वर्ष 4, अंक 44. दिसंबर 2018


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वर्ष 4, अंक 44. दिसंबर 2018

परामर्श मंडल

डॉ. सुधा ओम ढींगरा (अमेरिका),प्रो. सरन घई (कनाडा), प्रो. अनिल जनविजय (रूस), प्रो. राज हीरामन (मॉरीशस), प्रो. उदयनारायण सिंह (कोलकाता), स्व. प्रो. ओम कार कौल (दिल्ली), प्रो. चौथीराम यादव (उत्तर प्रदेश), डॉ. हरीश नवल (दिल्ली), डॉ. हरीश अरोड़ा (दिल्ली), डॉ. रमा (दिल्ली), डॉ. प्रेम जन्मेजय (दिल्ली), प्रो.जवरीमल पारख (दिल्ली), पंकज चतुर्वेदी (मध्य प्रदेश), प्रो. रामशरण जोशी (दिल्ली),डॉ. दुर्गा प्रसाद अग्रवाल (राजस्थान), पलाश बिस्वास (कोलकाता), डॉ. कैलाश कुमार मिश्रा (दिल्ली), प्रो. शैलेन्द्र कुमार शर्मा (उज्जैन), ओम पारिक (कोलकाता), प्रो. विजय कौल (जम्मू ), प्रो. महेश आनंद (दिल्ली), निसार अली (छत्तीसगढ़),

संपादक

कुमार गौरव मिश्रा

सह-संपादक

जैनेन्द्र (दिल्ली), कविता सिंह चौहान (मध्य प्रदेश)

कला संपादक

विभा परमार

संपादन मंडल

प्रो. कपिल कुमार (दिल्ली), डॉ. नामदेव (दिल्ली), डॉ. पुनीत बिसारिया (उत्तर प्रदेश), डॉ. जितेंद्र श्रीवास्तव (दिल्ली), डॉ. प्रज्ञा (दिल्ली), डॉ. रूपा सिंह (राजस्थान), स्व. तेजिंदर गगन (रायपुर), विमलेश त्रिपाठी (कोलकाता), शंकर नाथ तिवारी (त्रिपुरा), बी.एस. मिरगे (महाराष्ट्र), वीणा भाटिया (दिल्ली), वैभव सिंह (दिल्ली), रचना सिंह (दिल्ली), शैलेन्द्र कुमार शुक्ला (उत्तर प्रदेश), संजय शेफर्ड (दिल्ली), दानी कर्माकार (कोलकाता), राकेश कुमार (दिल्ली), ज्ञान प्रकाश (दिल्ली), प्रदीप त्रिपाठी (महाराष्ट्र), उमेश चंद्र सिरवारी (उत्तर प्रदेश), चन्दन कुमार (गोवा)

सहयोगी

गीता पंडित (दिल्ली)

निलय उपाध्याय (मुंबई, महाराष्ट्र)

मुन्ना कुमार पाण्डेय (दिल्ली)

अविचल गौतम (वर्धा, महाराष्ट्र)

महेंद्र प्रजापति (उत्तर प्रदेश)

विदेश प्रतिनिधि

डॉ. अनीता कपूर (कैलिफोर्निया)

डॉ. शिप्रा शिल्पी (जर्मनी)

राकेश माथुर (लन्दन)

मीना चौपड़ा (टोरंटो, कैनेडा)

पूजा अनिल (स्पेन)

अरुण प्रकाश मिश्र (स्लोवेनिया)

ओल्या गपोनवा (रशिया)

सोहन राही (यूनाइटेड किंगडम)

पूर्णिमा वर्मन (यूएई)

डॉ. गंगा प्रसाद 'गुणशेखर' (चीन)

Ridma Nishadinee Lansakara, University of Colombo, Sri Lanka

सोनिया तनेजा, हिन्दी प्राध्यापिका, स्टैंफ़र्ड विश्वविद्यालय, (कैलिफोर्निया)

डॉ. इन्दु चौहान, संयोजक, हिन्दी स्टडि प्रोग्राम, यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ पेसिफिक, (फ़िजी )

Ekaterina Kostina, Saint Petersburg University

Anna Chelnokova, Saint Petersburg University

संपादन मण्डल

जनकृति

(बहुभाषी अंतरराष्ट्रीय मासिक पत्रिका)

संपर्क

डॉ. कुमार गौरव मिश्रा, 4-a, बागेश्वरी अपार्टमेट, आर्यापुरी,

रातू रोड़, रांची, झारखंड, भारत

8805408656

वेबसाई-www.jankriti.org

ईमेल- jankritipatrika@gmail.com

संपादक की कलम से....


आप सभी पाठकों के समक्ष जनकृति का अक्टूबर-नवंबर सयुंक्त अंक प्रस्तुत है। प्रस्तुत अंक में साहित्य, कला, मीडिया, पत्रकारिता, अनुवाद इत्यादि क्षेत्र के विभिन्न विषयों को प्रकाशित किया गया है। जनकृति में साहित्यिक रचनाओं के साथ-साथ विभिन्न क्षेत्रों के नवीन विषयों पर आधारित लेख, शोध आलेख प्रकाशित किए जाते है। वर्तमान में आंशिक बदलाव करते हुए सम्पूर्ण अंक में केवल लेख एवं शोध आलेखों को स्थान दिया गया है। यह जनकृति का समान्य अंक है। इससे पूर्व बुजुर्गों पर केन्द्रित विशेषांक, विदेशी भाषा कविता विशेषांक, जल विशेषांक, थर्ड जेंडर विशेषांक, हिंदी पत्रिका विशेषांक, लोकभाषा विशेषांक एवं 21वीं सदी विशेषांक कुल 8 विशेषांक प्रकाशित किए गए हैं। इनके अतिरिक्त पत्रिका के आगामी विशेषांक पूर्वोत्तर भारत विशेषांक, काव्य आलोचना विशेषांक, संपादक एवं संपादकीय विशेषांक, बाल शोषण इत्यादि प्रस्तावित है जिनपर कार्य किया जा रहा है। इन विशेषांकों में लेखन हेतु आपका स्वागत है।

जनकृति वर्तमान में विश्व के दस से अधिक रिसर्च इंडेक्स में शामिल है। इसके अतिरिक्त जनकृति की इकाई विश्वहिंदीजन से विगत दो वर्षों से हिन्दी भाषा सामग्री का संकलन किया जा रहा है साथ ही प्रतिदिन पत्रिकाओं, लेख, रचनाओं का प्रचार-प्रसार किया जाता है। जनकृति की ही एक अन्य इकाई कलासंवाद से कलाजगत की गतिविधियों को आपके समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है साथ ही कलासंवाद पत्रिका का प्रकाशन भी किया जा रहा है। जनकृति के अंतर्गत भविष्य में देश की विभिन्न भाषाओं एवं बोलियों में उपक्रम प्रारंभ करने की योजना है इस कड़ी में जनकृति पंजाबी एवं अन्य भाषाओं पर कार्य जारी है।

जनकृति के द्वारा लेखकों को एक मंच पर लाने के उद्देश्य से विभिन्न देशों की संस्थाओं के साथ मिलकर ‘विश्व लेखक मंच’ के निर्माण का कार्य जारी है। इस मंच में विश्व की विभिन्न भाषाओं के लेखकों, छात्रों को शामिल किया जा रहा। इस मंच के माध्यम से वैश्विक स्तर पर सृजनात्मक कार्य किये जाएँगे।

धन्यवाद

-कुमार गौरव मिश्रा

इस अंक में ....

साहित्य-विमर्श/

Literature Discourse


शोध आलेख एवं लेख


पृष्ठ संख्या

कविता


सोनू चौधरी की कविताएँ


7

कहानी


ललिया: तेजस पूनिया


8-13


ललिया: डॉ. अनीता कुमारी यादव


14-16

लघुकथा


डॉन्ट डिस्टर्व मी: डा मधु त्रिवेदी


17

पुस्तक समीक्षा


जमीनी ह़की़कत की आसमानी दास्तान : मेरे बाद ..

समीक्षक: भागीनाथ वाकळे


18-24


टूट गये वीणा के तार : एक दृष्टि

समीक्षक: डॉ.राहुल उठवाल


25-29


दंगों की व्यथा-कथा का मर्मस्पर्शी पाठ

समीक्षक: प्रोमिला


30-32


व्यंग रचनाओं का अव्दितीय संग्रह है `मेथी की भाजी और लोकतंत्र`

समीक्षक: दीपक गिरकर


33-34


मदारीपुर जंक्शन:बालेन्‍दु द्विवेदी

व्यंग्यात्मक उपन्यासों की कड़ी में एक और सशक्त किस्सागोई:ओम निश्चल


35-39


संस्कार सभ्यता संस्कृति एवं स्वदेशी का सामासिक समन्वय है "वर्णिका"

समीक्षक : अवधेश कुमार 'अवध'


40-41

व्यंग्य


नई करेंसी का आगमन: संजय वर्मा "दृष्टि "


42

ग़ज़ल


दो ग़ज़लें : डॉ. सुधीर आज़ाद


43

लेख


हिन्दी भाषा लाएगी कश्मीर के पर्यटन उद्योग के अच्छे दिन: डॉ अर्पण जैन 'अविचल'


44-47

कला- विमर्श/ Art Discourse


शोध आलेख एवं लेख


पृष्ठ संख्या


नाट्य निर्देशन की प्रक्रिया में मुक्तिबोध की कविता अंधेरे में: डॉ. सतीश पावड़े [आलेख]


48-52

दलित एवं आदिवासी- विमर्श/ Dalit and Tribal Discourse


शोध आलेख एवं लेख


पृष्ठ संख्या


डॉ बाबा साहेब अंबेडकर की दृष्टि में स्त्री-मुक्ति: डॉ संतोष राजपाल [शोध आलेख]


53-58


हिंदी दलित कविता के प्रेरणास्रोत डॉ. बाबा साहब अंबेडकर: डॉ. जी. राजु [आलेख]


59-63

स्त्री- विमर्श/ Feminist Discourse


शोध आलेख एवं लेख


पृष्ठ संख्या


बदलते दौर में ग्रामीण नारी: सुरेश चंद मीणा [शोध आलेख]


64-67


सेवासदन उपन्यास में यौनकर्मी जीवन-संघर्ष: राजबहादुर पुष्कर [आलेख]


68-73

शोध आलेख/ Research Article


शोध आलेख


पृष्ठ संख्या


राजेश जोशी का आलोचनात्मक गद्य: डॉ. राकेश कुमार सिंह


74-87


वर्तमान समय में संत कबीरदास के विचारों की प्रासंगिकता: डॉ.संतोष गिरहे


88-91


भारत में चीनी डायस्पोरा की सामाजिक गतिशीलता का अध्ययन: विजय कुमार


92-104


कथा-साहित्य के लोकतंत्र में महानगर: डॉ. अंकिता तिवारी


105-112


समकालीन हिंदी साहित्य : वृद्ध विमर्श- डॉ. रंजीता परब


113-118


सामाजिक सन्दर्भों में रामचरितमानस का मूल्यांकन: डॉ. योगेश राव


119-126


स्वदेश भारती के उपन्यासों में बदलते जीवन मूल्यों का चित्रण: पिंकी कुमारी बागमार


127-131


हिंदी साहित्य में अस्मिता बोध: रणजीत कुमार सिन्हा


132-135


कश्मीरी गरीब मजदूरों के शोषण और उत्पीड़न की महागाथा

(पत्थर अलपत्थर उपन्यास के विशेष संदर्भ में) -योगिता


136-142

अनुवाद/ Translation


शोध आलेख


पृष्ठ संख्या


(अनूदित इतालवी कहानी) जिगरी यार

मूल लेखक : लुइगी पिरांदेलो

अनुवाद : सुशांत सुप्रिय


143-145

नू चौधरी की ५ कवितायें

फितरत

ये पुल की फितरत है

सब का भार सहन करना

और फितरत ये नदी के मुहाने की

पानी की टकराती धार वहन करना

पर्वत की फितरत

गडरिये के किस्सों की

पोटली संभाले रखना

सागर की फितरत है

नदी के मैले पानी को

अपनी साफ़ नजर देना

बारिश की फितरत

बादल को चीर देना

..और तुम्हारी

मुखर मौन

गिरते उठते मौसम की मानिंद

सारी सुवासों से भीगा था मन

बस एक कसक बाकी थी

इधर उधर की बातों के बीच

लम्बी चुप्पी का अन्तराल

और इस मौन में

मुखर होने की कुलबुलाहट

ये तो नयी बात हुई

पुराने किस्सों को खंगालना

दिन भर यादों की अंजुरी भर महकना

बिना बात के छोटी को धौल जमाना

कनखियों से देख कर मुस्कराना

इस उम्र में नवेली जैसी चाल

क्या हो गया तुम्हें

तरेरती नजरों में उठे सवाल

अब किस किस को

क्या क्या बताएं

जाना है उस पी के घर

जहाँ से लौटना नहीं

नयी बात इसलिये

कह दी, कर दी बस

कहीं कोई मलाल न रह जाये

रिश्ते

तल्ख़ ख़ामोशी के बीच

गुनगुनाती हवाएं

रूह को आजाद करती

बादल की बोलियाँ

कितनी दूर तलक

मौसम संभालेगा

संबंधों की धूपछाँव को

ज़िन्दगी

रोटी सी सिकती है

तेरी मेरी प्रेम कहानी

जरा सा झंझावत आते ही

अधपकी रह जाती है

हाँ कभी कभी

भुनते, भूनते

जल भी जाती है

खो जाते हैं जब

एक दूसरे के अहं में हम

कवियत्री सोनू चौधरी

विगत 16 वर्षों से रचनात्मक लेखन के क्षेत्र में सक्रिय. मैं प्रमाणित करती हूँ कि यह रचना पूर्णतया मौलिक़, अप्रकाशित एवं अप्रसारित है।यह रचना केवल आपको ही भेजी गई हैं।

पता- सोनू चौधरी 301/5, राजापार्क, व्यास मार्ग, शांति पथ जयपुर (राजस्थान) पिन 302004 मोबाइल 9413677414 sonu.choudhry@gmail.com

कल्याणी

तेजस पूनिया

दुःख सुख का ये संगम है... मेरा गम कितना कम है... लोगों का ग़म देखा तो... पास से गुजर रहे ऑटो रिक्शा में यह गाना बज रहा था और मैं मद्धिम-मद्धिम कदमों से पैरों को जानबूझ कर आगे पटकते हुए सी न जाने किस रास्तों पर चली जा रही थी । यूँ अपने पिता की तीन बेटियों में मैं बीच की थी । पूरा हँसता-खेलता परिवार था हमारा किसी चीज की कोई कमी नहीं थी । हम आराम से अपने परिवार के साथ गुजारा कर रहे थे । मेरे दिल, दिमाग दोनों खाली से थे । दिल की धड़कन के अलावा बस एक चीज थी जो चल रही थी वह थी मेरी शादी । मैं अपनों की अंगुश्तनुमाई (बदनामी) की चिंता किए बिना घर से भाग आई थी । घर से भागते समय मैंने देखा पिता जी और माँ रिश्तेदारों से हंस मिल रहे थे और मेरी बड़ी बहन मनोरमा अपने पति के साथ शादी के इंतजाम देख रही थी । छोटी बहन ममता अपनी सखी-सहेलियों में व्यस्त हंसी-ठिठोली कर रही थी । शादी से भाग आने का कारण था मेरी मर्जी और इच्छा के बिना शादी का होना । ऐसा नहीं था कि मुझे कोई और लड़का पसंद था या कोई मेरी जिंदगी में आने के लिए तैयार था । दरअसल यह शादी मेरे मुंशी पिता के एक धनी दोस्त के अधेड़ उम्र हो चले लड़के के साथ हो रही थी । लड़का मुझसे उम्र में सोलह साल बड़ा था और पिता के दोस्त का इकलौता लड़का ।

हर बाप की बेटी को लेकर चिंता होती ही है कि वह जल्दी ही उसके हाथ पीले कर गंगा नहा आए । मेरे पिता को भी लगने लगा था कि जैसे-जैसे मैं अपनी जवानी कि दहलीज पर कदम बढाती जा रही हूँ वैसे ही उन पर बोझ भी बनती जा रही हूँ । बड़ी बहन जिसकी अंजल (बड़ी-बड़ी आखों) और अंजस (पवित्रता) की हर कोई तारीफ़ किया करता, ने कोई ना-नुकर किए बगैर पिता ने जिसका हाथ पकड़वाया बस सात फेरे ले, सात जन्म साथ निभाने के वादों-कसमों के साथ उसकी संगी हो ली । मेरे पिता ख्यातिराम यूँ तो बड़े ईमानदार तथा रुपए पैसे, हिसाब-किताब के पक्के और अक़्दे अनामिल थे पर रिश्तों, शादी-ब्याह के मामले में वे सदैव कच्चे ही रहे ।

जब मुझे पहली बार लड़के वाले देखने आए तभी पिता जी ने माँ से कहा था –

पिता जी- सुषमा देखों कल्याणी को देखने आ रहे हैं, आवभगत में कोई कसर न रहे और पहला रिश्ता ही पक्का समझो, इकलौता लड़का है । अच्छी जमीन-जायदाद का मालिक भी । कल्याणी को ठीक से तैयार करके उनके सामने लाना । (सारे निर्देश एक साथ देते हुए पिता जी अपने काम को निकल गये और पीछे माँ अज्जी सुनो तो... कहते ही रह गई ।

पिता जी के घर से जाते-जाते उनकी आवाज भी शांत हो गई किन्तु जो हल्के से स्वर सुनाई दे रहे थे लगता था जैसे वो घर वालों को कम गली-मोहल्लों वालों को ज्यादा सुना रहे हों । इतने बड़े घर की बहु बनकर अपना नाम सार्थक कर लेगी बेटा कल्याणी...

जैसे ही मैंने ये सुना मैं न जाने किन ख्यालों में गुम हो गई ... साल 1995 का वह जाता हुआ आखिरी महिना मेरे ख़्वाबों को और हवा देने लगा । कारण उस साल शाहरुख खान की दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे पर्दे पर लगी थी । मुंशी जी का घर और उनकी बेटी होने के नाते घर की माली हालत भी ठीक-ठाक थी । इतनी कि हम बहनें साल में 2, 4 फ़िल्में तो देख ही आते । शाहरुख और काजोल की जोड़ी ने इस बार धूम मचा दी थी और मैं भी दिन-भर मेरे ख़्वाबों में जो आए... आके मुझे छेड़ जाए... रुक जा ओ दिल दीवाने... जरा सा झूम लूं मैं... गाने सारे दिन सुना करती । घर में टी० वी० तो था नहीं । एक टेप रिकोर्डर था जिसमें कैसेट लगा मैं और मेरी छोटी बहन रंगीन, सपनीली दुनिया के चक्कर लगा आते । फिल्म देखकर आने के बाद हम तीनों बहनें घर में शोर मचा रही थीं माँ को फिल्म की कहानी सुनाते हुए कि पिता जी आ धमके । शाहरुख की फिल्म का असर यूँ हुआ कि पापा या पिता जी कहने के बजाए हमने भी बाऊ जी कहना शुरू कर दिया ।

बाऊ जी ने एक बार इसके लिए डांटा भी था पर फिर बाद में कुछ नहीं बोले । उन्हें इस फ़िल्मी दुनिया से कोई विशेष लगाव नहीं था इसीलिए वे हमेशा खलनायक, मोगैंबों, डॉ० डैंग और गब्बर न जाने क्या क्या बने रहते ।

घर आते ही बाऊ जी बोले - मनोरमा एक गिलास पानी ला बेटा ।

तब दीदी कुछ दिन के लिए घर आई हुई थी । दीदी पिता जी के हमेशा करीब थी । हिन्दुस्तान के परिवारों में बड़ी और पहली संतान के प्रति कुछ विशेष प्रेम होता ही है । दीदी पानी का गिलास ले आई और बाऊ जी उसे वहीं पास बिठा मेरी शादी की बात करने लगे । मैं वहीं बैठी सब सुन रही थी इतने में दीदी बोल पड़ी देखो बाऊ जी शर्म ही नहीं इसे कैसे बातों के मजे लिए जा रही है । फिर दीदी एकदम कड़क अंदाज में बोली चल जा कमरे में और अपना काम कर ।

मैं हमेशा से ही चंचल, जिज्ञासु, तेज दिमाग तो थी ही किन्तु दीदी और बाबू जी कि नजरों में बेशर्म भी । 90 के दशक में जहाँ एक और लड़कियाँ अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होने लगी थी वहीं हमारे यहाँ आज भी वही पुराने रंग-ढंग थे । दीदी ने तो शादी कर ली लेकिन मुझे लेकर माँ-बाऊ जी दोनों चिंतित थे । रिश्ता तो पक्का हो चुका था पर मैं उस समय एम० बी० ए की पढ़ाई कर रही थी इसलिए शादी एक साल के लिए टाल दी गई ।

एम०बी०ए की परीक्षा देते ही साल 1996 की वो अप्रैल मेरी जिंदगी में क्या मोड़ लेकर आएगी मैं भी नहीं जानती थी । बाऊ जी के जोर देने पर मैं शादी के लिए तैयार तो हो गई पर मैं अपने करियर को तरजीह देना चाहती थी और शादी के बाद इसके बारे में सोचना भी मेरे लिए दुष्कर था । दुष्कर इसलिए कि जहाँ शादी तय हुई वह पहले से ही खाता-पीता एवं समृद्ध परिवार था । शादी का दिन जैसे-जैसे नजदीक आ रहा था मुझ पर निगरानी बढ़ा दी गई क्योंकि मैंने एक बारगी रिश्ते के लिए मना जो किया था और उस दिन घर में कोहराम मच गया था ।

बाऊ जी – (एकदम कड़क अंदाज में बोले) सुषमा देख समझा ले अपनी लाड़ली को... ज्यादा सर चढ़ा रखा है... तू जानती है मैं ज्यादा इनको पढ़ाने के पक्ष में कभी नहीं था... ये तुम्हारी ही जिद थी तो भुगतो अब !

मैं – माँ मैं कह रही हूँ मुझे नहीं करनी शादी उससे बुढ़ऊ से ।

माँ – (धीरे से कल्याणी के सिर पर चपत लगाते हुए बोली) हट पगली ऐसे नहीं कहते ! तेरा होने वाला खाविंद है वो ।

मैं – तो !

माँ – तो ? ऐसे नहीं कहते बेटा । पति परमेश्वर होता है ।

कल्याणी हँसते-हँसते लोट-पोट हो गई और पेट पकड़ कर कई देर हँसने के बाद फ़िल्मी अंदाज में बोली माँ पति और परमेश्वर !

तू भी ना माँ किस दुनिया की बातें करती है । फिर एकदम से गंभीर स्वर में बोली माँ मैं ये शादी नहीं करूँगी । मैं ये घर छोड़ कर भाग जाऊँगी अगर बाऊ जी ने...

जैसे-तैसे शादी का दिन भी आ गया । एक हफ़्ते से घर में चहल-पहल थी । रेशमा चाची, संतोष ताई जी और बाऊ जी की बहनें रज्जो देवी, शंकुतला देवी भी आ पहुंची । हल्दी रस्म पूरी हुई और शादी से ठीक एक दिन पहले घर में माता रानी का जागरण रखा गया जिसमें अड़ोस-पड़ोस के लोग और दूरदराज के मेहमान, व्यापारी, व्यवसायी, हमारे दोस्त सभी शामिल हुए ।

जागरण वाला दिन मेरे लिए सबसे भारी था और मैं शीशे के सामने बैठी हुई मन ही मन सोचने लगी ... या तो इतनी पढ़-लिखकर भी उस अमीरजादे के बच्चों की माँ बनूँ और मनोरमा दी की तरह घुटती रहूँ पर मुँह से एक शब्द न निकले । ऐसा करके उन सभी की नजरों में एक अच्छी बेटी, एक अच्छी पत्नी, बहु और माँ बन जाऊँगी पर मेरे सपनों का क्या ? स्कूल, कॉलेज में आज तक महिला अधिकारों से लेकर आत्मनिर्भरता, सशक्तिकरण पर जो लंबे-लंबे भाषण दिए वाद-विवाद प्रतियोगिताएँ जीती क्या वो महज प्रतियोगिता ही रह जाएंगीं ? नहीं... मुझे अपने भविष्य को बेहतर बनाने के लिए इस जंजाल से बाहर निकलना ही होगा ।

अचानक मेरे दिमाग के तेज-तर्रार दौड़ने वाले घोड़े भी न जाने कहाँ लंगड़ा गए । कुछ देर की उधेड़बुन के बाद एकदम से खड़ी हुई और बैतूल खला में घुस गई वहीं से कॉलेज की एक दोस्त शिवानी को फोन किया वह मेरी शादी में शिरकत के लिए कई दिन पहले से ही मेरे घर आ गई थी । शिवानी के कमरे में दाखिल होते ही पास बैठी कुछ लड़कियों को मैंने बाहर भेजा और फुर्ती से गेट अंदर से बंदकर शिवानी से मदद मांगने लगी ।

मैं – शिवानी देख यार तू तो सब जानती, समझती है अच्छे से... मम्म... मैं ये नहीं कर सकती ।

शिवानी - क्या कह रही है । मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा ।

मैं – अरे यार मैं ये शादी... नहीं करना चाहती ।

शिवानी – अरे पागल हो गई क्या ? क्या कह रही है तू जानती है ?

मैं – जानती हूँ इसीलिए कह रही हूँ । तू तो जानती है मुझे मैं कितना लड़ती आई हूँ अधिकारों के लिए... ऊपर से वो... (कहते कहते रुक गई)

शिवानी – क्या लड़ती आई है ? कुछ भी मत बोल और वो कौन ?

मैं- यार स्कूल, कॉलेज की प्रतियोगिताएँ भूल गई ? कितनी तारीफ़ होती थी और हमेशा फर्स्ट आती थी ।

शिवानी – देख कल्याणी प्रतियोगिता और असल जिंदगी में बहुत अंतर होता है ऐसा करके तू अपने घर वालों को अजीयत का शिकार बना देगी और फिर जीजा जी भी तो अच्छे घर से हैं ।

मैं – तो ? अच्छे घर से होना सबकुछ होता है ? तू इतना कैसे बदल सकती है तू भी तो कितना बोलती थी स्त्री अधिकार, सशक्तिकरण को लेकर ।

शिवानी – यार तू पागल तो नहीं हो गई ? ये फ़िल्मी और स्कूल, कॉलेज का भूत उतार सर से और शादी कर ले ।

मैं – यार ऐसे कैसे तू तो समझ कम से कम ।

शिवानी – मुझे कुछ नहीं समझना और उस पर से अंकल, आंटी की अज्मत मिट्टी में मिला देगी ? अभी देख तेरी छोटी बहन की शादी भी नहीं हुई ।

मैं – चुपचाप सब सुनती रही फिर बोली अधिकार से ज्यादा कर्तव्य निभाने पर मैं भी जोर देती थी लेकिन ये कैसे कर्तव्य शिवानी ? जहाँ खुद को मिटा दिया जाए ?

शिवानी – देख कल्याणी तू ऐसा कुछ नहीं करेगी... जिससे बाद में तेरे साथ-साथ तेरे घर वाले भी कहीं मुँह दिखाने लायक ही न... कहते हुए शिवानी कमरे से बाहर निकल गई ।

और मैं यूँ ही उहापोह में बैठी रही । फिर एकदम से उठी बैग में कुछ कपड़े डाले और दुल्हन वेश में ही खिड़की से बाहर कूद गई । पीछे घर में क्या कोहराम मचा होगा उसका अंदाजा मैं लगा सकती थी ।

हाँफते दौड़ते रेलवे स्टेशन पहुँची, टिकट ली और लखनऊ जा रही ट्रेन में चढ़ गई । मैं नहीं जानती थी कि आगे क्या होने वाला है ? पर मुझे ख़ुशी थी कि अब कम से कम मुझे मन्नू दी की तरह जिंदगी नहीं गुजारनी पड़ेगी । कल्याणी के जिंदगी जीने को लेकर अपने उसूल थे जिनसे वह कभी पीछे नहीं हटी थी । लखनऊ पहुँच कुछ समय बाद उसे एक बड़ी सी कम्पनी में नौ से पाँच की नौकरी तो मिल गई साथ ही रहने को घर किन्तु कुछ दिन बीते कि उसे अपने घर की याद सताने लगी । एक बारगी तो उसे पछतावा हुआ अगले ही पल वह खुद को बाऊ जी का बेटा बनने के सपने और अपने नाम को सार्थक कर लेने के नाम पर दिलासा देने लगती । इसी बीच एक दिन कम्पनी से घर लौटते समय उसे चार-पाँच अनजान लडकों ने घेर लिया और फिर उसके साथ वह सब कुछ हुआ जिसका उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था उन्होंने उसके अंदामे निहानी (गुप्तांग) को बुरी तरह से जख्मी कर दिया था । इस हादसे के बाद कल्याणी एकदम टूट सी गई और अपने आप को कोसने लगी । इस बात की खबर जब उसके बाऊ जी और परिवार को लगी तब माँ ने रो-रोकर घर आसमान पर उठा लिया

किन्तु बाऊ जी बडबडाते जा रहे थे – ऐसी नाफरमान, बदगुमान औलाद को सजा मिलनी ही चाहिए ।

कल्याणी अस्पताल में जख्मी हालत में भर्ती थी इधर पुलिस उसके घर जा उसके परिवार को पूछताछ के लिए लखनऊ ले आई परन्तु बाऊ जी ने साथ जाने से साफ़ इनकार कर दिया ।

15-20 दिन की तकलीफ से गुजरने के बाद कल्याणी को अस्पताल से छुट्टी तो मिल गई साथ ही उसे कम्पनी से यह कहकर निकाल दिया गया कि बाकि कर्मचारियों की निजी जिंदगी और कम्पनी की साख पर भी इस बात का असर पड़ेगा । तब अपने स्वाभिमान, सशक्तिकरण, आत्मनिर्भरता से भरपूर व्यक्तित्व को लेकर उसने फिर से नई जिंदगी बनाने का फैसला किया ।

उसकी माँ और बहन वापस गाँव लौट चुके थे घर पहुँचते ही बाऊ जी ने कल्याणी का हाल जानने कि कोशिश की । आखिर ठहरा एक पिता का दिल । कल्याणी की माँ उस हादसे के बाद से हलकान सी थी । ममता ने जब सारी बात बाऊ जी से कही तो अपनी बेटी का हाल सुन उन्हें पक्षाघात हो गया । जब यह घटना घटी थी तब भी ख्यातिराम को दिल का दौरा पड़ा था । जिसके बाद डॉक्टरों ने बेहद सावधानी बरतने को कहा था ।

पक्षाघात का शिकार होने पर उन्हें दिल्ली इलाज के लिए रेफर किया गया । इधर ममता ने कल्याणी को फोन पर सारी खबर पहले से ही दे दी थी । कल्याणी अब जिस नई कम्पनी में कम्पनी के मालिक की निजी सचिव के पद पर काम कर रही थी, की मदद से उसने दिल्ली के एक बड़े नामी अस्पताल में अपने बाऊ जी का इलाज कराने लगी । कल्याणी रोज अपने बाऊ जी से मिलने आती परन्तु उन्हें खिड़की से ही देखकर वापस चली जाती । उसकी अंदर आकर बाऊ जी को देखने, उनके पास कुछ देर बैठने की हिम्मत नहीं हुई ना ही वह अपने किए गुनाहों की माफ़ी मांगने का हौसला कर पाई । एक दिन देर शाम जब वह बाऊ जी से मिलने का हौसला कर अस्पताल आई उसी दिन उसने देखा कि पिता जी अब अपने अंजामिंद (अंतिम अंजाम) की और कदम बढ़ा रहे थे, डॉक्टर साहब चद्दर से बाऊ जी का मुँह ढक रहे थे और उनके मुँह पर लगी हुई ऑक्सीजन किट भी हटाई जा चुकी थी । कल्याणी वहीं दीवार के सहारे से धीरे से फर्श पर बैठ गई और शून्य में ताकने लगी ।

रचनाकार परिचय

तेजस पूनिया

सम्पर्क - Flat No.- A-2172, First Floor, Front Side,

Green Field Colony, Faridabad

Hariyana – 121003

+919166373652, +9198802707162

ई-मेल- tejaspoonia@gmail.com

शिक्षा- स्नातकोत्तर उत्तरार्द्ध, राजस्थान केन्द्रीय विश्वविद्यालय

प्रकाशन- जनकृति अंतर्राष्ट्रीय ई-पत्रिका, हस्ताक्षर मासिक ई-पत्रिका, अक्षरवार्ता अंतर्राष्ट्रीय रेफर्ड जनरल, विश्वगाथा त्रैमासिक अंतर्राष्ट्रीय प्रिंट पत्रिका, आरम्भ, परिवर्तन-त्रैमासिक ई-पत्रिका, ट्रू मिडिया, पिक्चर प्लस ब्लॉग, ब्लॉग सेतु, विश्व हिंदीजन ब्लॉग, सहचर त्रैमासिक ई-पत्रिका, प्रयास कनाडा से प्रकाशित ई-पत्रिका, आखर हिंदी डॉट कॉम, सर्वहारा ब्लॉग, सरस पत्रिका, सृजन समय, प्रतिलिपि डॉट कॉम आदि विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं, किताबों आदि में कविताएँ, लेख, कहानी एवं फ़िल्म समीक्षाएं प्रकाशित तथा कई राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों में पत्र वाचन एवं प्रकाशन

ललिया

-डॉ. अनीता कुमारी यादव

“मुझे नहीं जाना ससुराल, यहीं

रहकर घर के सारे काम करूंगी।

मुन्ना, सिपहिया, बाबा, अम्मा और

तुम्हारी सेवा करूँगी, मुझे नया घर

नहीं चाहिए दादी। पुराना घर ही अच्छा है।”

ललिया ओ ललिया, जा भाई को स्कूल के लिए तैयार कर दे। आज उसका पहला दिन है इसलिए साथ में तू चली जाना और जाते समय बाबा को खेत में सत्तू पहुँचा आना। ललिया कहती है - हाँ – हाँ मैं ही बची हूँ ना घर का सारा काम निपटाने के लिए? भैया को तो कुछ नहीं कहती, सारा दिन आवारा की तरह कभी झुरमुटिया के वहाँ तो कभी श्यामवा के घर, तो कभी वागिचा में निंबोंरियों पर अपनी शक्ति आजमाते रहता है। मुझसे पूरे तीन साल बड़ा है और उसकी परवाह भी मैं ही करूं।

तभी ललिया की नजर दादी पर पड़ी, दादी चिल्लाते हुए कहने लगी ललिया जा तो जरा दौड़कर सिपहिया को बुला ला, मैं उसके लिए जलेबी लाई हूँ । रास्ते में जो चंडी स्थान पर हटिया बैठता है न वहीं से गरम – गरम जलेबियां खरीद लाई हूँ। कल मुझसें कह रहा था कि जलेबी खाने का मन कर रहा है। अरे ! यही लोग तो मेरे कूल के दीपक हैं, वंश को आगे ले जाने वाले हैं और मुझे मुखाग्नि भी तो मेरे पोते ही देंगें। तू तो पराई धन है, उल्टे लूट – खसोट के यहाँ से ले जाएगी और तेरे दोनों भाई दहेज लेकर आयेंगें।

उधर मुनिया, टुन्नी, झुन्नु और रेखवा तैयार होकर ललिया के घर आ पड़ी है क्योंकि आज हटिया जाना है। अम्मा अंदर से आती है ललिया को झोला पकड़ा देती है और इस तरह से ललिया के लिये एक और काम बढ़ जाता है। ललिया अम्मा से कहती है सुनो अम्मा मेरे व्याह के लिये जो तुमने जोड़ा सिलवाया है, पीली जड़ियों वाली और जिसमें सितारे और तारे लगे हुये है उसे जरा दादी को तो दिखाओ। दादी को भी तो लगना चाहिये न कि मैं इस जोड़े मे कितनी सुंदर दिखूंगी? क्यों अम्मा सच है कि नहीं।

जा जा देर हो रही है बहुत काम है चौका बरतन में हाथ तो बँटाती हो नही; बाते बनना तो खूब जानती है। कल को जब ससुराल चली जायेगी तो क्या वहाँ सभी के साथ ऐसे ही......

तुम भी न अम्मा; तुम सब लोगों को मेरे पढ़ाई- लिखाई की चिन्ता तो है नहीं, सिर्फ मुझे दूसरे के घर भेजने की बात करती हो। उधर से टुन्नी ललिया से कहती है “ अरे ! ललिया मेरी अम्मा कहती है कि ये सकूल- वकूल, पढ़ाई-लिखाई लड़कियों के किसी काम की नहीं क्योंकि हमलोगों को तो चूल्हा- चौकी करनी पड़ती है ! डॉक्टर, वकिल तो बनना है नही, ये सब काम तो लड़को के हैं।“

चार- पाँच दिनों बाद ललिया को देखने लड़के वाले आते है, ललिया अभी सिर्फ १३ साल की है और जिम्मेदारियाँ तीस सालों वाली । घर के सभी लोग तैयारियों मे लगे हुए है । मोहनराम लड़के वालों की मेहमाननवाजी में लगे हैं और रह‌‌-रहकर लड़की के पिता होने का एहसास खुद को दिलाते रहते हैं । लड़का ललिया से करीब – करीब बीस साल बड़ा है और ललिया उसकी दूसरी पत्नी बनने वाली है। ललिया खुश है कि उसे नया घर मिलने वाला है। वह खुश है कि उसे अब ज्यादा काम नहीं करना पड़ेगा क्योंकि अब उसको अपना घर मिलने वाला है।

वास्तविकता तो यह है कि ललिया नहीं जानती कि वह एक पिंजरे से दूसरे पिंजरे में परिवर्तित हो रही है। घर वही है पर ठिकाना बदल रहा है। भारत में ऐसे कितने परिवार है जो ललिया जैसे अबोध बच्चों के मस्तिष्क में इस बात को बैठा देते है कि उनको तो पराए घर में जाना है, वही उसका अपना घर होगा, पढ़ाई में खर्चे न कर जेवर बनवाने चाहिए और दहेज के लिए पैसे जोड़ने चाहिए।

अचानक से रोने पीटने की आवाज सुनाई पड़ती है। सिपहिया दौड़कर खबर लाता है कि रेखवा को ससुराल वालों ने अग्नि में दहन कर दिया है। पूछने पर पता चलता है कि उसके पिता ने दहेज के कुछ रूपये कम दिए थे इसी कारण उसे घरेलु उत्पीड़न के अन्तर्गत जला कर मार दिया गया है। ललिया अपनी दादी से कहतीहै – “ मुझे नही जाना ससुराल यही रहकर घर के सारे काम करुँगी मुन्ना, सिपहिया, बाबा अम्मा, तुम्हारी सभी की सेवा करुँगी, मुझे नया घर नहीं चाहिए दादी। पुराना घर ही अच्छा है।“

तभी मौसी आती है जो पड़ोस में ही रहती है। गाँव में सबसे अधिक पढ़ी – लिखी (आठवी पास)। अन्य औरतो से समझदार्। कई बार कोशिश करने पर भी ठेकेदारों के षड़यंत्रो के कारण उन्हें लड़कियों को पढ़ाने का मौका नही मिलता। फिर भी वह हार नहीं मानती है जैसे ही मौका मिलता है पहुँच जाती है बाल विवाह रोकने के लिए। साथ ही स्त्री शिक्षा पर अपना वक्तव्य भी पेश करती है परंतु गाँव के किसी लोगों पर इस बात का असर नहीं पड़ता बल्कि ठेकेदारों के लठैतों के कारण गाँव वाले डरे सहमे रहते हैं। पता नहीं कब प्राकृतिक आपदा की मार पड़ जाए, फिर गाँव वालों को ऋण कौन देगी? किसी भी जरुरतमंद इंसानों की तरह गाँव वाले सोचते हैं कि मनुष्य की सर्वप्रमुख जरुरत तो रोटी, कपड़ाऔर मकान की होती है अगर पेट ही न भरा हो तो क्या करेंगे हम शिक्षा का?

मौसी मोहनराम और उसकी पत्नी को समझाने का प्रयास करती है और कहती है कि ललिया अभी अट्ठारह की नहीं हुई अभी पढ़ने – लिखने और खेलने – कूदने के दिन है। अभी से उसका बचपन खराब न करो! कुछ क्लास पढ़ – लिख लेगी तो अपने और तुमलोगों के काम आयेगी, फिर याद करना मुझे। पर दादी भला किसी की सुनने वाली थी ? कहने लगी अरे इसके उम्र में तो मैने पहला बच्चा जना था और इस हिसाब से तो ललिया बहुत बड़ी है। नहीं – नहीं अच्छा लड़का मिला है हम इसे हाथ से न जाने देंगे । जाओ – जाओ कहीं और जाकर अपना भाषण झाड़ो ।

झट से मौसी उत्तर देती है अच्छा लड़का? जिसकी उम्र पैंतिस साल और हमारी ललिया से लगभग बीस – बाईस साल बड़ा है। ऊपर से लड़के की यह दूसरी शादी है। पूरा गाँव जानता है बिपिन की पिछ्ली जिंदगी, इधर – उधर मुँह मारने की आदत है इसी कारण तो उसकी पहली पत्नी ने आत्महत्या कर ली थी। आगे ईश्वर जाने और कितनी ऐंब है उसमें ।

मोहनराम कहता है लड़के वाले ललिया को देख कर जा चुके हैं, पसंद भी कर चुके है और सगुण के पैसे भी दे चुके हैं। अब अगर सगाई नहीं हुई तो लोग क्या कहेंगें? तरह – तरह की बातें बनाऐंगे । हमारी ललिया को दोषी ठहरायेंगें, कहेंगें कि इसकी चाल – चलन ठिक नहीं है, वैसे भी मौसी लड़के के घर में खाने पहनने की कमी नहीं है, ललिया सुखी रहेगी । इस समाज का यह दस्तुर है लड़का कितना भी नालायक क्यों न हो? समाज दोषी नही ठहराता है और लड़की चाहे कितनी भी समझदार हो जरा सी गलती पर समाज उस पर कलंक लगाने से नहीं चुकता और सारा दोष लड़की पर ही आकर ठहर जाता है।

अंतत: मौसी के समझाने पर भी मोहनराम का परिवार नहीं मानता है और ललिया की शादी विपिन जैसे अपंग व्यक्ति के साथ कर देता है। शादी के तीन महिने बाद मोहनराम के घर खबर पहुँचता है कि ललिया बीमार है। दादी कहती है शादी के सिर्फ तीन महिने हुए हैं इसलिए हमलोगों को इतनी जल्दी बेटी के घर नहीं जाना चहिए। हॉलाकि दादी बड़ी थीं, बुजुर्ग थी परन्तु आत्मीयता का भाव उनमें जरा भी न था।

Name : Dr. ANITA KUMARI YADAV

Address : WBNVF, GATE NO. 2, SURYASEN COLONY, KUMOR PARA, PO-KANCHRAPARA, PS-BIZPUR, DIST : NORTH 24 PARGANAS, PIN-743145

Worked : - SREEGOPAL BANERJEE COLLEGE, MAGRA, HOOGHL

Mobile No. 8240762235 / 9804114530

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डॉन्ट डिस्टर्व मी

-डा मधु त्रिवेदी

क्या रोज की खीच -खींच मचा रखी है "तुमने यह नहीं किया तुमने वो किया " यह कहते हुए सोनाली ने शुभम को अनदेखा कर अपना पर्स उठाया और चल दी। आटो स्टैण्ड पर आ आटो में बैठ आफीस की ओर चल दी, उतर कर कुछ दूरी आफीस के लिए पैरों भी जाना होता था। आफीस में पहुँचते ही उसे साथी ने टोक दिया "कि आप लेट हो गयी, "मुँह बना अपने केविन की ओर जा ही रही थी कि पिओन आ बोला "साहब, बुलाते है, पर्स रख साहब के केविन में पहुँची, जी सर। साहब जो एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति था, बोला "व्हाट प्रोब्लम, वाय आर यू सो लेट ? सर आइ नोट लेट, आइ हेव सम प्रोव्लम, आइ ट्राई नाट कम टू लेट। अपनी बात को कहते हुए आगे वॉस के आदेश का इन्तजार करने लगी।

दो मिनट के मौन के बाद बॉस ने आदेश देते हुए कहा कि " सी मी फाइल्स ऑफ इमेल्स, सेन्ट टुमारो" मिसेज सोनाली। "यस सर, इन फ्यू मिनट्स " कहते हुए अपने केविन की ओर चल दी। और फाइल्स को निकालने लगी । लगभग पन्द्रह मिनट्स बाद फाइल्स हाथ में लेकर बॉस के आकर बोली, देट्स फाइल्स।

फाइल्स देखते हुए वाँस, जो एक अधेड़ उम्र का था, गुड सोनाली, कहते हुए प्रोमोशन का आश्वासन दिया। प्रफुल्लित होते हुए घर चली आई दरवाजे पर पैर रखते ही

सुबह शुभम के साथ घटित वाक्या पुनः याद आ गया।

पूरा नाम : डॉ मधु त्रिवेदी

पदस्थ : शान्ति निकेतन कालेज ऑफ

बिजनेस मैनेजमेंट एण्ड कम्प्यूटर

साइंस आगरा

प्राचार्या,

पोस्ट ग्रेडुएट कालेज आगरा

पुस्तक चर्चा

जमीनी ह़की़कत की आसमानी दास्तान : मेरे बाद ..


समीक्षक: भागीनाथ वाकळे

सुंदर है विहग, सुमन सुंदर, मानव तुम सबसे सुन्दरतम

निर्मित सबकी तिल सुषमा से तुम निखिल सृष्टि में चिर निरूपम

प्रकृति के अनुपम सौंदर्य पर अनुरक्त कवि पंत मानव के सबसे सुंदरतम स्वरूप को स्वीकृत करते हैं। करें भी तो क्यों नहीं। प्रकृति में पुष्पों की सुंदरता है, पक्षियों की सुंदरता है। इन सबकी सुंदरता क्या अपने आप में कोई मायनी रखते हैं ; जब तक इन सबकी पृष्ठभूमि में इन्हें देखने, इन्हें महसूस करने वाला कोई न हो। आदमी के बगैर किसी ची़ज का कोई अर्थ नहीं हैं। क्या यह सच नहीं ? ब्रह्मांड में दृष्टिगत भौतिक-अभौतिक, चर-अचर, सुंदर-कुरूप, आकर्षक-अनाकर्षक वह सब आदमी के अस्तित्व से अर्थपूर्ण बनता है। आदमी न हो तो क्या सभी अर्थहीन नहीं है ? यदि हाँ, तो फिर आदमी के बाद ...क्या? परंतु रचनाकार अपने आकल्पन से अपने बाद के संसार की कल्पना कर लेता है। ऐसी कल्पना जैसे एक सिद्ध पुरूष या भविष्यदृष्टा कह देता है कि ‘’यह होगा मेरे बाद...!’’

मेरे हाथ, मेरे बाद... यह पुस्तक जब आयी ; तब उसके मुख पृष्ठ पर अंकित स्वर्णिम अल़्फाज यूँ तो आकर्षित कर गए। वैसे, कनकाभ से भला कौन अनासक्त रह पाया है ? मैंने हाथ पकड़कर यह जाँचना चाहा कि वे शब्द चिपकाए है या रंगों की कारीगरी है। फिर मेरी जिज्ञासा और बढ़ी कि मेरे बाद... क्या ? आखिर मेरे बाद... में क्या चाहते हैं ग़जलकार ? ‘मेरे बाद...में संसार की चिंता है या ग़जल की? क्या स्वर्णिम भविष्य की कल्पना करता है या ग़जल के स्वर्णकाल का आशावादी है ?’ या ‘मेरे बाद....’रदी़फ से कोई ग़जल है? ऐसे कई सवाल मन में गुंजायमान हुए। इसी मालिका चक्र के बीच पृष्ठ उलटाता-पुलटाता हूँ कि एक जगह ठहर जाता हूँ-

मैं इंतजार में हूँ तू कोई सवाल तो कर

यकीन रख मैं तुझे लाजवाब कर दूँगा। (१)

शे’र की व्यंजना अवाक् कर देती है ‘मानो हजारों सवालों’ का एक अचूक उत्तर। ग़जलकार मानो मनोभावों को पहचान गया हो। इसी क्रम का अगला शेर लगभग निरूत्तर कर देता है –

हजार पर्दों में खुद को छुपा के बैठ मगर

तुझे कभी न कभी बेऩकाब कर दूँगा। (२)

गोया जड़ाया गया जबरदस्त तमाचा हो या दिखाया गया साफ-सूथरा आईना। ‘तमाचा और आईना’ में ग़जब का इत्त़फाक था या कहूँ तो अद्भुत संयोग। प्रिय आईने में कोण बदल-बदल कर तमाचा देखना नागवार गुजरा। फिर भी कडुवाहट में ही स्वास्थ्य तथा परिवर्तन का रहस्य छुपा हुआ था। जो पूरा संग्रह पढ़ने के लिए प्रेरित करता है। फिर सरसरी ऩजर से पृष्ठ उलटा ही रहा था कि निम्न शेर दृष्टिगत होते हैं –

मैं मौसमों का थका हूँ, मुझे ह़कीर न जान

मेरे शजर में कभी पत्तियाँ भी आएँगी

मुझे करीब से पढ़ सरसरी ऩजर से न देख

मेरी किताब में दिलचस्पियाँ भी आएँगी । (३)

पेड़ में ‘कभी पत्तियाँ’ और ‘किताब में दिलचस्पियाँ आना’ आशावादी दृष्टिकोण है। वही मनुष्य जीवन का सबसे बड़ा सम्बल है। ग़जलकार जानता है कि आशा की एक चिंगारी मनुष्य में उत्साह का संचार करती है। मुश्किल से मुश्किल परिस्थितियों में भी आदमी को न घबराने की सीख देती है। शाइर पूरी तरह आश्वस्त है कि आदमी की जिजीविषा ही तो है, जो आदमी के मन में ‘संभावना’ बनकर उसे निराश नहीं होने देती तथा निरंतर जीने का मार्ग प्रशस्त करती रहती है। मनुष्य की सकारात्मक सोच को भी विकसित करती है।

ग़जल संग्रह का शीर्षक ‘मेरे बाद......’ भी तो ग़जलकार के दृढ़तम आशावाद का परिचायक है। यहीं आशावाद समूचा संग्रह पढ़ने के लिए प्रवृत्त करता है। वास्तविक शाइर की विलक्षण प्रतिभा से सृजित यह संग्रह निस्संदेह पाठक को अंत तक आबद्ध रखता है।

इस संग्रह की विशेषता है लाक्षणिकता, शिल्प-लाघव, प्रतीकों का व्यंगार्थ, भाषा का स्वाभाविक सौंदर्य एवं सौष्ठव अभिव्यक्ति का नयापन तथा दूसरा कथ्य-वैविध्य। शब्दों का व़जन, शब्दों का चुनाव एवं विचार गंभीरता के मामले में राहत साहब अद्वितीय है। वे उर्दू ग़जल नक्षत्र मंडल के ऐसे तेजस्वी तारा है, जो साहित्य की धरती को अपनी आभा-प्रभा से आलोकित कर रहा है। उनका अंदाज-ए-बयाँ ही कुछ और है। अन्यों से मिलता भी है और औरों से न्यारा भी है। एक खास बात है उनमें, वे अपने पूर्व की उर्दू ग़जल परंपरा को शिद्दत से स्मरण करते हैं। ग़जलों में तरजीह देकर उनके प्रति श्रद्धा –सुमनों को अर्पित करके उस परंपरा को अधिक पुष्ट करते हैं। कुछ अशआर दृष्टव्य हैं –

मैंने देखा है तुझे गौर से ऐ जान-ए-ग़जल

मीर-ओ-गालिब तेरे उलझे हुए बालों में मिले।(४)

ग़जल सुंदरी के बालों में मीर-ओ-गालिब को उलझा हुआ पाना सुंदर व्यंजना है। तथा-

चाँद के माथें पे सूरज का ऩजारा पढ़ लिया

‘मीर’ को हमने सवेरे तक दुबारा पढ़ लिया।।(५)

राहत साहब मुशायरों के सिद्धहस्त अदाकार तो है; लेकिन उनके शेर साहित्यिक दृष्टि से भी समृद्ध है। केवल मंच पर अस्तमित होनेवाली तरन्नुम नहीं है उनकी ग़जलें ; प्रत्युत, साहित्यिक विरासत भी है। साहित्य और मंच का ऐसा दुग्ध शर्वâरा मेल अन्यत्र दुर्लभ है। आजकल ग़जल के अनुशासन तथा तत्व को समझे बगैरे ग़जल लिखना और पढ़ना धड़ल्ले से चल रहा है। ऐसे तथाकथित शाइरों के लिए बकौल राहत –

हमने दो सौ साल से घर में तोते पाल के रक्खे हैं

मीर तकी के शे’र सुनाना कौन बड़ी फनकारी है।।(६)

उपर्युक्त बेमिसाल पंक्तियों से ग़जल की नई इबारत लिखनेवाले कलमकार राहत इंदौरी, मीर-फैज परंपरा के संवाहक कहे जा सकते हैं। उनको केवल उर्दू शाइरों ने ही प्रभावित किया है, ऐसा नहीं। उन्हें हिंदी के सार्वकालिक महान ग़जलकार दुष्यंतकुमार ने भी प्रभावित किया –

पिछले दिनों की आँधी में गुम्बद तो गिर चुका

‘अल्लाह जाने सारे कबूतर कहाँ गए ?’ (७)

दुष्यंत के समान बच्चन जी का प्रभाव भी राहत साहब पर परिलक्षित होता है। हरिवंशराय बच्चन का ‘मिट्टी का तन, मस्ती का मन’ इस परिचयात्मक अंदाज के अनूठेपन से एक कदम आगे जनाब राहत साहब अपने होने का बोध मस्तमौला अंदाज में यूँ देते हैं –

अपने होने का हम इस तरह पता देते थे

खाक मुट्ठी में उठाते थे, उड़ा देते थे।(८)

उमर खैयाम के जीवन दर्शन का प्रभाव तथा रूबाइयों का नशा बच्चन पर चढ़ा; तो मधुशाला, मधुबाला, मधुकलश जैसी कालजयी रचनाएँ हिंदी संसार को मिली। वैसे ही बच्चन की साकी ने राहत साहब का जीवन मस्ती से भर दिया।

तेरा अहसान है जितनी भी मयस्सर कर दे

हाँ, मगर इतनी हो साकी कि गला तर कर दे

इम्तिहा ज़र्प का हो जाएगी सा़की लेकिन

पहले हम सब के गिलासों में बराबर कर दे (९)

ग़जल एक कोमल विधा है। वह न अतिरिक्त शब्दों को सहती है न जबरदस्ती विषय के छेडछाड़ को। भले ही आज ग़जल का आँगन विस्तृत हुआ है, तथा विषयों में विविधता आई हो। सामाजिक संदर्भों से लेकर राजनीतिक दृष्टिकोण तक तथा व्यक्तिगत रिश्तों से लेकर पारिवारिक संबंधों तक इसका दायरा विस्तृत हुआ है। लेकिन उसकी शोभा और साज-सज्जा खंडित न हो। वह रंग-रूप में सजी-सँवरी रहे, जैसी वह प्रेम भाव के शयनकक्ष में थी। विंâतु आज विषयों की विविधता को समेटने के प्रयास में वह बाजारवाद की शिकार हो गई है -

मसाइल, जंग-खुशबू, रंग, मौसम

ग़जल अ़खबार होती जा रही है।।(१०)

इस शेर में ग़जलकार की चिंता स्पष्ट देखी जा सकती है। शायद ‘मेरे बाद......’ शायर को इस बात की चिंता भी सता रही हो।

भूमंडलीकरण के युग में बा़जारवाद नाम की नई अवधारणा प्रयोग में आई है। बा़जार उपयोगी होने के साथ साथ उसका दूसरा पक्ष ऩजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बा़जारवाद ने सीधा प्रहार मानव के बुद्धि पर किया है। यहाँ वस्तु का मूल्य बढ़ गया है और मानव का मूल्य घटा है। यह खतरे की घंटी जो मानव के विनाश की ओर संकेत कर रही है। यहाँ सब कुछ बिकता है ; शर्त यह कि बनावटीपन ओढ़ लिया जाए। मराठी की एक काव्य पंक्ति है –

‘’चिंध्या नेसून सोनं विकायला बसलो, कोणी फिरकता फिरकेना

सोनं लेवून चिंध्या विकायला बसलो, गर्दी हटता-हटेना। ‘’

अर्थात यह बा़जारवाद की नई संकल्पना या पंâडा है। राहत साहब कहते है कि –

तू जो चाहे तो तेरा झूठ भी बिक सकता है

शर्त इतनी है कि सोने की तराजू रख ले।(११)

इस बाजार युग में ऐसा लगता है कि सारे देश का शरीर बाजार में और उनकी शक्ति दुकान में तब्दील हो गई है। घर हो या बाहर जिसे देखो वह सौदा करने में लगा है। बाजार शरीर से ही चलता है ; वहाँ आत्मा का कोई लेना देना नहीं होता। आज व्यक्ति को प्रोडक्ट बनाकर मुनाफे-घाटे में बदल दिया गया है।

उत्पादित वस्तु ऐन केन प्रकारेण विक्रय की जा रही है। इसके लिए सभी हथकंडे प्रयुक्त हो रहे हैं। इसी मानसिकता की उपज है – विज्ञापन। विज्ञापन एक सोची समझी साजिश है जिसमें मनुष्य को बेववूâफ बनाया जाता है। विज्ञापन की दुनिया में प्रसिद्ध के लिए हर कोई खबर में रहना चाहता या बनना चाहता है। इस ओर ग़जलकार ध्यानाकृष्ट करते हैं –

किसी को जख्म दिये है किसी को पूâल दिये

बुरी हो चाहे भली हो मगर खबर में रहो। (१२)

खास शेर की खासियत होती है कि वह घटना वृत्तांत कर केवल यथार्थ नहीं परोसता बल्कि कल्पना की रंगीन दुनिया का स़फर करके खूबसूरत दुनिया सृजित करता है।

खबर मिली है कि सोना निकल रहा है वहाँ

मैं जिस जमीन पे ठोकर लगा के लौट आ़या।(१३)

राहत साहब की शाइरी जिंदगी के अलग-अलग रंगों और शेड़्स के संमिश्रण का बेमिसाल अंदाज है। जिंदगी के विविध कोणों को छूकर उसको व्यक्त करने का अपना अलग अंदाज उनको बड़ा ग़जलकार स्थापित करता है। उन्होंने जिंदगी के विभिन्न पक्षों को इतनें विशाल फलक पर प्रस्तुत करके ग़जल को असीम वैâनवास प्रदान किया है।

स़फर में जितना मजा है, वो मंजिलों पे कहाँ

मैं इस दफा तो बहुत दूर जा के लौट आ़या।(१४)

राहत साहब हमेशा सच के अन्वेषक रहे हैं। मानव का वह सच जिससे स्वयं वह भी वा़किफ नहीं है। उस सच से परिचित कराने के लिए उन्होंने गांडीव उठाया है। उनके पास दूरदृष्टि है और उसे ग़जल में व्यक्त करने का फन। विचारों की ताजगी और अभिव्यक्ति कौशल से वे प्राचीनता को भी आधुनिकता का जामा पहनाकर व्यक्त कर देते हैं। यही विशेषता उनको नामवर ग़जलकार बना देती है।

मैं सबको राम समझ लूँ तो ये भी ठीक नहीं

यहाँ हरेक के काँधे पर इक कमाँ है मियाँ।(१५)

कल्पना के पंख लगाकर उन्मुक्त विचरण करके आकाश की ऊँचाई छूनेवाली यह ग़जल अपनी जमीनी हकीकत को तथा दायित्व को समझती हैं और पुनश्च अपनी जड़ की ओर लौट आती है। विशेष, जमीन पर पैर रखकर आसमान में भी झाँकती है। राहत साहब के यहाँ कथ्य की समृद्धता है। आँखों के सामने आनेवाले प्रत्येक प्रसंग चाहे भले हो या बुरे उनको प्रभावित करते हैं और बड़ी शालीनता से शाइरी का अंग बन जाते हैं। जीवन और जगत के विभिन्न पक्ष उनकी शाइरी में शिद्दत से मौजूद है। चाहे प्रेम का उज्ज्वल पक्ष हो, धार्मिकता, आतंकवाद, राजनीति, बा़जारवाद, मिथकीय चेतना, सांप्रदायिक सद्भाव, फकीराना अंदाज, जीवनानुभव, विभिन्न विमर्श, आर्थिक विसंगतियाँ आदि कतिपय विषय उनके अनुभूत विचारों की भट्टी से पककर आए है -

सुलगते सारे छप्पर लग रहे हैं

कवेलू मकबरों पे लग रहे हैं। (१६)

दिखाई देता है जो भेड़िये के होठों पर

वो लाल खून हमारी सफ़ेद गाय का है।(१७)

हो लाख जुल्म मगर बद्दुआ नहीं देंगे

जमीन माँ है जमी को दगा नहीं देंगे।(१८)

वो पाँच वक्त ऩजर आता है नमा़जो में

मगर सुना है कि शब में जुआ चलाता है। (१९)

खानकाहों में हरम में न शिवालों में मिले

वों फरिश्ते जो किताबों के हवालों में मिले।(२०)

उसकी याद आई है साँसों जरा अहिस्ता चलो

धड़कनों से भी इबादत में खलल पड़ता है।(२१)

मुझे खबर नहीं मंदिर जले हैं या मस्जिद

मेरी निगाह के आगे तो सब धुआँ है मियाँ।(२२)

मुझ पर नहीं उठे है तो उठकर कहाँ गए

मैं शहर में नहीं था तो पत्थर कहाँ गए।(२३)

ऐसे अनेक ‘अशआर’ इस संग्रह में है, जो पाठक के सोच की भट्टी में तपकर सोने की तरह पिघल उठते हैं। जनाब राहत साहब ने प्रतीक चयन, बिम्ब निर्धारण, शब्द-संयोजन, मुहावरों के सटीक प्रयोग से ग़जल का ऐसा कलात्मक पुनः सृजन किया है। यदि पूरी ईमानदारी से कहूँ तो लफ्जों का इतना विलक्षण रचनात्मक इस्तेमाल किया ; जो उनके पूर्व तथा बाद के ग़जलकारों को शायद संभव हुआ हो। इससे राहत साहब की ग़जल की ‘हाइट’ का अंदाजा लगाया जा सकता है।

इस ‘हाइट’ के मापन के लिए भले ही कोई पॅरामीटर उपलब्ध न हो विंâतु सोच के मीटर से अवश्य नापा जा सकता है। केवल विभिन्न विषय ही उनके शाइरी में स्थान पाए है, ऐसा नहीं। ग़जल की बुनियादी विशेषता तथा उसकी संस्कृति को वे भूले नहीं है।

कहते हैं ना कि अरब में ग़जल नामक व्यक्ति था, जिसने अपनी सारी उम्र शराब पीने और इश्क में गुजारी। वह हमेशा हुस्न और इश्क की प्रशंसा किया करता था। तब से ग़जलों में हुस्न और इश्क का वर्णन किया जा रहा है। ग़जल के इस पक्ष को भी वे भूले नहीं है -

न तआरू़फ, न तअल्लुक है मगर दिल अक्सर

नाम सुनता है तुम्हारा तो उछल पड़ता है।(२४)

धोखा दिये पे होने लगा आ़फताब का

जव्रे शराब में भी नशा है शराब का (२५)

पूँâक डालूँगा किसी रोज ये दिल की दुनिया

ये तेरे खत तो नहीं है कि जला भी न सवूँâ (२६)

मेरी ग़जल से बना जहेन में कोई तस्वीर

सबब न पूछा मेरे देवदास होने का।(२७)

वही सुख-दुख, उसी मंजर की तरह लगता है

मैकदे में भी मुझे घर की तरह लगता है।(२८)

उनके इस सहज मस्ती भरे जीवन पर उनकी प्रियत्तमा तथा पत्नी अंजुम रहबर के विरह ने तुषारापात कर दिया। इस आघात को उन्होंने धैर्यपूर्वक बर्दाश्त किया। इस संग्रह में वियोग-वेदना और ह्दय की कसक, पीड़ा एवं छटपटाहट के मार्मिक चित्रण मिलते हैं –

याद है तुझसे बिछ़डने की वो ठंडी रातें

सब तो हर रात में दिसम्बर की तरह लगता है।(२९)

राहबर मैंने समझ रक्खा था जिनको राहत

क्या खबर थी कि वही लूटने वाले होंगे।(३०)

शहर में चर्चा है आ़िखर ऐसी लड़की कौन है

जिसने अच्छे खासे इक शाइर को पागल कर दिया।(३१)

बाद में सीमा राहत के साथ उन्होंने पुनर्विवाह किया। जिससे उनके विषाद की कालिमा को उल्लास और आशा की नवल ज्योत्स्ना में परिणत कर दिया। इस प्रकार उनके जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव आए इसी की अभिव्यक्ति उनके शेरों में हुई है। उनकी ग़जलें मूलत: भावनाओं और अनुभूतियों का दर्पण हैं। वे पारदर्शी आत्मकथा के तौर पर भी पढ़ी जा सकती है।

आपसे एक बात कहनी है, बस इतनी बात थी

मुझको इतनी बात कहने में जमाने लग गए।(३२)

कभी दिमाग, कभी दिल, कभी ऩजर में रहो

ये सब तुम्हारे ही घर है, किसी भी घर में रहो।(३३)

जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण पड़ाव जवानी तो है। यही से जीवन की दशा और दिशा निर्धारित होती है। यह मोड वैâसी पहेली हैं ? ग़जलकार के लिए यह अबूझ ही है –

मोड होता है जवानी का सँभलने के लिए

और सब लोग यहीं आके फिसलते क्यों है।(३४)

दोहराने की आवश्यकता नहीं, यह वही लह़जा है, जो एक अनुभवी और जीवन की आँच पर तपे-तपाए आदमी का होता है।

वास्तविक ग़जल कोमलकांत एवं सुमधुर विधा है। प्रत्युत, वह सभी को अपनी ओर आकृष्ट करती है। ग़जल भले ही संगीतात्मकता और तुकबंदी के कारण पढ़ने में आसान लगती है; किन्तु यह धंधा बड़ा कठिन है। इसमें कड़े अनुशासन की आवश्यकता होती है। अनुशासन के अभाव में ग़जल की ग़जलियत तिरोहित हो जाती है। वस्तुतः ग़जल शब्दों का तार्विâक, सुव्यवस्थित, क्रमबद्ध एवं कि़फायत के साथ प्रयोग करने की कला है। जब भी इसमें से कोई गुण ग़जलकार से छूट जाता है, शेर अपनी शुद्धता एवं विश्वसनीयता खो बैठता है। इस सत्यता से राहत साहब भलीभाँति परिचित है। ग़जलगो शाइर ग़जल के संदर्भ में लोकभ्रम को तोड़ने की कोशिश करते हैं –

हमसे पूछो कि ग़जल माँगती है कितना लहू

सब समझते हैं ये धन्धा बड़े आराम का है।(३५)

‘ये धन्धा बड़े आराम का है’ से शायर ग़जल सृजन में कितना खून जलाना पड़ता है, यह बतलाते है।

अंततोगत्वा ग़जल पठन क्रम के वह अंतिम पृष्ठ थे। मेरे अध्यापकीय स्वभाव के अनुसार मैं ग़जल पर बहुविध चर्चा में व्यस्त था। उसी समय बहुदर्शी ग़जलकार एक शेर दृष्टिगत होता है –

मेरी ग़जल को ग़जल ही समझ तो अच्छा है

मेरी ग़जल से कोई रूख निकालता क्यों है।(३६)

‘शायद कोई रूख निकालना’ उन्हें अच्छा न लगे। फिर भी मेरे द्वारा प्रयास तो किए ही गए थे। बाद में उनकी ग़जल को ग़जल समझने की कोशिश करने लगा। तो स्पष्ट हुआ उनकी वर्णन शैली का जादू ही तो है कि हमें उनकी कहीं हुई बात अपने मन की लगती है और हम निमग्न हो जाते हैं। ऐसे कतिपय सरस, सुंदर तथा अर्थपूर्ण शेरों से ग़जल संग्रह भरा हुआ है। लाजवाब शब्द संयोजन, संगीत का ललित निमज्जन तथा अनुल्लिखित विषयों का परिघट्टन का कुशलतापूर्वक परिशीलन राहत साहब ही कर पाए है।

राहत साहब उन प्रतिष्ठित शाइरों में गणनीय है जो ग़जल के नैन नक्श सँवारने एवं उसके रूप को निखारने में मश़गूल है। हवा की ताजगी, समुंदर की गहराई, इंद्रधनुषी विविधता भावनाओं की ईमानदारी और जिंदगी के नये भावों की तलाश उनकी शाइरी की विशेषता है। सरल, साधारण बोलचाल के उर्दू शब्दों का प्रयोग से मुशायरों एवं ग़जलों में उनकी लोकप्रियता का ग्रा़फ निरंतर ऊध्र्वगामी रहा है। विशेष सादगी और अदायगी के कारण वे ‘कठिन काव्य के प्रेत’ नहीं बल्कि ‘सरल काव्य की आत्मा’ है। यही ‘आत्मा’ उनकी शाइरी की भी मूल आत्मा है।

दृष्यंत के बाद राहत साहब अपने लहजे के लिए जाने जाते हैं। दुष्यंतकुमार अपनी ग़जल के दर्पण में जो कुछ भी है, अपने तीखे, अनोखे एवं आकर्षक अंदाज के कारण हैं ; विषयों एवं विचारों के कारण नहीं ; क्योंकि विषय और विचार तो कई दूसरे कवियों में भी वैसे ही मिल जाएँगे, जैसे दृष्यंत की ग़जलों में है। यहीं तीखा, संजीदा, अनोखा, आकर्षक अंदाज एवं व्यक्तिगत अदायगी का लहजा राहत साहब को उर्दू का दुष्यंत बना सकता है।

वस्तुत: राहत साहब की विशेषता है अभिव्यक्ति की स्पष्टता और दरिया जैसी रवानी। उनके यहाँ शिल्पकारी या क्राफ्ट भी कम से कम पाया जाता है। शिल्प का प्रयोग उतना ही हुआ है जितना शेर को साँचे में ढालने के लिए आवश्यक है, उससे अधिक नहीं। वे शेर को स्वयं ढलने देते हैं, उन्हें अपनी शिल्पकारी से रँगते नहीं। शिल्प भी उनके यहाँ शालीनता से प्रयुक्त हुआ है। यही ग़जलगो शाइर की विशेषता है।

पुनश्च ग़जल के शीर्षक की ओर, अनायास ग़जल पढ़ते वक्त मुझे दुष्यंत का एक शेर स्मरण हो आया जो मेरे आरंभिक प्रश्नों का कुछ बयाँ कर रहा है -

मेरे गीत तुम्हारे पास सहारा पाने आएंगे

मेरे बाद.. तुम्हें ये मेरी याद दिलाने आएंगे।

अंततः एक ही वाक्य में कहूँ तो मेरे बाद... आधुनिक शाइरी (ग़जल) का एक अहम दस्तावे़ज है।

पुस्तक का नाम - मेरे बाद ........(ग़जल संग्रह)

ग़जलकार – राहत इंदौरी

लिप्यंतरण – अनुराधा शर्मा

राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली

प्रथम संस्करण-२०१६

मूल्य – ९९/-

भागीनाथ वाकळे

रिव्हरडेल हाई स्वूâल, औरंगाबाद

९४०४९८८८१३

महाराष्ट्र

संदर्भ :

१) मेरे बाद साहत इन्दौरी पृ. ४५

२) वही पृ. ४५

३) वही पृ.८९

४) वही पृ. ३४

५) वही पृ. ६०

६) वही पृ. ८४

७) वही पृ. ३४

८) वही पृ. ५६

९) वही पृ. ६४

१०) वही पृ. ४२

११) वही पृ. ८१

१२) वही पृ. ७९

१३) वही पृ. ५८

१४) वही पृ. ५८

१५) वही पृ. ३७

१६) वही पृ. २३

१७) वही पृ. २४

१८) वही पृ. २८

१९) वही पृ. ३०

२०) वही पृ. ३४

२१) वही पृ. ३६

२२) वही पृ. ३७

२३) वही पृ. ३९

२४) वही पृ. ३६

२५) वही पृ. ७२

२६) वही पृ. ७१

२७) वही पृ. ४८

२८) वही पृ. ४९

२९) वही पृ. ४९

३०) वही पृ. ६५

३१) वही पृ. ६६

३२) वही पृ. ७७

३३) वही पृ. ७९

३४) वही पृ. ८२

३५) वही पृ. ८६

३६) वही पृ. ८७

टूट गये वीणा के तार : एक दृष्टि


समीक्षक – डॉ.राहुल उठवाल

लेखक: डॉ. देवकीनंदन शर्मा (डॉ. डी. एन. शर्मा)

पुस्तक: टूट गये वीणा के तार

प्रकाशक : ओशन पब्लिकेशन रामपुर, उत्तर प्रदेश

प्रकाशन वर्ष: २०१२

कुल पृष्ठ: १०५

मूल्य:१५०


आई एस बी एन: ८१-९०२७२४-७-१

‘टूट गये वीणा के तार’ श्रद्धये डॉ. डी. एन. शर्मा जी द्वारा रचित द्वितीय काव्य संग्रह है । ‘टूट गये वीणा के तार’ के रचेयता डॉ. डॉ. डी. एन. शर्मा का जन्म १० जनवरी १९४६ ई. को उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जनपद में हुआ था । आपने शास्त्री, एम. ए (हिन्दी) वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी) एवं पी-एच.डी की शिक्षा प्राप्त की । आप अपनी विद्वता के कारण महात्मा गांधी मेमोरियल कॉलेज, सम्भल (उ.प्र.) में प्राचार्य, उपाचार्य एवं हिन्दी विभागाध्यक्ष रहे हैं । अपनी कर्त्तव्यनिष्ठा तथा प्रशंसनीय कार्यों के लिए आपको सन २००३ में मैन ऑफ द ईयर (यू. एस. ए.) पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया । इसी के साथ आप शिक्षा संबंधी कई उच्च पदों पर आसीन रहें ।

‘एको रस करुण एव’ अर्थात सभी रसों में करुण रस ही प्रधान है, भवभूति की यह उक्ति कविवर डॉ. डी.एन. शर्मा जी द्वारा रचित काव्य - संग्रह ‘टूट गये वीणा के तार’ में सत्य प्रतीत होती है । यह काव्य - संग्रह कवि की जिजीविषा, आशावादी दृष्टि और विपरीत परिस्थितियों से संघर्ष के अदम्य साहस का अनुभव देता है । इस काव्य संग्रह में स्मृति शीर्षक में लिखी गयी कविताओं में करुण करुण रस की धारा निरन्तर बही है । पीड़ा की अनुभूति और उसकी संवेदनात्मक अभिव्यक्ति कविता की अन्यतम विशेषता है । आत्मचिंतन, मानवतावादी दृष्टि तथा परिवर्तन का अहसास भी कविता कराती है । प्रस्तुत काव्य - संग्रह कवि ने अपनी अर्धंग्नी की मृत्यु के उपरान्त लिखा है । अपनी पत्नी की मृत्यु के उपरान्त उत्पन्न हुए दुःख और गहन पीड़ा को कवि ने अपनी लेखनी का आश्रय देकर शब्द रूप में अभिव्यक्त किया है । इस वियोग रुपी पीड़ा का जैसा प्रभाव कवि के हृदय पर वांछित था, वैसा ही हुआ है । यही कारण है कि कवि ने अपने काव्य - संग्रह को जिन पांच भागों में विभाजित किया है, उनमे प्रथम भाग को ‘स्मृति’ शीर्षक दिया है, जिसकी सभी कविताओं में कवि की विरह वेदना चरम पर पहुंची हुई दिखाई देती है । ‘टूट गये वीणा के तार’ काव्य - संग्रह छायावाद के प्रसिद्ध कवि सुमित्रानंदन पन्त जी की इन पंक्तियों का स्मरण करा जाता है – “वियोगी होगा पहला कवि / आह से उपजा होगा गान / निकल कर आँखों से चुपचाप बही होगी कविता अंजान।।” प्रसिद्ध कवि सुमित्रानंदन पन्त जी का मत है कि कविता विचारों और तथ्यों से नही वरन अनुभूति से होती है । यह पक्तियां ‘टूट गये वीणा के तार’ में सर्वथा सत्य सिद्ध हुई हैं ।

इस काव्य - संग्रह में कवि ने अपनी कविताओं को ‘स्मृति’, ‘पर्यावरण’, ‘आतंकवाद’, ‘धार्मिक / आध्यात्मिक’ तथा ‘विविध’ इन पांच शीर्षकों के अंतर्गत लिखा है । इनमें ‘स्मृति’ शीर्षक के अंतर्गत अट्ठारह कविताओं को लिखा है । प्रथम कविता ‘रथ का धुर टूट गया’ में ही कवि ने जीवन रुपी रथ के पति – पत्नी रूपी दो पहियों में से एक पहिया (पत्नी) के टूटने (मृत्यु) का वर्णन किया है । जिसमें कवि को विधुर होने की दु:खद अनुभूति होती है । जिस प्रकार रथ का एक पहिया टूटने पर रथ का आगे बढ़ना कठिन होता है, वैसे ही पति – पत्नी में से एक की मृत्यु होने पर जीवन को एकाकी जीना बहुत कठिन होता है । आगे की कविता ‘टूट गये वीणा के तार’ में कवि ने बताया है कि उसके जीवन में अब मधुर संगीत की स्वर लहरी कभी झंकृत नहीं हो पायेगी, क्योंकि उसकी जीवन रूपी वीणा के तार अब टूट चुके हैं और उसका जीवन आनन्द रहित हो गया है – “जीवन आज हुआ निस्सार / अगतिमय जीवन का विस्तार / नौका जा पहुँची मँझधार/ टूट गये वीणा के तार ।।”

अन्य कविताओं में भी कवि की अपनी पत्नी से वियोग एवं विरह-वेदना की अभिव्यक्त होती है जिसमें कवि स्वयं को अत्यंत वेबस, अकेला और अधुरा मानता है । दिन – प्रतिदिन कवि को अपनी प्रिय पत्नी का स्मरण पीड़ा दे रहा है, जिसको अपने शब्दों में व्यक्त करते हुए कवि ‘सबको रुलाई आ रही है’ कविता में लिखते हैं – “न याद कैसे भी भुलाई जा रही है / दिन प्रतिदिन सबको रुलाई जा रही है ।।”

कवि के जीवन में एक पड़ाव ऐसा भी आया, जब वह यादों के जंगल में भटक कर खुशी के पल, गम के आँसू पीकर संवेदनाओं के गहरे समुद्र में गोते लगाता हुआ प्रतीत होता है, अपनी प्रिया के साथ कवि को जो बस्तुएं प्रिय थीं, वही अब कवि के लिए नीरस हो गयीं हैं । पत्नी के साथ व्यतीत किये स्मरणीय एवं प्रसन्नता से युक्त लम्हों का स्मरण आने पर कवि की विरह वेदना अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँची हुई प्रतीत होती है । जिसके कारण कवि इतना व्याकुल हो जाता है कि उसको अपना जीवन निरर्थक लगने लगता है और वह अपने जीवन की चाह को छोड़ता हुआ सा प्रतीत होता है । ‘रीते घाट सा बोल रहा हूँ’ कविता में उसका धैर्य पूर्ण रूप से टूटा हुआ सा प्रतीत होता है – “अब मैं एक बचा हूँ / कब से जाने की सोच रहा हूँ ।।”

कवि के हृदय की गहराईयों से अपनी अर्धांग्नी की यादों का तूफान उठता रहता है । यह स्थिती कवि के प्रवहमान मन को कभी भी अतीत की ओर खींच ले जाती है और कभी ‘कुछ और कहना शेष रह गया तुमसे, आ जाओ प्राण प्रिये’, ‘एहसान बहुत हैं’ आदि में अपनी पत्नी के पुन: मिलन की आशा जागृत करते हुए प्रसन्नता का अनुभव करवाती है । इसलियें ‘स्मृति’ शीर्षक के अंतर्गत लिखी गयी अपनी अंतिम कविता ‘जब सागर तरसे–तरसे टूटेगी मेरी नाव’ में आशा व्यक्त करते हैं – “उस पार तुम्हारी कुटिया पर पहुंचू / तो मध्य रात्री के गहन अंधकार में / तुम दीप जलाओगे, शरमाओगे, चुप सो जाओगे / या फैलाओगे अपने हाथ / मैं सोच रहा हूँ, उस दिन की बात / जब सागर तरते - तरते टूटेगी मेरी नाव ।।”

काव्य-संग्रह की आगे की दस कविताओं में प्रकृति का मानवीकरण स्थापित कर नए प्रतीकों, बिम्बों एवं उपमानों को लेकर अपनी कविताओं में एक नवीन उत्कर्ष उत्पन्न किया है । इसलिए ये कविताएँ ‘पर्यावरण’ शीर्षक के अंतर्गत लिखीं गयीं हैं । वैज्ञानिक अविष्कारों और मनुष्य की गलतियों के कारण आज पर्यावरण दूषित होता जा रहा है । बहुत से पक्षिओं की प्रजातियाँ विलुप्त प्रायः होती जा रही जा रहीं हैं । इसलिए ‘गौरैया तुम क्यों डरती हो’ प्रथम कविता में ही कवि ने लुप्त होती जा रही गौरैया का वर्णन किया है – “गौरैया तुम क्यों डरती हो मुझसे / इसी से मेरे पास नहीं आती /.......शायद कच्चे घर आँगन में / तुम्हारे घोंसले बन जाते थे / अब ऐसे घर नहीं रहे / कंकरीट के वन उग आये हैं ।।” आगे कि कविता में कवि ने कम होते जा रहे वनों-पर्वतों के प्रति अपनी चिंता व्यक्त की है तथा महानगरीय जीवन के प्रति अपनी उदासीनता व्यक्त की है ।

‘गंगा-विश्वस्तरीय अर्थ नियोजन’ कविता में कवि ने गंगा नदी के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त की है । कवि ने बताया है कि किस प्रकार असंख्य लोगों की श्रद्धा आस्था के कारण जहाँ नदी का महत्त्व है, वहीं आर्थिक तथा सामाजिक दृष्टि से भी बहुत महत्त्व है – “कुछ अन्तराल पा / धर लेती रूप विमोहन / निकट आ जाते असंख्य जन / फिर होने लगता पूजन, अर्चन / कोटि-कोटि जन पाते जीवन / लाखों जीवों को मिलता भोजन / मात्र नहीं यह धार्मिक आयोजन / अपितु विश्वस्तरीय अर्थ नियोजन ।।”

आगे की कविताओं में कवि ने बारहमासों को लेकर प्रकृति और मनुष्य के बीच संबंधों को स्थापित कर कविताओं के माध्यम से सुन्दर वर्णन किया है । इन कविताओं में प्रकृति के कोमल तथा भयंकर दोनों रूपों का वर्णन किया है । ‘बिन बुलाये कैसे आ गये बादल’ में कवि ने वर्षा का सुन्दर वर्णन किया है - “बिन बुलाए कैसे आ गये बादल / झूम कर बरसे झमाझम / सब ओर कैसे छा गए बादल / हर्षित हुआ मन धरा का ।।” इसी प्रकार ‘तीजों का त्यौहार’, ‘धरती की भागती उदासी, ’ ‘निशान बाग’ तथा शालीमार गार्डन’ आदि कविताओं में प्रकृति के सौम्य, मनोहर तथा शांत रूप का वर्णन है, वहीं आग उगलती गर्मी आ गयी’, हरियाली तीज’ और ‘नागपंचमी सूखी रह गयी’ तथा ‘प्रकृति का प्रकोप’ कविताओं में प्रकृति के भयंकर तथा रौद्र रूप का वर्णन है । कवि इन कविताओं के द्वारा मनुष्य को सन्देश देना चाहता है कि वह प्रकृति के साथ छेडखानी न करे, क्योंकि जब - जब मनुष्य स्वयं को प्रकृति से बड़ा समझता है, तब-तब प्रकृति रौद्र रूप धारण कर मनुष्य को अपनी मर्यादा में रहने का सन्देश देती है । इसलियें ‘प्रकृति का प्रकोप’ कविता में कवि ने सन्देश दिया है कि – ‘मत करो कामना प्रकृति विजय की / छोड़ दो दंभ सारे, हटा लो प्रतिबन्ध सारे / चलो प्रकृति के सहारे ।।”

प्रकृति का वर्णन करने के पश्चात आगे की चार कविताओं में कवि ने आज सम्पूर्ण विश्व की सबसे बड़ी समस्या ‘आतंकवाद’ के प्रति अपने भाव व्यक्त किये हैं । सम्पूर्ण विश्व ही इस आतंक रूपी महादानव से संताप्त है । जो आतंकी धर्म की आड़ में आतंक फैला रहें हैं, ऐसे आतंकी संगठनों को सन्देश देते हुए तथा इनके बहकावे में आ रही युवा - पीढ़ी को कवि ने अपनी कविता ‘धर्म आतंकवाद की शिक्षा देता है क्या?’ में स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि कोई भी धर्म किसी को भी कायिक, वाचिक तथा मानसिक कष्ट पहुँचने की आज्ञा नही देता । आतकंवादी तो धर्म की आड़ में छिपकर आतंक फैलाते हैं – “धर्म कैसे शिक्षा देगा, आतंक की / उसे तो प्राणी मात्र में / एक ही नूर नज़र आता है ।।”

‘आंध्र में हिंसा’, ‘जम्मू क्यों हो उठा गर्म’ में आतकंवाद के भयंकर रूप का वर्णन किया है । कवि ने इन कविताओं में वर्णित किया है कि किस प्रकार आतंकी हमलों से त्रस्त लोग भीषण क्रन्दन करतें हैं । लेकिन कवि ने यह विश्वास भी दृढ़ता से व्यक्त किया है कि आतंक रूपी अधर्म चाहें कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो जाये, लेकिन एक – न – एक दिन नष्ट अवश्य होगा – “कोई कृष्ण कोई राम / कोई जीसस, कोई मुहम्मद / धरती पर आ कर सच का मार्ग दिखलाता है / अधर्म सहित आतंकी मर जाता है ।।”

इन आशाओं और संभावनाओं से परिपूर्ण कवि की कविता में आस्था और विश्वास की झलक स्पष्ट दिखाई देती है । ‘धार्मिक / आध्यात्मिक’ शीर्षक के अंतर्गत लिखी गई बारह कविताओं में परमात्मा के आगे स्तुति तथा आराधना की है और स्वयं द्वारा किये गये तीर्थ-स्थलों की यात्रा के अनुभव को अपनी लेखनी रूपी तुलिका से चित्रित करने का प्रयास किया है । इनमे भगवान भोले शंकर का विशेष रूप से आराधन किया गया है, जिससे कवि की भगवान महादेव के प्रति आपार श्रद्धा तथा विश्वास की अनुभूति होती है । ‘हे देवाधिदेव शिव शंकर’, ‘काशी विश्वनाथ’, ‘सर्वेश्वर सबके दुःख निवारो’, आदि कविताओं में कवि ने मानव-मात्र के लिये सुख-समृद्धि की प्रार्थना की है । इसके अतिरिक्त ‘रूद्र अवतार कांवरिये’, ‘माता वैष्णों देवी’, ‘अमरनाथ दर्शन’, तथा ‘बाबा बर्फानी’ कविताओं के माध्यम से कवि ने भक्तजनों के परमात्मा के प्रति उत्कृष्ट विश्वास, श्रद्धा और प्रेम को व्यक्त करने का प्रयास किया है जो भक्तजन कितने ही कष्ट उठाकर भी प्रभु दर्शन के लिये जाते हैं – “अमरनाथ की पवित्र गुफा में बैठे बाबा वर्फानी / जिसे चाहते उसे बुलाते, नहीं चाहते नहीं बुलाते / मध्य मार्ग से भी लौटते / अपनी आभा प्रकट दिखाते बाबा वर्फानी ।।”

काव्य-संग्रह के अंत में ‘विविध’ शीर्षक के अंतर्गत कविताएँ लिखी गयी हैं । नाम के अनुरूप ही इसमें भिन्न – भिन्न विषयों को लक्षित कर कविताएँ लिखी गयी हैं । पहली ही कविता में ‘भ्रष्टाचार मिटाने कृष्ण आयेंगे या राम’ में कवि ने भ्रष्टाचार की समस्या के बारे में बताते हुए स्वतंत्रता से लेकर अब तक अनेक पुरुषों द्वारा भ्रष्टाचार को मिटाने के लिये किये गये प्रयासों का वर्णन किया है । ‘परमाणु करार क्या’ में भारतीय संसद और नेताओं का यथार्थ चित्रण करते हुए उनके अशोभनीय व्यवहार का वर्णन किया है ।

‘मेरी कालोनी के पास कविता में कवि ने अपने घर के पास ही रहने वाले झुग्गी-झोपड़ी के निर्धन बच्चो का बहुत ही मार्मिक एवं दयनीय वर्णन किया है । वे बच्चे इस दुनिया से अनभिज्ञ हैं, तथापि अपने जीवन का आनन्द लेते हैं । कवि उन बच्चो की दशा का वर्णन करते हुए लिखता है कि- “नंगे – अध – नंगे कुछ बच्चे दौड़ रहें हैं / एक दूसरे को पकड़ने भाग रहें हैं / वे टी.वी. सीरियलों से अनजान हैं ।।”

‘आरती स्वदेश की’ कविता में कवि ने राष्ट्र के प्रति श्रद्धा और सम्मान के भाव व्यक्त किये हैं । साथ ही इसमें राष्ट्रप्रेम और गौरव को भूलने वाली युवा पीढ़ी के विषय में भी बताया गया है, जो की आज अपने भविष्य को लेकर आशारहित और संशयग्रस्त है - “चारों ओर तिरंगे की छठा छा गयी / मन – भावनी पन्द्रह अगस्त हरसती आ गयी / उमंग और उल्लास से भरपूर बालकों के तन - मन / चल दिए प्रभात – फेरियों में हर्षित वदन ।।” अंतिम कविता ‘५ सितम्बर शिक्षक – दिवस’ में कवि ने गुरु के प्रति आगाध श्रद्धा और विश्वास के भाव व्यक्त करते हुए गुरु की महत्ता बताते हुए, उनका मान – सम्मान करने के लिए प्रेरित किया है – “शिक्षक देता उजाला ज्ञान का / पंथ दिखता अंधकार से प्रकाश का / अपने जीवन में कितने कष्ट उठता / विपरीत स्थिति में भी ज्ञान सिखाता ।।”

कोई भी रचना तभी सफल मानी जा सकती है, जब वह पाठक की अंतरात्मा पर भी अपना प्रभाव डाले । पाठक इसको पढ़कर चिंतन करने पर विवश हो जाये । कविता की भाव धारा के तीव्र प्रवाह में पाठक का मन पूर्ण रूप से निमग्न हो जाये । कवि ने इस काव्य-संग्रह में विभिन्न शीर्षकों के अंतर्गत जो – जो कविताएँ लिखी हैं, इनको पढ़कर पाठक कविताओं में निहित संवेदना के कारण एक जुडाव सा महसूस करता है, जो उसे आत्मीय – अनुभूति प्रदान करती है ।

‘स्मृति’ शीर्षक के अंतर्गत कवि की पीड़ा जो शब्दों के रूप में अभिव्यक्त हुई है, वह पढ़ने वाले के हृदय को भी करुण रस से परिपूर्ण कर देती है । ‘पर्यावरण’ शीर्षक के अंतर्गत लिखी कविताएँ पाठक के हृदय को प्रकृति के समीप ले आती हैं ।

सम्पूर्ण काव्य – संग्रह का अध्ययन करने पर यह माना जा सकता है कि इसको श्रेष्ठ बनाने का कवि ने सफल प्रयास किया है । कवि अपने हृदय के जिन करुण रस से परिपूर्ण भावों को मुख्य रूप से व्यक्त करना चाहता था, उसी के अनुरूप ‘काव्य – संग्रह’ का शीर्षक रखा गया है । पुस्तक का आवरण पृष्ठ और गेटअप भी सुन्दर बन पड़ा है । इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें शब्दों का चयन बहुत सोच – विचार कर किया गया है, जिससे भाषा सरल और सुगम बनी है और साधारण पाठक को भी सरलता से समझ आ सकने वाली है । साधारण बोलचाल की शैली में रचित ये कविताएँ, विषय और शिक्षा सभी दृष्टियों से सम्पन्न मानी जा सकती हैं । ‘काव्य – संग्रह का अध्ययन करने पर यह कमी मानी जा सकती है कि जिन शीर्षकों के अंतर्गत कविताएँ लिखी गयीं हैं, वह क्रम थोड़ा अटपटा सा लगता है । जहाँ ‘स्मृति’ शीर्षक के अंतर्गत दुःखद भावों की अभिव्यक्ति है, वहीं ‘पर्यावरण’ शीर्षक में कवि पाठक के मन को प्रकृति की मनोरम झांकी का अवलोकन करवाता है और फिर तुरंत ‘धार्मिक / अध्यात्मिक’ के अंतर्गत लिखित कविताओं से मन में शीतलता और शांति उत्पन्न करने का प्रयास करता है तथा एकदम ‘विविध’ शीर्षक के अंतर्गत लिखित कविताओं में मन में वर्तमान की चिंताओं से अवगत कराकर, मन में अशांति उत्पन्न कर देता है । इस क्रम को थोड़ा सही ढंग से रखा गया होता, तो पाठक को कविताओं के रसास्वादन में और अधिक आनन्द आता । फिर भी इस एक कमी के कारण इस काव्य – संग्रह की श्रेष्ठता में किसी प्रकार की कमी नहीं आती और यह काव्य एक सुन्दर रचना बन पड़ी है ।

सम्पूर्ण काव्य – संग्रह के अध्ययन करने पर यह कहा जा सकता है कि पाठक के मन को गहराईयों तक स्पर्श करने तथा आत्ममंथन के लिये विवश करने वाला यह काव्य – संग्रह हर दृष्टि से पठनीय एवं संग्रहणीय है । साथ ही साथ जिन दु:खद क्षणों में कवि ने इस काव्य की रचना की, उसके लिए कवि आदर, सम्मान और प्रसंशा के पात्र है, कवि ने इस काव्य की रचना कर अपने अदम्य साहस का परिचय दिया है ।

दूर ध्वनि – ७०६६५०८०८९

अणु मेल – soonu.uthwal@gmail.com

दंगों की व्यथा-कथा का मर्मस्पर्शी पाठ


समीक्षक: प्रोमिला

पुस्तक-पिघले चेहरे (उपन्यास)

लेखक- सच्चिदानंद चतुर्वेदी

प्रकाशन-2018

प्रकाशक-अमन प्रकाशन, 104A/80c,

रामबाग, कानपुर-208012


मूल्य-395

भारतीय राजनीति, धर्म और साम्प्रदायिकता का त्रिकोण ऐसा है जिसकी नाप-तोल सरल नहीं और ना ही खतरों से खाली है। ‘अधबुनी रस्सी-एक परीकथा’, और ‘मझधार’ के बाद सच्चिदानंद चतुर्वेदी का ‘पिघले चेहरे’ 1984 में हुए सिख विरोधी दंगों पर लिखा गया नया उपन्यास है जो राजनीति और धर्म की आड़ में खेले जा रहे साम्प्रदायिकता के खेल की नब्ज की सही टटोल के लिए ऑपरेशन ब्लू स्टार, सिख हिस्ट्री और 1984 के घटनाक्रमों पर केंद्रित कई पुस्तकों के अध्ययन के पश्चात रचा गया है।( पुस्तकों की सूची लेखक ने आभार में ही दे दी है जो उपन्यास की शोधपरकता को प्रमाणित करते हुए इसे और अधिक मजबूत बनाती है।) संवेदनशील मन और वैचारिक दृष्टि का तालमेल इस उपन्यास में एक नई किस्सागोई रचता है। उपन्यास को पढ़ते समय पाठक को यह एहसास बना रहता है कि वह जिस कथा संसार में प्रवेश कर चुका है, वहां ग्रामीण और नगरीय जीवन के अनुभवों की एक गहरी बुनावट है और उस बुनावट की नींव में बिना किसी लाउडनेस के सत्ता समीकरणों की प्रश्नाकूल पड़ताल है। पर क्या यह उपन्यास केवल 1984 तक सीमित है? नहीं, इस समाज व्यवस्था में जब तक राजनीतिक स्वार्थ हैं, जब तक दंगें इन स्वार्थों की पूर्ति का ईंधन हैं, जब तक मनुष्य में पशुत्व है, तब तक यह उपन्यास सामयिक है। क्योंकि सामयिकता लेखक के दृष्टिकोण और घटना या समस्या को वैज्ञानिक क्रम में खंगालने से जुड़ती है और यह उपन्यास तो अपने परिवेश में एक बड़ी सच्चाई को लेकर चलता है। लेखक कहता है, ‘दंगों के दौरान जो सिख मारे गए हैं, वे वास्तव में मारे नहीं गए हैं, वरन प्रजातंत्र द्वारा ठगे गए हैं, और अपने ही देशवासियों के विश्वासघात का शिकार हुए हैं।’ (पृ.105)

इस उपन्यास में रचनाकार प्रजातांत्रिक व्यवस्था के राजनीतिक, धार्मिक, प्रशासनिक, न्यायिक, सामाजिक, आर्थिक क्षेत्रों में व्याप्त विकृतियों और उनके दुष्परिणामों को ना केवल बखूबी रेखांकित करता है बल्कि पलटन बाबा, मास्टर रुद्रदेव, नन्दा कौर आदि के विचारों एवं उनकी गतिविधियों के माध्यम से उन मानवीय मूल्यों को भी सहेजता है, जिससे मनुष्य में मनुष्य का विश्वास बना रहे। जाहिर है, इस विश्वास को कायम रखना आसान नहीं और तब तो और भी नहीं जब धर्म का नाम लेकर भड़काए दंगों में जीवन को बचाए रखना ही बड़ी चुनौती हो। लेकिन बावजूद इसके लेखक का विश्वास है कि आपसी सौहार्द और बंधुत्व-भाव, पक्के इरादे और अंतहीन संघर्ष ही मानवीय मूल्यों को बचाए रखने के उपादान बन सकते हैं।

कृपाचार्य बाजपेई, विधायक दुर्जन सिंह और आचार्य धर्माधिकारी जैसे चरित्रों के माध्यम से लेखक प्रजातांत्रिक व्यवस्था में व्याप्त अवसरवाद और राजनीति के अपराधीकरण तथा साम्प्रदायिकता की पूरी मानसिक प्रक्रिया पर खुलकर विचार करता है। इस व्यवस्था में देवदत्त जैसे चरित्र का जुड़ जाना स्वभाविक है। ‘मुसलमान हिन्दुओं के दुश्मन होते हैं’ (पृ.21) वाली सोच से संचालित होकर बचपन में ही रहमान चाचा को मौत के घाट उतार देने वाला देवदत्त उपन्यास के अंत तक एक खलनायक के रूप में उभरता है। देवदत्त की बहन देवयानी का चरित्र स्त्री-स्थिति पर विचार करने को विवश करता है तो समाज में आदर के साथ देखे जाने वाले मास्टर लोगों के चरित्र का भंडाफोड़ ठाकुर जगमोहन और उसके आसपास बुने कथा प्रसंगों से होता है।

उपन्यास में लेखक 1984 के समाज और उसकी व्यवस्था के प्रायः सभी प्रमुख प्रश्नों से टकराता है। साम्प्रदायिकता और साम्प्रदायिक मनोवृति के कुत्सित चरित्र तथा उसके प्रतिरोध को उभारने में पूरी सफलता पाता है। लेखक के मन, मस्तिष्क में एकदम स्पष्ट है कि साम्प्रदायिकता धार्मिक संकीर्णता के माध्यम से छुटभैए नेताओं से लेकर कांग्रेस जैसी पार्टियों के लिए एक राजनीतिक कार्यक्रम है और जटिल एवं कुटिल स्वार्थ पर आधारित स्पर्धा ने समय-समय पर साम्प्रदायिकता की आग में मनुष्य की गरिमा एवं अर्थवत्ता का गला घोटा है। इस घृणा ने प्रतिशोध, लूटपाट, दंगों और हत्या को जन्म दिया है। इसमें निहित ‘अन्य’ की वैचारिकी ने अचानक से पड़ोसियों के संबंधों तक हो अनुदार बनाया है। उपन्यास से एक बानगी प्रस्तुत है, “मास्टर साहब को देखकर ठाकुर साहब उत्साहित होकर बोल उठे-‘... आप तो चंडीगढ़ वालों के यहां बहुत दिनों से ट्यूशन पढ़ा रहे हैं, इसलिए उनके घर की कुछ अंदरूनी बातें भी जानते होंगे? उनके घर पर चढ़ाई करने में आप हमारे बड़े काम आ सकते हैं।... यह सब भिंडर वाले हैं, इनका कानपुर से सफाया होना बहुत ही जरूरी है।’” (पृ.98)

वास्तव में, उपन्यास के फलक का भौगोलिक विस्तार तो कन्नौज से लगभग 4 मील दूर गंगा नदी के दक्षिणी तट पर बसे एक बहुत छोटे से गांव बागसर से शुरू होकर कानपुर और शाहजहांपुर तक जाता है किंतु इसका वैचारिक भूगोल काफी विस्तृत और राष्ट्रीय है। पंजाब, दिल्ली, कानपुर, बोकारो आदि शहरों में हुई सिखों की हत्या और लूटपाट के प्रसंग इसके वैचारिक भूगोल के दायरे का विस्तार करते हैं। बागसर के एक निर्धन भक्त नामक ब्राह्मण के परिवार, विशेष रूप से उसके दो बच्चों देवदत्त और देवयानी के आसपास से निर्मित हुई कथा का ताना-बाना इब्राहिम पट्टी के रहमान चाचा से होते हुए सुल्तानपुर निवासी, बकौल कृपाचार्य बाजपेई चमट्टा बभ्रुवाहन और देवयानी के पति लोमहर्ष से होते हुए मास्टर रुद्रदेव के बेटे सत्यदेव और नन्दा कौर के विवाह तक को समेटता है। पर कथा सूत्रों में ना तो कहीं कोई फांक है और ना ही टूटन। कथा को गुँथने में लेखक को अद्भुत सफलता मिली है।

इस उपन्यास में पठनीयता एक अंतर्धारा की तरह आद्योपांत व्याप्त है। ‘विपन्नता वैसे भी कभी किसी गांव में ऊपर छलकती दिखाई नहीं पड़ती, उसी प्रकार जैसे घर का कवाड़ कभी बैठक में नहीं दिखाई पड़ता।’ (पृ.10) या ‘पर वे शायद यह भूल गए थे कि सपने केवल सपने होते हैं और एक हल्के से हवा के झोंके से मकड़ी के जाले की भांति टूट जाते हैं।’ (पृ.16) जैसे कलात्मक वाक्यों से होते हुए उपन्यास अपने अंतिम कथन- ‘सुना है कि तिलचट्टे लाखों साल जीवित रहते हैं। यदि वह सही है तो हमारे देश के प्रजातंत्र को अभी लाखों साल तक कोई खतरा नहीं है।’ में भीषण हो चुकी राजनीतिक सच्चाई से पर्दा उठता है। सही है कि धर्म, साम्प्रदायिकता, दंगे, हत्याएं, लूटपाट और आगजनी की राजनीति करने वाली पार्टियां आज हमारे राष्ट्रीय फलक पर ज्यादा प्रभावी हैं।

‘पिघले चेहरे’ के लेखक में चित्रण करने और सवाल उठाने की अद्भुत कला है। यूं तो पूरे उपन्यास में जहां-जहां दृश्यों, स्थितियों, दंगों षड्यंत्रों और तिकड़मों का चित्रण किया है, वे सभी स्थल ध्यान आकर्षित करते हैं लेकिन पाठक का विशेष ध्यान वहां जाता है जहां लेखक दंगे शुरू होने के बाद बागसर आने वाले रास्ते पर खड़े ट्रकों के सिख ड्राइवरों की सुरक्षा के लिए तत्पर गांव वालों के प्रसंग के संदर्भ में नगर और शहर का अंतर वर्णित करता है। वह लिखता है, ‘नगर लोगों की पीढ़ी के अलावा और कुछ नहीं होते। इंसानियत वहां मरुस्थल में जल की भांति सूख जाती है। वहां के अमीर और गरीब इंसान न रह कर, भावना-शून्य यंत्र बन जाते हैं, जो पदे-पदे भावनाएं रखने का ढोंग रचते हैं। नगर और गांव के गरीबों और उनकी गरीबी में कोई अंतर नहीं होता, अंतर होता है, उनकी पहचान का। नगर के गरीब देश की जनगणना के आंकड़े मात्र होते हैं, जिनकी कोई पहचान नहीं होती। लेकिन गांव के गरीबों की गरीबी अपने में स्वयं एक पहचान होती है। वह गांव भर का चाचा-ताऊ वगैरा होता है। इसीलिए नगर के पहचान खोए हुए गरीब कुंठा और अवसाद में डूबकर, अपनी ही प्रजाति के लोगों को निगलने के लिए तत्पर हो जाते हैं। यही लोग राजनीतिक दलों के इशारे पर नाचते हैं।’ (पृ.111) निश्चित तौर पर यह अंतर ग्रामीणों की मानवीयता और नगर के लोगों में पसरी संवेदनहीनता के कारणों तथा परिणामों पर बड़ी टिप्पणी बनता है और इतनी तार्किकता के साथ आता है कि इसे लेखक का नॉस्टेलजिया कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार पृ. 104 पर आया अपराध और दंगे का अंतर लेखक की सूक्ष्म विश्लेषण शक्ति और सामाजिक बोध का परिचय देता है।

उपन्यास में देवयानी और नन्दा कौर समाज में स्त्री-स्थिति की प्रतीक बनकर उभरती हैं। ‘अबला तेरी यही कहानी’ की टेक पर जीवन जीती देवयानी कभी पिता की ‘चिट्ठी लिखना-पढ़ना भर सीख ले’ वाली आकांक्षा पूरी करने, कभी पति की लखपति बनने की प्रतिज्ञा पूर्ती में सहायता हेतु एल.एल. बी. के लिए लखनऊ जाने, कभी वकालत करने, कभी बार काउंसिल के अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ने, कभी नगरपालिका परिषद के अध्यक्ष पद का पर्चा भरने की अनगिनत (पति) इच्छाओं को पूरा करते-करते ‘रेस की घोड़ी’ बनी आखिरकार नर्वस ब्रेकडाउन का शिकार होकर, बिना इलाज अस्पताल में जिंदगी हार जाती है। आखिरी समय में ना भाई आगे आता है और ना पति। लोमहर्ष कहता है, ‘और इतने में तो एक नई घोड़ी खरीदी जा सकती है।… उसे खूंटे पर बांध कर चारा कौन खिलाएगा?’ (पृ.170) पलटन बाबा के कहने पर गांव वाले जरूर अपनी सामुदायिक संवेदना को समेटे पैसा जोड़ते हैं पर उसमें भी बहुत देर हो जाती है। निश्चित ही समय के सापेक्ष स्त्री के मनोभावों, उसके अंतर्द्वंद्वों, उसकी रोजमर्रा की लड़ाइयों, स्त्री-मन में गहरे पैठे मूल्यों आदि को लेखक अत्यंत बारीकी से पकड़ता है। देवयानी से इतर वह नन्दा कौर को एक जुझारू चेतना संपन्न और आत्मनिर्भर स्त्री के रूप में दर्शाता है जो अपने निर्णय स्वयं लेती है और पूरे उपन्यास में साम्प्रदायिकता का प्रतिरोध रचती एक बड़ा वाक्य कहती है, ‘किसी भी धर्म या जाति के सभी लोग कभी बुरे नहीं होते।’ (पृ.159) नन्दा कौर का चरित्र स्त्री-विमर्श के उत्कृष्ट आदर्श को सामने रखता है। स्वतंत्र स्त्री की सही और खरी-खरी परिभाषा गढ़ता है।


कुल मिलाकर ‘पिघले चेहरे’ अपने ढब और रंग में विशेष है। शब्दों का चयन और प्रयोग अत्यंत मार्मिक बन पड़ा है। उपन्यास में वाक्य की संरचना ध्यान आकर्षित करती है, जैसे- ‘उसने अपनी रिहाई के लिए धन्यवाद दिया था भारतीय प्रजातंत्र को और उसकी न्याय व्यवस्था को जहां अंधे पीसते हैं और कुत्ते खाते हैं।’ (पृ.164) भाषा की अशुद्धियां इस उपन्यास में अवश्य खटकती हैं और कई बार पढ़ने का क्रम भी खंडित करती हैं पर लेखक की इस बात के लिए प्रशंसा की जानी चाहिए कि यह उपन्यास ‘क्या तुमने कभी कोई सरदार भिखारी देखा?’ कहानी के साथ मजबूती से खड़ा दिखता है। 1984 के दंगे का वस्तुगत और ऐतिहासिक आधार प्रस्तुत करता है। बहुत से प्रश्न उठाता है पर कहीं भी मनुष्य और मनुष्यता में अपना विश्वास नहीं खोता।

मो.-8977961191, असिस्टेंट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय,

व्यंग रचनाओं का अव्दितीय संग्रह है `मेथी की भाजी और लोकतंत्र`


समीक्षक: दीपक गिरकर

पुस्तक : मेथी की भाजी और लोकतंत्र

लेखक : ब्रजेश कानूनगो

प्रकाशक : रश्मि प्रकाशन, 204, सनशाइन अपार्टमेंट, बी-3, बी-4, कृष्णा नगर. लखनऊ-226023

मूल्य : 100 रूपए


पेज : 100

`मेथी की भाजी और लोकतंत्र` ब्रजेशजी का तीसरा व्यंग संग्रह हैं. ब्रजेशजी के लेखन का सफ़र बहुत लंबा हैं. इनकी व्यंग रचनाएं निरंतर देश की लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं. वर्तमान समाज की उपभोक्तावादी संस्कृति में झूठ, फरेब, छल, दगाबाज़ी, दोमुँहापन, रिश्वत, दलाली, भ्रष्टाचार इत्यादि अनैतिक आचरणों को सार्वजनिक रूप से स्वीकृति प्राप्त हो चुकी है, व्यंगकार ने इस संग्रह की रचनाओं में इन अनैतिक मानदंडों पर तीखे प्रहार किए हैं.

शीर्षक रचना `मेथी की भाजी और लोकतंत्र` सोशल मीडिया और राजनीतिक पार्टियों पर गहरा कटाक्ष हैं. मेथी आलोचना और विरोध की तरह कड़वी होती हैं. मेथी है, तो लोकतंत्र भी हैं. व्यंग `गणेशजी पहुँचे कर्ज़ा लेने` एक शिक्षित बेरोज़गार की व्यथा हैं. एक शिक्षित बेरोज़गार को बैंक से धंधें के लिए कर्ज़ा लेने में कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं. शिक्षित बेरोज़गारों और कर्ज़ा देने वाली वित्तीय संस्थाओं की कार्यप्रणाली एवं कर्मचारियों के आचरण के प्रति ब्रजेशजी चिंतित दिखते हैं. व्यंग रचना ` सफ़र में समाधि` कर्मचारियों के आचरण पर तीव्र प्रहार हैं. `ऐनक के बहाने` व्यंग रचना में लेखक लिखते है जहाँ ऐनक से हमारी भौतिक दृष्टि ठीक होती है, वही `चिंतन के चश्मे` से वैचारिक दृष्टि साफ और प्रखर हो जाती हैं. इस रचना के माध्यम से व्यंगकार ने चिंतन के चश्मे की धूल साफ़ की हैं. `रात के आतंकवादी` में ब्रजेशजी लिखते है आतंकवाद की कोई प्रजाति नहीं होती. आतंकवाद सिर्फ़ आतंकवाद होता हैं. वह जहरीले कीट-पतंगों का हो या भटके हुए इंसानों का, उसके खिलाफ हमारी लड़ाई निरंतर जारी रहनी चाहिए. यह व्यंग आतंकवाद को समाप्त करने का संदेश देता हैं. `सब सही है` रचना में ब्रजेश जी ने लिखा है जीवन में सकारात्मक दृष्टिकोण रखना सदियों से हमारा दर्शन रहा है. किसी ने कहा भी है, `जो हो रहा है, वह सही हो रहा है और जो सही नहीं हो रहा, समझो वह और ज़्यादा सही हो रहा हैं.` `बायपास के पास` व्यंग रचना में व्यंगकार कहते है `शहर भी अपना विकास करता है तो खेतों को कालोनियों में बदल दिया जाता हैं. पगडंडी सड़क में, सड़क रोड में, बाहरी रास्ते रिंग रोड और बायपास में परिवर्तित होते जाते हैं. धीरे-धीरे शहर का वजन बढ़ने लगता है. शहर के ह्रदय में ब्लाकेज़ और धमनियों में रूकावट की रिपोर्ट आने लगती हैं. ऐसे में शहर की बायपास सर्जरी ही एक मात्र उपचार हो जाता हैं.`

व्यंगकार ब्रजेश क़ानूनगो की लेखन शैली सहज और शालीन हैं, लेकिन उनके व्यंगों की मारक क्षमता अधिक हैं. ब्रजेशजी इस व्यंग संग्रह की रचनाओं से पाठकों से रूबरू होते हुए उन्हें अपने साथ लेकर चलते हैं. यही उनकी सफलता है जो इस संग्रह को पठनीय और संग्रहणीय बनाती हैं. सरलता और सहज बुनावट ब्रजेशजी के लेखन की विशेषता हैं. संग्रह की रचनाओं में शब्दों की शक्ति और कटाक्ष पाठकों के दिल और दिमाग़ को झंझोड़कर रख देते हैं. ब्रजेशजी की व्यंग रचनाओं में उनकी समाजवादी और जनवादी विचारधारा, प्रगतिशील जीवन मूल्य एवं मनुष्य के प्रति प्रतिबद्धता की वैज्ञानिक दृष्टि अभिव्यक्त होती हैं. यह व्यंग संग्रह भारतीय व्यंग रचनाओं के परिदृश्य में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करवाने में सफल हुआ हैं. नि:संदेह ब्रजेशजी की लेखन शैली और अनैतिक मानदंडों पर उनकी तिरछी नज़र देश के अग्रणी व्यंग लेखकों की प्रथम पंक्ति में उन्हें स्थापित करती हैं.

दीपक गिरकर

समीक्षक

28-सी, वैभव नगर, कनाडिया रोड,

इंदौर- 452016

मोबाइल : 9425067036

मेल आईडी : deepakgirkar2016@gmail.com

दिनांक : 10.05.2018

मदारीपुर जंक्शन:बालेन्‍दु द्विवेदी

व्यंग्यात्मक उपन्यासों की कड़ी में एक और सशक्त किस्सागोई:ओम निश्चल

कभी ‘राग दरबारी’ आया था तो लगा कि यह एक अलग सी दुनिया है। श्रीलाल शुक्‍ल ने ब्‍यूरोक्रेसी का हिस्‍सा होते हुए उसे लिखा और उसके लिए निंदित भी हुए पर जो यथार्थ उनके व्‍यंग्‍यविदग्‍ध विट से निकला, वह आज भी अटूट है; गांव-देहात के तमाम किरदार आज भी उसी गतानुगतिकता में सांस लेते हुए मिल जाएंगे। तब से कोई सतयुग तो आया नही है बल्‍कि घोर कलियुग का दौर है । इसलिए न भ्रष्‍टाचार पर लगाम लगी, न भाई भतीजावाद, न कदाचार पर, न कुर्सी के लिए दूसरों की जान लेने की जिद कम हुई। इसलिए आज भी देखिए तो हर जगह ‘राग दरबारी’ का राग चल रहा है। कहीं द्रुत-कहीं विलंबित । लगभग इसी नक्‍शेकदम पर चलने का साहस युवा कथाकार बालेन्‍दु द्विवेदी का उपन्‍यास '' मदारीपुर जंक्‍शन'' करता है। मदारीपुर जंक्‍शन जो न गांव रहा न कस्‍बा बन पाया। जहां हर तरह के लोग हैं जुआरी, भंगेडी, गंजेड़ी, लंतरानीबाज, मुतफन्‍नी, ऐसे-ऐसे नरकट जीव कि सुबह भेंट हो जाए तो भोजन नसीब न हो।

मदारीपुर पट्टियों में बँटा है। अठन्‍नी, चवन्‍नी और भुरकुस आदि पट्टियों में। यहां लोगों की आदत है हर अच्‍छे काम में एक दूसरे की टांग अड़ाना। लतखोर मिजाज और दैहिक शास्‍त्रार्थ में यहां के लोग पारंगत हैं। गांव है तो पास में ताल भी है जो जुआरियों का अड्डा है। पास ही मंदिर है जहां गांजा क्रांति के उदभावक पाए जाते हैं। एक बार इस मंदिर के पुजारी भालू बाबा की ढीली लंगोट व नंगई देख कर औरतों ने पनही-औषधि से ऐसा उपचार किया कि फिर वे जीवन की मुख्‍य धारा में लौट नहीं पाए। याद आए काशीनाथ सिंह रचित ‘रेहन पर रग्‍घू’ के ठाकुर साहब जिनका हश्र कुछ ऐसा ही हुआ। हर उपन्‍यास की एक केंद्रीय समस्‍या होती है। जैसे हर काव्‍य का कोई न कोई प्रयोजन । हम सामाजिक और राजनीतिक यथार्थ की ज़मीन पर ‘मैला आंचल’ पढ चुके हैं, राजकृष्ण मिश्र का ‘दारुलसफा’ व ‘सचिवालय’ पढ़ चुके हैं, विभाजन की ज़मीन पर ‘आधा गांव’ पढ चुके हैं। गांव और कस्‍बे जहां जहां सियासत के पांव पड़े हैं, ग्राम प्रधानी, ब्‍लाक प्रमुखी और विधायकी के चुनावों के बिगुल बजते ही हिंसा व जोड तोड शुरु हो जाती है। हर चुनाव में गांव रक्तरंजित पृष्ठभूमि में बदल जाते हैं। इसलिए कि परधानी में लाखों का बजट है, पैसा है, लूट है। सो मदारीपुर जंक्‍शन के भी केंद्र में परधानी का चुनाव है।

परधानी का चुनाव मुद्दा है तो अवधी कवि विजय बहादुर सिंह अक्‍खड़ याद हो आए –'कब तक बुद्धू बनके रहबै अब हमहूँ चतुर सयान होब। हमहूं अबकी परधान होब।'

एक कवि ने लिखा है, ‘नहर गांव भर की पानी परधान का।‘ सो इस गांव में भी भूतपूर्व प्रधान छेदी बाबू, वर्तमान प्रधान रमई, परधानी का ख्‍वाब लिये बैरागी बाबू, उनकी सहायता में लगे वैद जी, दलित वोट काटने में छेदी बाबू के खड़े किये चइता, केवटोले कें भगेलूराम, छेदी बाबू के भतीजे बिजई ---सब अपनी अपनी जोड तोड में होते हैं। ऐसे वक्‍त गांव में जो रात रात भर जगहर होती है, दुरभिसंधियां चलती हैं, तरह तरह के मसल और कहावतें बांची जाती हैं वे पूरे गांव की सामाजिकी के छिन्‍न-भिन्‍न होते ताने बाने के रेशे-रेशे उधेडती चलती हैं। श्रीलाल शुक्‍ल ने ‘रागदरबारी’ में कहा था---'यहां से भारतीय देहात का महासागर शुरु होता है ।' यह उसी देहात की बटलोई का एक चावल है।

कभी समाजशास्‍त्री पी सी जोशी ने कहा था कि ‘रागदरबारी’ या ‘मैला आंचल’ जैसे उपन्यासों को समाजशास्‍त्रीय अध्‍ययन के लिहाज से क्‍यों नही पढा जाना चाहिए?आजादी के मोहभंग से बहुत सारा लेखन उपजा है। ‘राग दरबारी’ भी, मैला आंचल भी, विभाजन के हालात पर केंद्रित ‘आधा गांव’ भी।बालेन्दु का मदारीपुर भी गंगोली गांव, शिवपालगंज या मेरीगंज से बहुत अलग नहीं है ।इसलिए यह कहा जा सकता है कि समाजशास्त्रीय अध्ययन के लिए मदारीपुर जंक्शन भी एक सहयोगी उपन्यास हो सकता है।

विमर्शों के लिहाज से देखें तो दलित विमर्श, स्‍त्री विमर्श दोनों मदारीपुर में नजर आते हैं। एक सबाल्‍टर्न विमर्श भी है कि आज भी सवर्ण समाज की दुरभिसंधियां आसानी से दलितों को सत्‍ता नही सौंपना चाहतीं, लिहाजा वह उनके वोट किधर जाएं, कैसे कटें, इसके कुलाबे भिड़ाता रहता है। यहां परधानी के चुनाव में बुनियादी तौर से दो दल हैं एक छेदी बाबू का दूसरा बैरागी बाबू का। पर चुनाव के वोटों के समीकरण से दलित वर्ग का चइता भी परधानी का ख्‍वाब देखता है और भगेलू भी। पर दोनों छेदी और बैरागी के दांव के आगे चित हो जाते हैं। चइता को छेदी के भतीजे ने मार डाला तो बेटे पर बदलू शुकुल की लडकी को भगाने के आरोप में भगेलू को नीचा देखना पड़ा ।पर राह के रोड़े चइता व भगेलू के हट जाने पर भी परधानी की राह आसान नहीं। हरिजन टोले के लोग चइता की औरत मेघिया को चुनाव में खड़ा कर देते हैं । दलित चेतना की आंच सुलगने नहीं बल्‍कि दहकने लगती है जिसे सवर्ण जातियां बुझाने की जुगत में रहती हैं।--- और संयोग देखिए कि वह दो वोट से चुनाव जीत जाती है। पर चइता की मौत की ही तरह उसका अंत भी बहुत ही दारुण होता है। लिहाजा जब जीत की घोषणा सुन कर पिछवाड़े पति की समाधि पर पहुंचती है पर जीत कर भी हरिजन टोले के सौभाग्‍य और स्‍वाभिमानी पीढ़ी को देखने के लिए जिन्‍दा नही रहती। शायद आज का कठोर यथार्थ यही है।

कहना यह कि सत्‍ता की लड़ाई में दलितों की राह आज भी आसान नहीं। वे आज भी सवर्णों की लड़ाई में यज्ञ का हविष्‍य ही बन रहे हैं।आज गांव किस हालात से गुजर रहे हैं, यह उपन्यास इसका जबर्दस्त जायज़ा लेता है। बालेन्‍दु द्विवेदी गंवई और कस्‍बाई बोली में पारंगत हैं। गांव के मुहावरे लोकोक्‍तियों सबमें उनकी जबर्दस्‍त पैठ है। चरित्र चित्रण का तो कहना ही क्‍या। पढ़ते हुए कहीं श्रीलाल शुक्‍ल याद आते हैं, कहीं ज्ञान चतुर्वेदी तो कहीं परसाई भी । कहावतें तो क्‍या ही उम्‍दा हैं :'घर मा भूंजी भांग नहीं ससुरारी देइहैं न्‍योता।'

कुल मिला कर दुरभिसंधियों में डूबे गांवों के रूपक के रुप में मदारीपुर जंक्‍शन इस अर्थ में याद किया जाने वाला उपन्‍यास है कि दलित चेतना को आज भी सवर्णवादी प्रवृत्‍तियों से ही हांका जा रहा है।सबाल्‍टर्न और वर्गीय चेतना भी आजादी के तीन थके हुए रंगों की तरह विवर्ण हो रही है। गांवों को सियासत ने बदला जरूर है पर गरीब दलित के आंसुओं की कोई कीमत नहीं।बालेन्‍दु द्विवेदी ने यहां लाचार आंसुओं को अपने भाल पर सहेजने की कोशिश बड़ी ही पटु भाषा में की है, इसमें संदेह नहीं।

उपन्यास अंश....

मंदिर के ठीक सामने एक गहरा तालाब स्थित था जिसके बारे में यह कहा जाता था कि यह इतना गहरा था कि इसमें सात हाथियों की 'थाह' भी न मिले.बहरहाल इसकी ख्याति दूसरे कारण से थी.किंवदंती थी कि एक बार कोई राजा, जो पुरानी और लगभग असाध्य कोढ़ का शिकार था, लड़ाई के मैदान से विजय प्राप्त कर वापस लौट रहा था.रास्ते में उसे पाख़ाना लगा.राजा ने पहले तो इसे अपने स्तर पर ही रोकने की कोशिश की;फिर बेसब्र होने पर अपने इस 'दीर्घ और तीव्र आवेग' के बारे में मंत्री आदि से मंत्रणा की.मंत्री ने राजा को सुझाया -

'मान्यवर..!!आपकी धोती से बड़ी है आपकी इज्ज़त! और वह मुख़्तसर इसी धोती के संरक्षण में है.अगर एक बार वह प्रजा के बीच में खुल गई तो आपका और आपके राज्य का सारा वैभव जाता रहेगा.इसलिए सरकार! धोती भले ही ख़राब हो जाए पर उसे यूँ सरेआम खोलना युद्ध में पराजय स्वीकार करने जैसा और कदाचित उससे भी विनाशकारी सिद्ध होगा.'

राजा अपने मंत्री की बात पर अमल तो करना चाहता था, पर उसकी आंतें उसे निरंतर किसी नए विध्वंश की ओर धकेल रही थीं. जब तक राजा को मंत्री की बात समझ में आती, उसके पहले ही यह तालाब दिखाई पड़ा.राजा के पास अपने को हल्का करने के अलावा और कोई चारा नहीं था.मल-त्याग के बाद राजा ने जब पानी-छूने के लिए हाथ तालाब में डाले तो उसके हाथों की कोढ़ अचानक से सूखने लगी.राजा हतप्रभ रह गया.उसने झट अपने मंत्री को यह बात बताई और फिर खुश होकर, एक योगी साधक को यहाँ की ज़मींदारी दे दी.बस यहीं से मदारीपुर के वैभव की शुरुआत मानी गई थी.

तहसील की खतौनी में दर्ज़ इन्द्राज़ के मुताबिक़ शिवमंदिर चवन्नी पट्टी की संपत्ति मानी जाती थी.इसलिए इस मंदिर-परिसर में लगे पेड़ों से टपकने वाले एक-एक आम से लेकर खर-पतवार बीनने आने वाली कन्याओं तक पर पहला अधिकार इसी पट्टी का बनता था.ऐसे तमाम अन्य अघोषित 'प्रशासनिक अधिकार' भी फिलहाल इसी पट्टी के पास सुरक्षित थे.मसलन पट्टी के युवा इस चीज़ की जानकारी प्राप्त में लगे रहते थे कि कौन सी कन्या ने सोलह बरस का आँकड़ा पार कर लिया है;कौन फिलहाल कौमार्य-भंगापेक्षिणी है;किसे अरहर की खेतों में उन्मुक्त अठखेलियाँ करने का शौक है;किसके गवने की तारीख़ नज़दीक आ गई है;कौन अभी-अभी अपने साजन के पास से लौटी है-आदि-आदि.'अज्ञात के प्रति जिज्ञासा' रूपी इस शोध और संधान के मूल में अपने निजी भावनाओं की तृप्ति के साथ-साथ संभवत: विदा के कगार पर खड़े चवन्नी पट्टी के पुरुषों की अंतिम इच्छा के पूरे किये जाने का सद्प्रयास भी सम्मिलित था.

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सड़क कहे जाने वाले इन मार्गों का एक अतिरिक्त लाभ यह भी था कि यदि इनसे होकर इलाके की किसी गर्भवती स्त्री को प्रसव हेतु अस्पताल ले जाया जाता तो वह अस्पताल पहुँचाने से पहले ही बच्चा जन देती थी.इस प्रकार ये सड़कें अघो षित तौर पर न केवल डॉक्टर-वार्डब्वाय- अस्पताल की सामूहिक जिम्मेदारी निभाती थीं बल्कि सरकारी मुलाज़िमों को 'अनावश्यक के सिरदर्द' से मुक्त रखने की कोशिश भी करती थीं.'संसार के आठवें आश्चर्य' के रूप में घोषित होने की अपेक्षा लिए ये सड़कें फिलहाल सरकारी अभिलेखों में राजमार्ग का दर्ज़ा धारण किये हुए थीं और इस ऐतिहासिक राजमार्ग से होकर जब भारी सामानों से लदा हुआ कोई वाहन गुज़रता था तो मदारीपुर और आस-पास के तमाम गाँवों के निवासी उस वाहन के बोझ को हल्का करने का कोई अवसर नहीं चूकते थे.

एक बार ऐसा वाक़या हुआ बताते हैं कि एक रात को इस रास्ते से गुज़रते हुए काजू-किशमिश-बादाम से लदे एक ट्रक के पहियों ने थक-हारकर और आगे चलने में असमर्थ होकर, बीच-सड़क में अपने हाथ खड़े कर दिए.फिर क्या था! इलाके के लोगों ने इस स्वर्णिम अवसर का लाभ उठाने की नीयत से वाहन के ड्राइवर-क्लीनर के ऊपर सामूहिक हल्ला बोल दिया और इस आपसी-प्रतिस्पर्धा में लग गए कि कौन शख्स कम-से-कम समय में, ज्यादा-से-ज्यादा माल पार कर सकता है..!हालांकि अमावस की रात के घुप्प अँधेरे की वजह से इस प्रतिस्पर्धा के वास्तविक विजेताओं के सम्बन्ध में अंतिम निर्णय तो नहीं हो सका किन्तु इतना जरूर हुआ कि इलाके की मज़दूर और मेहनतकश कही जाने वाली महिलाओं ने अपने पतियों-बेटों के साथ मिलकर उनके इस पवित्र कर्म में जमकर हाथ बँटाया.कुछ महिलाओं ने तो बोरों और झोलों के अभाव में अंत:वस्त्र कहे जाने वाले अपने ‘पेटीकोट’ के मुँह को एक ओर से बंद कर तात्कालिक तौर पर न केवल झोलों का विकल्प प्रस्तुत किया बल्कि उसमें काजू-किशमिश-बादाम ठूँस-ठूँसकर और सिर पर लादकर अपने घर ले आयीं.इस अभूतपूर्व और अविस्मरणीय आंदोलन का क्रांतिकारी परिणाम यह हुआ कि इलाके के जिन घरों में अनाज के अभाव में कई दिनों तक चूल्हा तक नहीं जलता था;उन घरों के बच्चे अब आठों पहर काजू-किशमिश-बादाम का सेवन करने लगे और इलाके की कुपोषण की समस्या रातों-रात उड़न-छू हो गई.यही नहीं, दिन भर कटोरे लेकर सड़कों पर घूमने वाले छोटे बच्चों से लेकर भीख माँगने वाले बूढ़े-महीनों तक अपने घर से नहीं निकले और चोरी की घटनाओं में भी गिरावट देखी गई.दरअसल कुछ ही समय के लिए ही सही, पूरे इलाके के कोलाहल भरे वातावरण में अचानक से 'सम्पन्नता का छद्म सन्नाटा' सा छा गया था.लोगों के इस छोटे से सद्प्रास का एक प्रभाव यह भी हुआ कि देखते-ही-देखते यह इलाका अब जिले के सबसे समृद्ध इलाके के रूप में गिना जाने लगा था और सबसे बढ़कर सरकार के मुलाजिमों ने हमेशा की तरह इस बार भी इस बदलाव को अपने दिन-रात के संघर्ष का परिणाम बताना नहीं छोड़ा.

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डॉक्टर साहब अभी ऑपरेशन थियेटर में थे और संभवत: गाँव के ही केवटोली के मोहन नामक किसी युवा मरीज़ के गंभीर ऑपरेशन में व्यस्त थे.ऑपरेशन थियेटर को बाहर से देखने पर यह अपने नाम को चिढ़ाता हुआ ही लगता था.दरअसल इसमें थियेटर जैसा कुछ भी न था.डॉक्टर साहब के कमरे के भीतर ही एक कोने में एक सरकारी चारपाई डाल दी गई थी और एक सफ़ेद चादर को बगल के दीवार की खिड़की के सहारे से एक आड़ का रूप दे दिया गया था.सफ़ेद कहे जाने वाले चादर पर खून के इतने धब्बे थे कि कई बार उसके रंगीन होने का भ्रम हो जाता था और फैली हुई चादर में इतने छेद थे कि यदि वह हटा भी दी जाती तो भी वस्तुस्थिति में कोई ख़ास अंतर नहीं आता! लेकिन इसे बनाए रखना भी एक प्रकार की पेशेगत-मजबूरी थी.

ऑपरेशन थियेटर के भीतर चार-पाँच मुस्टंड आदमी, मरीज़ के हाथ और पैरों को इस कदर कसकर पकडे हुए थे जैसे किसी 'बलि के बकरे' को हलाल करने के पहले पकड़ा जाता होगा.कायदे से वे सभी बेहोशी की दवा का मुकम्मल विकल्प प्रस्तुत कर रहे थे. 'बेड' कहे जाने वाले बिस्तर पर 'मोहन' नामक मरीज़ लेटा हुआ था और निरंतर चिल्ला रहा था.इस क्रम में उन सभी मुस्टंडों के बाप-दादाओं का बारी-बारी से नाम लेता जाता था.साथ ही उनके साथ देशी गालियाँ अभिधान के रूप में जोड़ता जाता था और कई बार वह मुस्टंडों और उनके पुरखों के आपसी रिश्ते को भी गड्ड-मड्ड कर दे रहा था, जैसे-'हरे सारे! सुकुलवा के दमाद..!', 'का रे फोफियाs..!', 'तोहरे महतारी केs..!' आदि-आदि.पर मुस्टंडे भी जैसे इस प्रकार के अवसरों के लिए अभ्यस्त थे और शायद सहनशीलता जैसे भावों को कब का आत्मसात कर चुके थे.इसलिए ज्यों ही मरीज़ कोई ऐसा उदगार व्यक्त करता था, सभी एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा देते थे.इस पर मरीज़ का तेवर और उच्चारण का स्वर और अधिक आक्रामक हो जाता.लगभग दस मिनट के रगड़-घस्स के बाद डॉक्टर साहब के द्वारा ऑपरेशन की सफलता की घोषणा की गई.मरीज़ चिल्ला-चिल्ला कर पस्त हो चुका था.अब जाकर उसने डॉक्टर की ओर थोड़ा संकोच की नज़र से देखा. डॉक्टर ने आँखों-ही-आँखों में उसे नीचे पड़े बाल्टी की ओर देखने को कहा, मानो कहना चाहते हों कि-'मोहन बेटा..!जब थैले में ढाई पसर मवाद लेकर घूमोगे तो ऑपरेशन तो कराना ही पड़ेगा!फिर चाहे जितना चिल्लाओ..!!'

संस्कार सभ्यता संस्कृति एवं स्वदेशी का सामासिक समन्वय है "वर्णिका"


समीक्षक : अवधेश कुमार 'अवध'

कवयित्री : वाणी बरठाकुर 'विभा'

प्रकाशन : भारतीय साहित्य प्रतिष्ठान शोणितपुर, असम


मूल्य : रुपये 120 मात्र

'राष्ट्र बगैर / न कोई पहचान / न कोई नाम।' जब किसी कलम से ऐसे संदेश निकलते हों, अमावस की क्या विसात कि भोर होने से रोक सके! दुश्मन की क्या विसात जो पारावार को टोक सके!! मुसीबतें पहाड़ या दरिया बनकर भी आई हों तो ऐसे जज़्बे से टकराकर लौट जाएँगी। असम की पौराणिक/ऐतिहासिक धरती उषा - अनिरुद्ध के पावन प्रेम, श्रीमन्त शंकर देव की नैतिकता, लाचित बोरफुकन की वीरता, गोपीनाथ बारदोलोई की राष्ट्रभक्ति से आप्लावित है जिससे सिक्त है यहाँ की कवयित्री, अनुवादक, शिक्षिका एवं चित्रकार श्रीमती वाणी बरठाकुर 'विभा' की काव्य कृति 'वर्णिका' । असमिया और हिन्दी के कई साझा काव्य संग्रहों में रचनाकार व संपादक तथा हिन्दी - असमिया अनुवादक की हैयिसत का लोहा मनवा लेने के बाद 'वर्णिका' उनकी पहली स्वतन्त्र काव्य पुस्तक है।

मातृभाषा अहिन्दी के परिवेश में पली - बढ़ी कवयित्री की पांडुलिपि जब मुझे मिली तो मैं इस बात से खुश हुआ कि अहिन्दी भाषी प्रदेश में असमिया मातृ भाषी कवयित्री ने हिन्दी का चिराग जलाया। यह आश्चर्यजनित खुशी उत्तरोत्तर बढ़ती गई क्योंकि अतुकान्त कविताओं से गुजरता हुआ मैं तुकान्त, वर्णिक छंद, मात्रिक छंद और फिर मिश्रित छंद (वर्णिक व मात्रिक) पर जाकर रुका। 120 पृष्ठीय तकरीबन एक सौ कविताओं के इस अप्रतिम संकलन में नौ रस और प्राय: सम्पूर्ण मनोवृत्तियाँ कवयित्री की लेखनी के दायरे में हैं। भक्ति, धर्म, जाति, कर्म, प्रेम, पर्यावरण, भूगोल, खगोल, मौसम, पक्षी, खेल, नेत्रदान, त्यौहार, रूढ़ियाँ, संस्कृति, प्रकृति, राष्ट्र और विशिष्ट व्यक्तियों से परिपूर्ण है 'वर्णिका' की विषयवस्तु।

पूर्वोत्तर भारत का असम प्रदेश सुरम्य प्रकृति की गोद में बसा है। कवयित्री की जन्मभूमि व कर्मभूमि यहीं है अतएव यहां का सौन्दर्य भाव रोशनाई बनकर शब्दों के अक्स में उभरा - सा दीख पड़ता है। अरुणोदय के संग पक्षियों का कलरव, नन्हें पशुओं की धमा - चौकड़ी, बादलों की गर्जना, बागों का सजना, तिरंगे का गान और ब्रह्मपुत्र नद का नाद कवयित्री को न सिर्फ आकर्षित करते हैं वरन सृजन हेतु आलम्बन व उद्दीपन बनकर भाव प्रवणता उपजाकर विवश भी करते हैं।

अतुकान्त विधा की अधिकता के साथ तुकान्त रचनाएँ भी शामिल हैं। वर्णिक छंद के रूप में हाइकू, वर्ण पिरामिड, सायली, क्षणिकाएँ भी अपनी जगह सुनिश्चित करती हैं। मात्रिक छंद में कुछ मुक्तक और दोहे को कवयित्री ने स्थान दिया है । सृजन का श्रृंगार हिन्दी के साथ असमिया और संस्कृत के सुलभ शब्दों ने किया है। उपमा, रूपक, अनुप्रास, अन्योक्ति एवं दृष्टांत अलकार द्रष्टव्य हैं। 'वर्णिका' में भावों की प्रधानता प्राय: भक्ति, श्रृंगार, करुण, वीर एवं वात्सल्य की है।

'वर्णिका' का यह दोहा जिसकी भाव साम्यता कबीर के दोहे से है-

"वन-वन जिसको खोजता, मिला न एको बार।

कस्तूरी मृग हो गया, 'विभा' हृदय लाचार ।।"

'प्यासी धरती' कविता में कवयित्री मानवीय अत्याचार को ही इसका कारण मानती है-

"धरती पर किए

मानवों ने अत्याचार

वृक्ष काटकर

फैक्ट्री बनाकर

पहाड़ काटे

नदी पर लगाए बाँध....

ऐसा परिवेश हो तो

कैसे बरसेगा मेघ।"

नेत्रदान की आवश्यकता ही इसकी महत्ता है जिसके प्रति लेखनी सजग होकर आह्वान करती है-

"आओ

तुम और मैं

मिलकर करें

एक संकल्प....

देकर जाएँ

अपनी आँखें,

इन आँखों से

देख सके कोई

रंगीन संसार के

सारे रंग

मन में लिए

असीम उमंग ।"

'सच' में कवयित्री क्षणभंगुरता के प्रति दार्शनिक हो जाती है-

"अब मुझे मालूम है

दुनिया सच में

गोल है

जहाँ कोई चीज

टिकती नहीं।"

'वर्णिका' कवयित्री की हिन्दी भाषा में प्रथम मौलिक कृति है इसलिए कमियों/दोषों/त्रुटियों से इंकार नहीं किया जा सकता। आपको क्लेष हो सकता है, आपका कीमती समय कदाचित जाया हो सकता है इसके बावजूद कवयित्री की मंशा है कि हर छोटे दोष के लिए बड़ी से बड़ी सजा दें, किन्तु अपने स्नेह से वंचित न करें।

किसी भी पुस्तक का वास्तविक पारखी अन्तत: पाठक ही होता है । श्रीमती वाणी बरठाकुर 'विभा' की 'वर्णिका' आपके समर्थ हाथों में न्यायिक नज़रों से गुजरते हुए दिल के दरवाजे पर दस्तक दे रही है इस अपेक्षा के साथ कि दिल के किसी कोने में आप जगह जरूर देंगे । 'वर्णिका' को उज्जल भविष्य की अनन्त असीम अशेष शुभकामनाएँ।

अवधेश कुमार 'अवध', कवि, लेखक, समीक्षक व अभियन्ता

Engineer, Plant, Max Cement, GVIL, 4th Floor, LB Plaza, GS Road, Bhagavath, Guwahati, 781005 (Assam), Mob. 9862744237, awadhesh.gvil@gmail.com

व्यंग्य

नई करेंसी का आगमन

संजय वर्मा "दृष्टि "

पिछले वर्षों, में पुराने 500 व 1000 की करेंसी नोट लीगल टेंडर नहीं होने के बाद नए 500 व् 2000 के करेंसी नोट के चलन से भ्रष्टाचार , नकली करेंसी रोकने आदि हेतु उपायों को चलन में लाया गया था किन्तु इसमें कुछ व्यवहारिक परेशानी का सामना आम लोगो से लेकर खास लोगो करना पड़ा था। लोगो ने सोचा धीरे -धीरे इसका भी कुछ न कुछ समाधान अवश्य निकलेगा ही। टीवी पर करेंसी नोट बदलवाने व् पुराने करेंसी नोट बदलवाने की खबरे प्रसारित हो रही और फेसबुक -वाट्सअप पर इसके त्वरित समाचार के लिए और समाधान हेतु घर परिवार की नजरें ताजे समाचारों हेतु मानों पलक पावड़े लिए बैठी हुई रहती थी।

घर के अंदर से पति महोदय को पत्नी ने आवाज लगाई -नहा कर बाजार से सब्जी -भाजी ले आओ| किन्तु पति महोदय को लगा फेस बुक का चस्का। वे फेस बुक के महासागर में तैरते हुए मदमस्त हुए जा रहे। बच्चे पापा से स्कूल ले जाने की जिद कर रहे थे की स्कूल में देर हो जाएगी। काम की सब तरफ से पुकार हो रही मगर जवाब बस एक मिनिट। महाशय नाइस, वेरी नाइस की कला में माहिर हो गए थे। मित्र की संख्या में हजारों इजाफा से वे मन ही मन खुश थे किन्तु पडोसी को चाय का नहीं पूछते।

इसका यह भी कारण हो सकता उन्हें फुर्सत नहीं हो। दोस्तों में काफी ज्ञानी हो गए थे। मित्र भी सोचने लगे कि यार ये इतना ज्ञान कहा से लाया। इससे पहले तो ये हमारे साथ दिन भर रहता और हमारी देखी हुई फिल्म की बातें समीक्षा के रूप में सुनता रहता था। एक दिन मोहल्ले वाले मित्रों ने सोचा इनके घर चल कर के पता किया जाए।गर्मी में ठंडा शरबत भी पीने मिल जाएगा। मित्रों ने घर के बाहर लगी घंटी दो चार बार बजाई। अंदर से आवाज आई- जरा देखना कौन आया है। उन्हें तो उठ कर देखने की भी फुरसत नहीं मिल रही थी।

दोस्तों ने कहा -यार आज कल दिखता ही नहीं क्या बात है। हमने सोचा कही बीमार तो नहीं हो गया हो। इसलिए खबर लेने और करेंसी 500 ओर 1000 रूपये बंद होने और नए 10, 50, 200, 500 व् 2000 की नए करेंसी नोट आगए की खबर तो पता ही थी। वर्तमान में नई करेंसी चलन में आगई है ।पता नहीं दिख नहीं रहा तो शायद तुझे खबर मालूम न हो।

घर में देखा तो भाभीजी वाट्सअप में अपने रिश्तेदारों को त्योहारों की फोटो सेंड करने में सर झुकाये तल्लीन और कुछ बच्चे भी इसी मे लगे थे। अब ऐसा लग रहा था की फेसबुक और वाट्सअप में जैसे मुकाबला हो रहा हो। घर के काम का समय मानो विलुप्तता की कगार पर जा खड़ा हुआ हो। सब जगह चार्जर लटक रहे थे। मोबाइल यदि कही भूल से रख दिया और नहीं मिला तो ऐसा लगता जैसे कोई अपना लापता हो गया हो। दिमाग में चिड़चिड़ापन, हिदायते, उभर कर आना मानों रोज की आदत बन गई हो। चार्जिग करने के लिए घर में ही होड़ होने लगी। बैटरी लो होजाने से सब एक दूसरे को सबूत पेश करने लगे।

वाकई इलेक्ट्रॉनिक युग में प्रगति हुई किन्तु लोग रिश्तों और दिनचर्या में कम ध्यान देकर अधिक समय और सम्मान फेस बुक और वाट्सअप और मोबाइल पर केंद्रित करने लगे है। पहले 500 और 1000 हजार की करेंसी बदलवाने की चिंता थी। अब एटीएम से मिलने वाले नोटों का इंतजार में लंबी कतारे कही कही देखी जाने लगी ।शुरू शुरू में तो गांव -शहर में करेंसी बदलवाने को ले जाते हुजूम से बैंक और डाकघर चर्चित हुए वही कोई परिचित किसी से यही पूछता की आप कहा हो।? वो एक ही पता बताता की मै, बैंक /डाक घर में हूँ। वर्तमान में नई करेंसी वाला 500, 2000, 200, 5 0 एवं 10 के नए रंगीन नोट आने से 2000 के छुट्टे जगह जगह मांगने राहत मिल रही ।

संजय वर्मा "दृष्टि "

१२५, शहीद भगत सिंग मार्ग

मनावर (धार) म प्र 454446

दो ग़ज़लें : डॉ. सुधीर आज़ाद

1.

बस ज़रा-सा तेरी यादों से गुज़र आये हैं,

कितने मौसम मेरी साँसों में उभर आये हैं.

कभी तन्हाई मुसलसल, कभी रतजगों की क़तारें,

एक तुम तक आने में मुझे कितने सफ़र आये हैं

आज आँखों की बीनाई बढ़ी हुई लगती है,

आज आँखों को मेरी आप नज़र आये हैं.

इतनी दहशत में अब जायेंगे शहर से कहाँ,

गाँव को छोड़कर जो लोग शहर आये हैं.

देखिए बरसों के बाद आपकी हुई है आमद,

सुनिए रुक जाइये भी अब आप अगर आए हैं

ये कैसी बेहिसी पसरी है यहाँ 'आज़ाद',

ऐसा लगता है किसी और के घर आए है

.......................................................

2.

इस बात पर मग़रूर है

बदनाम था मशहूर है

मैं उसके रंग में रंग गया

वो मेरे नशे में चूर है

नहीं बेसबब यह चाँदनी

ये मुहब्बतों का नूर है

जब हिज़्र था तो उम्मीद थी

लेकिन ये वस्ल बेनूर है

आवाम को अभी पास रख

दिल्ली अभी भी दूर है

है पास क्यों वो रूह के,

जो जीस्त से बड़ा दूर है

कहते हुए रुकता है वो

कहना तो कुछ ज़रूर है

हिन्दी भाषा लाएगी कश्मीर के पर्यटन उद्योग के अच्छे दिन

डॉ अर्पण जैन 'अविचल'

प्रेम के गीत गुनगुनाने वाली मखमली आवाज़, जो जाफरान की तासीर से तरन्नुम बना देगी, कश्यप की घाटी, पानी की नगरी या शंकराचार्य की भूमि के रूप में, लालचौक से क्रांति कहती जमीं हो चाहे, डल झील से टपकते पानी की बात होगी, शिकारों और तैरनेवाले घर (हाउस बोट) की सर्द रातों को याद किया जाएगा, चश्मे शाही में पत्थरों से रिसते पानी की चाह होगी, मुगल गार्डन को जेहन में उतारा जायेगा, फूलों के महकने को जब जीवन में उतरता देखा जाएगा, तब बेशक वादी की बर्फ से लेकर कहवे की महक का जायका लेकर कश्मीर की क्यारियों को ही याद किया जाएगा ।

समृद्धशाली इतिहास का झरोखा हो चाहे विस्तृत पौराणिक कहानियों में वादी का जिक्र, सभी जगह केवल प्रेम गीत ही गुंजायमान होते है, ऐसे धरती के स्वर्ग के जीवन यापन का मुख्य आधार यहाँ के सौंदर्य को निहारने आने वाले पर्यटक ही तो है। पानी से निकलने वाला स्थान यानी कश्मीर जिसकी वादियों में बसा है समृद्ध इतिहास और यहाँ का सौंदर्य स्वमेव ही पर्यटकों को आकर्षित करता है। प्राचीनकाल में कश्मीर हिन्दू और बौद्ध संस्कृतियों का पालक राज्य रहा है। माना जाता है कि यहाँ पर भगवान शिव की पत्नी देवी सती रहा करती थीं और उस समय ये वादी पूरी पानी से ढकी हुई थी। यहाँ एक राक्षस नाग भी रहता था, जिसे वैदिक ऋषि कश्यप और देवी सती ने मिलकर हरा दिया और ज़्यादातर पानी वितस्ता (झेलम) नदी के रास्ते बहा दिया। इस तरह इस जगह का नाम सतीसर से कश्मीर पड़ा। इससे अधिक तर्कसंगत प्रसंग यह है कि इसका वास्तविक नाम कश्यपमर (अथवा कछुओं की झील) था, इसी से कश्मीर नाम निकला।

कश्मीर का अच्छा-ख़ासा इतिहास कल्हण के ग्रंथ राजतरंगिणी से मिलता है। प्राचीन काल में यहाँ आर्य राजाओं का राज था। मौर्य सम्राट अशोक और कुषाण सम्राट कनिष्क के समय कश्मीर बौद्ध धर्म और संस्कृति का मुख्य केन्द्र बन गया। पूर्व-मध्ययुग में यहाँ के चक्रवर्ती सम्राट ललितादित्य ने एक विशाल साम्राज्य क़ायम कर लिया था। कश्मीर संस्कृत विद्या का विख्यात केन्द्र रहा। कश्मीर शैवदर्शन भी यहीं पैदा हुआ और पनपा। यहां के महान मनीषीयों में पतञ्जलि, दृढबल, वसुगुप्त, आनन्दवर्धन, अभिनवगुप्त, कल्हण, क्षेमराज आदि हैं। यह धारणा है कि विष्णुधर्मोत्तर पुराण एवं योग वासिष्ठ यहीं लिखे गये।

स्थानीय लोगों का विश्वास है कि इस विस्तृत घाटी के स्थान पर कभी मनोरम झील थी जिसके तट पर देवताओं का वास था। एक बार इस झील में ही एक असुर कहीं से आकर बस गया और वह देवताओं को सताने लगा। त्रस्त देवताओं ने ऋषि कश्यप से प्रार्थना की कि वह असुर का विनाश करें। देवताओं के आग्रह पर ऋषि ने उस झील को अपने तप के बल से रिक्त कर दिया। इसके साथ ही उस असुर का अंत हो गया और उस स्थान पर घाटी बन गई। कश्यप ऋषि द्वारा असुर को मारने के कारण ही घाटी को कश्यप मार कहा जाने लगा। यही नाम समयांतर में कश्मीर हो गया। निलमत पुराण में भी ऐसी ही एक कथा का उल्लेख है। कश्मीर के प्राचीन इतिहास और यहां के सौंदर्य का वर्णन कल्हण रचित राज तरंगिनी में बहुत सुंदर ढंग से किया गया है। वैसे इतिहास के लंबे कालखंड में यहां मौर्य, कुषाण, हूण, करकोटा, लोहरा, मुगल, अफगान, सिख और डोगरा राजाओं का राज रहा है। कश्मीर सदियों तक एशिया में संस्कृति एवं दर्शन शास्त्र का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा और सूफी संतों का दर्शन यहां की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।

मध्ययुग में मुस्लिम कश्मीर आए और यही के निवासी हो गये। मुसल्मान शाहों में ये बारी बारी से अफ़ग़ान, कश्मीरी मुसल्मान, मुग़ल आदि वंशों के पास गया। मुग़ल सल्तनत गिरने के बाद से सिख महाराजा रणजीत सिंह के राज्य में शामिल हो गया। कुछ समय बाद जम्मू के हिन्दू डोगरा राजा गुलाब सिंह डोगरा ने ब्रिटिश लोगों के साथ सन्धि करके जम्मू के साथ साथ कश्मीर पर भी अधिकार कर लिया। डोगरा वंश भारत की आज़ादी तक कायम रहा।

भारत का यह ख़ूबसूरत भूभाग मुख्यतः झेलम नदी की घाटी (वादी) में बसा है। भारतीय कश्मीर घाटी में छः ज़िले हैं : श्रीनगर, बड़ग़ाम, अनन्तनाग, पुलवामा, बारामुला और कुपवाड़ा। कश्मीर हिमालय पर्वती क्षेत्र का भाग है। जम्मू खण्ड से और पाकिस्तान से इसे पीर-पांजाल पर्वत-श्रेणी अलग करती है। यहाँ कई सुन्दर सरोवर हैं, जैसे डल, वुलर और नगीन। यहाँ का मौसम गर्मियों में सुहावना और सर्दियों में बर्फ़ीला होता है। इस प्रदेश को धरती का स्वर्ग कहा गया है। एक नहीं कई कवियों ने बार बार कहा है: गर फ़िरदौस बर रुए ज़मीं अस्त, हमीं अस्त, हमीं अस्त, हमीं अस्त। (फ़ारसी में मुग़ल बादशाह जहाँगीर के शब्द)

पर्यटन और हस्तशिल्प कश्मीर का परपंरागत उद्योग है। हाथ से बनी वस्तुओं की व्यापक रोज़गार क्षमता और विशेषज्ञता को देखते हुए राज्य सरकार हस्तशिल्प को उच्च प्राथमिकता दे रही है। कश्मीर के प्रमुख हस्तशिल्प उत्पादों में काग़ज़ की लुगदी से बनी वस्तुएं, लकड़ी पर नक़्क़ाशी, कालीन, शॉल और कशीदाकारी का सामान आदि शामिल हैं। हस्तशिल्प उद्योग से काफ़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा अर्जित होती है। हस्तशिल्प उद्योग में 3.40 लाख कामगार लगे हुए हैं। उद्योगों की संख्या बढ़ी है। करथोली, जम्मू में 19 करोड़ रुपये का निर्यात प्रोत्साहन औद्योगिक पार्क बनाया गया है। ऐसा ही एक पार्क ओमपोरा, बडगाम में बनाया जा रहा है। जम्मू में शहरी हाट हैं जबकि इसी तरह के हाट श्रीनगर में बनाए जा रहे है। राग्रेथ, श्रीनगर में 6.50 करोड़ रुपये की लागत से सॉफ्टेवयर टेक्नोलॉजी पार्क शुरू किया गया है।

पर्यटन, कश्मीरी अर्थव्यवस्था का एक अभिन्न हिस्सा है। प्रायः "पृथ्वी पर स्वर्ग" नाम से अभिहित, कश्मीर के पर्वतीय परिदृश्य सदियों से पर्यटकों को आकर्षित करते रहे हैं। उल्लेखनीय स्थल हैं डल झील, श्रीनगर पहलगाम, गुलमर्ग, यूसमार्ग और मुग़ल गार्डन आदि। तथापि, उग्रवाद की वजह से पर्यटन उद्योग बुरी तरह प्रभावित है। हाल के वर्षों में, साहसिक पर्यटन के लिए लद्दाख एक प्रमुख केंद्र के रूप में उभरा है। नग्न चोटियों और गहरी घाटियों से युक्त ग्रेटर हिमालय के इस हिस्से को "पृथ्वी का चांद" कहा जाता है, जो कभी उपमहाद्वीप से उच्च एशिया के सिल्क रूट के लिए जाना जाता था। लेह भी पर्यटन स्थल के रूप में उभर रहा है।

कश्मीर के पर्यटन उद्योग पर नज़र डाली जाए तो इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि कश्मीर में आने वाले पर्यटकों में बड़ा हिस्सा हिंदुस्तान के हिन्दीभाषी राज्यों से आता है। सरकारी आंकड़ों पर नज़र डाले तो भी यह बात सिद्ध होती है कि ७० प्रतिशत से ज्यादा पर्यटक हिन्दीभाषी होते है। और ऐसे में कश्मीरी यदि अपने राज्य में हिन्दी विद्यालयों का विरोध करेंगे तो निश्चित तौर पर वे अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मार रहे है। क्योंकि भाषा का किसी मजहब या जाति से कोई वास्ता नहीं होता है। कश्मीरी बच्चें यदि हिन्दी भाषा नहीं सीखेंगे तो कैसे वे हिंदुस्तानी पर्यटकों से संवाद स्थापित कर पाएंगे। जब संवाद में कठिनता होगी तो पर्यटक आना भी कम हो जायेंगे इसका उदहारण दक्षिण भारत है। जहाँ संवाद माध्यम में हिंदुस्तानी भाषा का शामिल नहीं होना ही पर्यटकों को वहाँ न जाने पर मजबूर कर चूका है और बीते ३ दशकों में दक्षिण भारत के पर्यटन उद्द्योग पर भारी बट्टा लगा है।

पत्रकार एवं स्तंभकार

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MkW- lrh'k ikoMs

डॉ बाबा साहेब अंबेडकर की दृष्टि में स्त्री-मुक्ति।


डॉ संतोष राजपाल

पोस्ट डॉक्टोरल रिसर्च फेल्लोव

हिंदी अध्ययन विभाग

मानसगंगोत्री

मैसूर विश्वविध्यालय


मैसूर ५७०००६

शोध सारांश

डॉ बाबा साहेब का काल सन १८९१ से १९५६ तक रहा उनका जीवन काल दलितों की खातिर समर्पणशील और त्यागी व्यक्तित्व का प्रतिबिंब है। बाबा साहेब का विचार था कि मनुवादी व्यवस्था ने जिस प्रकार प्राचीन काल से ही अस्पृश्य जाति के विकास में बाधा उत्पन्न की थी, उसी प्रकार महिलाओं के विकास और स्वतन्त्रता के अधिकारों को भी रोका था। प्रस्तुत शोध आलेख में डॉ. अंबेडकर के स्त्री अधिकारों, स्त्री मुक्ति संबंधी संबंधी विचारों पर प्रकाश डाला गया है।


की वर्ड: स्त्री मुक्ति, दलित, स्त्री अधिकार, समता, शिक्षा, समानता

शोध आलेख

नारी भारतीय समाज का एक महत्वपूर्ण अंग रही है। नारी के विविध रूपों की व्याख्या हो चुकी है, युगों-युगों से पीड़ित, अत्याचार-अनाचार की शिकार एवं वासना तृप्ति का साधन बनकर जीवन व्यतीत करने वाली नारी बेवश, लाचार एवं अपमानित ज़िंदगी जी रही है। “किसानों और मजदूरों के बाद भारतीय समाज का एक बृहद शोषित समूह भारतीय नारी अर्थ और अधिकार से वंचित रहने के कारण उसका कोई चारा नहीं। आर्थिक और सामाजिक स्तर पर उसका बराबर शोषण हो रहा है।“१ यह कथन दलित नारी पर भी लागू होता है। भारत में दलितों की हीन अवस्था और उनके उद्धार का कार्य युग प्रवाह के साथ हुआ और आज भी हो रहा है। उसमें डॉ बाबा साहेब अंबेडकर का नाम अग्रीण और अमर है। डॉ बाबा साहेब का काल सन १८९१ से १९५६ तक रहा उनका जीवन काल दलितों की खातिर समर्पणशील और त्यागी व्यक्तित्व का प्रतिबिंब है। जिसके अनावश्यक, अन्याय, झूठी प्राचीन व्यवस्था के प्रति विद्रोह का स्वर उबरा हुआ है। इस महान विभूति के जन्म से न केवल दलितों को बल्कि मानवता को मान, प्रतिष्ठा और चेतना का स्वरूप प्राप्त हुआ। समता और स्वतन्त्रता के प्रतिपादक तथा दलितों के भाग्यविधता के रूप में बाबा साहेब का व्यक्तित्व सदा प्रकाशमान रहा है। बाबा साहेब का विचार था कि मनुवादी व्यवस्था ने जिस प्रकार प्राचीन काल से ही अस्पृश्य जाति के विकास में बाधा उत्पन्न की थी, उसी प्रकार महिलाओं के विकास और स्वतन्त्रता के अधिकारों को भी रोका था। मैं इस संधर्भ में डॉ बाबा साहेब द्वारा लिखी गई लेख जिसका शीर्षक है ‘हिन्दू नारियों का उत्थान और पतन’ जो ‘महाबोधि’ मासिक में प्रकाशित हुई थी उसे उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत करके बताना चाहूँगा कि स्त्रियों को खास करके दलित स्त्रियों को मनुवादियों ने समाज में दबाकर रखा। सन १९५० में बम्बई के एक लेखक ने ‘ईव्स वीकली’ नामक स्त्रियों के साप्ताहिक जनवरी १९५० के अंक में अपने लेख में लिखा था कि ‘हिन्दू नारियों के पतन के लिए गौतम बुध्द ही जिम्मेदार हैं’ उसका उत्तर देने के लिए बाबा साहेब ने उपर्युक्त उल्लेखित (हिन्दू नारियों का उत्थान और पतन) एक अध्यवसायपूर्ण लेख लिखा और उस लेखक द्वारा लिखी हुई लेख की अच्छी खबर ली और कहा कि “बुद्ध के विरुद्ध यह काफी गंभीर और दुष्ट आरोप हमेशा ही किया जाता है।“२ अंबेडकर के मतानुसार उस लेखक ने जिस लेखांश के आधार पर अपना निष्कर्ष निकाला था, वह लेखांश ही मूलतः आगे की बौद्ध बिक्षुओं ने घुसेड़ा था। गौतम बुद्ध नारियों को न टालते थे, न उनके प्रति तिरस्कार व्यक्त करते थे। बुद्ध के अवतीर्ण होने से पहले ज्ञान प्राप्त करने का जन्मसिद्ध अधिकार नारी को नकारा गया था। अपना आत्मिक उत्कर्ष करने का भी अधिकार उसे नहीं दिया गया था। यह नारी जाति पर सीधा-सीधा अन्याय था। नारी को परिव्राजक का जीवन-क्रय स्वीकारने के लिए स्वतंत्रता देकर बुद्ध ने एक फटकार से नारी पर हो रहे दोनों अन्याय दूर किए। पुरुषों की भाँति नारियाँ ज्ञान अर्जित करें और अपनी आत्मिक उन्नति करें- बुद्ध ने नारियों को प्रतिष्ठता व स्वतंत्रता देने वाली वह एक बड़ी क्रांति थी। मनु बुद्ध का प्रबल विरोधी था। उसने, घर में बौद्ध धर्म का प्रवेश न हो, इसलिए नारियों पर ये बंधन लगाए। उनके माथे पर असमानता के ढेर रचे थे। अपने लेख का निष्कर्ष बताते हुए बाबा साहेब अंबेडकर ने कहा, “भारतीय नारियों के पतन और विनाश के लिए अगर कोई कारण हुआ होगा, तो वह मनु है, बुद्ध नहीं।“३

डॉ बाबा साहेब अंबेडकर को जब भी कोई अवसर मिला, उनहोंने महिलाओं को विशेषकर दलित महिलाओं को हर प्रकार की स्वतंत्रता, शिक्षा, समानता व समाज की सभी गतिविधियों में पुरुषों के समक्ष ही अपनी भागीदारी निभाने का संदेश दिया। महात्मा फुले द्वारा महिलाओं के उत्थान के कार्य करने के उदाहरण से भी डॉ बाबा साहब ने प्रेरणा ली। महात्मा ज्योतिबा फुले के बाद सर्वप्रथम दलित महिलाओं के बारे में सोचने वाले अगर कोई थे तो वह बाबा साहेब अंबेडकर थे। बाबा साहेब का उदय होने पर दलित स्त्रियों की स्थिति में परिवर्तनकारी दौर शुरू हुआ। बाबा साहेब स्त्री-शिक्षा और उनके स्वतंत्र विकास के प्रबल हिमायती थे। बाबा साहब ने मानुवादी व्यवस्थाओं के विरुद्ध जो सफल ऐतिहासिक विद्रोह किया और उससे नारी जाति को जो लाभ मिला, उसे देखते हुए वे भारतीय नारी के उद्धारक सिद्ध होते हैं। डॉ बाबा साहब अंबेडकर स्त्री जीवन के संबंध में अपने विचारों को व्यक्त करते हुए कहते हैं “भारतीय समाज व्यवस्था में स्त्री दलित से भी दलित है। इस व्यवस्था ने न केवल उसकी अस्मिता को नकारा है, बल्कि उसे हमेशा दूसरा दर्जा दिया है। उसका प्रवेश ज्ञान क्षेत्र से लेकर धर्म क्षेत्र तक वर्जित था। हजारों वर्षों से वह दासतापूर्ण जीवन जी रही थी।“४

२५ दिसम्बर १९२७ का दिन भारतीय इतिहास का एक अविस्मरणीय दिन बन गया, जब एक आधुनिक न्यानवादी मनु ने पुरातन अन्यायवादी मनु की व्यवस्थाओं को भस्मीभूत कर दिया। इसी मनु द्वारा भारतीय संविधान के रूप में नई व्यवस्था दी गई थी जो आज हमारे देश का सर्वोच्च विधान है। इस प्रकार डॉ बाबा साहेब अंबेडकर ने नारी व दलितों को समानता एवं स्वतंत्रता के मानवाधिकार दिलाकर भारतीय समाज के माथे पर लगी अन्याय और असमानताओं की कलंक कालिमा को धोने में अपना सारा जीवन खपा दिया। २७ दिसम्बर १९२७ को अस्पृश्य महिलाओं को अलग से भाषण देते हुए डॉ बाबा साहेब अंबेडकर ने कहा “तुम खुद को अस्पृश्य मत मानों। घर में स्वच्छता रखो। स्पृश्य हिन्दू हामिलाएँ जिस तरह कपड़े पहनती हैं, उसी तरह तुम पहनों। धोती चाहे फटी ही क्यों न हो पर वह स्वच्छ होनी चाहिए। तुम इस बात पर सोचो कि तुम्हारे पेट में जन्म देना पुण्यप्रद क्यों है? तुम प्रतिज्ञा करो कि इस तरह की कलंकित स्थिति में हम आगे ज़िंदगी नहीं बिताएँगे। तुम सबको पुराने और बुरे रीति-रिवाजों को छोड़ देना चाहिए। संप्रति कौन कैसे बर्ताव करे इस पर पाबन्दी नहीं है। पूरे गले भर गलासारियाँ और हाथ में कुहनी तक चाँदी के कड़े तुम्हारी पहचान है। अगर जेवर पहनना है तो सोने का पहनों। घर में किसि भी प्रकार की अमंगल बात न होने दो। लड़कियों को शिक्षा दिलाओ। ज्ञान और विद्या दोनों बातें महिलाओं के लिए भी आवश्यक हैं, ऐसी महत्वाकांक्षा मन में रखकर ज़िंदगी बिताओ।“५ डॉ बाबा साहेब का उक्त भाषण यह साबित करता है कि अस्पृश्य वर्ग के लोगों में विशेषकर अस्पृश्य महिलाओं में सामाजिक परिवर्तन की चेतना जागा रहे थे।

१८ और १९ जुलाई, १९४२ को अखिल भारतीय दलित वर्ग की परिषद नागपुर में की जाने वाली थी। यहाँ एक भाषण अमरावती की सुलोचना बाई डोंगरे की आद्यक्षता में दलित वर्ग की महिलाओं की परिषद में हुआ। इसमें डॉ बाबा साहेब ने कहा “मेरा मत है कि महिलाओं का संगठन हो। महिलाओं को अपने कर्तव्यों का महत्व मालूम पड़ने पर वे समाज सुधार का कार्य कर सकेंगी। समाज में घातक रीति-रिवाजों का उच्चाटन कर आपने बड़ी सेवा कि है। आपकी उन्नति के बारे में मुझे समाधान और भरोसा लगता है। आप स्वच्छता को महत्व दें। दुर्गुणों से दूर रहें। बच्चों को शिक्षा दें। उनके मन में माहत्वाकांक्षा जागृत करें। उनके मन पर यह प्रतिबिम्बित करें कि विश्व में बड़प्पन प्राप्त कर सकेंगे। उनके मन से न्यूनतम कि भावना को हटा दें। विवाह करने में जल्दबाज़ी न करें। विवाह एक ज़िम्मेदारी होती है। आपकी संतानों कि उस ज़िम्मेदारी को आर्थिक दृष्टि से सहने में समर्थ हुए बिना वह ज़िम्मेदारी उन पर न लादें। विवाह करने वालों को यह ध्यान में रखना चाहिए कि ज़्यादा बच्चे पैदा करना पाप है। सबसे महत्वपूर्ण बात यानि प्रत्येक लड़की को शादी के बाद अपने पति के साथ एकनिष्ठ रहना चाहिए। उसके साथ मित्रता और समानता के रिश्ते से बर्ताव करना चाहिए। उसकी दासी नहीं बनना चाहिए। अगर आप इस उपदेश के अनुसार बर्ताव करेंगी तो आपको सम्मान और वैभव प्राप्त हुए बिना नहीं रहेगा।“६ इस प्रकार बाबा साहेब ने अस्पृश्य जाति की महिलाओं को समाज परिवर्तन के लिए अपने सामाजिक दायित्व को स्वीकार करने का पाठ पढ़ाया। बाबा साहेब की उपर्युक्त विचारों से पता चलता हे कि नारी तभी मुक्त हो सकेगी जब वह अपने जीवन में अनुशशित और क्रमबद्ध जीवनशैली अपनाएगी।

डॉ बाबा साहेब अंबेडकर ने २० वीं सदी के तीसरे दशक में ही, जब वे बम्बई विधान परिषद के सदस्य थे, महिला श्रमिकों के लिए प्रसूति-काल में सहूलियत देने के बारे में प्रस्तुत विधेयक के समर्थन में अपने भाषण में कहा, “मैं यह मानता हूँ कि प्रत्येक माता को प्रसूति-पूर्व और प्रसूति बाद कि अवधि में कुछ विशिष्ट समय तक विश्राम मिलना राष्ट्र-हित की दृष्टि से लाभदायक है। यह विधेयक को तो उसी तत्व पर आधारित है। इस पर होने वाला व्यय सरकार उठाए। तथापि तत्कालीन परिस्थिति में वह आर्थिक बोझ मालिक वर्ग ही सहन करे।“७ इससे यह भी स्पष्ट होता है कि बाबा साहेब ने महिलाओं की समस्या को राष्ट्र-हित में आवश्यक मानते हुए राज्य को भी उसके दायित्व का आभास कराया। डॉ बाबा साहेब का विधान परिषद में दिया गया, उस समय का यह वक्तव्य उनके राजनीतिक-सामाजिक सोच को भी दर्शाता हैं। जब १९४२ में वाइसराय की काउंसिल (मंत्रिमंडल) के वे सदस्य थे। उनहोंने श्रम मंत्री के रूप में महिला मजदूरों की मजदूरी बढ़ाने के विशेष उपलब्द किए। बाबा साहेब ने कोयला खान में काम करने वाली महिलाओं की प्रसूति अवकाश, स्वास्थ्य, मनोरंजन और काम के घंटे निश्चित किए। इसके अतिरिक्त, ‘फरवरी १९९४ में डॉ बाबा साहेब अंबेडकर की पहल के परिणामस्वरूप कोयला खान में काम करने वाली महिला श्रमिकों को पुरुष श्रमिकों के समान वेतन पाने का अधिकार मिला। श्रमिकों की कमी को देखते हुए महिला श्रमिकों की खान में काम करने पर लगाया प्रतिबंध भी हटा।‘ भारतीय संविधान सभा के सदस्यों और डॉ अंबेडकर ने महिलाओं को स्वतंत्रता व समानता दिलाने के लिए विशेष प्रयत्न किए। स्वतंत्र भारत के प्रथम विधि मंत्री बन जाने के बाद डॉ बाबा साहेब अंबेडकर ने हिन्दू न्याय व्यवस्था में महत्वपूर्ण परिवर्तन करने तथा भारतीय नारी को मानवीय अधिकार दिलाने के लिए ‘हिन्दू कोड बिल’ को पास करवाना चाहा। इस बिल में “बलिक नारी यदि अपनी इच्छा के अनुसार किसि भी वर्ग एवं जाति के पुरुष के साथ विवाह कर लेती है तो उस विवाह को वैध माना जाएगा।“८ विवाह में वर का वरन-स्वातंत्र्य मनुवादी सामाजिक व्यवस्था में महिला पराधीनता को तोड़ने का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ बना। इसका बहुत से सदस्यों ने विरोध किया। डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कहा, “हिन्दू कोड बिल की वजह से हिन्दू संस्कृति की भव्य रचना का विनाश होगा।“९ हिन्दू कोड बिल में जिस तरह से परिवर्तन संसद में सुझाए गए उनसे प्रसन्न होकर डॉ अंबेडकर ने अंततः मंत्रिपरिषद से त्याग-पत्र देने का मन बना लिया। यद्यपि हिन्दू कोड बिल उस रूप में पारित नहीं हो सका, जिस रूप में डॉ अंबेडकर ने उसे प्रस्तुत किया था, पर डॉ अंबेडकर के मंत्रिपरिषद से त्याग-पत्र देने के बाद आगे आने वाले समय में, हिन्दू कोड बिल को अलग-अलग भागों में, अलग-अलग समय में, एक नये प्रकार से मंजूर कर लिया गया। बाद में पारित ‘विशेष विवाह अधिनियम’ (१९५४), ‘हिन्दू विवाह विधेयक’ (१९५५), ‘हिन्दू उत्तराधिकार विधेयक’ (१९५६), ‘हिन्दू दत्तक ग्रहण निर्वाह विधेयक’(१९५६), से महिलाओं को बहुत लाभ मिल गए। “पति के अमानुषिक अत्याचार से बचने के लिए वह पति से संबंध-विच्छेध की भी अधिकारी बन गयी। तलाक का अधिकार उसकी सामाजिक गरिमा को प्रतिष्ठित करने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम था। इसके द्वारा एक पत्नीत्व की प्रथा को भी कानूनी मान्यता मिल गयी। संपत्ति संबंधी अधिकार बनाकर पहली बार स्त्री को अपने पिता एवं पति की संपत्ति में हिस्सा लेने का हक़ मिला। ‘स्त्री’ को ही संपत्ति मनाने वाले समाज में उसे एक नागरिक का दर्जा हेतु ‘संपत्ति का अधिकार’ दे देना, महिला के जीवन में बराबरी की दिशा में एक निर्णायक प्रगतिशील कदम था। अब कानूनन महिला भी दत्तक ली जाति है। ‘समान कार्य के लिए समान वेतन’ के नियम द्वारा लिंगा भिन्नता को खत्म किया गया।“१० इतना ही नहीं, मातृत्व अवकाश जैसी संवेदनशील व्यवस्था करके डॉ बाबा साहेब अंबेडकर ने सदियों से पीड़ित और वंचित स्त्री समाज के लिए मुक्ति का द्वार खोला। महिलाओं द्वारा इन अधिकारों व लाभों को प्राप्त करने में डॉ अंबेडकर के पुराने प्रयासों का भी प्रस्ताव देखा जा सकता है। डॉ बाबा साहेब अंबेडकर ने जीवन-पर्यन्त भारतीय महिलाओं और विशेषकर गरीब, श्रमिक व दलित वर्ग की महिलाओं के लिए जो कार्य किए और समाज में उनकी उन्नति के लिए जो विचार रखे, उनसे डॉ अंबेडकर के आधुनिक, प्रगतिशील, व्यावहारिक व मानववादी राजनीतिक-सामाजिक दृष्टि का आभास होता है।

डॉ बाबा साहेब चाहते थे कि प्रत्येक भारतीय अपने सामाजिक उत्तरदायित्व को समझे और प्रत्येक भारतीय को इस योग्य बनाने के लिए उपर्युक्त स्थितियाँ व सामाजिक व्यवस्थाएँ बनाई जाएँ। दलित वर्ग व महिलाओं को जागृत करने की आवश्यकता उनको अधिक लगती थी। इसलिए डॉ बाबा साहेब ने सामाजिक विकास व परिवर्तन के लिए इनकी समस्याओं का विशेष अध्ययन कर इनको सामाजिक दृष्टि से संगठित करने का प्रयत्न किया, लेकिन धीरे-धीरे उनको यह भी महसूस हुआ कि जब तक दलित वर्ग को राजनीतिक-सामाजिक रूप से भी संगठित व सक्रिय नहीं किया जाएगा, इन का सामाजिक विकास गति प्राप्त नहीं कर सकेगा। अतएव उनहोंने सामाजिक न्याय की विचारधारा को भारतीय संदर्भ में दलितों की सामाजिक समानता और उन्नति का माध्यम बनाने का प्रयास आरम्भ कर दिया। दलितों व महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता व सामर्थ्य भी उनकी सामाजिक अस्मिता को पुष्ट करने का एक माध्यम हैं। डॉ बाबा साहेब अंबेडकर भारतीय सामाजिक व पारिवारिक व्यवस्थाओं व परम्पराओं में सुधार कर हर व्यक्ति, विशेषकर दलितों व महिलाओं को समाज में प्रतिष्ठा व समता का स्थान देकर एक ऐसी व्यवस्था कायम करना चाहते थे जो पश्चिमी देशों का मात्र अंधानुकरण या नकल न हो।

स्त्री मुक्तिदाता डॉ बाबा साहेब अंबेडकर भारतीय संविधान के माध्यम से अपने समतमूलक विचारों को कानून का हिस्सा बनाने में सफल हुए। वे स्त्री और दलित ही नहीं मानव की अस्मिता, गरिमा और उसकी स्वतंत्रा के लिए आजीवन संघर्षत रहे। संविधान के अनुच्छेद १४, १५ व १६ में उन्होने अथक परिश्रम द्वारा महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार दिलाया। एक लोकतांत्रिक संविधान का निर्माण उनकी विश्वदृष्टि का परिचायक है, जो स्त्रियों के लिए वरदान सिद्ध हुआ। आज भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों के कारण स्त्रियाँ स्वावलंबी बन रही हैं, उनकी सोच में विस्तार हो रहा है। तभी तो आज का नारी विमर्श दहेज, बलात्कार, महंगाई, सांप्रदायिकता, सरकारी जन विरोधी नीति, सबको शिक्षा, भूखों को भोजन, पर्यावरण संरक्षा आदि मानवीय मूल्यों को अपने संघर्ष का मुद्दा बना रही हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि भारतीय संविधान में प्रदत अधिकारों के प्रति स्त्रियाँ और अधिक सचेत हों, धर्म कि रूढ़िवादी स्वरूप को उखाड़ फेंकने के लिए साहस का परिचय दें, तभी भारतीय समाज स्त्री-पुरुष के समंजस्य से निर्मित एक आदर्श राष्ट्र बन पाएगा, और पुरुष वर्ग को भी परंपरागत मानसिकता का त्यागकर समतमूलक समाज की स्थापना में सहयोग करना होगा। इसी में पूरे मानवता का कल्याण निहित है।

निष्कर्ष: डॉ बाबा साहेब अंबेडकर यह मानते थे कि वर्ण व्यवस्था ने केवल दलितों को ही नहीं महिलाओं के सामाजिक व शैक्षणिक विकास को भी अवरुद्ध किया है। बाबा साहेब का विचार था कि महात्मा बुद्ध ने महिलाओं को शिक्षा के क्षेत्र में पुरुषों के समान ही बराबरी का अधिकार देने का प्रयास किया था। बाबा साहेब स्वयं दलित महिलाओं से कहा था कि वे सवर्ण महिलाओं कि तरह स्वच्छता पर विशेष ध्यान दें। अपनी हीन भावना को छोड़ें, शराब पीने वालों पुरुषों का विरोध करें तथा अपनी संतान को शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रेरित करें। डॉ बाबा साहेब अंबेडकर ने मजदूर महिलाओं को पुरुष मजदूरों के समान वेतन देने तथा उनको सवेतन प्रसूति अवकाश देने के सफल प्रयास किए। भारत का नया संविधान बनाते समय भी डॉ बाबा साहेब अंबेडकर तथा कुछ अन्य प्रगतिशील राजनेताओं ने पुरुषों और स्त्रियों को समान अधिकार देने की व्यवस्था का समर्थन किया। स्वतंत्र भारत के कानून मंत्री के रूप में डॉ बाबा साहेब अंबेडकर हिन्दू कोड बिल को संसद में पारित कराकर महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करना चाहते थे। वे समझते थे कि मनु का प्राचीन विधान महिलाओं के प्रति न्याय नहीं करता है। इस प्रकार डॉ बाबा साहेब अंबेडकर का महिलाओं की स्थिति को सुधारने का और महिलाओं को मुक्त करने का दृष्टिकोण मानवीय, समतवादी तथा प्रगतिशील था।

संदर्भ

१) हिन्दी उपन्यासों में दलित-जीवन। डॉ शम्भूनाथ द्विवेदी पृष्ट २०३

२) डॉ अंबेडकर और पं दीनदयाल। प्रीति पांडे पृष्ट २६३

३) वही, पृष्ट २६४

४) अंतरजाल से प्राप्त सूचना।

५) डॉ अंबेडकर और पं दीनदयाल। प्रीति पांडे पृष्ट २६४

६) वही, २६५

७) वही, २६५

८) स्त्री विमर्श: विविध पहलू। संपादक कल्पना वर्मा पृष्ट २३७

९) डॉ अंबेडकर और पं दीनदयाल। प्रीति पांडे पृष्ट २६६

१०) स्त्री विमर्श: विविध पहलू। संपादक कल्पना वर्मा पृष्ट २३८

हिंदी दलित कविता के प्रेरणास्रोत डॉ. बाबा साहब अंबेडकर

डॉ. जी. राजु

अनुसंधान अधिकारी

डॉ. अंबेडकर पीठ

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय विश्वविद्यालय

अमरकंटक, (म.प्र.)


दूरभाष - 09059379268

“जब तक आप सामाजिक स्वतंत्रता हासिल नहीं कर लेते, तब तक आपको कानून चाहे जो भी स्वतंत्रता देता है, वह आपके किसी काम की नहीं होती।” इस कथन से स्पष्ट हो जाता है कि मनुष्य के लिए समाज जितना आवश्यक है सामाजिक स्वतंत्रता भी उतनी ही आवश्यक है । बगैर उसके वह सामाजिक प्राणी नहीं बन पायेगा। विश्व स्तर पर अपने विचारों एवं सिद्धांतों से प्रसिध्दि प्राप्त कर आज सारे विश्व के लिए एक ज्ञान प्रतीक बन चुके हैं डॉ. बाबा साहब अंबेडकर । ऐसे व्यक्तित्व को आज तक भारतीय सामाज ने एक विशेष समाज के प्रतिनिधि के रूप में ही देखा है । लेकिन वास्तव में उनके विचार उनका सिद्धांत और उनका चिंतन सब कुछ संपूर्ण भारतीय समाज के लिए ही रहा । जिसके कारण उन्होंने भारतीय संविधान की रचना की और हिंदू कोड बिल आदि जैसे अनेक कार्य किसी वर्ग विशेष या वर्ण विशेष के लिए ना होकर भारतीय समाज के लिए किये । वे मानते हैं कि- हमारे पास यह आज़ादी इसलिए है ताकि हम उन चीजों को सुधार सकें जो सामाजिक व्यवस्था, असमानता, भेद-भाव और अन्य चीजों से भरी हैं जो हमारे मौलिक अधिकारों की विरोधी हैं।

अंबेडकर भारतीय समाज को एक आदर्श समाज के रूप में देखना चाहते थे । जिसका अर्थ है, स्वाधीनता, समानता और भाईचारे का होना । समाज में विभिन्न लोगों के बीच संपर्क के ऐसे बहुविध और निर्विवाद बिंदु होने चाहिएँ, जहाँ साहचर्य या संगठन के अन्य रूपों से भी संवाद हो सके । दूसरे शब्दों में, समाज के भीतर संपर्क का सर्वत्र प्रसार होना चाहिए । इसी को भाईचारा कहा जाता है और यह प्रजातंत्र का दूसरा नाम है । राष्ट्रवाद तभी औचित्य ग्रहण कर सकता है, जब लोगों के बीच जाति, नस्ल या रंग का अन्तर भुलाकर उसमें सामाजिक भ्रातृत्व को सर्वोच्च स्थान दिया जाये।

अंबेडकर ने इसके विपरीत भारतीय समाज में प्रचलित चातुर्वर्ण्य व्यवस्था को रेखांकित कर उस पर अपनी असहमति व्यक्ति करते हैं – यह चातुर्वर्ण्य सामाजिक संगठन प्रणाली के रूप में अव्यावहारिक, घातक और अत्यंत असफल रहा है । अगर चातुर्वर्ण्य व्यवस्था के आधार पर सिर्फ चार निश्चित वर्गों में बांटा जा सकता है तो यह वैसा ही विभाजन है जैसे कि प्लेटो ने किया था । प्लेटो के अनुसार लोगों को उनकी प्रकृति के अऩुसार तीन भागों में रखा गया था । जैसे श्रमिक, योद्ध या संरक्षक और कानून बनाने वाले या न्याय वर्ग । प्लेटो के इस विभाजन से अंबेडकर का विरोध इसलिए था कि वह मानते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति की अपनी विशिष्टता होती है । वह किसी एक प्रवृत्ति से संबद्ध न होकर कई प्रकार के प्रवृत्तियों से युक्त होता है । अगर उसे किसी एक वर्ग एवं संगठन में बांट कर रखा जाय तो वह बिल्कुल संभव नहीं हो सकता है । इसीलिए वह प्लेटो के इस गणराज्य की कल्पना की तरह भारतीय समाज की चातुर्वर्ण्य व्यवस्था भी असफल और असंभव मानते हैं ।

चातुर्वर्ण्य व्यवस्था के निराकरण के पीछे अंबेडकर के स्पष्ट विचार रहे कि मनुस्मृति पर आधारित यह चातुर्वर्ण्य व्यवस्था ने निचले पायदान पर खडे वर्ण के लिए किसी भी प्रकार की सुविधा या सामाजिक दर्जा और समान अधिकार प्राप्त नहीं कराया । जिसके चलते शूद्र कहे जाने वाले इस वर्ण का जीवन पशु से भी कमतर हो चला था । उन्हें शिक्षा, अधिकार और धन सम्मान जैसे मूलभूत आवश्यकताओं से वंचित कर दिया गया था । जिसके कारण कई वर्षों तक वे गुलाम बने रहे । मनुस्मृति अध्याय 10 श्लोक क्रमांक 129 देखने से पता चलता है कि - किसी भी शूद्र को संपत्ति का संग्रह नहीं करना चाहिए चाहे वह इसके लिए कितना भी समर्थ क्यों न हो, क्योंकि जो शूद्र धन का संग्रह कर लेता है, वह ब्राह्मणों को कष्ट देता है। (मनुस्मृति अध्याय 1 श्लोक 87 से 91 देखें।)

इन्हीं महत्वपूर्ण विचारों से प्रभावित एवं प्रेरित होकर आज दलित साहित्य ने अपनी आवाज बुलंद की । हिंदी दलित कविता अपने सदियों के संताप को व्यक्त ही नहीं कर रही है बल्कि संघर्ष और विद्रोह की चेतना को भी उजागर कर रही है । दलित कविता आनन्द या रसास्वादन की चीज नहीं है । बल्कि कविता के माध्यम से मानवीय पक्षों को उजागर करते हुए मनुष्यता के सरोकारों और मनुष्यता के पक्ष में खड़ा होना है । मनुष्य और प्रकृति, भाषा और संवेदना का गहरा रिश्ता है, जिसे दलित कविता ने अपने सरोकारों के साथ जोड़ा है ।(समकालीन हिंदी दलित कविता का यथार्थवादी पक्ष, शिराजोदिन, दलित साहित्य वार्षिकी, 2016, पृ. 35) आज दलित कविता ने अपने सर्वोत्कृष्ट स्थान पर पहुंच कर अपनी विकास-यात्रा कर रही है । अपनी इस विकास-यात्रा में डॉ. अंबेडकर द्वारा बताए गए मार्ग पर चलना ही नहीं बल्कि उनके विचारों एवं चिंतन व दर्शन को साथ लेकर चल रही है जिसमें वैचारिकता, जीवन-संघर्ष, विद्रोह, आक्रोष, नकार, प्रेम, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक छदम, वर्ण एवं जातिगत विषमता के सवाल, साहित्यिक छल कपट आदि विषयों को लेकर बार-बार सवाल उठाते हुए उसके समाधान ढूंढती है ।

दलित साहित्य के प्रमुख कवि ओमप्रकाश वाल्मीकि जी जो अपनी कविता के माध्यम से तथाकथित समाज के द्वारा दलित समाज के प्रति अपनाये जाने वाले व्यवहार, विषमता और असमानता के विरोध में अपनी आवाज बुलंद करते हुए तीखा एवं आक्रामक भाव व्यक्त करते हैं । सदियों से दलित समाज को दबाये रखने वाले आज उन्हें डर है कि कहीं वे उनके विरोध में खडे न हो जाय । अपनी कविता ‘उन्हें डर है’ में वह कहते हैं कि आज दलित समाज अपने बंधनों को तोडकर अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो रहा है । दलित समाज की इस चेतना से उस समाज के अंदर जो डर बैठा हुआ है उसे कविता के माध्यम से इस तरह व्यक्त करते हैं-

उन्हें डर है

बंजर धरती का सीना चीर कर

अन्न उगा देने वाले साँवले खुरदरे हाथ

उतनी ही दक्षता से जुट जाएँगे

वर्जित क्षेत्र में भी

जहाँ अभी तक लगा था उनके लिए

नो-एंटरी का बोर्ड

फिर भी,

उन्हें डर है

भविष्य के गर्भ से चीख़-चीख़ कर

बाहर आती हज़ारों साल की वीभत्सता

जिसे रचा था उनके पुरखों ने भविष्य निधि की तरह

कहीं उन्हें ही न ले डूबे किसी अंधेरी खाई में

जहाँ से बाहर आने के तमाम रास्ते

स्वयं ही बंद कर आए थे

सुग्रीव की तरह

बाबा साहब अंबेडकर के विचार एवं संघर्ष से दलित समाज को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होने और अपने मंजिल तक पहुंचने की प्रेरणा मिलती है । जिसके कारण वह कभी पीछे हटने की बात नहीं करते हैं । दलित साहित्य के वरिष्ठ आलोचक कंवल भारती द्वारा लिखी गयी कविता मुक्ति संग्रम जारी है के माध्यम से बाबा साहब अंबेडकर को याद करते हैं और कहते हैं कि जब कभी इस मुक्ति संघर्ष में निराश व हताश हो जाते हैं तो बाबा के उस संघर्ष को याद करते हैं जिसकी याद से उन्हें नई ऊर्जा मिलती है । वह लिखते हैं-

मैं उस अतीत को

अपने बहुत क़रीब पाता हूँ

जिसे जिया था तुमने

अपने दृढ-संकल्प और संघर्ष से।

परिवर्तित किया था समय-चक्र को

इस वर्तमान में।

मैं उस अन्धी निशा की

भयानक पीड़ा को / जब भी महसूस करता हूँ

तुम्हारे विचारों के आन्दोलन में

मुखर होता है एक रचनात्मक विप्लव

मेरे रोम-रोम में।

तुम बिलकुल नहीं मरे हो बाबा !

जीवित हो हमारी चेतना में,

हमारे संकल्प में, हमारे संघर्षों में।

समता, सम्मान और स्वाधीनता के लिए

मुक्ति-संग्राम जारी रहेगा / जब तक कि

हमारे मुरझाए पौधे के हिस्से का सूरज

उग नहीं जाता है।

एक ओर संघर्ष और मुक्ति की बात करती दलित कविता दूसरी तरफ गरीबी, लाचारी और आर्थिक विषमता की बात करती है । दमोदर मोरे की मेरा बचपन कविता में इन्हीं वास्तविकताओं को उजागर करते हुए वह अपनी पीढ़ा को व्यक्त करते हैं । गरीबी से त्रस्त होने के बावजूद वह पढ़ने की चाह को दर्शाते हैं । इससे अंबेडकर के शिक्षित होने की संकल्पना भी अभिव्यक्त होती है-

स्कूल जा रहा था

जूता नहीं था पाँव में

फटे लिबास

जल रहा था, भूख की ज्वाला में

जिंदगी ढूंढ रहा था, फटी किताब में

कभी नहीं बरसा बादल बन

किसी की आंखों में...

जिंदगी में चाहे जितने भी अभाव रहे हो या जितने कष्ट सहे हो लेकिन वह बाबा के द्वारा प्रशस्त मार्ग शिक्षित होकर अपने आपको सुधारने की जो ऊर्जा है उसे याद करते हुए हर व्यक्ति का धैर्य बढ़ जाता है । और वह भविष्य की ओर आस रखकर संकल्प बद्ध होने की प्रेरणा ग्रहण करता है । कवि सी.बी. भारती अपनी कविता चुनौती में कहते हैं कि तुमने हम पर चाहे जितने जुल्म किये थे लेकिन एक दिन ऐसा आयेगा जब उन दीवारों को तोड़कर एक नयी राह बनायेंगे जिसमें हम भी होंगे शामिल तुम भी...

तुमने चुरा लिये

हमारे विकास के रास्ते

शिक्षा पर लगा दिये प्रतिबन्ध

आखर पर आज रख दी है तुमने

हमारी भागीदारी के लिए

योग्यता की शर्त

पर कब तक फेंकोगे तुम

अपना यह मकड़जाल हम पर?

घबराओ नहीं

समय आ रहा है

जब हम भी बढ़ेंगे तुमसे

दौड़ने की शर्त

जीतेंगे बाज़ी

तोड़ेंगे तुम्हारा दर्प

सुनो परिवर्तन की सुगबुगाहट

बदलती हवा का रुख़

पहचानो पहचानो पहचानो!

दलित कविता सामान्य जीवन की बात नहीं करती बल्कि संघर्षमय जीवन की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा देती है । वह मसझौते से जीने को जिंदगी का लक्ष्य नहीं बल्कि निर्जीव और जड़ होने का प्रतीक मानती है । कवि जयप्रकाश कर्दम अपनी कविता जिंदगी में कहते हैं-

बन्द कमरों की

सीलन के भीतर

क्रोध के कोरस का नाम

ज़िन्दगी नहीं होता।