विकास की अवधारणा : गांधीय दृष्टि-विजय कुमार

(पीएच.डी शोध- छात्र ),

डॉ बाबा साहब अंबेडकर सिदो-कान्हू मुर्मु दलित एवं जनजाति अध्ययन केंद्र ,

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यलया , वर्धा )

प्रस्तावना

किसी ने ठीक ही कहा है कि विकास की शुरुआत घर से होती है | व्यक्ति से परिवार, परिवार से पास-पड़ोस, पास-पड़ोस से समाज, समाज से राष्ट्र और राष्ट्र से विश्व की ओर विकास का विस्तार होता है | यह विकास शांति की अवधारणा में ही हो सकता है | बोलचाल की भाषा में विकास का अर्थ जो मन में आए सो लगा लो | लेकिन समाजशास्त्र में यह पद एक निश्चित अवधारणा है और इसलिए इसका अर्थ भी तकनीकी है | विकास में लचीलापन होता है और यह हमेशा नये आविष्कारों में जुटी रहती है | समाजशास्त्र में विकास की अवधारणा बहुत पुरानी है | महात्मा गांधी ने विकास की अवधारणा को बहुत ही सटीक रूप से परिभाषित किया है | जो उनके दर्शन से पता चलता है | गांधी जी के जीवन पद्धति से पता चलता है | उनकी सोच से पता चलात है | विकास शब्द का शाब्दिक अर्थ, ‘वृद्धि-क्रमिक प्रगति का होना है |’ पश्चिमी देशों में इसे प्रधानतः एक आर्थिक प्रक्रिया माना जाता है, जिसका उद्देश्य जनसंख्या के सभी स्तरों में सुधार करना होता है | गांधी जी का विकास का अर्थ परिवर्तन, राष्ट्रनिर्माण, नियोजिन विकास, जिसका उद्देश्य एक ऐसे समतावादी समाज का निर्माण करना है, जो देश का शासक में जनता की सहभागिता, सामाजिक समता, सभी के लिए और समान अवसर, आर्थिक समता के सिद्धांतों पर आधारित हो | जिससे मानव जाति का सम्पूर्ण विकास हो पाए | साथ ही गांधी जी यह भी कहते है कि बिना शांति के विकास की कल्पना भी नहीं हो सकती है | जहां शांति होगी, वही विकास हो सकता है | यह विकास प्रकृति के दोहन से नहीं होना चाहिए, बल्कि विकास प्रकृति को सुरक्षित रखते हुए, मानव जाति का विकास होना चाहिए | क्योंकि विकास का केंद्र मानव ही है | प्रकृति के अंदर ही मानव सुरक्षित रह सकता है | महात्मा गांधी ने विकास का अर्थ– विकास एक पागल दौड़ है | विकास कि प्रक्रिया एक दैत्याकार पैमाने पर समाज का सकारात्मक कार्य है | विकास का तात्पर्य मनुष्य के सर्वांगीण विकास से होता है | हर मनुष्य को अपने जीवनयापन के लिए श्रम करना चाहिए | यह श्रम शुद्ध होना चाहिए | मानव विकास ‘प्रकृति-मानव-विकास’ को साथ ले कर विकास होना चाहिए | जिससे न प्रकृति को हानि पहुंचे न मानव को हानि पहुंचे | गांधी जी ने सर्वांगीण मानव विकास का रास्ता बतलाया था | जिसे DIAGRAM के द्वारा समझा जा सकता है |

DIAGRAM

सर्वांगीण मानव विकास च्रक

गांधीवादी चिंतक सिद्धराज जी का मानना है कि पश्चिम के यांत्रिक उद्योगवाद के इस अभिशाप से गांधी बहुत पहले परिचित हो चुके थे | गांधी जी का विरोध यंत्रों से नहीं था, जैसा कि समझा जाता है | उनका विरोध इस बात से था कि यंत्रों के जरिये बने बड़े पैमाने पर उघोगों द्वारा आम जनता के शोषण और नतीजों में गरीबी और बेकारी के निरंतर बढ़ते जाने का रास्ता साफ हो गया था | गांधी जी उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में 1909 में प्रकाशित ‘हिंदस्वराज’ में यांत्रिकघोग और भोगवादी संस्कृति से होने वाले दुष्परिणामों का विस्तार से जिक्र किया था | गांधी जी का मानना था, “मेरा उद्देश्य तमाम यत्रों का नाश करने का नहीं है, बल्कि उनकी हद बांधने का है |” उन्होंने आगे कहा “ऐसे यंत्र नहीं आने चाहिए, जो काम न रहने के कारण आदमी के अंगो को जड़ और बेकार बना दें | यदि छोटे यंत्रों को बढ़ावा देने के लिए कोई बड़ा कारख़ाना लगाना पड़े तो ऐसे कारखानों का मालिक राष्ट्र हों या जनता की सरकार की ओर से ऐसे कारखाने लगाये जायें |” आर्थिक विकास पूर्णनिर्माण हेतु गांधी जी आर्थिक समानता लाने के पक्षधर रहे | उनके लिए उन्होंने यह माना कि पूंजी और श्रम के मध्य खड़े सभी विवाद और संघर्ष समाप्त हों | उन्होंने श्रम की पवित्रता को बनाए रखते हुए ‘शारीरिक श्रम’ के महत्व पर बल दिया |

गांधी जी का विकास का सही उदाहरण ‘ एनाकुलम (केरल राज्य) देश का प्रथम शत-प्रतिशत साक्षर राज्य है | गांधी जी ने विकास और सामाजिक समस्याओं के समाधान के कई उपायों पर प्रयोग किए है, जिसका उदाहरण 1917 मे पश्चिम चंपारण, सेवाग्राम आश्रम, सत्याग्रह आश्रम आदि में किए गए प्रयोग जैसे प्रौढ़ शिक्षा, साक्षारता, ग्रामस्वराज, सिंचाई व्यवस्था, लधूघोग, खादी उघोग, स्वस्था के प्रति जागरूकता, आदि कार्यों से, सभी प्रकृति से जुड़ कर किया गया विकास है | सही अर्थों मे गांधी विकास मॉडल से देश का विकास हो सकता है, बिना प्रकृति को दोहन किए हुए |


विकास की अवधारणा : गांधीय दृष्टि

बोलचाल की भाषा में विकास का अर्थ जो मन में आए सो लगा लो | लेकिन समाजशास्त्र में यह पद एक निश्चित अवधारणा है और इसलिए इसका अर्थ भी तकनीकी है | विकास में लचीलापन होता है और यह हमेशा नये आविष्कारों में जुटी रहती है | समाजशास्त्र में विकास की अवधारणा बहुत पुरानी है | किसी ने ठीक ही कहा है की विकास की शुरुआत घर से होती है | व्यक्ति से परिवार, परिवार से पास-पड़ोस, पास-पड़ोस से समाज, समाज से राष्ट्र और राष्ट्र से विश्व की ओर विकास का विस्तार होता है | यह विकास शांति की अवधारणा में ही हो सकता है | महात्मा गांधी ने विकास के लिए की वैकल्पित मार्ग का रास्ता बतलाया है | जो उनके दर्शन से पता चलता है | गांधी जी की जीवन पद्धति से पता चलता है | उनकी सोंच से पता चलात है | विकास शब्द का शाब्दिक अर्थ, ‘वृद्धि-क्रमिक प्रगति का होना है |’ मानव इतिहास को जब हम देखते है तो उसके पीछे विकास की लंबी-चौड़ी इतिहास का पता चलता है | विकास के अर्थ के मायनों में मानव के युग परिवर्तन से समझा जा सकता है | जिसे एक DIAGRAM के द्वारा समझा जा सकता है |

DIAGRAM

एक युग से दूसरे युग में परिवर्तन, मानव विकास की प्रक्रिया है |

DIAGRAM

गाँव से राज्य-राष्ट्र बनने की अवधारणा, मानव विकास की एक सामाजिक विकास की प्रक्रिया है |

‘विकास’शब्द का शाब्दिक अर्थ, ‘वृद्धि-क्रमिक प्रगति’ का होना है | पश्चिमी देशों में इसे प्रधानतः एक आर्थिक प्रक्रिया माना जाता है | महात्मा गांधी कि विकास की अवधारणा में एक वैकल्पित मार्ग दिया है | जो उनके दर्शन से पता चलता है | गांधी जी के जीवन पद्धति से पता चलता है | उनकी सोच से पता चलात है | विकास शब्द का शाब्दिक अर्थ, ‘वृद्धि-क्रमिक प्रगति’ का होना है |’ पश्चिमी देशों में इसे प्रधानतः एक आर्थिक प्रक्रिया माना जाता है, जिसका उद्देश्य जनसंख्या के सभी स्तरों में सुधार करना होता है | गांधी जी का विकास का अर्थ परिवर्तन, राष्ट्रनिर्माण, नियोजिन विकास, जिसका उद्देश्य एक ऐसे समतावादी समाज का निर्माण करना हैं, जो देश के शासक में जनता की सहभागिता, सामाजिक समता, सभी के लिए और समान अवसर, आर्थिक समता के सिद्धांतों पर आधारित हो | जिससे मानव जाति का संपूर्ण विकास हो पाए | साथ ही गांधी जी यह भी कहते है कि बिना शांति के विकास का कल्पना भी नहीं हो सकता है | जहां शांति होगी, वही विकास हो सकता है | यह विकास प्रकृति के दोहन से नहीं होना चाहिए, बल्कि विकास प्रकृति को सुरक्षित रखते हुए, मानव जाति का विकास होना चाहिए | क्योंकि विकास का केंद्र मानव ही है | प्रकृति के अंदर ही मानव सुरक्षित रह सकता है | महात्मा गांधी ने विकास का अर्थ– विकास एक पागल दौड़ है | विकास की प्रक्रिया एक दैत्याकार पैमाने पर समाज का सकारात्मक कार्य है | विकास का तात्पर्य मनुष्य के सर्वांगीण विकास से होता चाहिए | गांधीवादी विकास नीति में श्रम एक महत्वपूर्ण और स्वाभाविक प्रक्रिया है | प्रत्येक मनुष्य को अपने जीवनयापन के लिए श्रम करना चाहिए | यह श्रम शुद्ध होना चाहिए | मानव विकास ‘प्रकृति-मानव-विकास’ को साथ ले कर विकास होना चाहिए | जिससे न प्रकृति को नुकसान पहुंचे न मानव को नुकसान पहुंचे | गांधी जी ने सर्वांगीण मानव विकास का रास्ता बतलाया है | गांधी जी के विकास की अवधारणा को गणितीय सूत्र में दर्शाया जा सकता है

गांधी विकास मॉडल का गणितीय सूत्र

विकास = प्राकृति + शांति + परिवर्तन

+

राष्ट्र निर्माण

+

नियोजित विकास, जिसका उद्देश्य एक ऐसे समतावादी समाज का निर्माण

करना हैं, जो देश का शासक में जनता का सहभागिता, सामाजिक समता,

सभी के लिए और समान अवसर |

+

आर्थिक समता के सिद्धतों पर आधारित

उत्तर - = संपूर्ण विकास

सर्वांगीण मानव विकास च्रक

आइंस्टीन ने कहा था – “गांधी इन्सानों में एक चमत्कार था |” यदि प्राचीन युग शांति को बुद्ध और ईसा जैसे महापुरुषों का जन्म देने का गौरव प्राप्त है तो आधुनिक युग भी सत्य, अहिंसा, तथा शांति के दूत महात्मा गांधी जैसी विश्वविभूति को उत्पन्न करके कुछ कम गौरवान्वित नहीं हुआ है | महात्मा गांधी की दर्शन से विकास की अवधारणा को समझा जा सकता है |

विकास की अवधारणा :

📷 स्वदेशी का सामाजिक-आर्थिक मानव विकास की प्रासंगिकता

📷 आर्थिक विकास पूर्णनिर्माण में गांधी और ग्रामोघोग का महत्व

📷 स्वैच्छिक संगठन का मानव विकास में भूमिका

क ) स्वदेशी का सामाजिक-आर्थिक मानव विकास की प्रासंगिकता

गांधी जी के अनुसार स्वदेशी “ ‘धार्मिक अनुशासन’ है, जिसका पालन व्यक्तियों को उससे होने वाले शारीरिक कष्ट की बिल्कुल उपेक्षा करके करना चाहिये |” साथ ही उनका ऐसा मानना है कि स्वदेशी जीवन का पवित्र नियम है | और यह नियम मनुष्य की मूलभूत प्रकृति में सन्निहित हैं | शाब्दिक दृष्टि से स्वदेशी का अर्थ है ‘अपना देश’ | स्वदेशी का नियम सेवा के एकमात्र सही मार्ग का चयन है | गांधी जी इस नियम को परिभाषित इन शब्दों में करते हैं, “स्वदेशी हमारे अंदर कि वह भावना है जो हम पर यह प्रतिबंध लगती है कि हम अपेक्षाकृत अधिक वातावरण को छोड़कर पास के वातावरण का उपयोग करें और उसकी सेवा करें |” स्वदेशी वह भावना हैं, जो हमको अन्य किसी को छोड़कर अपने निकटतम पड़ोसी कि सेवा करने का आदेश देती है | गांधी जी का मानना था की स्वदेशी के अंतर्गत पास-पड़ोस से प्रेम भ्रातृत्व प्रसाढ़ हो | समूचे विश्व के साथ बंधुत्व की भावना के लिए प्रयत्नशील भलें रहे, फिर भी जिन पड़ोसियों के बीच हमारा जीवन रात-दिन बीतता है, और जिनके साथ अनेक कारणों से हमारे संबंध जुड़े रहते हैं, हमारा पहला व्यवहार उन्हीं के साथ होना चाहिए | उन्होंने आगाह करते हुए लिखा है, “स्वदेशी सिद्धांतों को भंग करने का पहला नतीजा यह होगा कि अपने निकट के पड़ोसियों की दोषपूर्ण उपेक्षा होगी और जिन लोगों की सेवा मैं करना चाहता हूँ, उनको न चाहते हुए भी कुसेवा होगी |” स्वतंत्रता के बाद देश की ऐसी स्थितियों का अनवरत सामना करना पड़ रहा है | आर्थिक क्षेत्र में वे देश के और गांवों के भी स्वावलंबन के पक्ष में है | उनके अनुसार स्वदेशी का अर्थ, “विदेशी वस्तुओं का निराकरण करके देश में बनी वस्तुओं का प्रयोग, जहां तक यह घरेलू धंधो की रक्षा के लिए आवश्यक हैं, विशेषकर उन धंधों की रक्षा के लिए जिनके बिना भारत कंगाल हो जाएगा |” भारतीय जनता गरीबी एवं आर्थिक संकट में है इसका कारण यह है कि आर्थिक और औघोगिक जीवन में हमने स्वदेशी के नियम को भंग किया है | अंग्रेजों ने अपने लाभ एवं भारत की आर्थिक सरंचना को पंगु बनाने के लिए परंपरागत उघोग-धंधों से धीरे-धीरे मोह भंग करने को बाध्य किया क्योंकि वे बहुत कुटिल एवं दूरदर्शी थे | उन्हें यह सहज ज्ञात था कि जबतक हिंदुस्तानी आर्थिक रूप से स्वावलंबी रहेगे उनकी उन पर पकड़ सुदृढ़ तब तक नहीं हो सकती जब तक कि वे परावलंबी न बना दिए जाए | अंग्रेजों ने वैसा कर दिखाया और सहजतापूर्वक गुलामी की जंजीरों में भारतियों को जकड़ कर रखा एवं यहाँ की प्राकृतिक संपदाओं का भरपूर दोहन किया और लंकाशयर और मैनचेस्टर में उत्पादित सामग्रियों के प्रति ललक पैदा कर परावलम्बी बनाया | दलित और शोषित वर्गों के लिए इससे बचने का एकमात्र उपाय स्वदेशी धर्म ही है |

सराशः – यह है कि स्वदेशी कि भावना से ही विकास हो सकता है | स्वदेशी सिद्धान्त वास्तव में घरेलू उघोगों के इस रूप में सरंक्षण पर बल देता है कि उसमें विकास करने की निश्चित शक्ति विघमान रहे, किन्तु स्वदेशी का अर्थ किसी दूसरे देश के प्रति दुर्भाव कदापि न रहे | गांधी जी जिस आर्थिक व्यवस्था के निर्माण में अपना योग दे रहे थे, उस सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था का ध्येय भारत को पुनः आत्मनिर्भर बनाना था | उन्होंने ग्रामोंघोग के बारे में कहा-‘ग्रामोघोग का यदि लोप हो गया तो, भारत के 7 लाख गांवों का सर्वनाश ही समझिए | उन्होंने कहा ‘ग्राम उघोगों की योजना के पीछे मेरी कल्पना तो यह है कि हमें अपने रोज़मर्रा की आवश्यकता गांवों की बनी चीजों से ही पूरी करनी चाहिए | गांधी जी मानव विकास, प्रकृति और मानव के साथ करना चाहते थे | जिससे प्रकृति भी सुरक्षित रहे, मानव का भी आर्थिक विकास होता रहे | स्वदेशी की भावना से ही मानव का विकास संभव है | गांधी जी के बातों को इस सिद्धान्त के द्वारा प्रस्तुत किया जा सकता है |

गांधी स्वदेशी सामाजिक-आर्थिक मानव विकास सिद्धान्त

स्वदेशी = प्रकृति + मानव

= सामाजिक आर्थिक मानव विकास

उदाहरण के लिए सेवाग्राम आश्रम को ले सकते है | सेवाग्राम आश्रम बनाने के लिए गांधी जी ने एक सर्थ रखी थी, आश्रम के बनाने के लिए 15 किलों मीटर की दूरी में आने वाली वस्तुओं का ही प्रयोग किया जाए | जिससे उस गाँव के लोगों का आर्थिक प्रगति भी होगी और स्वदेशी की भावना भी जागृत होगी |

📷 आर्थिक विकास पूर्णनिर्माण में गांधी और ग्रामोघोग का महत्व

भारतीय ग्रामों के संबंध में सर चार्ल्स मेटगाफ ने 1930 में लिखा था, “ ग्राम समुदाय लघु गणराज्यों के समान हैं, जिनके पास उनकी आवश्यकता की सम्पूर्ण वस्तुएँ है और जो कि विदेशी संबंध से लगभाग स्वतंत्र है | ग्राम समुदाय का यह संगठन, प्रत्येक स्वयं में एक पृथक लघु राज्य के समान है |” आचार्य राममूर्ति का यह कहना न्यायसंगत है कि ‘मुगलकाल में देश गुलाम था, ग्राम स्वतंत्र, ब्रिटीशकाल में देश गुलाम व ग्राम गुलाम, स्वतंत्र भारत में देश आजाद, ग्राम गुलाम है |’ आधुनिक सभ्यता शारीरिक सुःख की भूख को जागृत करती है | गांधी जी का दर्शन आध्यात्मिक और नैतिक संतुष्टि के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित करता है | गांधीवादी चिंतक सिद्धराज जी का मानना है कि पश्चिम के यांत्रिक उघोगवाद के इस अभिशाप से गांधी बहुत पहले परिचित हो चुके थे | गांधी जी का विरोध यंत्रों से नहीं था, जैसा कि समझा जाता है | उनका विरोध इस बात से था कि यंत्रों के जरिये बने बड़े पैमाने पर उघोगों द्वारा आम जनता के शोषण और नतीजों में गरीबी और बेकारी के निरंतर बढ़ते जाने का रास्ता साफ हो गया था | गांधी जी उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में 1909 में प्रकाशित ‘हिंदस्वराज’ में यांत्रिकघोग और भोगवादी संस्कृति से होने वाले दुष्परिणामों का विस्तार से जिक्र किया था | गांधी जी का मानना था, “मेरा उद्देश्य तमाम यत्रों का नाश करने का नहीं हैं, बल्कि उनकी हद बांधने का है |” उन्होंने आगे कहा “ऐसे यंत्र नहीं आने चाहिए, जो काम न रहने के कारण आदमी के अंगो को जड़ और बेकार बना दें | यदि छोटे यंत्रों को बढ़ावा देने के लिए कोई बड़ा कारख़ाना लगाना पड़े तो ऐसे कारखानों का मालिक राष्ट्र हों या जनता की सरकार की ओर से ऐसे कारखाने चलाये जायें |” आर्थिक विकास पूर्णनिर्माण हेतु गांधी जी आर्थिक समानता लाने के पक्षधर रहे | उनके लिए उन्होंने यह माना कि पूंजी और श्रम के मध्य खड़े सभी विवाद और संघर्ष समाप्त हों | उन्होंने श्रम कि पवित्रता को बनाए रखते हुए ‘शारीरिक श्रम’ के महत्व पर बल दिया | गांधी जी का विकास का सही उदाहरण ‘ एनाकुलम (केरल राज्य) देश का प्रथम शत-प्रतिशत साक्षर राज्य है |

गांधी जी ने विकास और सामाजिक समस्याओं के समाधान के कई उपायों पर प्रयोग किए हैं, जिसका उदाहरण 1917 मे पश्चिम चंपारण, सेवाग्राम आश्रम, सत्याग्रह आश्रम आदि में किए गए प्रयोग जैसे प्रौढ़ शिक्षा, साक्षारता, ग्रामस्वराज, सिंचाई व्यवस्था, लधूघोग, खादी उघोग, स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता, आदि कार्यों से, सभी प्रकृति से जुड़ कर किया गया विकास है | सही अर्थों मे गांधी विकास मॉडल से देश का विकास हो सकता हैं, बिना प्रकृति का दोहन किए हुए |

📷 स्वैच्छिक संगठन का मानव विकास में भूमिका

गांधीय परिकल्पना में स्वैच्छिक संगठन की अवधारणा इस आधार पर की गई है कि “ये संस्थाएं समाज की सरंचना में परिवर्तन लाकर एक शोषणहीन, न्यायपूर्ण और सामूहिक भावना से परिवर्तन व्यवस्था का निर्माण करेंगे | यह व्यवस्था ऐसे होगी, जिसमे विभिन्न समूहों अथवा मानवीय क्रियाकलाओं और सम्बन्धों के बीच टकराव धीरे-धीरे गायब हो जाएगा | और व्यक्ति का पूर्ण विकास होगा |” गलत शासन पद्धति के निराकरण के साथ-साथ विकसित करने के लिए सहचर्य की जीवन पद्धति विकसित करने के लिए उन्होंने रचनात्मक कार्यक्रम एवं संस्थाएं दिनानुदिन सरकार का विकल्प बनकर जनाकांक्षाओं को पूरा करने में सक्षम हो जाएगी, जिससे सरकार जनजीवन में कम-से-कम हस्तक्षेप करेगी तथा सरकार की उपयोगिता स्वयं कम हो जाएगी | गांधी जी ने कई संस्थाएं खड़ी की किन्तु उनमें से एक भी वलांटियर संस्था नहीं थी, वे सब रचनात्मक कार्य की संस्थाएं थी | उनका उद्देश्य था भारत की आत्मा से निकली स्वप्रेरित सेवा की परंपरा को फिर से जागृत और आधुनिक संदर्भ में रखकर विकसित करना | यह एक वैकल्पित मार्ग हो सकता है | जहां स्वैच्छित संगठन प्रकृति के सहयोग से मानव का विकास के लिए काम करे | यह विकास सामाजिक, आर्थिक, आध्यात्मिक, व्यक्तित्व का विकास का कार्य करे | इनमें समाज के ऐसे शोषित वर्गों को जो दिखाई नहीं देते और असहाय हैं, दुर्दशा और चिंताओं से धीरे रहते हैं, वहाँ तक स्वैच्छिक संस्थाएं उसका विकास करे |

निष्कर्ष

गांधी मानव विकास मॉडल, सही अर्थों में मानव का सम्पूर्ण विकास कर सकता है | यह अंतिम व्यक्ति का विकास करने में सक्षम है | जिससे मानव जाति का सम्पूर्ण विकास हो पाए | साथ यह भी है की बिना शांति के विकास की कल्पना भी नहीं हो सकती है | जहां शांति होगी, वही विकास हो सकता है | यह विकास प्रकृति के दोहन से नहीं होना चाहिए, बल्कि विकास प्रकृति को सुरक्षित रखते हुए, मानव जाति का विकास होना चाहिए | क्योंकि विकास का केंद्र मानव ही है | प्रकृति के अंदर ही मानव सुरक्षित रह सकता है | महात्मा गांधी ने विकास का अर्थ– विकास एक पागल दौड़ है | विकास की प्रक्रिया एक दैत्याकार पैमाने पर समाज का सकारात्मक कार्य है | विकास का तात्पर्य मनुष्य के सर्वांगीण विकास से होन चाहिए | गांधीवादी विकास नीति में श्रम एक महत्वपूर्ण और स्वाभाविक प्रक्रिया है | हर मनुष्य को अपने जीवनयापन के लिए श्रम करना चाहिए | यह श्रम शुद्ध होना चाहिए | मानव विकास ‘प्रकृति-मानव-विकास’ को साथ ले कर विकास होना चाहिए | गांधी जी का विकास का अर्थ परिवर्तन, राष्ट्रनिर्माण, नियोजिन विकास, जिसका उद्देश्य एक ऐसे समतावादी समाज का निर्माण करना हैं, जो देश के शासन में जनता की सभागिता, सामाजिक समता, सभी के लिए और समान अवसर, आर्थिक समता के सिद्धांतों पर आधारित हो |

संदर्भ

📷 सिंह, वी.एन, जनमेजय, भारत में सामाजिक आंदोलन, रावत पब्लिकेशन्स, 2013

📷 मोदी, डॉ नृपेन्द्र प्रसाद, गांधी-दृष्टि, मानक पब्लिकेशन्स प्रा.लि, 2007

📷 गांधी,मोहनदास करमचंद्र,अनुवाद काशीनाथ त्रिवेदी, सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा, नवजीवन प्रकाशन मंदिर

📷 गांधी, मोहनदास करमचंद्र, अनुवाद अमृतलाल ठाकोरादास नाणावाती, हिन्द स्वराज्य, सर्व सेवा संध-प्रकाशन 2012

📷 Internet www.gandhiwikki.com

📷 योजना पत्रिका

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