वर्ष 4, अंक 45-46. जनवरी-फरवरी 2019 (सयुंक्त अंक)





परामर्श मंडल

डॉ. सुधा ओम ढींगरा (अमेरिका),प्रो. सरन घई (कनाडा), प्रो. अनिल जनविजय (रूस), प्रो. राज हीरामन (मॉरीशस), प्रो. उदयनारायण सिंह (कोलकाता), स्व. प्रो. ओमकार कौल (दिल्ली), प्रो. चौथीराम यादव (उत्तर प्रदेश), डॉ. हरीश नवल (दिल्ली), डॉ. हरीश अरोड़ा (दिल्ली), डॉ. रमा (दिल्ली), डॉ. प्रेम जन्मेजय (दिल्ली), प्रो.जवरीमल पारख (दिल्ली), पंकज चतुर्वेदी (मध्य प्रदेश), प्रो. रामशरण जोशी (दिल्ली),डॉ. दुर्गा प्रसाद अग्रवाल (राजस्थान), पलाश बिस्वास (कोलकाता), डॉ. कैलाश कुमार मिश्रा (दिल्ली), प्रो. शैलेन्द्र कुमार शर्मा (उज्जैन), ओम पारिक (कोलकाता), प्रो. विजय कौल (जम्मू ), प्रो. महेश आनंद (दिल्ली), निसार अली (छत्तीसगढ़),

संपादक

कुमार गौरव मिश्रा

सह-संपादक

जैनेन्द्र (दिल्ली), कविता सिंह चौहान (मध्य प्रदेश)

कला संपादक

विभा परमार

संपादन मंडल

प्रो. कपिल कुमार (दिल्ली), डॉ. नामदेव (दिल्ली), डॉ. पुनीत बिसारिया (उत्तर प्रदेश), डॉ. जितेंद्र श्रीवास्तव (दिल्ली), डॉ. प्रज्ञा (दिल्ली), डॉ. रूपा सिंह (राजस्थान), स्व. तेजिंदर गगन (रायपुर), विमलेश त्रिपाठी (कोलकाता), शंकर नाथ तिवारी (त्रिपुरा), बी.एस. मिरगे (महाराष्ट्र), वीणा भाटिया (दिल्ली), वैभव सिंह (दिल्ली), रचना सिंह (दिल्ली), शैलेन्द्र कुमार शुक्ला (उत्तर प्रदेश), संजय शेफर्ड (दिल्ली), दानी कर्माकार (कोलकाता), राकेश कुमार (दिल्ली), ज्ञान प्रकाश (दिल्ली), प्रदीप त्रिपाठी (महाराष्ट्र), उमेश चंद्र सिरवारी (उत्तर प्रदेश), चन्दन कुमार (गोवा)

सहयोगी

गीता पंडित (दिल्ली)

निलय उपाध्याय (मुंबई, महाराष्ट्र)

मुन्ना कुमार पाण्डेय (दिल्ली)

अविचल गौतम (वर्धा, महाराष्ट्र)

महेंद्र प्रजापति (उत्तर प्रदेश)

विदेश प्रतिनिधि

डॉ. अनीता कपूर (कैलिफोर्निया)

डॉ. शिप्रा शिल्पी (जर्मनी)

राकेश माथुर (लन्दन)

मीना चौपड़ा (टोरंटो, कैनेडा)

पूजा अनिल (स्पेन)

अरुण प्रकाश मिश्र (स्लोवेनिया)

ओल्या गपोनवा (रशिया)

सोहन राही (यूनाइटेड किंगडम)

पूर्णिमा वर्मन (यूएई)

डॉ. गंगा प्रसाद 'गुणशेखर' (चीन)

Ridma Nishadinee Lansakara, University of Colombo, Sri Lanka

सोनिया तनेजा, हिन्दी प्राध्यापिका, स्टैंफ़र्ड विश्वविद्यालय, (कैलिफोर्निया)

डॉ. इन्दु चौहान, संयोजक, हिन्दी स्टडि प्रोग्राम, यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ पेसिफिक, (फ़िजी )

Ekaterina Kostina, Saint Petersburg University

Anna Chelnokova, Saint Petersburg University

संपादन मण्डल

जनकृति

(बहुभाषी अंतरराष्ट्रीय मासिक पत्रिका)

संपर्क

डॉ. कुमार गौरव मिश्रा, 4-a, बागेश्वरी अपार्टमेट, आर्यापुरी,

रातू रोड़, रांची, झारखंड, भारत

8805408656

वेबसाई-www.jankriti.org

ईमेल- jankritipatrika@gmail.com

वर्तमान अंक रेखाचित्र: डॉ. लाल रत्नाकर

संपादक की कलम से....


‘यह दुनियाँ अगर मिल भी जाए तो क्या है’ साहिर लुधियानवी की यह पंक्ति जब भी जहन में आती है तो वर्तमान समय का नग्न यथार्थ आँखों के समक्ष उभर आता है। हमारा समय स्वयं पर केन्द्रित होते मनुष्य का समय है और इसने मानवीय संवेदना को अत्यधिक प्रभावित किया है। आज सम्पूर्ण विश्व में मनुष्य और मनुष्य के बीच एक गहरी खाई है। एक ओर जहां विश्व की अधिकतम संपत्ति लिए अमीर लोग हैं तो वहीं दूसरी और अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करते लोग है, जिनके पास जीवन जीने मात्र की भी मूलभूत सुविधाएं नहीं। आज प्रत्येक व्यक्ति स्वयं पर केन्द्रित है और इस व्यक्ति केन्द्रित सोच ने समाज को पूर्ण रूप से विभाजित किया है। मशीनों का निर्माण करते-करते हम मशीनों में तब्दील हो गए हैं। हम निरंतर कुछ न कुछ निर्मित करते जा रहे हैं परंतु यह निर्माण पूरी दुनियाँ को एक विध्वंस की ओर ले जा रहा है। हम सभी अपने भीतर एक लाश ढो रहे हैं, जो इंसानियत की है। आज स्वयं के अस्तित्व को बचाए रखने के लिए मनुष्य मानव बम बनने को तैयार है। मनुष्य को ऐसी तालीम दी जा रही कि उसने मानवता को सबसे नीचले पायदान पर रख दिया है।

हम आज संकट के उस दौर से गुजर रहे हैं, जहां मनुष्य के भीतर मनुष्य तलाशना पड़ रहा है। सभी के कंधे पर एक लाश है और वह स्वयं उसी की है। हम चिंतित जरूर है अपने आने वाले कल को लेकर पर हमने आने वाले पीढ़ियों के सुनहरे भविष्य हेतु कुछ नहीं किया। इसके विपरीत हमने आने वाली दुनियाँ को ऐसा भविष्य दिया जिसका जिस्म लहूलुहान है। आने वाली पीढ़ियों को हम तौहफे में ऐसी दुनियाँ दे रहे हैं, जो बारूद के ढेर पर है, इंसानियत की कब्र पर है।

मानवीय सभ्यता के अंत की घोषणा हमारे क्रियाकलापों से स्वतः हो चुकी है। धरती पर जितनी भी इष्ट इकाइयों का निर्माण मानवता की बेहतरी के लिए किया गया अब उसी के नाम पर मानवता की निरंतर हत्या हो रही है। हम इससे अनभिज्ञ है ऐसा नहीं है। अंत को समीप देखकर हम चिंतित भी हो रहे हैं परंतु अंत के प्रमुख कारकों को जीवित भी रखे हैं।

यदि हम स्वर्णिम भविष्य की कल्पना कर रहे हैं तो सर्वप्रथम सामाजिक होना आवश्यक है। सामूहिकता में चिंतन की आवश्यकता है। पुनः इतिहास के पन्नों को पलटने की आवश्यकता है। हमें उन सभी कारकों को तत्काल समाप्त करने की आवश्यकता है, जो मानवता के दुश्मन है। निश्चय ही सही दिशा में सामूहिक प्रयास एक मजबूत भविष्य की नीव रख सकता है बस विश्व में सभी को एक साथ आगे कदम बढ़ाने की आवश्यकता है।

-कुमार गौरव मिश्रा

इस अंक में ....

साहित्य-विमर्श/

Literature Discourse


शोध आलेख एवं लेख


पृष्ठ संख्या

कविता


अमृता सिन्हा, ओमप्रकाश, नरेन्द्र वाल्मीकि, ओम प्रकाश अत्रि, सारिका भूषण, राजेन्द्र वर्मा, रमन भारतीय,


7-19

नवगीत


सलिल सरोज


19

गज़ल


कैलाश मनहर, राघवेन्द्र पाण्डेय


19-21

कहानी


रोजगार: शंकर लाल माहेश्वरी


22-24


एक अदद कमरे की तलाश: तेजस पूनिया


25-29

लघुकथा


मृत्युभोज: मुकेश कुमार ऋषि वर्मा


30

व्यंग्य


साहित्य की खटपट!: पूरन सरमा


31-33


पप्पू - गप्पू ने पछाड़ दिया संता - बंता को: अवधेश कुमार 'अवध'


33-34

यात्रा वृंतात


शिलोंग (मेघालय): गुलाबचंद एन. पटेल


35-36

रिपोर्ताज


देश की त्रासद कथा का बयान : ऋणजल धनजल- डॉ. धर्मेन्द्र प्रताप सिंह


37-40

पर्यटन


अरुणाचल प्रदेश के पर्यटन स्थल: वीरेन्द्र परमार


41-48

पत्र


प्यारी बिटियाँ के नाम मेरा पत्र: सुरेश चंद्र


49-50

जीवनी


हिन्दी लेखक निर्मलवर्मा : व्यक्ति एवं रचना- आचार्य. एस.वी.एस.एस.नारायण राजू


51-57

किस्से कलम के


ग़ज़ल की दुनिया का मुकम्मल शेर है अज़ीज़ अंसारी -डॉ अर्पण जैन 'अविचल'


58

पुस्तक समीक्षा


नियति का महाभारत- समीक्षक : एम एम चन्द्रा


59


एक नयी दुनिया के सपनो का नाम प्रोस्तोर- समीक्षक: वंदना गुप्ता


60-62

लेख


वर्तमान परिपेक्ष्य में साहित्यकार का सृजनात्मक उत्तरदायित्व: शंकर लाल माहेश्वरी


63-67

रोशनदान


बिखरते परिवार और सांस्कृतिक मूल्यों का हनन: नमिता दुबे


68-69

विश्व साहित्य


दोन किख़ोते: विश्व साहित्य का एक धरोहर- सुभाष यादव


70-80

मीडिया- विमर्श/ Media Discourse


शोध आलेख एवं लेख


पृष्ठ संख्या


हिंदी साहित्य में दैनिक समाचार पत्रों की उपादेयता एवं प्रासंगिकता: एक विवरण- कृष्ण वीर सिंह सिकरवार [आलेख]


81-87

कला- विमर्श/ Art Discourse


शोध आलेख एवं लेख


पृष्ठ संख्या


मनोरंजन के रूप में बहुरूपिया लोक कला की भूमिका का अध्ययन: अनुज [आलेख]


88-93


मराठी रंगमंच का पूर्वार्ध; स्त्रियॉं के सर्जनात्मक प्रतिरोध के विशेष संदर्भ में: डॉ. सतीश पावड़े [आलेख]


94-98

दलित एवं आदिवासी- विमर्श/ Dalit and Tribal Discourse


शोध आलेख एवं लेख


पृष्ठ संख्या


परंपरागत हिंदी काव्य में चित्रित दलित समाज और जीवन : डॉ. चैनसिंह मीना [शोध आलेख]


99-107


“आदिवासी विमर्श में समकालीन यात्रा साहित्य का अवदान”

“आदिवासी लोक की यात्राएँ” के संदर्भ में: हेमंत कुमार

[शोध आलेख]


108-113

बाल- विमर्श/ Child Discourse


शोध आलेख एवं लेख


पृष्ठ संख्या


बाजारवाद, विज्ञापन और बचपन: डॉ. प्रीति अग्रवाल[शोध आलेख]


114-118


बच्चों को जिद्दी नही व्यवहारिक बनाएं: गौरव मौर्या [आलेख]


119-120

भाषिक- विमर्श/ Language Discourse


शोध आलेख एवं लेख


पृष्ठ संख्या


बाजारवाद, विज्ञापन और बचपन: डॉ. प्रीति अग्रवाल[शोध आलेख]


114-118


बच्चों को जिद्दी नही व्यवहारिक बनाएं: गौरव मौर्या [आलेख]


119-120

भाषिक- विमर्श/ Language Discourse


शोध आलेख एवं लेख


पृष्ठ संख्या


खड़ी बोली का आविर्भाव एवं विकास: जसपाली चौहान [आलेख]


121-125

समकालीन विषय / Contemporary Topic


शोध आलेख एवं लेख


पृष्ठ संख्या


ये मुख्यधारा है या दबदबे की साजिश: आलोक कुमार मिश्रा


126-129


मनरेगा द्वारा महिला सशक्तिकरण: तथ्यात्मक सच्चाई या कोरी बयानबाजी- अम्बिकेश कुमार त्रिपाठी [शोध आलेख]


130-135

शोध आलेख/ Research Article


विषय


पृष्ठ संख्या


गोदान के वातायन से किसान जीवन की त्रासदी का अंकन: सूर्य प्रकाश


136- 140


धार्मिक प्रतिरोध को अभिव्यक्त करता शिवमूर्ति का उपन्यास ‘त्रिशूल’: पूजा मदान


141-145


वैपुल्यसूत्रराज सद्धर्मपुण्डरीक की सामाजिक उपादेयता: दिलीप कुमार


146-149


दिलो दानिशउपन्यास में सामंती परिवेश और स्त्री की स्थिति: कल्पना सिंह राठौड़


150-154


मत्स्यगंधा’ (असमिया उपन्यास) की प्रासंगिकता और सरोकार: बर्नाली नाथ


155-159


हिंदी कविता का विकास और निराला की कविताएँ: योगेश कुमार मिश्र


160-164


आजादी के बाद की हिन्दी कविता के स्वर: डॉ. हर्षबाला शर्मा


165-172

अनुवाद/ Translation


शोध आलेख एवं लेख


पृष्ठ संख्या


अनुवादक बनने की चुनौतियाँ: धर्मराज कुमार


173-177


असंगतवाद : सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक समस्याओं का दर्पण

(विशेष संदर्भ : काफ़्का, बैकेट एवं भुवनेश्वर): शावेज़ ख़ान


178-182

प्रवासी साहित्य


शोध आलेख एवं लेख


पृष्ठ संख्या


तेजेन्द्र शर्मा की कहानियों का विशिष्ट एवं नवीन अनुभव संसार: अभिनव कुमार


173-177


प्रवासी साहित्यकार उषा प्रियंवदा कृत ‘नदी’ उपन्यास : प्रवासी स्त्री जीवन का संत्रास सपना दास


187-197

आगामी अंक की सूचना एवं पत्रिका नियमावली


198

अमृता सिन्हा की कविताएँ

1. जन्माष्टमी

सितम्बर भाग रहा है,

इसकी रफ्तार से क़दमताल करते हुए

कुछ ज़रूरी साज़ोसामान लिए

मैं भी यात्रा की ओर चल पड़ी हूँ

यायावरी में मश्गूल

यात्रा में हूँ

हम सब यात्रा में हैं

भागती ट्रेन कितना कुछ,

पीछे

छोड़ती जा रही है।

कहीं ऊँचे-ऊँचे दरख़्त,

हरे भरे खेत,

कुछ बंजर ज़मीन।

खिड़की के बाहर

घुप्प अंधेरा है

पूरा कंपार्टमेंट भी ख़ाली ख़ाली है,

लोग घरों में भगवान की पूजा में रमे

कृष्णाष्टमी, मना रहे हैं आज

शायद, तभी सन्नाटा पसरा है,

वरना भीड़ का ओर-छोर न होता

यहाँ भी,

सभी अपने-आप में व्यस्त हैं

ज़ाहिर तौर पर सब अपने-अपने

मोबाइल से मुख़ातिब हैं, पर

कुछ तो इस क़दर उलझे कि

अपने नन्हें बच्चे तक की सुध नहीं

तभी एक मासूम सा

नन्हा बच्चा भटका हुआ

शायद अपनी माँ को ढूँढता

कान्हा सा प्यारा

मेरे पायताने के पास खड़ा हो जाता है

मुझे छूने की कोशिश करता है

मैं उसे देखती हूँ एकटक

शायद भूले से इधर आ गया है

मुझे सामने देख

शायद रोने लगे

पर, मेरी आशा के विपरीत

वह पहले तो मुस्कुराया,

पर अब,बच्चा हँस रहा था

लगातार, ज़ोरों से हँस रहा था

मैं भी हँसने लग पड़ी हूँ साथ उसके

उस मासूम की अप्रत्याशित सी हँसी

और उसकी मासूमियत

कण -कण, घुलती जा रही है

वातावरण में,

इसमें थोड़ी सी घुलकर मैं भी

हल्का कर लेती हूँ मन अपना,

वह हँसता है ....और खिलखिलाकर हँसता ही जाता है

उसे हँसने से रोकना नहीं है

उसकी मासूम हँसी की हमें

सख्त ज़रूरत है

ऐसे संजीदा

तनाव से त्रस्त माहौल में

उस बच्चे की हसीन हँसी

जीवन की

सूखी बंजर ज़मीन को नर्म बनाती है

हमारी धरती बची रहे

इसके लिए इन मासूमों का

लगातार हँसते जाना

उनकी हँसी का बचा रहना,

ईश्वर की नेमत है

क्योंकि

हमें बहुत ज़रूरत है

इन बेलौस, बेसाख्ता हँसी की।

2). व्यतीत

नदियाँ लिखती हैं इतिहास

गवाही देते

अनथक

खंभों की

खंभे नापते हैं

गहराई

सभ्यता की,

और ख़ामोशी से

थामे रहते हैं, बन कर प्रहरी

उठाते हुए

सदी का बोझ

समेट लेते हैं ये

क़िस्से अनगिनत

तोता मैना की कहानी से लेकर

सोहणी महिवाल तक

पानी पर लिखी ये तहरीरें

मुखर होती हैं बहुत

कहती हैं बहुत सी बातें

उगलती हैं ढेरों राज़

पर ज़रूरी नहीं कि

सारे राज़ खोले जाएँ

जाने कितने वर्षों से बंद पड़े

संदूकों में हैं अनगिन गुप्त बातें

जो फेंके गए थे कई वर्षों पहले

नदियों के ठीक बीचों-बीच

कुछ विचलित आत्माएँ

दफ़्न है इनकी गहराई में

प्यासी अतृप्त

शायद तभी आज भी तैरती हैं

कुछ भटकती आत्माएँ

चाँदनी रात की धवल रौशनी में

आज भी सुनाई देती है

डूबती सी आवाज़

कोई कातर पुकार

अमावस की घोर रात में।

3. अपराध

उसके तेज़ दौड़ने,

निरंतर भागने का

कोई हश्र न निकला,

भीड़ ने उसे

अपराधी ठहरा ही दिया।

वह अवाक़् विस्मित

अपने अपराधों से अनभिज्ञ

अपनी तरफ़ फेंके गए

हर पत्थर का अकेला गवाह

टटोलता रहा भीड़ को विस्फारित नेत्रों से

ढूंढता रहा किसी एक शख़्स को

जो कर पाए सच्चाई की शिनाख्त

पर यहाँ तो ठहरा भीड़ का अंधा इंसाफ़

यथार्थ के धरातल पर बसते

अंधे बहरे लोग

भेड़चाल में शामिल

ये बस्ती है हैवानों की

पत्थर फेंकने वालों को

पत्थरों को झेलना भी पड़े

कुछ ऐसा भी हो इंसाफ़

ईश्वर भी शायद चिरनिद्रा में है लीन

प्रार्थना में हाथ जोड़े खड़ा है वह

गिड़गिड़ाता हुआ,

क्योंकि उसका सबसे बड़ा

हथियार यही है,

उसकी आँखें चौंधिया रही हैं,

भीड़ को भलमनसाहत से

झेलना कोरी कल्पना थी उसकी

अब अनायास ही भीड़ से घिर कर

गश खाकर गिर पड़ना

नियति है उसकी,

सच है

यथार्थ कल्पना से

अधिक भयावह होता है

भीड़ से घिरना

घिर कर मर जाना

उससे भी ज़ियादह भयावह।

4. बचा रहना सपनों का

नियामत होती है कुछ परतें,

परतों में छुपे कई भेद

कुछ तिलिस्म भी,

जो बने रहते हैं

अवांछित, अनमने

हमारे इर्द - गिर्द

इन परतों के बीच

होती है कई फाँकें

सपनों के साथ रची- बसी

इनकी जिजीविषा ही

बचाए रखती है इनके

सपनों की मादक गंध

अक्सर, सोये पड़े होते हैं

असंख्य तारे इन तहों में

सुगबुगाते, कसमसाते

मुट्ठी भर हवा की शह पाते ही

टिमटिमाने लगते हैं जुगनुओं की तरह

नहीं छोड़ते ये पनपना

टुकड़े- टुकड़े सपनों को जोड़ना

शैवाल की तरह फैलना

दरो- दीवार पर,

जमे रहना हरी काई सा

जीते हैं चीथड़ों के बीच

किसी पहुरूवे की प्रतीक्षा में

किसी मसीहा के इंतज़ार में

जो दिला सके जीवन

युगों से दम

तोड़ते सपनों को

मुक्त कर सके

चट्टानों के भीतर दबे पड़े

जीवाश्म को।

5. खान में मज़दूर

झोड़ी, गैता, हेलमेट

लाइट, गमबूट

दीनू का जीवन इन्हीं

चीज़ों के इर्द - गिर्द घूमता,

घूमता समय का चक्र

किसी पहिए सा

तड़के सुबह हो या

रात पल्ला

ज़रा चुटकी भर मनपसंद मसाला

तलहथी पर रख अँगूठे से

माँजते हुए, ताली मारता दो- चार,

मुँह खोल जीभ के भीतर रख, मुस्कुराते हुए

आगे बढ़ जाता

ज़ोर ज़ोर से बोलते हुए

साब को सलाम ठोकते- ठोकते


बढ़ जाता है खान की ओर।

मोबाइल : 9334017284, ई मेल- a.sinhamaxlife@gmail.com

पता : एफ-42, सेक्टर - 2, सृष्टि कॉम्पलेक्स, मीरा रोड, मुम्बई, पिन - 401107

ओमप्रकाश [नरेन्द्र वाल्मीकि की कविता]

30 जून 1950 को

मुज़फ्फरनगर के गाँव बरला में

पैदा होते ही बन गया था

मैं एक विशेष वर्ग का बालक

लग गया था ठप्पा मुझपे चुहड़े और चमार का।

पढ़ने भेजा गया मुझे भी स्कूल

यहीं की थी मेरे पिता छोटन ने

व्यवस्था के खिलाफ एक भूल

जब तुमने मेरी इच्छाओं को दबाया था

हेड मास्टर साहब।

मैंने भी कर लिया था प्रण तभी से ये कि

मैं दिखलाऊंगा तुम्हें

तुमसे बड़ा बन कर।

मेरी माँ ने जूठन को ठुकराकर

दिया था मुझे वो साहस

जिसे मैं बन पाया

बालक मुंशी से ओमप्रकाश।

मैंने जैसा जीवन जिया उकेरा उसे

शब्दों में 'जूठन' के रूप में

होकर अनुवादित नौ से ज्यादा

देशी व विदेशी भाषाओं में

'जूठन' ने फैलाया समूचे विश्व में

दलित साहित्य का प्रकाश

मैं हूँ सफाई कर्मचारियों की समस्याओं

पर 'सफाई देवता' लिखने वाला ओमप्रकाश।

आज मेरी रचनाओं ने खींच दी हैं

उनके सामने एक बड़ी लकीर।

पढ़ते है उनके बच्चे भी

उनके पुरखों के द्वारा किये गए

अमानवीय व्यवहार की कहानियां

मेरी किताबों में,

विश्विद्यालय के पाठ्यक्रम में

होने को परीक्षा में अच्छे अंको से पास

मैं हूँ दलित साहित्य का महानायक ओमप्रकाश।

'बस्स ! बहुत हो चुका', 'अब और नही'

सहेंगे हम 'सदियों का सन्ताप'

मेरी रचना 'ठाकुर का कुँआ' ने कर दिया

भारतीय ग्रामीण व्यवस्था का पर्दाफाश

मैं हूँ 'घुसपैठिये' और 'दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र'

रचने वाला ओमप्रकाश।

मेरी देह 17 नवम्बर 2013 को

छोड़कर चली गयी यह संसार

मगर मेरे बच्चे 'नरेन्द्र'

तुम व्यर्थ मत जाने देना

मेरा साहित्य रूपी भंडार

जाओ घर-घर फैलाओ इस साहित्य रूपी ज्ञानपुंज को

बदलो उनके जीवन को जो जी रहे हैं,

जीवन अभी तक बेकार

एक बार यदि बाबा के विचारों को पढ़ गये वे लोग

तो कोई भी कुरीति न फ़टकेगी उनके पास

मैं हूँ दलितों में ऊर्जा भरने वाला ओमप्रकाश।

कितनी भी कर लो तुम कोशिशें

ऐ मनुवादियों

हटा दो मेरी भावनाओं को शिक्षालयों से

कभी न कर पाओगे तुम मेरे विचारों की लाश

मेरी साहित्यिक जाग्रति ने पैदा कर दिए है

असंख्य ओमप्रकाश।

युवा कवि

नरेन्द्र वाल्मीकि

पीएचडी शोध छात्र

मो.न. - 9720866612

ओम प्रकाश अत्रि की कविताएँ

मेहनतकश

मेहनतकश हूं मजबूर नही, पेशा है मेरा मेहनत करना पर, मुफ़्त मे करना मंजूर नहीं।

मेहनत की खाता हूं मैं है इसमें कोई देन नहीं, गली-सड़क और गटर व नाली, इसको भी चमकाता हूं मैं, मुझको है इसमें शर्म नहीं।

दाम के बदले श्रम को बेचता पर अपना कभी ईमान नहीं, मिट्टी को स्वर्ण बनाता हूं मै, भवनों से गिर मर जाता हूं मैं सुनता है कोई हाल नहीं।

काम करा के आँख दिखाकर जब कोई हमको धमकाता है, अन्तर- मन तब कहने लगता क्यों, तेरे भीतर क्रान्ति नहीं।

…………………..

किसान

स्वयं को दे देता है खेती के लिए, सीना चीर देता है धरती का, फसल को उगने के लिए।

सींचता है लहू से जमीं को, जिलाने के लिए खाद बनकर मिट जाता है, वो भी फसल के लिए।

दांव पर सब कुछ लगा देता है, फसल के लिए फिर भी कुछ नहीं पाता जीने के लिए।.....

श्रमिक का दर्द

अब तो हम मजदूर और किसान की ज़बान लिखूंगा, उनके बहते हुए पसीने की कीमत लिखूंगा। सुबह उठने से लेकर शाम तक मरने, मर कर जीने की भाषा लिखूंगा। भूंख से रिरियाते हुए उनके बच्चे, एक साबून को तरसती हुई उनकी बीबियों की गाथा लिखूंगा। तसला ढोते हुए मजदूर, खून से फसल को सींचते हुए किसान चूल्हे के सामने अनाज की ताक में बैठी हुई स्त्री, कटोरों को ठनकाते हुए बच्चे, उनके पेट मे भूंख से हो रहे दर्द की कराह लिखूंगा।.... ओम प्रकाश अत्रि, विश्व भारती शान्तिनिकेतन (प.बंगाल ) मोबाइल न.-9451692485

सारिका भूषण की कविताएं

प्रेम और नदी

मैंने सुना है

प्रेम को बांध कर

नहीं रख सकते

ठीक वैसे ही

जैसे

बहती नदी को

बांधना खतरे मोल लेना है

दोनों के वेग, उफान

सीमाओं से परे हैं

इसलिए तो

न विवाह का बंधन

बांध पाया है बहते प्रेम को

और न ही कोई बांध

रोक सकी है

पहाड़ों से निकलती

हरियाली फैलाती

नदियों को।

ये कहाँ खो गए हम !

कैसी यह चकाचौंध है

कैसा यह छलावा

माया की यह नगरी है

मतलबी रिश्तों का बढ़ावा

अपने तड़प रहे थे रास्ते पर

पर कोई पहचान न पाया

खून के छीटें थे कपड़ों पर

सबने अपना दामन बचाया

नहीं था पछतावा

किसी चेहरे पर

और न ही था

किसी के मरने का ग़म

जिस मिट्टी से जुड़े हैं

उसी में मिलना है हरदम

थोड़ी तो लाज रखे

कुछ तो करें इस जनम

या खुदा ! तेरी बनायी दुनिया

फिर क्यों सहे इतने सितम

क्यों रोता है दिल बार - बार सोच

ये कहाँ खो गए हम !!

बचाओ बचपन

-

सिसकता हुआ मन

झुलसता हुआ तन

तोतली तोतली बोलियों में

चीख - चीख कर पुकार रहा

आज बचा लो मेरा बचपन !

जूते बर्तनों की राख में

ईंट की भट्टी की आग में

लुहार के हथौड़ों की चोट में

बेबसी, गरीबी की ओट में

आज खोता जा रहा सारा बचपन !

गरीबी की बोझ तले

उम्मीदों की आस में आशीष जले

दो रोटियों की आड़ में

फैली हथेलियों पर जुगाड़ में

आज दबता जा रहा सारा बचपन !

कब कैसे फ़रिश्ते करेंगे पहल

मानवता का दिल,अब तो जा दहल

छोटा ही सही, सपनों से हो महल

और उन्मुक्त पंछियों से गाते चहकते

अब खुल कर जिए सारे अपना बचपन !

जमाना बदल गया है

प्रेम की खुशबू से भींगी

वो प्यारी चिट्ठियां

पन्नों के बीच इठलाती

वो सूखे गुलाब व पत्तियां

तुम्हारे दामन की महक

और मीठी - मीठी बतियां

कहाँ गयीं वो यादें

जो गुदगुदाती थी सारी रतियां

अब तो

न नज़रें मिलती हैं

न नखरे दिखते हैं

हाथों में मोबाइल रहते हैं

चेहरे प्रोफाइल में दिखते हैं

क्योंकि

जमाना बदल गया है !

अब तो

दादी भी चैट करती है

गीता भी गूगल से पढ़ती है

यूट्यूब पर भजन अपलोड करती है

गुस्साने पर सबको डिसलाइक करती है

क्योंकि

जमाना बदल गया है !!

पता - C / 258, रोड - 1C

अशोक नगर, रांची - 834002, झारखंड


मोबाइल - 8709310230, 9334717449

राजेन्द्र वर्मा की कविताएँ

।।एक।।

पत्ते

उगे कोपल नयी फिर डार पर

कुहुक उट्ठे पिकी फिर डार पर

धरा पर आ सके फिर से वसन्त,

कि पत्ते टूट गिरते हैं।

बहुत मुश्किल-

पुराने पात को बस टूटते देखो,

बहुत मुश्किल-

किसी अपने को’ भी निर्मोह से देखो।

पुराने पात यों ही टूटकर बस,

गिर नहीं पड़ते,

लचकते हैं, दरकते हैं,

वे गिरते-फड़फड़ाते हैं,

मगर गिरकर नहीं गिरते !

किया करते हैं वे तय

कुछ-न-कुछ दूरी

मगर ज़ाहिर नहीं करते

तनिक भी अपनी मजबूरी।

वे पैरों के तले पड़ कर

नहीं चुपचाप रह जाते

बहुत कुछ अनकहा भाषा में अपनी

किन्तु कह जाते !

ये पत्ते हैं जो जीते हैं

भरा-पूरा समूचा एक जीवन,

भले वे डार से लगकर रहें

या, डार से बिछुरे !

।। दो।।

बच्चे

अभी-अभी चिड़िया के बच्चे

दाने चुगकर घर आये हैं।

अभी-अभी चिडि़या भी आयी,

पूछ रही, ‘दिन कैसा बीता?’

बच्चे माँ को बतलाते हैं,

‘यहीं पास में एक खेत है

यूँ तो खेत पड़ा था खाली,

पर, दाने कुछ पड़े हुए थे।

खेत का मालिक न था,

बस, चार बच्चे थे इकट्ठे!

बीनते जाते थे दाना

खेल भी वे खेलते थे

लुका-छिपी का,

पर न छुपने की जगह थी,

जैसे-तैसे छुप जाते थे,

नन्हीं-नन्हीं हथेलियों से

आँखों को बस, ढक लेते थे;

पल में चोर पकड़ लेते थे,

खिल-खिल-खिल-खिल

हँस पड़ते थे।

हमें देखकर चौंक गये वे

लगे पकड़ने हमको मिलकर

लेकिन हमको पकड़ न पाये

रहे दौड़ते इधर-उधर से !

कभी इधर हम, कभी उधर हम,

कभी उड़ककर, कभी फुदककर!

फिर दानों से हमें लुभाया,

अपनी बातों से फुसलाया;

लेकिन हम भी सावधान थे—

व्यर्थ कर दिये उनके झाँसे,

लेकिन वे भोले बच्चे थे,

पलक झपकते हुए रुआँसे।

फिर हमने मिलकर यह सोचा—

इनके मन में प्रेम भरा है

और प्रेम भी खरा-खरा है,

फिर क्यों इनसे दूरी रक्खें?

क्योंकर भोलेपन को परखें?

हमें तुम्हारी याद आयी माँ!

फिर हम सबने हिम्मत बाँधी

अपने-अपने पंख फुलाये,

उनकी नन्हीं हथेलियों से

धीरे-धीरे उन्हें छुआये।

अपने पास हमें पाया तो,

मस्ती में वे झूम उठे थे,

हम पर दाने सभी लुटाये,

जो उन सब ने बीन रखे थे।

तभी खेत का मालिक आया,

हमें देखकर वह झल्लाया;

लगा डाँटने सबको, पागल,

सहम गये थे हम भी उस पल !

जब तक ज़्यादा और बिगड़ता,

हम लोगों के पीछे पड़ता,

हम बच्चों से विदा हो लिये,

अपने घर को फुर्र हो लिये!

चिडि़या भी ख़ुश-ख़ुश थी उस दिन।

।। तीन।।

घर

नभ में जब उड़े कबूतर थे,

धरती पर लड़ते तीतर थे,

तब सागर में इक लहर उठी

वह मेरा घरौंदा तोड़ गयी!

सागर किंचित लज्जित न हुआ,

पर मेरे मन कुछ घटित हुआ।

बेशक़, मैं ख़ाली लौटा था

पर मन में एक इरादा था

कल ऐसा एक बनेगा घर

लहरें जिसे तोड़ न पाएंगी,

कितना-ही ज़ोर लगा लें वे,

कितना-ही शोर मचा लें वे !

बन रहा एक घर है मेरा—

निश्चय की जिसमें नींव पड़ी

दृढ़ता की ईंटों से चुनकर,

अनुभव के साहुल से सधकर,

श्रम के गारे से दीवारें

सीधी तनकर हैं खड़ी हुई !

आशीषों के खपरैलों से

बन गयी अनोखी उसकी छत

है ठोस सत्य का फ़र्श बना

दरवाज़ा ज्ञान का लगा हुआ

विज्ञान-झरोखा बना हुआ।

खिड़की सुबुद्धि की लगी हुई

यवनिका लाज की पड़ी हुई

स्नेहिल रंगों से रँगा हुआ

सुरभित श्वासों से सजा हुआ।

देहरी पर ऋद्धि-सिद्धि बैठी,

दश दिशि मंगलप्रदता पैठी।

बन गया एक घर है मेरा

स्वागत! स्वागत!!

उस मानव का

जिसमें संवेदन भरा हुआ,

धृति-क्षमा-शौच-इन्द्रियविग्रह,

अस्तेय-सत्य-विद्या-अक्रोध,

धी-दम से जो भी सजा हुआ।

उस मानवता की मूरत का


अभिनन्दन है! शत वन्दन है!!


संपर्क : 3/29. विकास नगर, लखनऊ-226 022 (मो.80096 60096)

रमन भारतीय की कविताएँ

(1)

जाति ______________________

मेहनत मजदूरी करता हो या हो बाबू कार्यालय में कभी डांट में छिपकर या कभी गाली के रूप में चटटान से मजबूत इन हौंसलो को तोड़ जाती है पता नहीं कैसे ! नाम से पहले जाति पहुँच जाती है।

नौकरी का साक्षात्कार हो या हो विद्यालय में दाखिला विश्वविद्यालय का खेल मैदान हो या हँसी-ठिठोली वालों का काफिला गाँव की शांत गलियों और शहरों के शोर में भी सुन जाती है पता नहीं कैसे ! नाम से पहले जाति पहुँच जाती है।

शंबूक सा तपस्वी हो या हो एकलव्य सा धनुधर योग्य को अयोग्य साबित करना हो या अयोग्य को योग्य से ऊपर सिर धड से अलग करने अंगूठे काटने के काम आती है पता नहीं कैसे ! नाम से पहले जाति पहुँच जाती है।

कुँए से पानी भरना हो या हो गुजरना गली से ले बारात घोड़ी पर चढने की या मूछे रखने की हो बात लाठी-डंडो का डर दिखा आवाज कहीं दबा दी जाती है पता नहीं कैसे ! नाम से पहले जाति पहुँच जाती है।

नई जूती पैर में हो या हो पगडी सिर पर लाल इस अपराध पर पीटा जाए या उतार ली जाए खाल जाति के जहर की पुड़िया यहाँ मुफ्त में बांटी जाती है पता नहीं कैसे ! नाम से पहले जाति पहुँच जाती है।

राष्ट्र का प्रथम नागरिक हो या हो मंत्री पद का दावेदार व्यापार जगत का व्यापारी हो या पढ़ाई में खूब होशियार जाति का चश्मा लगाने वालों की आंखो में यह कांटे सा चुभ जाती है पता नहीं कैसे ! नाम से पहले जाति पहुँच जाती है।

बैंक का बडा अफसर हो या हो डाकू जंगल का ज्ञान का दीपक हो या पहलवान हो दंगल का लाख मना करने पर भी जाति साथ जोड दी जाती है पता नहीं कैसे ! नाम से पहले जाति पहुँच जाती है।

न्याय की तलाश में भटकता हो या हो आत्महत्या को तैयार जातिय अभिमान से चूर लोगों ने उजाड़ दिया जब संसार परिवार को दर-दर भटकने पर मजबूर यह कर जाती है पता नहीं कैसे ! नाम से पहले जाति पहुँच जाती है।

(2)

मैं निर्दयी नहीं हूँ ____________________

काश ! जो जूता मैंने बनाया वह दे मारता तुम्हारे सिर के ऊपर कुचल देता तुम्हारे इरादे तो आगामी नस्ल सुख से रहती धरती खुशहाल होती

जो अन्न मैंने उगाया वह ना देता कभी तुमको खाने को भूखे मरते तुम ! जो ईंट के घर मैंने बनाये ना देता तुमको कहाँ सिर छिपाते फिर ?

ना बनाता पहाड़ काटकर मूरत किस पर गर्व करते फिर?

ना करता तुम्हारी खदानों में मेहनत ना उठाता तुम्हारे मृत पशु ना करता झाड़ू-पोछा तुम्हारे महलों में कैसे पहुँचते तुम आसमान पर ?

ना ढ़ोता तुम्हारी वर्ण-व्यवस्था बजाय इसके कर देता क्रांति का आगाज़ छीन लेता तुम्हारी जमीनें, धन, ऐश्वर्य सोचो ! आज तुम कहाँ होते ?

अरे निठल्लों ! मैं तुम्हारी तरह निर्दयी नहीं हूँ, मैंने लिया है केवल अपनी मेहनत का हिस्सा जिसे तुम 'आरक्षण' कह कोसते हो।

(3)

पसीने का इतिहास ______________________

कोई ज्योतिष इन हाथों की रेखाएं नहीं पढ़ सकता यह धुंधली पड़ चुकी हैं महलों के बर्तन घिसते-घिसते, कचरा बीनते, मैला ढ़ोते, जूती गांठते, मिट्टी की मूर्तियां, सुराही बनाते हुए रेखाओं का मिटना आश्चर्यजनक नहीं जानते हो ! लोहा पिघलाने में तो आदमी मिट जाता है ; पढ़ना है तो पढ़ो इस बदन से टपकते पसीने का इतिहास जो इन रेखाओं से बड़ा गवाह है वर्तमान और भविष्य का।

(4)

सत्य से परहेज क्यूं ? ______________________________

तुम्हें दिखता है गज़नवी, गौरी का आक्रमण क्यूं नहीं दिखता ? मनु का उगला हुआ जहर या तुम देखना ही नहीं चाहते वह सब ?

दिखता है इतिहास में मंदिरों का टूटना, मंदिरों में लूटपाट होना क्यूं नहीं दिखती उन्ही मंदिरों में कैद देवदासी ? आख़िर क्यूं ? या जानबूझकर नहीं देखना चाहते उस ओर ?

दिखता है नरक का भय सडांध मारती व्यवस्था नहीं दिखती धरती का असल नरक जीवन तुम्हें क्यूं नहीं दिखता ?

बीता हुआ कल तुम कुरेद रहे हो अगर पलट रहे हो पृष्ठ इतिहास के तो दर्ज करो अपनी कायरता का पाठ तो मानू तुम्हें !

वरना जैसे बिल्ली को सामने देखकर कबूतर आँखें मूंद लेता है कि वह बच जाऐगा तुम्हारी स्थिति भी ठीक यही है।


नाम- रमन भारतीय मोबाईल न• - 9996202128 पता- रविन्द्र ढांडा, VPO कारसा डोड, तहसील- निगदू, जिला- करनाल (हरियाणा) (पिन कोड - 132157)


नवगीत

जो गीत मैं अपने वतन में गुनगुनाता हूँ

सरहद के पार भी वही गाता है कोई

मैं बादलों के परों पे जो कहानियाँ लिखता हूँ

वो संदली हवा की सरसराहट में सुनाता है कोई

उस पार भी हिजाब की वही चादर है

शाम ढले रुखसार से जो गिराता है कोई

मैं जून की भरी धूप में होली मना लेता हूँ

जब रेत की अबीरें कहीं उड़ाता है कोई

मेरे मन्दिर में आरती की घंटियाँ बज उठती हैं

किसी मस्जिद में अजान ज्यों लगाता है कोई

मुझे यकीं होता है इंसान सरहदों से कहीं बढ़कर है

जब किसी रहीम से राम मिलकर आता है कोई

नाम:सलिल सरोज

पता: बी 302, तीसरी मंजिल

सिग्नेचर व्यू अपार्टमेंट्स

मुखर्जी नगर

नई दिल्ली-110009

उम्र:31 वर्ष

ग़ज़लें: कैलाश मनहर

(एक)

*********

दरकार खून की है, सियासत की प्यास में।

अँधेरा बहुत है भरा, झूठे उजास में।।

हर आम परेशान है, सुनता नहीं कोई,

सिमटा हुआ है लोक-तन्त्र, सिर्फ़ खास में।।

हर ओर है फैला हुआ,बस झूठ का जंजाल,

दिखता नहीं है सच, कहीं भी आस-पास में।।

न प्राण-वायु और न ही, पानी और भात,

यह मुल्क़ मर रहा है, ज़िन्दगी की आस में।।

मुद्दों में गाय-भैंस हैं, और ताज-शिवालय,

सरकार अभी व्यस्त है, बस रंग-रास में।।

नदियाँ भी सूखने लगीं, जंगल भी कट गये,

मारा गया गरीब, बेचारा विकास में।।

(दो)

कोई बुनियाद या आँगन कि सिर पे छत जैसे।

जिस्म ओ जाँ मे रहे शामिल कोई आदत जैसे।।

हक़ में मुफ़्लिस के वो इंसाफ़ दे नहीं सकती,

खरीद रक्खी है साहब ने अदालत जैसे।।

हरेक बात में घुस आती है बुलाये बिना,

यह सियासत भी है अनचाही मुसीबत जैसे।।

बताये जाते हैं झूठे बयान सारे सही,

बोलना सच हुआ इस दौर में ग़लत जैसे।।

देखिये मुल्क को एक बार निग़ाह ए दिल से,


कोई आशिक़ पढ़े बरसों पुराना ख़त जैसे।।

(तीन)

हाय रे जलती दुपहरी हाय रे।

छाँह जाने कहाँ ठहरी हाय रे।।

हाय रे उन खोई-खोई आँखों में,

पीर कोई बहुत गहरी हाय रे।।

हाय रे तहसील थाना कलेक्ट्रेट,

हाय रे ढुलमुल कचहरी हाय रे।।

हाय रे डरपोक गूँगे लोग ये,

और हुक़ूमत निपट बहरी हाय रे।।

हाय रे अच्छे दिनों की असलियत,

हाय रे यह वक़्त ज़हरी हाय रे।।

(चार)

ज़हर है आजकल हवाओं में।

लगी है आग सब दिशाओं में।।

रोज़ बीमारी बढ़ती जाये है,

कुछ असर ही नहीं दवाओं में।।

हाय झगड़े ये धर्म ओ मज़हब के,

जंग प्रभुओं में और ख़ुदाओं में।।

हक़ ए इंसाफ़ की जरूरत है,

हर बशर की दिली सदाओं में।।

अम्न ओ ईमान माँगता है बस,

हरेक दीवाना अब दुआओं में।।

(पाँच)

उदासियों पे मुझे आ रहा है प्यार अभी।

ठिठुरती धूप में दिखता है कुछ निखार अभी।।

वो मेरे पास नहीं दूर भी कहाँ है मगर,

इस जगह जिसका मैं करता हूँ इन्तज़ार अभी।।

ये अधबने-से मकाँ और कच्ची दीवारें,

यहाँ से कोसों दूर है रुत ए बहार अभी।।

भरी-भरी-सी निग़ाहों में उसका चेहरा है,

करार ले के भी यह दिल है बेकरार अभी।।

अभी तो चढ़ने को पहाड़ सामने हैं बहुत,

क्यों सोचते हो तुम आये कोई उतार अभी।।

--कैलाश मनहर

स्वामी मुहल्ला, मनोहरपुर (जयपुर-राज.)

पिनकोड--303104

मोबा.9460757408

राघवेन्द्र पाण्डेय की ग़ज़ल

नज़र के सामने सोना पड़ा है

हमारी आंख पर पर्दा पड़ा है

उठाकर इसको सीने से लगा लूँ

कोई मासूम सा बच्चा पड़ा है

ज़हर बोते हैं जो उनको पता क्या

समूचे गांव में स्यापा पड़ा है

सभी चीजों की महंगाई बढ़ी है

आदमी जान से सस्ता पड़ा है

मिरा तू क़त्ल कर, पर याद रखना

जो भी आया, उसे जाना पड़ा है

कमाता हूँ, मगर बचता नहीं है

हमारी जेब पर डाका पड़ा है

मनाता मैं फिरूँ किस-किसको बोलो

जिसे देखो वही रूठा पड़ा है

तुम्हारी बादशाहत तोड़ देगा

हमारे हाथ में इक्का पड़ा है

लड़ा है आखिरी दम तक कोई फिर

विखंडित रथ का ये पहिया पड़ा है

- राघवेन्द्र पाण्डेय

वरिष्ठ अनुवादक

केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो, नई दिल्ली

कहानी

रोजगार


शंकर लाल माहेश्वरी

रामधन अब बूढ़ा हो गया। कमर झुक गई। लकड़ी ही उसके चलने का सहारा बन गई। सेवा निवृत्ति के 25 साल बाद भी उसका परिवार वहीं का वहीं ठहरा हुआ सा है। बड़ी लडकी आभा भी विधवा हो जाने के बाद रामधन के पास ही रहती है। छोटी सुरभि तो पिया के संग विदेश चली गई। जाने के बाद सुध भी नहीं ली अपने बाप की उसने। बेटा राहुल एम. ए प्रथम श्रेणी से पास कर चुका और अपने कॉलेज में सर्वाधिक अंक प्राप्त करने पर सम्मानित भी हुआ। रामधन अचानक ही पक्षाघात से पीडित हो गया। खूब ईलाज भी करवाया किन्तु सुधार नहीं हो पाया। वह दिन भर बिस्तर पर पड़े-पड़े भावी दुश्चिंताओं से ग्रसित रहने लगा। स्थिति बिगड़ती जा रही थी। माँ की बूढ़ी आँखे भी कब तक पड़ौसी बच्चों को ट्युशन पर पढ़ाती रहेगी? ऐसी हालत में पेंशन के पैसे से कोई कैसे काम चलाए? अकेला पड़ गया बेचारा रामधन। दिन प्रतिदिन चिन्ता गहराती गई। जो रामधन रोज सुबह चार बजे उठकर दण्ड बैठक लगाकर घूमने निकलता था। आज चार महिने से खाट पर लेटा रहने को मजबूर हो गया। सुबह चार बजे साथ घूमने वाले भी चार माह बीत जाने के बाद भी रामधन की सुध लेने नहीं आये। यह कैसा दस्तूर हैं दुनियाँ का ?

बेटा राहुल नित्य प्रति सुबह रोजगार की तलाश में निकलता और शाम होते तक घर आकर निराश हताश होकर पड़ जाता। प्रथम श्रेणी में एम.ए तक की पढ़ाई कर लेने के बाद भी रोजी रोटी का जुगाड़ नहीं कर पाया तो ऐसी पढ़ाई किस काम की? इससे तो जीतू लुहार का छोकरा दसवीं पास करते ही अपने पुश्तैनी धन्धे में लग गया जो आज लाखों का हिसाब किताब रखता है। शिक्षा तो ऐसी होनी चाहिए न कि पढ़ाई पूरी करते ही रोजगारोन्मुख होकर सुखी जीवन यापन कर सके। राहुल उस दिन भोजन करके घर की सीढ़ियों की चैखट पर अनमना सा बैठा हुआ सोच रहा था कि अब करे तो करे क्या ? इसी समय रामधन के बचपन का दोस्त, जो विदेश में रहता हैं, उसकी कुशलक्षेम पूछनें के लिए आ धमका। दीन दयाल हैं नाम उसका। बड़ा खुश मिजाज हैं। लाख परेशानियाँ हो तब भी वह समभाव बनाये रखता है। संतुलन नहीं खोता। रामधन की दशा देखकर कहने लगा, दादा! ‘‘हारिए न हिम्मत बिसारिये न हरि नाम’’ निराश होने की जरुरत नहीं है। कहते है, जब व्यक्ति पर चारों और से विपत्ति का पहाड़ टूट पडे तो ऐसी अवस्था में सब कुछ ऊपर वाले पर छोड़ देना चाहिए। जिस प्रकार दुख आता हैं उसी प्रकार जीवन में सुख के दिन भी आते है। राहुल की चिन्ता मत कर सब समय आने पर ठीक होगा। भैया! चिता तो हमारे शव को ही जलाती हैं किन्तु चिन्ता जीते जागते इंसान को ही जला ड़ालती है। बुढ़ापे को भुनभुनाते हुए जीने की बजाए गुनगुनगुनाते हुए जी। आशावादी बनकर जीना सीख। निराशावादी हर अवसर में कठिनाई देखता है जबकि आशावादी हर कठिनाई में अवसर देखता है। इसीलिए आशावादी बनकर जीवन को जी। समय पर सबकुछ ठीक होगा।

दीनदयाल को आज ही विदेश लौटना था। रामधन से विदा लेकर बाहर की बैठक में राहुल को साथ बिठाकर गले में बाँहे डाल उसे यह हौसला दिलाया कि बेटा राहुल! ध्यान रख, जब सफलता का एक दरवाजा बन्द होता हैं तो दूसरा दरवाजा खुल जाता है लेकिन हम सदैव बन्द दरवाजे को ही देखते है। खुले दरवाजे की ओर नहीं देखते। जहाँ हिम्मत समाप्त होती हैं वहीं तो हार की शुरुआत होती है। धीरज मत खो। कदम आगे बढ़ा, ध्यान रख, हर सफलता का इंजीनियर व्यक्ति स्वयं ही होता है। अगर वह अपनी आत्मा की ईंट और जीवन की सीमेंट उस जगह लगाये जहाँ चाहते हैं तो सफलता की बडी मजबूत इमारत खड़ी कर सकता है। मोती तो सदैव समुद्र में गोता लगाने पर ही मिल सकते है, किनारे पर बैठ कर नहीं पा सकते। सफलता के लिए नए रास्ते चुनों। मैं तुम्हे सफलता का एक ही गुरु मन्त्र देकर जा रहा हूँ, वह यह है। सर्वप्रथम अपना लक्ष्य निर्धारित कर, फिर कार्य की योजना बना, जो उस लक्ष्य तक पहुंचा सके और फिर उस काम में तब तक जुटे रहना जब तक निर्धारित लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो जाये। हमेशा ध्यान रखना जीवन युद्ध में बलशाली और तेज दौड़ने वाले ही नहीं जीतते बल्कि हर युद्ध में वे ही जीतते हैं जो यह सोचते हैं कि वे जीत सकते है। भरोसा होना चाहिए अपनी काबलियत पर। हिम्मत के साथ ही अपनी काबलियत अवश्य साथ देती है।‘‘ कागज अपनी किस्मत से उड़ता हैं किन्तु पंतग अपनी काबलियत से’’ आगे बढ़ो, चल पड़ो, कंटकाकीर्ण मार्ग की चिन्ता मत करो। तुम्हारी मेहनत और दृढ़ इच्छा शक्ति तुम्हारी राह के काँटो को भी अवश्य फूल बना देगी।

दीनदयाल की सीख का जबरदस्त प्रभाव पड़ा राहुल पर। वह हिल सा गया। नई ऊर्जा का संचार हुआ। नई उमंग और नये जोश के साथ चल पड़ा अपनी मंजिल की ओर। निश्चय में मजबूती आ गई। वह जान गया कि इंतजार करने वालों को तो केवल इतना ही मिलता हैं जितना कोशिश करने वाले छोड़ जाते है। अब राहुल हौसलों की उड़ान पर है। आज राहुल बड़े तड़के ही उठा नहा धोकर तैयार हुआ। माँ बापू के चरण स्पर्श कर काम की तलाश में जयपुर जाने की आज्ञा प्राप्त कर निकल पड़ा। भावी संभावनाओं की सूची निर्मित करता हुआ जयपुर पहुँच ही गया दोपहर वाली ट्रेन से। स्टेशन के बाहर ही ठेले वाले, रिक्शे वाले को देखकर मन में आया कि क्यांे नहीं येही काम कर लूं? उससे मुसाफिरों से जाते आते बातचीत होगी, किसी से परिचय भी बढ़ेगा तो किसी के सामने काम काज की बात भी कर सकता हूं। कभी न कभी किसी न किसी से तो काम का जुगाड़ बैठ सकता है। इसी उधेड़बुन में चैराहा पार कर ही रहा था कि एक हरा भरा बगीचा दिखाई दिया। वह उस बगीचे में पहुँचा और जल मंदिर के पास वाली सूनी बेंच पर बैठ गया। समीप ही खड़े खोमचे वाले से भूख बुझाने के लिए एक के बाद एक समोसा खरीदा, पुराने अखबारी कागज के टुकड़े पर मसालेदार समोसो का रसास्वादन कर अखबार के टुकड़ो को वहाँ रखे कूड़ेदान को समर्पित करने ही वाला था कि उसकी नजर अखबारी कागज पर लिखे विज्ञापन पर पड़ी उसमें लिखा था ‘‘ मिलिए, वर चाहिए तो वर से और वधु से’’। उसकी आँखे उसी विज्ञापन पर टिक गई पूरा विवरण एक ही साँस में पढ़ गया, सोचा, क्यों नहीं इसी विज्ञापन को आधार बनाकर आपना रोजगार प्रारम्भ किया जाए। अब क्या था, आशा अमर हुई। नई उंमग से भर गया।

समीप के जल मंदिर पर जाकर अपनी प्यास बुझाई और आज के अखबार की तलाश में आगे बढ़ गया। थोड़ी दूर जाने के बाद शिव मंदिर की सीढ़ियों पर एक छोकरा जोर जोर से बोल रहा था। वर चाहिए तो लीजिए आज का यह अखबार, पढिये, आपको वधू भी मिलेगी। पढ़े लिखे, नौकरी पेशे वाले किसी भी जाति समुदाय के हो, मिलेंगे हमउम्र के स्वस्थ व जोड़ीदार रिश्ते। राहुल का रास्ता साफ होता जा रहा था। उसने वह अखबार खरीदा और वर वधू वाले विज्ञापन को काट कर अपनी जेब में रखा।

दूसरे दिन नौ बजे का समय था। नाश्ता किया और भविष्य का हिसाब किताब लगाने लगा। तभी अखबार बेचने वाला छोकरा आया और उससे आज का अखबार खरीदा। वर वधू का पन्ना पलटा। विज्ञापन में जोड़ीदार की तलाश की। जोडी वाले वर वधू को पत्र लिखना प्रारम्भ किया। तीन चार दिनों के बाद ही उसके फोन की घंटी बजती सुनाई दी। भैयाजी! आपका पत्र मिला काम करवा दे। आपका प्रस्ताव अच्छा लगा, हम तैयार हैं। काम शीघ्र करवावें। आपका मेहनताना हाथों हाथ मिल जाएगा। इस प्रकार वैवाहिक विज्ञापनों से रोजगार बढ़ता गया। दिन दूरी रात चैगुनी प्रगति हुई। अच्छा भला बिन पैसे का रोजगार मिला तो वह फूला नहीं समाया। उसने इसी रोजगार में कई विधवाओं को सधवा बना दिया और कई तलाकशुदा को शादीशुदा बनाकर पुण्य कमाया। वह उसके लिए वरदान सिद्ध हुआ। पिता रामधन का जयपुर में ही रह कर बड़े ख्याति प्राप्त डाक्टर से उपचार करवाया। पिता तन से और बेटा मन से स्वस्थ होकर परिवार सहित आनन्द का जीवन जीने लगे।

बगीचे के उस जल मंदिर पर एक अपंग चैबीस पच्चीस वर्ष की विकलांग विधवा लड़की रोज पानी पिलाने का ही काम कर अपनी रोजी कमाती हैं। बेचारी का पति उत्तराखण्ड की त्रासदी में भगवान को प्यारा हो गया था। वह लड़की सुबह तो पैसे वालो के घर जाकर झाडू बुहारी कर पैसा कमाती तो आधा अधूरा पेट भरने को मिल जाता। जब प्याऊ के काम से छुटकारा मिलता तो दिन भर में प्राप्त हुए पैसों से भरपेट भोजन का इंतजाम कर लेती थी। कोई प्यासा दया भाव से तो कोई उदारता दिखाकर और कोई मनचले अपनी मौज से पानी का पैसा ड़ालकर जाते थे। साँयकाल मस्त मजदूर की दशा लिए वह घर जाती और दूसरे दिन की प्रतीक्षा करती। उसका नाम सुधा है।

एक दिन राहुल अकेले में उसकी राम कहानी सुनकर द्रवित हो गया और उसने उसे जीवन संगिनी बनाने का प्रस्ताव रखा तो वह राजी हो गई और माता पिता की साक्षी में धूम धाम से शादी हो गई। रोजगार के इस कारोबार में दोनों ही जी जान से लग गये। सुधा ने कम्प्यूटर और इंटरनेट का ज्ञान प्राप्त कर इस व्यवसाय को आगे बढ़ाने में सहयोग दिया। दीनदयाल विदेश में रहते हुए भी राहुल व रामधन की खैरखबर लेता रहा। राहुल के कारोबार की उन्नति से वह बड़ा खुश हुआ। रामधन भी स्वस्थ होकर इस व्यवसाय में जुड़ गया और राहुल का सहारा बन गया। राहुल का कारोबार बढ़ता गया। कई लोगों की गृहस्थी चल पड़ी, पहचान बढ़ी तो धन्धा भी बढ़ गया। आज ही के दिन तो साल भर पहले काम शुरु किया था राहुल ने। अब वहीं अपना घर भी बसा लिया। माँ बाप भी एक साथ रहने लगे। आज राहुल को समझ में आया कि दो अक्षर का ‘‘लक’’ ढ़ाई अक्षर का ‘‘भाग्य’’ तीन अक्षर का ‘‘नसीब’’ और साढ़े तीन अक्षर की ‘‘किस्मत’’ ये सभी चार अक्षर की ‘‘मेहनत’’ से छोटे होते है।

पूर्व जिला शिक्षा अधिकारी

पोस्ट-आगूचा

जिला-भीलवाडा

राजस्थान

पिन- 311022

मो.. 09413781610

कहानी

एक अदद कमरे की तलाश


तेजस पूनिया

सुबह सवेरे रामबीर के फोन की घंटी बज उठी। उनींदी आँखों से उसने मोबाइल फोन को ग्रीन सिग्नल दिया ... सामने प्रेम था -

हैल्लो

हैल्लो, हाँ बोलो इतनी सुबह फोन ?

प्रेम हँसते हुए - सुबह कहाँ भाई दस बज रहे हैं।

ओह ... यार बाहर सर्दी बहुत है। इसीलिए अभी तक सो रहा था ... खैर तुम बोलो क्या बात थी ?

प्रेम - क्या हुआ फिर ...?

क्या ... क्या हुआ ? (रामबीर पेशानी पर शिकन लाते हुए)

यार रात को ही तो व्हाट्सएप पर बात हुई थी।

ओह ... ओके ... ठीक है। कितने बजे आएगा तुम्हारा दोस्त ?

प्रेम - वो तेरे घर के पास ही है ... उसे फोन कर ले।

रामबीर पहले घर के बाहर की तरफ़ भागा फिर अंदर आकर फोन उठाता कि उससे पहले वह घनघना उठा। सामने एक अजनबी आवाज थी -

हैल्लो ... भाई कहाँ है तुम्हारा घर ?

देखो अपने ठीक सामने मैं हाथ हिला रहा हूँ।

ठीक है ... ओके

कहकर संजय ने फोन काट दिया और रामबीर के घर में दनदनाता हुआ दाखिल हुआ।

आओ बैठो ...

संजय और रामबीर करीबन दो घंटें आपस में बतियाते रहे। इसी बीच संजय बार- बार अपनी अंगुलियाँ फोन के की-पैड पर फिरा रहा था। ठीक एक बजे वह कुछ इत्मीनान सा नजर आया और नहाने चला गया।

रामबीर एक अनजान व्यक्ति के लिए सबकुछ कर रहा था। उसने उसे गर्म पानी, तौलिया, बाल ट्रिम करने के लिए मशीन सबकुछ दिए। नहा-धोने के बाद वह रामबीर के घर से यह कहकर चला गया कि अभी फिर आ रहा हूँ। इधर रामबीर अपने घर में अकेला घर के कामकाज में व्यस्त हो गया।

संजय पुन: रामबीर के घर में दाखिल हुआ। परन्तु इस बार वह अकेला नहीं था। उसके साथ एक लड़की भी थी। जिसका जिक्र उसने अलसुबह रामबीर से किया था।

आँखों में ही रामबीर और संजय के कुछ इशारे हुए और फिर संजय ने कमरा अंदर से बंद कर लिया। कमरे की बत्ती करीबन दो घंटें तक जलती रही। इधर रामबीर साफ़-सफाई में व्यस्त रहा। वहाँ से फारिग हो जाने के बाद जब वह नहाने के लिए गुसलखाने में घुसा तो भीतर से कुछ आवाजें बाहर भी आने लगी। बाहर रामबीर की बैचेनी बढ़ती जा रही थी कि अनजान को कमरा दिया है। वो भी मात्र चार दिन पुराने एक दोस्त के कहने पर। इसी उधेड़बुन में उसकी सांस अटकी थी कि भीतर क्या चल रहा है ? तभी रामबीर ने कमरे के ऊपर बने झरोखे से भीतर की तरफ़ झाँका। रामबीर बा-मुश्किल दस सैकेंड ही देख पाया होगा कि भीतर का दृश्य देखते ही उसके पूरे बदन में झुरझुरी सी तैर गई। लड़की लड़के के ऊपर लमलेट थी। किसी तरह रामबीर नीचे उतरा और नहाने लगा। नहा धोते ही उसके मन में ख्याल आया कि एक बार फिर से यह नजारा देखा जाए। इस बार पहले की तरह संजय और कंचन अर्धनग्न नहीं थे। संजय अपनी मर्दानगी की पूरी ताकत झोंक रहा था। मानो वे दोनों आखरी बार मिल रहे हों। कंचन की चीख निकली और रामबीर पुन: झरोखे से पीछे हट गया।

रामबीर के लिए यह पहला अवसर नहीं था। हालांकि इससे पहले भी उसके कई दोस्त एक अदद कमरे की तलाश में उससे नजदीकियाँ गाँठने की हर संभव कोशिश करते रहते थे। परन्तु रामबीर अपनी मर्जी का मालिक। किसी को कमरा देता तो किसी को सीधा ना कह देता। मगर आज उसने पहली बार जो कमरे में झाँका उसके बाद से उसके भीतर एक कुलबुलाहट सी मचने लगी। वह नहीं जान पा रहा था कि आखिर यह बिलबिलाहट और कुलबुलाहट किस चीज की है।

यूँ ही एक दिन रामबीर का दोस्त नरेंद्र भी अकेले में किसी लड़की की लेकर उसके घर दाखिल हुआ था। नरेंद्र रामबीर का अच्छा दोस्त बनता जा रहा था मगर मगर जब नरेंद्र तीसरी बार रामबीर के घर अपनी गर्लफ्रेंड को लाया तब रामबीर ने उससे सख्त लहजे में कह दिया -

देखो यह मेरा घर है। कोई रंडी खाना नहीं जो तुम हर दो-चार रोज बाद इसे ले आते हो।

रामबीर का इतना कहना भर था कि नरेंद्र ने उससे राब्ता करना बंद कर दिया। रामबीर भोला अपने दोस्त राहुल से जब इन सबका जिक्र करता तो राहुल उसे हिदायतें देता कि ये सब लड़के ठीक नहीं हैं। तू पता नहीं क्यों इन जैसे दोस्तों की मदद करता रहता है।

इतने में रामबीर बोल पड़ा - यार मगर आज जो लड़का आया था ना ... मुझे उन लड़का-लड़की का कोई मेल नजर नहीं आया। जबकि वो कह रहा था कि वो उससे शादी भी करने वाला है।

राहुल - बस रहने दे तू, मैं जा रहा हूँ। तू ये समाज सेवा करता रहा। किसी दिन कुछ हो गया तो मुझे मत कहना।

कहकर राहुल चला गया और इधर रामबीर फिर घरेलू कामों में व्यस्त हो गया। एक रात रामबीर अपने बिस्तर पर लेटा ही था कि उसने सपने में देखा की वही लड़का संजय और लड़की कंचन उसी बिस्तर पर अपने शरीर की तपिश को एक दूसरे से रगड़ खाते हुए कम करने का प्रयास कर रहे हैं। रामबीर का संजय और कंचन को ऐसी अवस्था में देखना पागल बना रहा था।

तभी रामबीर के व्हाट्सएप पर एक अनजान नंबर से मैसेज आया।

हैल्लो

भाई कहाँ हो ?

मैं आ गया ...

रामबीर - कौन ?

सामने से वही अनजान नंबर का मैसेज -

मैं आ गया हूँ ...

घर कहाँ है ...

और कौन है घर में ?

रामबीर – अरे भई आप कौन ...?

कोई नहीं ...

फिर पुन: उसी नंबर से मैसेज - नरेंद्र ... तुम विकास ? ... तुम हुक्का ले आए ?

अबकी बार रामबीर ने इस अनजान आदमी को फोन मिला दिया। तब उसने राँग नंबर कहकर फोन काट दिया और फिर सॉरी भाई, गलत नंबर लग गया। फोन रखते ही उसे मैसेज मिला।

प्रतिउत्तर में रामबीर ने कहा - जी कोई बात नहीं ... शुक्रिया ...

मगर राँग नंबर कहने के बाद भी नरेंद्र उससे राब्ता बढ़ाने की कोशिश कर रहा था।

भईया आप क्या करते हो ?

हैल्लो ...

जवाब तो दो।

रामबीर - पढाई करता हूँ ...

गुड, भाई रात को काम था कल आपसे।

रामबीर- क्या ?

आप हो कौन, मैं पहचाना नहीं ...

मैं नरेंद्र ...

कौन नरेंद्र ?

यार रात को मैं तुम्हारी तरफ़ आया था।

मुझे रुकना था ...

आप कौन हो ?

रामबीर - मुझे इसी नंबर पर फोन कीजिए।

नरेंद्र - आप हो कौन ...?

पहले ये तो बताओ .... विकास के

रामबीर - मैं रामबीर ...

नरेंद्र - ओके ... सॉरी भाई मैं दोस्त को समझा था ...

रामबीर को यह नया नरेंद्र नाम का लड़का भी भी कुछ परेशान हाल कर गया। वह सोचने लगा कि जब मैंने पहले ही इसे फोन करके कह दिया कि मैं वह नहीं हूँ ... जिससे तुम्हें बात करनी है। फिर भी यह क्यों मैसेज कर रहा है। थोड़ी देर बाद रामबीर का फोन फिर घनघना उठा। उसने देखा व्हाट्सएप पर वही लड़का फिर से मैसेज कर रहा था।

हैल्लो

रामबीर - बोलो

क्या कर रहे हो ?

रामबीर - कुछ नहीं, पढ़ रहा हूँ।

अच्छा ...

रामबीर - थोड़ा परेशान हाल हूँ और अजीब सी बैचेनी घुल रही है। खैर आप बताएँ ... और आप अपनी एक तस्वीर तो भेज दें ...

रामबीर आखिर देखना चाहता था कि यह अनजान आदमी आखिर है कौन ...?

तस्वीर मिलने के बाद वह उसे देख पाता उससे पहले नरेंद्र का फिर से मैसेज व्हाट्सएप के इनबॉक्स में तैरने लगा। व्हाट्सएप पर पहले पहल रामबीर सख्त रहा। मगर जल्दी ही वह नरेंद्र के इरादों को भांप गया और उसने नरेंद्र को अपने घर आने का न्यौता भी दे दिया। जो नरेंद्र पहले से ही चाह रहा था। रामबीर और नरेंद्र के बीच तय हुआ कि वे आपस में हम बिस्तर होंगे। मिलने का वक्फा तय हुआ और शुभरात्रि का संदेश दोनों ओर से एक किसिंग नॉज के साथ प्रेषित हुआ।

रामबीर का लड़कों के प्रति झुकाव थोड़ा अधिक था शायद इसीलिए सब उससे दोस्ती गाँठने की कोशिश करते रहते और कहते एक लड़की तो पटवा दो, या हम अपनी सेटिंग को तुम्हारे घर ले आएँ। तुम चिंता न करो हम तुझे भी खुश कर देंगे, अगले दिन।

कोई उसे पार्टी, मीट, माँस, दारु का ऑफर करता तो कोई उसके साथ हम बिस्तर होने का।

इधर छोटे से शहर की फिजाओं में जाने कौन से बड़े शहर की हवा तैरने लगी थी। कि यह शहर आधुनिकता की चकाचौंध में खोता जा रहा था। महंगे परफ्यूम, लड़के-लडकियाँ, एक लड़की के कईयों से नाजायज संबंध तो वही हाल लड़कों के भी थे।

रामबीर अपने उन दोस्तों से अक्सर पूछता तुम्हारी छ: सात गर्लफ्रेंड हैं। एक ही टाइम में तुम कैसे संभालते हो उन्हें ? वे पहले तो हँसते फिर कहते पागल एक का दूसरी के बारे में पता नहीं चलने देते। रामबीर उनकी इन करामातों और चालबाजियों पर रश्क करता और बातों के चस्के लेते हुए आनंद की अनुभूति के साथ आश्चर्य भी होता कि कहाँ उसके जैसे लड़कों को एक लड़की नहीं मिलती और कहाँ ये जिनके पास न अक्ल न शक्ल दस-दस लिए फिरते हैं। असल जिंदगी के मजे तो यही लूट रहे हैं।

इधर शहर में नया डी० एस० पी० आया था। रामबीर को उसके बचपन के एक दोस्त से पता चला कि यह डी० एस० पी० कड़क लहजे का है। और अक्सर पैट्रोलिंग के लिए दिन-रात कभी भी चल देता है। शहर भर के लड़के-लड़कियों में एक खौफ़ तारी हो रहा था कि अब होटलों में छापे पड़ने लगे हैं। अखबारों की सुर्खियाँ आए दिन इन्हीं बातों की स्याही में रंगने लगी है।

शहर में सैक्स रैकेट का भंडा फोड़, होटल में अय्याशी करता नौजवान और युवती से रंगें हाथों पकड़े गए। अखबारों कि यह सुर्खियाँ दबे पाँव लड़के-लड़कियों के भीतर एक भय का माहौल बनाती जा रही थी।

वे लड़के जो खुल्म-खुल्ला गाड़ियों में शराब पीते, शबाब लूटते, सिगरेट और हुक्के के छल्ले बनाते वह अब बंद कमरों की दीवारों में होने लगा था। ये दीवारें होटलों की नहीं अपने यार-दोस्तों के कमरे या घर होते जहाँ उन्हें किसी तरह का भय नहीं सताता था।

फिर एक दिन रामबीर के घर के बाहर किसी लड़की ने दस्तक की। लड़की कोई सेल्सगर्ल मालूम होती थी जो चाय का विज्ञापन कर रही थी।

सेल्सगर्ल – चाय की पत्ती ले लीजिए सर

रामबीर - नहीं लेनी

ले लीजिए न सर ...

रामबीर - अरे भई नहीं लेनी ...

निराश लड़की को रामबीर दूसरे घरों में जाते देखता रहा।

अगले ही दिन रामबीर के एक दोस्त प्रिंस ने अपने किसी दोस्त के लिए थोड़ी देर के लिए कमरा माँगा। पहले पहल रामबीर ने मना किया तो आगे से पप्रिंस बोल पड़ा –

कोई बात नहीं यार मैं शाम को फ्री होकर आ रहा हूँ ना तेरे पास।

रामबीर ने कमरे के लिए हाँ कह दी।

प्रिंस का दोस्त अपनी सहेली के साथ कुछ घंटे उसके कमरे में गुजारकर चला गया। प्रिंस के कहे मुताबिक़ रामबीर ने प्रिंस को कई बार फोन लगाया। मगर सामने से कोई जवाब नहीं मिला। थक हार कर रामबीर अपने कान्टेक्ट लिस्ट को स्क्रॉल करने लगा और लगातार 5-7 लड़कों को उसने फोन लगाए। किसी ने फोन उठाया तो कहा आज नहीं फिर कभी मिलेंगे। तो किसी ने फोन ही नहीं उठाया।

रामबीर फोन को स्क्रॉल करता रहा, फिर गेम खेला और थोड़ी देर बाद रजाई से मुँह ढक लिया। इतने में उसका फोन बज उठा। इस बार सामने उसके एक चार साल पुराने दोस्त की आवाज थी।

कहाँ है ?

घर ...

और कौन है ...?

कोई नहीं ...

ठीक है ... मैं आ रहा हूँ ...

यह दोस्त गौरव था। गौरव रामबीर को पिछले चार सालों से जानता था और उसकी खूब तारीफ़ भी किया करता था। रामबीर अपनी पूरी दुनिया के सामने सभ्य, सुशील पढ़ने, लिखने वाला और बुद्धिमान इंसान था। गौरव उससे बात करता रहा कुछ देर। इधर रामबीर के दिमाग में कुछ और ही चल रहा था।

तभी गौरव से रामबीर ने पूछा - हम एक दूसरे को चार साल से जानते हैं। कभी ऐसे काम के लिए मिलना नहीं हुआ।

गौरव - हाँ, मैं भी तुझसे कहना चाहता था। मगर डरता रहा कि शायद मैं जो सोच रहा हूँ तुम वैसे नहीं हो। और आज फिर बीवी के पीरियड्स चल रहे हैं तो सोचा अब तो मिल ही सकते हैं।

रामबीर - हाँ में हाँ मिलाते हुए। ह्म्म्म ... मैं तो बहुत पहले से ही तुम्हारे साथ सोना चाहता था ... फिर एक लम्बी सांस लेकर हल्के से उसके मुँह से फूटा ...मगर

खैर ... गौरव ने भी एक गहरी लम्बी सांस छोड़ते हुए कहा।

रामबीर - तो लाईट बंद कर दूँ ?

तेरी इच्छा ...

नहीं मुझे लाईट पसंद नहीं ...

ठीक है ...

कहकर वे दोनों अंतरंग हो गए।

लेकिन मदीद समय गुजार कर जब गौरव अपने घर लौट गया। तब रामबीर फिर से सोने की कोशिश करने लगा तो जाने उसके मन पर कौन सा बोझ सवार कर गया कि वह आज 40 वें जन्मदिन पर फोन के कोंटेक्ट्स को स्क्रॉल करने लगा। अब वह अपने आप से बडबड़ा रहा था कि बीसियों बार फोन स्क्रॉल करने पर जब देखता हूँ तो ज्ञात होता है कि दिखावे के इतने कोंटेक्ट्स से फोन अटा पड़ा है। और फिर हर दूसरा आदमी भी तो उसे पहली ही मुलाक़ात के बाद मिस कॉल देना नहीं भूलता था। साथ ही जाते-जाते हिदायत दे जाता या फिर मैसेज से याद दिलाता की सेव कर लेना।

लेकिन आज 40 साल की उम्र में उनमें से कोई मेरा अपना नहीं जिनसे दो मिनट भी अपने मन का हाल कह सकूँ। तभी उसी उधेड़बुन में रामबीर ने घर वालों को फोन लगा दिया। उधर से हमेशा वही सवाल ... कैसे हो ... ?

इधर से ... ठीक ऐसे ही जैसे हमेशा होते हैं ...


फिर उसी भिनभिनाहट में कोंटेक्ट्स की छंटनी की और फिर राहत महसूस करने लगा कि दिखावे के लोगों में कुछ तो कमी हुई। दरअसल फोन पहचानों की खाली डब्बे जैसी कतारें हैं और भावनाओं से भरे दोस्तों की कमी का अहसास ...

सम्पर्क - Flat No.- A-2172, First Floor, Front Side,

Green Field Colony, Faridabad

Hariyana – 121003

+919166373652, +9198802707162


ई-मेल- tejaspoonia@gmail.com


लघुकथा

मृत्युभोज

- मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

रजुआ बीच जंगल में अपनी भेड़-बकरियों को टिटकारी देता हुआ चरा रहा था, कि तभी उसकी नजर सज्जन सिंह पर पड़ गयी। सज्जन सिंह को सभी गाँव वाले दादा कह कर बुलाते थे। स्वभाव से अच्छे थे इसीलिए औरत - मर्द, बूढे - बच्चे सभी बस दादा - दादा की रट लगाये रहते...।

पास जाकर रजुआ ने पूछा, “दादा आज अकेले जंगल में और इतनी दूर कैसे आ गये, किसी जड़ी - बूटी की जरूरत आन पड़ी थी क्या? मुझे बोल देते, मैं ले आता।”

दादा ने रजुआ को धीरे से पलट कर देखा और धीमी आवाज में बोले, “बेटा रजुआ तू! कलेऊ लाया है क्या? दो दिन से यहीं भूखा पड़ा हूँ, धक्के मारकर घर से निकाल दिया मुझे।”

रजुआ ने अपना खाना दादा की तरफ बडाते हुए कहा, “लो दादा खा लो, पर ये बताओ आपको घर से क्यों निकाल दिया। आपके पाँच बेटे हैं, पाँचों के तीन-तीन, चार-चार लड़के हैं, फिर उनके लड़के हैं, नाती-पोतों से भरा पूरा परिवार है। सबकी आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी है। सबका अलग-अलग व्यवसाय है, फिर।”

“यही तो कारण है, बेटा रजुआ, सब अपने-अपने काम में व्यस्त हैं। मुझे परसों बुखार आ गया था, तो मैंने बड़े लड़के से कुछ रूपये दवा के लिए मांगे, उसने दुत्कार कर भगा दिया। जब उससे छोटे के पास गया तो उसने भी डांट दिया, इस तरह बारी - बारी से सबने स्पष्ट मना कर दिया। फिर मैंने सोच वहाँ रहना बेकार है, कोई किसी का नहीं इस दुखिया संसार में और मैं यहाँ मरने जंगल में चला आया।” दादा सज्जन सिंह ने रोते-बिलखते रजुआ को अपनी व्यथा सुना दी।

चार दिन बाद पता चला दादा इस दुनिया में नहीं रहे।

ठीक तैरह दिन बाद दादा सज्जन सिंह के पांचों लड़कों ने उनका मृत्युभोज (बृह्मभोज) बारह कुन्तल आटे का किया। माल-पुआ, खीर - सब्जी बनाई गई और आसपास के सभी गाँव वालों को भरपेट खाना खिलाया गया।

रजुआ सोच रहा था, जब दादा जिन्दा थे तो दवा के लिए दस-पांच रूपये नहीं थे इनके पास और आज दुनिया को दिखाने के लिए लाखों का मृत्युभोज आयोजित कर रहे हैं, ताकि दादा की आत्मा को शांति मिल सके, ढोंगी कहीं के...।

ग्राम रिहावली डाक तारौली,

फतेहाबाद, आगरा, 283111

व्यंग्य

साहित्य की खटपट !


पूरन सरमा

साहित्य में मेरे योगदान का मूल्यांकन अभी कोई आलोचक नहीं कर पाया है और मैं इस मामले में दूसरे के भरोसे रहना भी नहीं चाहता। दूसरे लोगों को मैंने अब अच्छी तरह पहचान भी लिया है। वे मेरे घर में जब तक चाय-नाश्ता उड़ाते हैं, तब तक तो साहित्य में मेरा अस्तित्व स्वीकारते हैं और मेरे यहाँ से विदा होते ही मेरी मजाक बनाते हैं तथा मेरे योगदान के बारे में कोई जिक्र तक नहीं करते। इसलिए मैंने तय किया है कि अपने कार्य का मूलयांकन मुझे खुद करना होगा। इतना लिख लिया है तो आंकलन तो होना चाहिए ही। वैसे मुझे पता है कि मैं कितने पानी में हूँ। वे जो लोग मेरा मजाक बनाते हैं, मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि वे छिछले पानी में खड़े हैं और उनके पांव अभी साहित्य में पूरी तरह भीगे भी नहीं हैं। मैं यहाँ उनकी आलोचना नहीं कर रहा, लेकिन अपना कद आंकने के लिए मुझे किसी से तो अपनी तुलना करनी ही होगी। इसलिए थोड़ा सा पत्र वाचन विरोधियों पर हो जाये तो यह मेरे येागदान के लिए प्रासंगिक है।

अब खटपटजी को ही लें, वे व्यंग्य क्या लिखते हैं, मेरी समझ में उनकी विसंगति और उस पर किया गया प्रहार आज तक समझ में नहीं आया। लेकिन वे आये दिन अपने लेखन कर्म को लेकर मुझसे खटपट करते रहते हैं। मैंने एक दिन उनसे कहा भी-‘भाई खटपटजी, आप जो अपना एकलाप करते हो, उसमें पाठक की समझ को गौण कैसे कर देते हो ? जिसके लिए रचना लिखी जा रही है, उसकी रूचि और पाठन का तो ध्यान आपको रखना चाहिए।’ इस पर खटपटजी नाराजी के स्वर में बोले-‘देखो शर्मा, व्यंग्य तुम्हारी समझ से परे है, मैं मानता हूँ व्यंग्य तुम भी लिखते हो, परन्तु वे मेरी समझ में नहीं आते। जहाँ तक मेरे व्यंग्य लेखन का प्रश्न है, क्या सम्पादक को पागल कुत्ते ने काटा है, जो वह मेरे व्यंग्य लगातार प्रकाशित कर अपने पत्र में छापते हैं ?’

मैंने कहा-‘आपने ठीक कहा, सम्पादक को पागल कुत्ते ने नहीं काटा है, लेकिन अब वे भी करें क्या, व्यंग्य का काॅलम चलाना है तो व्यंग्य के नाम पर आप जो लिख रहे हैं, वह पाठकों को परोस देते हैं। जिम्मेदारी तो आप की बड़ी है कि आप व्यंग्य लेखन के प्रति संजीदा नहीं है। व्यंग्य लेखन को आपने अखबार की खबर बना रखा है जिसे लिखकर आप व्यंग्य का तोष प्राप्त कर रहे हैं। इस तरह तो आपका मूल्यांकन व्यंग्य विधा में कहाँ होगा, यह आप स्वयं आसानी से समझ सकते हैं। जहाँ तक मेरी रचनाओं का प्रश्न है, मैं उन पत्रों को प्रकाशनार्थ देता नहीं, जिन्हें आप देते हैं। मैंने अपना आभामण्डल, माफ करना-राष्ट्रीय स्तर पर विकसित कर लिया है। इसलिए यदि मेरा व्यंग्य लेखन रेखांकित होता है तो मैं इसका हकदार हूँ।’

2

खटपटजी अब की बार तैश में आ गये, बोले-‘अमां यार शर्मा, अपने मुंह मियां मिट्ठू बनना तो कोई तुमसे सीखे-दस मिनट से बक-बक किये जा रहे हो, अपनी ही कहोगे या मेरी भी सुनोगे ?’

‘तुम्हारी सुनने के लिए तो मैरी इतनी बक-बक की है। तुम भी कहो अपनी राम कहानी ?’ मैंने कहा तो वे लगभग चीखकर बोले-‘तुम्हारा अभी एक व्यंग्य वसंत पर छपा है। ध्यान से सुनो वसंत पर व्यंग्य लिखना गुजरे जमाने की बात हो गयी और एक तुम हो कि वसंत पर हर वर्ष व्यंग्य लिखकर अपनी रचना छपवा लेते हो। मेरा मतलब तुम्हारे पास विषयों की विविधता नहीं है। वह तो सम्पादक को वसंत पंचमी पर लेख छापना होता है, इसलिए वह तुम्हारा वसंत छाप देता है। तुमने कभी देश के हालात पर नजर डाली है। मेरा मतलब चारों तरफ भ्रष्टाचार का हाहाकार मचा हुआ है। भ्रष्टाचार कह रहा है कि मुझ पर लिखो, परन्तु तुमने तो वसंत का आथेंटिक राइटर होने का ठेका सा ले लिया है। वसंत पर भी लिखते हो तो पहले वसंत को जानो तो सही भाई। उसमें कितना लालित्य है। इस समय वसंत की माली हालत क्या है ? पहले जो वसंत पर लिखकर चले गये उन्हें पढ़ो तो जानोगे कि वसंत होता क्या है। मेरे विचार से वसंत पर निबंध हो सकता है, व्यंग्य तो किसी कोण से बनता ही नहीं। तुम अपनी वसंत रचना के ऊपर हर बार व्यंग्य लिख देते हो। इसलिए तुम्हारा मूल्यांकन संदिग्ध है। मुझे पता है तुम्हारे भीतर स्थापित होने की कितनी छटपटाहट है। भाई आराम से लेटकर एक दिन सोचो तो सही कि तुमने साहित्य को आखिर दिया क्या है ? मेरा मतलब तुम्हारे योगदान से ही है।’

‘अब तुम भी सुनलो मेरी बात। मैं झटपटजी की तरह नहीं हूँ, जो दिनभर में तेरह रचनाएँ लिखकर डाक के लाल डिब्बे के हवाले प्रतिदिन कर देते हैं। पता है उन्हें लिखने की इतनी जल्दी है कि उन्होंने कभी आंकलन ही नहीं किया कि तेरह में से तीन रचनाएँ भी नहीं छपती। मैं झटपटजी की तरह नहीं हूँ, जो बिना सोचे-समझे लिखे चले जा रहे हैं, जहाँ तक खटपटजी आपका व्यंग्य लेखन है, वह भी झटपटजी की श्रेणी का ही है। वह इसलिए कि आपने भी कभी ठहरकर नहीं सोचा कि आपने वसंत पर एक भी रचना क्यों नहीं लिखी ? क्या आप वसंत पर लिख नहीं सकते या वसंत से ज्यादा आपको वोल्कर समिति की रिपोर्ट प्यारी है। वोल्कर में तीन चैथाई लेखन तो अखबार सुलभ करवा देते हैं, बाकी दस पंक्तियाँ आप अपनी पिद्दी टिप्पणी के साथ चेप देते हैं। मैंने वसंत को जिया है। मैंने उससे बात की है, इसलिए मैं वसंत का आॅथेंटिक राइटर भी हूँ। इसलिए आपकी तुलना में मेरा साहित्य श्रेष्ठ ठहराया जा सकता है। नयी पीढ़ी में परसाई के बाद मेरा नाम ले रहे हैं, अब आपने यह नहीं सुना तो इसमें मेरा क्या दोष है ?’ मैंने कहा।

3

इस बार खटपटजी आग बबूला होकर बोले-‘शर्मा थोड़ी गैरत रखो। परसाईजी को अपने साथ जोड़कर इतना छोटा मत करो कि लोग परसाई के लेखन को तुम्हारे कारण पढ़ना छोड़ दें। परसाई का नाम ही सुना है या उसे पढ़ा भी है ?’ उनके प्रतिप्रश्न के उत्तर में मैंने कहा-‘क्या परसाई जी ने वसंत पर नहीं लिखा और जब लिखा है तो मैंने वसंत पर लिखकर साहित्य का क्या अनर्थ कर दिया ?’

‘परसाईजी ने वसंत को पहले भोगा है और बाद में अपनी कलम उठाई है। तुमने वसंत की मादकता को देखा, न पहचाना और लिख मारा वासंती व्यंग्य। तुमने अपना मूल्यांकन खुद ही किया है और अपना कद रोज एक इंच बढ़ा लिया है, ऐसी स्थिति में क्या किया जा सकता है। डॉ. विकट खोपड़ा ने तुम्हारे व्यंग्य पर एक भी पंक्ति लिखी हो तो बताओ। इधर साहित्य शिरोमणी दादा बटुकनाथ ने भी कभी तुम्हारा जिक्र तक नहीं किया है तो तुमने अपने को साहित्य के दरिया में कमर तक कैसे भिगो लिया है ? थोड़ा खयाल करो और देखो-दूसरे लोग तुम्हारे बारे में क्या सोचते हैं ?’

‘मुझे पता है दूसरे लोग क्या सोचते हैं। आप सोच रहे हैं मेरे बारे में। मैंने अपना मूल्यांकन खुद किया है और अपने आप को साहित्य की मुख्यधारा में पाया है। मैं आपके भरोसे नहीं हूँ। मैं व्यंग्य में स्थापित हो चुका हूँ, आप कर लीजिये जो कुछ करना है वह।’ मेरे इस दंभी चीत्कार के सामने उनका सिंहासन एक पल हिला और क्रोधाग्नि में जलते हुये झटपटजी के घर की ओर दौड़ लिये। आप भी सुधी पाठक हैं, स्वयं तय कर लें कि खटपटजी और झटपटजी के सामने मेरा लेखन कहाँ ठहरता है ! साहित्य की खटपट यही है।

(पूरन सरमा)

124/61-62, अग्रवाल फार्म,

मानसरोवर, जयपुर-302 020,


मोबाइल-9828024500

पप्पू - गप्पू ने पछाड़ दिया संता - बंता को


-अवधेश कुमार 'अवध'

साहित्य विहीन सस्ते चुटकुले/ जोक्स सामान्य जन को सदैव हँसने का अवसर देते रहे हैं। आज के साहित्य में हास्य खोजना, रूई के ढेर में सुई खोजने जैसा दुरूह कार्य है एवं तथाकथित जनतन्त्र में खुलकर दिल से हँसना गधे के सिंग सा नौ दो ग्यारह है। ऐसे विषम परिवेश में जोक्स की हैसियत व उपादेयता बढ़ जाती है।

जब स्वस्थ साहित्य दिनकर, हरिशंकर परसाई, मनोहर जोशी की कलमों से हास्य व्यंग्य उगल रहा था तब काका हाथरसी, सांड़ बनारसी, शैल चतुर्वेदी, उर्मिल थपलियाल जैसे लोगों की कलमें पढ़े - लिखों को पेट पकड़कर हँसा रही थीं। किन्तु फिर भी सामान्य जनमानस रोटी - भात में उलझकर हँसी से बहुत दूर था। फिर आया दौर जीजा - साली, देवर - भाभी और पति - पत्नी का जो हँसाने से ज्यादा सम्बंधों की शुचिता को तोड़ - मरोड़कर परोक्षत: वासना को संतुष्ट करता रहा और आज भी कुछ हद तक कर रहा है। सुरेन्द्र शर्मा अथक प्रयास से अब भी जिंदा रखे हुए हैं। इसी बीच न जाने किन लोगों के योजनाबद्ध कुत्सित प्रयासों से सरदारों को महामूर्ख के रूप में सामने लाया गया और सरदार जोक्स के पर्याय बना दिए गए। सरदारों के ऐतिहासिक शौर्यगाथा पर यह सबसे बड़ा कुठाराघात था। उनकी अस्मिता को लीलने की कोशिश थी। जसपाल भट्ठी जैसे कलाकार सरदारों का मान - मर्दनकर खुद समृद्ध हो गए। अभी तक जोक्स/ चुटकुलों के पात्र अनाम थे। जहाँ कहीं भी दो चार लोग इकट्ठा होते, अपनी आर्थिक तंगहाली और बौद्धिक बड़प्पन का श्रृंगार 'सरदार' से करते।

समय पलटा और 'सरदारों' की मुक्ति शुरु हुई संता - बंता के तूफानी आगमन से। ये किसके मस्तिष्क की उपज थे, अन्वेषण का विषय है। इनकी पहुँच संसद से सड़क, बाथरूम से देशाटन तक रही। हर कोई सामने वाले को संता - बंता के रूप में देखता। सस्ते और सर्व सुलभ हास्य के विकास क्रम में और भी कई लोगों ने हाथ आजमाया पर टिक न सके। लालू जी भी लगभग दो दशक तक हास्य की राबड़ी चाटकर बिहार को तेजस्वी दे दिये। 'मिस्टर खाँसी' भी कुरुक्षेत्र में बिल्ली बनकर दैवयोग से और भी छींके टूटने के लिए डटे थे किन्तु इनकी मंशा पर एल टी गवर्नर ने पानी फेर दिया।

गहन जाँच -पड़ताल से पता चलता है कि इन सबमें एक यह बात कॉमन है कि कोई 'नारी' हास्य की स्थाई पात्र नहीं बनी। जब मैं इस बारे में सोचता हूँ तो इसमें नारी की सूझबूझ की गंध आती है। नारी जाति स्वयं के मान - सम्मान के बारे में सदैव सचेत रहती है। अपने आप पर वह हँस नहीं सकती क्योंकि सम्मान का सवाल है। सौतिया डाह दूसरों पर हँसने नहीं देता। हो सकता है आप इससे इत्तेफ़ाक न रखें। खैर इससे आगे बढ़ना चाहिए।


संता - बंता को असमय मौत के घाट उतार दिया हमारे देश के दो महान कर्णधारों ने। बात 2014 के संसदीय चुनाव के समय की है। चुनाव में 'हम किसी से कम नहीं' सकारात्मक सोच का सबसे प्रेरक स्लोगन होता है। जनमत को अपनी झोली में भरने की जुगत में पप्पू अकेले ही संता - बंता की जोड़ी से भिड़ गए और समर का परिणाम बहुत मुश्किल से उनके पक्ष में रहा। अब गप्पू को पप्पू की यह विजय रास न आनी थी न आई। गप्पू जी भी कमर कसकर कूद पड़े मैदान में। पप्पू की हड़प नीति से बेचारे संता - बंता पहले से ही अधमरे थे। ये गप्पू का प्रहार कैसे झेलते! वर्षों से चली आ रही संता - बंता की जोड़ी को एक पंचवर्षीय योजना से भी कम अवधि में मारकर पप्पू - गप्पू की लोकप्रिय युगल जोड़ी ने उनकी विरासत पर कब्जा कर लिया। अब पप्पू - गप्पू की जोड़ी का एकछत्र राज भारत ही नहीं बल्कि भारत से बाहर तक फैल रहा है। हमारी शुभकामनायें पप्पू - गप्पू के साथ हैं। ईश्वर इनकी जोड़ी को अक्षुण्ण बनाये रखें।

मो० नं० 8787573644

awadhesh.gvil@gmail.com

(Mr. Awadhesh Kumar)

Engineer, Plant

Max Cement, GVIL

4th Floor, LB Plaza

GS Road, Bhangagarh


Guwahati -781005 (Assam)

यात्रा वृतांत

शिलोंग (मेघालय)


-गुलाबचंद एन. पटेल

राष्ट्रभाषा हिन्दी प्रचार समिति, एलिस ब्रिज, अमदावाद से डाक से चिट्ठी मिली। बताया गया था कि हिन्दी कोलेज, हिन्दी प्रचार समिति की ओरसे आपको हिन्दी साहित्य सम्मेल, प्रयाग की ओरसे आयोजित हिन्दी साहित्य सम्मलेन में मार्च २०१७ में तिन दिन के लिए समिति के प्रतिनिधि के तोर पर आपको शिलोंग जाना होगा। आप का रु.१००० प्रतिनिधि शुल्क जमा करवाके पंजीकरण करवाया गया है। हम लम्बा रास्ता होने के कारण जाना नहीं चाहते थे, लेकिन, समिति के अध्यक्ष, नरेन्द्रभाई जोशी ने बताया कि हम भी कोलेज की ओर से भानुभाई त्रिवेदी, आशा बहन, नटूभाई रावल, हिना शाह और चतुरभाई बारोट भी सम्मलेन में सहभागी होने वाले है। हमारा आने जाने का रिजर्वेशन हिना शाह ने हम सभी का एक ही साथ करवाया था। जाने के समय में और मेरी पत्नी, पारवती दोनों अलग डिब्बे में थे। नई दिल्ली में हमें ज्यादा समय रुकना पड़ा क्यों कि रात में ट्रेन लेट थी। हम गौहाटी नव घंटे लेट पहुंचे। रात हो गई थी, रास्ते में बहुत बारिश थी। गौहाटी पहुँच कर हम सभी एक मंदिर में आराम गृह में रुके थे। सुबह में टेक्सी से हम शिलोंग के लिए रवाना हुए। वहां हमें कुलपति के गेस्ट हाउस में ठहराया गये थे। पहाड़ी विस्तार होने से सम्मेल्लन स्थल तक पहुँचने के लिए कार की व्यवस्था रखी थी। ठंडा होने से हम रुम में ही चाय बनाकर पीते थे। बहुत बढ़िया इंतजाम किया गया था। सम्मलेन स्थल के करीब ही नास्ता और भोजन का प्रबंध किया गया था।

बारिश होने के कारण बहुत ठंडा हो गया था। बाजार जाकर कमें एक शोल और केप भी खरीद करना पड़ा। उद्घाटन के दुसरे दिन चेरापूंजी जाने का प्लान सभी साथी मित्रों ने बनाया था। लेकिन, “राष्ट्रिय विकास में हिन्दी साहित्य की भूमिका” पर अपना आलेख प्रस्तुत करना था, इस लिए में चेरापूंजी नहीं जा पाया। शिलोंग में नेहू युनिवर्सिटी बहुत बड़ी है, वहीँ सम्मलेन था। देश भर से हिन्दी कवि लेखक, विद्वान् और हिन्दी प्रेमी लोग शिलोंग में आये थे। हमारे साथ शारदा स्कूल, अहमदाबाद के ट्रस्टी, चतुरभाई बारोट जी थे। उनको खैनी खाने की आदत थी। हमने उनको समझाया तो उन्हों ने प्रण लिया कि आज से हम खैनी खाना छोड़ देते है। में नशा मुक्ति / व्यसन मुक्ति कार्य पिछले दस सालों से करता हूँ, ३०० से अधिक स्कूल एवं कालेज में प्रोगाम किये गए हैं। उसके परिणाम चतुरभाई बारोट जी को खैनी खाने से होने वाला आर्थिक एवं शारीरक नुकशान की जानकारी देने से उन्हों ने खैनी खाना तुरंत ही छोड़ कर शिलोंग में ही संकल्प किया कि, में आज से खैनी खाना छोड़ देता हूँ और में दुसरे लोगों को भी तम्बाकू से दूर रहने के लिए समझाऊंगा। रात में गेस्ट हाउस में हिना शाह के रुम में हम भानुभाई त्रिवेदी के साथ बैठे थे तब हिना ने बताया कि क्यूँ मेरा बेड हिला रहे हो ? मैंने बताया कि में आप की बेड क्यूँ हिलाउंगा ? थोड़ी देर में जोर से आवाज आई और मेरी कुर्सी भी हिल गई, में गिरते गिरते बच गया, तब महसूस हुआ कि ये तो भूकंप है। यहाँ बार बार भूकंप आती है इस लिए प्रशासन ने बड़ी बिल्डिंग बनाने पर रोक लगा दी है।

मेघालय की राजधानी, शिलोंग में पूरी दुनिया में सबसे अधिक बारिश यहाँ चेरापूंजी, मेघालय में होती है। राणी गोदाम, देवों की नगरी और अलकापुरी जैसे सुंदर स्थल यहाँ पर है। तिन दिन बाद हम सम्मलेन पूरा होने से वापसी में गौहाटी आये। हमें पहाड़ी में ढलान के कारण टेक्सी प्रवास में निचे की ओर उतारते वख्त चक्कर भी आ गए थे। टेक्सी एक ढाबे पर रोका गया, वहां चाय नास्ता कर के फ्रेश होकर हम फिर टेक्सी में सवार होकर गौहाटी पहुंचे। कामख्या माता का सुन्दर मंदिर की ओर हम जाने लगे, तो पहाड़ में उपर की ओर चढान वाला रास्ता देख कर मैंने बताया कि में मंदिर में दर्शन के लिए नहीं जा पाउँगा, क्यों कि मेरे पैर में दिक्कत है। सीढियाँ बहुत लंबी थी, लेकिन चमत्कार जैसा हो गया और में सब से पहले कामख्या देवी के दर्शन करके निचे की ओर आ गया।

हैदराबाद में हिन्दी नव लेखक शिविर में नीतू करके एक लड़की आई थी। वहां हमारी मुलाकात हुई थी। उसे मैंने मेसेज दिया था कि, में कामख्या मंदिर आया हूँ। नीतू एक स्कूल में अपनी पढाई के साथ जॉब भी करती थी। वो छुट्टी लेकर कामख्या मंदिर हमें मिलने पहुंची। हमें बहुत खुसी हुई। उसने अपने घर हम सभी को आने का आग्रह किया, लेकिन, कामख्या से हमारी ट्रेन का समय होने के कारण हम उसके घर नहीं जा पाए। दर्शन कर के हम कामख्या रेलवे स्टेशन टेक्सी से पहुंचे। हमारी ट्रेन आधे घंटे में आ पहुंची। हम डिब्बे में अपनी सिट पर बैठ गए। दो दिन और दो रात की मुसाफ़री ट्रेन में करने से हम अहमदाबाद पहुंचे। शिलोंग की सुंदर और यादगार यात्रा आज भी हमें याद दिलाती है।

कवि, लेखक, अनुवादक और

नशा मुक्ति अभियान प्रणेता,

मो. ९९०४४ ८०७५३


इ-मेल: patelgulabchand19@gmail.com

रिपोर्ताज

देश की त्रासद कथा का बयान : ऋणजल धनजल

डॉ. धर्मेन्द्र प्रताप सिंह

सहायक आचार्य

हिंदी एवं तुलनात्मक साहित्य विभाग

केरल केंद्रीय विश्वविद्यालय

कासरगोड, केरल

मोबाइल-09453476741


email- dpsingh777@gmail.com

‘रिपोर्ताज’ एक फ्रांसीसी शब्द ‘रिपोर्ट’ से बना है जिसमें किसी आँखों देखी घटना का चित्रण किया जाता है। ‘रिपोर्ट’ में दिन-प्रतिदिन के समाचारों का स्पष्ट वर्णन होता है जबकि ‘रिपोर्ताज’ में साहित्यिक शैली में रोचकतापूर्ण चित्रण मिलता है। ‘रिपोर्ताज’ का प्रारम्भ द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान हुआ और इसकी शुरूआत करने का श्रेय इलिया एहरेन वर्ग को दिया जाता है। हिन्दी में पहला रिपोर्ताज शिवदान सिंह चैहान कृत ‘लक्ष्मीपुरा’ को माना जाता है जो 1938 में रूपाभ पत्रिका में प्रकाशित हुआ था। इसके साथ ही ‘मौत के खिलाफ़ जिन्दगी की लड़ाई’ शिवदान सिंह का एक अन्य महत्त्वपूर्ण रिपोर्ताज है। रांगेय राघव (स्वराज्य भवन, अल्मोड़े का बाजार, बंगाल का अकाल), उपेन्द्रनाथ ‘अश्क’ (पहाड़ों में प्रेममय संगीत, है कुछ ऐसी बात जो चुप हूँ), धर्मवीर भारती (युद्धयात्रा-1972, मुक्तक्षेत्रे युद्धक्षेत्रे), कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ (क्षण बोले कण मुस्काए), शमशेर बहादुर सिंह (प्लाट का मोर्चा-1952), फणीश्वरनाथ रेणु (ऋणजल धनजल-1977, नेपाली क्रांति कथा-1978), विवेकीराय (जुलूस रुका है-1977), भगवतशरण उपाध्याय, रामकुमार वर्मा (पेरिस के नोट्स), निर्मल वर्मा (प्रागः एक स्वप्न), श्रीकांत वर्मा (मुक्ति फौज), कमलेश्वर (क्रांति करते हुए आदमी को देखना) आदि ने हिन्दी जगत को कुछ महत्त्वपूर्ण रिपोर्ताज दिए हैं।

उपरोक्त रिपोर्ताज लेखकों में फणीश्वरनाथ रेणु आंचलिक लेखन के लिए विशेषतः याद किए जाते हैं। मात्र 15 वर्ष की आयु में लेखन की शुरूआत करने वाले फणीश्वरनाथ रेणु हिन्दी साहित्य में विशिष्ट स्थान रखते हैं। रेणु जी ने रिपोर्ताज के अतिरिक्त कहानी, उपन्यास, संस्मरण, रेखाचित्र विधा को भी समृद्ध किया। उनके रिपोर्ताजों के लेखन की विशिष्टता आम जन से उनका जुड़ाव है। ऋणजल धनजल, वन तुलसी की गंध, श्रुत अश्रुत पूर्वे, समय की शिला पर, आत्म परिचय, नेपाली क्रांति कथा, गंगा, डायन कोशी, हड्डियों का पुल उनके प्रमुख संस्मरणात्मक रिपोर्ताज हैं। दिनमान के संपादक अज्ञेय फणीश्वरनाथ रेणु के साहित्यिक मित्र थे जो उन्हें सदैव लेखन के लिए प्रेरित करते रहते थे।

‘ऋणजल धनजल’ रेणु का प्रसिद्ध रिपोर्ताज है जिसमें उन्हेंने बाढ़ और सूखा से प्रभावित बिहार की जनता की भूख और प्यास के बीच जीने की जद्दोजहत का मार्मिक चित्र उकेरा है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट हैं- ऋणजल अर्थात् पानी की कमी (सुखा) और धन जल अर्थात् पानी की अधिकता (बाढ़)। यह रिपोर्ताज दो भागों में विभाजित है- बाढ़ और सूखा। बाढ़ के अंतर्गत पाँच और सूखा के अंतर्गत छह रिपोर्ट हैं जिसमें पूरे बिहार द्वारा पिछले 250 वर्षों से झेली जाने वाली त्रासदी पर बेवाकी से अपनी राय रखी गई है। ग्रंथ के प्रारंभ में रघुवीर सहाय और निर्मल वर्मा के दो महत्त्वपूर्ण लेख हैं जो रेणु के पूरे व्यक्तित्व को उभारकर पाठकों के सम्मुख रख देते हैं। इसमें फणीश्वनाथ रेणु का सोशलिस्ट पार्टी से जुड़कर जनता के दुख और कष्ट को दूर करने का प्रयत्न स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यही कारण है कि वे जयप्रकाश के साथ राजनीति में सक्रिय भागीदारी करते रहे।

विवेच्य रिपोर्ताज का प्रथम भाग ‘बाढ़’ है। यह जो बोले सो निहाल, पंछी की लाश, कलाकारों की रिलीफ़ पार्टी और मानुष बने रहो के नाम से पाँच उपखण्डों में विभक्त है। 1975 में पटना में आयी भीषण बाढ़ और उससे होने वाली जन-धन की हानि का लेखा-जोखा रेणु ने प्रस्तुत किया है। इस भाग में रचनाकार ने ‘कुत्ते की आवाज़’ में अपने बाढ़ के अनुभवों को बताते हुए बाढ़ से बचने के उपायों की भी चर्चा की है। बाढ़ के समय ईंधन, मोमबत्ती, दियासलाई, सिगरेट, पीने का पानी और कंपोज की गोलियाँ इकट्ठा करके रेणु घर में बैठ जाते हैं। रेणु के इस रिपोर्ताज के केन्द्र में पटना शहर में आयी बाढ़ है। हम सभी इस बात से भली प्रकार अवगत हैं कि शहर की अपेक्षा गाँव में आयी बाढ़ अधिक भयावह होती है। विवेच्य रिपोर्ताज में रेणु ने पटना में आयी बाढ़ के अनेक चित्र उकेरे हैं। उक्त शीर्षक आने वाले संकट की सूचना देता हैं। कुत्तों को आने वाले संकट का आभास पहले ही हो जाता है। बाढ़ के दौरान लेखक बाढ़ग्रस्त शहर के दुमंजिले मकान में शरण लिए हुए इस विभीषिका का स्वयं अनुभव भी कर रहा था। रेणु लिखते हैं कि बाढ़ को सभी अलग-अलग नजरिये से देखते हैं। कुछ लोगों के लिए बाढ़ उत्सुकता का कारण है- ‘‘मोटर, स्कूटर, टैªक्टर, मोटर साइकिल, ट्रक, साइकिल, रिक्शा पर और पैदल लोग पानी देखने जा रहे हैं, लोग पानी देखकर लौट रहे हैं। देखने वालों की आँखों में, जुबान पर एक ही जिज्ञासा है- ‘पानी कहाँ तक आ गया?’ (ऋणजल धनजल, पृष्ठ-24)

संकट के बावजूद जनसामान्य अपना सामान्य जीवन जीने का प्रयास करता है। लेखक का मानना है कि बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में सही योजनाएँ काफी हद तक बाढ़ से होने वाले नुकसान को कम कर सकती हैं। पटना की बाढ़ के दौरान स्वयं सेवकों द्वारा की जाने वाली मदद किस तरह लोगों के प्राण बचाती है। इसमें यह भी देखा गया कि सरकारी मदद हमेशा बाद में ही पहुँचती है और पहुँचने के बावजूद सही समय पर राहत सामग्री लोगों तक वितरित नहीं होती। जब बिहार डूब रहा था उस समय आम जन के मुख से निकली हुई आवाज कि पानी का स्तर इतना बढ़ना चाहिए कि अमीरों की कोठियाँ भी इसमें डूबनी चाहिए। जब गाँवों में बाढ़ आती है तो सुविधा सम्पन्न लोगों के कानों में जूँ तक नहीं रेंगती। देश में फैली घोर असमानता के विरुद्ध जनमानस का प्रतिरोध नज़र आता हैं।

पटना में बाढ़ का पानी उतरने के साथ ही असली परीक्षा शुरू हो जाती है। सबसे बड़ी चुनौती लोगों को बीमारियों से बचाने और बर्बाद हुए शहर को पुनः आबाद करने की होती है। यह सरकार के लिए भी असल परीक्षा की घड़ी होती है। लेखक की बेचैनी तब दिखाई देती है जब वह परेशान होकर ‘परती परिकथा’ और ‘जुलूस’ पढ़ना शुरू कर देता है। सरकार द्वारा किया जाने वाला दिखावा भी इसमें प्रस्तुत किया गया है। समाचारों से मिली खबर के अनुसार दिल्ली से माडर्न रोटी, विदेश से केक और चीज, आगरा से पेठा, कलकत्ता से प्राणरक्षक दवाइयाँ बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए भेजी गई हैं जबकि उन्हें चिउरा, भुने चने, पाप कार्न और दालमोट के पैकेट दिये जाना देश में व्याप्त भ्रष्टाचार को दिखाता है। अधिकारी वर्ग गरीबों की भूख का भी सौदा कर लेते हैं। हमारे देश की सबसे बड़ी विडम्बना है जो देशवासियों का व्यवस्था से मोहभंग करती है।

ऋणजल धनजल के दूसरे भाग में बिहार में वर्ष 1966 में पड़े सूखे का रेणु जी ने वीभत्स रूप प्रस्तुत किया है। उक्त भाग में छह रिपोर्ट हैं जो बिहार के जनमानस की हृदय विदारक पीड़ा को उकेरकर रख देती है। ये सभी भाग भूमिदर्शन की भूमिका नाम से हैं। रेणु यहाँ कहते हैं कि बिहार का सूखा हमारी सरकार और पत्रकारों के लिए छतरपुर-सोनपुर का मेला हैं जिसे सभी देखने के लिए चले आ रहे हैं। इनके दौरों से जनता को कोई राहत नहीं मिल रही। बल्कि वे इससे अपना उल्लू सीधा करने में लगे हुए हैं। रेणु इस रिपोर्ताज में देश में फैली असमानता को चित्रित करते हुए कहते हैं कि बिहार के गाँव सूखे की चपेट में हैं लेकिन राजधानी पटना में दीपावली मनाई जा रही है- ‘‘राजधानी में, शहरों में दीपावलियाँ सजती हैं। पटाखे फूटते हैं, फुलझड़ियाँ छूटती हैं।... उधर, गया के गाँवों में, मुंगेर के दक्षिणी हिस्से में, पलामू और हजारीबाग की पहाड़ियों और जंगलों की धरती की छातियाँ दरकती जाती हैं, पानी पाताल की ओर खिसकता जा रहा है। आदमी भूख से ऐंठ-ऐंठकर मरने लगते हैं। (ऋणजल धनजल, पृष्ठ-79)

उक्त रिपोर्ताज में अज्ञेय द्वारा सूखाग्रस्त क्षेत्रों का दौरा, संपादक अज्ञेय के व्यक्तित्व और मिलनसार स्वभाव, जयप्रकाश से उनके सम्बन्ध, बिहार की लोक संस्कृति और रेणु के स्वभाव का चित्रण मिलता है। दिनमान के संपादक अज्ञेय सूखाग्रस्त क्षेत्रों का दौरा करने के लिए आते हैं और वे समाजवाद के समर्थक जयप्रकाश से मिलकर संकटग्रस्त क्षेत्रों में हुए नुकसान का मुआयना कर प्रभावितों को मदद पहुँचाने का प्रयास करते हैं। विवेच्य रिपोर्ताज में बिहार की लोक संस्कृति की झलक देखने को मिलती है। छोटे-छोटे त्योहारों पर बिहार की टेªनों में ऐसी भीड़ होती है कि मानों पूरा देश रेलवे स्टेशन पर ही उतर आया हो। रेलवे कर्मचारियों द्वारा अनपढ़ व्यक्तियों से किस तरह धन उगाही करते हैं, इसका भी चित्र रेणु जी ने प्रस्तुत किया है। जयप्रकाश अज्ञेय से रेलवे स्टेशन पर मिलते हैं और उन्हें आगे की योजना बताते हुए गया, जमुई, हजारीबाग और पलामू के कई इलाकों और गाँवों का भ्रमण करने की सलाह देते हैं।

जयप्रकाश के निर्देशानुसार अज्ञेय फणीश्वरनाथ रेणु, मित्र जितेन्द्र और टैªक्सी चालक गणेश के साथ अपनी पूरी तैयारी करके सूखाग्रस्त क्षेत्रों का मुआयना करने के लिए निकलते हैं। बोधगया के गाँवों में भ्रमण से पूर्व वे वहाँ के ए0डी0एम0 से मुलाकात कर ऐसे क्षेत्रों की मदद के लिए उनके द्वारा किए जाने वाले सरकारी प्रयासों के बारे में जानकारी लेते हें। ए0डी0एम0 से मुलाकात कर वे प्रभावित हुए चूँकि वे मूलतः बंगाली होते हुए भी जनसंपर्क की भाषा को महत्व देते हुए जनभाषा में अज्ञेय से वार्तालाप करते हैं। गया, नवादा, रेपुरा, सिरसा, कोमला, कोसला, कछुआरा, भेलुआ का भ्रमण करते हुए रेणु जी सूखा की भयावह स्थिति का चित्रण करते हुए लिखा है कि- ‘‘जहाँ तक दृष्टि जाती है- एक तृण नहीं। कहीं एक तिनका भी हरा नहीं। बंजर-परती धरती नहीं... धान के हजारों एकड़। प्रकृति के प्रकोप की मारी धरती! यह क्या देख रहा हूँ? यह किसका शाप है?... किसका पाप है... ? (ऋणजल धनजल, पृष्ठ-89)

रेणु जी बिहारी जनता की सूखे के बावजूद जिजीविषा की भावना को बहुत ही बारीकी से चित्रित किया है। बिहार के गाँवों का भ्रमण करते हुए उन्हें इस बात का अहसास होता है कि असली हिन्दुस्तान भारत के ग्रामीण अंचलों में ही बसता है। रेणु जी उक्त रिपोर्ताज में यह भी बताते हैं कि बिना जनामनस की भाषा जाने उन तक पहुँचना बहुत मुश्किल है। गरीबों का दर्द फणीश्वरनाथ रेणु की इन पंक्तियों में देखा जा सकता है- ‘‘मलिकवन के कौन फिकिर? घर में अनाज पानी भरल है।... हमनिये के उपजायेल, ओसायल-बरायल और घर में संइतल अनजवा- देखल अनजवा कहाँ चल जइतै, भैया?’’ (ऋणजल धनजल, पृष्ठ-93)

हमारे देश का आम आदमी पूँजीपतियों के चंगुल में फँसकर किस तरह भूख से तड़प रहा है- यह भी दर्शनीय है। अकाल और सूखा में जन्में बच्चों के नाम भी अकालू और सुखाड़ी पड़ जाते हैं। रेणु जी भारत के ग्रामीण अंचलों की उन सभी समस्याओं को इस रिपोर्ताज में समेटने का प्रयास किया है जो उन्हें परेशान करती हैं। बिहारियों के पास आज भी राशन कार्ड नहीं है जिससे उन्हें सरकार द्वारा प्रदत्त सुविधाएँ नहीं मिल पा रही हैं और उनकी अस्मिता पर संकट के बादल छाये हुए हैं। गाँव के लोगों से मिलने के बाद अज्ञेय जब वहाँ से निकलने के लिए तैयार होते हैं और पुनः वापस लौटने के लिए कहते हैं तो ग्रामीणों की आँखों में अज्ञेय से उम्मीद की किरण दिखाई देती है कि वे उनके लिए कुछ न कुछ करेंगे। अज्ञेय के सामने धर्मसंकट है कि क्या वाकई में वे पुनः वहाँ लौटकर आयेंगे? और आने पर उन्हें वहाँ की स्थिति का आभास पहले ही हो जाता है- ‘‘जब लौटकर आऊँगा तो देखूँगा... जशोदा नहीं है।... अथवा अकलवा अपनी माँ को खाकर चल बसा।... बिनोदवा को आखिरी दिन घुनी खेसारी का ‘घाठा’ भी नहीं मिल सका था।... मैं खोजूँगा- यहाँ कहीं कोसला गाँव था ? यहाँ जशोदा थी ?’’ (ऋणजल धनजल, पृष्ठ-96)

फणीश्वर नाथ रेणु ने इसमें यह भी दिखाने का प्रयास किया है कि सरकार की ओर से मिलने वाली राहत सामग्री स्टेशन की लाइन जाम होने की वजह से पीड़ितों तक नहीं पहुँच पाती। भूखे लोगों जब उनसे खाने की सामग्री चोरी करते हैं तो उन्हें जेल में डालकर आपराधिक मुकदमा दर्ज कर दिया जाता है। राहत सामग्री पहुँचने के बाद उनको बाँटने वाले अधिकारी को आदमी की चिन्ता नहीं है बल्कि अपनी ख्याति के लिए ज्यादा चिन्तित दिखाई देते हैं। भूख से परेशान जनता धूप में खड़ी होकर उच्च अधिकारियों का इंतजार कर रही हैं क्योंकि उन्हें ही अपने हाथों से सूखा पीड़ितों को भोजन परोसना है- ‘‘हर पत्ते में एक रोटी और एक मुट्ठी सोयाबीन की घुघनी।... ‘यायावर’ तसवीरें खींचने में व्यक्त हैं। उनका कैमरा जिस पंक्ति की ओर मुड़ता है-उधर के पत्तों में रोटी तुरत डाल दी जाती है।... जिनके पत्ते में कुछ नहीं पड़ा है, वह माँग नहीं रहा है कुछ। चुपचाप देख रहा है। बच्चे टूटे पड़े हैं मगर किसी ओर न हँसी है, न खुशी।’’ (ऋणजल धनजल, पृष्ठ-111)

सूखा और बाढ़ देश की दो ऐसी भीषण समस्याएं हैं जिससे प्रतिवर्ष होने वाले जन-धन हानि का आकलन अभी तक नहीं किया जा सका है। बिहार इससे सबसे ज्यादा प्रभावित रहा है। फणीश्वर नाथ रेणु ने 1975 में पटना में आई बाढ़ और 1966 में बिहार में पड़े सूखा को आधार बनाकर ‘ऋणजल धनजल’ की रचना की। इस रिपोर्ताज में बिहार के माध्यम से देश के मैदानी क्षेत्र की प्रमुख समस्या को रेणु ने उजागर करने का प्रयास किया है। रिपार्ताज की भाषा पर ध्यान दिया जाय तो इसमें हिन्दी के साथ-साथ अंचल में प्रयुक्त होने वाली मैथिली का प्रयोग बहुलता से दिखाई देता है। इसके अतिरिक्त भोजपुरी और बंगला का प्रभाव में दिखाई देता है। लोकोकितयाँ और मुहावरे पाठकों को बिहार के जनमानस के निकट ले जाते हैं।

सन्दर्भ :


ऋणजल धनजल-फणीश्वरनाथ रेणु, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण- 2013

पर्यटन

अरुणाचल प्रदेश के पर्यटन स्थल


वीरेन्द्र परमार

अरुणाचल प्रदेश अपने नैसर्गिक सौंदर्य, सदाबहार घाटियों, वनाच्‍छादित पर्वतों, बहुरंगी संस्‍कृति, समृद्ध विरासत, बहुजातीय समाज, भाषायी वैविध्‍य एवं नयनाभिराम वन्‍य-प्राणियों के कारण देश में विशिष्‍ट स्‍थान रखता है। अनेक नदियों एवं झरनों से अभिसिंचित अरुणाचल की सुरम्‍य भूमि में भगवान भाष्‍कर सर्वप्रथम अपनी रश्‍मि विकीर्ण करते हैं, इसलिए इसे उगते हुए सूर्य की भूमि का अभिधान दिया गया है। इसके पश्चिम में भूटान और तिब्बत, उत्तर तथा उत्तर – पूर्व में चीन, पूर्व एवं दक्षिण – पूर्व में म्यांमार और दक्षिण में असम की ब्रह्मपुत्र घाटी स्थित है। पहले यह उत्तर – पूर्व सीमांत एजेंसी अर्थात नेफा के नाम से जाना जाता था। 21 जनवरी 1972 को इसे केन्द्रशासित प्रदेश बनाया गया। इसके बाद 20 फ़रवरी 1987 को इसे पूर्ण राज्य का दर्जा दिया गया। इसका क्षेत्रफल 83,743 वर्गकिलोमीटर है जो देश के क्षेत्रफल का 2.54 प्रतिशत एवं पूर्वोत्तर का ( सिक्किम को छोड़कर ) 32.81 प्रतिशत है। 2011 की जनगणना के अनुसार अरुणाचल की कुल जनसंख्या 1382611 है जिनमे पुरुष 720232 और महिला 662379 है। जनसंख्या का घनत्व 17 व्यक्ति प्रति वर्गकिलोमीटर है। यहाँ लिंगानुपात प्रति 1000 पुरुषों पर 920 है तथा साक्षरता दर 66.95 प्रतिशत है। यहाँ की सम्पूर्ण जनसंख्या आदिवासी है। आदी, न्यिशी, आपातानी, हिल मीरी, तागिन, सुलुंग, मोम्पा, खाम्ती, शेरदुक्पेन, सिंहफ़ो, मेम्बा, खम्बा, नोक्ते, वांचो, तांगसा, मिश्मी, बुगुन (खोवा ), आका, मिजी इत्यादि जनजातियां यहाँ निवास करती हैं। अरुणाचल की 25 प्रमुख जनजातियों की अलग-अलग भाषाएं हैं लेकिन सभी लोग संपर्क भाषा के रूप में हिंदी का प्रयोग करते है, यहॉं तक कि विद्यालयों-महाविद्यालयों में भी माध्‍यम भाषा के रूप में हिंदी का प्रयोग किया जाता है। ईटानगर, नाहरलागुन, बमडीला, तवांग, पासीघाट, जीरो इत्यादि अरुणाचल के प्रमुख शहर हैं। ईटानगर इस राज्य की राजधानी है। मोपिन, सोलुंग, लोस्सार, ड्री, सी- दोन्यी, रेह, न्योकुम इत्यादि अरुणाचल के प्रमुख पर्व- त्योहार हैंI

अरुणाचल प्रदेश में अनेक ऐसे पौराणिक और ऐतिहासिक स्थल हैं जो इसकी प्राचीन गौरवशाली संस्कृति को उद्घाटित करते हैं। पुरातत्ववेत्ताओं और इतिहासकारों के अनुसंधानों द्वारा स्पष्ट परिलक्षित होता है कि प्राचीन काल में अरुणाचल का शेष भारत से गहरा सांस्कृतिक संबंध था। प्राकृतिक और भौगोलिक कारणों से कालांतर में यह सांस्कृतिक संबंध क्षीण हो गया लेकिन एकता की भावना अंतःसलिला की भांति प्रवाहमान रही। पुरातत्ववेत्ताओं ने अनेक पौराणिक किलों, मंदिरों और महलों के अवशेषों के आधार पर निष्कर्ष निकाला है कि यह सांस्कृतिक संबंध हजारों वर्ष पुराना है। अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश के लिए भारतीय पर्यटकों को इनरलाइन परमिट और विदेशी पर्यटकों को प्रतिबंधित एरिया परमिट लेना पड़ता है। यह परमिट दिल्ली स्थित अरुणाचल भवन और गुवाहाटी से सरलतापूर्वक प्राप्त किया जा सकता है।

ईटानगर - अरुणाचल की राजधानी ईटानगर एक पर्वतीय शहर है। यह अब रेलमार्ग से भी जुड़ चुका है। प्रतिदिन गुवाहाटी से ईटानगर के लिय ट्रेन चलती है। ईटानगर का ईटाफोर्ट, बौद्ध मठ, जनजातीय संग्रहालय देखने लायक है। ईटाफोर्ट के गर्भ में अनेक ऐतिहासिक तथ्य छिपे हुए हैं लेकिन उसका संपूर्ण रूप से अभी तक उद्घाटन नहीं हो सका है। यह किला किस सदी में और किसके द्वारा बनवाया गया है, इस संबंध में इतिहासकारों में मतभिन्नता है। इसके संबंध में स्थानीय लोक साहित्य में अनेक आख्यान मिलते हैं। न्यीशी जनजाति के अनुसार यह ‘हिता’ नाम से विख्यात था। ऐसी भी मान्यता है कि इसका निर्माण मैदानी क्षेत्र के किसी आप्रवासी राजा ने करवाया था। यह उस राजा की राजधानी था जिसे मायापुरी भी कहा जाता था। एक दूसरी कथा के अनुसार यह राजा रामचंद्र की दूसरी राजधानी था। राजा रामचंद्र जितारी वंश के शासक अरिमत्त के पिता थे। अरिमत्त ने अपने पिता की हत्या कर दी थी और बाद में स्वयं आत्महत्या कर ली थी। कुछ इतिहासकार इसका निर्माण काल 17वीं सदी बताते हैंI

मालिनीथान- मालिनीथान मंदिर अरुणाचल के पश्चिमी सियांग जिले में लीकाबाली के निकट स्थित है। यह उत्तर पूर्वी भारत का एक प्रसिद्ध मंदिर है। इसका निर्माण काल संभवतः दसवीं से बारहवीं सदी के बीच है। कालिकापुराण से ज्ञात होता है कि कामरूप कामाख्या के पूर्व में एक पीठस्थान था। बाद में मालिनीथान के रूप में उसकी पहचान की गई। स्थानीय लोकसाहित्य के अनुसार मालिनीथान का संबंध भगवान श्रीकृष्ण और रुक्मिणी से है। रुक्मिणी कुंडिलनगर अथवा भीष्मक नगर की राजकुमारी थी। रुक्मिणी का भगवान श्रीकृष्ण से प्रेम हो गया और उसने श्रीकृष्ण से विवाह करने की इच्छा प्रकट की। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण राजा भीष्मक की राजधानी कुंडिलनगर आए और राजकुमारी रुक्मिणी का अपहरण कर द्वारिका लौट गए। रास्ते में भगवान श्रीकृष्ण और रुक्मिणी ने एक स्थान पर विश्राम किया जहां पर महादेव और पार्वती अपने साथियों के साथ तपस्या कर रहे थे। पार्वती ने नवदंपति को देखकर आशीर्वादस्वरुप रुक्मिणी को फूलों की माला पहनाई। फूलों की माला पहनाने के कारण श्रीकृष्ण ने पार्वती को ‘मालिनी’ के नाम से संबोधित किया। इसके बाद से यह स्थान मालिनीथान के नाम से विख्यात हो गया। इस क्षेत्र के निवासी महिषासुरमर्दिनी दुर्गा के रूप में पार्वती की पूजा करते हैं। खुदाई के द्वारा इस स्थान में विभिन्न मुद्राओं में अनेक देवी- देवताओं की मूर्तियां प्राप्त हुई है। दुर्गा, सूर्य, इंद्र, कार्तिकेय, गणेश, नंदी, हाथी इत्यादि मूर्तियां शिल्प कला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इन मूर्तियों से पता चलता है कि इस क्षेत्र का हिंदू संस्कृति से गहरा संबंध है। सूर्य, कार्तिक और नंदी बैल की नृत्यरत मूर्तियां मूर्ति कला के उत्तम नमूने हैं।

ताम्रेश्वरी मंदिर - यह मंदिर लोहित जिले में स्थित है। ऐतिहासिक दस्तावेजों से पता चलता है कि यह मंदिर तांबे से बना हुआ था। इसलिए इसे ताम्रेश्वरी मंदिर (कॉपर टेंपल) कहा गया। इसे तामर माई भी कहा जाता है। इस मंदिर के संबंध में अनेक किंवदंतियां प्रचलित है। इससे संबंधित लोककथाओं के आधार पर इतिहासकारों ने अलग -अलग मत व्यक्त किए हैं। कुछ इतिहासकारों का अभिमत है कि इसका निर्माण छठी शताब्दी में सूतिया वंश के शासन काल में हुआ था। कुछ इतिहासकारों की मान्यता है कि इसका निर्माण राजा भीष्मक ने अपने शासनकाल में कराया था। राजा भीष्मक की पुत्री राजकुमारी रुक्मिणी प्रतिदिन इस मंदिर में पूजा करने जाती थी। राजा भीष्मक अपनी पुत्री की शादी शिशुपाल से करना चाहते थे लेकिन वह भगवान श्रीकृष्ण से प्रेम करती थी। उसने भगवान श्रीकृष्ण को अपना प्रेम संदेश भेजा। ऐसी मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने इसी मंदिर से रुक्मिणी का अपहरण किया था। ब्रिटिश अधिकारी ई.ए. रॉलेट की रिपोर्ट के अनुसार 1820 ई. तक प्रत्येक वर्ष यहां एक विशाल मेला लगता था जिसमें दो पुरुषों की बलि दी जाती थी। लोगों की भारी भीड़ एकत्रित होती थी और माता की जय-जयकार करती थी। मनुष्यों की बलि पाकर देवी संतुष्ट होती थी। उपस्थित जनसमुदाय ढोल-नगाड़े बजाकर और गीत गाकर देवी को प्रसन्न करने की कोशिश करता था।

भारत में दो ही मंदिरों में योनि पूजा का विधान है। ये दोनों मंदिर पूर्वोत्तर भारत में स्थित हैं। पहला गुवाहाटी का कामाख्या मंदिर और दूसरा अरुणाचल का ताम्रेश्वरी मंदिर। इन दोनों में मां पार्वती की आराधना की जाती है। ऐसा लगता है कि दोनों मंदिरों में निकट का संबंध है। इस संदर्भ में एक कथा प्रचलित है। एक बार पार्वती के पिता राजा दक्ष ने एक यज्ञ का आयोजन किया। राजा दक्ष भगवान शंकर को पसंद नहीं करते थे, इसलिए उन्होंने भगवान शंकर को आमंत्रित नहीं किया। एक दिन महर्षि नारद उनके घर आए और यज्ञ में जाने के लिए प्रेरित किया। भगवान शंकर के मना करने के बावजूद पार्वती जी अपने पिता के घर यज्ञ में शामिल होने के लिए जाने का हठ करने लगी। अंततः भगवान शंकर ने बेमन से पार्वती जी को जाने की अनुमति प्रदान कर दी। अपने पिता के घर में पार्वती जी को अपमानित होना पड़ा। वे इस अपमान को सहन नहीं कर सकी और यज्ञ कुंड में कूद गई। इस घटना से भगवान शंकर अत्यधिक क्रोधित हो गए। वह अपनी पत्नी पार्वती की लाश को अपने कंधे पर लादकर घूमने लगे। यह उनके दुख और क्रोध का चरम बिंदु था। भगवान विष्णु भी उनके मार्मिक दुख को महसूस करते थे लेकिन महादेव को रोकना भी आवश्यक था। इसलिए वह अपने चक्र से सती के शरीर को काटने लगे। शंकर सती के शरीर को लेकर घूमते रहे और सती का शरीर कट-कटकर भूमि पर गिरता रहा। सती के शरीर का मध्य भाग गुवाहाटी में गिरा जहां कामाख्या नामक शक्तिपीठ स्थापित हुई। ऐसा विश्वास है कि सती के शरीर के मध्य भाग का कुछ हिस्सा कुंडिलनगर के निकट भी गिरा। इसलिए कामाख्या मंदिर और ताम्रेश्वरी मंदिर दोनों में योनि पूजा का विधान है और दोनों मंदिरों की पूजा विधि में भी समानता है।

भालुकपोंग- अरुणाचल प्रदेश के प्राकृतिक सौन्दर्य को देखते हुए कुछ रोमांचकारी अनुभव प्राप्त करना चाहते हैं तो भालुकपोंग अवश्य जाना चाहिए। भालुकपोंग में लंबी पैदल यात्रा, ट्रेकिंग और नदी राफ्टिंग किया जा सकता है। भालुकपोंग के चारों ओर फैले पहाड़ आपको ट्रेकिंग पर जाने के लिए मानो निमंत्रण देते हैं। ईस्ट कामेंग जिले में अवस्थित भालुकपोंग किले का ध्वंसावशेष इतिहासकारों और पुरातत्ववेत्ताओं के लिए जिज्ञासा का विषय बना हुआ है। 300 फीट की ऊंचाई पर अवस्थित इस किले के निर्माण काल के विषय में आज भी निश्चित रुप से कुछ कहना कठिन है। इस किले को किसने निर्मित करवाया था, यह भी अभी अनुमान आधारित है। यह तीन ओर से ईटों की दीवार से घिरा हुआ है। इस किले के आसपास आक जनजाति के लोग निवास करते हैं। आका समुदाय के पौराणिक आख्यानों के अनुसार यह किसी जनजातीय राजा की राजधानी था। एक दूसरे आख्यान के अनुसार ये राजा भालुक की राजधानी था। राजा भालुक को आका समुदाय के लोग अपना पूर्वज मानते हैं। राजा भालुक बनराजा के पुत्र थे जिसे श्रीकृष्ण ने युद्ध में परास्त किया था। असम स्थित तेजपुर नामक स्थान बनराजा से संबंधित है। राजा भालुक का शासन काल सातवीं से दसवीं शताब्दी के बीच माना जाता है।

नक्श पर्वत - पूर्वी कामेंग जिले के सिजोसा अंचल में स्थित नक्श पर्वत बौद्ध धर्म से संबंधित स्थान है। खुदाई के दौरान यहाँ टूटे स्तम्भ, गुरिया, मिट्टी के बर्तन और कांच के हरे - नीले टुकड़े प्राप्त हुए हैं। पुरातत्ववेत्ताओं ने अनुमान लगाया है कि मध्यकाल में यहां पर समृद्ध बौद्ध संस्कृति फल- फूल रही थी।

विजयनगर - अरुणाचल के चांगलांग जिले में स्थित विजयनगर में खुदाई के दौरान बौद्ध धर्म से संबंधित अनेक वस्तुएं प्राप्त हुई हैं। यहां पर ईटो से निर्मित बौद्ध स्तूप और भगवान बुद्ध की मूर्तियां मिली है। इस बौद्ध स्तूप में जिन ईंटों का उपयोग हुआ है वह अनेक आकार -प्रकार की है। ऐसा माना जाता है कि 10 वीं - 11 वीं सदी में बर्मा में पाए जानेवाले स्तूपों से इसकी काफी समानता है। वर्ष 1971 में पुरातत्ववेत्ताओं ने इस स्थान की खुदाई की। यहाँ खुदाई में एक स्तूप प्राप्त हुआ। यह स्तूप अष्टभुजे चबूतरे पर बना था। पुरातत्ववेत्ताओं ने निष्कर्ष निकाला है कि अठारहवीं शताब्दी के मध्य में इस घाटी में सिंहफ़ो और खाम्ती जैसा विकसित बौद्ध समुदाय रहता था।

परशुराम कुंड- परशुराम कुंड भारत प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है। यह भगवान परशुराम से संबन्धित है। अपने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए परशुराम ने अपनी माता की हत्या कर दी थी। उनके पिता जमदग्नि ऋषि ने प्रसन्न होकर दो वरदान मांगने के लिए कहा। परशुराम ने पहला वरदान मांगा कि मेरी माँ पुनर्जीवित हो जाए तथा दूसरा वरदान मांगा कि मातृहत्या के पाप से मुक्ति मिल जाए। उनकी माँ जीवित हो गईं। जमदग्नि ऋषि ने परशुराम को पाप मुक्ति का उपाय बताते हुए कहा कि आर्यावर्त के उत्तर पूर्व में घने वनों के बीच ब्रह्मा जी द्वारा निर्मित एक कुंड है। उस पवित्र कुंड में स्नान करने से पापों से मुक्ति मिल जाएगी। परशुराम लंबी यात्रा कर उस कुंड के निकट गए और उसमें डुबकी लगाई। कुंड में स्नान करने से उनका पाप तो नष्ट हो गया परंतु कुंड का जल लाल (लोहित) हो गया। कुंड के अपवित्र जल को पवित्र करने के उद्देश्य से पशुराम ने कुंड के आस – पास की चट्टान को अपने परशु से काट दिया और उसके जल को बहने के लिए मार्ग बना दिया। ब्रहमकुंड से बहनेवाली जलधारा ब्रह्मपुत्र के नाम से विख्यात हुई। प्रत्येक वर्ष मकर संक्रांति के दिन यहाँ मेला लगता है और हजारों हिन्दू तीर्थयात्री इस कुंड में स्नान करते हैं।

तवांग गोम्पा - तवांग जिले का गोम्‍पा बौद्ध मतावलंबियों (महायान शाखा) की आध्‍यात्‍मिक आस्‍था का सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण केन्‍द्र है। इसे एशिया का सबसे बड़ा बौद्ध गोम्‍पा माना जाता है। यह लगभग 350 वर्ष पुराना है। समुद्र तल से इस गोम्‍पा की ऊंचाई दस हजार फीट है। यहां पर 500 लामाओं के ठहरने की व्‍यवस्‍था है। यह भारत का अपनी तरह का सबसे बड़ा बौद्ध गोम्‍पा है। इसके आस-पास मोंपा और शेरदुक्‍पेन जनजाति के लोग निवास करते हैं। यह गोम्‍पा इन बौद्ध धर्मावलंबियों की आस्‍था का सबसे बड़ा केन्‍द्र है। यह तवांग घाटी में बर्फीली पर्वत चोटियों से घिरा हुआ और हरित वनों के मध्‍य में स्‍थित है। इसकी स्‍थापना मेरा लामा ने सत्रहवीं शताब्‍दी में कराई थी। इस किलेनुमा गोम्‍पा में पुस्‍तकालय भी है जिसमें दुर्लभ पुस्‍तकें और प्राचीन अभिलेख सुरक्षित हैं। ऐसा कहा जाता है कि इस गोम्‍पा के शिलान्‍यास के समय मेरा लामा ने तामदिंग (घोड़ों के भगवान) के सम्‍मान में एक भव्‍य समारोह का आयोजन किया था। उस समय से यह क्षेत्र तवांग (ता=घोड़ा) के नाम से विख्‍यात हुआ। तवांग नाम की उत्‍पत्‍ति के संबंध में एक अन्‍य कथा भी प्रचलित है जिसके अनुसार मेरा लामा अपने घोड़े पर सवार होकर आए और इस जगह पर आकर उन्‍होंने अपना घोड़ा रोक दिया और घोड़ा रोककर लोगों को आशीर्वाद दिया।(ता=घोड़ा,बोंग=आशीर्वाद)। एक दूसरे आख्‍यान के अनुसार बौद्ध मठ के लिए मेरा लामा जगह का चुनाव नही कर पा रहे थे। एक दिन उनका घोड़ा इस स्‍थान पर आकर रुक गया और इस प्रकार बौद्ध गोम्‍पा के लिए स्‍थान के चयन की अनिश्‍चितता दूर हो गई।(ता=घोड़ा, वांग=चुनना)। अरुणाचल की बौद्ध मतावलंबी जनजातियों के लिए तवांग गोम्‍पा धार्मिक-सांस्‍कृतिक गतिविधियों का केन्‍द्र है। मठ इनकी आध्‍यात्‍मिक चेतना का विराम है। घने जंगल के मध्‍य में स्‍थित यह बौद्ध मठ अपने प्राकृतिक सौंदर्य और उत्कृष्ट वास्‍तुकला के लिए भारत ही नहीं बल्‍कि एशिया में भी प्रसिद्ध है। पर्यटकों में यह छुपे हुए स्वर्ग के नाम से लोकप्रिय है। पर्यटक यहाँ पर ख़ूबसूरत चोटियाँ, छोटे-छोटे गाँव, शानदार गोम्पा, शांत झील और अन्य बहुत कुछ देख सकते हैं। इनके अलावा यहाँ पर इतिहास, धर्म और पौराणिक कथाओं का सम्मिश्रण भी देखा जा सकता है। यहाँ से पूरी त्वांग-चू घाटी के ख़ूबसूरत दृश्य देखे जा सकते हैं। तवांग मठ दूर से क़िले जैसा दिखाई देता है। तवांग मठ के पास एक जलधारा बहती है। यह जलधारा बहुत ख़ूबसूरत है। यहाँ से मठ के लिए जल की आपूर्ति होती है। तवांग मठ का प्रवेश द्वार दक्षिण में है जिसे काकालिंग कहते हैं। काकालिंग देखने में झोपडी जैसा लगता है और इसकी दीवारों के निर्माण में पत्थरों का प्रयोग किया गया है। इन दीवारों पर ख़ूबसूरत चित्रकारी की गई है जो पर्यटकों को बहुत पसंद आती है।

रोइंग- रोइंग अरुणाचल प्रदेश के सबसे महत्वपूर्ण पर्यटन स्थलों में से एक है। यह लोअर दिबांग वैली जिले में स्थित है। इसका प्राकृतिक सौन्दर्य दुनिया के सभी हिस्सों से पर्यटकों को आकर्षित करता है। प्रकृति प्रेमियों, पुरातत्वविदों और साहसी खोजकर्ताओं के लिए यह स्थल मनोहर, शिक्षाप्रद और रोचक है। यहाँ अनेक झील और झरने हैं। शांति की तलाश करनेवाले पर्यटकों के लिए यह एक उपयुक्त स्थान है। यहाँ के शांत वातावरण में कुछ पल व्यतीत कर नई ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है।

बोमडिला- बमडिला अरुणाचल का एक छोटा शहर है जो पूर्वी हिमालय की विशाल पर्वतमाला के बीच में स्थित है। यह अरुणाचल प्रदेश राज्य के पश्चिम कामेंग जिले का मुख्यालय है। बोमडिला के बर्फ से ढके पहाड़ हिमालय का मनोरम दृश्य पेश करते हैं। यह अरुणाचल प्रदेश राज्य के उत्तर-पश्चिमी भाग में समुद्र तल से 2,530 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। बोमडिला अपने प्राकृतिक सौन्दर्य के साथ- साथ अपने बौद्ध मठों और सेब ऑर्किड के लिए प्रख्यात है। यहाँ जुलाई और सितंबर के बीच भरपूर वर्षा होती है। यहाँ यात्रा करने का सर्वोत्तम समय अप्रैल और अक्टूबर के बीच है। बोमडीला का कोई लिखित इतिहास उपलब्ध नही है लेकिन कहा जाता है कि मध्यकाल में यह तिब्बत का हिस्सा था। भूटान और स्थानीय आदिवासी शासकों ने समय-समय पर यहाँ शासन किया। असम के अहोम शासकों ने स्थानीय जनजातियों के शासन में कोई हस्तक्षेप नहीं किया। अंग्रेजों ने 1873 में अरुणाचल प्रदेश के इस क्षेत्र को वर्जित क्षेत्र घोषित किया था। 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही यह क्षेत्र भारत और चीन के बीच विवाद का कारण बना हुआ है। चीन ने 1962 में बोमडिला के आसपास के क्षेत्र पर हमला किया, लेकिन बाद में अपनी सेना वापस ले ली। बोमडिला के आसपास के क्षेत्रों में कई ट्रेकिंग और लंबी पैदल यात्रा ट्रेल्स हैं जो रोमांच प्रेमी खिलाडियों और पर्यटकों को आकर्षित करती हैं। तवांग शहर बोमडिला के उत्तर में स्थित है और बोमडिला से तवांग तक की यात्रा प्रकृति को निकट से जानने का अवसर प्रदान करती है। इसके पास हवाई अड्डे या रेलवे स्टेशन नहीं है। स्थानीय बस या जीप द्वारा तेजपुर शहर से बमडिला पहुंचा जा सकता है। यह सड़क द्वारा अरुणाचल प्रदेश और असम के अन्य शहरों से जुड़ा हुआ है। यदि आप हिमालय पर्वत श्रृंखला का आश्चर्यजनक हिमपात देखना चाहते हैं तो बोमडिला एक उपयुक्त जगह है। यहाँ का शांत वातावरण और सुंदर परिवेश प्रकृति से हमारा साक्षात्कार कराता है। बोमडिला का हस्तशिल्प अत्यंत मनमोहक होता है।

जिरो - जिरो घाटी को आपातानी घाटी के रूप में जाना जाता है। यह आपतानी समुदाय का निवास क्षेत्र है। इसे विश्व विरासत स्थल के रूप में घोषित किया गया है। जिरो अरुणाचल प्रदेश के कुछ सर्वोत्तम पर्यटन स्थलों में से एक है। यहाँ तैली घाटी, वन्य जीव अभयारण्य देखने योग्य है। अन्य अरुणाचली जनजातियाँ जहां झूम खेती करती हैं, आपातानी लोग स्थायी खेती करते हैं। इनके पास खेतों की सिंचाई करने की उत्तम कृत्रिम व्यवस्था है। आपातानी घाटी को चावल का प्याला कहा जाता है। यहाँ सैकड़ों वर्षों से धान -सह -मछली पालन किया जाता है।

पासीघाट - अरुणाचल प्रदेश के सबसे पुराने शहर पासीघाट को वर्ष 1911 में अंग्रेजों ने स्थापित किया था। यह अरुणाचल प्रदेश का प्रवेश द्वार है। पूर्वी सियांग जिले का मुख्यालय पासीघाट तुलनात्मक रूप से एक विकसित शहर है। यह सियांग नदी के तट पर स्थित है और समुद्र तल से 155 मीटर ऊपर है। इस जगह को प्रकृति की ओर से भरपूर आशीर्वाद प्राप्त हुआ है। तिब्बत से पासीघाट होकर भव्य नदी ब्रह्मपुत्र बहती है। आदी समुदाय के आगमन से पहले पासीघाट दिबु-मारंग लोगों का निवास स्थान था। कुछ लोगों का मानना है कि उन्नीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक या नोएल विलियमसन की पहली यात्रा के दौरान ब्रिटिशों के आगमन के बाद शहर को 'पासीघाट' नाम दिया गया। वे कहते हैं कि 'पासीघाट' आदी जनजाति की उप-जनजाति 'पासी' शब्द से उत्पन्न हुआ है। डॉ डाईंग इरिंग के नेतृत्व में इस क्षेत्र में विकास और सामाजिक परिवर्तन के एक नए युग का सूत्रपात हुआ। 1960-80 के दशक में आदी समुदाय में अनेक बुद्धिजीवी उत्पन्न हुए जिन्होंने अपने नेतृत्व कौशल से राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक और धार्मिक सभी क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाई एवं इस शहर के विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। वर्ष 1964 में पासीघाट में जे.एन. कॉलेज की स्थापना न केवल पासीघाट बल्कि पूरे अरुणाचल प्रदेश के इतिहास की महत्वपूर्ण घटना थी। यह कॉलेज पूरे राज्य के लिए प्रेरणा स्रोत साबित हुआ। इस कॉलेज ने कई नेताओं, नौकरशाहों, वकीलों, शिक्षाविदों, पत्रकारों, शासकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को पैदा किया। पांगिन और डेयिंग एरिंग वन्यजीव अभयारण्य यहां के दो प्रमुख आकर्षण हैं।

अनिनी- अनिनी अरुणाचल प्रदेश के सबसे मोहक स्थानों में से एक है। यद्यपि इस जगह के इतिहास का पूर्ण उद्घाटन नहीं हुआ है तथापि ऐसा माना जाता है कि ईदू मिशमी समुदाय तिब्बत से आकार यहाँ बसे थे। ऐसी मान्यता है कि राजा भीष्मक की पुत्री और भगवान श्रीक़ृष्ण की पत्नी रुक्मिणी ईदु मिश्मी जनजाति की थी। यह शहर शक्तिशाली ब्रह्मपुत्र नदी की दो सहायक नदियों के बीच एक पठार के ऊपर स्थित है। समुद्र तल से ऊंचाई के कारण इस शहर की जलवायु पूरे वर्ष सुखद रहती है। यहाँ कई प्राकृतिक और मानव निर्मित पर्यटन स्थल हैं।

दापोरिजो- दापोरिजो अरुणाचल प्रदेश के अपर सुबनसिरी जिले का मुख्यालय है। हरित पहाड़ियों से घिरा यह अरुणाचल प्रदेश का एक सुंदर शहर है। 'दापो' का अर्थ सुरक्षा अथवा अवरोध है और 'रिजो' का अर्थ घाटी है। दापोरिजो का अर्थ घाटी को महामारी या बुरी शक्तियों से "सुरक्षा" करना है। यह तागिन जनजाति का निवास क्षेत्र है। तागिन के अतिरिक्त यहाँ गालो, हिलमिरी, मिश्मी समुदाय के लोग रहते हैं। दापोरिजो समुद्र तल से 600 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह अरुणाचल प्रदेश की प्रमुख नदियों में से एक सुबनसिरी नदी के निकट स्थित है जो ब्रह्मपुत्र की एक प्रमुख सहायक नदी है। सुबनसिरी नदी शहर का एक विशाल दृश्य प्रस्तुत करती है। एलोंग - जिरो मार्ग पर अवस्थित यह शहर एक ही स्थान पर विविध जातीय संस्कृतियों के मिलन स्थल के लिए जाना जाता है।

तेजु- अरुणाचल प्रदेश में तेजु एक प्रमुख पर्यटन स्थल है। नदियों और घाटियों से आच्छादित इस शहर का प्रकृति ने श्रृंगार किया है। यह लोहित जिले का मुख्यालय है। लोहित जिले में प्रमुख रूप से मिश्मी जनजाति के लोग निवास करते हैं। अद्भुत झीलों, धार्मिक स्थलों और वन्यजीव अभ्यारण्य तेज़ू के महत्वपूर्ण आकर्षण हैं। प्राचीन हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार कृष्णा की पत्नी रुक्मिणी मिश्मी समुदाय की थी। मिश्मी लोग भगवान रिंग्याजाममल्लू की पूजा करते हैं। वे हर साल 15 फरवरी को तमलादु त्यौहार मनाते हैं। परशुराम कुंड एक प्रमुख हिंदू तीर्थ स्थान है जहाँ मकर संक्रांति के अवसर पर हजारों हिंदू तीर्थयात्री कुंड में स्नान करते हैं। मोहनबारी हवाई अड्डे से तेज़ू की दूरी 154 किलोमीटर है। इसके अलावा डिब्रूगढ़ से तेज़ू तक हेलीकाप्टरों के जरिए यात्रा का आनंद लिया जा सकता है। सड़क द्वारा भी तेजु अन्य शहरों से जुड़ा हुआ है। ग्लो झील बर्फ आच्छादित पर्वतों से घिरा हुआ है। हरे रंग की पृष्ठभूमि के कारण झील का सौंदर्य और आकर्षण बढ़ जाता है। यह झील लगभग 5000 फीट की ऊंचाई पर वाक्रो अंचल में स्थित है। आठ वर्ग किलोमीटर का यह क्षेत्र पक्षियों, फूलों और अन्य खूबसूरत प्रजातियों से समृद्ध है। झील को जोड़ने वाली अच्छी सड़क नहीं होने के कारण इसका उचित विकास नहीं हो सका है। वालोंग एक ऐतिहासिक स्थल है। यह बांस से घिरा हुआ है। वालोंग तेज़ू से 200 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। 1094 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस स्थल का अवलोकन पर्यटकों को जीवन का अविस्मरणीय अनुभव देता है। नमती घाटी प्रसिद्ध पर्यटन स्थलों में से एक है। यहाँ वर्ष 1962 में भारतीय सेना ने चीन के साथ युद्ध किया था। तेजु जिला संग्रहालय और क्राफ्ट सेंटर में परम्परागत कला कृतियाँ देखि जा सकती हैं। यहाँ आदिवासियों की परंपराओं और संस्कृति को दर्शाया गया है। इसका निर्माण 1956 में किया गया था। पेंटिंग, गहने, लेखन, हथियार, वेशभूषा इत्यादि के साथ -साथ यहाँ हस्तशिल्प के नमूने संगृहीत हैं। इस संग्रहालय के निर्माण का मुख्य उद्देश्य जनजातियों की पारंपरिक कला और परंपरा को संरक्षित करना है। तेजु में डी एरिंग मेमोरियल वन्यजीव अभयारण्य भी महत्वपूर्ण दर्शनीय स्थल है। डी 'एरिंग मेमोरियल वन्यजीव अभयारण्य को पहले लाली वन्यजीव अभयारण्य के रूप में जाना जाता था। इसका निर्माण 1976 में किया गया था। अभयारण्य का क्षेत्रफल करीब 190 वर्ग किलोमीटर है। यहाँ विभिन्न प्रजाति के पशु- पक्षी पाए जाते हैं, जैसे- हॉग हिरण, हाथी, सांबर हिरण, शेर और जंगली पग। अभयारण्य विभिन्न प्रकार के पक्षियों के लिए प्रसिद्ध है। कुछ दुर्लभ पक्षी भी यहाँ संरक्षित हैं जिन्हें विलुप्त होने का खतरा है। तेजु बॉटनिकल गार्डन 23 हेक्टेयर के एक क्षेत्र में फैला है। यहाँ विभिन्न पौधों के साथ ही कुछ असाधारण प्रजातियों के पेड़- पौधे भी पाए जाते हैं। पौधों और जड़ी-बूटियों की खेती और सुरक्षा बहुत मुश्किल है जिसमे विशेष ज्ञान और अनुभव की आवश्यकता होती है। यहाँ पौधों और जड़ी-बूटियों की खेती और संरक्षण के कई तरीके भी सिखाए जाते हैं।

खोंसा- खोंसा अरुणाचल प्रदेश के तिरप जिले का मुख्यालय है और हिमालय पर्वतमाला से घिरी तिरप घाटी में स्थित है। जलधाराओं, गहरी घाटियों, घने जंगलों और बर्फ से आच्छादित पहाड़ियों से घिरा यह छोटा -सा शहर प्रकृति का अनुपम वरदान जैसा है। समुद्र तल से लगभग 1,215 मीटर की औसत ऊंचाई पर स्थित खोंसा एक सुंदर पहाड़ी स्टेशन है जिसके चारों तरफ प्राकृतिक सौन्दर्य बिखरा पड़ा है। इसके पूर्व में म्यांमार और दक्षिण में असम राज्य स्थित है। खोंसा उत्तर-पूर्व का एक महत्वपूर्ण सैन्य क्षेत्र है। पास में ही खेती और लाजो नामक आदिवासी गांव हैं जहाँ आदिवासी लोगों के जीवन और संस्कृति की झलक मिलती है। यदि तिब्बती संस्कृति का अनुभव प्राप्त करना हो तो मियाओ अवश्य जाना चाहिए जो चंगलांग जिले में खोंसा से लगभग 154 किमी की दूरी पर स्थित है।


चांगलांग- चांगलांग अरुणाचल प्रदेश के एक जिले का नाम है जिसका मुख्यालय भी चांगलांग है। पौराणिक कथा के अनुसार चांगलांग का मूल नाम स्थानीय भाषा में "चांगलांगकन" है जिसका अर्थ पहाड़ी स्थल होता है जहां लोगों ने विषैली जड़ी -बूटी की खोज की। उस विषैली जड़ी का उपयोग नदी में मछली को विष देने के लिए किया जाता है। चांगलांग जिले के उत्तर में लोहित जिला और असम का तिनसुकिया जिला, पश्चिम में तिरप जिला और दक्षिण-पूर्व में म्यांमार स्थित है। पटकई बुम हिल्स नागालैंड तक पहुंचनेवाले ग्रेटर हिमालय का विस्तार हैं जो चंगलांग और म्यांमार के बीच प्राकृतिक अवरोधक का कार्य करता है। यह जिला तांगसा, नोक्ते, सिंह्फो और लिसू जनजाति का निवास क्षेत्र है। चांगलांग में नोआ-दिहिंग, नामचिक, तिरप, नमफुक, दफा, नमफई, टिसू, तारित, तारा, टिकेंग और टिगिंग नदियां प्रवाहित होती हैं जिनमें से अधिकांश अंततः बुरी-दिहिंग नदी में मिल जाती हैं। चांगलांग वनस्पतियों और जीवों की विभिन्न प्रजातियों से समृद्ध है। पर्यटन का मुख्य आकर्षण नामदफा राष्ट्रीय उद्यान है। नामदफा राष्ट्रीय उद्यान में लगभग 96 स्तनधारी प्रजातियां, 453 एवियन प्रजातियां और 50 सरीसृप प्रजातियां हैं। डिब्रूगढ़, तिनसुकिया, मार्गरीटा और मिआओ से सड़क मार्ग द्वारा चांगलांग जा सकते हैं। शहर का निकटतम हवाई अड्डा डिब्रूगढ़ है और निकटतम रेलवे स्टेशन तिनसुकिया है। यात्रा के लिए नवंबर से फरवरी तक का मौसम सर्वोत्तम है।

संपर्क:103, नवकार्तिक एपार्टमेंट, जी एच – 13, सेक्टर-65, फरीदाबाद-121004


मोबाइल- 9868200085, ईमेल:- bkscgwb@gmail.com

पत्र


सुरेश चंद्र

1.#प्यारी बिटियाँ के नाम मेरा दूसरा पत्र-

#प्यारी हिनू

आज जब ये पत्र लिख रहा हूँ,पता है तुम्हारे पापा बहुत डरे हुए है।आज खेलते - खेलते तुम्हारा अचानक यूं साँस रोक लेने ने पहली बार तुम्हारे पापा को भीतर तक डरा दिया है।तुम्हारे नीले पड़ते चेहरे ने न जाने कितने ही बुरे सपनों को एक ही पल में मेरी आँखों के सामने ला दिया और उस पल ने मुझे सबसे बेबस इंसान बना दिया।

पता नही बिटियाँ तुमसे ये कैसा जुड़ाव है कि उड़ गई है मेरी नींद और भूल गया हूं सब कुछ आज अपना, सिर्फ तुम ही रह गई हो शेष, मेरे भीतर तक।जानती हो हिनू कितनी पूजा और प्रार्थना के बाद तो पाया है तुमको और तुम्हारा यूँ इस तरह डराना बिल्कुल अच्छा नही लगता तुम्हारे पापा को।

प्यारी बिटियाँ तुम्हारे अपनी माँ के गर्भ में आने के बाद से लेकर मेरी ऐसी कोई कल्पना या कहानी नहीं रही जिसमे की तुम शामिल नही रही हो, फिर तुम्हारे बिना खुद की कोई कल्पना कैसे कर सकता हूँ।

आज उस ईश्वर के प्रति मेरी आस्था और बढ़ गई है जिसने 8 नवंबर को मेरे आंगन में तुमको भेजा और आज तुम्हारी साँसों को तुम्हे फिर से लौटाकर मुझे दुनियाँ भर की खुशी लौटा दी।

बड़े- बड़े दार्शनिक और विद्वान कहते है कि "ज्यादा मोह दुःख का कारण बनता है,किसी से भी ज्यादा जुड़ाव नही रखना चाहिए।"पर क्या करूँ बिटियाँ मै तो सिर्फ तुम्हारा पिता हूँ और इस पिता का अपनी हिनू से जुड़ाव किसी दार्शनिक का कथन नही रोक सकता।

अंत मे सिर्फ इतना ही कि बिटियाँ की तुम्हे मेरी सारी उम्र लग जाये,मेरी सारी खुशियाँ तुम्हारी हो जाये और बस तुम्हारे बिना कुछ नहीं।तुम सदैव खुश रहो।

सुरेश 29/8/18 1:30AM

2.#प्यारी हिनु तुम्हारे पापा का तुम्हारे लिए एक पत्र-

प्यारी हिनु

8 नवंबर 2017 को तुम्हारा जन्म हुआ,और मेरा जीवन अनगिनत खुशियों से भर गया।नींद में तुम्हारी प्यारी हँसी हँसा देती है मुझे भी भीतर तक,ओर तुम्हारा रोना कर देता है विचलित हम सभी को।तुम्हारे नंन्हे नन्हे पाव जब हवा में अठखेलिया करते है तो लगता है जैसे बड़े से बड़े धावक को भी पीछे छोड़ दोगी तुम।तुम्हारे नन्हे तलवे जब छुआता हु अपने चेहरे से तो लगता है जैसे दुनिया के सबसे कोमल फूल छू रहे हो मुझे।तुम्हे जब गोद मे लेता हूं तो तुम्हारा मेरी तरफ यूं प्यार से ऐसे देखना कर देता है मुझे तुम्हारे प्यार में सरोबार ओर मेरे कंधे पर तुम्हारा सिर रखकर लिपट कर सोना ऐसा लगता है कि बस ये क्षण कभी समाप्त न हो।

लोग कहते है बदल गया हूं मैं सच ही तो है कोई कैसे न बदले तुम्हारे जैसी प्यारी सी बिटियां को पाकर,ओर फिर इस दुनिया मे कितना मुश्किल है न अपने मन का होना, आप जो चाहो वो आपको मिल जाये।8 नवंबर को मुझे वो सब कुछ मिल गया जो ईश्वर से मांगी जाने वाली मेरी हर प्रार्थना में शामिल था।

जानती हो हिनु जन्म के बाद दी जाने वाली पहली गुटकी(घी और गुड़ का मिश्रण) तुम्हारी नानी के कहने पर मैने ही तुमको दी थी।और अब घरवाले कहते है की तुम मेरे जैसी ही होने वाली हो।कोई तुम्हारे नाक से तो कोई तुम्हारी छोटी सी ठोड़ी से तुम्हारी ओर मेरी समानता को जोड़ता रहता है।और इन बातों को सुनकर तुम्हारे पापा खुशी से ओर मोटे होते जा रहे है।

प्यारी हिनु तुम सदैव खुश रहो तुम जीवन को पूरे आंनद से जियो अपने सपने खुद बुनों ओर उन्हें साकार करो।जीवन मे आने वाली समस्याओं से लड़ना सीखो ओर अपने तरीके से उन समस्याओं को हल करना सीखो।तुम सदैव सामना करना सीखो भागना नही।

कुछ दिनों बाद जब होली आ रही है और हमारे यहाँ छोटे बच्चों की ढूंढ की परंपरा है परन्तु लोग कहते है की सिर्फ लड़को की ही ढूंढ होती है तो बिटियां बताना चाहता हूं की इस बार तुम्हारे ढूंढ की तैयारी भी पूरी है और सभी को निमंत्रण है इस नई परंपरा की शुरुआत पर।

प्यारी बिटियाँ तुम सदैव खुश रहो तम्हारी खुशी तुम्हारे माता पिता के लिए खुश रहने की सबसे बड़ी वजह है।

तुम्हारा पिता

सुरेश

25/2/18.


धन्यवाद।

जालोर(राजस्थान)

Mob.8290711762

जीवनी

हिन्दी लेखक निर्मलवर्मा : व्यक्ति एवं रचना

आचार्य. एस.वी.एस.एस.नारायण राजू,

अध्यक्ष, हिंदी विभाग, प्रवक्ता, हिंदी विभाग,

तमिलनाडु केंद्रीय विश्‍वविद्यालय,

नीलक्कुडी, तिरुवारूर-610 005

तमिलनाडु, भारत।


www.drnarayanaraju.blogspot.com www.thehindiacademy.com

जीवन परिचय :

किसी भी रचनाकार की रचनाओं का मूल्यांकन करने से पूर्व उसके व्यक्तिगत जीवन का परिचय प्राप्त करके व्यक्तित्व का विश्लेषण कर लेना अत्यंत समीचीन होता है। क्योंकि रचना रचनाकार के व्यक्तिगत जीवन की अर्जित अनुभूतियों, स्मृतियों एवं कल्पनाओं की अभीव्यक्ति है। रचनाकार का व्यक्तित्व जितना सशक्त एवं गौरवपूर्ण होगा उसकी रचनाधर्मिता उतनी ही चमत्कृत और रसपूर्ण होगी।

स्वातत्रंता के बाद भोगे हुए यथार्थ और कराहती हुई मानवीय संवेदना का हृदय उदारक चित्र साहित्यकारों ने खींचा वह हिन्दी साहित्य में अविस्मरणीय हैं। निर्मलवर्मा जी के उपन्यासों में आधुनिक मानव के चरमराते जीवन और उसकी छटपटाह्ट, संवेदना की गहराई और सूक्ष्म निरीक्षण दिखाई देती है। विदेशी प्रसंगों के वातावरण-शराब और सेक्स का नशा मात्र उन्होंने नहीं खींचा या उनका उपयोग केवल विदेशीपन की छोंक लगाने के लिए नहीं किया, बल्कि हिन्दी उपन्यास और कहानी साहित्य को इन्होंने एक नया रूप और एक नया आयाम दिया।

लेखक का किसी सामाजिक-राजनीतिक आन्दोलन से जुड़े होना स्वयं अपने से जुड़े होना हैं। जो लेखक सही अर्थों में प्रतिबद्ध होता है, प्रतिबद्ध उसके लिए आदर्श या त्याग या समाजसेवा की समस्या न कर अपनी ही सृजन-प्रक्रिया की एक अनिवार्य शर्त बन जाती है। इस सम्बन्ध में निर्मलवर्मा जी का कथन है कि “मैं प्रतिबद्ध होकर लिख रहा हूँ।”1

सौम्य मितभाषी (किन्तु जहाँ सिद्धान्तों की टकराहट हो वहाँ दृढ़)। अपने बारे में उन्होंने ही अपने शब्दों में “मुझमें चाहे कोई आकर्षण न हो, लेकिन किसी लुटी-पिटी ‘बार’(Bar) या ‘पब’ (Pub) में पियक्कड़ों को या ऐसे ‘तलछती‘ प्राणियों को, जो बहुत गहरे में जा चुके हो-अपनी तरफ खींचने की अद्भुत क्षमता रही है। मुझे देखते ही वे मेरी मेज के ईर्द-गिर्द बैठ जाते थे। You are a Quiet Indian, are not you? (बाद में उनके बीच में लम्बे अर्से तक इसी नाम से प्रसिद्ध रहा) उनकी ऊपर से अनर्गल दीखनेवाली आत्मकथाओं में मुझे पहली बार उस अन्धेरे कोनों से साक्षात्कार हुआ, जिन्हें मैं छिपाकर रखता आया था। आज मैं जो कुछ है, उसका एक हिस्सा इन अज्ञात लोगों की देन है।“2

पुराने स्मारक और खँडहर हमें उस मृत्यु का बोध कराते हैं जो हम अपने भीतर लेकर चलते है। बहता पानी उस जीवन का बोध कराता है जो मत्यु के बावजूद वर्तमान है, गतिशीत हैं, अन्तहीन है। संकट की घड़ी में अपनी परम्परा का मूल्यांकन करना एक तरह से खुद अपना मूल्यांकन करना है, अपनी अस्मिता की जड़ों को खोजना है। हम कौन है - यह एक दार्शनिक प्रश्न न रहकर खुद अपनी नियती से मुठभेद करने का तात्कालिक प्रश्न बन जाता है। केवल अनुभव सीधे रचना में नहीं उतरता, वह स्मृति के माध्यम से रचना में आकर ढ़लता है। “कोई भी रचना न पूर्ण रुप से स्वतंत्र है, न पूर्ण रूप से उपज, बल्कि जिस सेंकरे दरवाजे से लेखक खुद नहीं गुजर सकता, उनकी रचना अपने को एक अदृश्य छाया सी उस दरवाजे के अनुकूल समेट कर रास्ता बना लेती है।”3

जन्म और बचपन :

हिन्दी के प्रमुख उपन्यासकार निर्मलवर्मा जी का जन्म सन् १९२९ में शिमला में हुआ और बचपन का बड़ा हिस्सा पहाडों पर ही बीता। निर्मल वर्मा के बचपन के बारे में उन्होंने अपने ही शब्दों में कह रहे है कि “शिमला के वे देन आज भी नहीं भूला हूँ। सर्दियाँ शुरुहोते ही शहर उजाड़ से जाता था। आस-पास के लोग बोरिया-बिस्तर बाँधकर दिल्ली की ओर ‘उतरायी’ शुरू कर देते थे। बरामदे की रेलिंग पर सिर टिकाये हम भाई-बहन उन लोगों को बेहद ईष्या से देखते रहते जो दूर अजनबी स्थानों की ओर प्रस्थान कर जाते थे। पीछे हमारे लिए रह जाते थे, चीड़ के साँय-साँय करते पेड, खाती भुतहे मकान, बर्फ में सिमटी हुए स्कूल जाने वाली पगडण्डी। उन सूनी, कभी न खत्म होनेवाली शामों में हम उन अनजाने देशों के बारे में सोचा करते थे - जो हमेशा दूसरों के लिए हैं, जहाँ हमारी पहुँच कभी नहीं होगा। तब कभी कल्पना भी नहीं की थी कि एक दिन अचानक अपने छोटे-से कमरे, ग्रामफोन, कागज पत्रों को छोडकर बरसों ‘सात समुद्र पार’ करना होगा।“4

उन्होंने ने अपने शब्दों में ”पहाडी मकानों की एक खास निर्जन किस्म की भुर्तेली आभा होती है। इसे शायद वही समझ सकते हैं, जिन्होंने अपने अकेले साँय-साँय करते बचपन के वर्ष-बहुत से वर्ष एक साथ पहाड़ी स्टेशनों पर गुजार हों।“5

निर्मल वर्मा जी को हमेशा अपनी रचनाओं में यह महसूस होता हैं कि हर चीज की जड़ में साधारण लोगों की जिन्दगी है। कभी-कभी उनको यह विचार काफी दुःख देता है कि हम वास्तविक जिन्दगी में नहीं हैं - उनका मतलब है कि रंग और प्लास्टर में काम करने से कहीं ज्यादा बेहतर है खून और हाड़-मांसवाला काम करना, तसवीरें बनाने से कहीं अधिक सुखदायी है, बच्चों को जन्म देना या किसी व्यापार में लग जाना। लेकिन इसके बावजूद जब उन्होंने यह सोचता है कि “मेरी ही तरह मेरे कई दोस्त वास्तविक जिन्दगी के बाहर हैं, तो मैं फिर से अपने को जीवित महसूस करने लगता हूँ।"6

स्वयं उन्हें अपनी स्थिति की विड़म्बन का तीखा और सजग एहसास है - “लगता है जैसे हम परम्परा और आधुनिता के हाशिये पर जी रहे हैं। न एक में हमारा घर है, न दूसरे में हमारी सुरक्षा।”7 वे यह भी कहते हैं - “जैसे मेरी चेतना के बीचों-बीच एक फाँक खिंच गई है, एक तरफ आधुनिक अनुभव, जो मेरे वास्तविक यथार्थ को प्रतिध्वनित करता है दूसरी तरफ अखंडित संपूर्णता का अनुभव है, जिस में मेरी संस्कृति का स्वप्न छिपा है।”8

इतिहास और स्मृति निर्मलवर्मा के प्रिय वस्तु है। निर्मलवर्मा के चिंतन में इतिहास के ठोस और विशिष्ट अनुभव है। उनकी पूर्व पश्चिम के द्धन्द्ध में, परम्परा में, औपनिवेशिक और उत्तर औपनिवेशिक परिस्थिति में सुपरिभाषित अवस्थिति है। वहाँ परम्परा इसी स्मृति का अंग है, बल्कि स्मृति को सहजने और समझने का साधना के बिना कोई गहरा या वस्तुपरक विश्लेषण किये, बरसों से निर्मलवर्मा को भारत-व्याकुल, अध्यात्मवादी, पुनरुत्थानवादी आदि कहकर उन्हें हिन्दी के सब से सशक्त प्रतिक्रियावादी के रुप में विख्यात हुई।

उनके व्यक्तित्व के कारण वे जो बदलता है, जो बदलाव की मुद्रा के बावजूद नहीं बदलता है और जो बदलने से ठिठकता है, उस सबको अपनी रचना के तानेबाने में विन्यस्त करनेवाले लेखक है। वे परिवर्तन के चालू छद्म से बचते है, वे परिवर्तन के सूक्ष्म, लगभग अदृश्य सच की पहचान के कलाकार है।

शिक्षा :

निर्मलवर्मा के पिता जी अंग्रेजों के जमाने में सरकारी अफसर थे, तो उन्हें शिमला और दिल्ली में रहना पड़ता था। इसलिए उनका शिक्षा भी शिमला और दिल्ली में हुआ। दिल्ली विश्वविद्यालय के सुप्रसिद्ध कालेज सेण्ट स्टीफेन्स से इतिहास में सन् १९५२ या १९५३ में एम.ए करने के बाद कुछ वर्ष अध्यापन कार्य किया। चेखव की कहानियाँ और तुर्गनेव के उपन्यास से प्रभावित होकर आपने लिखना शुरू किया। उनके बड़े भाई राम कुमार। रामकुमार पेरिस में थे, तो वे उनको बराबर बड़े कलाकारों की किताबें, उनके केटलाग्स भेजते रहते थे।

विदेशी भ्रमण :

“मैं बरसों से अपने देश के बाहर रहा हूँ। इस से मेरे भीतर एक अलगाव-सा उत्पन्न हुआ है, जो मुझे कभी-कभी बोझ-सा जान पड़ता है। किन्तु दूसरी तरफ इसी ‘अलगाव' ने मुझे अपनी जातीय अस्मिता और संस्कृति को एक ऐसे कोण से देखने का अवसर दिया है, जहाँ भ्रम और भुलावे के लिए गुंजाइश बहुत कम है। मैं एक साथ अपने को बाहर और भीतर पाता हूँ। पश्चिम से मुझे एक तार्किक अन्तर्दृष्टि मिली है, जिसके सहारे मैं ने अपनी सस्कृति के मिथक-बोध, बिम्बों और प्रतीकों की गौर-तार्किक अन्तर्चेतना को परखने की चेष्टा की है, दूसरी तरफ मैं खुद इस अन्तर्चेतना का अंग हूँ, जिसके आधार पर मुझे आधुनिक तर्कशील तकनीकी सभ्यता के अन्तर्विरोधों का अहसास भी होता रहा है।“9

सन् १९५९ में पहली बार उन्हें प्राग जाना हुआ था। वह समय था जव चेकोस्लोवाकिया में सेंसरशिप, पुस्तकों पर पाबन्दियाँ और हर तरह का दमन अपनी चरम सीमा पर था। जिसे हम ‘स्टालिनिस्टिक टेरर' का समय कहते है, वह समय बहुत ही भयंकर रूप से मौजूद था। स्वाभाविक रूप से निर्मलवर्मा उन दिनों बहुत से चेक लेखकों से मुलाकात हुई। सन् १९६१-६२ के दौरान ही जब निर्मलवर्मा ने चेक भाषा का अध्ययन समाप्त किया और प्राग की चार्ल्स यूनिवर्सिटि में चेक साहित्य के लेक्चर्स में शामिल हुआ जब उन्होंने पहली बार पाया कि जिसे हम एक अधिनायक वादी व्यवस्था के भीतर सेंसरशिप का अस्तित्व कहते है वह कितना कमजोर और ढ़ीला है। निजी रिश्ते अनेक लेखकों से बनते गये, उन्होंने पाया कि इन बुरे वर्षों में भी वे बराबर रचनाशील रहे है। सन् १९६४ तक की चकोस्लोवाकिया की स्थिति के बारे में बताया। वहाँ सात वर्ष रहकर अनेक चेक उपन्यासों और कहानियों का अनुवाद किया। बाद में आप बीच के समय में लन्दन चले गये थे। इस विदेशी भ्रमण उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर गहरा प्रभाव पड़ा है। सन् १९७७ में अमेरिका में आयोजित इन्टरनेशनल राईटिंग प्रोग्राम में भाग लिया। इस प्रकार विभिन्न देशों में भ्रमण करने के कारण अपनी रचनाओं में विभिन्न देशों की सभ्यता और संस्कृति दर्शाती है।

साहित्य के प्रति रुचि :

निर्मल वर्मा का साहित्य और चिन्तन उत्तर-औपनिवेशिक समाज में कुछ बहुत मौलिक प्रश्न और चिन्ताएँ उठाता है, जहाँ कथाकथित सामाजिक यथार्थ का आतंक सा छाया रहा है और मुखर किस्म की सामाजिकता साहित्य को लगभग आत्महीन बनाने पर उतारू है, अगर निर्मलवर्मा अपनी रचना और चिन्तन में पूर्णता और पवित्रता, उनकी खोज और सत्यापन, उनकी उपस्थिति और अनुपस्थिति, उनके अन्त संघर्ष और तनाव को मूलाधार बनाते हैं।

साहित्य के सम्बन्धी निर्मलवर्मा का विचार है कि “हमारे देश में साहित्य ऐसी संकोचजनक स्थिति में है, एक भीड़-भरे कमरे में घुसने की स्थिति में है, जहाँ उसके लिए कोई जगह नहीं है और उसे या तो धर्म, या समाजशास्त्र या हमारी रुढ़ नैतिकता के साथ, बारी-बारी से उनकी सेवा करते हुए, आधी कुर्सी पर बैठना होता है।“10

निर्मलवर्मा का एक आत्मीय सम्बन्ध चित्रकला से बना। यह एक दिलचस्प प्रक्रिया होती है कि आप चित्रों में जो कुछ देखते है, थोड़ी-सी आदत और अभ्यास के बाद, प्रकृति का साम्य उसके साथ देखने लगते है। यह शायद कला का सब से बड़ा वरदान है। इस सम्बन्ध में निर्मल एक उदाहरण दिया कि - लगभग पाँच-छः वर्ष पहले उन्होंने इटेलियन सुर्रिचलिस्ट पेण्टर किरिको की एक पेंण्टिग एक किताब में देखी थी। किरिको मेरे बहुत प्रिय चित्रकार है। उस पेंण्टिग में एक लड़की पहिया घुमाती हुई दो सुनसान गलियों के बीच में चली आ रही है, गलियों के दोनों तरफ मकान है। इस पेण्टिग को मैं भूल गया था, लेकिन अपना नया उपन्यास (रात का रिपोर्टर) लिखते हुए वह चित्र मेरे दिमाग में जिस तरह से उभर आया वह मुझे एक तरह का चामत्कारिक रहस्योद्घाटन लगा। अन्त अनुशासनीयता की बात मुझे बहुत बनावटी लगती है लेकिन चित्रकला, संगीत और साहित्य की संवेदनाएँ अगर अनायास रूप में हमारे संवेदन तन्त्रों को परिष्कृत करती है तो यह अपने में अद्भुत चीज होती है।

सभी महत्वपूर्ण कलाकृतियाँ इस अन्तर्विरोध का अहसास कराती हैं - एक ओर लेखक की विश्वास करने की इच्छा और दूसरी ओर 'छद्म चेतना' के खिलाफ उसका संघर्ष जो विश्वासों को जन्म देती है। अपने व्यक्तिगत, अकेले अनुभव की एक ऐसी स्मृति में बदलने का संघर्ष, जिस में सबका साँझा है, जो अदृश्य देते हुए भी सब की चीज है, जिस से कोई भी रचना 'मिथ' की सार्वलौकिकता ग्रहण कर पाती हैं।

कलाकार के सम्बन्ध में निर्मलवर्मा का विचार हैं कि “मैं तुम से कहता हूँ कि उस मानवीयता का चित्रण करते हुए मैं थक गया हूँ, जिस में मेरा कोई हिस्सा नहीं - - - मैं दो दुनिया के बीच खड़ा हूँ और उनमें से किसी में भी मेरा घर नहीं है।“11

निर्मलवर्मा के चिन्तन में इतिहास के ठोस और विशिष्ट अनुभव है। उसकी पूर्व-पश्चिम के द्वन्द्ध में, परम्मरा में, औपनिवेशिक और उत्तर औपनिवेशिक परिस्थिति में सुपरिभाषित अवस्थिति है। निर्मलवर्मा पश्चिम के लोकतंत्र और सोवियत अधिनायक वाद को एक ही किस्म की आधुनिक सभ्यता के दो पहलू और मानद जाति मात्र के अस्तित्व केलिए खतरा मानते है।

सम्प्रेषणीयता की भावना प्रेम से उत्पन्न होती है - तभी ईसा मसीह के अनुसार जहाँ तीन-चार लोग भी मुझे चाहते हो, मैं वहाँ मौजूद हूँ। इस भीड़ को न ईसा मसीह की जरूरत थी, न रचनाकार की - उसकी जरुरत को एक व्यावसायिक, बाजारू लेखक आसानी से पूरा कर सकता था। आधुनिक लेखक की यह विडम्बना है कि सम्प्रेषणीयता सिर्फ अर्थ खोकर और सिर्फ सम्प्रेषणीयता खोकर प्राप्त किया जा सकता है, आज के तकनीकी समाज की विलक्षण देन है।

यह एक ऐसे संश्लिष्ट रूप की साधना स्थली है जो एक साथ आधुनिक भी हो और जिस में शब्द, सत्य और सौंदर्य तीनों को एक रूप, एक-दूसरे की शर्तों पर चरितार्थ किया जा सके। कला की उसकी शुद्धता की मुखर पक्षधरता करनेवाले हिन्दी लेखकों में निर्मलवर्मा शायद अकेले हैं, जिसके साहित्य में इस पक्षधरता के साथ-साथ नैतिकता, मर्यादा, पवित्रता, सत्य जैसे एक विशेष कोटि के प्रत्यय या भाव एक ओर बार-बार प्रकट होते है किन्तु दूसरी ओर जिन्हें किसी तरह की निश्चिन्त अवस्थिति का कोई सुख यहाँ उपलब्ध नहीं है। इनकी इस बेचैन उपस्थिति में ही यह साहित्य अपनी आत्मचेतना को रूपायित करता है।

लेखन के अलावा अन्य कलाओं में रुचि :

निर्मलवर्मा हिन्दी के उन विरले साहित्यकारों में है, जिन्हें लेखन के अलावा संगीत, चित्रकला तथा फिल्म में भी गहरी दिलचस्पी है। चित्रकला सम्बन्धी उसकी रुचि ‘साहित्य के प्रति रुचि' में बदल गया। उनकी एक कहानी ‘माया दर्पण' पर फिल्म बनी है। जिसे सन् १९७३ की सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार प्राप्त हुआ है। निर्मलवर्मा के सास्त्यि और सिनेमा सम्बन्धी अपने विचार “कोई भी कला-कृति, कविता, चित्र, फिल्म - अपने में अन्तिम रूप से सम्पूर्ण है। उसका सत्य और मर्म उसके माध्यम से अलग करना असम्भव है - बल्कि यूँ कहें, स्वयं माध्यम का चुनाव लक्ष्य की खोज के साथ जुड़ा है। इस दृष्टि में फिल्म का सत्य अनूदित करना उतना ही निरर्थक प्रयास है, जितना कविता के मर्म को शब्दों से अलग करके देखने की कोशिश करना। आश्चर्य की बात है कि साहित्य का मूल्यांकन करते समय हम उस कसौटी को अलग रख देते हैं - - जैसे एक विधा की कसौटी दूसरी विधा से अलग हो। यही से भ्रति उत्पन्न होती है। साहित्य और फिल्म के बीच सही रिश्ते को पहचान ने केलिए पहली शर्त इस भ्रान्ति से छुटकारा पाना है।12 मेरे विचार में “माया दर्पण - जैसी फिल्मों की सब से बड़ी उपलब्धि यह है कि उनमें ऐसे कोई सनसनीखेज ‘प्रयोग‘ नहीं मिलते जो बम्बई या हालीवुड फिल्मों के आभूषण हैं - अपने में वे अत्यन्त साही, चमत्कारहीन किन्तु अपनी दृष्टि में अत्यन्त ठोस और जीवन्त फिल्में है।“13

हर रचना का रूपाकार लेखक के जीवन की विषय-वस्तु द्धारा निर्धारित होता है और चूँकि यह विषय-वस्तु समय के तकाजों, चुनौतियों और निर्णयों के तन्तुजाल से बना है, स्वयं रूपाकार की खोज अपने जीवन में नैतिकता, सही शब्द, सही नाम की खोज से जुड़ जाती है।

निर्मलवर्मा के व्यक्तित्व पर धार्मिक प्रभाव :

धर्म का सम्बन्ध बचपन से ही उनका धार्मिक शिक्षाओं से है। धर्म से उनका सम्बन्ध वैसा ही रहा है जैसा किसी भी हिन्दू परिवार में लोगों का है। निर्मलवर्मा एक कथाकार जो कि भ्रम और यथार्थ के बीच काम करता है. यह उसके लिए सब से मूल्यवान अन्तर्दृष्टि है। इस अर्थ में ही इसे एक धर्मिक अन्तर्दृष्टि के रूप में स्वीकार करता है।

भाषिक प्रभाव :

निर्मलवर्मा ने हिन्दी को एक नई कथाभाषा दी है, उसी तरह से हिन्दी की नई चिन्तन-भाषा के विकास में उनकी मह्त्वपूर्ण भूमिका है। उनकी 'भाषा की ऐंद्रियता, सूक्ष्म से सूक्ष्म बखान भी कविता की तरह बिम्बों या स्मृतिचित्रों से करने की उनकी क्षमता, उनका शब्द संयम और मितव्ययता उनके कथा रूपों को एकाग्र भी बनाते है और साथ ही अनेकार्थी भी। वे अर्थों के बखान के नहीं, अर्थों की गुँजों और अनुगुजों के कथाकार है। वे अधिक बुनियादी और दूरगामी परिवर्तनों के धीमे-धीमे घटने या न घटने के साक्षी-लेखक है।

रचना संसार :

निर्मलवर्मा जी की साहित्यक फलक बहुत व्यापक है। उन्होंने पश्चिम सभ्यता को लेकर अनेक रचनाओं का सृजन किया। उन्होंने उपन्यास, कहानी, नाटक, निबन्ध, संस्मरण और अंग्रेजी लेखकों की रचनाओं का अनुवाद भी किया। उनकी रचनाओं में आधुनिकता बोध विस्तार रूप से दिखाई देता है। निर्मलवर्मा ने मनुष्य के अनुभव को बृहत्तर परिवेश में देखा। इसके लिए वे भारतीय और भारतेतर (यूरोपीय) संदर्भ लेते हैं। भारतीय संदर्भ हो या भारतेतर सब में पीडा अनुभूति मूल में एक ही है। यूरोप के मनुष्य की पीडा रंग-भेद की है तो भारतीय की वर्ग-भेद और वर्ण भेद की। इस तरह निर्मलवर्मा की मानवीय पीड़ा और संत्रास का एक Cosmos रचते हैं, जिस में रंग-भेद, पारिवारिक सम्बन्धों के तनाव, अजनबीपन, अकेलापन के शिकार मनुष्य का चित्र खींचते हैं।

उपन्यास : “वे दिन”

निर्मलवर्मा का 'वे दिन' आधुनिक संवेदना से सम्पन्न उपन्यास है। पश्चिम के अर्थहीन परिवेश में जिस छोटे सुख की तलाश इस उपन्यास में की गई है, वह आज के सन्दर्भ में गैरमौजूँ नहीं लगती। इसे रोमैंटिक नहीं कहा जा सकता क्योंकि तीन दिन के सम्पर्क में 'मैं' और 'रायना' का शारीरिक सुख रोमैंटिक अर्थ में प्रेम नहीं, बल्कि रोमानी प्रेम से अलग प्रेम की आधुनिकतावादी परिकल्पना है। अन्त में रायना के प्रति जो मोह उसमें उत्पन्न होता है, वह भावुकता न होकर 'मैं' का बचा हुआ वह मनुष्य है जिससे वह अलग हो गया है।

"जब मैं ने वे दिन लिखना शुरू किया था तो उसका स्थान विल्कुल अलग था। मैं रोम में एक महिला से मिला था। यह मेरी पहली बार अकेलापन और बहुत ही बेकारी के दिनों की स्थिति थी। मेरे पास पैसे भी नहीं थे और मै बहुत ही लुटे-पिटे होटल में ठहरा हुआ था। शाम को मैं काफी पीने गया तो वहाँ मुझे इंग्लैण्ड की ही एक महिला मिली। मेरी उनसे बातचीत होने लगी क्योंकि इटली में अंग्रेजी बोलनेवाले कम ही मिलते हैं। उन्होंने बताया कि वे एक 'टूरिस्ट ऑफिस' में काम करती हैं और यहाँ पर एक 'टूरिस्ट गाइड' के तौर पर आयी हुई है। बाद में उन्होंने मुझ से पूछा कि क्या आज शाम को मैं खाली हैं, तो मैं ने कहा कि हाँ मैं खाली हैं। लेकिन मैं गया नहीं क्योंकि मेरे पास इतने पैसे नहीं थे कि मैं उनको 'एण्टरटेन' कर सकता। मेरी बहुत इच्छा थी कि मैं शाम को उनसे मिलूँ, लेकिन मुझे लगा कि यह बहुत ही अजीब होगा कि मैं ने काफी भी उन्हीं के पैसों की पी थी और शाम का खाना भी उन्हीं के पैसों का खाऊँ और उनकी जगह अपने को ‘एण्टरटेन' करूँ। उस महिला का एक 'टूरिस्ट गाइड' के तौर पर रोम के रेस्तारों में मुझ से मिलना, मुझे तब तक याद रहा, जब तक मैं प्राग नहीं आ गया और जब मैं ने हिन्दुस्तान आकर वे दिन लिखना शुरू किया तो अजीब बात यह थी कि रोम में मिली उस महिला का एक गठित रुप प्राण शहर के परिप्रेक्ष्य में मेरे भीतर जन्म लेता है। शायद आपको यह दिलचस्प चीज लगेगी कि प्राग और एक व्यक्ति का पारस्परिक सम्बन्ध पूरे मूर्त और ठोस रूप में जब तक मेरे भीतर नहीं बना तब तक वे दिन के समूचे कथानक ने अपना आकार ग्रहण नहीं किया, हालाँकि उपन्यास का रिश्ता न तो रोम से है और न ही इस महिला से।''14

लाल टीन की छत :

आधुनिकता बोध के उपन्यासों की परम्परा में 'लाल टीन की छत' भी काफी प्रसिध्द है। इन में कही वैयक्तिक, तो कही पारिवारिक-सामाजिक विषमताओं का मुखर विरोध मिलता है। इस उपन्यास में एक वयःसन्धि को पार करती लड़की के अपने अन्तःकरण से बाहर निकलने की कहानी अंकित की गयी है, जिस में काम चेतना की अनुभूति लक्षित हुई है। इस उपन्यास में अस्तित्व की खोज में पात्र की सम्पूर्ण अनुभूतियाँ, संवेदना के धरातल पर तीव्रता से सामने आती हैं।

स्वयं उपन्यासकार अपने शब्दों में ही अभिव्यक्त किया कि - "काया ही एक ऐसा चरित्र है जो किसी एक खास लड़की को लेकर नहीं रचा गया बल्कि काया मेरे बचपन के सब स्मृति अंशों का एक पुंजीभूत चरित्र है तो यह ज्यादा सही होगा। काया निर्मलवर्मा केलिए एक रूपकात्मक अभिव्यक्ति रही है, बचपन के उन वर्षों के बदहवास और विक्षिप्त किस्म के अकेलेपन की जो हम हर बरस शिमला में बिताते थे। अकेली मेम या माँ या पिता या चाचा के चरित्र हैं ये सब भोगे हुए चरित्रों से सूत्र लेकर आये हैं। लामा और काया चरित्रहीन पात्र जो बचपन की स्मृति से उत्पन्न नहीं हुए, उस स्वप्न से उत्पन्न हुए जो हमारा बचपन है। वह शायद ऐसा पहला उपन्यास है जिस में निर्मलवर्मा सीधे-सीधे एक रेखा नहीं खींच सकता कि इनका सम्बन्ध इस एक खास स्मृति से हैं।''15

एक चिथड़ा सुख :

निर्मलवर्मा का उपन्यास 'एक चिथड़ा सुख' अपने ढेर सारे पात्रों के साथ उनके अधूरेपन की गाथा कहनेवाला एक नायक विहीन उपन्यास है। इसमें महानगर के पात्रों की भटकन तथा उनके अधूरेपन की संवेदना चित्रित हुई है। इस उपन्यास में महानगरीय जीवन की विसंगतियों का चित्रण हुआ है।

रात का रिपोर्टर :

निर्मलवर्मा का नया उपन्यास 'रात का रिपोर्टर' आज की राजनैतिक विसंगतियों के शिकार एक बुद्धिजीवी रिपोर्टर रिशी के मानसिक संकट का ब्यौरा है। व्यवस्था और स्वतंत्रता का परस्पर विरोध और तनाव आज के युग की मूल समस्या है। इनके पारस्परिक सम्बन्धों के बिगड़ने पर ही आपतकालीन स्थिति का आविर्भाव होता है। निर्मलवर्मा ने रात का रिपोर्टर में रिशी के द्वारा अपने आन्तरिक संकट और इस संकट के कारण स्वयं अपने जीवन और अपने निकटतम व्यक्तियों के साथ अपने सम्बन्धों के पुनरावलोकन और पुनर्मूल्यांकन की कहानी प्रस्तुत की है। बाहर का डर अन्दर के डर से घुलमिल कर रिशी के जीवन में तुफान खड़ा कर देता है जिससे न भागा जा सकता और न ही जिसे भोगा जा सकता है। रिशी भी अन्त में इस शून्यता से व्याधिग्रस्त हो जाता है। रात का रिपोर्टर मानवीय स्थिति के इस आयाम से बेखबर, उदासीन जैसा लगता है।

कहानी संग्रहः

१) परिन्दे

२) जलती झाड़ी।

३) पिछली गर्मियों में

४) बीच बहस में

५) मेरी प्रिय कहानियाँ

६) कल्वे और काला पानी

नाटकः

तीन एकान्त

दुसरी दुनिया

निबन्ध और संस्मरणः

चीडों पर चाँदनी

हर बारीश में

शब्द और स्मृति

कला का जोखिम

ढ़लान से उतरते हुए

अंग्रेजी में अनूदितः

डेज ऑफ लांगिण (वे दिन)

हिल स्टेशन (कहानियाँ)

अनुवाद :

कुप्रीन की कहानियाँ

कारेल चापेक की कहानियाँ

इतने बड़े धब्बे (सात चेक कहानियाँ)

झोंपडेवाले (रूमानियन कहानियाँ)

रोम्यो, जूलियट और अंधेरा (उपन्यास) (मूल लेखक : यान ओत्वेनाशेक)

बाहर और परे (उपन्यास) (लेखक : इर्शा फीड)

एमेके की गाथा (उपन्यास) (लेखक : जोसेसकशेरेस्की)

आर.यू.आर (नाटक) (लेखक : कारेल चापेक)

देश के सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार से वरिष्ठ साहित्यकार निर्मलवर्मा जी के व्यक्तित्व और कुतित्व के विभिन्न आयामों पर प्रकाश डालते हुए, उनके कृतित्व का संक्षिप्त परिचय देना मेरा सौभाग्य है। निर्मलवर्मा का साहित्य और चिन्तन समाज में कुछ बहुत मौलिक प्रश्न और चिन्ताएँ उठाता है, जहाँ कथाकथित सामाजिक यथार्थ का आतंक सा छाया रहा है और मुखर किस्म की सामाजिकता साहित्य को लगभग आत्महीन बनाने पर उतारू है, अगर निर्मलवर्मा अपनी रचना और चिन्तन में पूर्णता और पवित्रता, उनकी खोज और सत्यापन, उनकी उपस्थिति और अनुपस्थिति, उनके अन्तर संघर्ष और तनाव को मूलाधार बनाते हैं।। स्वतंत्रोत्तर हिन्दी साहित्य में निर्मलवर्मा का स्थान विशिष्ट है। सशक्त उपन्यासकार के अतिरिक्त कहानीकार, नाटककार, विचारक एवं समीक्षक के रूप में भी निर्मलवर्मा जी के गंम्भीर व्यक्तित्व उभरकर आये।

संदर्भ सूची :

1) निर्मल वर्मा - शब्द और स्मृति, पृ० ३३ - ३४

2) निर्मल वर्मा - मेरी प्रिय कहानियाँ, भूमिका, पृ० ८

3) निर्मल वर्मा - शब्द और स्मृति, पृ० २६

4) निर्मल वर्मा - चीडों पर चाँदिनी, पृ० ७

5) निर्मल वर्मा - मेरी प्रिय कहानियाँ, भूमिका, पृ० ८

6) निर्मल वर्मा - शब्द और स्मृति, पृ० ३२

7) संपादक : - अशोक वाजपेयी - निर्मलवर्मा, पृ० ९

8) संपादक : - अशोक वाजपेयी - निर्मलवर्मा, पृ० ९

9) निर्मल वर्मा - शब्द और स्मृति, प्राक्कथन, पृ० १०

10) निर्मल वर्मा - शब्द और स्मृति, पृ० ३३

11) निर्मल वर्मा - शब्द और स्मृति, पृ० २५ .

12) निर्मल वर्मा - शब्द और स्मृति, साहित्य - सिनेमाः सही रिश्ते की पहचान, पृ० ७९

13) निर्मल वर्मा - शब्द और स्मृति, साहित्य – सिनेमाः सही रिश्ते की पहचान, पृ० ७९

14) संपादक : अशोक वाजपेयी, पृ० १९

15) संपादक : अशोक वाजपेयी : निर्मल वर्मा, पृ० २८

किस्से कलम के

ग़ज़ल की दुनिया का मुकम्मल शेर है अज़ीज़ अंसारी


-डॉ अर्पण जैन 'अविचल'

जैसा नाम वैसा ही स्वभाव, वैसी ही आत्मीयता, वैसा ही निश्छल स्नेह, वैसी ही शांति और सरलता की प्रतिमूर्ति और सबसे बड़ी बात तो यह की ग़ज़ल के मायने जब तो समझाते है तो लगता है खुद ग़ज़ल बोल रही है कि मुझे इस मीटर में, इस बहर में, इस रदीफ़ और इस काफिये के साथ लिखो।

हम बात कर रहे है इंदौर के खान बहादूर कम्पाउंड में रहने वाले अज़ीज़ अंसारी साहब की जो वर्ष २००२ की मार्च में आकाशवाणी इंदौर से केंद्र निदेशक के दायित्व से सेवानिवृत हुए हैं पर उसके बाद भी अनथक, अनवरत और अबाध गति से साहित्य साधना में रत हैं। हिंदी-उर्दू की महफ़िल और अदब की एक शाम कहूँ यदि अंसारी जी को तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। लगभग १० से अधिक किताब और सैकड़ों सम्मान जिनके खाते में हो, कई वामन तो कई विराट कद को सहज स्वीकार करते, नवाचार के पक्षधर, अनम्य को सिरे से ख़ारिज करने के उपरांत हर दिन होते नव प्रयोगों को सार्थकता से अपनी ग़ज़ल, अपनी जबान और अपने लहजे में उसी तरह शामिल करते हैं जैसे पानी में नमक या शक्कर।

७ मार्च १९४२ को मालवा की धरती इंदौर में पिता श्री ईदू अंसारी जी के घर जन्मे अज़ीज़ अंसारी जी वैसे तो एमएससी (कृषि), डिप्लोमा इन मास कम्युनिकेशन एन्ड रूरल जर्नलिस्म तक अध्ययन कर चुके हैं और बचपन से उर्दू-हिन्दी साहित्य में रूचि रखते हैं। सन १९६४ से साहित्य की जमीन पर गोष्ठियों के माध्यम से सक्रियता की इबारत रच रहे हैं। जहाँ साहित्य के झंडाबरदार साहित्य के गलीचे को जनता के पांव के नीचे से खसकाने वाले बन रहे है और अस्ताचल की तरफ बढ़वाना चाह रहे है पर ऐसे ही दौर में अंसारी जी नए जोश और उमंग के साथ नवाचार का स्वागत करते हैं।

साफगोई और किस्सों की एक किताब जो बच्चों को भी उसी ढंग से हौसला देते हैं जैसे तजुर्बेदारों या कहूँ विधा के झंडाबरदारों को टोकते हैं उनकी गलती पर।

बात जब हाइकु की हुई तो अंसारी जी कहते है कि 'सलासी' जानते हो? उर्दू में सलासी भी तीन लाइन में लिखे शेर हैं जिसमें रदीफ़ भी होता है और काफिया भी मिलता है। बहुत से किस्से और कहानियों के बीच हिन्दी के उत्थान की बात आई तो पेट की भाषा बनाने के लिए उनकी भी चिंता साथ मिल गई। और यही कहा की साथ हूँ, जब चाहो, जैसे चाहो बताना जरूर। एक स्कूल में जगह है अपने पास चाहो तो यहाँ भी कुछ संचालित कर सकते हो।

शहर की साहित्यिक जमात में अदावत का एक नाम जो इसलिए भी मशहूर है क्योंकि आकाशवाणी पर कई रचनाकारों को मंच देकर तराशा भी और हीरा भी बनाया। आपके सुपुत्र सईद अंसारी जी जो वर्तमान में आजतक के मशहूर न्यूज एंकर है। इन सब के अतिरिक्त अंसारी जी के पास सैकड़ों किस्से हैं, जिनमे शामिल है शहर की विरासत और ग़ज़ल की बज्म। बहर और मीटर में अपनी बात कहने वाले अज़ीज़ अंसारी जी जीवन में भी मीटर में ही रहते हुए मुकम्मल शेर बनकर जिंदगी की ग़ज़ल गुनगुना रहे हैं।

पत्रकार एवं स्तंभकार

संपर्क: ०७०६७४५५४५५

अणुडाक: arpan455@gmail.com

अंतरताना:www.arpanjain.com

पुस्तक समीक्षा

नियति का महाभारत


समीक्षक : एम एम चन्द्रा

युवा पीढ़ी के लेखक भुवनेश्वर उपाध्याय जो पूरी तरह से लेखन को अपना कर्म और धर्म मान चुके है। उनका नया उपन्यास महाभारत को पढ़ने का मौका मिला। अभी तक मैंने उनको एक कवि व्यंग्यकार और एक आलोचक के रूप में ही पढ़ा था। लेखक इस रचना के बाद, एक नये रूप में हमारे सामने आये है। मैं भुवनेश्वर उपाध्याय जी को एक आदर्शवादी लेखक के रूप में मानता हूँ। यह रचना भी इसी दर्शन के आधार पर लिखी गयी है।

महाभारत पर न जाने कितने लेखको ने अपनी कलम चलाई है और न जाने कितने लेखक इस विषय पर आगे भी लिखेंगे। लेकिन लेखक ने इसे इतिहास से वर्तमान को समझने के उद्देश्य से लिखा है।

जैसा कि लेखक कहता है कि जो महाभारत में नहीं है वो भारत में नहीं है। लेखक के इस मत से हमारे मत भिन्न हो सकते है। क्योंकि महाभारत के बाद भारत का स्वरूप पूरी तरह से बदल गया है लेकिन यह इस रूप में अलग है कि महाभारत की भीषण तबाही के कारणों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करता है।

महाभारत के कई पात्र पाठकों को अपने जैसे लग सकते है। असल में भुवनेश्वर उपाध्याय ने इसमें पात्रों का विश्लेष्ण अपने ही तरीके से पाठको के लिए एक बौद्धिक खुराक देने के लिए किया है।

एक सामन्ती समाज के दौर को पुनः लिखना जटिल तो है लेकिन लेखन का कौशल इसी चुनौती में देखने को है। उस दौर के सामाजिक संबंधो को मनोवैज्ञानिक रूप में खंगालना और फिर उसका सारगर्भित संवादों और परिस्थितियों की निर्माण कला इसका ख़ास शिल्प है।

इस रचना में यहाँ-वहां-जहाँ भी देखेंगे, धर्म, नियति, अहंकार, स्वार्थ जैसी शाशक वर्ग की एक मनोवृति को चिन्हित करने का प्रयास लेखक ने अपनी आदर्शवादी दृष्टी से किया है। शासक वर्ग चरित्र और उसके सत्य के पक्ष में अपने विचार रखे है। जो अनत: समय की नियति के रूप में स्वीकार किये गये है।यह आदर्शवादी धरना का से जुड़ा है जिसे भौतिकवादी कभी भी स्वीकार नहीं करेंगे.

इस रचना के अधिकतर पात्र सत्ता के साथ जुड़े हुए है। किसी न किसी रूप में महाभारत में सक्रिय रूप से हिस्सेदार है। और वे सभी अपने बचाव के लिए एक से बढ़कर एक तर्क प्रस्तुत करते है। शासक वर्ग अपने बचाव् की लाख कोशिश करते है। लेकिन उनके द्वंद को लेखक पकड़ने की कोशिश करता है। उनके किये-धरे को मनोवैज्ञानिक रूप से रेखांकित करता है। अब पाठक पर निर्भर करता है कि महाभारत के लिए किसे दोषी माने, समय की नियति को या सत्ता की लालसा को।

समीक्षक : एम एम चन्द्रा

लेखक: भुवनेश्वर उपाध्याय

पुस्तक : महाबरत के बाद


कीमत :12

पुस्तक समीक्षा

एक नयी दुनिया के सपनो का नाम प्रोस्तोर


समीक्षक: वंदना गुप्ता

‘प्रोस्तोर’ एक लघु उपन्यास एम. एम. चन्द्रा जी द्वारा लिखा डायमंड बुक्स से प्रकाशित है. आज बड़े बड़े उपन्यास लिखे जाने के दौर में लघु उपन्यास लिखा जाना भी साहस का काम है और यही कार्य लेखक ने किया है. शायद चुनौतियों से आँख मिला सके वो ही सच्चे साहित्यकार की पहचान होती है. उपन्यास में नयी आर्थिक नीति के कारण मजबूर मजदूर वर्ग की उस दुर्दशा का चित्रण है जिसमें जब बड़े पैमाने पर मिलें बंद हो रही थीं तब हर वर्ग उसकी चपेट में आया.

उपन्यास के मुख्य पात्र बच्चे हैं. यहाँ एक बार फिर लेखक एक नया संघर्ष लेकर आया है. चाहता तो किसी भी बड़े पात्र को मुख्य पात्र बनाकर भी लिख सकता था लेकिन लेखक ने ऐसा किया नहीं बल्कि उस दौर में बच्चों पर, उनके सपनों पर क्या प्रभाव पड़ा मानो लेखक यही कहना चाहता है. जैसे बच्चे छोटे होते हैं शायद उसी को ध्यान रख उपन्यास भी लघु रखा. वर्ना ये एक ऐसा सब्जेक्ट था जिस पर चाहते तो पूरा शोध प्रबंध रूप में एक उपन्यास लिख सकते थे. यहाँ मानो लेखक बच्चों की मनोस्थिति के माध्यम से पड़ते प्रभाव को दर्शाना चाहता है कैसे ऐसे दौर में वो किन किन मोड़ों से गुजरते हैं जब मिल बंद हो जाती है, अन्य कोई साधन आमदनी के बचते नहीं क्योंकि पिता ने उम्र भर सिर्फ यही काम किया तो और कोई काम आता नहीं. ऐसे में घर के हालत बद से बदतर कैसे होते हैं कि यहाँ तक कि सिवाय पेट की आग के और कुछ दिखाई नहीं देता. उसे बुझाने के लिए इंसान किसी भी हद तक जा सकता है फिर चाहे पहले कितने ही ऊंचे आदर्श हों, मगर धराशायी हो जाते हैं, जब पेट अपनी माँग रखता है. फिर चोरी करनी पड़े या डाका डालना पड़े.

मुख्य पात्र अघोघ, योगेश, विपिन, बंटी, भुवन, राजीव, जितेन्द्र आदि मित्र हैं और कोई ज्यादा उम्र नहीं. 16 वर्ष की उम्र आते आते तो वो सीधे बचपन से जवानी भी नहीं और वृद्धावस्था भी नहीं बल्कि परिपक्व अवस्था में प्रवेश कर जाते हैं. शायद गरीबी होती ही वो शय है जो उम्र से पहले वयस्क बना देती है. यूं तो उस दौर में बहुत आन्दोलन होते रहते थे, मजदूर वर्ग संघर्ष करता रहता था लेकिन कभी कोई हल नहीं निकलता था. जब विदेशियों को लाभ पहुँचाना हो और दुनिया में देश के नाम का डंका बजाना हो तब अनदेखा कर दिया जाता है उपेक्षित, शोषित वर्ग को. यही उस वक्त हुआ लेकिन यदि आज के संदर्भ में भी देखो तो लगता है एक बार फिर वही दौर आ गया है जब पेटीएम, भीम एप जैसी कंपनियों को फायदा पहुंचाने को सारे देश पर इ वॉलेट द्वारा पेमेंट करना जरूरी कर दिया गया. फिर चाहे देश में अभी भी शिक्षित वर्ग कितना है सभी जानते हैं, वो नहीं जानते कैसे पैसे मोबाइल द्वारा भेजे जाएँ और लिए जाएँ, या उनके भेजे गए पैसे यदि भेजने में गलती से फंस गए तो कब और कैसे मिलेंगे, वो कमाई जिसे उन्होंने अपने खून पसीने से कमाया है एक गलती से महीनों के लिए ब्लाक हो जाती है, आज यदि एक कम पढ़ा लिखा बैंक जाता है और उसे नहीं पता कैसे खुद पास बुक क्लियर की जा सकती है और वहां किसी फोर्थ क्लास को कह दे तो उसे दुत्कार दिया जाता है ये कहकर कि ये हमारा काम नहीं तो सोचिये ऐसे में कैसे संभव है ऑनलाइन लेन देन बिना किसी रुकावट के . मगर सरकारी आदेश सबको मानने होते हैं . बस ऐसा ही उस दौर में हुआ. बच्चे जो अभी पढ़ रहे थे नहीं जानते कैसे इस समस्या से निजात पाई जाए लेकिन सबसे जरूरी चीज होती है विपरीत परिस्थिति में भी आशा का दामन न छोड़ना और सपने देखते रहना. मानो अघोघ में ये गुण अपने पिता से आया जो हमेशा कहते एक दिन मिल चालू हो जायेगी. वहीँ अघोघ हमेशा सुखद भविष्य के सपने अकेले नहीं देखता बल्कि सब दोस्त मिलकर देखते हैं लेकिन वक्त के बेरहम हाथ उनसे अक्सर उनकी खुशियाँ छीन लेते हैं . अंत में एक कोशिश और मिल को पुनर्जीवित करने की कोशिश में अपना सब कुछ जब हार जाते हैं, सरकारी और निजी क्षेत्र की गठजोड़ के कारण डंडे लाठियाँ खाते हैं मजदूर और इन हालत में जब वो जगह ही छोड़नी पड़ जाती है तब भी उनमें जिजीविषा बची रहती है. सपनों को जिंदा रखते हैं वो युवा होते बच्चे फिर चाहे जिंदगी कहीं भी ले जाए लेकिन जिंदा रहने के लिए सपनों का जिंदा रहना बहुत जरूरी है मानो उपन्यास यही सन्देश दे रहा है . वहीँ ये भी कह रहा है युवावस्था की ओर कदम बढ़ाते बच्चे आसमान में सुराख़ करने की हिम्मत रखते हैं बस उनके हौसलों को उड़ान मिलती रहे और वो उड़ान देते रहे मास्टर रतनसिंह . शायद तभी कहा जाता है शिक्षक ही देश का भविष्य निर्माण करता है और उसने उनके अन्दर की उस आग को जीवित रखा. और कुछ चाहे न कर पाए लेकिन जीवन जीने के सूत्र मानो दे गए.

शायद यही जीवन होता है जिसमें शिक्षा कदम कदम पर मिलती रहती है बस जरूरत होती है उसे समझने और याद रखने की. कुछ पंक्तियाँ जिन्होंने बहुत कुछ कह दिया उनका उल्लेख जरूरी है :

“देखा, आज हमने अपने सपने खरीद लिए . वैसे भी सपने हर किसी को नसीब नहीं होते हैं, हमारे सपने जिंदा रहने चाहिये”

“लेकिन भूखे मरने से अच्छा है चोरी डकैती करके जियो, जिंदा रहना मुश्किल काम है, मर तो पहले से रहे हैं”

“नहीं यार! गरीबी अच्छे अच्छों को चोर बना देती है और स्वयं अमीरी चोर होते हुए भी जमीरवादी बना देती है”

मास्टर जी द्वारा कहा जाना – मंदिर मस्जिद का मुद्दा इसीलिए जानबूझ कर छेड़ा गया है ताकि जनता के मूलभूत मुद्दों और लड़ाई से लोगों का ध्यान हटाया जा सके. मानो ये कहकर लेखक ने आज को भी प्रस्तुत कर दिया. जैसा आज भी हो रहा है . किसी भी मुद्दे से ध्यान भटकाना हो तो कभी जाति तो कभी धर्म तो कभी आरक्षण आदि मुद्दे उभर आते हैं और मुख्य मुद्दा दबा दिया जाता है, लोगों का ध्यान भटका दिया जाता है. काल कोई रहा हो और सरकार भी कोई भी रही हो जनता कल भी निरीह थी और आज भी है, उपन्यास पढ़कर समझा जा सकता है. आज भी यदि वोट बैंक कमजोर पड़ने लगता है तो मंदिर मुद्दा जोर शोर से उठा दिया जाता है ये किसे समझ नहीं आता? सब समझते हैं लेकिन बात वहीँ आती है कि जनता न तो जागरूक होती है और यदि होती है तो उसे संगठित नहीं रहने दिया जाता जिसका खामियाजा ये कि नेता राज करते रहते हैं और जनता पिसती रहती है फिर मजदूर वर्ग और किसान वर्ग तो शुरू से ही सर्वहारा की श्रेणी में आता है.

उपन्यास के माध्यम से लेखक ने नब्बे के दौर का बेशक जिक्र किया है लेकिन पढ़ने पर लगता है आज कौन सा ज्यादा बदलाव हुआ है. आज भी प्रासंगिक है.

“यार! मैं किसी को मरता नहीं देख सकता, इसलिए जिंदा हूँ. काम करता हूँ, सपने देखता हूँ, यदि सपने देखते हुए मर भी जाऊं तो भी गम नहीं ...कोई था अघोघ जो सपने देखता था एक नयी दुनिया के सपने, ऐसी दुनिया जो अभी बनी नहीं है- ऐसी दुनिया जहाँ गरीबी नहीं होगी. कोई बेरोजगार नहीं होगा, बच्चों को काम नहीं करना पड़ेगा और अपने गाँव से उजड़कर दूसरी जगह नहीं जमाना होगा” पंक्तियाँ सारी हकीकत बयां कर देती हैं वहीँ इसी के अंतर्गत एक प्रसंग याद आता है जब ये सब बच्चे सपने देखते हैं वो एक ही कॉलोनी में रहते हैं, सबका आमने सामने घर है, सब दूसरी मंजिल पर रहते हैं और सुबह उठकर चाय पीते हुए हाथ में अखबार लेकर बालकनी में आकर एक दूसरे को हैलो कहते हैं, पढ़कर अपना बचपन याद आता है जब हम भी ऐसा ही सोचा करते थे. काश हम सब आस पास साथ साथ रहें, जब चाहे एक दूसरे से मिल सकें, बात कर सकें. बचपन कितना निश्छल और मासूम होता है उसकी बानगी ही तो है ये उपन्यास. जहाँ सपनों को जिंदा रखने की जद्दोजहद है, ज़िन्दगी से लड़ने की जद्दोजहद है.

लघु कलेवर में प्रस्तुत उपन्यास का आकाश बेहद विस्तृत है. लेखक बधाई के पात्र हैं जो उन्होंने शोधग्रन्थ न बनाकर बिना कुछ कहते हुए भी बहुत कुछ कह दिया. हो सकता है कुछ लोगों को नागवार गुजरे कि इसमें ऐसा है क्या? ये तो सबको पता है लेकिन यदि सोचा जाए तो बहुत कुछ है इस उपन्यास में. कैसे बचपन पर असर पड़ता है ऐसे हालात का मानो यही कहने का लेखक का उद्देश्य है. या कहा जाए ऐसे हालात में भी खुद को बचा ले जाना और वो भी कच्ची उम्र में, बेहद कठिन कार्य है तो उसमें सपने देखना और उन्हें पूरा करने की ललक को बचाए रखना तो दुष्कर ही समझो लेकिन बच्चों ने अपने सपनों को जिंदा रखा, कह, मानो लेखक यही सन्देश दे रहा है हालात कैसे भी हों, अपने सपनों को जिंदा रखना जरूरी है फिर जिंदगी आराम से गुजर सकती है, जब बच्चे ऐसा कर सकते हैं तो बड़े क्यों नहीं. सरकार या उसकी नीतियों और मजदूर वर्ग का संघर्ष तो मानो वो जमीन है जिसके माध्यम से लेखक ने अपने मन की बात कही है वर्ना हर कोई जानता है सरकार या निजी क्षेत्र के साथ आम इंसान के संघर्ष के बारे में.

लिखने को तो बहुत कुछ लिखा जा सकता है लेकिन प्रतिक्रिया की भी एक मर्यादा होती है इसलिए अंत में इतना ही कहूँगी उपन्यास पढ़ते हुए लगा कि जैसे लेखक ने बहुत पास से ये सब देखा है यानि खुद इन पात्रों के आस पास रहे हैं या उन्हीं में से हैं और यही लेखन की सफलता होती है जब पाठक लेखक की छवि पात्रों में देखने लगे. लेखक बधाई के पात्र हैं और उम्मीद है उनसे आगे भी पाठक को अलग अंदाज़ में और नए नए उपन्यास पढ़ने को मिलते रहेंगे.

समीक्षक : वंदना गुप्ता

पुस्तक : प्रोस्तोर

लेखक : एम.एम.चन्द्रा

प्रकाशक :डायमंड बुक्स


कीमत : 60

लेख

वर्तमान परिपेक्ष्य में साहित्यकार का सृजनात्मक उत्तरदायित्व


शंकर लाल माहेश्वरी

‘‘इक्कीसवीं सदी का जीवन वैश्वीकरण, साइबर क्राइम, मुक्त बाजार प्रणाली, बाजारवाद, उपभोक्ता प्रवृत्ति, साम्प्रदायिक संकीर्णता, राजनैतिक विकृतियों, भ्रष्टाचार, अनाचार, उग्रवाद, आतंकवाद, असुरक्षा, मानवीय मूल्यों का अवमूल्यन, राष्ट्रीय चरित्र का अभाव, धार्मिक और आध्यात्मिक भावनाओं में गिरावट, अनैतिकता को बढ़ावा, मूल्यहीन शिक्षा का दुष्प्रभाव, सांस्कृतिक विद्रूपता, पर्यावरण प्रदूषण, भौतिकवाद, आदि मरीची भावों के बीच विकसित हो रहा है।’’ - लक्ष्मीनारायण रंगा

समाज की ऐसी विकृतियों की अवस्था में इस प्रकार के साहित्य सृजन की आवश्यकता है जो नई चेतना जगा सके। मानव मन में संवेदनाओं का समावेश कर पथराए मानव मन को पिघला कर युगानुकूल मानव की संरचना कर सके। आज मनुष्य मात्र को आत्म चिंतन की आवश्यकता है। वर्तमान परिपेक्ष्य में जो साहित्य लोकतन्त्र के अधिकारों और कर्तव्यों की महत्ता का प्रतिपादन कर मानवीय व नैतिक गुणों के उत्थान हेतु मानव मस्तिष्क को झकझोर दे, उसे नया कुछ करने की पे्ररणा प्रदान करे। साम्प्रदायिक सद्भाव की दिशा में आगे कदम बढ़ा सके। भटके हुए युवाओं को नई राह दिखा सके। पाश्चात्य विचारों से मुक्ति प्रदान कर भारत माँ के प्राचीन गौरव को लौटा सके। संचार साधनों का उत्तरदायित्व गहराई से समझ कर राष्ट्रीय एकता, साम्प्रदायिक सद्भाव, अपराधीकरण पर नियन्त्रण तथा लोकहितकारी योजनाओं से संलग्न होकर राष्ट्र व समाज को नई दिशा दे सके। साहित्य साधक अपने रचनात्मक कौशल का परिचय देते हुए ऐसे ज्योति स्तम्भ का कार्य निरुपण करे जो व्यक्ति को अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर होने में संबल प्रदान कर सके।

साहित्यकार को ऐसे समर्थ और ऊर्जावान रचना शिल्पी के रुप में प्रस्तुत होना चाहिए जो देश की दशा दिशा का गंभीर आकलन कर उसे प्रगति पथ पर अग्रसर होने के लिए दिशा बोध प्रदान कर सके। समाज और राष्ट्र को एक नवीनतम आयाम देने का समय आ गया है। साहित्यकार अपने शिल्प द्वारा समर्पित भाव से समाज को सुसंगठित और संस्कारित करने में अपनी भूमिका का निर्वहन करें। आज वैचारिक क्रान्ति की आवश्यकता है। जब जब भी समाज में मूर्छा उत्पन्न हुई, नकारात्मक सोच का प्राधान्य हुआ, बदलती परिस्थितियों में देशवासी बदलाव नहीं ला सका, समय के साथ कदम नहीं मिला सका तो सहित्यकार की सीख बड़ी सार्थक सिद्ध हुई है।

प्राचीन काल में राजा महाराजाओं को सुशासन संचालन हेतु और बिगड़े राजकुमारों को आदर्शवान बनाने हेतु मित्र लाभ, हितोपदेश, नीति कथाएं, जातक कथाएं, पंचतन्त्र की कहानियाँ, चाणक्य नीति, नीति शतक तथा विदुर नीति आदि ग्रंथों का तत्कालीन साहित्य साधकों ने समाजगत आवश्यकताओं को ध्यान रखते हुए साहित्य का सृजन किया था। जिससे सोई जनता में जागरण उत्पन्न हुआ और एक सामयिक परिवर्तन की लहर दृष्टिगत हुई। सद्साहित्य द्वारा विचारवान व्यक्तियों का जन्म होता है जो रुढ़ियों के विरुद्ध मानसिकता दिखाते हुए समाज में व्याप्त न्यूनताओं को उखाड़ फैंकने में सक्षम होता है।

यदि आज के उदीयमान सहित्यकारों ने अपने प्रेरक साहित्य सृजन की दिशा में कदम नहीं बढ़ाये तो सामाजिक समरसता, राष्ट्रपे्रम, श्रमनिष्ठा , पारिवारिक सामन्जस्य, वैचारिक परिवर्तन और सुसंस्कारों के सृजन से कोंसों दूर रह जायेंगे। यदि सही समय पर सही मार्गदर्शन व दिशाबोध रचना शिल्पियों द्वारा नहीं मिला तो बहुत पिछड़ जायेगें और पीछे रह कर दौड़कर भी मंजिल प्राप्त नहीं कर पायेंगे अतः साहित्यकारों को त्वरित गति से समय के साथ सही दिशा में अपनी रफ्तार तेज करनी चाहिए।

‘‘विचारवान व्यक्ति वह होता हैं जिसने मस्तिष्क को इस तरह विकसित कर लिया है कि वह जो चाहता हैं उसे हासिल कर सकता है’’- नेपोलियन

ईष्या, द्वेष, छल, कपट, दुष्कर्म, बेईमानी, भ्रष्टाचार, जीवन मूल्यों में गिरावट व्यक्ति के भटकाव के कारण है। उसे सही मार्ग का अनुसरण करने के लिए वह साहित्य उपलब्ध नहीं हुआ जिसके पारायण से वह स्वयं को सद्मार्ग पर अग्रसर कर सके। आज तोता मैना और लैला मजनूं की कहानियाँ सार्थक नहीं हैं अब जीवन में आमूल चूल परिवर्तन लाने वाला चैटिला साहित्य चाहिए। सद्साहित्य के पठन द्वारा मानव मन की कलुषित भावनाओं का दमन हो सकता हैं तथा उत्पीड़न व अनाचारों से मुक्ति प्राप्त कर सकता है।

‘‘जिस प्रकार पे्रम आलसी और निकम्मे मनुष्यों को सुधार देता हैं उसी प्रकार सद् साहित्य जीवन में महान परिवर्तन कर देता हैं। चरित्रगत दुर्बलताओं को इस प्रकार दूर कर देता है मानो किसी दैवी शक्ति ने जीवन में प्रवेश किया हो। व्यक्ति मन के अंदर की फूहड़ता और अव्यवस्थाओं तथा कुटिलताओं को हराकर सुव्यवस्था और सद्भावना को स्थापित कर देता है जिससे अकर्मण्य मनुष्य भी कर्मठ बन जाता है और भटका हुआ प्राणी सन्मार्ग पर अग्रसर होने लगता है।’’ -रास बिहारी

शब्द शिल्पी द्वारा सृजित साहित्य विश्व की मूल्यवान धरोहर होती है। सहित्य शब्द का तात्पर्य सत्य का अनुसरण करता हुआ जन जन के कल्याण के लिए साहित्य सृजन करे। साहित्य के द्वारा ही रचनाकार अपना संदेश जनजन तक पहुंचाने का प्रयास करता है। शांत मस्तिष्क करुणामय हृदय का आमुख हैं और उसका परिणाम सत्कर्म है। मुनष्य को सत्य एवं आचरण में धर्मजीवी होना चाहिए। अध्यात्म-अमृत का पान कर मानव लोकोपकारी बनता है। वह सत्यम्, शिवम् और सुन्दरम् का पोषक होता है। उसमें जन कल्याण की भावनाओं का उद्गम होता है। व्यक्ति सभ्य एवं सुसंकृत बनता है। करुणा, दया, मैत्री, उदारता, त्याग, सहिष्णुता, सहयोग, श्रम और कल्याण की भावना से परिपूर्ण होकर समाज सेवा में संलग्न हो जाता है। अतः ऐसे साहित्य को विकसित किया जाए जो मनुष्य की भावनाओं को आलोड़ित कर सके। आज कथनी और करनी में एकरुपता नहीं होने से सिद्धान्त और आचरण में बड़ी खाई उत्पन्न हो गई है। हम ज्ञानी बन गये, जानकारियाँ बढ़ गई किन्तु सद्गुणों का विकास नहीं हो पाया। विश्व बंधुत्व की भावना तिरोहित हो गई अतः राष्ट्रीय मूल्यों के प्रति सजगता पैदा करना साहित्यकार का दायित्व है।

मानव मात्र में सत्य के प्रति निष्ठा और असत्य के प्रति तिरस्कार के भाव में जागृत हो सके, सर्वे भवन्तु सुखिनः के सूत्र का अनुसरण कर सकें। अतिथि देवो भवः की भावना बलवती हो सके, भौतिकवादी सोच से छुटकारा मिले, संस्कार, सद्भाव, आचार व्यवहार, सहृदयता, सहयोग और सहानुभूति आदि गुणों का अभाव हो गया है। आज का जन प्रतिनिधि भटक गया है। दम्भ और अंहकार से परिपूर्ण है। उसका वाणी संयम नष्ट हो गया है। राष्ट्र के प्रति समर्पण भाव समाप्त हो गया है। नेतृत्व की क्षमता नहीं है। वह स्वार्थी और शोषक बन गया हैं। आज सूचना तन्त्र भी निर्बल हो गया हैं, प्रशासन पंगु हो गया हैं। भ्रष्टाचार शिष्टाचार बन गया है तथा साम्प्रदायिकता देश के लिए अभिशाप बन गई है। जब समाज और राष्ट्र अपने मार्ग से भटकने लगता है तो साहित्यकार की ललकार ही उसे गलत मार्ग को छोड़ सही मार्ग का अनुसरण करने में सहयोगी होती हैं। एक ऐसा भी समय था जब तत्कालीन राजस्थान के राजा महाराजाओं में प्राण फूँकने वाले उन चारण कवियों को नहीं भुलाया जा सकता जिन्होंने अपनी ओजस्वी भाषा व तेजोमय वाणी से उन्हं राजमहलों से बाहर निकाल रणभूमि में तलवार थमाने का कार्य किया। यह चारण साहित्य का ज्वलंत उदाहरण हैं। चारण कवियों ने आश्रय दाताओं की कीर्ति, युद्ध कला, गर्वोक्तियां तथा वीरता पूर्ण कार्य कलापों का चित्रण किया हैं। वह चारण साहित्य उस समय की ज्वलंत समस्याओं के समाहार हेतु उपयोगी सिद्ध हुआ। वह पूरा कार्यकाल डॉ. रामकुमार वर्मा और डॉ. पियर्सन ने आदिकाल को ‘‘चारण काल’’ के नाम से संबोधित किया है। चन्दबरदाई का नाम आज भी जन जन के मन को आंदोलित करता हैं। वर्तमान काल में मुंशी पे्रमचन्द्र, मैथिलीशरण गुप्त, रामधारी सिंह दिनकर, प्रेमघन, प्रताप नारायण मिश्र, राधाकृष्ण दास आदि के साहित्य ने भी पाठक को उत्प्रेरित किया है। शिवाजी महाराज के समय में साहित्य सेवा की दृष्टि से कवि भूषण का विशेष योगदान रहा है।

उपन्यास सम्राट पे्रमचन्द के उपन्यास वस्तुतः गाँधीवादी युग की झलक प्रस्तुत करते हैं उनका कोई भी पात्र संघर्ष से विचलित नहीं होता और उनमें वे समाज की विकृतियों पर प्रहार करते रहे हैं। उनका साहित्य डूबते हुए को संबल प्रदान करने वाला है। कबीर, जायसी, सूर, तुलसी आदि संत कवियों ने अपनी जीवन शैली और साधना से हताश हिन्दू समाज को आलंबन प्रदान किया था। साहित्य समाज की प्रगति की आधारशिला प्रस्तुत करता हैं। साहित्य मानव जीवन को परिष्कृत कर उसे सही दिशा में गतिमान करता है। सशक्त और सजग साहित्य समाज का पथ प्रदर्शक होता है। देश और समाज के निर्माण में साहित्यकार का बहुविध तथा असीमित सहयोग होता है। वे पंरपरा के वटवृक्ष का सहारा लेकर प्रगति के फूल बिखेरते हुए समाज व राष्ट्र का मार्ग प्रशस्त करता है। साहित्य सूर्य किरणों की भाँति समाज में चेतना का संचार करता हैं। ज्ञान के अंधकार को दूर कर समाज को आलोकित करता है। साहित्य ही राष्ट्र की सांस्कृतिक गरिमा को अक्षुण्य बनाये रखता है। साहित्यकार का दायित्व हैं कि वह ऐसे साहित्य का सजृन करे जिससे नागरिक अपने अधिकार व कर्तव्य तथा न्यायिक व्यवस्था से परिचित होकर जागरुक बन सके।

जब देश में मुसलमानों का राज्य प्रतिष्ठापित हुआ उस समय जनता अत्याचारों से त्रस्त थी। देव मंदिरों को गिराना, महापुरुषों को अपमानित करना और साम्प्रदायिकता फैलाना आदि कुकृत्यों से जन जीवन दुखी था। उस समय हमारे संत कवियों ने साहित्य सृजना से समाज को एक नई दिशा प्रदान की थी। संत कबीर ने तो खंडित समाज को एक सूत्र में बाँधनें का अथक परिश्रम किया तथा भावात्मक एकता स्थापित करने में सफल रहे। आधुनिक काल में भारतेन्दू हरिश्चन्द्र के प्रादुर्भाव से आधुनिक भाव धारा का विकास हुआ। सामयिक साहित्य में सामाजिक कुरीतियों का उद्घाटन, अंग्रेजो के विरुद्ध जनमत निर्माण तथा राष्ट्रभक्ति, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, शिक्षा का प्रचार प्रसार आदि के साथ राष्ट्रीय चेतना का उदय हुआ। इस समय के साहित्यकारों ने जनमानस में राष्ट्रीय भावनाओं को जागृत करने का महत्वपूर्ण कार्य किया और अपने साहित्य धर्म का निर्वाह किया।

आज सूचना क्रान्ति का युग है। दूरदर्शन व इंटरनेट के माध्यम से सामयिक व श्रेष्ठ कथा कहानियों से परिपूर्ण आलेखों से जन शिक्षण प्राप्त हो सकता है। अतः कथाकारों को देश हित में ऐसी चित्र कथाएं तैयार करनी चाहिए जो उपयोगी व प्रेरक हों। विशेषतः शिक्षण संस्थाओं में जहाँ नई पीढ़ी की पौध तैयार हो रही है वहाँ यदि पे्ररणादायी और जीवन मूल्यों की उत्पे्ररक पुस्तकों का उपयोग हो तो भावी नागरिक का बौद्धिक स्तर विकसित होगा। देश का विकास भी तभी संभव है जब प्रत्येक नागरिक सुशिक्षित हो सके।

‘‘न पढ़ने वालों से वे श्रेष्ठ है जो पढ़ते हैं। पढ़ने वालों से वे श्रेष्ठ है जो पढ़े हुए का स्मरण रखते है। स्मरण रखने वालों से वे श्रेष्ठ हैं जो पढ़े हुए का अभिप्राय समझते है और उनसे भी वे श्रेष्ठ हैं जो पढ़े हुए के अनुसार आचरण करते हैं। ’’

-मुन स्मृति

एक साहित्यकार के द्वारा ऐसी कृति का निर्माण हो जिससे पठित सामग्री का अनुसरण कर आचरण सुधार के लिए उत्पे्ररित हो जाए। साहित्य की विविध विधाओं में निबन्ध, कविता, नाटक, एकांकी, बोध कथा, संवाद, रेखाचित्र, व्यंग्य लेख, उपन्यास तथा क्षणिकाएं विशेष रुप से प्रचारित हैं। अतः समसामयिक परिस्थितियों के अनुरुप ही विषय वस्तु का समावेश विभिन्न विधाओं में प्रस्तुत किया जाए। कवि सम्मेलनों का भी सामाजिकों के लिए विशेष महत्व है अतः कवि अपनी प्रेरणादायी कविताओं के माध्यम से जागरण उत्पन्न कर सके, ऐसा उन्हें सुनिश्चित करना चाहिए।

वर्तमान परिपेक्ष में आंतकवाद, नक्सलवाद, माओवाद, सीमाओं का अतिक्रमण, पर्यावरण प्रदूषण, मानवाधिकारों का क्षरण, दुष्कर्म ,अनाचार, घरेलू हिंसा, सांस्कृतिक प्रदुषण, जनसंख्या विस्तार, भ्रष्टाचार, रिश्वत खोरी, हत्या,लूटपाट आदि ज्वलंत समस्याएं समाज में व्याप्त हैं। इसके साथ ही सामाजिक रुढ़ियां भी जन जीवन को प्रभावित कर रही है। जिनमें दहेजप्रथा, मृत्युभोज, बालविवाह, शादी समारोह में दिखावा आदि कुप्रथाओं से जन जीवन त्रस्त है। अतः इन सब पर नियन्त्रण भी आवश्यक है। ‘‘ साहित्यकार को सकारात्मक सोच के साथ अपने लक्ष्य प्राप्ति के लिए प्रबल इच्छा शक्ति, अथक परिश्रम,पारदर्शिता तथा सकारात्मक सोच के साथ अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन करना चाहिए तभी समाज का हित होगा। क्योंकि

‘‘शब्द के संवाद से शिव, ब्रह्ना और इन्द्र की शक्ति प्राप्त हो सकती है व्यक्ति का पिछला जीवन चाहे जैसा भी रहा हो शब्द संवाद द्वारा वह वांछित दिशा में उन्मुख हो सकता है। ’’ - गुरु नानक

यदि साहित्यकार सजगता पूर्वक निष्पक्ष भाव से समसामयिक अव्यस्थाओं और विसंगतियों का पर्याप्त आकलन कर अपनी लेखनी उठाने का संकल्प संजोयेगा तो अवश्य सफलता मिलेगी।

‘‘संसार में सभी भले कार्य संकल्प से पूरे होते हैं जिसमें संकल्प की शक्ति नहीं वह संसार में सुकार्य नहीं कर सकता इसीलिए वैदिक ऋषियों ने भी यही याचना की थी कि हमारे हृदय में कल्याणकारी संकल्प हो जिससे हम निरन्तर आत्म कल्याण के साथ लोक कल्याण कर सकें।’’ - आचार्य गणेशदास

‘‘रचनाकार की सफलता जिस ताले में बन्द है वह दो चाबियों से खुलता हैं। एक सकारात्मक सोच और दूसरा दृढ़ इच्छा शक्ति। यदि कोई भी ताला बिना चाबी के खोला गया तो आगे उपयोगी नहीं होगा। अतः साहित्यकार को सजगता पूर्वक अपने सजृनात्मक उत्तरदायित्व का निर्वाह