विमर्श के विविध आयाम दलित बनाम आदिवासीसुमित कुमार मीना

शोधार्थी, हिंदी विभाग, राजस्थान केन्द्रीय विश्वविद्यालय, बांदर सिंदरी, किशनगढ़

E-mail : sumitmeena1990@gmail.com Mob. : 9929362008

विमर्शो के वर्तमान दौर में आदिवासी विमर्श अपेक्षाकृत नया पड़ाव है। दलित साहित्य के साथ-साथ आदिवासी साहित्य पर भी विमर्श हो। इन दोनों समुदायों के साहित्य में मुख्य रूप से अपने-अपने तरीके से सांस्कृतिक और सामाजिक वर्चस्ववाद के विरुद्ध संघर्ष दिखता है। कई बार लोग दोनों को एक ही मान लेते हैं और आदिवासी लेखन को अलग से न पहचान कर उसे दलित-लेखन में ही शामिल कर देते है। नब्बे के दशक में शुरू हुई वैश्वीकरण, सांप्रदायिकता और अस्मिताओं की राजनीति ने देश के बौद्धिक, अकादमिक और मीडिया जगत को विमर्श के नए आयाम दिए। धर्म और जाति के बारे में वे तमाम बातें उभर कर आईं, जो या तो ग्रंथों में थीं या फिर ग्रामीण समाज के भीतरी पर्तों में थीं। इसी दौरान दलित, स्त्री और आदिवासी साहित्य के विविध आयाम विमर्शों में आए और लोगों की संवेदना और समझ में वृद्धि हुई।

आज का दौर भूमण्डलीकरण और उसे वैचारिक आधार देने वाले उत्तर आधुनिक विमर्श और मीडिया की विस्मयकारी प्रगति का दौर है। इस दौर में साहित्य और उसके मूल में निहित संवेदनाओं के छीजते जाने की चुनौती अपनी जगह है ही, साहित्य और सामाजिक कर्म के बीच का रिश्ता भी निस्तेज किया जा रहा है। ऐसे में साहित्य की ओर से प्रतिरोध बेहद जरूरी हो जाता है। इधर साहित्य में आ रहे बदलाव नित नए प्रतिमानों और उनसे उपजे विमर्शों के लिए आधार बन रहे हैं। पिछले दशकों में शीतयुद्ध की राजनीति ने वैश्विक चिंतन को गहरे आन्दोलित किया, जिसका प्रभाव भारतीय साहित्य एवं कलाजगत् पर सहज ही देखा जाने लगा। इसी प्रकार भूमण्डलीकरण और बाजारवाद की वर्चस्वशाली उपस्थिति ने भी मनुष्य जीवन से जुड़े प्रायः सभी पक्षों पर अपना असर जमाया। इनसे साहित्य का अछूता रह पाना कैसी संभव था? उत्तर आधुनिकता, फिर उत्तर संरचनावाद और विखंडनवाद के प्रभावस्वरूप पाठ के विखंडन का नया दौर शुरू हुआ। इसी दौर में आलोचना, नारी विमर्श, दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श , सांस्कृतिक-ऐतिहासिक बोध जैसी विविध विमर्श धाराएँ विकसित हुईं। पिछले दो-तीन दशकों में एक साथ बहुत से विमर्शों ने साहित्य, संस्कृति और कुल मिलाकर कहें तो समूचे चिंतन जगत् को मथा है। हिन्दी साहित्य में हाल के दशकों में उभरे प्रमुख विमर्शों में स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श, वैश्वीकरण, बहुसांस्कृतिकतावाद आदि को देखा जा सकता है। ये विमर्श साहित्य को देखने की नई दृष्टि देते हैं, वहीं इनका जैविक रूपायन रचनाओं में भी हो रहा है।

दलित शब्द का अर्थ है- “जिसका दलन और दमन हुआ है, दबाया गया है, उत्पीड़ित, शोषित, सताया हुआ, गिराया हुआ, उपेक्षित, ....., रौंदा हुआ, मसला हुआ, कुचला हुआ, विनिष्ट, मर्दित, पस्त-हिम्मत, हतोत्साहित, वंचित आदि।”1 दलित लेखक डॉ. श्यौराज सिंह बेचैन के अनुसार “दलित वह है जिसे भारतीय संविधान ने अनुसूचित जाति का दर्जा दिया है।”2 मोहनदास नैमिशराय कहते हैं कि “दलित शब्द मार्क्स प्रणीत सर्वहारा शब्द के लिए समानार्थी लगता है, लेकिन दोनों शब्दों में पर्याप्त भेद भी है। दलित की व्याप्ति अधिक है, तो सर्वहारा की सिमित। दलित के अंतर्गत सामाजिक, धर्मिक, आर्थिक, राजनीतिक शोषण का अन्तर्भाव होता है, तो सर्वहारा केवल आर्थिक शोषण तक ही सीमित है। प्रत्येक दलित व्यक्ति सर्वहारा के अंतर्गत आ सकता है,......”3 ओमप्रकाश वाल्मीकि कहते हैं की “साहित्य के साथ दलित शब्द के जुड़ते ही उसकी व्यापकता और अधिक क्रान्तिबोधक हो जाती है।......दलित शब्द विरोध की अभिव्यक्ति का प्रतीक बन जाता है। मानवीय संवेदनाओं के सरोकारों से जुडकर सामाजिक प्रतिबद्धता स्थापित करता है।”4 दलित-विमर्श के शुरूआती चरण बुद्ध की वाणी में दिखाई देते हैं, जो निरंतर पालि,प्राकृत, अपभ्रंश जैसी जनभाषाओं से आगे बढ़ते हुए आधुनिक भारतीय भाषाओं के आरंभिक और मध्यकालीन काव्य में विस्तार लेते चले गए। विशेषतः मध्ययुगीन संत काव्य में इसकी मुखर अभिव्यक्ति हुई है, जिसने भारतीय समाज को गहरे आंदोलित भी किया। आधुनिक पुनर्जागरण के दौर में दलित चिंता का स्वर पुनः उभरा जो राष्ट्रीय आंदोलन को एक नया आयाम दे रहा था। इसी की सफल परिणति के रूप में ज्योतिराव फुले, डा. अम्बेडकर जैसे व्यक्तित्व सामने आए, जो न केवल दलित विमर्श को नई जमीन देते हैं, वरन् खुद भी जमीनी नेतृत्वकर्ता के रूप में परिवर्तन की दस्तक देते हैं। इनमें डा. अम्बेडकर का कार्य विशेषतः उल्लेखनीय है, जो दलित चेतना को न सिर्फ बृहतर आयाम देने में, वरन् उसे आंदोलनधर्मिता के साथ जोड़कर राष्ट्रीय आंदोलन के एक बड़े सवाल के रूप में उभारने में भी कामयाब रहे। समकालीन सांस्कृतिक परिदृश्य में दलित- विमर्श और दलित साहित्य की वैचारिक पीठिका को निर्मित करने में डा. अम्बेडकर की भूमिका निर्णायक और निर्विवाद रही है।

हिन्दी साहित्य में इस नए ढंग के दलित विमर्श का आगमन कुछ विलम्ब से हुआ है, फिर भी इसने बहुत कम समय में अपनी अलग पहचान बना ली है। खासतौर पर पिछले दो-तीन दशकों में इससे न सिर्फ सुंदर अतीत से आते मान-मूल्यों पर प्रश्न चिह्न लगाए हैं, वरन् कथित आधुनिकता और प्रगतिशीलता के आड़म्बर में छुपी दलित विरोधी मानसिकता पर भी अपना निशाना साधा है। दलित साहित्य को प्रायः ‘नकार’ का साहित्य कहा जाता है, इसके बजाय इसे प्रवाह का साहित्य कहना अधिक संगत है, क्योंकि यह अपनी स्पष्ट और खरी पहचान बनाने में सक्रिय है। यह स्थापित तथ्य है कि दलित चेतना के अभ्युदय में डा. अम्बेडकर की भूमिका विशेष उल्लेखनीय है, किन्तु यह भी स्वीकार करना होगा कि उनकी विचारधारा बुद्ध, कबीर, रैदास और ज्योतिराव फुले जैसे समतानिष्ठ चिंतकों से अनुप्रेरित थी। अम्बेडकर की यह दृष्टि उल्लेखनीय है कि हमें न सिर्फ पहले पहल भारतीय होना चाहिए, वरन् अंततः भी भारतीय ही बने रहना चाहिए, और कुछ नहीं। राष्ट्र की इसी कल्पना को वे आजीवन कर्म और विचार सभी धरातलों पर साकार करते रहे।

आदिवासी विमर्श इसी शृंखला की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है। भारत की कुल आबादी का लगभग 8.08 प्रतिशत अनुसूचित जनजातियों (शैड्यूल ट्राइब्स) के रूप में बांटा गया है। अनुसूचित जनजातियों(एस.टी.) को आदिवासी कहते है। “संस्कृत में आदिवासी शब्द का अर्थ है, किसी क्षेत्र के मूल निवासी जो आदिकाल से किसी स्थान विशेष में रहते चले आ रहे है”5 “जनजातियों को महात्मागांधी ने ‘आदिवासी’ नाम दिया था।”6 आदिवासी सदियों पुरानी परम्परा, संस्कृति और मूल्यों का ही दूसरा नाम है। “आदिवासी समाज को भारतीय मुख्य समाज से अलग मानव समाज माना जाता रहा है। कुल मिलाकर भारतीय समाज को जाति व आदिवासी दो बड़े वर्गों में विभाजित करके देखा जाता रहा है।”7 यह विमर्श प्रकृति के बीच अपने सहज जीवनबोध के साथ रहते चले आ रहे जनजातीय समुदायों के विस्थापन के त्रास को केन्द्र में लाता है। कथित आधुनिकता और विकास को प्रतिमानों के रहते न जाने कितने जनजातीय समुदायों को समाज की मुख्य धारा से परे जाने को विवश किया गया। यह विमर्श साहित्य में उनके दर्द को गहरी संवेदना के साथ उकेरने और उनके हिस्से की दुनिया लौटाने का आह्वान करता है। आदिवासियों की पहचान आज भी दलित-आदिवासी के रूप में की जाती है या अंग्रेजी में एससी एसटी कहकर आदिवासी की गिनती की जाती है। जब भी दलितों के उत्थान के लिये कोई नीति बनती है तो उसे आदिवासियों के लिये भी ज्यों की त्यों लागू कर दिया जाता है। जबकि दलित और आदिवासी दो पृथक-पृथक कौम हैं। जिनका इतिहास, जिनकी नस्ल और रीति-रिवाज, सब कुछ पृथक-पृथक हैं। इसलिये दोनों वर्गों की समाजिक, शैक्षणिक एवं आर्थिक समस्याएँ भी अलग-अलग तरह की हैं। आदिवासी शुरू से ही शहरों से दूर जंगलों और पहाड़ों में रहता आया है। जहाँ पर वह शिक्षा और आधुनिक सभ्यता से पूरी तरह वंचित हो गया। उसे समाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक पिछड़ेपन की पीड़ा और तिरस्कार दोनों को झेलना पड़ा है। आज भी आदिवासी की ये ही मूल समस्याएँ हैं। जिन्हें समझने के लिये आदिवासी मनो मस्तिष्क की जरूरत है

इन दोनों विमर्शों के साम्य-वैषम्य पर कुछ बिंदु इस तरह रखे जा सकते है –

1. दोनों विमर्श शुरूआती मंतव्य में अस्मितावादी है। आत्म-सम्मान की लड़ाई, पहचान की लड़ाई, शेष समाज से अपने को भिन्न मानने की कोशिश इनकी चिंता के केंद्र में है। यह अस्मितावाद उन्हें आत्म-केन्द्रित करता है। लेकिन उनके लेखन की धार को तीव्र करता है।

2. दोनों प्रतिरोधी आंदोलन है। यह प्रतिरोध तेवर उन्हें अस्मितावादी संकीर्णता से मुक्त करने की क्षमता रखता है।

3. आर्य मानव-समूहों द्वारा मूलवासियों के जिन लोगों को पकड़-दबोच कर सेवा के लिए रखते हुए समाज-प्रणाली के निम्नतर पायदान पर रखकर दोयम दर्जे का जीवन जीने को मजबूर किया, वे आज के दलित हैं और जिन्हें खदेड़कर जंगलों में जीने को विवश कर दिया, जहां उन्होंने प्रकृति और मानवेतर प्राणी-जगत के साथ सह-अस्तित्व की भावना से जीने के सूत्र खोज लिए, वे आज के आदिवासी हैं। इसलिए मूल स्वरूप एक होते हुए भी आज दोनों का जीवन और इतिहास अलग होता गया।

4. दोनों की धार्मिक परम्पराएँ, सांस्कृतिक विश्वास कुछ मामलों में हिन्दू धर्म से अलग हैं और कुछ में अलग। दलित हिन्दू के दायरे में ज्यादा आते है जबकि आदिवासी उस दायरे के सीमांत पर हैं।

5. पहला घटक सामाजिक स्तर पर अमानवीय शोषण का शिकार होता हुआ अछूत का दंश भोगता रहा और दूसरा घटक भौगोलिक स्तर पर अलग-थलग अपनी दुनिया में जीने के रास्ते खोजता रहा। इस दौर में दोनों ही वर्ग हाइटैक पूंजी संचालित तथाकथित विकास के बुल्डोजर के तले कुचले जाने की दुराशंका से चिंतित हैं।

6. साहित्य में दलित अभिव्यक्ति का वैचारिक आधार अंबेडकरवाद के रूप में दिखाई देता है, लेकिन आदिवासी साहित्य की इस तरह की कोई वैचारिक पृष्ठभूमि मुझे अभी नजर नहीं आती, चाहे बिरसा मुंडा, गोविंद गुरु नायक जैसे क्रांतिकारी नायक हमें दिखाई देते हों। यहां महाराष्ट्र के दलित व आदिवासी साहित्य की वैचारिकी को हमें अलग से देखना होगा। मेरी यह चिंता हिंदी साहित्य में आदिवासी अभिव्यक्ति को लेकर है।

7. आज के आदिवासी समाज का एक प्रतिरोधी अतीत और संस्कृति के स्तर पर समृद्ध धरोहर हमारे सामने हैं। वैश्वीकरण के इस दौर में आदिवासी के सामने सबसे बड़ा सवाल उसके अस्तित्व का बन पड़ा है। यह अतीत, संस्कृति और अस्तित्व का संकट दलित जीवन का सरोकार नहीं है। इसलिए दलित और आदिवासी साहित्य की विभाजन रेखा यहां नजर आती है, लेकिन जहां से यह घटक जन्मे, वहां से तार जोड़कर वैश्वीकृत पूंजी के वर्चस्व के खतरों को देखते हुए दोनों श्रेणियां इस दौर में भी निकट दिखाई देंगी।

8. एकरूपता और अनेकरूपता की स्थिति दोनों जगह है। आदिवासी समाज ज्यादा गहरे स्तर पर अनेकरूपी है। उतर और पश्चिम भारत को ही ध्यान में रखें तो इन इलाकों में रहने वाला आदिवासी समुदाय अपने सामाजिक-सांस्कृतिक गठन में बिल्कुल अलग-अलग है।

9. औपनिवेशिक दौर दलितों के लिए मोटे तौर पर लाभकारी रहा लेकिन आदिवासियों के लिए नुकसानदेह। प्राकृतिक संसाधनों पर उनका पारंपरिक अबाद अधिकार तभी प्रतिबंधित करना प्रारभ किया गया। उनके इलाकों में सरकारी दखंलदाजी बढ़ी। उनके आवागमन पर रोक लगने लगी और उनके स्त्रोतों का बाहरी लोगों द्वारा निजी मुनाफों के लिए अंधाधुंध दोहन होने लगा। ये बाहरी लोग आदिवासियों को ‘दिक’ (परेशान) करते-करते ‘दिक’ हो गए।

10. अस्मिता की लड़ाई के साथ दोनों अस्तित्व की लड़ाई भी लड़ रहे हैं। हमले, विस्थापन या बेदखली दोनों ही झेल रहे हैं। आदिवासियों का विस्थापन जहाँ बड़े पैमाने पर सरकारी नीतियों, तथाकथित विकास कार्यक्रम योजनाओं के चलते होता है, वहीं दलित वर्चस्वशालियों की घेरेबंदी, दमन और उत्पीड़न से तंग आकर एकल या सामूहिक रूप में अपना गाँव छोड़ने को मजबूर होते हैं। आदिवासी आधुनिकता की औपनिवेशिक विरासत के ‘विक्टिम’ हैं तो दलित परम्परा में निहित वर्चस्ववाद के।

11. आदिवासी अपनी परम्पराओं से ज्यादा जुड़े है, उनका संरक्षण चाहते हैं, लोक कथाओं तथा गीतों की धारा को प्रवाहित रहते देखना चाहते हैं वहीं दलितों के बारे में यह बात नहीं कही जा सकती। उनकी परम्पराओं, विश्वासों और संस्कारों में सवर्णवाद की अधिक घुसपैठ है। वे उससे मुक्त होना चाहते हैं। परम्परा के बरक्स आधुनिकता उन्हें अधिक स्वीकार्य है।

12. दलित साहित्य मुख्यत: आत्म कथात्मक है। इसी की अभिव्यक्ति तमाम विधाओं, साहित्य रूपों में हुई है। उनके साहित्य का एक बड़ा हिस्सा कविता तथा आत्मकथनों ने घेरा है जबकि आदिवासी लेखन कहानी और उपन्यास लेखन की ओर अधिक झुके दिखायी देते हैं। पारम्परिक मौखिक साहित्य के सत्व को बनाए रखते हुए वे उसका दस्तावेजीकरण करने को प्राथमिकता दे रहे हैं।

13. दोनों के साहित्य केंद्र में मनुष्य है ईश्वर नहीं। मानवीय अधिकारों को पाना व उनकी रक्षा करना उनका मुख्य लक्ष्य है।

14. स्कूली और विश्वविद्यालय पाठ्यक्रमों में दलित साहित्य को ज्यादा तवज्जो मिली है। उनके अलग से कोर्स भी पढाए जाने लगे हैं। आदिवासी को अभी यह स्पेस नहीं मिला है।

15. दोनों के जीवन और अभिव्यक्ति के ढंग में फर्क है। इनके स्रोत, सामाजिक ढांचा, संस्कृतिक, भौगोलिक स्थितियां, प्रतीक, मिथक, शैली, भाषा, जीवन-शैली सभी भिन्न हैं। एक को सभ्यता के बाहर कर जंगलों में खदेड़ दिया गया, तो दुसरे को मनुष्यता से ही बाहर कर अपने ही गाँवों की सीमओं पर पशुतुल्य जीवन जीने को मजबूर कर दिया गया।

संदर्भ ग्रंथ:-

1. दलित साहित्य का सौन्दर्य शास्त्र, ओमप्रकाश वाल्मीकि, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ. संख्या -13.

2. वही, पृ. संख्या -13.

3. दलित साहित्य का समाजशास्त्र, हरिनारायण ठाकुर, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, पृ. संख्या -51.

4. वही, पृ. संख्या -51.

5. आदिवासी कौन, रमणिका गुप्ता, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ. संख्या -29.

6. आदिवासी और उनका इतिहास, हरिश्चन्द्र शाक्य, अनुराग प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ. संख्या -4.

7. आदिवासी दुनिया, हरिराम मीणा, नेशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्ली, पृ. संख्या -1.

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