज को सही ढंग से समझ नही सकते। इसलिए जीवन में शिक्षा का होना महत्वपूर्ण ही नही बल्कि अनिवार्य है।

शिक्षा से ही विवेक-बुद्धि प्राप्त होती हैं जिसके द्वारा हम अपनी स्थिति और सही-गलत का भेद करके सत्य को आधार बनाकर सच्चा इतिहास लिखेंगें। कहा जाता है कि जिनकों अपने इतिहास के बारे में कुछ जानकारी नहीं वह अपना इतिहास लिख नही सकते। आज तक वही होते आ रहा था लेकिन आज दलित, आदिवासी और स्त्रियों ने शिक्षा के बल पर अपना इतिहास जानकर स्वयं इतिहास लिखने का काम ही बल्कि इतिहास में अपनी खास जगह बना रही है। अतः स्पष्ट है कि, इतिहास जानने के लिए शिक्षा बहुत जरुरी है। शिक्षा प्राप्ति के उपरांत हम अपना इतिहास और वर्तमान को अच्छे से समझकर भविष्य में उन्नति-प्रगति पर राह का इतिहास खुद बना सकते है। सुशीला टाकभौरे लिखती है, “सर्वप्रथम महात्मा ज्योतिबा फुले स्त्री शिक्षा का अभियान चलाया था क्रांति माँ सावित्री फुले ने प्रथम शिक्षिका बनकर, स्त्री शिक्षण अभियान को आगे बढाया। बाबासाहेब डॉ.भीमराव अम्बेडकर ने स्त्रियों के हक में कानून बनाकर स्त्रियों को अधिकार दिलाए, जिसके फलस्वरुप वे शिक्षा और प्रगति के क्षेत्र में आगे बढ सकी।”[xix]

दलित स्त्री की बदलती परिस्थिति

दलित स्त्री की परिस्थिति पहले से बेहतर हो रही है। आज वह अपने हक एवं अधिकार के लिए समाज से लड रही है। अब दलित स्त्री के आंदोलन, मुद्दों पर भी , सोचने का तरिक बदला है। भले ही दलित स्त्री को समानता का अधिकार न मिला हो लेकिन उसे समाज ने यह कबूल कर लिया है कि दलित स्त्री भी एक मनुष्य है और उसे मनुष्य होने का अधिकार मिलना चाहिए। वैसे स्त्री बहुत ही सहनशील होती है समाज ने उसे इस सहनशीलता का फायदा उठाकर कमजोर बनाया। परन्तु पुरुष के यह पत्ता नहीं था कि सहनशील होने के लिए हौसला रखना चाहिए। स्त्री के पास इतना सहन करने की शक्ति होती है कि सब कुछ छोडकर अपने परिवार के लिए जी जान लगा देती है। लेकिन आज स्त्री के पास यह उपलब्धि हैं, कि वह “आज औरत अपने सीमित दायरे से बाहर निकलकर प्रगति पथ पर अवश्य आगे बढ रही है, परन्तु समानता ने अभी भी कोसों दूर है।”[xx] सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा शैक्षणिक क्षेत्र में दलित स्त्री की स्थिति में जितनी विकाश की गती होनी थी वह नहीं हो पायी। फिर भा कह सकते है कि दलित स्त्री आज सभी क्षेत्र में अपना दबदबा निर्माण करना चाहती है।

दलित साहित्य को राजनीति से जोडकर देखना आवश्यक कारण दलित साहित्य केवल साहित्य ही नहीं बल्कि विचारों का एक राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक आंदोलन भी हैं। एक ऐसा आंदोनल जिसके द्वारा दलित, आदिवासी, स्त्री तथा दबे-कुचले लोग भी अपनी लडाई खुद लडने के लिए तयार हैं। हक एवं अधिकार की बात करते ही साहित्य अपने आप राजनीति से जुड जाता है। पर सवाल हि कि क्या दलित साहित्य का राजनीति से कोई संबंद है या नहीं। कारण हम दलित साहित्य को आंदोलन का रुप मानते है तो फिर कोई भी आंदोलन राजनीतिक विचारों के बिना आगे नहीं बढ सकता हैं। अनिता भारती ठिक ही लिखती है, “दलित आंदोलन और दलित साहित्य की भी एक राजनीतिक विचारधारा है जिसके प्रेरणास्रोत अम्बेडकर, फुले, कबीर, बुद्ध हैं।”[xxi] दलित साहित्य और आंदोलन के प्रेरणास्रोत डॉ.अम्बेडकर के नेत्रत्व में दलित समाज तथा स्त्री समाज जिस चेतना से लाखों करोडों की संख्या में जुड रहा है। वैसा किसी भी इतिहास में नहीं संभव नहीं है। डॉ. अम्बेडकर ने केवल दलित समाज को ही सुधारने का या उनको आगे लाने का कार्य नहीं किया बल्कि उनके दृष्टि में समाज की सभी महिलाओं को न्याय दिलाना ही मकसद रहा है। तथकालीन समाज में चले स्त्रियों के छोटे-बडे आंदोलनों की आखिर यही राजनीति रही होगी कि, दलित आंदोलन से जुडकर शोषण और दमन के खिलाफ एक ऐसे स्वस्थ समाज के लिए संघर्ष करना जहां समाज में दलित पुरुषों के साथ खंदे से खंदा मिलाकर कार्यरत रहे और वह भी समानता, स्वतंत्रता का हिसा बने। “1977 में कुल 19 महिलाएं ही संसद में पहुंचीं जबकि 1984 में सबसे अधिक 46 महिलाएं संसद में पहुंचीं। यह इंदिरा गांधी हत्याकांड का वर्ष था, जब राजीव गांधी सहानूभूति की तेज लहर चली थी उसके बाद संसद में महिलाओं की संख्या घटती चली गई। 1999 में फिर इसमें थोडा सुधार आया और संसद में पहुंचने वाली महिलाओं का संख्या 48 हो गयी।”[xxii] इतना ही नहीं बल्कि भारत का सबसे बडा राज्य उत्तरप्रदेश की पहली बार एक दलित महिला मुख्यमंत्री बनी है। और दलित महिलाओं में दूसरी मुख्यमंत्री रही राबडी देवी जो कि लालू प्रसाद यादव के जेल जाने के बाद बनी। बात अलग है कि उनका मुख्यमंत्री बनना मजबूरी थी लेकिन राबडी देवा भी हमेशा लालू प्रसाद को सहयोग की भूमिका में ही दिखाई देती रही है। इसके अलावा अनेक दलित महिलाओं ने राजनीति में भागीदारी दर्ज की उसमें मध्यप्रदेश की जमुना देवी उपमुख्यमंत्री पद पर रही और बिहार में मुसहर जाति की महिला भगवती देवी राज्यमंत्री भी बनी साथ ही केंद्र में सांसद भी रही।

जहां मायावती ने दलित महिलाओं का स्वाभिमान जगाया, वही एक बिल्कुल ग्रामिण महिला ने व्यवस्था से विद्रोह कर अपने अपमान का बदला लिया। जहां लाखों ठाकूरों और ब्राह्मणों की नजर में फूलन देवी एक डकैत थी, जिसने बेहमई में ठाकूरों को मौत के घाट उतारा, लेकिन ये ही लोग फूलन पर अत्याचार-दुष्कर्म को भूल जाते हैं। परन्तु हम यह कभी नहीं भूल सकते कि फुलन दलित महिलाओं की चेतना थी, उनके विद्रोह की कहानी थी। 12 साल जेल में रहकर बाहर आने के बाद राजनीतिक हलचलें शुरु हुई है। फुलन पर उनकी मल्लाह जाति को बहुत गर्व था, अन्त में उन्होंने एक राजनैतिक दल की सदस्य बनकर मिर्जापुर से सांसद वनी।

आज संविधान के तहत आरक्षण की बदौलत बडी संख्या में दलित महिलाएं पंचायत और क्षेत्र पंचायतों की प्रमुख सदस्य हैं। और हिम्मत और खुशी से अपना काम कर रही है। लेकिन बहुत सारी महिलाएं अपने पति के निर्देशों पर ही काम करती हैं जो कि संविधान की मुल भावना के खिलाफ है। दलित महिलाओं को अपने हक एवं अधिकारों की लडाई राजनैतिक ताकत को बढाकर ही लडनी होगी और यह सही मायनों में तभी संभव होगा सकता है जब सांप्रदायिकता, हिंसा और धार्मिकता से स्वयं को दूर रखेंगे। यही सबसे अधिक दलित महिलाओं के शोषण के हतियार बनकर आये हैं। इसलिए दलित महिलाओं को अपने संवैधानिक अधिकारों के प्रति सचेत रहकर ही राजनीति में अपना कदम रखना अनिवार्य तथा महत्वपूर्ण रहेगा।

कहना होगा कि दलित स्त्री हर क्षेत्र में आगे आने की कोशिश में जूटी हुई है। दलित महिलाएं विभिन्न प्रांतो में सजग तो हो रही है परन्तु आज भी हिंसा, गरीबी, छुआछूत, शिक्षा की कमी, स्वास्थ्य की कमी जैसी समस्याओं के चलते जीने को मजबूर है। इसके चलते हम कह सकते हैं कि दलित महिलाओं के स्थितियों में बहुत कुछ अन्तर नहीं आया है। शिवकुमार के अनुसार “अभी भी दलित महिलाओं को अपने ही दलित आंदोलन में पूरी पहचान नहीं मिल पायी है। हांलाकि वे इस दिशा में प्रयासरत हैं।”[xxiii] और इस संदर्भ में सुशीला टाकभौरे और अन्य दलित कवयित्रियां चिंतीत है। दलित आंदोलन व लेखन के सामने यह बहुत बडा प्रश्न है कि समाज में महिलाओं के प्रति ब्राह्मणवादी मानसिकता को किस प्रकार बदला जाय कारण इस मानसिकता के कारण संपूर्ण दलित महिला वर्ग नारी मुक्ति आंदोलन से जुड नहीं पाती है। इसका बडा कारण पितृसत्ता का वर्चस्व कहा जा सकता है। इसलिए आज भी वे घर हो या घर के बाहर का कोई भी कार्य हो परिवार के पुरुष की अनुमति के बिना कर नही सकती। अत: संभावना कर सकते है कि स्त्री के प्रति इस तरह की मानसिकता को जब तक बदला न जाय तब तक नारी मुक्ति के प्रश्नों का समाधान नही कर पायेंगे।

निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि, दलित स्त्री राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक, धार्मिक और सांस्कृतिक आदि क्षेत्रों से पिछडी हुई हैं। धीरे-धीरे वह पिछडी जिंदगी को पिछे छोडकर विकास का रास्ता अपना रही है। हिंदी दलित स्त्री लेखन में अनेक संभावनाएं हैं। कही गयी बात को पुन: पुन: उसी अंदाज में कहना रीपीटेशन अधिक होता है। इसलिए आगे भविष्य में इस प्रकार एक ही बात को अलग प्रकार से चित्रित करने की कोशिश होनी चाहिए। विषयों में भी विभिन्नता होनी आवश्यक हैं। दलित स्त्री के अनेक मुद्दे अभी भी साहित्य में चित्रित करना बाकी रहा है। उम्मीद हैं कि दलित स्त्री आगे इसकी कमी दुर करेगी।

-तुपसाखरे श्यामराव पुंडलिक

शोधार्थी- हिंदी विभाग, मानविकिय संकाय

हैदराबाद विश्वविद्यालय हैदराबाद,500046

गच्चीबाउली हैदराबाद,

मो. न. 7382460576

नरेन्द्र कोहली के उपन्यासों में स्त्री-विमर्श


डॉ. कान्ता ढ़िल्लन

उपन्यास आज की सबसे लोकप्रिय विधा है। ‘उपन्यास’ ‘उप’ और ‘न्यास’ शब्दों के योग से बना है। ‘उप’ का अर्थ है, निकट ‘न्यास’ का अर्थ है रखा हुआ। जीवन की संष्लिष्टताओं और जटिलताओं का जितना सफल चित्रण उपन्यास के द्वारा संभव है, अन्य किसी विद्या के द्वारा नहीं, उपन्यास अपनी रंजकता और प्रभावात्मकता के कारण पाठकों को अत्यंत सहजता से यथार्थ का बोध कराता है। स्त्री और पुरूष समाज की दो महत्त्वपूर्ण इकाई हैं। बस फर्क इतना है कि एक ज्यादा शोषित है और एक ज्यादा स्वतंत्र। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से पुरूष का स्वरूप उतना नहीं बदला है जितना स्त्री का। आज की स्त्री समाज की चुनौतियों को स्वीकारते हुए आगे बढ़ रही है। आज की स्त्री यह अनुभव कर रही है कि वह किसी भी क्षेत्र में पुरूष से कम नहीं है। आज स्त्री समाज में एक स्वतंत्र इकाई के रूप में अपने को स्थापित करना चाहती है। स्त्री-पुरूष समानता पर पुरूष-प्रधान समाज का विचार प्रायः नकारात्मक है और वह स्त्री को अपमानित करने का एक मौका भी नहीं छोड़ता। समय के साथ रूढ़ नियमों एवं अवधारणाओं में संशोधन की जरूरत है। स्त्री इंसान है, यह सोच हमारे समाज में नहीं है। स्त्री शोषण पर ही हमारी सामाजिक व्यवस्था रखी है। नारी स्वरूप में बदलाव के लिए नारी सशक्तिकरण की आवश्यकता है। उसे जागरूक करने की जरूरत है।

भारतीय समाज में स्त्रियों की स्थिति, दशा एवं भूमिका का प्रश्न बेहद ज्वलंत मुद्दा है। नारी भारतीय समाज की आधी जनसंख्या है। वह समाज की आधी शक्ति है। पुरूष वर्ग का नारी वर्ग के प्रति संकुचित धारणाओं की वजह से वह स्वावलंबन की ओर कदम बढ़ाने का साहस नहीं जुटा पा रही है। जरूरत आज इस बात की है कि स्त्री भी समाज में अपनी सही पहचान, उचित जगह एवं अस्मिता को बनाए रखे ताकि वह कमजोर न रहे।

स्त्री-विमर्श

स्त्री-विमर्श/Feminist Discourse

नारीवाद ही स्त्री विमर्श है, नारी की यथार्थ स्थिति के बारे में चर्चा से मुक्ति चाहता है। ताकि वह स्वतंत्र ढंग से जी सके और सोच सके। वह पूर्ण स्वाधीन हो। समाज की निर्णायक शक्ति हो। कात्यायनी के अनुसार- ‘‘नकारात्मक भेदभाव की जगह स्त्री के प्रति सकारात्मक पक्षपात की बात करता है। वस्तुतः इस रूप में देखा जाए तो स्त्री विमर्श अपने समय और समाज के जीवन की वास्तविकताओं तथा संभावनाओं को तलाश करने वाली दृष्टि है।’’1 स्त्री विमर्श के युग में स्त्री की स्थिति में आये सबसे महत्वपूर्ण कार्य यह है कि वह पुरूष के समान ही जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत है। लेकिन इसके लिए उसे भीतर-बाहर से बहुत टूटना पड़ता है। विवाह से पहले नौकरी करती स्त्री को अपने परिवारजनों के लिए तड़पना पड़ता है तो विवाह के बाद पति के परिवार वालों के लिए उसकी इच्छाओं और आकांक्षाओं का कोई ध्यान नहीं रखता। सबको संतुष्ट करना ही उसकी नियति है। इस संदर्भ में मैत्रेयी पुष्पा का वक्तव्य यह है कि - ‘‘पुरूष के लिए सबसे बड़ी चुनौती स्त्री ही है, उसको वश में करने के लिए वह जिन्दगी भर न जाने कितने प्रयास करता है कि किसी तरह औरत के वजूद को तोड़ सके।’’2

पुरूषों की निगाहों में स्त्रियाँ उपेक्षिता ही रहती हैं। पुरूषों ने उनके स्वतंत्र व्यक्तित्व के निर्माण के लिए कभी कोई सुविधा नहीं दी है। जब स्त्रियाँ मानवीय अस्मिता के लिए प्रतिवाद करती हैं तो उनकी स्वतंत्रता को नकारात्मक अर्थों में ही ग्रहण किया जाता है। भारतीय समाज में स्त्रियों की स्थिति, दशा एवं भूमिका का प्रश्न बेहद ज्वलंत मुद्दा है। पुरूष वर्ग का नारी वर्ग के प्रति संकुचित धारणाओं की वजह से वह स्वालंबन की ओर कदम बढ़ाने का साहस नहीं जुटा पा रही हैं।

नरेन्द्र कोहली के उपन्यासों में स्त्री-विमर्श

नरेन्द्र कोहली आधुनिक हिन्दी साहित्य के एक सशक्त साहित्यकार है। नरेन्द्र कोहली ने हिन्दी उपन्यास को एक नई जमीन पर लाकर खड़ा कर दिया है। नरेन्द्र कोहली के अपने उपन्यासों में स्त्री की समस्या एक ध्यानाकर्षक विषय रही है। आधुनिक युग में समाज सुधारकों का ही नहीं साहित्यकारों का ध्यान भी स्त्री से सम्बन्ध विभिन्न समस्याओ की ओर विशिष्ट रूप से आकृष्ट हुआ है। युग-युग से पीड़ित व प्रताड़ित स्त्री जीवन के विभिन्न पहलूओं का चित्रण नरेन्द्र कोहली जी ने संवेदनाशीलता के साथ किया है। नरेन्द्र कोहली ने अपने उपन्यासों में स्त्री की विभिन्न समस्याओं को उजागर किया है। प्राचीन काल से ही स्त्री को नियंत्रित करने का प्रयास किया गया है। कौमार्यवस्था में पिता के यौवनावस्था में पति और वृद्धावस्था में पुत्र के संरक्षण में नारी को रहना पड़ा है। नरेन्द्र कोहली ने अपने उपन्यासों में प्राचीन समय में स्त्री की जो स्थिति थी उसका सजीव, प्रामाणिक एवं कलात्मक चित्रण किया है।

आधुनिक नारी बाहरी तौर पर काफी आगे पहुँची है लेकिन जितना पहुँचना चाहिए था वहाँ तक नहीं पहुँची है। ‘‘हमारे भारतीय समाज में दुर्गा, पार्वती, लक्ष्मी, सरस्वती देवी के रूपों में औरतों की पूजा की जाती है, परंतु व्यावहारिक धरातल पर उसे मानवीय भी नहीं समझा जाता। वह पाषाण की मूर्ति की भाँति सब कुछ सहे, यही भारतीय समाज चाहता है।’’3 पुरूषों की निगाहों में स्त्रियाँ उपेक्षिता ही रही हैं। नरेन्द्र कोहली के उपन्यास ‘बंधन’ में अम्बा शाल्वराज के यहाँ पहुँची तो शाल्वराज ने यह कहकर उसे अपने अन्तःपुर में लेने से इनकार कर दिया - सुन्दरी! तुम पहले किसी दूसरे की हो चुकी हो, अतः अब मैं, तुम्हारे साथ विवाह नहीं कर सकता। अम्बा ने अपहरण की घटना के लिए अपने-आपको निरपराध बताते हुए कहा मैं एक धर्मपरायण महिला हूँ। आपका वरण करने के बाद मैं किसी भी अन्य पुरूष के साथ विवाह का रिश्ता नहीं जी सकती, लेकिन शाल्वराज अम्बा को अपनाने के लिए राजी नहीं हुए। भीष्म भी न मिल सका तो अम्बा भयंकर प्रतिज्ञा करती है - ‘‘मैं अपना जीवन तपस्या में दग्ध कर दूँगी, ताकि तुम्हारा जीवन जो मेरा नहीं हो सका, नष्ट हो सके।’’4 वास्तविकता यह है कि आज तक अधिकारों पर कब्जा पुरूषों का ही था, आज भी है। वह तब तक रहेगा जब तक स्त्रियाँ अपने अधिकारों के लिए जागरूक नहीं हो जाती। जब स्त्रियाँ इस प्रकार के प्रश्नों के प्रति तर्कशील होकर विचार करेंगी तभी उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति में परिवर्तन संभव हो सकेगा।